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भगवद गीता अध्याय 13 क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग।Bhagavad Gita Ch 13 Kshetra-KshetrajyaVibhagYoga.

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00:00भगवद गीता
00:01अध्याय 13
00:03क्षेत्र क्षेत्रग्य विभाग योग
00:05भाग एक
00:07शरीर और आत्मा का रहस्य
00:10कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमी पर
00:12सूर्य अस्त होने के करीब था
00:14धूल से भरी हवा में
00:16युद्ध की तैयारी अब भी जारी थी
00:18सैनिक अपने हथियारों को
00:20समहाल रहे थे
00:20रथों के पहिये मिट्टी में गहरे निशान बना रहे थे
00:24लेकिन उस विशाल
00:26युद्ध भूमी के बीच
00:27एक रथ पर एक अलग ही युद्ध चल रहा था
00:29ये युद्ध था
00:31अज्यान और ज्यान के बीच
00:33रथ पर बैठे थे महान योद्धा
00:35अर्जुन और उनके सार्थी थे
00:38स्वयम योगेश्वर श्री कृष्ण
00:40अर्जुन अब तक
00:41बहुत कुछ समझ चुका था
00:43उसने कर्म का रहस्य सुना
00:45भक्ती का महत्व जाना
00:46और आत्मा की अमर्ता को भी समझा
00:49लेकिन अब उसके मन में
00:50एक नया प्रश्ण उठ रहा था
00:52उसने धीरे से पूछा
00:54हे प्रभु
00:56ये शरीर क्या है
00:57और इसके भीतर जो चेतना है वो क्या है
01:00मनुष्य का वास्तविक स्वरूत क्या है
01:03श्री कृष्ण मुस्कुराए
01:05ये प्रश्ण बहुत गहरा था
01:07और इसी प्रश्ण से प्रारंभ होता है
01:09क्षेत्र क्षेत्रग्य विभाग योग
01:12एक
01:13क्षेत्र क्या है
01:14श्री कृष्ण बोले
01:16हे अर्जुन
01:17ये शरीर जिसे तुम देख रहे हो
01:20इसे क्षेत्र कहा जाता है
01:222. Kshetra का आर्थ है Kheet
01:24जैसे किसान Kheet में बीज बोता है और समय के साथ फसल उगती है
01:29वैसे ही मनुष्य के कर्म इस शरीर रूपी Kheet में बोय जाते हैं
01:33और समय के साथ उनका फल मिलता है
01:36इस शरीर में ही सुख का अनुभाव होता है
01:39दुख का अनुभाव होता है
01:41प्रेम और क्रोध जन्म लेते हैं
01:43इसलिए इसे क्षेतर कहा गया है
01:452. क्षेतरग्य कौन है?
01:49अर्जुन ध्यान से सुन रहा था
01:50श्री कृष्ण ने आगे कहा
01:52He Arjun, who knows this body,
01:56he is a kshetraga that it belongs to.
01:58Kshetraga is the Atma.
02:00The body changes to the body.
02:02But that the body changes to the body.
02:04The body changes to the body.
02:05A body changes to the body.
02:07But Atma is a hawk.
02:09She always tries to change.
02:113. Manusyaka Sabse Bada Brahm.
02:14Krishna would call it,
02:18that the body changes to the body.
02:18That Swayam is not a body.
02:20He says,
02:21Koi kata hai, mahi sundar haun, mahi kamzor haun, mahi buna hoga haun.
02:26So wau vastav mein aapne šarir ke baare me baat kar raha hota hai.
02:29Lekin wau bhou li jata hai.
02:31Wau šarir nahi hai.
02:32Wau is šarir ka drashta hai.
02:344. Shariir ke tattv.
02:37Shri Krishna ni nai šarir ki prakriti ko sumjhaate huwe kaha.
02:40Ye shariir kai tattvohun se bana hai.
02:43Inne mahi shamil hai.
02:44Prithvi, jal, agni, vayu, akash.
02:48इसके साथ ही मन, बुद्धी, एहिंकार
02:52ये सभी मिलकर मनुष्य के शरीर और व्यक्तित्व का निर्मान करते हैं
02:57लेकिन इन सब के पीछे जो चेतना है वही वास्तविक शेत्रग्य है
03:015. शरीर का परिवर्तन
03:04श्री कृष्ण बोले
03:06हे अर्जुन, इस शरीर में लगातार परिवर्तन होता रहता है
03:10एक बालक धीरे-धीरे युवा बनता है, फिर वृद्ध हो जाता है
03:14लेकिन जो आत्मा उस शरीर में रहती है, वो नहीं बदलती, वो वही रहती है
03:19इसलिए जो व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है, वो जीवन के परिवर्तनों से विचलित नहीं होता
03:266. आत्मग्यान की शुरुवात
03:29श्री कृष्म ने कहा, जब मनुष्य ये समझने लगता है कि वो शरीर नहीं है, बलकि आत्मा है, तभी उसकी
03:37आध्यात्मिक यात्रा शुरू होती है
03:39यही है आत्मग्यान का पहला कदम
03:42जब ये ग्यान जागता है, तो मनुष्य का गृष्टिकोन बदल जाता है
03:47साथ, संसार को देखने का नया दृष्टिकोन
03:50जब कोई व्यक्ति क्षेत्र और क्षेत्रग्य का अंतर समझ लेता है, तो वो संसार को अलग दृष्टि से देखने लगता
03:57है
03:57अब वो केवल बाहरी रूप नहीं देखता, वो हर जीव में उसी दिव्य चेत्ना को पहचानने लगता है
04:03वो समझ जाता है, सभी जीवों के भीतर एक ही परम चेत्ना काम कर रही है
04:12फिर श्री कृष्ण ने एक और गहरा रहस से बताया
04:14उन्होंने कहा, हे अर्जुन, हर शरीर में जो आत्मा है, वो क्षेत्रग्य है
04:20लेकिन उन सभी आत्माओं के पीछे एक और महान चेत्ना है
04:24वो है परमात्मा, वो संपून ब्रहम्हांड का परम क्षेत्रग्य है
04:29वो सब कुछ जानता है, हर रिदय में वही निवास करता है
04:35अर्जुन की गहरी अनुभूति
04:37ये सुनकर अर्जुन के मनमे एक अद्भूत प्रकाश उत्पन्न हुआ
04:41अब उसे समझ में आ रहा था, मनुष्य केवल शरीर नहीं है
04:45वो एक शाश्वत आत्मा है जो इस संसार में अनुभव प्राप्त करने आई है
04:49और परमात्मा हर आत्मा के भीतर उपस्थित हैं
04:56इस प्रकार क्षेत्र क्षेत्रग्य विभाग योग एक बहुत महत्वपूर्ण सत्य को प्रकट करता है
05:02मनुष्य को अपने शरीर और आत्मा के अंतर को समझना चाहिए
05:06जब ये ज्यान जागता है तभी वास्तविक आध्यात्मिक जीवन शुरू होता है
05:12कुरुक्षेत्र की भूमी पर ज्यान का ये नया आध्याय प्रारंब हो चुका था
05:16अर्जुन के मन में अब और भी गहरी जिग्यासा जाग चुकी थी
05:20भाग दो
05:21ज्यान के वास्तविक गुण और आत्म ज्यान का मार्ग
05:25कुरुक्षेत्र की धर्ती पर ज्यान की वो दिव्य वार्ता आगे बढ़ रही थी
05:29रत के उपर खड़े थे महान योध्धा अर्जुन और उनके सामने थे योगेश्वर श्री कृष्ण
05:35अभी अभी श्री कृष्ण ने समझाया था
05:38शरीर शेत्र है और आत्मा क्षेत्रग्य
05:41लेकिन अब अर्जुन के मन में एक और प्रश्ण उठ रहा था
05:44उसने विनम्रता से पूछा
05:46हे प्रभू, यदि आत्मा को जानना ही सच्चा ज्यान है
05:49तो उस ज्यान तक पहुँचने का मार्क क्या है?
05:52मनुष्य सच्चा ज्यान कैसे प्राप्त करता है?
05:55शेक्रिष्ण मुस्कुराए
05:56और फिर उन्होंने वो रहस्य से बताया
05:58जो केवल बुद्धी से नहीं
06:00बलकि जीवन के आचरण से समझा जाता है
06:02एक, सच्चा ज्यान क्या है?
06:06शेक्रिष्ण बोले
06:06हे अर्जुन, मनुष्य अक्सर सोचता है
06:09कि बहुत सारी किताबे पढ़ लेना ही ज्यान है
06:11लेकिन सच्चा ज्यान केवल जानकारी का संग्रह नहीं है
06:15सच्चा ज्यान है अपने वास्थविक स्वरूप को जान लेना
06:19जब मनुष्य ये समझ लेता है
06:21वो शरीर नहीं है
06:22वो मन नहीं है
06:23वो बुद्धी भी नहीं है
06:24बलकि वो शास्वत आत्मा है
06:262. VINAMRATA
06:31ज्यान का पहला द्वार
06:33श्रीक्रश्ण ने कहा ज्यान का पहला गुण है विनमरता
06:37जो व्यक्ति अहंकारी होता है, वो कभी ज्यान प्राप्त नहीं कर सकता
06:41क्योंकि अहंकार मन को बंद कर देता है
06:43लेकिन विनमर व्यक्ति हमेशा सीखने के लिए तयार रहता है
06:47वो हर अनुभब से सीखता है और यही उसे आत्म ज्यान के करीब ले जाता है
06:523. अहिंसा
06:54सच्छा ज्यान मनुष्य के विवहार में भी दिखाई देता है
07:074. Sahin शीलता
07:315. सरलता
07:33सच्चे ज्यान का एक और गुण है सरलता
07:35ज्यानी व्यक्ति का जीवन दिखावे से भरा नहीं होता
07:38वो अपने जीवन को सादगी से जीता है
07:41उसके भीतर कोई छल या कपट नहीं होता
07:43उसका मन साफ होता है
07:45और यही सरल्ता उसे परम सत्य के करीब ले जाती है.
07:496. गुरू के प्रती श्रद्धा
07:51श्री कृष्ण ने कहा, आत्म ज्यान प्राप्त करने के लिए गुरू का मार्ग दर्शन आवश्चक है,
07:57क्योंकि गुरू वो दीपक है, जो अज्यान के अंधकार को दूर करता है.
08:01जब शिश्य विनम्रता और श्रद्धा से गुरू से ग्यान ग्रहन करता है,
08:04तो उसका जीवन धीरे-धीरे प्रकाश से भर जाता है.
08:087. आत्मसंयम
08:09ग्यान का मार्ग आसान नहीं होता.
08:11इस मार्ग पर चलने के लिए मनुष्य को अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रन रखना पड़ता है.
08:16इंद्रियां हमेशा भूगों की ओर भागती है,
08:19लेकिन ग्यानी व्यक्ति अपने मन को नियंत्रित करता है.
08:22वो जानता है, यदि मन भटक दिया, तो आत्म ग्यान की यात्रा रुग जाएगी.
08:278. संसार की अस्थिर्ता को समझना
08:30श्री कृष्ण बोले, ग्यानी व्यक्ति ये समझता है कि संसार की हर वस्तु अस्थाई है.
08:449. अकेले पन में आनंद
08:49ग्यानी व्यक्ति भीड में भी शांत रह सकता है और अकेले में भी, क्योंकि उसका मन अपने भीतर के संसार
08:56से जुड़ा होता है.
08:57उसे हमेशा बाहरी मनोरंजन की जरूरत नहीं होती, उसके भीतर एक गहरी शांती होती है.
09:0310. आत्म ग्यान की ओर यात्रा
09:05श्रीकृष्ण ने अंत में कहा, हे अर्जुन, जब मनुष्य इन गुणों को अपने जीवन में अपनाता है, तो उसका मन
09:12शुद्ध होने लगता है, और जब मन शुद्ध होता है, तब आत्मा का प्रकाश स्वयम प्रकट होने लगता है.
09:32भागतीन प्रकृती और पुरुष का गहरा रहस्य
09:38कुरुक्षेत्र की विशाल भूमी पर ज्ञान की यह दिव्यवार्ता आगे बढ़ रही थी.
09:43रत पर खड़े महान योध्धा, अर्जुन, अब पहले जैसे संशय में नहीं थे.
09:49उनके भीतर ज्ञान की जोती धीरे-धीरे प्रज्वलित हो रही थी.
09:54और उनके सामने खड़े थे योगेश्वर, श्री कृष्ण, जो इस ब्रह्मांड के सबसे गहरे रहस्यों को उजागर कर रहे थे.
10:02अभी तक श्री कृष्ण ने समझाया था शरीर क्या है, आत्मा क्या है, और सच्चा ज्यान क्या है.
10:10लेकिन अब वे उस रहस्य की ओर बढ़ रहे थे, जो पूरे ब्रह्मांड की सनरचना को समझाता है.
10:16एक, संसार की उत्पत्ती का रहस्या.
10:19श्री कृष्ण बोले,
10:21हे अर्जुन, यह संसार दो महान तत्वों से बना है, प्रकृती और पुरुष.
10:27इन दोनों के मिलन से यह संपूर्ण जगत अस्तित्व में आता है.
10:32यदि इन दोनों को समझ लिया जाए, तो मनुष्य स्रिष्ठी के रहस्य को समझ सकता है.
10:37दो, प्रकृती क्या है?
10:39श्री कृष्ठी ने कहा, प्रकृती वह शक्ती है, जिससे यह पूरा भौतिक संसार बना है.
10:46प्रकृती में शामिल हैं प्रिथ्वी, जल, अगनी, वायू, आकाश, और साथ ही मन, बुद्धी, एहंकार.
10:56ये सभी तत्वों मिलकर भौतिक जगत की रचना करते हैं.
11:00ये प्रकृती हमारे शरीर का भी निर्मान करती है, और इसी के माध्यम से संसार की हर वस्तु उत्पन होती
11:08है.
11:093. प्रकृती की कार्यशक्ती
11:11प्रकृती स्थिर नहीं है, उसके भीतर एक निरंतर गति विधी चलती रहती है.
11:17बीज से व्रिक्ष बनना, नदी का बहना, सूर्य का उदें होना, रितुओं का बदलना, ये सब प्रकृती की कार्यशक्ती के
11:25उधारण है.
11:26प्रकृती हमेशा परिवर्तन शील है, इसलिए संसार में कुछ भी स्थाई नहीं है.
11:324. पुरुष क्या है?
11:34अब श्री कृष्ण ने दूसरा रहस्य बताया.
11:37पुरुष.
11:38हे अर्जुन, पुरुष का अर्थ है चेतना.
11:42वह शक्ती जो इस शरीर को जीविद बनाती है.
11:45वह शक्ती जो अनुभव करती है.
11:47वह शक्ती जो देखती है, सुनती है, सोचती है.
11:52यही है पुरुष, आत्मा.
11:56पुरुष, साक्षी है.
11:58श्री कृष्ण बोले, पुरुष स्वयम कोई करम नहीं करता,
12:02वह केवल साक्षी होता है.
12:04जैसे कोई व्यक्ती एक नाटक देखता है,
12:07और मंच पर चल रही घटनाओं का साक्षी बनता है,
12:10वैसे ही आत्मा इस शरीर और संसार के अनुभवों की साक्षी होती है.
12:15शरीर कार्य करता है, मन सोचता है,
12:18इंद्रियां अनुभव करती हैं,
12:20लेकिन आत्मा इन सब की साक्षी होती है.
12:236. प्रकृती और पुरुष का मिलन
12:26अब श्री कृष्ण ने उस रहस्य को बताया,
12:29जो जीवन को जन्म देता है.
12:31उन्होंने कहा,
12:32जब पुरुष यानि चेतना प्रकृती यानि भौतिक शक्ती के साथ जुड़ता है,
12:38तब जीवन उत्पन्न होता है.
12:40प्रकृती शरीर बनाती है,
12:41और पुरुष उसमें चेतना भर देता है.
12:44जैसे एक दीपक में तेल और बाती हो,
12:46लेकिन जब तक अगनी न जले,
12:48तब तक प्रकाश नहीं होता.
12:50वैसे ही शरीर प्रकृती से बनता है,
12:53लेकिन जीवन आत्मा से आता है.
12:55साथ, कर्म और अनुभव
12:58श्री कृष्ण बोले,
13:00प्रकृती कर्म करती है,
13:01लेकिन पुरुष उन कर्मों के फल का अनुभव करता है.
13:05जब मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार सुख या दुख अनुभव करता है,
13:09तो वास्तब में वह प्रकृती के प्रभव को अनुभव कर रहा होता है.
13:12लेकिन आत्मा इन सब से परे है
13:15वह केवल अनुभव की साक्षी है
13:17आठ
13:18बंधन कैसे उत्पन्न होता है
13:21अर्जुन ध्यान से सुन रहा था
13:23श्री कृष्ण ने आगे कहा
13:25हे अर्जुन
13:26जब आत्मा प्रकृती के गुणों से स्वयम को जोड लेती है
13:29तब बंधन उत्पन्न होता है
13:31मनुष्य सोचने लगता है
13:33मैं शरीर हूँ
13:34मैं करता हूँ
13:36मैं भूगता हूँ
13:37यही आंकार उसे जन्म और मृत्यू के चक्र में बांध देता है
13:419. मुक्ती का मार्ग
13:43लेकिन यदि मनुष्य यह समझ ले
13:46कि वह प्रकृती नहीं है
13:47बलकि पुरुष है
13:48तो उसका द्रिष्टिकून बदल जाता है
13:51तब वह समझता है
13:52शरीर बदलता है
13:53लेकिन आत्मा नहीं बदलती
13:55कर्म होते हैं
13:57लेकिन आत्मा उनसे बंधी नहीं है
13:59यही समझ मुक्ती की शुरुवात है
14:02परम पुरुष
14:04फिर शरी कृष्ण ने सबसे बड़ा रहस्य बताया
14:07उन्होंने कहा
14:08हे अर्जुन
14:09हर जीव में जो आत्मा है
14:11वह पुरुष है
14:12लेकिन उन सभी आत्माओं के उपर
14:14एक सर्वोच्च चेतना है
14:16वह है परम पुरुष
14:18और वही परम पुरुष
14:20संपून ब्रह्मांड का आधार है
14:23ग्यारा
14:23परम पुरुष की उपस्थिती
14:25वह परम चेतना हर रिदय में निवास करती है
14:28वह साक्षी है
14:30मार्ग दर्शक है
14:31और सब का पालन करता है
14:33वह प्रकृती से परे है
14:35फिर भी
14:36संसार के हर कण में उपस्थित है
14:39बारा
14:39अर्जुन की गहरी समझ
14:41इन शब्दों को सुनकर
14:43अर्जुन के भीतर एक नई समझ जन्म लेने लगी
14:46अब उसे महसूस हो रहा था
14:48संसार केवल घटनाओं का समूह नहीं है
14:50ये प्रकृती और चेतना का एक अद्भुत नृत्य है
14:54और उस नृत्य का साक्षी स्वयम आत्मा है
14:58कुरुक्षेत्य की भूमी पर ज्ञान की यह गंगा निरंतर बह रही थी
15:02अर्जुन के मन में अब और भी गहरी जिग्यासा जाग चुकी थी
15:06भाग चार गुणों का प्रभाव और आत्मा की स्वतंद्रता
15:11कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमी पर ज्ञान की ये दिव्य वार्ता निरंतर प्रवाहित हो रही थी
15:17महान धनुर्धर अर्जुन अपने रत पर खड़े गहन ध्यान से सुन रहे थे
15:23और उनके सामने खड़े थे योगेश्वर श्रीकृष्ण जिनके प्रत्येक शब्द मानो ब्रह्मान्द के रहस्यों को खोल रहे थे
15:32अभी तक अर्जुन ये समझ चुका था शरीर क्या है आत्मा क्या है प्रकृती और पुरुष का संबंध क्या है
15:40लेकिन अब एक नया प्रश्ण सामने था यदि आत्मा स्वतंत्र है तो फिर मनुष्य बंधन में क्यूं है
15:46क्यूं वो सुख दुख मोह और भय में फस जाता है
15:50श्रीकृष्ण मुस्कुराए और उन्होंने प्रकृती के उस रहस्य को प्रकट किया जो मनुष्य के जीवन को नियंत्रित करता है
15:58पहला प्रकृती के तीन गुण
16:01श्रीकृष्ण बोले
16:03Hey Arjun, Prakriti केवल पदार्थों का समूह नहीं है, उसके भीतर तीन शक्तियां काम करती हैं. इन शक्तियों को कहा
16:12जाता है तीन गुण, सत्व, रजस, तमस. ये तीनों गुण संसार के हर व्यक्ति और हर वस्तु में माजूद हैं.
16:21पहला, सत्व गुण, प्रकाश और शान्ती. सबसे पहले श्री कृष्ण ने सत्व गुण का वर्नन किया. सत्व कार्थ है शुद्धता,
16:31प्रकाश, ज्यान, शान्ती.
16:33जब किसी व्यक्ति में सत्व गुण अधिक होता है, तो उसका मन शान्त रहता है. वो सत्य की खोज करता
16:40है. वो दूसरों के प्रती दयालू होता है. उसके जीवन में संतुलन होता है. ऐसा व्यक्ति ग्यान की ओर बढ़ता
16:47है और आत्मा के करीब पहुँचता है.
16:50दूसरा, रजस गुण, इच्छा और कर्म. दूसरा गुण है रजस. रजस का अर्थ है गतिविधी, इच्छा, महत्वा कांक्षा, कर्म. जब
17:01रजस अधिक होता है, तो मनुष्य लगातार कुछ पाने की इच्छा करता है. वो धन चाहता है, यश्य चाहता है,
17:08सफलता चाह
17:163. Tamas-gun, Ajnani and Jarta
17:213. Tamas-kart is Ajnani, Ajnani, Ajnani, Ajnani and Ajnani.
17:28जब किसी व्यक्ति में तमस अधिक होता है, तो वो सत्य को समज नहीं पाता, उसका मन भारी और सुस्थ
17:35हो जाता है, वो सही और घलत में अंतर नहीं कर पाता और धीरे धीरे उसका जीवन भ्रम में डूब
17:41जाता है.
17:425. तीनों गुणों का खेल
17:45श्री कृष्ण बोले, हे अर्जुन, ये तीनों गुण मनुष्य के जीवन में लगातार काम करते रहते हैं।
17:52कभी सत्व बढ़ता है, कभी रजस, कभी तमस।
17:55इसी कारण मनुष्य का मन कभी शांत होता है, कभी बेचैन और कभी सुस्त।
18:01संसार में जो कुछ भी हो रहा है, वो इन तीन गुणों के प्रभाव से ही हो रहा है।
18:06पांचवा, आत्मा इन गुणों से परे है, लेकिन यहां एक गहरा रहस्य है।
18:11श्री कृष्ण बोले, हे अर्जुन, ये तीनों गुण प्रकृती के हैं, आत्मा के नहीं।
18:17आत्मा शुद्ध है, स्वतंत्र है और इन गुणों से परे है, लेकिन जब आत्मा शरीर और मन के साथ जुड़
18:24जाती है, तो ऐसा लगता है, मानो वही इन गुणों से प्रभावित हो रही है।
18:29छठा, बंधन कैसे बनता है, जब मनुष्य ये सोचने लगता है, मैं ही कर्म कर रहा हूँ, मैं ही सुख
18:36दुख का अनुभव कर रहा हूँ, तब वो प्रकृती के गुणों से स्वयम को जोड लेता है, यही हंकार बंधन
18:42का कारण बनता है।
18:44साथवा, ज्यानी व्यक्ती की द्रिष्टी, लेकिन जो व्यक्ती ज्यान प्राप्त कर लेता है, वो समझ जाता है, कर्म प्रकृती करती
18:52है, गुण गुणों के साथ कार्य करते हैं, और आत्मा सिर्फ साक्षी है, तब वो कर्म करते हुए भी अंदर
19:00से स्वतंत्र रहता है।
19:01आठवा, गुणों से उपर उठने का मार्ग.
19:04अर्जुन ने पूछा, हे प्रभु, मनुष्य इन गुणों से उपर कैसे उठ सकता है?
19:09श्री कृष्ण बोले, जब मनुष्य ज्ञान प्राप्ट करता है, अपने मन को नियंतरित करता है, और परमात्मा में भक्ती रखता
19:17है, तब वो धीरे-धीरे गुणों के प्रभाव से मुक्त होने लगता है.
19:22नौवा, आत्मा की स्वतंत्रता.
19:24जब मनुष्य समझ जाता है के वो शरीर नहीं है, बलकि आत्मा है, तो उसके भीतर एक नई स्वतंत्रता जन्म
19:31लेती है. अब वो सुख में भी शान्त रहता है और दुख में भी, क्योंकि वो जानता है, ये सब
19:37प्रकृती के गुणों का खेल है.
19:3910. साक्षी भाव
20:09आत्मा हमेशा स्वतंत्र है और ज्ञान ही वो मार्ग है जो इस स्वतंत्रता को प्रकट करता है. कुरुक्षेत्र की भूमी
20:17पर ज्ञान की ये दिव्वे यात्रा आगे बढ़ रही थी और अर्जुन के भीतर आत्मबोध का प्रकाश और अधिक उजवल
20:23हो रहा था.
20:53भाग पाँच परमात्मा का सर्वव्यापी स्वरूप
20:57अर्जुन के मन में अभी भी कई प्रश्ण थे. उन्होने अभी-भी समझा था कि ये शरीर क्षेत्र है और
21:03आत्मा क्षेत्रग्य. लेकिन अर्जुन के मन में अब एक नया प्रश्ण उठ रहा था. यदि आत्मा शरीर से अलग है,
21:11तो फिर परमात्मा कहा है. क्या वो किसी �
21:42
21:43अब मैं तुम्हें उस परमसत्य का ज्यान दूँगा,
21:46जिसे जानकर मनुष्य जन्मरण के बंधन से मुक्थ हो जाता है,
21:49और यहीं से प्रारंब होता है परमात्मा के सर्व्यापी स्वरूप का अध्भुत्र हैस्य.
21:55परमात्मा, जो हर जगा है.
21:58श्रीकृष्ण बोले,
21:59हे अर्जुन, जिस परमसत्य को जानना चाहिए,
22:03वो ना तो केवल शरीर है और ना ही केवल आटमा,
22:06वो उससे भी परे है, वो है परमात्मा.
22:10परमात्मा, जो इस पूरे ब्रहमांड का मूल स्रोत है,
22:13जो हर वस्तु के भीतर मौजूद है,
22:16लेकिन फिर भी किसी एक वस्तु तक सीमित नहीं है.
22:20श्रीकृष्ण बोले,
22:21हे अर्जुन, परमात्मा के हाथ पाउं हर जगा हैं,
22:25उनकी आँखे हर दिशा में हैं,
22:27उनके कान हर धोनी को सुनते हैं,
22:29और उनका स्वरूप पूरे ब्रहमांड में व्याप्त है.
22:32ये सुनकर अर्जुन चकित हो गए,
22:34कैसे संभव है कि किसी के हाथ पाउं हर जगा हूं,
22:37कैसे संभव है कि कोई हर दिशा में देख सके,
22:41लेकिन यही तो परमात्मा का रहस्य है,
22:43वो किसी एक शरीर में सीमित नहीं हैं,
22:46वो हर शरीर में हैं,
22:47means they have used,
22:49they are all good in then,
22:50they are allbuilt."
22:51I believe in the world,
22:53earthly pride of anybody,
22:53that isしょう in such a forest.
22:56indiet 꽂 angular.
22:57But all tayheres gesund
23:01are suchnu.
23:03They are people who are finished
23:05up to sunам,
23:06Here,яние
23:07he Reasur
23:08going and ritual lies Him
23:17परमात्मा दिखाई क्यों नहीं देता अर्जुन ने पूछा हे प्रभु यदि परमात्मा हर जगह है तो हम उसे देख क्यों
23:25नहीं पाते श्री कृष्ण मुस्कुराए उन्होंने कहा हे अर्जुन परमात्मा को आँखों से नहीं देखा जा सकता उसे केवल ज्यान
23:34और अनु
23:47वो सबका आधार है श्री कृष्ण बोले हे अर्जुन ये पूरा संसार परमात्मा पर ही टिका हुआ है जैसे मिट्टी
23:57से ही घड़ा बनता है मिट्टी से ही दीवार बनती है मिट्टी से ही मूर्ती बनती है लेकिन घड़ा तूट
24:03जाए दीवार गिर जाए मूर्ती नश्�
24:42प्रमात्मा सदैव बना रहता है।
24:51प्रमात्मा सदैव बना रहता है।
25:22प्रमात्मा सदैव बना रहता है।
25:38प्रमात्मा प्रमात्मा और प्रकृति श्री कृष्ण ने आगे कहा।
26:08प्रमात्मा है आत्मा और प्रमात्मा जो ये सत्य देख लेता है।
26:17प्रमात्मा हर जीव में समान रूप से उपस्थित है, वो किसी से घणा नहीं करता।
26:22क्योंकि उसे पता है, जिसे वो चोट पहुँचाएगा, वो भी उसी परमात्मा का अंच है।
26:27और जो ऐसा समझ लेता है, वो कभी किसी के साथ अन्याय नहीं करता।
26:59आत्मा की मुक्ति
27:01Patswilin हो जाते हैं, तब वो ब्रम्भ को प्राप्ट कर लेता है।
27:04ये वही अवस्था है जहां मनुष्य का एहंकार समाप्थ हो जाता है।
27:09जहां उसका मन शांत हो जाता है।
27:11जहां वो समझ जाता है कि वो अलग नहीं है।
27:13वो उसी परम चेतना का अंच है।
27:16Arjun ka man badalne lagta hai.
27:18Shri Krishna ki baatye sunkar Arjun ka hirde dhira dhira badalne laga tha.
27:22Ab wo samajhne laga tha,
27:24ki jeevan keval yudh nahi hai.
27:26Jeevan eek divve rahasya hai,
27:28jishe samajhne ke liye manushye ko apne bheater jhaakna padta hai.
27:32Samaapan
27:32To mitro,
27:34Adhyay 13 ke is bhaag me,
27:36Shri Krishna ne hume eek mahan sattya bataya.
27:39Parmaatma ka hii dure nahi hai,
27:41wo har jagha hai,
27:42har jeev me,
27:43har kand me,
27:44har hirde me.
27:44Jho manushye is sattya ko samajh leeta hai,
27:47uska jeevan badal jata hai.
27:49Uske bheater prem á jata hai,
27:51karuna á jati hai.
27:52Aur sabse mehetupun,
27:53usse jeevan ka vastavik uddhishya samajh me á jata hai.
27:57Lekin,
27:58abhi bhi eek gehera rahasya baaki hai.
28:00Ághe Shri Krishna batayenge,
28:01kaisa manushye prakriti ke guno se upar uđtkar,
28:04atma ki svetantrita praapta kar saktata hai.
28:06Aur yahhi hume le jayega.
28:08Bhaag 6
28:09Atma ki nishkriyata
28:11aur prakriti ke karm ka rahasya.
28:13Kuruk shetra ki vishal bhoomii par
28:16gyan ki wo divyadharah
28:17abhi bhi prawaahit ho rahi thi.
28:20Ákash me surya dhire dhire
28:22pashchim ki aur jhuk raha tha.
28:24Yudh ka samayi nazdik á raha tha.
28:27Lekin,
28:28us rat par khađe dho divyavyaktitv
28:30abhi sansar ke sabse
28:32ghehere rahasyao pər
28:33charcha kar rahe thi.
28:34Ek aur thay mahan yodhha,
28:37Arjun,
28:38aur dúsri aur thay
28:39Yogeshwar,
28:40Shri Krishna.
28:42Arjun ka man
28:43abh pehle se kahin adhik shant tha.
28:45Lekin,
28:46uske bheetar abhi bhi
28:47eek gheheri jigyasa thi.
28:49Usnei púcha,
28:50Hei prabhu,
28:52yadhi atma shudh
28:53aur swatantra hai,
28:54to phir manushy karmo
28:55ke bhandhan me kyu bhandh jata hai?
28:58Kón vastav me karm karta hai?
29:00Arjun ka yye prashn
29:02bhout ghehera tha
29:02aur aur iska uttar
29:04aadhyatmik jyan ke sabse mehtwapun
29:06rahasyao me se eek hai.
29:08Eek,
29:09kón karta hai karm?
29:11Shri Krishna nye shant swar me kaha,
29:14Hei Arjun,
29:15Is san saar me jyobhi karm ho rahe hai,
29:18vye vastav mei prakriti dwara kiyye jate hai.
29:22Manushyya souchta hai,
29:23मैi chal raha hou,
29:24मैi bol raha hou,
29:25मैi kama kar raha hou,
29:27Lekin,
29:28yye pura karya prakriti ke madhyam se hoota hai.
29:312.
29:32Shariir aur prakriti ka sambandh
29:34Shariir prakriti se bana hai.
29:37Is shariir ki indriyaan,
29:38ákhen,
29:39kaan,
29:40hat,
29:40pair,
29:41sab prakriti ke hi angg hai.
29:43Jab koji vyakti chalta hai,
29:45toh pair chalte hai.
29:46Jab koji dhekta hai,
29:48toh ákhen dhekhti hai.
29:50Jab koji souchta hai,
29:51toh man aur buddhi kama karte hai.
29:54Lekin,
29:54átma inmei se kuch bhi nahi kerti.
29:573.
29:58Átma keval sakshi hai.
30:00Shri Krishna bolei,
30:02Hei Arjun,
30:03átma keval sakshi hai.
30:05Jaysse koji vyakti
30:06nadhi ke kinaare bẹt kar
30:08páni ko bhehte huyye dhekta hai,
30:09viesse hii átma,
30:11shriir aur man ki gatvidhiyo ko dhekhti hai.
30:14Voh swayam koji karm nahi kerti.
30:16Voh keval anubhav kerti hai.
30:194.
30:20Bhrahm kahaan se átá hai?
30:22Lekin,
30:22samasya tib paida hooti hai,
30:24jab manushya apne šriir ke saath,
30:26swayam ko jodh leta hai.
30:28Voh souchnay lagta hai,
30:29mein hii ye sab kar raha huu.
30:31Yehi ahankar bendhan ka karan bantah hai.
30:34Jab manushya apne karmo ka karta bantah hai,
30:37toh woh unke phal se bhi bantah jata hai.
30:405.
30:41Gjani vyakti ki dhrişthi.
30:43Lekin,
30:44joh vyakti gjani prapta kar leta hai,
30:46voh is rahasya ko semaj jata hai.
30:48Voh jantah hai,
30:49karm prakrti kerti hai,
30:51indriyaan apne vishayon me kárrye kerti hai,
30:54aur atma in sab ki sakshi hai.
30:57Is liye voh karm kerte huuye bhi,
30:59anndar se swatantra rehatta hai.
31:026.
31:02Aakash ka udhaharana
31:04Shri Krishna ne iis sattya ko semjhane ke liye
31:07ek sundar udhaharana diya.
31:09Unhohu ne kaha,
31:10He Arjun,
31:11Aakash har jaga maujud hai,
31:14voh sab kuch apne bheitar semethe huye hai,
31:16lekiin Aakash kisii bhi vashtu se prabhahavit nuhi hota.
31:20Usi prakara atma,
31:21šarir me rahate huye bhi
31:23uske karmoh se prabhahavit nuhi hoti.
31:267.
31:26Surya ka udhaharana
31:28Phrir Shri Krishna bolei,
31:29जैसे एक surya pūrhe sansar ko prakash djeta hai,
31:33वैसे ही आतma pūrhe shriir ko chetna djeti hai.
31:37यदी आतma na ho,
31:39तो shriir keval एक nirjeev vashtu ben जाएगा.
31:42इसलिए शरीर का जीवन
31:43आतma की उपasthiti से ही संभav hai.
31:468.
31:47कर्म से परेक इस्थिती
31:49जब मनुष्य ये समझ लेता है
31:51कि आतma वास्तव में करता नहीं है,
31:53तब उसका दृष्टिकोन बदल जाता है.
31:56अब वो कर्म तो करता है,
31:58लेकिन भीतर से शांत रहता है.
32:00उसे कर्मों के फल की चिंता नहीं रहती,
32:02क्योंकि वो जानता है,
32:04कर्म प्रकृती के माध्यम से हो रहे हैं.
32:10यही समझ आतma की स्वतंतरता का द्वार खोलती है.
32:13अब मनुष्य समझ जाता है,
32:15वो शरीर नहीं है,
32:16वो मन नहीं है,
32:18वो कर्मों का करता भी नहीं है.
32:20वो एक शुध चेतना है,
32:2310. Mukti का अनुभव
32:5110. Mukti के भीतर अब आत्म ज्यान का दीपक जल चुका था, लेकिन अभी भी एक अंतिम रह से बाकी
32:57था।
33:2410. Mukti के भीतर अब आत्म ज्यान का दीपक जल चुका था, लेकिन उसके मन में एक और प्रश्न उठ
33:43रहा था, उसने विनम्र होकर पूछा,
33:45हे प्रभू, यदि आत्मा शुद्ध और एक ही है, तो फिर संसार में इतने भिन भिन जीव क्यों दिखाई देते
33:52हैं, क्या सब के भीतर एक ही परमात्मा है।
33:56अर्जुन का ये प्रश्न आध्यात्मिक ज्यान के सबसे उचे स्तर को छूता था।
34:27दो, शरीर अलग-अलग, आत्मा एक, शरीर अलग-अलग हो सकते हैं, किसी का शरीर बड़ा है, किसी का छोटा,
34:35किसी का रूप सुन्दर है, किसी का साधरन, लेकिन आत्मा सब में एक ही है, जैसे कई अलग-अलग दीपकों
34:42में एक ही प्रकार की अगनी जलती है, वैसे ही सभ
35:114. भेद भाव का अंत
35:25अन्याय नहीं करता क्योंकि वह समझ चुका होता है दूसरे को दुख देना वास्तव में स्वयम को दुख देना है
35:325. परमात्मा की समान उपस्थिती
35:36श्री कृष्ण ने कहा
35:506. सच्चा दर्शन
35:57जब कोई व्यक्ती हर जीव में परमात्मा को देखने लगता है तब उसका जीवन पूरी तरह बदल जाता है
36:04अब उसका व्यभार करुणा और प्रीम से भर जाता है
36:07अब वह हर जीव का सम्मान करता है
36:10क्यूंकि वह जानता है हर जीव परमात्मा का ही एक रूप है
36:147. आत्म ज्यान का सर्वोचिस्तर
36:17श्री कृष्ण बोले
36:19हे अर्जुन जो व्यक्ती यह समझ लेता है कि सभी जीवों में वही एक परमात्मा है
36:25वह वास्तव में सच्चा ज्यान प्राप्त कर चुका है
36:27ऐसा व्यक्ती कभी भ्रम में नहीं पढ़ता
36:30वह संसार के भेदों के पार सत्य को देख लेता है
36:348. मुक्ती की ओर कदम
36:37जब मनुष्य इस सत्य को अनुभव कर लेता है
36:40तब वह धीरे-धीरे मुक्ती की ओर बढ़ने लगता है
36:43क्योंकि अब उसके भीतर एहंकार समाप्त हो जाता है
36:47अब वह केवल प्रेम और करुणा के साथ जीवन जीता है
36:51और यही आध्यात्मिक जीवन की सबसे उची अवस्था है
36:55कुरुक्षेत्र की उस पवित्र भूमी पर ज्ञान का प्रकाश और भी उज्वल हो चुका था
37:00अर्जुन के हृदय में अब सत्य की एक नई जीती जलूठी थी
37:04लेकिन श्रीकृष्ण के दिव्य उपदेश अभी समाप्त नहीं हुए थे
37:08भाग आठ
37:09प्रकृर्टी और आत्मा का अंतिम रहस्य
37:13कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमी पर ज्ञान का अध्भुत प्रवाह जारी था
37:17रत के उपर खड़े महान धनुर्धर अर्जन अब पहले से कहीं अधिक शान्त और गंभीर दिखाई दे रहे थे
37:24और उनके सामने खड़े थे योगेश्वर श्रीकृष्ण जो संसार के सबसे गहरे आध्यात्मिक रहस्यों को प्रकट कर रहे थे
37:32अब श्रीकृष्ण ज्यान के अंतिम और सबसे महत्वपूर सत्य को बताने वाले थे
37:38एक प्रकृष्ण ही सारे कारे करती है
37:41श्रीकृष्ण ने कहा हे अर्जुन इस संसार में जो भी कारे होते हैं वे वास्तव में प्रकृष्ण के द्वारा ही
37:49किये जाते हैं
37:50Manushye these think that I'm doing this.
37:53But this is just a miracle.
37:54The body is born and the body is born and the body is born.
38:012. Atma is the family.
38:04Krishna has said,
38:06Hey Arjun, Atma is not a miracle.
38:09Atma is a miracle.
38:11Atma is a miracle.
38:14Atma is a miracle.
38:223. Parmaatma ka divviprakash
38:24Shri Krishna nai eek sundar udhaharan diya.
38:27Jaisi eek surya pure sansar ko prakash deta hai,
38:31Vaisi hi atma ka prakash pure shariir ko chetna deta hai.
38:35Yadhi atma na ho,
38:36To shariir keval eek nirji vustu ban jata hai.
38:394. Gyan ki sachi drišti
38:41Hey Arjun,
38:43Jho vyaakti ye samaj leta hai
38:45Ki shariir aur atma alag hai,
38:47Vohi sachi gyan ko prapht karta hai.
38:49Vohi samaj jata hai,
38:50Shariir nashwar hai,
38:52Lekin atma amar hai.
38:54Shariir badalta rhehta hai,
38:55Lekin atma haemesha eek jaisi rhehti hai.
38:585. Prakriti se mukti
39:00Jab manushye ye jahan leta hai,
39:03Ki voh vastav me atma hai,
39:04Or prakriti ke kariyohan se alag hai,
39:07Tab voh dhire dhire
39:07Prakriti ke bandhano se mukti honne lagta hai.
39:11Ab voh karm ke bandhano me nahhi phastha.
39:136. Param satyaki praphti
39:16Shri Krishna bole,
39:17Hei Arjun,
39:18Jho vyakti gyan ki is dhrišti ko prapht kar leta hai,
39:22Voh sansar ke bhram se mukth ho jata hai.
39:24Ab voh janm aur mritiuk ke chakr se upar uch chata hai.
39:28Or ant me,
39:29Voh parmatma ki divvye avastha ko prapht kar leta hai.
39:32Kuruk shetra ki us bhumi par ab gyan ki yatra ka ek mehtwapun adhyaya poora ho chuka tha.
39:38Arjun ke hirde me ab satye ka prakash aur bhi spasht ho gaya tha.
39:42Lekin Shri Krishna ke divvye upadesh abhi samaapt nahi huye tha.
39:46Lekin Shri Krishna ke divvye upadesh abhi samaapt nahi huye tha.
39:47Lekin Shri Krishna
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