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भगवद गीता – अध्याय 39 गुणत्रय विभाग योग।Bhagavad Gita – Chapter 39 Gunatray Vibhag Yoga.

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00:00अयोध्या कांड का अध्याय 49 रामायन के सबसे गहरे और दार्षनिक प्रसंगों में से एक है. इस अध्याय में भरत
00:09अपने बड़े भाई राम से अयोध्या लोटने का आग्रह करते हैं. ये केवल एक निवेदन नहीं, बलकि धर्म, कर्तव्य, सत्य
00:18और मर्यादा पर एक महा
00:20संबाद है. अयोध्या कांड अध्याय 49 भरत का राम से अयोध्या लोटने का आग्रह और धर्म की महान चर्चा. वन
00:30की शांत वादियों में उस दिन एक गंभीर वातावरण था. चित्रकूट के पवित्र परवतों के बीच राम की छोटी सी
00:38कुटिया के सामने अयोध्या के
00:40राजकुमार, माताएं, गुरू और मंत्री एकत्रित थे. सबकी आँखों में आसू थे और हृदय में एक ही इच्छा. राम, अयोध्या
00:50लोट जाएं. भरत का निवेदन. कुछ समय तक मौन रहने के बाद भरत आगे बढ़े. वे राम के सामने खड़े
00:58हुए लेकिन उनका
01:00सिर जुका हुआ था. उन्होंने अत्यंत विनम्रिस्वर में कहा, भाया, अयोध्या आपके बिना सूनी हो गई है. राज्य, प्रजा, माताएं,
01:10सब आपके लिए व्याकुल हैं. भरत की आवास कांप रही थी. सिंघासन का आग रहे. भरत ने आगे कहा, अयोध्या
01:19का सिंघ
01:20सिंघासन आपका है. मैं केवल आपका सेवक हूँ. उन्होंने हाथ जोड़कर राम से कहा, कृप्या, अयोध्या लोट आईए. राम का
01:29उत्तर. राम ने भरत की ओर प्रेम से देखा. उन्होंने शांत और गंभीर स्वर में कहा, भरत, तुम्हारे प्रेम को
01:37मैं समझता हूँ
01:38लेकिन पिता का दिया हुआ वचन मेरे लिए सबसे बड़ा धर्म है. राम के लिए धर्म और सत्य सबसे उपर
01:46थे. पिता के वचन का महत्व
01:48राम ने कहा, हमारे पिता, दशरत ने जो वचन दिया था, उसे निभाना हमारा कर्तब्य है. यदि मैं उस वचन
01:57का पालन नहीं करूंगा, तो ये अधर्म होगा.
01:59गुरु वशिष्ट की बात, इस समय अयोध्या के महान गुरु वशिष्ट भी आगे आए. उन्होंने राम से कहा, पुत्र, भरत
02:09का प्रेम सच्चा है, प्रजा भी तुम्हें वापस चाहती है, लेकिन राम अपने निर्णय पर अडिग रहे.
02:15धर्म की महान शिक्षा. राम ने सभी को समझाते हुए कहा, धर्म का मार्ग कभी-कभी कढ़िन होता है, लेकिन
02:24वही मार्ग सच्चा होता है. उन्होंने कहा, यदि हम अपने कर्तव्य से पीछे हट जाएं, तो समाज में धर्म कैसे
02:31बचेगा? भरत का दुख.
02:33राम की बात सुनकर भरत का हृदय तूट गया. उन्की आँखों से आशु बहने लगे. उन्होंने कहा, यदि आप अयोध्या
02:42नहीं लोटेंगे, तो मैं भी राजसिम्हासन स्विकार नहीं करूँगा.
02:46सभा का मौन. ये सुनकर वहां उपस्थित सभी लोग मौन हो गए. वन की शांती में केवल भावनाओं की गून
02:55सुनाई दे रही थी.
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