00:00श्रीमत भगवद गीता, सप्तम अध्याय, ज्यान विज्यान योग, भाग एक, परम ज्यान का प्रारंब और इश्वर की वास्तविक पहचान, ध्यान
00:11योग की परिपूर्णता के पश्चात, अब श्री कृष्ण अर्जुन को और भी गहरे रहस्य में प्रभेश कराते हैं.
00:18अब तक अर्जुन ने कर्म का रहस्य, सन्यास का अर्थ, ध्यान की साधना और योगी की श्रेष्टता समझ ली थी.
00:27परन्तु अब एक नया अध्याय प्रारंब होता है ज्यान और विज्यान का.
00:3222. ज्यान और विज्यान में अंतर. अर्जुन के मन में प्रश्ण उठा, हे कृष्ण ज्यान और विज्यान में क्या अंतर
00:41है? श्री कृष्ण ने समझाया, ज्यान सत्य का सैधान्तिक बोध है, विज्यान उस सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव है. ज्यान से
00:51हम समझते हैं कि प
01:02इतना मन मुझमें लगाओ, मेरा आश्रेलो और योग-युक्त होकर सुनो, मैं तुम्हें वो ज्यान दूंगा, जिसे जानकर कुछ भी
01:10जानना शेश नहीं रहेगा। ये अत्यंत गूढवचन है। जब मन पूर्णतह ईश्वर में स्थिर हो जाता है, तब वो सर्वोच्च
01:18सत
01:18को ग्रहन करने योग्य बनता है। दुरलब साधक। श्री कृष्ण कहते हैं, हजारों मनुष्यों में कोई एक सिध्धी के लिए
01:26प्रयास करता है, और उन प्रयास करने वालों में भी कोई एक मुझे तत्वतह जान पाता है। ये संकेत है,
01:34आध्यात्मे क्यात्रा दुरलब
01:35है, परंतु असंभव नहीं। जो धैर्य और श्रधा से आगे बढ़ता है, वो अंततह सत्य तक पहुँचता है। ईश्वर की
01:43द्वी प्रकृती। अब श्री कृष्ण अपने स्वरूप का गुढ रहस्य बताते हैं, उनकी दो प्रकार की प्रकृती है। एक अपरा
01:52प्रक�
02:06ये चेतन शक्ती है, जो जीवन देती है, जो आत्मा का स्वरूप है, इसी परा प्रकृती से समस्त जीवों का
02:14अस्तित्व है। श्रिष्टी का मूल सुरूत। श्री कृष्ण स्पष्ट कहते हैं, मैं ही संपूर्ण जगत का उदगम और ले हूँ।
02:22जैसे माला के मूती धा
02:24अगे में पिरोय रहते हैं, वैसे ही समस्त संसार ईश्वर में स्थित है। ये उपमा अत्यंत सुन्दर है। हम बाहरी
02:31रूप देखते हैं, परंतु भीतर की एकता को भूल जाते हैं। अर्जुन की जागरिती। अब अर्जुन समझने लगा था, ईश्वर
02:40केवल दूर बै
02:51ज्यान में अंतर है, समझ और अनुभव। मन को ईश्वर में स्थिर करना आवश्यक है, आध्यात्मिक सिध्धी दुरलब है, पर
03:00संभव है। ईश्वर की दो प्रकृतियां हैं, अपरा और परा। संपूर्ण श्रिष्टी का मूल स्रोत वही परमात्मा है। इस प्रकार
03:09स�
03:09तम अध्याय का प्रथम भाग हमें परम सत्य की ओर ले जाने वाले ज्यान के द्वार खोलता है। भाग दो
03:16इश्वर की सर्व व्यापकता और माया का रहसे। अर्जुन अब अत्यंत एकाग्र होकर श्री कृष्ण के वचनों को सुन रहा
03:24था। उसे ज्यात हो चुका था कि
03:26परमात्मा ही स्रिष्टी का मूल कारण है परंतु उसके मन में एक और प्रशन उठा। हे प्रभु यदि आप ही
03:33सब के मूल हैं तो क्या प्रत्येक वस्तुने विद्यमान हैं और यदि ऐसा है तो हम आपको देख क्यो नहीं
03:39पाते। श्री कृष्ण ने इस गूड रहसे को �
03:42खोलना प्रारंब किया। इश्वर की सर्व व्यापकता। श्री कृष्ण कहते हैं मैं ही जल में रस हूँ, सूर्य और चंद्रमा
03:50में प्रकाश हूँ, वेदो में प्रणव हूँ, आकाश में शब्द हूँ और मनुश्यों में पुरुशार्थ हूँ। ये अत्यंत सुन्द
04:10दिव्य सत्ता को नहीं पहचानते। प्रकृती में परमात्मा, प्रित्वी की सुगंध वही है, अगनी की उश्मा वही है, प्राणियों का
04:20जीवन वही है, तपस्वियों का तप वही है। अर्थात परमात्मा केवल दूरस्थ देवता नहीं, बलकि हर अनुभव का आधार
04:56।
04:57माया क्या करती है?
04:59वो वास्तविक्ता को ढग देती है.
05:01हमें बाहरी रूप में उल्जा देती है.
05:03एहंकार और एच्छाओं में बांध देती है.
05:06इसी कारण हम परमात्मा को सर्वत्र होते हुए भी नहीं पहचानते.
05:10माया से पार कैसे?
05:11श्री कृष्ण स्पष्ट समाधान देते हैं.
05:14जो मेरी शरण में आता है, वो इस माया को पार कर जाता है.
05:18अर्थात केवल बुद्धी से नहीं, केवल कर्म से नहीं,
05:22बलकि समर्पन और भक्ती से माया का आवरण हटता है.
05:25चार प्रकार के भक्त.
05:27श्री कृष्ण कहते हैं, चार प्रकार के लोग मेरी भक्ती करते हैं.
05:31एक आर्थ, दुखी, दो अर्थार्थी, धन की इच्छावाले,
05:36तीन, जिग्यासू, ज्यान की खोज करने वाले,
05:39चार, ज्यानी, जो मुझे तत्वतह जान चुके हैं.
05:43इन में ज्यानी भक्त सर्वोच्च है, क्योंकि वो प्रेम से, निश्काम भाव से ईश्वर को चाहता है.
05:49अब अर्जुन समझ रहा था, ईश्वर केवल स्रिष्टी का कारण नहीं, बलकि हरक्षन का आधार है.
05:55माया ही उसे अलग प्रतीत कराती है.
05:57उसके भीतर श्रद्धा और स्पष्टता दोनों बढ़ रहे थे.
06:01इस भाग का सार, परमात्मा सर्वत्र विद्यमान है.
06:05प्रकृती की प्रत्येक शक्ती उसी की अभिव्यक्ती है.
06:08त्रिगुण मई माया सक्ते को ढग देती है.
06:10समर्पन से माया पार होती है.
06:12ज्यानी भक्त सर्वोच है.
06:14इस प्रकार सप्तम अध्याय का दूसरा भाग हमें इश्वर की सर्व व्यापक्ता और माया के रहस्य को समझाता है.
06:21भाग तीन भक्तों के भेद और ज्यानी की सर्वोचि स्थिती.
06:26अर्जुन, अभीश्वर की सर्व व्यापकता और माया के रहस्य को सुनकर गहरे चिंतन में डूब गया
06:33उसके मन में एक सूक्ष्म जिग्यासा जागी
06:36हे कृष्ण, आपने चार प्रकार के भक्तों का उलेख किया
06:40क्या इन सब में कोई विशेश है और सच्चे ज्यानी की पहचान क्या है
06:45श्री कृष्ण ने अत्यंत प्रेम पूर्व कुत्तर दिया
06:49चार प्रकार के भक्त, पुनह विवेचन
06:52जैसा पहले कहा गया
06:54एक, आर्थ, जो दुख में इश्वर को पुकारता है
06:58दो, अर्थार्थी, जो धन, सफलता या लाब की कामना से भक्ती करता है
07:04तीन, जिग्यासू, जो सत्य को जानने की जिग्यासा से भक्ती करता है
07:09चार, ज्यानी, जो इश्वर को तत्वतह जानकर निशकाम भाव से प्रेम करता है
07:15इन चारों में भक्ती है, परन्तु उनकी भावना अलग-अलग है
07:19क्या सभी भक्त प्रिये हैं?
07:22श्री कृष्ण कहते हैं, ये सभी भक्त श्रेष्ठ हैं और मुझे प्रिये हैं
07:27ये अत्यंत करुणामय उद्घोश है
07:29चाहे कुई दुख में पुकारे, चाहे स्वार्थ से पुकारे, इश्वर उसे अस्विकार नहीं करते
07:35भक्ती का आरंब चाहे किसी भी कारण से हो, वे अंततह शुद्ध प्रेम की ओर ले जा सकता है
07:42ज्यानी क्यों श्रेष्ठ है?
07:43फिर भी श्री कृष्ण कहते हैं, ज्यानी तो मेरा ही स्वरूप है
07:47क्यों? क्योंकि ज्यानी मुझे सरवत्र देखता है, मुझ में ही स्थित रहता है
07:53और मुझे ही परम लक्ष्य मानता है
07:55उसकी भक्ती किसी इच्छा से प्रेरित नहीं होती
07:58वह ईश्वर को साधन नहीं, बलकि साध्य मानता है
08:02अनेग जन्मों के बाद
08:04श्री कृष्ण एक गहन सत्य बताते हैं
08:07अनेग जन्मों के बाद ज्यानी यह जानता है कि वासुदेव ही सब कुछ है
08:12यह ज्यान अचानक नहीं आता
08:14यह अनेक अनुभवों, संगर्षों और साधना के बाद परिपक्व होता है
08:19जब आत्मा बार-बार संसार का अनुभव कर लेती है
08:22तब उसे स्थाई सत्य की खोज होती है
08:25अन्य देवताओं की उपासना
08:27श्री कृष्ण कहते हैं
08:29जो लोग अन्य देवताओं की उपासना करते हैं
08:31वे भी अन्तत्ह उसी परमसत्य की ओर बढ़ रहे हैं
08:35परंतु सीमित फल प्राप्त करते हैं
08:37क्योंकि उनकी इच्छा सीमित है
08:39उनका लक्ष भी सीमित है
08:41परंतु जो परमसत्य को लक्ष बनाता है
08:44वे अनंत को प्राप्त करता है
08:45माया से ढखा हुआ सत्य
08:48अज्यानी लोग ईश्वर को केवल मानविय रूप में देखते हैं
08:52उसकी दिव्यता को नहीं पहचानते
08:54माया उनके विवेक को ढख देती है
08:56इसी कारण वे परमसत्य को समझ नहीं पाते
08:59अब अर्जुन का द्रिष्टिकोन और व्यापक हो गया
09:03उसे समझाया भक्ती के स्तर अलग-अलग हो सकते हैं
09:07परंतु अंतिम लक्ष एक ही है परमसत्य
09:10ज्यानी वही है जो ईश्वर को ही सब कुछ मान ले
09:13उसके हृदय में श्रद्धा और गहरी हो गई
09:16इस भाग का सार
09:18चार प्रकार के भक्त होते हैं
09:20सभी भक्त ईश्वर को प्रिय हैं
09:22ज्यानी भक्त सर्वोच है
09:24अनेक जन्मों के बाद वासुदेव सर्वम का ज्यान होता है
09:28सीमित इच्छाएं सीमित फल देती हैं
09:31Bhakti की परिपक्वता और ज्ञानी की सर्वोच स्थिती को स्पष्ट करता है.
09:46पिछले भाग में हमने जाना कि ज्ञानी भक्त ही सर्वोच है.
09:50अब श्री किरिष्ण अर्जुन को बताते हैं,
09:53कि मनुश्य ईष्वर को क्यों नहीं पहचान पाता,
09:55और माया कैसे सत्य को ढख देती है
10:00इश्वर सब को जानते हैं, पर सब उन्हें नहीं जानते
10:03श्री कृष्ण कहते हैं
10:06हे अर्जुन, मैं भूत, वर्तमान और भविश्य तीनों कालों को जानता हूं
10:11परन्तु, कोई भी मुझे तत्वतह नहीं जानता
10:15ये वचन अत्यंत गहन है
10:17इश्वर, सरवग्य है, काल से परे है
10:21सभी जीवों के हृदय में स्थित है
10:24परन्तु, मनुष्य अपनी सीमित बुद्धी के कारण उन्हें पहचान नहीं पाता
10:30इच्छा और द्वेश से उत्पन्न मोह
10:32श्री कृष्ण बताते हैं, कि मनुष्य जन्म लेते ही
10:36इच्छा यानी राग, द्वेश यानी वैर के द्वंध्व में फस जाता है
10:41यही द्वंध्व उसे मोह में डाल देता है
10:44और मोह सत्य को देखने नहीं देता
10:47जब मनुष्य किसी वस्तु को पाना चाहता है
10:51or who has a mind to be aware of the people who have a mind,
10:52then it will be a mind to be aware of the mind.
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11:41अधिदैव और अधियग्य रूप
11:44श्री कृष्ण अर्जुन को एक और गूड सत्य बताते हैं
11:48जो मुझे अधिभूत, अधिदैव और अधियग्य रूप में जानता है
11:52वो मृत्यू के समय भी मुझे नहीं भूलता
11:55यहां संकेत है ज्यान केवल सैध्धान्तिक ना हो
11:59बलकि जीवन और मृत्यू दोनों में स्थिर रहे
12:03मृत्यू के समय स्मरण
12:04जिसका जीवन भर का अभ्यास इश्वर स्मरण है
12:08वो अंतिमक्षण में भी उसी का चिंतन करता है
12:11और वही उसे परमगती तक ले जाता है
12:14अतह भक्ती और ज्यान केवल शास्त्र पढ़ने का विशय नहीं
12:18बलकि निरंतर अभ्यास का विशय है
12:21इस भाग का सार इश्वर सरवग्य हैं
12:25पर अज्यानवश मनुष्य उन्हें नहीं जानता
12:28इच्छा और द्वेश मोह उत्पन्न करते हैं
12:31शुद्ध कर्म और पुन्य से मन निर्मल होता है
12:34जो ब्रह्म को जानना चाहता है
12:36वो जन्म मरण से परे जा सकता है
12:39मृत्यू के समय स्मरण वही होता है
12:41जिसका जीवन भर अभ्यास किया गया हो
12:44इस प्रकार सप्तम अध्याय का ये चतुर्थ भाग हमें बताता है
12:48कि ज्ञान केवल बौधिक नहीं
12:50बलकि जीवन का निरंतर साधन है
12:52भाग पाँज
12:54परमात्मा का शाश्वत और अव्यक्त स्वरूप
12:57अब तक अर्जुन ये समझ चुका था कि इश्वर सर्वत्र है
13:01परन्तु माया के कारण मनुष्य उन्हें पहचान नहीं पाता
13:05अब श्रीकृष्ण उसे अपने अव्यक्त, शाश्वत और परम स्वरूप का और गहरा ग्यान देते है
13:11व्यक्त और अव्यक्त का रहस्य
13:13मनुष्य प्रायह इश्वर को केवल व्यक्त यानि रूप में दिखाई देने वाला समझता है
13:19वो सोचता है इश्वर केवल एक मानव रूप हैं
13:23एक सीमित देह में बंधे हुए हैं
13:25परन्तु श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं
13:27अव्यक्त से व्यक्त होना मेरा वास्तविक स्ववूप नहीं है
13:30मैं अनादी, अविनाशी और सर्वोच्च हूँ
13:34अर्थात इश्वर का मानव रूप केवल एक माध्यम है
13:38उनका वास्तविक स्वरूप असीम और अनन्त है
13:41माया से ढखा हुआ दिव्य स्वरूप
13:43इश्वर कहते हैं, मैं अपनी योग माया से आच्छादित रहता हूँ
13:48अज्यानी मुझे साधारण मनुष्य समझते है
13:50यहां एक गूड सत्य है
13:52जो केवल बाहरी रूप लेखता है, वो भ्रमित होता है
13:56जो तत्व देखता है, वही सत्य को भह जानता है
13:59जैसे सूर्य बादलों से ढख जाए, तो वो दिखाई नहीं देता
14:03परंतु वो अस्तित्व में बना रहता है
14:05सीमित बुद्धी की सीमा
14:07जिनकी बुद्धी सीमित इच्छाओं में उल्ची है
14:10वे इश्वर की अनंत सत्ता को नहीं समझ पाते
14:13वो सोचते हैं, इश्वर तो एक विशेश समय में जन्म लेते हैं
14:17उनका आरंभ और अन्त है
14:19परंतु ये अज्ञान है
14:21इश्वर काल, स्थान और परिस्थिती से परे है
14:24परम सत्ति की पहचान
14:26जो साधक निरंतर भक्ती करता है
14:29इच्छा द्वेश से मुक्त रहता है
14:31और मन को शुद्ध करता है
14:33वो धीरे-धीरे ये अनुभव करता है
14:35कि परमात्मा ही सब का मूल है
14:38सब उसी से उत्पन है
14:39और उसी में लीन होते है
14:41ये अनुभव केवल विजार नहीं
14:43बलकि आत्मा की प्रत्यक्ष अनुभूती बन जाता है
14:46मृत्यू से पूर्व जागरण
14:48श्रीकृष्ण संकेत देते हैं
14:51जो जीवन भर इश्वर को समझने का प्रयास करता है
14:54वो मृत्यू से पहले ही जागरत हो जाता है
14:56उसके लिए जीवन एक साधना है
14:59मृत्यू एक परिवर्तन मात्र है
15:01वो भाय से मुक्त हो जाता है
15:03अब अर्जुन के भीतर एक परिवर्तन स्पष्ट होने लगा था
15:07वो समझ रहा था इश्वर सीमित नहीं है
15:10उनका वास्तविक सुरूप अव्यक्त और अनन्त है
15:13मानव रूप केवल करुणा का माध्यम है
15:16उसकी द्रिष्टी बाहरी रूप से हटकर तत्व की और बढ़ने लगी
15:20इस भाग का सार इश्वर का वास्तविक स्वरूप अव्यक्त और शाश्वत है
15:25माया के कारण मनुष्य उन्हें सीमित समझता है
15:28इच्छाएं और सीमित बुद्धी सत्य को ढख देती है
15:31शुद्ध भक्ती और साधना से परम सत्य का अनुभव संभव है
15:35जो इश्वर को तत्वतह जान लेता है
15:37वो मृत्यों के भैसे मुक्त हो जाता है
15:40इस प्रकार सप्तम अध्याय का ये पंचम भाग हमें बताता है
15:44कि इश्वर को जानना केवल दर्शन नहीं
15:46बलकि अंतरमन की जागरती है
15:48भाग 6
15:49ज्यान और विज्यान का समन्वय
15:52अनुभूती की परिपूर्णता
15:54अब तक श्री कृष्ण ने अर्जुन को
15:56इश्वर के व्यक्त और अव्यक्त स्वरूप
15:58माया, भक्तों के भेद
16:00और ज्यानी की श्रीष्टता का वर्णन किया
16:02अब वे ज्यान यानि सैध्धान्तिक समझ
16:05और विज्यान यानि प्रत्यक्ष अनुभूती के अंतर
16:08और उनके समन्वय को स्पष्ट करते हैं
16:10ज्यान क्या है? ज्यान वो है
16:13जब हम सुनते हैं कि इश्वर सर्वत्र है
16:15जब हम समझते हैं कि आत्मा अमर है
16:18जब हम शास्त्रों से सत्य को ग्रहन करते हैं
16:21ये बौधिक समझ है
16:23मन और बुद्धी का स्विकार
16:25परंतु केवल ज्यान पर्याप्त नहीं
16:27विज्ञान क्या है? विज्ञान वो है जब हम वास्तब में अनुभव करते हैं कि इश्वर हमारे भीतर हैं, जब भाय,
16:35मोह और द्वेश स्वतह समाप्त होने लगते हैं, जब जीवन का प्रत्येक क्षन इश्वर की उपस्थिती का अनुभव बन जाए.
16:52ये अनुभव का सत्
16:57जैसे बीज बोया जाए, श्रद्धा, वो अंकुरित हो, ज्ञान, और फिर फल दे, विज्ञान. स्थिर बुद्धि की अवस्था, जब ज्ञान
17:06विज्ञान में बदल जाता है, मन स्थिर हो जाता है, इच्छाइक शीम अनुजाती है, संसार आकर्षन खो देता है, ऐसा
17:26सा
17:26कर्म में इश्वर, विश्राम में इश्वर, विचार में इश्वर, सब कुछ उसी की चेतना में डूब जाता है, अर्जुन की
17:34आंत्रिक स्पष्ठता, अब अर्जुन समझ रहा था, केवल युद्ध का निर्णय नहीं, बलकि जीवन का निर्णय भी सामने है, यदि
17:41वो ज
17:41विज्ञान को अनुभव में बदल ले, तो उसका प्रत्यक कर्म योग बन जाएगा. इस भाग का सार, ज्यान सैध्धान्तिक समझ
17:48है, विज्ञान प्रत्यक्ष अनुभूती है, श्रद्धा से ज्यान और ज्यान से अनुभव की यात्रा होती है, अनुभूत सत्य मन को
17:56स्थ
18:14ुपूर्ण शरणागती
18:27परम्भक्त की अवस्था कैसी होती है और शरणागती का वास्तविक अर्थ क्या है?
18:33परम्भक्त की पहचान
18:35परम्भक्त वो है जो ईश्वर को केवल पूजता ही नहीं बल्कि हर क्षण उन्हें अनुभव करता है।
18:41उसके लिए इश्वर कोई दूर स्थित सत्ता नहीं बल्कि जीवन का स्पंदन हैं।
18:46वो जान चुका है वासुधेव ही सब कुछ हैं।
18:50ये ज्ञान केवल शब्द नहीं उसके हृदय का सत्य बन चुका है।
18:55शरणागती का वास्तविक अर्थ
18:56शरणागती का अर्थ केवल हाथ जोड़ना नहीं।
19:00सच्ची शरणागती है अपने एहंकार का त्याग।
19:04अपने कर्मों का समरपन, अपने फल की अपेक्षा का त्याग।
19:08जब मनुष्य ये स्विकार कर लेता है कि मैं करता नहीं, वो ही करता है, तब ही शरणागती पूर्ण होती
19:14है।
19:15भय का अंत
19:16जिसने इश्वर को तत्वतह जान लिया, उसे मृत्यों का भय नहीं रहता, उसे हानी का भय नहीं रहता, उसे भविष्य
19:25की चिंता नहीं सताती, क्योंकि वो जानता है, सब उसी की योजना का भाग है।
19:30ये आंतरिक निर्भायता ही परंभक्ती का फल है।
19:34SANSAR MEN RAHTAY HUYE BHI MOOKT
19:36PARAMBHAKT SANSAR SE BHAGTA NAHIN
19:38WOH AAPNAY KARTAVYONKA PALAN KERTA HAY
19:41PARIWAR MEN, SAMAJ MEN, KARRIYA MEN
19:44PARANTU BHEITAR SE MOOKT RAHTA HAY
19:46USKAY KARM ABBANTHAN NAHIN BANTHAY
19:48KYUNKI UNMEN AASAKTY NAHIN HOTI
19:51ANTIMKSHAN KII STHIRTAH
19:52SHRI KRUSHN SANGKET KERTA HAYIN
19:55JOO JEEVAN BHAR EISHWAR MEN STHIT RAHTA HAY
19:57WOH ANTIMKSHAN MEN BHI VICHLIT NAHIN HOTA
20:04प्रदान करता है
20:05अर्जुन की अंतहस्थिती
20:07अब अर्जुन के भीतर एक नई स्पष्टता जाग चुकी थी
20:11वो समझ गया
20:12युद्ध केवल बाहरी नहीं है
20:14वास्तविक युद्ध भीतर है
20:16एहंकार और समर्पन के बीच
20:18यदि वो शरणागती को स्विकार कर ले
20:20तो उसका प्रत्य कर्म योग बन जाएगा
20:23इस भाग का सार
20:24परमभक्त इश्वर को सर्वत्र अनुभव करता है
20:28शरणागती एहंकार का त्याग है
20:30निर्भयता परमभक्ती का फल है
20:33संसार में रहकर भी मुक्त रहा जा सकता है
20:36स्थिर भक्ती अन्तिम क्षण में भी साथ रहती है
20:39इस प्रकार सप्तम अध्याय का ये सप्तम भाग
20:42हमें सिखाता है कि ज्यान का अन्तिम रूप
20:45पूर्ण समर्पन और निर्भय प्रीम है
20:48भाग आठ
20:53अब तक श्री कृष्ण ने अर्जुन को अपनी प्रकृती का रहस्य, माया का प्रभाव, भक्तों के भेद, ज्यानी की श्रेष्टता
21:02और पूर्ण शरणागती का महत्व समझा दिया।
21:05अब ये अध्याय अपने निशकर्ष की ओर बढ़ता है, जहां ज्यान और विज्यान एक पूर्ण अनुभूती में विलीन हो जाते
21:12हैं।
21:36माया से मुक्ती, इस अध्याय का एक मुख्य संदेश है, माया बलवान है, परंतु जो मेरी शरण में आता है,
21:43वो उसे पार कर जाता है।
21:45माया इच्छा उत्पन करती है, द्वेश पैदा करती है, मोह में डालती है, पर भक्ती और समर्पन से ये आवरण
21:53हट जाता है।
21:54परं सत्ति की प्राप्ती, जो साधक निरंतर समर्ण करता है, निशकाम भाव से कर्म करता है और हिर्दय को शुद्ध
22:02रखता है, वह अंततह यह अनुभव करता है, इश्वर ही सबका आधार है।
22:07ये अनुभव उसे स्थिर, शान्त और निर्भय बना देता है।
22:37भक्ती ही मार्ग है, ज्ञान और अनुभव का समन्वे आवश्चक है, उसकी आत्मा अब अगले गहन प्रश्णों के लिए तयार
22:44हो रही थी।
22:56सब्तम अध्याय का समग्रसार
22:59शरणागती से माया पार होती है
23:02जीवन का लक्ष परम सत्य की अनुभूती है
23:05इस प्रकार सप्तम अध्याय ज्यान विज्यान योग हमें सिखाता है
23:09कि ईश्वर को जानना ही नहीं उन्हें अनुभव करना और उनमें स्थित होना ही जीवन की परिपूर्णता है
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