00:00अयोध्याकांड का अध्याय 37 अत्यंत भावनात्मक और हिदय को स्पर्ष करने वाला प्रसंग है।
00:06इसमें भरत अपने बड़े भाई राम से मिलने के लिए चित्रकूट के निकट पहुँच जाते हैं।
00:11ये अध्याय भाई के प्रती प्रेम, पश्चाताप और मिलन की तीवर व्याकूलता को अत्यंत मारमिक रूप में प्रस्तुत करता है।
00:18अयोध्याकांड अध्याय 37 चित्रकूट के निकट पहुँच कर भरत की राम से मिलने की व्याकूलता।
00:25घने जंगलों और उचे पर्वतों से घेरा हुआ चित्रकूट उस समय अत्यंत शांत और पवित्रस्थान था।
00:31चारों और पक्षियों की मधुर्धोनी गूंज रही थी और मंद पवन व्रिक्षों की पत्तियों को हिला रही थी।
00:37इसी पवित्रस्थान के निकट अब अयोध्या से आया विशाल समूह पहुँचने वाला था।
00:42इस समूह का नेत्रित्व कर रहे थे भरत।
00:46भरत का बेचैन मन
00:47जैसे जैसे भरत चित्रकूट के पास पहुँच रहे थे, उनका मन और अधिक व्याकुल होता जा रहा था।
00:53उनके हृदय में अनेक भाव उमड रहे थे, पश्चाताप, प्रेम, आशा और भाये।
00:59वे बार-बार सोचते, राम भाया मुझे देखकर क्या सोचेंगे? क्या वे मुझे ख्षमा करेंगे?
01:06सेना को रोकना
01:07चित्रकूट के परवत दूर से दिखाई देने लगे। ये देखकर भरत ने अपनी सेना को रोक दिया।
01:13उन्होंने कहा, इतनी बड़ी सेना के साथ आगे बढ़ना उचित नहीं है। कहीं ऐसा न हो की राम भाया हमें
01:19देखकर चिंतित हो जाएं। इसलिए उन्होंने केवल कुछ लोगों के साथ आगे जाने का निर्ने लिया।
01:25गुरू वशिष्ट का साथ इस समय उनके साथ थे वशिष्ट, शत्रुगन और अयोध्या की माताएं। सभी के हिरदय में राम
01:33से मिलने की तीवर इच्छा थी।
01:35वन का मार्ग अव्वे धीरे धीरे वन के भीतर आगे बढ़ने लगे। मार्ग में हिरन, पक्षी और अन्य वन्य जीव
01:43दिखाई दी रहे थे। वातावरण अत्यंत शांत और पवित्र था।
01:47भरत की भावनाएं। हर कदम पर भरत का मन और अधिक भावख हो जाता। उन्हें याद आता कि राम ने
01:54किस प्रकार बिना किसी शिकायत के वनवास स्विकार कर लिया था। उन्हें ये सोच कर दुख होता कि ये सब
02:00उनकी माता के कारण हुआ था।
02:03राम की कुटिया की खोज। कुछ समय बाद उन्हें उस थान के संकेत मिलने लगे जहां राम रहते थे। वन
02:09के रास्तों पर पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे। गुरु अशिष्ठ ने कहा ये वही मार्ग है जहां से
02:15राम अक्सर आते जाते होंगे।
02:17मिलन का क्षण निकटा गया। अब भरत का हरिदय तेजी से धड़कने लगा। उन्हें महसूस हो रहा था कि वो
02:24क्षण बहुत निकट है जब वे अपने प्रिय भाई राम को देखेंगे। उनकी आँखें आसूँ से भराई। प्रार्थना। भरत ने
02:32मन ही मन प्रार्थना
02:33की। हे प्रभु मुझे राम भाईया के चरणों में गिरने का अफसर दीजिए। मैं उनसे क्षमा मांगना चाहता हूँ।
Comments