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भगवद गीता – अध्याय 40 गुणत्रय विभाग योग।Bhagavad Gita – Chapter 40 Gunatray Vibhag Yoga.
#Shri Bhagwat Geeta motivation.

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Transcript
00:00Ayodhya Kanda का Adhyaay 40, Ramayana का अत्यंत प्रसिद्ध और भावनात्मक प्रसंग है.
00:06इस Adhyaay में भरत अपने बड़े भाई Ram से Ayodhya लोटने का अंतिम निवेदन करते हैं.
00:13जब Ram धर्म के कारण वनवास पूरा करने का निर्णे दोहराते हैं,
00:22यह प्रसंग त्याग, भक्ति और मर्यादा का सर्वोच उधारन माना जाता है
00:32बरत का राम की चरण पादुका लेकर औयोध्या लोटने का निर्णै
00:36वन की शांथ वादियों में उस दिन वातावरन अत्यंत गमवीर और भावुक था
00:41चित्रकूट के पवित्र परवतों के बीच राम की छोटी सी कुटिया के सामने अयोध्या की पूरी सभा उपस्थित थी
00:48सबकी आँखों में आशा थी कि राम अयोध्या लोटने के लिए तैयार हो जाएंगे
00:53लेकिन राम अपने निर्णय पर द्रिढ थे
00:56भरत का अंतिम निवेदन
00:58भरत एक बार फिर राम के सामने आए
01:01उनकी आखों में आशू थे और रिदय अत्यंत व्याकुल था
01:05उन्होंने हाथ जोड़ कर कहा
01:07भाया यदि आप अयोध्या नहीं लोटेंगे तो ये राग्ये मेरे लिए निरर्थक है
01:11मैं आपके बिना राजगद्दी स्विकार नहीं कर सकता
01:15उनकी आवाज में गहरा दर्द था
01:17राम का धर्म
01:20राम ने प्रेम से भरत की ओर देखा
01:22उन्होंने शांत्स्वर में कहा
01:24भरत मैं तुम्हारे प्रेम को समझता हूँ
01:27लेकिन पिता का वचन
01:28मेरे लिए सबसे बड़ा धर्म है
01:30उन्होंने स्पष्ट कहा
01:32जब तक 14 वर्ष पूरे नहीं होंगे
01:34मैं अयोध्या वापस नहीं लोट सकता
01:37भरत का महान निर्णे
01:38राम की ये बात सुनकर
01:40भरत कुछ समय तक मौन खड़े रहे
01:43फिर उन्होंने एक ऐसा निर्णे लिया
01:45जिसने इतिहास में उन्हें अमर बना दिया
01:47उन्होंने कहा
01:48यदि आप स्वयम अयोध्या नहीं लोटेंगे
01:51तो मैं आपके प्रतीक को ली कर जाऊंगा
01:53चरण पादुका की मांग
01:55भरत ने राम से विनम्रपा से कहा
01:58भाया, कृपया अपनी चरण पादुका मुझे दे दीजिए
02:01मैं उन्हें अयोध्या के सिंगहासन पर स्थापित करूँगा
02:04ये सुनकर वहां उपस्थित सभी लोग भावुक हो उठे
02:07राम का आशिरवाद
02:09राम ने अपनी पवित्र पादुका उतारी
02:12और उन्हें भरत को सौंप दिया
02:13भरत ने अत्यंत श्रद्धा के साथ
02:16उन पादुकाओं को अपने सिर पर धारन किया
02:18ये द्रिश्य इतना भावुक था
02:20कि सभी की आँखों से आंसु बहने लगे
02:23भरत की प्रतिग्या
02:24भरत ने सभा के सामने एक महान प्रतिग्या की
02:27मैं चौधा वर्षों तक अयोध्या का राजा नहीं बनूँगा
02:31मैं केवल राम की पादुकाओं का सेवक बनकर राज्य चलाऊंगा
02:34उन्होंने ये भी कहा कि यदि चौधा वर्ष पूरे होने के बाद भी
02:38राम वापस नहीं आये तो मैं अपने प्राण त्याग दूँगा
02:42त्याग का आदर्श
02:43भरत का ये त्याग और भक्ती अद्भुत था
02:46उन्होंने सत्ता को ठुकरा कर धर्म और भाई के प्रेम को चुना
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