00:00अयोध्याकांड का अध्याय 35 अत्यंत भावनात्मक और रिदय को स्पर्ष करने वाला प्रसंग है। इसमें भरत अपने भाई राम की
00:08खोज में आगे बढ़ते हुए निशाद राज गुह से मिलते हैं। यह अध्याय, प्रेम, शंका, भक्ती और भाईचारे की गहरी
00:15भावन
00:16से भरा हुआ है। अयोध्याकांड अध्याय 35 भरत का निशाद राज गुह से मिलना और राम के बारे में पूछना।
00:26जब विशाल, सेना और प्रजा के साथ भरत चित्रकूट की ओर बढ़ रहे थे, तब वे धीरे-धीरे गंगा के
00:32तट के पास पहुँचने लगे। वहीं
00:46गुह को समाचार जब निशाद राज गुह को ये समाचार मिला कि अयोध्या से एक विशाल सेना इस दिशा में
00:52आ रही है तो वे चौक गए। उन्होंने सोचा इतनी बड़ी सेना यहां क्यूं आ रही है। कुछ ही समय
00:58में उन्हें पता चला कि इस सेना का नित्रित्व भरत
01:01कर रहे हैं। गुह की शंका गुह के मन में अचानक चिंता उत्पन हुई। उन्होंने सोचा कहीं ऐसा तो नहीं
01:09की भरत राम को नुकसान पहुचाने आये हों। उन्हें राम से अत्यंत प्रेम था। राम ने जब वन की ओर
01:15यात्रा की थी तब गुह ने उन्हें अपना सब
01:17से प्रियमित्र मान कर सहायता की थी। युद्ध की तैयारी। इस शंका के कारण गुह ने अपने निशाद युद्धाओं को
01:24बुलाया। उन्होंने कहा यदि कोई भी राम को हानी पहुचाने का प्रयास करेगा तो हम उसका सामना करेंगे। निशादों ने
01:44अपने धनु�
01:45की आवाज से पूराक्षेत्र गुँज उठा। लेकिन भरत का मन अत्यंत दुखी था। वे केवल राम से मिलने की इच्छा
01:52से आगे बढ़ रहे थे। पहली भेंट। आखिरकार भरत और गुह की भेंट हुई। गुह ने सावधानी से भरत को
01:59देखा। उन्होंने पूच
02:14उनके शब्दों में सच्चाई और प्रेम था। गुह का हिरदय पिखलना। भरत के शब्द सुनते ही गुह का हिरदय पिखल
02:23गया। उन्हें समझा गया कि भरत के मन में कोई छल नहीं है। उन्होंने तुरंत भरत को गले लगा लिया।
02:30राम की स्मृतिया। गुह ने भरत
02:45Bhrat Ka Dukh
03:14Bhrat Ka Dukh
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