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  • 5 days ago
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 – ध्यान योग।Srimad Bhagavad Gita Chapter 6 – Dhyana Yoga.

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00:00श्रीमत भगवत गीता, शष्ठ अध्याय, ध्यान योग, भाग एक, योग की वास्तविक परिभाशा और साधना का आरंब, पंचम अध्याय के
00:11समापन के पश्चात, अर्जुन का मन अपस्थिर हो चुका था, वो कर्म, सन्यास और समर्पन का रहस्य समच चुका था,
00:20परन्त
00:20अब उसके भीतर एक और गहरी जिग्यासा उत्पन हुई, हे माधव, यदि मनुष्य को भीतर स्थिर होना है, तो वो
00:28ध्यान की साधना कैसे आरंब करे, योग का वास्तविक स्वरूप क्या है, श्री कृष्ण ने गंभीर और करुन स्वर में
00:35उत्तर दिया, योग और सन्या
00:38की एक ता, श्री कृष्ण ने कहा, हे अर्जन, जिसे लोग सन्यास कहते हैं, वही वास्तव में योग है, बिना
00:46संकल्पों का त्याग किये, कोई योगी नहीं बन सकता, यहां एक गहरा संकेत है, केवल कर्म त्याग देना सन्यास नहीं,
00:54और केवल आसन पर बैठ जाना योग
00:56नहीं, मन के संकल्पों और इच्छाओं का त्याग ही सच्चा योग है, साधक और सिध में अंतर, योग मार्ग में
01:05दो अवस्थाएं होती हैं, आरंभिक साधक यानि आरुरुक्षू, सिध योगी यानि योगारूड, आरंभिक साधक के लिए कर्म आवश्यक है, वो
01:17कर्म क
01:17करते हुए, मन को शुद्ध करता है, परन्तु जब मन शुद्ध हो जाता है, तब वही व्यक्ति आंतरिक शांती में
01:24स्थित हो जाता है, आत्मोध्धार का सिध्धान्त, श्री कृष्न कहते हैं, मनुष्य स्वयम ही अपना मित्र है, और स्वयम ही
01:32अपना शत्रू, यदि मन स
01:47समत्व की स्थिदी
01:49जब मन, इच्छाओं से मुक्त, द्वेश से रहित और आत्मा में संतुष्ठ हो जाता है, तब योगा रूड अवस्था आती
01:57है.
01:58ऐसा व्यक्ति, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण को समान द्रिष्टी से देखता है.
02:02मित्र और शक्त्रु में भेद नहीं करता, मान अपमान में सम रहता है.
02:08यही संभाव ही ध्यान की भूमी तैयार करता है.
02:11ध्यान के लिए आवश्चक तैयारी.
02:14श्रीकृष्ण आगे संकेत देते हैं कि ध्यान केवल बैठ जाने से नहीं होता.
02:18उसके लिए आवश्चक है शुद्ध जीवन, संयमित आहार विहार, नियमित दिन्चर्या और मन की पवित्रता.
02:26ये सब साधना की नीव है.
02:29अर्जुन का आंतरिक परिवर्तन.
02:31अब अर्जुन समझ रहा था कि युद्ध से पहले उसे अपने भीतर के विकारों पर विजय पानी है.
02:37बाहरी शत्रु से पहले मन के शत्रु को जीतना आवश्चक है.
02:41उसका मन धीरे-धीरे द्रिड हो रहा था.
02:43इस भाग का सार.
02:46योग और सन्यास एक ही सत्ति के दो रूप है.
02:49संकल्पों का त्याग योग का आधार है.
02:52मनुष्य स्वयम ही अपना मित्र और शत्रु है.
02:55संभाव ध्यान की भूमी तयार करता है.
02:58संयमित जीवन ध्यान का प्रथम चरण है.
03:01इस प्रकार शश्ट अध्याय ध्यान योग का प्रथम भाग हमें योग की मूल परिभाशा और साधना की तयारी सिखाता है.
03:09भाग दो ध्यान की विधी, आसन और साधना की बहारी व्यवस्था.
03:15अर्जुन अब अत्यंत ध्यान पूर्वक श्रीकृष्ण के वचनों को सुन रहा था.
03:20उसके भीतर ये जिग्यासा उठी,
03:22हे योगेश्वर, यदि मन को स्थिर करना ही योग है, तो ध्यान करने की सही विधी क्या है?
03:27साधक को कैसे बैठना चाहिए? कैसी स्थिती रखनी चाहिए?
03:32श्रीकृष्ण ने अत्यंत व्यवस्थित रूप से ध्यान की प्रक्रिया समझानी आरंब की.
03:37एकांत और पवित्र स्थान
03:39सबसे पहले श्रीकृष्ण कहते हैं, योगी को चाहिए कि वो
03:45एकांत स्थान में रहे, मन को एकागर करे और निरंतर आत्मचिंतन करे.
03:50एकांत का अर्थ केवर जंगल नहीं है. एकांत का अर्थ है ऐसा वातावरण जहां मन कम विचलित हो.
03:57आज के जीवन में भी घर का शांत कोना, सुभह का ब्रह्म महुर्थ या संध्या का समय ध्यान के लिए
04:05उप्युक्त हो सकता है.
04:08आसन की विवस्था
04:09श्रीकृष्ण ध्यान के लिए विशेश आसन का निर्देश देते हैं. स्थान न बहुत उचा हो, न बहुत नीचा और स्थिर
04:17हो. प्राचीन काल में, कुशा घास, मुरिक चर्म और वस्त्र का प्रयोग किया जाता था.
04:24इसका संकेत ये है कि आसन स्थिर और स्वच होना चाहिए, जिससे शरीर लंबे समय तक शांत बैट सके.
04:32शरीर की स्थिथी?
04:33ध्यान करते समय, शरीर, गर्दन और सिर्फ सीधे और स्थिर होने चाहिए. ये सीधापन केवल शारिरिक नहीं, बलकि मानसिक सजक्ता
04:43का भी प्रतीक है. जुका हुआ शरीर अकसर आलस से लाता है और अत्यधिक तनाव कठूरता लाता है. इसलिए संतुलन
04:51आवश्शक है.
05:03इधर-उधर भटकने ना दें, बाहरी संसार से ध्यान हटाकर भीत्र केंद्रित करें. जब नेत्र स्थिर होते हैं, तो मन
05:11भी धीरे-धीरे स्थिर होने लगता है.
05:13मन की शुधता
05:15ध्यान का उद्देश्य केवल शारिरिक बैठना नहीं है. उसका मूल उद्देश्य है मन को भय से मुक्त करना, कामनाओं को
05:22शांत करना, और भ्रमचर्य यानि उर्जा की शुध दिशा का पालन करना. जब मन पवित्र होता है, तभी ध्यान गहरा
05:30होता है.
05:32निरंतर अभ्यास
05:34श्वीक्रिष्न स्प्रष्ट कहते हैं, ध्यान एक दिन में सिध नहीं होता. निरंतर अभ्यास आवशक है. प्रति दिन
05:41एक ही समय, एक ही स्थान और एक ही विधी से साधना करने से मन धीरे-धीरे अनुशासित हो जाता
05:48है.
05:49अर्जुन की समझ
05:51अर्जुन अब समझ चुका था, योग केवल दार्षनिक विचार नहीं, बलकि एक अनुशासित अभ्यास है. जिस प्रकार युद्ध के लिए
05:59प्रशिक्षन आवशक है, उसी प्रकार मन के युद्ध के लिए ध्यान आवशक है.
06:04इस भाग का सार
06:06ध्यान के लिए एकांत और शांत स्थान आवशक है, आसन स्थिर और संतुलित होना चाहिए, शरीर, गर्दन और सिर सीथा
06:13रखें, द्रिष्टी और मन को नियंतरित करें, नियमित अभ्यास से ही ध्यान सिद्ध होता है.
06:19इस प्रकार शष्ट अध्याय का दूसरा भाग हमें ध्यान की बाहरी व्यवस्था और विधी सिखाता है, जो आंतरिक स्थिरता की
06:27ओर पहला ठोस कदम है.
06:28भाग तीन
06:29मन की चंचलता और उसका नियंतरण
06:32ध्यान की विधी सुनने के बाद, अर्जुन के मन में एक स्वभाविक प्रश्ण उठा.
06:37वे गंभीर होकर बोले,
06:39हे क्रिश्ण, ये मन अत्यंत चंचल है, ये वायू के समान बलवान और अस्थिर है, इसे नियंतरित करना मुझे अत्यंत
06:47कठिन प्रतीत होता है.
06:48अर्जुन का ये प्रश्ण हम सभी का प्रश्ण है.
06:51मनुष्य का सबसे बड़ा संगर्ष बाहरी संसार से नहीं, अपने ही मन से होता है.
06:56मन का स्वभाव
06:58श्री कृष्ण स्वीकार करते हैं.
07:01निससंदे हैं मन, चंचल और दुरनी ग्रह है.
07:04मन
07:21अर्जुन को लगता है कि मन को वश्मे करना असंभव है.
07:24पर श्री कृष्ण समाधान बताते हैं.
07:27अभ्यास और वैराग्य से मन को नियंत्रित किया जा सकता है.
07:30ये दो शब्द ही ध्यान योग का हृदय हैं.
07:34अभ्यास निरंतर प्रयास
07:36वैराग्य आसक्ती का त्याग
07:39अभ्यास का अर्थ
07:41अभ्यास का अर्थ है बार-बार मन को लक्ष पर लाना.
07:45जब मन भटके, उसे डाटे नहीं, निराश ना हो.
07:48बस शान्ती पूर्वक उसे पुनह केंद्रित करें.
07:51जैसे मा अपने चंचल बच्चे को बार-बार प्रेम से मार्ग दिखाती है,
07:55वैसे ही साधक को अपने मन के साथ व्यवहार करना चाहिए.
07:59वैराग्य का महत्व
08:01यदि केवल अभ्यास हो और वैराग्य ना हो,
08:04तो मन बार-बार विशेयों की ओर खिचता रहेगा.
08:07वैराग्य का अर्थ है,
08:08ये समझना कि बाहरी वस्तु है स्थाई सुख नहीं दे सकती.
08:12आसकती ही दुख का कारण है.
08:15जब ये समझ गहरी हो जाती है,
08:16तब मन स्वतह शांथ होने लगता है.
08:20असंयमित मन और संयमित मन
08:22श्री कृष्ण स्पष्ट कहते हैं,
08:25असंयमित मन वाले के लिए योग कठिन है,
08:28परंतु संयमित मन वाले के लिए योग संभव है.
08:31ये शिक्षा अत्यंत व्यभारिक है.
08:33ध्यान कोई जादू नहीं, बल्कि धैर्य और अनुशासन की प्रक्रिया है
08:38गिरने पर क्या होगा?
08:40अर्जुन के मन में एक और शंका उठती है
08:42यदि कोई साधक प्रयास करता है, परंतु पूर्ण सफलता से पहले ही गिर जाता है, तो उसका क्या होगा?
08:48ये प्रश्ण मानविय है, क्योंकि साधना में उतार चड़ावाते हैं, श्री कृष्ण आश्वासन देते हैं, साधना का कोई भी प्रयास
08:57व्यर्थ नहीं जाता, हर प्रयास आत्मा की उन्नती में जुड़ जाता है
09:02अर्जुन की सांत्वना
09:04ये सुनकर अर्जुन का भय दूर हुआ, उसे समझ आ गया, मन का चंचल होना स्वभाविक है, परन्तु धैरे और
09:12वैराग्य से उसे जीता जा सकता है, अब वो निराश नहीं, बलकि प्रेरित था
09:17इस भाग का सार
09:19मन स्वभाव से चंचल है, अभ्यास और वैराग्य से मन नियंत्रित होता है, ध्यान में धैर्य आवश्यक है, असफलता का
09:28भय नहीं रखना चाहिए, साधना का कोई प्रयास व्यर्थ नहीं जाता
09:32इस प्रकार, शष्ट अध्याय का तृतिय भाग हमें सिखाता है कि ध्यान का सबसे बड़ा युद्ध मन के साथ है,
09:39और उसकी विजए अभ्यास तथा वैराग्य से ही संभव है
09:41भाग चार
09:43योग भरष्ट की स्थिती और आध्यात्मिक यात्रा की निरंतर्ता
09:48अर्जुन के हिर्दय में अभी भी एक सूक्ष्म शंका शेश थी
09:52उसने विनम्रता से पूछा
09:54हे कृष्ण, यदि कोई साधक श्रद्धा से योग मार्ग पर चलता है
09:59परन्तु मन की चंचलता के कारण पूर सिद्धी से पहले ही गिर जाता है
10:03तो उसका क्या होगा?
10:05क्या वो दोनों और से नश्ट नहीं हो जाएगा?
10:08ये प्रश्ण अत्यंत मानवीय है
10:10हर साधक के मन में कभी न कभी ये भैय आता है
10:14श्री कृष्ण का आश्वासन
10:17श्री कृष्ण ने ध्रिन स्वर में कहा
10:19हे अर्जुन, ऐसा साधक कभी नश्ट नहीं होता
10:22न इस लोक में न परलोक में उसका विनाश होता है
10:26ये एक महान आश्वासन है
10:28आध्यात्मिक प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता
10:33योगब्रश्ट कौन है?
10:35योगब्रश्ट वो है जिसने श्रद्धा से साधना प्रारम्ध की
10:38मन को संयमित करने का प्रयास किया
10:41परन्तु पूर्ण समाधी से पहले ही भटक गया
10:44ये भटकाव असफलता नहीं, बलकि अधूरी यात्रा है
10:47अगले जन्म में उन्नती
10:51श्रीकृष्ण कहते हैं, ऐसा साधक अगले जन्म में
10:54या तो किसी पुन्यात्मा के घर जन्म लेता है
10:56या योगियों के परिवार में जन्म लेता है
10:59ये जन्म अत्यंत दुरलब होता है
11:02इसका आर्थ है, आत्मिक संसकार आगे बढ़ते रहते हैं
11:05आत्मा की यात्रा रुकती नहीं
11:09पूर्व जन्म के संसकार
11:11जब वो पुन्ह जन्म लेता है
11:13तो उसके भीतर स्वाभाविक रूप से
11:15वैराग्य, साधना की रुची
11:17और ईश्वर की ओर आकर्शन उत्पन होता है
11:20उसे बिना विशेश प्रयास के ही
11:22ध्यान और सत्य की ओर जुकाव महसूस होता है
11:25ये उसके पूर्व जन्म के अभ्यास का फल है
11:28भले ही वो साधक कुछ समय संसार में उलज जाए
11:31परंतु अंततह उसके भीतर का संसकार
11:34उसे पुनह योग मार्ग पर ले आता है
11:37जैसे नदी अंततह समुद्र की ओर बहती है
11:40वैसे ही आत्मा अंततह परमात्मा की ओर बढ़ती है
11:44अब अर्जुन का भई पूर्ण तह मिट गया
11:46उसे समझ आ गया योग का मार्ग लंबा हो सकता है
11:50परंतु ये मार्ग सुरक्षित है
11:52इस पर चलने वाला कभी नष्ट नहीं होता
11:54ये शिक्षा केवल अर्जुन के लिए नहीं
11:57हर साधक के लिए है
11:59धैर्य और विश्वास
12:02ध्यान योग का ये भाग हमें सिखाता है
12:04साधना में धैर्य रखें
12:06असफलता से ना घबराएं
12:08इश्वर पर विश्वास रखें
12:10आत्मिक यात्रा समय ले सकती है
12:12परंतु उसका हर कदम मूल्यवान है
12:14इस भाग का सार
12:16योग भरष्ट साधक का कभी विनाश नहीं होता
12:21आध्यात्मिक प्रयास
12:22जन्म जन्मांतर तक चलता है
12:23पूर्व जन्म के संसकार
12:25आत्मा को आगे बढ़ाते हैं
12:28साधना में असफलता अंत नहीं
12:29विराम मात्र है
12:31विश्वास और धैर्य योग मार्ग के आधार है
12:35इस प्रकार
12:36शष्ट अध्याय का चौथा भाग
12:38हमें आश्वस्त करता है
12:39कि ध्यान की यात्रा कभी व्यर्थ नहीं जाती
12:42आत्मा निरंतर उन्नती की ओर अग्रसर रहती है
12:45भाग पांच
12:47योगी की श्रेष्ठ था और उसकी महिमा
12:49अर्जुन अपूर्ण श्रद्धा से
12:51श्रीकृष्ण के वचनों को सुन रहा था
12:53उसकी शंकाएं शांत हो चुकी थी
12:56परंतु उसके भीतर एक नई जिग्यासा जागी
12:58हे कृष्ण
12:59तपस्वी ज्यानियों और कर्मियों में कौन श्रेष्ठ है
13:03और योगी का स्थान इन में कहा है
13:05श्रीकृष्ण ने अत्यंत स्पष्ट और निर्नायक उत्तर दिया
13:08योगी की श्रेष्ठ था
13:10श्रीकृष्ण कहते हैं कि योगी तपस्वीयों से श्रेष्ट है
13:14ज्यानियों से श्रेष्ट है और कर्मियों से भी श्रेष्ट है
13:17ये कथन अत्यंत गहन है
13:19तपस्वी शरीर को कष्ट देकर साधना करता है
13:22ज्यानी शास्त्रों का ध्यान कर सत्य को समझता है
13:27do
13:56do
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13:56That's why, if you're a good person, you're a good person.
14:51ुश्य जीवन दिव्य हो जाता है।
14:59इस भाग का सार योगी, तपस्वी, ज्यानी और कर्मी से श्रेष्ठ है।
15:27अर्जुन अब ध्यान योग की गहराईयों को समझने लगा था।
15:31उसने अनुभव किया कि मन को स्थिर करने के बाद भी एक अंतिम प्रशन शेश है।
15:36हे प्रभु, जब योगी ध्यान में सिद्ध हो जाता है, तब वो संसार को किस द्रिष्टी से देखता है।
15:43श्रीकृष्ण ने इस गूढ प्रशन का उत्तर अत्यंत दिव विशब्दों में दिया।
15:48सर्वत्र आत्मा का दर्शन।
15:50श्रीकृष्ण कहते हैं, सच्चा योगी वो है, जो सब प्राणियों में अपनी आत्मा को देखता है।
15:56और अपनी आत्मा में सभी प्राणियों को अनभव करता है।
15:59ये केवल दार्षनिक विचार नहीं, बलकि अनभूती की अवस्था है।
16:03जब मन पूर्ण तह शुद्ध हो जाता है, तब भेद भाव समाप्त होने लगता है।
16:08समद्रिष्टी का अर्थ है न किसी से विशेश आ सकती, न किसी से द्वेश।
16:15योगी, मित्र और शत्रू में समान भाव रखता है, प्रिय और अप्रिय में संतुलित रहता है, सुख दुख में संभाव
16:22बनाए रखता है।
16:23ये संतुलन बाहरी नहीं, भीतर की स्थिर्ता से उत्पन होता है.
16:27इश्वर का सर्व व्यापक अनुभाव
16:29श्री कृष्ण आगे कहते हैं, जो मुझे सरवत्र देखता है और सब कुछ मुझ में देखता है, उससे में कभी
16:36दूर नहीं होता.
16:37ये ध्यान योग का अत्यंत उच्छ शिखर है, यहां ध्यान केवल आँखे बंद करके बैठना नहीं, बल्कि हरक्षान इश्वर की
16:45उपस्थिती का अनुभव है. व्रिक्ष्यों में, आकाश में, मनुष्यों में और अपने ही हिरदय में.
16:51करुणा और एकत्व
16:53जब योगी सब को अपने समान अनुभव करता है, तो उसके भीतर स्वाभाविक करुणा उत्पन होती है. वो किसी को
16:59पीडा नहीं देता, किसी से घ्रणा नहीं करता और सब के हित की कामना करता है. ये वजबूरी नहीं, बल्कि
17:06आत्म ज्यान का स्वाभाविक परणाम है.
17:50अर्जुन की समझ
17:54समत्व से किया गया कर्म बंधन नहीं बनता. इस प्रकार शष्ठ अध्याय का छठा भाग ध्यान की परिपक्व अवस्था, समद्रिष्टी
18:02और सरवात्म भाव को स्पष्ट करता है.
18:04भाग साथ
18:06परम योगी की अवस्था और आत्मा नंद का उतकर्ष
18:10अर्जुन अब ध्यान योग के शिखर के समी पहुँच चुका था. मन का नियंत्रण, अभ्यास, वैराग्य, योग भ्रष्ट का रहस्य
18:19और समद्रिष्टी इन सब को सुन कर उसका हरदय शांत था.
18:23फिर भी उसने विनम्रता पूर्वक पूछा, हे कृष्ण, जब योगी पूर्ण सिध्धी प्राप्त कर लेता है, तब उसकी चेतना की
18:31अंतिम अवस्था क्या होती है? वो किस आनंद का अनुभव करता है?
18:35श्री कृष्ण ने दिव्य भाव से उत्तर दिया. परम शांती का अनुभव. जब साधक निरंतर अभ्यास करता है, मन को
18:44बार बार आत्मा में स्थित करता है, और विश्यों से विरक्त रहता है, तब उसका मन पूर्ण तह शांत हो
18:50जाता है. ये शांती बाहरी परिस्थिति
19:02श्री कृष्ण कहते हैं, योगी उस आनंद का अनुभव करता है, जो इंद्रियों से परे है. ये आनंद न शब्दों
19:10में बन सकता है, न बाहरी वस्तूओं से मिल सकता है. ये आत्मा का स्वाभाविक प्रकाश है. जब मन की
19:16तरंगे शांत हो जाती है, तब आत्मा का आनं�
19:19प्रकट होता है. अचल स्थिती. इस अवस्था में पहुंचकर योगी किसी दुख से विचलित नहीं होता, किसी सुख से आसक्त
19:28नहीं होता. यदि संसार का सबसे बड़ा दुख भी सामने आए, तो भी उसका मन स्थिर रहता है. ये कठोरता
19:35नहीं, बलकि गहरी आंत्रिक स्
19:49अपने संबंद को तोड़ देता है. दुख आएगा, परन्तु योगी उससे बंधेगा नहीं. निरंतर अभ्यास का महत्व. ये अवस्था अचानक
19:58नहीं आती. इसके लिए आवश्यक है द्रिड संकल्प, निरंतर अभ्यास और धैर्य. जब मन बार-बार भटके, तो उसे
20:06पुना आत्मा में स्थत करना ही ध्यान की साधना है. अर्जुन का अंतर्मन. अब अर्जुन के भीतर एक नई शक्ती
20:14जागुठी. उसे समझाया, बाहरी युद से पहले भीतर की स्थिर्ता आवश्यक है. जब मन अचल हो जाएगा, तो कोई भी
20:22परिस्थिती उसे डिगा न
20:36रहता है. योग दुख से संबंद विच्छेद है. निरंतर अभ्यास से ही ये स्थिती प्राप्त होती है. इस प्रकार शेष्ट
20:44अध्याय का सात्वा भाग हमें योग की सर्वोच अवस्था, आत्मानंद और अचल शांती का दर्शन कराता है. भाग आठ ध्यान
20:53योग का उ
21:04हांती स्थिर हो चुका था. ध्यान योग के सभी आयाम, मन का नियंत्रन, अभ्यास, वैराग्य, योग भरष्ट का रहस्य, समद्रिष्टी
21:14और आत्मानंद अब एक पूर्ण चित्र बन चुके थे. अब श्री कृष्ण इस अध्याय का अंतिम और अत्यंत महत्वपूर्ण
21:22निश्कर्ष देते हैं. योगी की अंतिम श्रेष्टता. श्री कृष्ण कहते हैं, तपस्वियों से योगी श्रेष्ट है, ज्यानियों से योगी श्रेष्ट
21:32है, कर्मकांडियों से भी योगी श्रेष्ट है, परन्तु इन सब में भी वो योगी सर्वोच्च है, जो श्रध
22:20जियाय का अंत एक अद्भुत परिवर्तन दिखाता है।
22:38जियाय का अध्याय का समग्र संदेश इस अध्याय ने हमें सिखाया योग का आधार आत्मसंयम है।
22:50अभ्यास और वैराग्य से मन नियंत्रत होता है।
23:20इस प्रकार शष्ठ अध्याय ध्यान योग पून होता है।
23:24यहां साधक, कर्म से ध्यान, ध्यान से समत्व और समत्व से भक्ती की और अग्रसर होता है।
23:30झाल सकता है।
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