00:00हरे कृष्ण दोस्तों, मिशन भगवत गीता श्लोक दिवस 31, अध्याए 1, श्लोक 30
00:07श्लोक, गांडिवस रंस्ते हस्तात्वक चैव परी दहते, नच शक्नों में वस्थातू भ्रमतीव चमे मना, अनुवाद, मेरा गांडिव धनुष हाद से फिसल रहा है, मेरी तवचा जल रही है, मैं खड़ा भी नहीं रह पा रहा है, और मेरा मन जैसे चक्कर खा रहा है, भ
00:37अब हाथ में टिक नहीं रहा, तन भी काम प्रहा है, और मन भरम में पड़ चुका है, ये केवल शारिरिक ठकावट नहीं, बलकि मो, शोक और भय का गहरा प्रभाव है, शिक्षा, जब हम अपने कर्तव्य से भागने लगते हैं, तो शरीर और मन दोनों हमारा साथ छोड़न
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