00:00भगवद गीता श्लोक 37
00:01तस्मान नारह वय हंतू धारतराश्टरांस्वबांधवान
00:06स्वजनम ही कथा हत्वा सुखिन है स्याम माधव
00:09अनुवाद
00:11इसलिए हे माधव
00:13हमें अपने ही संबंधियों
00:15इन धृतराश्ट के पुत्रों की हत्या करना उचित नहीं है
00:19भला
00:20अपने ही स्वजनों को मार कर हम कैसे सुखी रह सकते हैं
00:24भावार्थ
00:25अर्जुन अब युद्ध से पीछे हटने का एक और कारण बताते हैं
00:30वो कहते हैं कि ये जो सामने खड़े हैं
00:33ये केवल दुश्मन नहीं
00:35मेरे अपने हैं
00:36चाचा, भाई, गुरू
00:38इन सब को मार कर मैं कौन सा सुख पाऊंगा
00:41क्या ऐसा राज्य, ऐसा विजय, ऐसा एश्वर्य
00:45जिनकी नीव अपने ही लोगों के खून से सनी हो
00:49क्या वो सच में सुख दायक होगा
00:51सीख, जब मो और ममता का परदा विवेक पर पढ़ जाता है
00:56तो इनसान सही और गलत में फर्क करना भूल जाता है
01:00कभी कभी धर्म के मार्क पर चलने के लिए कठे निर्ने लेने पड़ते हैं
01:04और गीता हमें उसी साहस की प्रेणा देती है
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