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रामायण: किष्किंधा कांड — अध्याय 62 l Ramayana: Kishkindha Kanda — Chapter 62.
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00:00किश्किन्धा कांड का अध्याय 62, कथा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड है। वर्षा जितु समाप्त हो चुकी है, लेकिन सुग्रीव
00:08अपने वचन को भूल कर भोग मिलास में लीन है। दूसरी और राम के हृदय में सीता के वियोग का
00:14दुख और सुग्रीव की उदासी
00:24किश्किन्धा कांड की अध्याय 62, वर्षा रितु के बाद राम का क्रोध और लक्षमन का प्रेशन, वर्षा रितु समाप्त हो
00:32चुकी थी, आकाश अब स्वच और निर्मल हो गया था, नदियों का जल शांत हो चुका था और वन फिर
00:38से यातरा के योग्य बंच चुका था
00:40ये वही समय था जिसका राम को लंबे समय से इंतिजार था
00:44प्रतीक्षा का अंत चिंता की शुरुवात
00:47राम ने सोचा अब तो सुग्रीव को अपना वचन निभाना चाहिए
00:51अब सीता की खोज आरंभ हो जानी चाहिए
00:54लेकिन दिन बीथते गए और किशकिंधा से कोई संदेश नहीं आया
00:58राम का दुख और क्रोध
01:01राम का हृदय व्याकुल हो उठा
01:03उन्होंने गंभीर स्वर में कहा
01:05जिसके लिए मैंने बाली का वद किया
01:07वही आज अपने वचन को भूल गया है
01:09सुग्रीव को अपने कर्तव्य का स्मरण कराना आवश्चक है
01:12उनकी वानी में दुख भी था और क्रोध भी
01:16लक्षमन का क्रोध
01:17राम की ये दशा देख कर
01:19लक्षमन का हृदय भी क्रोधित हो उठा
01:21उन्होंने कहा
01:22भाईया ये उचित नहीं है
01:24जिसने आपकी सहायता से राज्य पाया
01:26वही आज अपने वचन को भूल गया
01:28राम का सैयम
01:30राम ने लक्षमन को शांत करते हुए कहा
01:33लक्षमन क्रोध में निर्णय नहीं लेना चाहिए
01:35पहले उसे समझाओ
01:37यदि फिर भी न माने तब विचार करेंगे
01:39लक्षमन को आदेश
01:41राम ने लक्षमन से कहा
01:43तुम किशकिंधा जाओ
01:44सुग्रीव को मेरे वचन की याद दिलाओ
01:46लक्षमन का प्रस्थान
01:48लक्षमन तुरंत किशकिंधा की ओर चल पड़े
01:51उनकी आँखों में क्रोध था
01:52और हृदय में धर्म का संकल्प
01:54किशकिंधा नगरी में उस समय
01:56उत्सव और आनंद का वाताबरन था
01:58सुग्रीव राज सुखों में लीन था
02:01नृत्य, संगीद और विलास
02:03चारों ओर यही द्रिश्य था
02:05लक्षमन का क्रूध बढ़ना
02:07ये सब देखकर लक्षमन का क्रूध और बढ़ गया
02:09उन्होंने सोचा
02:11क्या ये वही सुग्रीव है
02:12जिसने राम से सहायता मांगी थी
02:15द्वार पर क्रोध
02:16लक्षमन महल के द्वार पर पहुँचे
02:18उनकी आखें अगनी के समान जल रही थी
02:20उनकी उपस्थिती से पूरा महल कांप उठा
02:23तारा का आगमन
02:24तभी बुद्धिमती तारा वहां आई
02:26उन्होंने लक्षमन के क्रोध को समझ लिया
02:29तारा की बुद्धिमता
02:30तारा ने विनम्रता से कहा
02:32हे लक्षमन, कृप्या क्रोध शांत करें
02:35राजा सुग्रीव अपने कर्तव्य को नहीं भूले हैं
02:38केवल समय की प्रतीक्षा कर रहे थे
02:39लक्षमन का शांत होना
02:41तारा के मधुर वचनों से
02:43लक्षमन का क्रोध कुछ शांत हुआ
02:45उन्होंने कहा
02:46यदि ऐसा है तो तुरंत राम के कार्य में लगना चाहिए
02:49सुग्रीव का पश्चाताप
02:51अब सुग्रीव को अपनी भूल का एहसास हुआ
02:54वो तुरंत लक्षमन के पास आया
02:56विनम्र निवेदन
02:57सुग्रीव ने सिर जुका कर कहा
02:59हे लक्षमन मुझसे भूल हो गई
03:01मैं राम के उपकार को कभी नहीं भूल सकता
03:04राम के पास जाने का निर्णै
03:06सुग्रीव ने तुरंत निर्णै लिया
03:08कि वो स्वयम राम के पास जाकर
03:10ख्षमा मांगेगा
03:11वानर सेना का आहवान
03:13सुग्रीव ने तुरंत अपने दूतों को भेजा
03:15सभी दिशाओं में संदेश भेजा गया
03:17सभी वानर तुरंत एकत्र हो
03:19Vishal Sena का आगमन
03:21कुछी दिनों में चारों दिशाओं से वानरों की Vishal Sena किशकिन्धा में एकत्र होने लगी
03:26परवतों, वनों और नदियों से लाकों वानर किशकिन्धा में एकत्रित हो गए
03:31नई शुरुआत
03:32अब सीता की खोज का समय आ गया था
03:35Raam ka uddeshya pura hoonay ki dishah mein badeh raha tha
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