00:00एक निर्मान स्थल पर काम करने वाला मजदूर रोज अपने छोटे बेटे को साथ लाता था।
00:06वो बच्चा इंटों के धेर पर बैट कर चुपचाप अपनी किताब खोल लेता।
00:10लंच ब्रेक में पिता पसीना पोचते हुए उसके पास बैटता और पूचता पढ़ाई ठीक चल रही है ना।
00:17एक दिन वहाँ काम देखने आए इंजीनियर की नजर उस बच्चे पर पड़ी।
00:21उन्होंने पूचा इसे यहां क्यो लाते हो ये जगे बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं है।
00:27मजदूर ने विनमरता से जवाब दिया साहब ताकि ये अपनी आखों से देख सके कि मेहनत क्या होती है।
00:34ताकि ये तय करे कि इसे यही जिन्दगी नहीं जीनी। उन्हें उस पिता की आखों में ठकान नहीं।
00:39सपना दिखाई दिया। अगले हफ़ते उन्होंने बच्चे की स्कूल फीस, किताबें और कोचिंग की जिम्मेदारी ले ली।
00:47मजदूर की आखे भराई। लेकिन उसने सिर्फ इतना कहा, साहब एक दिन ये आपको गर्व महसूस कराएगा।
00:56वही बच्चा पढ़लिक कर इंजीनियर बना और उसी कंपनी में नौकरी करने लगा।
01:01कुछ सालों बाद वो उसी प्रोजेक्ट का हेड बना, जहां उसके पिता कभी मजदूर थे।
01:07पहली मीटिंग में उसने सब के सामने कहा, मेरे पिता ने इमारते बनाई थी।
01:13अब मैं उनके सपनों को बनाऊंगा। दोस्तों, गरीबी हाला थै।
01:17पहचा नहीं, महत की नीव पर ही सपनों की इमारत खड़ी होती है।
01:22हाद वर्क बेल्स ट्रीम्स
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