00:00आरणिय कांड का अध्याय चववन, रामालन की कथा का अत्यंत प्रसिद, नाटकिय और निरनायक प्रसंग है। इसी अध्याय में रावन
00:09साधु यानि भिक्षु का रूप धारण करके पंचवटी में आता है और छल से सीता का हरण कर लेता है।
00:15उस समय राम और लक्षमन कु
00:29के व्रिक्षों के बीच हलकी हवा चल रही थी। गोदावरी नदी का कल-कल प्रवाह सुनाई दे रहा था। लेकिन
00:36उस शान्ती के भीतर एक भयंकर घटना घटने वाली थी। सीता का अकेला पन। कुटिया के भीतर सीता अकेली थी।
00:43लक्षमन राम की खोज में जा चुके
00:59जब उसने देखा कि कुटिया में केवल सीता अकेली हैं तो उसके मन में अत्यंत प्रसन्नता हुई। रावन का साधु
01:06रूप। रावन ने अपनी मायावी शक्ती से एक साधु का रूप धारण कर लिया। उसने जटाधारण की भगवा वस्त्र पहने
01:14और हाथ में कमंडल�
01:15ले लिया। अब वो एक साधारण तपस्वी जैसा दिखाई दे रहा था। कुटिया के सामने आगमन। रावन धीरे धीरे कुटिया
01:22के सामने आया। उसने उचे स्वर में कहा भिक्षाम देही। सीता ने जब ये आवाज सुनी तो वे कुटिया से
01:29बाहर आई। सीता का सम्
01:33परा में अतिथी और साधू का सम्मान करना धर्म माना जाता है। सीता ने उस साधू का सम्मान पूर्वक स्वागत
01:39किया। उन्होंने विनम्रता से कहा। हे महात्मा, कृप्या बैठिये। लक्ष्मन रेखा का स्मरण। लेकिन जब सीता बाहर आने लगी तो
01:48उन्हें लक्�
02:01पूर्पनखा की बातों से भी अधिक सुन्दर रूप देखा। वो कुछ क्षणों तक सीता को देखता ही रह गया। रावन
02:07की प्रशंसा। रावन ने मधुर शब्दों में कहा। हे देवी, आप कौन हैं? आपका सौन्दर्य स्वर्ग की अपसराओं से भी
02:14अधिक है। सी
02:27सीता की बात सुनकर रावन की मन में और भी अधिक लाला चुत्पन हुआ। उसने कहा, हे सुन्दरी, तुम इस
02:33वन में क्यों कष्ट सह रही हो? मेरे साथ लंका चलो। सीता का क्रोध। ये सुनकर सीता अत्यंत क्रोधित हो
02:40गई। उन्होंने कठूर स्वर में कहा, मैं राम क
02:43की पतनी हूँ, मैं जीवन भर उन्हीं के साथ रहूंगी। रावन का असली रूप अब रावन का धैर्य समाप्त हो
02:50गया, उसने अपना साधू रूप त्याग दिया, क्षन भर में उसका विशाल और भयानक राक्षसी रूप प्रकट हो गया, उसके
02:57दस सिर और बीस भुज
03:00सिता का भय, रावन का भयानक रूप देखकर सिता भयभीत हो गई, उन्होंने जोर से राम और लक्ष्मन को पुकारा,
03:07लेकिन वे दोनों बहुत दूर थे, सिता हरन, रावन ने बल पूर्वक सिता को पकड़ लिया, उसने उन्हें अपने रथ
03:14में बैठा लिया, फिर वो आ
03:16आकाश मार्ग से लंका की ओर उड़ चला, सिता की पुकार, सिता रोते हुए पुकार रही थी, हे राम, हे
03:23लक्ष्मन, उनकी करुण पुकार पूरे वन में गूंज रही थी, आभूशन गिराना, सिता ने अपने आभूशन एक-एक करके नीचे
03:31गिराने शुरू कर दिये, �
03:32उन्हें आशा थी कि राम और लक्ष्मन इन आभूशनों को देख कर उनका मार्ग जान सकेंगे, आने वाले संघर्ष की
03:39शुरूआत, रावण सिता को लेकर लंका की ओर बढ़ गया, लेकिन उसे ये नहीं पता था कि इस एक घटना
03:45से एक महान युद्ध की शुरूआत होने
03:47यही घटना आगे चलकर राम रावण युद्ध का कारण बनेगी
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