00:00किश्किंधा कांड का अध्याय साथ, रामायन का अत्यंत वीर, निरनायक और साथ ही दार्षनिक द्रिष्टी से विवादित प्रसंग है।
00:08इसमें राम अपने मित्र सुग्रीव की सहायता के लिए उसके भाई बाली का वद करते हैं।
00:13इस घटना में धर्म, न्याय और नीती पर गहन प्रशन उठते हैं।
00:18किश्किंधा कांड, अध्याय साथ, बाली और सुग्रीव का युद्ध तथा बाली वद्ध।
00:24रिश्य मूख परवत पर मित्रता स्थापित होने के बाद, अब समय आ गया था प्रतिग्या निभाने का।
00:30राम ने वचन दिया था कि वे सुग्रीव को उसका राज्ये वापस दिलाएंगे।
00:35सुग्रीव की चुनौती
00:36सुग्रीव ने साहस जुटाया और बाली को युद्ध के लिए ललकारने का निरने लिया।
00:41वे किशकिंधा की ओर बढ़े, राम और लक्ष्मन कुछ दूरी पर छिपकर खड़े हो गए।
00:46किशकिंधा का दृष्य
00:48किशकिंधा नगरी उस समय अत्यंत भव्य थी, वानरों की चहल पहल और शक्ती का केंद्र, यहीं बाली राजा के रूप
00:56में शासन कर रहा था।
00:57पहली चुनौती
00:58सुग्रीव ने उचे स्वर में पुकारा, हे बाली, बाहर आओ और मुझ से युद्ध करो।
01:06सुग्रीव की आवाज सुनकर बाली क्रोधित हो गया, वो तुरंत बाहर आया, उसकी आँखों में अगनी थी, तारा की चेतावनी,
01:14बाली की पत्नी तारा ने उसे रोका, उसने कहा, आज का दिन शुभ नहीं है, मुझे लगता है कि कोई
01:20बड़ा संकट आने वाला है, लेकि
01:34की दुविधा, राम दूर से यह युद्ध देख रहे थे, लेकिन उन्हें एक समस्य आई, दोनों भाई बिलकुल एक जैसे
01:41दिख रहे थे, वे पहचान नहीं पा रहे थे कि कौन बाली है और कौन सुग्रीव, सुग्रीव की पराज है,
01:48इस कारण राम बान नहीं चला सके,
01:50उधर बाली ने सुग्रीव को बुरी तरह घायल कर दिया, सुग्रीव भाग कर वापस रिश्यमूक परवत परा गया, सुग्रीव का
01:58दुख, सुग्रीव अत्यंत निराश हो गया, उसने राम से कहा, आपने मेरी सहायता क्यों नहीं की, राम ने शांत स्वर
02:06में कहा, मैं त�
02:46दूसरा युद्ध
03:14बाली का प्रश्न
03:17बाली की बात सुनकर बाली को अपनी गल्ती का एहसास हुआ, उसने सिर छुका दिया, अंतिम ख्षन
03:23बाली ने अपने पुतर अंगद को सुग्रीव की सेवा में सौप दिया, उसने राम से कहा, मेरे पुतर का ध्यान
03:29रखना
03:30बाली का देह त्याग
03:31इसके बाद बाली ने शांती पूर्वक अपने प्राण त्याग दिये
03:35सुग्रीव का राज्य भिशेक
03:37बाली के बाद सुग्रीव को किश्किंधा का राजा बनाया गया
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