00:00अरण्य कांड का अध्याय चवालीस अत्यंत रहस्यमय और आध्यात्मिक प्रसंगों से भरा हुआ है।
00:06इसमें राम, सीता और लक्षमन गहरेवन दंड का अरण्य में आगे बढ़ते हुए महान तपस्वी शरभंग रिशी के आश्रम में
00:14पहुँचते हैं।
00:15ये प्रसंग वैराग्य, तपस्या और मोक्ष की गहरी भावना को प्रकट करता है।
00:20अरण्य कांड अध्याय चवालीस महान रिशी शरभंग से भेट और उनका दिव्य देहत्याग।
00:27दंड कारण्य का विशालवन अपनी रहस्य महता के कारण अत्यंत अद्भुत प्रतीत होता था।
00:33घनेव रिक्षों के बीच से आती मंद हवा वन को जीवन्त बना रही थी।
00:37पक्षियों की मधुर ध्वनी और कभी-कभी जंगली पशुओं की गर्जना उस वन की गहराई का संकेद दे रही थी।
00:44इसी वन के बीच से राम, सीता और लक्षमन अपनी यात्रा आगे बढ़ा रहे थे।
00:49विराध के बाद की यात्रा
00:51राक्षिस विराध के साथ भयानक युद्ध के बाद भी तीनों के मन में भय नहीं था।
00:56राम का उद्देश्य स्पष्ट था, वन में रहने वाले रिशियों की रक्षा करना।
01:01सीता शांत भाव से राम के साथ चल रही थी और लक्षमन सदैव सतर्क थे।
01:05एक पवित्र आश्रम
01:07कुछ समय बाद उन्हें दूर से धुए की हलकी रेखा दिखाई दी।
01:11लक्षमन ने कहा, भया, लगता है कि पास में किसी रिशी का आश्रम है।
01:15जब वे आगे बढ़े तो उन्होंने एक शांत और पवित्र स्थान देखा।
01:19वहाँ अनेक तपस्वी साधना में लीन थे।
01:22ये आश्रम महान तपस्वी शरभंग रिशी का था।
01:25दिव्य द्रिश्य
01:26जब राम उस आश्रम के निकट पहुँचे तब उन्होंने एक अध्भुद द्रिश्य देखा।
01:31आकाश में दिव्य प्रकाश दिखाई दे रहा था।
01:33कुछ देवदूत आकाश से उतरते प्रतीत हो रहे थे।
01:37ऐसा लग रहा था मानो देवताओं का आगमन हुआ हो।
01:40इंद्र का आगमन
01:42बरसल उस समय देवताओं के राजा इंद्र शरभंग रिशी को स्वर्ग ले जाने के लिए आये थे।
01:47रिशी की महान तपस्या से प्रसंद होकर देवताओं ने उन्हें स्वर्ग का निमंत्रन दिया था।
01:52रिशी का निर्णै
01:53लेकिन शरभभंग रिशी ने इंद्र से कहा, मैं अभी स्वर्ग नहीं जाओंगा, मैं पहले राम के दर्शन करना चाहता हूँ,
02:00उनके मन में राम के प्रती गहरी श्रद्धा थी, राम का आगमन, कुछी समय बाद राम, सीता और लक्षमन आश्रम
02:07में पहुँचे, शरभभं
02:20से वन में हो रहे राक्षसों के अत्याचार के बारे में बताया, उन्होंने कहा, कि वन के अनेक रिशी इन
02:26राक्षसों से पीडित है, राम ने उन्हें आश्वासन दिया, जब तक मैं इस वन में हूँ, तब तक धरम की
02:32रक्षा होगी, देह त्याग का निर्णे, राम के दर
02:50से उस अगनी में प्रवेश कर गए, लेकिन ये कोई साधारन अगनी नहीं थी, ये उनके शरीर का त्याग करने
02:56की दिव्य प्रक्रिया थी, दिव्य रूप में प्रकट होना, कुछी क्षणों बाद उस अगनी से एक दिव्य तेज प्रकट हुआ,
03:03रिशी का सूक्ष्म और �
03:04तेजस्वी रूप आकाश की ओर उठने लगा, अब वे अपने दिव्य सुरूप में स्वर्ग की ओर जा रहे थे, राम
03:11का मौन, ये द्रिश्य देखकर राम, सीता और लक्ष्मन अत्यंत शांत और गंभीर हो गए, ये एक महन तपस्वी की
03:18अंतिम यात्रा थी, वन के सभी �
03:20दिशी उस दिश्य को श्रद्धा से देख रहे थे, आगे की दिशा, इसके बाद आश्रम के अन्य रिश्यों ने राम
03:26से प्रार्थना की, हे राम, कृप्या दंड का रण्य में रहने वाले सभी रिश्यों की रक्षा कीजिए, राम ने उन्हें
03:32वचन दिया कि वे अधरम का
03:34नाश करेंगे
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