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भगवद गीता – अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग।Bhagavad Gita – Chapter 15: Purushottam Yoga.

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00:00भगवद गीता, अध्याय पंद्रा, पुर्षुत्तम योग, भाग एक, संसार रुपी अश्वत्थ व्रक्ष और जीवन का महान रहस्य, प्रारंभिक द्रिश्य, कुरुक्षेत्र
00:13की विशाल भूमी, जहां युद्ध शुरू होने से पहले एक गहरी शांती चाई हुई है,
00:18सूर्य धीरे-धीरे आकाश में उपर उठ रहा है, हवा में हलकी धूल तैर रही है, रतों की पंक्तियां, योध्धाओं
00:27की भारी सांसें, और बीच में खड़ा एक रत, जिस पर बैठे हैं अर्जुन और श्री कृष्ण, अर्जुन अब पहले
00:34जैसा भ्रमित नहीं है, उस
00:48आपने मुझे कर्म, ज्यान और भक्ती का मार्ग बताया, लेकिन इस संसार की असली प्रकृती क्या है, और वो परम
00:56सत्य कौन है, जो इस सब के पीछे है, श्री कृष्ण मुस्कुराते हैं, उनकी आखों में करुणा और अनन्त ज्यान
01:04चमक रहा है, वे कहते हैं, अर्जुन
01:07अब मैं तुम्हें वो ग्यान बताने जा रहा हूँ, जिसे जान लेने के बाद मनुष्य संसार के भ्रम से मुक्त
01:14हो सकता है, ये है पुरुशोत्तम योग का ग्यान, और यहीं से शुरू होता है अध्याय 15, पुरुशोत्तम योग
01:30अर्जुन, इस संसार को समझने के लिए एक अध्भुत उधारन समझो, उन्होंने कहा, ये संसार एक अश्वत्त व्रिक्ष की तरहा
01:38है, लेकिन ये साधारन व्रिक्ष नहीं है, ये व्रिक्ष उल्टा है, उसकी जड़े उपर हैं और शाखाएं नीचे
01:45द्रिश्य कल्पना, आकाश में एक विशाल दिव्य व्रिक्ष प्रकट होता है, उसकी जड़े प्रकाश में उपर की ओर हैं, उसकी
01:53शाखाएं नीचे पूरी स्रिष्टी में फैल रही हैं, शाखाओं में मनुष्य, पशु, पक्षी, परवत, नदिया, ग्रह, तारे, पू
02:15संसार का मूल परमात्मा है, लेकिन मनुष्य इस व्रिक्ष की शाखाओं में उलज जाता है, और उसकी जड़ों को भूल
02:22जाता है, द्रिश्य दो, संसार की शाखाएं, अब श्री कृष्ण इस व्रिक्ष की शाखाओं का अर्थ बताते हैं, उन्होंने कहा,
02:31इस व्रिक्ष क
02:43इच्छाएं, महत्वकांग्षा, सुख और दुख, संबंध, जन्म और मृत्यू।
02:50मनुष्य इन शाखाओं में उलज कर अपने असली स्वरूप को भूल जाता है।
02:55द्रिश्य कल्पना
02:56एक व्यक्ति इस व्रिक्ष की शाखाओं में उलजा हुआ है।
03:00वो कोशिश करता है बाहर निकलने की, लेकिन हर इच्छा उसे और बांध देती है।
03:05धन की इच्छा, प्रसिद्धी की इच्छा, शक्ती की इच्छा, और हर नई इच्छा एक नई शाखा बन जाती है।
03:12श्री कृष्ण कहते हैं, अर्जुन, जब तक मनुष्य इन शाखाओं में उलजा रहता है, तब तक वो जन्म और मृत्यों
03:19के चक्र में घूमता रहता है।
03:24अब श्री कृष्ण इस व्रिक्ष की जड़ों का एक और रहस्य बताते हैं।
03:28अर्जुन, इस व्रिक्ष की कुछ जड़े नीचे भी फैलती हैं। ये जड़े क्या हैं? कर्म के बंधन। हर कर्म एक
03:36नई जड़ बनाता है और यही जड़े मनुष्य को संसार में बांध देती हैं।
03:41उधारन, यदि कोई व्यक्ती लोभ से कर्म करता है, क्रोध से कर्म करता है, एहंकार से कर्म करता है, तो
03:48वो अपने लिए एक नया बंधन बना लेता है।
03:51द्रिश्य कलपना, व्रिक्ष की जड़े धर्ती में फैलती हैं और मनुष्य के पैरों को पकड़ लेती हैं. वो चलना चाहता
03:58है, लेकिन बंधा हुआ है. श्री कृष्ण कहते हैं, अर्जुन, यही कारण है कि मनुष्य बार-बार जन्म लेता है.
04:06द्रिश्य चार, इस व्रिक्ष को काटने का मार्ग. अर्जुन ध्यान से सुन रहा है. अब वो पूशता है, हे प्रभु,
04:14यदि ये संसार इतना विशाल और जटिल है, तो इससे मुक्त कैसे हुआ जा सकता है? श्री कृष्ण उत्तर देते
04:20हैं. अर्जुन, इस संसार रुपी
04:23व्रिक्ष को काटने का केवल एक मार्ग है. वो है वैराग्य की तलवार. वैराग्य का अर्थ. वैराग्य का मतलब संसार
04:31छोड़ना नहीं है, बलकि इच्छाओं पर नियंत्रण, आसक्ती का त्याग, आत्मा का ज्यान. जब मनुश्य इन तीनों को समझता है,
04:41तो वो इस व
04:53जड़े कटती हैं, वो स्वतंत्र हो जाता है. द्रिश्य पांच परमधाम की खोज. श्री कृष्ण अब उस थान का वर्नन
05:01करते हैं, जहां पहुचने के बाद मनुश्य वापस नहीं आता. अर्जुन, जब मनुश्य इस संसार के व्रक्ष को काट देता
05:09है, तब वो उस था
05:14परमधाम की विशेष्टा, वहां सूर्य की आवशक्ता नहीं, चंद्रमा की आवशक्ता नहीं, अग्नी की आवशक्ता नहीं, क्योंकि वहां स्वयम परम
05:26प्रकाश है. द्रिश्य कल्पना, एक दिव्य लोक प्रकट होता है, अनन्त प्रकाश, शांत वातावरण, दिव्य �
05:34यह है परमधाम, द्रिश्यच है, आत्मा की यात्रा, श्रेक्रिष्न कहते हैं, अर्जुन, हर जीव वास्तव में मेरी ही एक छोटी
05:44अभिव्यक्ति है, हर आत्मा परमात्मा का अंश है, लेकिन जब आत्मा शरीर में प्रवेश करती है, तो वो भूल जाती
05:52है कि वो वास्तव म
05:53कौन है, आत्मा का अनुभाव, जब आत्मा शरीर छोड़ती है, तो वो अपने साथ ले जाती है, मन, इंद्रिया, संसकार,
06:02और फिर वो एक नए शरीर में प्रवेश करती है, द्रिश्यकल्पना, एक प्रकाश कन शरीर से निकलता है, और हवा
06:09में यात्रा करता है, फिर वो �
06:22अंशुद्ध है, अज्यानी व्यक्ति केवल शरीर को देखता है, ज्यानी व्यक्ति आत्मा को देखता है, अंतर, अज्यानी सोचता है, मैं
06:31शरीर हूँ, ज्यानी जानता है, मैं आत्मा हूँ, द्रिश्यकल्पना, एक व्यक्ति दरपन में अपने शरीर को देख रहा है, द�
06:57अर्जुन, जिसने संसार रुपी व्रिक्ष को समझ लिया, वो जीवन का रहस्य समझ गया, और यही है पुरशोत्तम योग की
07:05शुरुवात.
07:05भाग दो, आत्मा की यात्रा, इंद्रियों का रहस्य और परमात्मा की सर्वव्यापकता, प्रारंभिक द्रिश्य, कुरुक्षेत्र की विशाल भूमी पर हल्की
07:18हवा बह रही है, सूर्य अब आकाश में उपर उठ चुका है, युध अभी शुरू नहीं हुआ, लेकिन ग्या
07:26का महान युध जारी है, रत पर बैठे अर्जुन गहरी सोच में डूबे हुए हैं, अभी अभी उन्होंने संसार रूपी
07:34अश्वत वरिक्ष का रहस्य सुना है, उनके मन में अब एक नया प्रश्न उठता है, अर्जुन धीरे धीरे श्री कृष्न
07:42की ओर देखते हैं, और क
07:55कियों बांधेती हैं, और आप इस पूरे ब्रह्मान में किस प्रकार विद्धिमान है, श्री कृष्न की मुस्कान गहरी हो जाती
08:03है, वे कहते हैं, अर्जुन अब मैं तुम्हें आत्मा की उस यात्रा का रहस्य बताऊंगा, जिसे समझ लेने पर मनुष्य
08:11जीवन और मृत्य
08:12दोनों का भाय खो देता है, द्रिश्य एक, आत्मा का दिव्य स्वरूप, श्री कृष्न कहते हैं, अर्जुन इस संसार का
08:21प्रत्येक जीव वास्तव में मेरा ही एक अंश है, ये एक अत्यंत गहरा सत्य है, हर जीव, चाहे वो मनुष्य
08:29हो, पशु हो या पक्षी, उसके भी
08:32इतर एक अमर आत्मा है, और वो आत्मा परमात्मा का ही अंश है, आत्मा की विशेष्टाएं, आत्मा न जन्म लेती
08:41है, न मरती है, न जल सकती है, न कट सकती है, शरीर बदलते हैं, लेकिन आत्मा हमेशा बनी रहती
08:49है, द्रिश्य कल्पना, एक दीपक से हजारों दीपक जल
09:02एक ही परमचेतना की अभिव्यक्ति हैं।
09:08अब श्री कृष्ण आत्मा की यात्रा का रहसे बताते हैं।
09:12उन्होंने कहा, जब आत्मा एक शरीर छोड़ती है,
09:15तो वो अपने साथ मन और इंद्रियों के संसकार लेकर आगे बढ़ती है।
09:19यही कारण है कि हर व्यक्ति का स्वभाव अलग होता है।
09:24आत्मा क्या साथ ले जाती है?
09:26जब आत्मा शरीर छोड़ती है, तो वो अपने साथ ले जाती है
09:30मन, पांच इंद्रियों की प्रवृत्तियां, पिछले कर्मों के संसकार,
09:34फिर वो एक नए शरीर में प्रवेश करती है।
09:38द्रिश्य कलपना, एक प्रकाश कन शरीर से निकलता है,
09:42वो हवा में तैरता है और फिर धीरे धीरे एक नए शरीर में प्रवेश करता है।
09:47यह है आत्मा की यात्रा।
09:49द्रिश्य तीन, इंद्रियों का रहस्य।
09:53Shri Krishna says,
10:47अग्यानी व्यक्ति इस आत्मा की यात्रा को नहीं देख पाता।
10:51उसे केवल शरीर दिखाई देता है, लेकिन ग्यानी व्यक्ति आत्मा को पहचानता है, जीवन के पीछे की चेतना को समझता
10:59है।
11:00अग्यानी की दिख्टि? वो सोचता है, मैं शरीर हूँ, मेरा जीवन केवल ये शरीर है और इसे लिए वो भय,
11:08लोब और मुह में फसा रहता है।
11:11ज्यानी की दिख्टि? वो जानता है, मैं शरीर नहीं, मैं अमर आत्मा हूँ, और यही ज्यान उसे स्वतंत्र बना देता
11:19है।
11:20सूर्य, परमात्मा की सर्व व्यापकता। अब श्री कृष्ण एक और महान सत्य बताते हैं। वे कहते हैं, अर्जुन, मैं केवल
11:29तुम्हारे सामने खड़ा नहीं हूँ, मैं पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त हूँ।
11:34परमात्मा कहा कहा हैं। श्री कृष्ण कहते हैं, सूर्य की रौष्णी में मैं हूँ, चंद्रमा की शीतलता में मैं हूँ,
11:42अगनी की उर्जा में मैं हूँ, प्रिथवी की शक्ती में हूँ।
11:46द्रिश्य कल्पना, सूर्य उगता है, उसकी किरणे प्रिथवी को प्रकाश देती हैं। श्री कृष्ण की आवाज, वह प्रकाश भी मैं
11:55ही हूँ, फिर चंद्रमा दिखाई देता है, उसकी शीतलता भी मैं ही हूँ, फिर अगनी जलती है, उसकी उर्जा भी
12:02मैं ही हूँ।
12:04प्रिथवी, जीवन का पोशन, श्री कृष्ण आगे कहते हैं, मैं ही प्रिथवी में प्रवेश करके सभी जीवों का पोशन करता
12:12हूँ, धर्ती पर जो कुछ भी उखता है, पेल, पौधे, फल, अनाज, उनकी उर्जा का स्रोत भी परमात्मा ही है,
12:21द्रिश्य कल्पना, बारि
12:33शरीर में परमात्मा की उपस्थिती, श्री कृष्ण कहते हैं, अर्जुन, मैं केवल बाहर नहीं, मैं हर जीव के भीतर भी
12:42हूँ, मनुष्य के शरीर में एक विशेश अगनी होती है, वो अगनी भोजन को पचाती है, श्री कृष्ण कहते हैं,
12:50वो अगनी भी मैं ही हूँ, �
12:53इसका अर्थ है, हमारा हर श्वास, हर उर्जा, हर जीवन शक्ती परमात्मा से ही आती है।
12:59मानस, ज्यान का स्रोध, अब श्री कृष्ण एक और गहरा रहस्य बताते हैं।
13:05अर्जुन, स्मृती, ज्यान और बुद्धी का स्रोध भी मैं ही हूँ।
13:10जब मनुष्य को कोई सत्य समझ आता है, कोई समस्या का समाधान मिलता है, कोई नहीं प्रेरणा मिलती है, तो
13:17वो केवल मन की शक्ती नहीं होती, उसके पीछे दिव्य चेतना की प्रेरणा होती है।
13:23द्रिश्य कल्पना एक व्यक्ति ध्यान में बैठा है, अचानक उसके मन में प्रकाश प्रकट होता है, उसे समाधान मिल जाता
13:30है, श्री कृष्ण की आवाज वह ज्यान भी मुझसे ही आता है.
13:35समापन
13:36कुरुक्षेत्र का द्रिश्य फिर से शांत हो जाता है, अब अर्जुन गहरी समझ में डूप चुका है, अब वो समझ
13:43चुका है आत्मा की यात्रा, इंद्रियों का रहस्य और परमात्मा की सर्वव्यापकता, श्री कृष्ण धीरे से कहते हैं, अर्जुन जो
13:52इस सत्य को समझ
13:54लेता है, वो संसार को नए द्रिश्टिकोंड से देखता है, अब उसके लिए जीवन भय का विशय नहीं, मृत्यु अंत
14:01नहीं, बल्कि ये केवल आत्मा की यात्रा का एक चरण है, भाग तीन, क्षर, अक्षर और पुरुशुत्तम का गहन रहस्य,
14:11प्रारंभिक द्रिश्य
14:14कुरुक्षेत्र की भूमी, जहां हजारों योध्धा युद्ध के लिए तैयार खड़े हैं, लेकिन इस महान युद्ध के बीच एक और
14:22गहरा युद्ध चल रहा है, अज्ञान और ज्ञान का युद्ध, रत पर बैठे अर्जुन अब पहले से कहीं अधिक शान्थ
14:29हैं, �
14:41लेकिन उनके मन में अब एक और प्रश्न उठता है, अर्जुन धीरे से कहते हैं, हे प्रभु, आपने बताया कि
14:48आत्मा अमर है और परमात्मा हर जगह उपस्थित हैं, लेकिन इस संसार में जो कुछ भी दिखाई देता है, वह
14:56नश्वर क्यूं है, और उस नश्वरता के प
15:11रहस्य बताऊंगा, जिसे जान लेने के बाद मनुश्य, जीवन और ब्रह्मान की वास्तविक्ता को समझ सकता है, ये रहस्य है
15:18क्षर, अक्षर और पुरुशोत्तम का ज्यान, द्रिश्य एक, क्षर का अर्थ, नश्वर संसार, श्री क्रिश्न कहते हैं, अर्जुन, इस संस
15:30क्षर में जो कुछ भी दिखाई देता है, वह सब क्षर है, क्षर का अर्थ है, जो नश्ट होने वाला
15:36है, क्षर में क्या-क्या शामिल है, शरीर, वस्तुएं, प्रकृती, परवत, नदियां, ग्रह, तारे, यहां तक की पूरी स्रिष्टी भी
15:47एक दिन समाप्त हो जाती है,
15:49द्रिश्य कल्पना, एक सुन्दर फूल खिलता है, कुछ समय बाद वह मुर्जा जाता है, फिर एक नया फूल खिलता है,
15:58इसी तरह रितुएं बदलती हैं, सब भिताएं बनती और मिटती हैं, शरीर जन्म लेते और समाप्त हो जाते हैं, यह
16:07सब है क्षर संसार,
16:09श्रीकृष्ण कहते हैं, अर्जुन, जो कुछ भी परिवर्तन के अधीन है, वैक्षर है, और यही संसार का स्वभाव है, परिवर्तन,
16:19द्रिश्य दो, अक्षर का रहस्य, अविनाशी तत्व, अब श्रीकृष्ण एक और गहरा सत्य बताते हैं, अर्जुन, इस नश्वर स
16:29अंसार के पीछे एक अविनाशी तत्व भी है, उसे कहते हैं अक्षर, अक्षर का अर्थ, अक्षर वह है, जो कभी
16:38नश्ट नहीं होता, जो हमेशा बना रहता है, जो समय से परे है, ये है आत्मा, आत्मा क्यों अक्षर है,
16:46क्योंकि वह जन्म नहीं लेती, वह मरती नहीं, व
17:23
17:29तब भ्रम उत्पन्न होता है।
17:32मनुष्य सोचने लगता है।
17:34मैं शरीर हूँ।
17:35ये संसार ही सब कुछ है।
17:37और इसी भ्रम से मोह पैदा होता है,
17:40लोब पैदा होता है,
17:41भय पैदा होता है।
17:43दृष्य कल्पना
17:44एक व्यक्ती दरपण में अपने शरीर को देख रहा है।
17:48वह अपने शरीर को ही
17:49अपनी पूरी पहचान मान रहा है।
17:52लेकिन उसके भीतर एक चमकता हुआ प्रकाश है,
17:55जिसे वह देखी नहीं पा रहा।
17:57श्री कृष्य कहते हैं,
17:59अर्जुन, जब तक मनुष्य इस भ्रह्म में रहता है,
18:02तब तक वह जन्म और मृत्यू के चक्र से मुक्त नहीं हो सकता।
18:09अब श्री कृष्य इस अध्याय का सबसे बड़ा रहस्य बताती हैं।
18:14उन्होंने कहा,
18:14अर्जुन, क्षर और अक्षर दोनों के ऊपर भी एक और सत्य है।
18:19वह है पुरुषोत्तम।
18:21पुरुषोत्तम का अर्थ है सर्वुच्छ पुरुष।
18:26वह जो क्षर से भी परे है, अक्षर से भी परे है और पूरी सृष्टी का आधार है।
18:31श्रीक्रिष्ण कहते हैं, अर्जुन, वही पुरुषोत्तम मैं हूँ, ये कोई एहंकार नहीं है, ये है परमसत्य की घोषणा.
18:41द्रिश्य कल्पना, पूरा ब्रम्हांड दिखाई देता है, ग्रह, तारे, आकाश, गंगाएं, फिर धीरे-धीरे सब एक दिव्य प्रकाश में समाहित
18:51हो जाते हैं, और उस प्रकाश में श्रीक्रिष्ण का दिव्य स्वरूब दिखाई देता है.
18:55द्रिश्य पाँच, पुरुशोत्तम और ब्रम्हांड, श्रीक्रिष्ण कहते हैं, अर्जुन, मैं ही वह शक्ती हूँ जो पूरे ब्रम्हांड को धारन करती
19:05है, क्षर संसार, अक्षर आत्माएं, दोनों उसी परमचेतना पर आधारित है, उदाहरन, जैसी माला के मोती एक �
19:14धागे पर टिके होते हैं, वैसे ही पूरी स्रिष्टी परमात्मा पर टिकी हुई है, द्रिश्य कल्पना, एक माला दिखाई देती
19:23है, मोती चमक रहे हैं, लेकिन उन्हें जोडने वाला धागा दिखाई नहीं देता, फिर धीरे धीरे वह धागा प्रकाश बनकर
19:30दिखाई �
19:32श्रीकृष्ण कहते हैं, वै धागा मैं हूँ अर्जुन, द्रिश्य छे, पुरुशोत्तम को पहचानना, अब अर्जुन अत्यंत ध्यान से सुन रहा
19:41है, श्रीकृष्ण कहते हैं, जो व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है, वै वास्तव में ज्यानी बन जाता है, क्यूंकि
20:00
20:00जीवन को शांत द्रिश्टि से देखता है, द्रिश्य कलपना, एक व्यक्ति भीड में खड़ा है, सब लोग भाग दोड में
20:08व्यस्त हैं, लेकिन वह व्यक्ति शांत है, उसके चहरे पर गहरी शांती है, क्यूंकि उसने सत्य को पहचान लिया है,
20:16द्रिश्य साथ, पुरु�
20:28च्छी करता है, वह जीवन का सबसे बड़ा रहस्य जान लेता है, परणाम, ऐसा व्यक्ति परम ज्यान प्राप्थ करता है,
20:37सच्ची भक्ति करता है, और अंत तह परम धाम को प्राप्थ करता है, कुरुक्षेत्र की हवा अब शांत है, अर्जुन
20:45की आखों में एक नई चमक
21:06PURUSHOTAM YOG
21:16आकाश में सूर्य अब मध्य की ओर बढ़ रहा है। हवा में युद्ध की आहट है। लेकिन उस रथ पर
21:24अभी भी ज्यान की गूंज है। रथ पर बैठे अर्जुन अब पहले से कहीं अधिक शान्त हैं। उनकी आखों में
21:31एक नहीं समझ जाग चुकी है। उन्होंने अभी �
21:34सुना है, संसार शर है, आत्मा अक्षर है और सबसे उपर है पुरुशोत्तम। लेकिन उनके मन में अब एक और
21:43प्रशन उठता है। अर्जुन विनम्रता से कहते हैं, हे प्रभु, यदि पुरुशोत्तम ही सर्वोच सत्य हैं, तो सत्य को जानने
21:52वाला व्यक्ति कैसा होता ह
21:54और मनुष्य उस परम सत्य का कैसे पहुँच सकता है। श्री कृष्ण मुस्कुराते हैं, उनकी आवाज गहरी और शान्थ है।
22:03वे कहते हैं, अर्जुन जो पुरुशोत्तम को जान लेता है, वो केवल ज्यानी ही नहीं बनता, वो सच्चा भक्त बन
22:11जाता है। और यहीं से
22:12शुरू होता है भक्ती के सर्वोच मार्ग का रहस्य। द्रिश्च एक पुरुशोत्तम को पहचानने वाला ज्यानी। श्री कृष्ण कहते हैं,
22:23अर्जुन जो व्यक्ती ये समझ लेता है कि इस संसार का मूल परमात्मा है और सभी आत्माएं उसी का अंश
22:30हैं, वही सच्चा
22:31ज्यानी है, ऐसा व्यक्ती संसार को अलग द्रिश्ची से देखता है, उसकी द्रिश्ची कैसी होती है, वो समझता है, हर
22:40जीव में वही चेतना है, हर घटना के पीछे एक दिव्य योजना है, और जीवन केवल भौतिक अनुधव नहीं है,
22:49द्रिश्य कल्पना, एक व्यक्ती
22:51भीड से भरे शहर में चल रहा है, लोग भाग रहे हैं, चिंता में हैं, प्रतिस्परधा में हैं, लेकिन वो
22:58व्यक्ती शान्त है, वो हर व्यक्ती में एक ही दिव्य चेतना को देख रहा है, श्री कृष्ण कहते हैं, अर्जुन,
23:06ऐसा ज्यानी व्यक्ती किसी से द्वेश नह
23:48Shri Krishna says,
23:49एक व्यक्ती पहले किताब पढ़ रहा है, वो ज्ञान प्राप्ट कर रहा है, धीरे धीरे वो पुस्तक बंद करता है
23:56और ध्यान में बैट जाता है, अब वो केवल समझ नहीं रहा, वो अनुभव कर रहा है.
24:02द्रिश्य तीन, भक्ती का वास्तविक अर्थ
24:05श्री कृष्ण कहते हैं, अर्जुन, सच्ची भक्ती केवल पूजा या मंत्र नहीं है, भक्ती का वास्तविक अर्थ है, पूर्ण, प्रेम
24:14और समर्पण.
24:15भक्ती कैसी होनी चाहिए? भक्ती में एहिंकार नहीं होता, स्वार्थ नहीं होता, भय नहीं होता, भक्ती में केवल होता है,
24:25प्रेम.
24:26उदाहरण
24:271.
24:57सच्चे भक्त के गुण
24:59अब श्री कृष्ण बताते हैं कि पुरुशोत्तम को जानने वाले भक्त में कौन-कौन से गुण होते हैं।
25:051. विनम्रता
25:07सच्चा भक्त कभी एहंकारी नहीं होता।
25:10उसे पता है उसकी हर शक्ती परमात्मा से आई है।
25:142. करुणा
25:15वो सभी जीवों के प्रती दयालू होता है, क्योंकि वो जानता है, हर जीव में वही परमचेतना है।
25:223. संतोश
25:24वो जीवन में जो भी मिलता है, उसे स्वीकार करता है, क्योंकि उसे विश्वास है, सब कुछ परम योजना का
25:31हिस्सा है।
25:324. द्रिश्य कल्पना
25:34एक साधारन व्यक्ती खेत में काम कर रहा है, उसके पास धन नहीं है, लेकिन उसके चहरे पर शानती है,
25:41क्योंकि उसके भीतर भक्ती की जोती है।
25:455. भक्ती और स्वतंत्रता
25:47श्री कृष्ण कहते हैं, अर्जुन, जब मनुष्य सच्ची भक्ती करता है, तो वो भीतर से स्वतंत्र हो जाता है।
26:186. पूरुशोत्तम से एक्ता
26:21श्री कृष्ण कहते हैं, अर्जुन, जब भक्ती पूर्ण हो जाती है, तब आत्मा परमात्मा के साथ एक्ता का अनुभव करती
26:29है।
26:29ये कोई भौतिक मिलन नहीं है, ये है चेतना का मिलन। इसका अनुभव कैसा होता है।
26:35भक्त महसूस करता है, परमात्मा हर जगा है, परमात्मा हर क्षण उसके साथ है, परमात्मा उसके भीतर है, और तब
26:44उसका जीवन बदल जाता है।
26:46द्रिश्य कलपना, एक व्यक्ती ध्यान में बैठा है, धीरे धीरे उसके चारों और प्रकाश फैलने लगता है, वो अनुभव करता
26:55है, पूरा ब्रमांड उसी प्रकाश से भरा हुआ है।
26:58द्रिश्य साथ, जीवन का अंतिम उद्देश्य, अब श्री कृष्ण अंतिम सत्य बताते हैं।
27:33अर्जुन की आखों में अब एक नई चमक है, उसे अब समझ आ चुका है, ज्यान का उद्देश्य क्या है,
27:39भक्ती का वास्तमिक अर्थ क्या है, और जीवन का अंतिम लक्ष क्या है।
27:44श्री कृष्ण धीरे-धीरे कहते हैं, अर्जुन, जो पुरुशोत्तम को जान लेता है और प्रेम से उनकी भक्ती करता है,
27:52वही वास्तव में पूर्ण हो जाता है।
27:55और यही है पुरुशोत्तम योग का दिव्यमार्ग।
28:25जो अब केवल युद्ध नहीं सीख रहा, वो जीवन का परम रहस्य सीख रहा है, वो है अर्जुन. और उसके
28:33सामने खड़े हैं योगेश्वर श्री कृष्ण. अर्जुन की आखों में अब गहरा चिंतन है, उन्होंने सुना है, संसार क्षर है,
28:43आत्मा अक्षर है, और पर
28:45परम सत्य है पुरुषोत्तम, लेकिन अब उनके मन में एक नया प्रशन उठता है. अर्जुन धीरे से पूचते हैं, हे
28:53प्रभु, यदि पुरुषोत्तम हर जग्य उपस्थित हैं, तो मनुष्य उन्हें अपने जीवन में कैसे अनुभव कर सकता है? हम संसार
29:02में रहते हु
29:02उस परम सत्य से कैसे जुड़े रह सकते हैं? श्री कृष्ण की मुस्कान गहरी हो जाती है. वे कहते हैं,
29:10अर्जुन यही तो जीवन की सबसे बड़ी कला है. संसार में रहते हुए भी परमात्मा को अनुभव करना ही सच्चा
29:18योग है.
29:19द्रिश्य एक. संसार और आध्यात्मिक जीवन का संतुलन. श्री कृष्ण कहते हैं, अर्जुन, बहुत से लोग सोचते हैं कि परमात्मा
29:29को पाने के लिए संसार छोड़ना पड़ता है. लेकिन यह पूर्ण सर्ति नहीं है, क्योंकि संसार भी उसी परमचेतना की
29:37रचना है
29:38इसका अर्थ क्या है? मनुष्य को संसार से भागने की आवशक्ता नहीं है, बलकि उसे सीखना है, संसार में रहते
29:47हुए भी परमात्मा से जुड़ना
29:49द्रिश्य कल्पना
29:50एक व्यक्ती जंगल में ध्यान कर रहा है, दूसरा व्यक्ती शहर में काम कर रहा है, लेकिन दोनों के भीतर
29:58एक ही दिव्य चेतना जाग रही है, क्योंकि परमात्मा केवल जंगल में नहीं है, वे हर जगा है
30:04श्री क्रिश्न कहते हैं, अर्जुन, सच्चा योग वो है, जहां मरुष्य अपने कर्तव्यों को निभाते हुए भी परम सत्य को
30:13नहीं भूलता
30:14द्रिश्य दो, मन को परमात्मा से जोड़ना
30:18अर्जुन ध्यान से सुन रहे हैं
30:20श्री क्रिश्न आगे कहते हैं, मनुष्य का मन ही उसका सबसे बड़ा मित्र भी है और सबसे बड़ा शत्रु भी
30:27यदि मन संसार में उलज जाए, तो वो बंधन बन जाता है
30:31लेकिन यदि वही मन परमात्मा की ओर मुड़ जाए, तो वही मुक्ती का मार्ग बन जाता है
31:18द्रिश्य कल्पना
31:21परिवार का ध्यान रखता है, समाज के लिए कार्य करता है, यदि वो ये सब एहंकार के लिए नहीं, बलकि
31:28परमात्मा के लिए करे, तो वही कर्म योग बन जाता है।
31:32द्रिश्य कल्पना
31:33एक किसान खेत में काम कर रहा है, एक मा अपने बच्चे की देखभाल कर रही है, एक शिक्षक बच्चों
31:41को पढ़ा रहा है, यदि ये सब कार्य समर्पन के भाव से किये जाएं, तो यही कर्म भक्ती बन जाते
31:47हैं।
31:48प्रकृती में परमात्मा का अनुभाव। श्री क्रिश्न कहते हैं, अर्जुन, यदि मनुष्य ध्यान से देखे, तो उसे परमात्मा हर जगर
31:57दिखाई देंगे। कहां? सूर्योदय में, हवा की ठंडक में, नदी की धारा में, पक्षियों के गीत में। प्रकृती का हर
32:06
32:18प्रकृती है, ये सब केवल प्रकृती नहीं है, ये परम चेतना की अभिव्यक्ती है। द्रिश्य पांच, ध्यान और आंत्रिक शान्ती।
32:28अर्जुन पूछते हैं, हे प्रभु, यदि मनुष्य का जीवन बहुत व्यस्त हो, तो वो परमात्मा से कैसे जुला रह सकता
32:35है।
32:36श्री कृष्ण उत्तर देते हैं, अर्जुन, कुछ क्षण का सच्चा ध्यान पूरे जीवन को बदल सकता है।
32:43ध्यान का अर्थ, ध्यान का मतलब केवल आँखे बंद करना नहीं है, ध्यान का अर्थ है अपने भीतर की चेतना
32:51को महसूस करना।
32:52द्रिश्य कलपना, एक व्यक्ती नदी किनारे बैठा है, वो आखे बंद करता है, धीरे धीरे उसका मन शान्त हो जाता
33:00है, उसके भीतर एक प्रकाश अनुभव होता है।
33:04श्री कृष्ण कहते हैं, वह प्रकाश ही आत्मा है।
33:08द्रिश्य छे, पुरुशोत्तम का अनुभव, जब मनुष्य मन को शान्त करता है, कर्म को समर्पित करता है, और हृदय में
33:17प्रेम रखता है, तब धीरे धीरे उसे अनुभव होने लगता है, कि परमात्मा दूर नहीं है, वे तो हमेशा से
33:24उसके साथ थे।
33:25द्रिश्य कल्पना, एक व्यक्ती पहले अकेला महसूस करता है, फिर ध्यान में उसे महसूस होता है, कि उसके भीतर एक
33:34दिव्य उपस्थिती है, अब वो अकेला नहीं है।
33:38द्रिश्य साथ, जीवन की बदलती द्रिश्टी, जब मनुष्य पुरुशोत्तम को अनुभव करता है, तो उसका जीवन बदल जाता है, अब
33:47वो परिश्थितियों से नहीं तूटता, सफलता से एहंकारी नहीं होता, असफलता से निराश नहीं होता, क्योंकि उसे पता है,
33:55सभी घटनाए परम योजना का हिस्सा है
33:57द्रिश्य कल्पना
33:59एक व्यक्ति पहले जीवन की समस्याओं से परेशान था
34:03अब वही व्यक्ति शांत और स्थिर है
34:06क्योंकि उसके भीतर विश्वास जाग चुका है
34:09समापन
34:11कुरुक्षेत्र का द्रिश्य फिर शांत हो जाता है
34:13अर्जुन की आखों में गहरी समझ दिखाई दे रही है
34:17अब वो जान चुका है
34:18परमात्मा केवल मंदिर में नहीं है
34:21वे केवल ध्यान में नहीं है
34:23वे तो हर कर्म में
34:25हर श्वास में
34:31अर्जुन, जो व्यक्ति संसार में रहते हुए भी परमात्मा को अनुभव करता है, वही सच्चा योगी है, और यही है
34:39पुरुशोत्तम योग का जीवन्त अनुभव.
34:41भाग 6. पुरुशोत्तम योग का गहनसार और आत्मा की अन्तिम यात्रा. प्रारंभिक द्रिश्य. कुरुक्षेत्र की भूमी अब पहले से अधिक
34:52गंभीर हो चुकी है. आकाश में सूर्य धीरे धीरे पश्चिम की ओर जुक रहा है. दोनों सेनाएं अभी भी युद्ध
34:58की �
34:58प्रतीक्षा में खड़ी है. लेकिन उस रत पर जहां अर्जुन और श्री कृष्ण खड़े हैं, वहां एक ऐसा संबाज चल
35:04रहा है, जो केवल युद्ध की रणनीती नहीं है. वो है जीवन और मृत्यू का अंतिम रहस्य. अर्जुन अब पहले
35:11से अधिक शांत हैं, लेकि
35:25अब ये जीवन समाफ्थ होता है, तब आत्मा की यात्रा कहां जाती है? श्री कृष्ण की दृष्टी गंभीर हो जाती
35:31है. वे धीरे-धीरे कहते हैं, अर्जुन ये प्रश्ण केवल तुम्हारा नहीं है, ये हर मनुष्य का प्रश्ण है. मृत्यू
35:38के बाद क्या होता है? �
35:39और आत्मा की अंतिम यात्रा कहां समाफ्थ होती है? जीवन और मृत्यू का रहस्य. श्री कृष्ण कहते हैं, अर्जुन जो
35:47जन्म लेता है, वो मृत्यू को प्रश्ण होता है, और जो मरता है, वो फिर जन्म लेता है. ये संसार
35:53एक चक्र है. जन्म, जीवन, मृत्यू, प�
36:10अर्जुन, शरीर बदलता है, लेकिन आत्मा अपनी यात्रा जारी रखती है।
36:42अर्जुन, आत्मा की दिशा उसके कर्म और चेतना से तै होती है।
37:25अर्जुन, इस संसार के उपर भी एक और लोग है, वो है परमधाम।
37:30परमधाम कैसा है? वो स्थान जन्म और मृत्यू से परे हैं, समय से परे हैं, दुख से परे हैं, वहाँ
37:37केवल शान्ती और दिव्यानंद है।
37:39द्रिश्य कलपना, एक उजवल लोग दिखाई देता है, वहाँ कोई भय नहीं है, कोई संगश नहीं है, सिर्फ दिव्य प्रगाश
37:46और शान्ती है।
37:47श्री कृष्ण कहते हैं, अर्जुन जो आत्मा पुरुशोत्तम को प्राप्त कर लेती है, वो उसी परमधाम में प्रवेश करती है।
37:55मुक्ति का मार्ग
37:56अर्जुन पूचते हैं, हे प्रभु, उस परमधाम तक पहुँचने का मार्ग क्या है?
38:00श्री कृष्ण उत्तर देते हैं, अर्जुन, उसका मार्ग है भक्ति, ज्यान और समर्पण.
38:07तीन मुख्य साधन, ज्यान, मनुष्य को समझना होगा कि वो शरीर नहीं है, भक्ति, उसे परमात्मा से प्रेम करना होगा,
38:15समर्पण, उसे अपने एहंकार को छोड़ना होगा,
38:30तभी वो वास्तव में मुक्त होता है, पुरुशोत्तम योग का गहन सार, अब श्री कृष्ण इस पूरे अध्याय का सार
38:37बताते हैं, वे कहते हैं, अर्जुन, संसार नश्वर है, आत्मा अविनाशी है, और परम सत्य है पुरुशोत्तम, इसका अर्थ क्या
38:45है? यदि मनु
39:04अर्जुन की आँखों में एक नई चमक है, उन्हें समझ आ चुका है, जीवन केवल युद्ध सफलता और असफलता का
39:11नाम नहीं है, जीवन का वास्तवे को देश्य है, आत्मा की जागरती, अब उनके लिए मृत्यु भय नहीं है, जीवन
39:18संघर्ष नहीं है, बलकि ये एक
39:20यात्रा है, परम सत्य की ओर, समापन, कुरुक्षेत्र की हवा फिर से बहने लगती है, सूर्य धीरे धीरे अस्त होने
39:28की ओर बढ़ाहा है, अर्जुन शांत होकर श्री कृष्न की ओर देखते हैं, उनके चहरे पर अब भाई नहीं है,
39:34केवल एक गहरी समझ है, श्री कृष्न
39:50योग का अनुभाव करने वाले व्यक्ति का जीवन, प्रारंभिक द्रिश्य, कुरुक्षेत्र की भूमी, जहां कुछी समय बाद इतिहास का सबसे
39:59महान युद्ध होने वाला है, लेकिन इस महान युद्ध से पहले एक और महान परिवर्तन हो चुका है, अर्जुन के
40:06भीतर
40:06जो अर्जुन पहले ब्रहम, भय और मोह में डूबे हुए थे, अब उनके चहरे पर एक अध्भुत शान्ती दिखाई देती
40:13है, उनकी आखों में अब धर नहीं है, क्योंकि उन्होंने जीवन का सबसी बड़ा रहस्य समझ लिया है, संसार शर
40:21है, आत्मा अक्षर है, और पर
40:36परमात्मा के इस रहस्य को समझ लिता है, उसका जीवन कैसा होता है, श्रीकृष्ण की आखों में करुणा और मुस्कान
40:43है, वे कहते हैं, अर्जुन ऐसा व्यक्ति संसार में रहता है, लेकिन संसार उसके भीतर नहीं रहता, और यहीं से
40:51शुरू होता है पुरुशोत्तम यो
41:06वो जीवन से दूर नहीं जाता, बल्कि वो अपने कर्तव्यों को निभाता है, समाज में रहता है, परिवार के साथ
41:13रहता है, लेकिन उसके भीतर मोह नहीं रहता, डिशकलपना एक कमल का फूल कीचड़ में खिलता है, लेकिन कीचड उसकी
41:22पंखुडियों को छु नहीं पा
41:23इसी प्रकार, पुरुशोत्तम योग का अनुभाव करने वाला व्यक्ति संसार में रहता है, लेकिन संसार की अशान्ती उसे प्रभावित नहीं
41:32कर पाती.
41:32द्रिश्य दो, स्थिर मन और संतुलित जीवन
41:36श्रीकृष्ण कहते हैं, अर्जुन ऐसा व्यक्ति अपने मन को नियंत्रित कर चुका होता है. उसका मन परिस्थितियों से नहीं डगमगाता,
41:44प्रशंसा से एहंकारी नहीं होता, आलोचना से तूटता नहीं.
41:48डिश कल्पना
42:07श्रीकृष्ण कहते हैं, अर्जुन जो व्यक्ति पुरुषोत्तम को पहचान लेता है, वो हर जीव में उसी परम चेटना को देखता
42:14है. इसलिए उसके भीतर द्वेश नहीं होता, घणा नहीं होती.
42:18हिंसा नहीं होती. उसके भीतर केवल करुणा होती है. डिश कल्पना
42:24एक व्यक्ति सडक पर घायल पक्षी को देखता है, वो उसे उठा कर सुरक्षित स्थान पर रखता है. क्योंकि उसके
42:31लिए वो पक्षी केवल एक जीव नहीं है, वो भी उसी परम चेतना का अंश है.
42:35सक्ति संपूर्ण जीवन
43:05अभव करने वाला व्यक्ति हमेशा संतोष में रहता है. क्यों? क्योंकि उसे विश्वास होता है, जो कुछ भी जीवन में
43:12होता है, वो परम योजना का हिस्सा है.
43:15डिश कल्पना
43:16एक किसान बारिश का इंतजार कर रहा है. कभी वर्षा होती है, कभी नहीं होती. लेकिन वो निराश नहीं होता.
43:23वो प्रकृति पर विश्वास करता है. इसी प्रकार भक्त भी जीवन की परिस्थितियों को स्वीकार करना सीख जाता है.
43:30डिश कल्पना
44:01भयात पूर्ण मुक्ति
44:02डिश कल्पना
44:04जीवन का वास्थविक आनंद
44:05श्रिकृष्ण कहते हैं
44:07अर्जुन, सच्चा आनंद बाहरी वस्तूओं से नहीं आता. धन, शक्ति और प्रसिध्धी कुछ समय के लिए खुशी दे सकते हैं,
44:15लेकिन स्थाई आनंद आता है आत्मा की शान्ती से.
44:18डिश कल्पना
44:20एक व्यक्ति पहले बाहरी सफलता के पीछे भाग रहा था, लेकिन अब वो शान्त बैठा है. उसके चहरे पर गहरी
44:26संतुष्टी है, क्योंकि उसने वो पालिया है, जो दुनिया की कोई वस्तू नहीं दे सकती. आन्तरिक शान्ती.
45:01समापन
45:02पुरुषोत्तम योग को जीने वाले व्यक्ति का जीवन
45:04भाग आठ
45:05पुरुषोत्तम योग का अंतिम रहस्य और जीवन का परमुद्देश्य
45:10प्रारंभिक द्रिश्य
45:12कुरुक्षेत्र की विशाल भूमी
45:14अब वातावरण पहले से कहीं अधिक गंभीर हो चुका है
45:18आकाश में सूर्य धीरे धीरे ढलने लगा है
45:21दोनों से नाएं अपने शस्त्रों के साथ तैयार खड़ी है
45:24इतिहास का सबसे बड़ा युद्ध शुरू होने ही वाला है
45:27लेकिन उस युद्ध से पहले एक और महान परिवर्तन पूरा हो चुका है
45:32अर्जुन के भीतर
45:33कुछ समय पहले तक वही अर्जुन ब्रह्म, दुख और भाय में दूबे हुए थे
45:38लेकिन अब उनके चहरे पर एक अलग ही शान्ती दिखाई देती है
45:42उनकी आखों में अब डर नहीं है
45:44क्योंकि उन्होंने सुन लिया है
45:46आत्मा का रहस्य, संसार का रहस्य और पुरुशोत्तम का रहस्य
45:51लेकिन अब अर्जुन के मन में एक अंतिम प्रश्न उठता है
45:54वो धीरे से श्री कृष्ण की ओर देखते हैं और कहते हैं
45:58हे प्रभु, आपने मुझे जीवन के इतने गहरे रहस्य से बताए
46:01लेकिन यदि इन सब का सार एक वाक्य में समझना हो
46:05तो मनुष्य के जीवन का अंतिमुद्देश्य क्या है
46:08कुरुख्षेत्र की हवा जैसे एक शन के लिए शांत हो जाती है
46:11श्रीकृष्ण अर्जुन की ओर देखते हैं
46:14उनकी आँखों में गहरी करुना और दिव्य तेज है
46:17और फिर वे कहते हैं
46:19अर्जुन, मनुष्य की जीवन का अंतिमुद्देश्य है
46:22पुरुशोत्तम को पहचानना और उनसे एक होना
46:25जीवन का वास्तविक उद्देश्य
46:27श्रीकृष्ण कहते हैं
46:29अर्जुन, मनुष्य अक्सर जीवन के उद्देश्य को गलत समझ लेता है
46:33बहुत से लोग सोचते हैं
46:35जीवन का उद्देश्य है
46:36धन कमाना, शक्ती प्राप्त करना, प्रसिद्धी पाना, सुख भूगना
46:41लेकिन ये सब अस्थाई है
46:42द्रिश्य कल्पना
46:44एक महल दिखाई देता है
46:45उसके भीतर राजा हैता है
46:47लेकिन समय के साथ महल तूट जाता है
46:50राजा चला जाता है
46:51और सब कुछ बदल जाता है
46:53श्री कृष्ण कहते है
46:54अर्जुन, जो चीजे समय के साथ नश्थ हो जाती है
46:58वे जीवन का अंतिम उद्देश्य नहीं हो सकती
47:00सच्चा उद्देश्य है
47:01अविनाशी सत्य की खोज
47:03पुरुशोत्तम का अंतिम रहस्य
47:05श्री कृष्ण कहते है
47:07अर्जुन, इस संसार में तीन स्तर है
47:10एक, क्षर, नश्वर संसार
47:12दो, अक्षर, अविनाशी आत्मा
47:15तीन, पुरुशोत्तम, सर्वोच्य परमात्मा
47:18इसका आर्थ क्या है?
47:20संसार बदलता रहता है
47:21आत्मा स्थिर रहती है
47:23लेकिन दोनों का आधार है
47:25पुरुशोत्तम, द्रिश्य कल्पना
47:27एक विशाल व्रिख्ष दिखाई देता है
47:29उसकी पत्तियां बदलती रहती है
47:30शाखाएं बढ़ती और तूटती है
47:32लेकिन जड़ हमेशा स्थिर रहती है
47:35ये जड़ है पुरुशोत्तम
47:37पुरुशोत्तम को पहचानने की साधना
47:39अर्जुन पूचते हैं
47:41हे प्रभू, मनुश्य उस पुरुशोत्तम को कैसे पहचान सकता है
47:44श्री कृष्ण उत्तर देते हैं
47:46अर्जुन, इसके तीन मार्ग है
47:48एक, ज्यान
47:50मनुश्य को समझना होगा
47:51वो केवल शरीर नहीं है
47:53वो आत्मा है
47:54दो, भक्ती
47:56उसे परमात्मा के प्रती प्रेम विक्सित करना होगा
47:59तीन, समर्पण
48:00उसे अपने एहंकार को छोड़ना होगा
48:02द्रिश्य कल्पना
48:03एक व्यक्ती भारी बोज लेकर चल रहा है
48:06फिर वो बोज जमीन पर रखतेता है
48:08तुरंत उसका शरीर हलका हो जाता है
48:10एहंकार का बोज छोड़ना ही समर्पण है
48:13संसार को नई द्रिश्टी से देखना
48:15जब मनुश्य पुरुशोत्तम को पहचान लेता है
48:18तो उसका संसार बदल जाता है
48:19अब वो हर जीव में परमात्मा को देखता है
48:22हर परिस्थिती में एक शिक्षा देखता है
48:25हर अनुभब में एक दिव्य संकेत देखता है
48:27द्रिश्य कल्पना
48:29एक व्यक्ती पहले जीवन की समस्याओं से परेशान था
48:32अब वही व्यक्ति उन्हें शांत मन से स्विकार करता है, क्योंकि उसे पता है, सब कुछ परम योजना का हिस्सा
48:38है.
48:39आंतरिक स्वतंद्रता
48:40श्री कृष्ण कहते हैं, अर्जुन, जब मनुष्य पुरुषोत्तम को पहचान लेता है, तब वो वास्तव में स्वतंद्र हो जाता है.
48:47क्यों? क्योंकि अब उसे भविश्य का डर नहीं होता, उसे संसार का मोह नहीं होता, उसका मन स्थिर हो जाता
48:55है.
49:23द्रिश्य कल्पना
49:26पुरुषोत्तम योग का अंतिम संदेश, अब श्री कृष्ण अंतिम संदेश देते हैं, वे कहते हैं, अर्जुन, जो मनुष्य पुरुषोत्तम को
49:34जान लेता है, वो वास्तव में सब कुछ जान लेता है, क्योंकि तब उसे समझ आ जाता है, जीवन क्या
49:40है, आत्मा क्या ह
49:41और परम सक्त्य क्या है, और तब उसकी यात्रा समाप्त नहीं होती, बल्कि वो प्रवेश करता है परम शान्ती में,
49:48महान समापन.
49:50कुरुक्षेत की हवा फिर से बहने लगती है, सूर्य अबस्थ होने की ओर है, अर्जुन शान्त होकर श्रीकृष्न की ओर
49:56देखते हैं, उनके चहरे पर अब केवल एक भावना है, गहरी कृतग्यता, उन्होंने वो ग्यान प्राप्ट कर लिया है, जो
50:03रिशियों ने हजारों �
50:04तक खोजा, श्रीकृष्न धीरे से कहते हैं, अर्जुन ये ज्ञान अत्यंत गुप्त है, जो इसे समझ लेता है, वो वास्तव
50:12में बुद्धिमान बन जाता है, और वो अपने जीवन का उद्देश्य प्राप्त कर लेता है, अर्जुन सिर जुकाते हैं, अब
50:18वे तयार हैं
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