00:00युद्ध कांड का अध्याय 82, रामान का चरम, सबसे महान और निर्नायक प्रसंग है. यहां राम और रावन के बीच
00:07अंतिम युद्ध होता है. एक ऐसा युद्ध जो केवल दो युद्धाओं का नहीं, बलकि धर्म और अधर्म, मर्यादा और एहंकार,
00:15सत्य और असत्य का अ
00:29दुख और प्रतिशोध की अगनी से जल रहा था. रावन का क्रोध, रावन ने गर्जना की, अब मैं स्वयम युद्ध
00:37भूमी में जाऊंगा. युद्ध की तैयारी, रावन ने अपने दिव्यरत को सजवाया, शक्तिशाली अस्त्र, कवच और भयानक सुरूब. युद्�
00:59उनकी चेहरे पर कोई भय नहीं था, केवल धर्म का तेज था. प्रारंभिक टकराव, दोनों महायोध्धा आमने सामने आये और
01:08युद्ध आरंभ हुआ. बाणों की वर्षा, रावन ने पहले आक्रमन किया, उसने तीव्यर गती से बाण चलाए. राम का प्रत्युत्तर,
01:17र
01:29बाईयु अस्त्र, ब्रह्मास्त्र की शक्ति, भयंकर द्रिश्य, पूरा आकाश अस्त्रों की चमक से भर गया, बिजली जैसी चमक, गर्जनाओं की
01:38गूंज और विनाश का द्रिश्य, रावन का पराक्रम, रावन अत्यंत शक्तिशाली था, उसके दसो सिर और बीसो भुज
01:46युद्ध में अद्भुत प्रभाव डाल रही थी, राम का धैर्य, राम हर आकरमन का शांती पूर्वक उत्तर दे रहे थे,
01:53उनकी हर चाल सटीक और विचार शील थी, देवताओं की चिंता, आकाश में देवता ये युद्ध देख रहे थे, उन्हें
02:01भी चिंता हो रही थी
02:02ये युद्ध कब समाप्थ होगा? तभी इंद्र ने अपना दिव्यरत भेजा, जिसे चलाने आये मातली, राम को सहायता, मातली ने
02:12राम से कहा, हे प्रभु, इस रत पर बैठकर युद्ध करें, युद्ध का नया चरण, अब राम रत पर आरूड
02:18होकर और भी शक्तिशाल
02:20रूप में युद्ध करने लगे, रावन की माया, रावन ने अपनी माया का प्रयोक किया, अनेक रूप बनाए, भ्रमुत्पन किया,
02:28राम की एकाग्रता, लेकिन राम ने अपने ध्यान और शक्ति से उस माया को भंग कर दिया, सिरों का रहस्य,
02:35राम ने कई बार रावन के स
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