00:00अयोध्या कांड का अध्याय 18 रामायन की कथा का अत्यंत भावनात्मक और निर्नायक प्रसंग है। इसमें रानी कैकई अपने दो
00:08वर्दान मांगती हैं और राजा दशरत गहरे दुख में डूब जाते हैं। यही वो क्षण हैं जो भगवान राम के
00:14वनवास का मार्ग खोलत
00:16है। अयोध्या कांड अध्याय 18 कैकई की दो वर्दान और दशरत का दुख। अयोध्या नगरी में उसरात आनंद और उत्सव
00:25का वातवरण था। पूरे राज्य में दीब जल रहे थे और लोग राम के राज्याबिशेक की तयारी में लगे हुए
00:32थे। नगर की सड़कों
00:44अपने कोब भवन में क्रोध से भरी हुई बैठी थी। उनके मन में मन्थरा द्वारा बोए गए संदेह और महात्वा
00:50कांक्षा के बीज अब पूरी तरह अंकुरित हो चुके थे। दशरत का आगमन। उधर राजा दशरत अत्यंत प्रसंद थे। वे
00:59अपने जीवन के सब
01:00से महत्वपूर्ण निरने से संतुष्ट थे। अपने प्रियपुत्र राम को अयोध्या का राजा बनाना। उन्होंने सोचा कि इस शुब अफसर
01:07का समाचार कैकई को स्वयम जा कर दे। जब वे कैकई के कक्ष में पहुँचे तो उन्हें वहाँ अजीब सन्नाटा
01:13दिखा
01:13उन्होंने पूछा कैकई कहा हैं। एक दासी ने उत्तर दिया महराज रानी को भवन में है। ये सुनकर दशरत काश्चरे
01:22चकित हो गए। कोब भवन का द्रिश्य। राजा दशरत तुरंत कोब भवन की ओर चले। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि
01:29कैकई भूमी प
01:42तुम्हें दुखी किया है। दशरत का वचन कैकई ने पहले कुछ नहीं कहा। तब राजा दशरत ने उन्हें शांत करने
01:49के लिए कहा। तुम्हारी खुशी के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ। तुम जो चाहो मुझसे मांग सकती हो।
01:55फिर उन्होंने अपने जीवन की स
01:57अपसे बड़ी भूल कर दी। उन्होंने कहा, मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि तुम्हारी हर इच्छा पूरी करूँगा। पुराना वचन।
02:04कैकई ने धीरे से कहा, क्या आपको वचन याद है जो आपने मुझे युद्ध के समय दिया था। दशरत ने
02:11तुरंत कहा, हा
02:24आज मैं वही दो वर्दान मांगना चाहती हूँ। दशरत ने प्रसन होकर कहा, मांगो कैकई, मैं अवश्य दूंगा। पहला वर्दान।
02:32कैकई ने कहा, मेरा पहला वर्दान ये है कि मेरा पुत्र भरत अयोध्या का राजा बने। ये सुनकर दशरत चौंक
02:39गए। लेकिन �
02:42कैकई ने कहा, यदि यही तुम्हारी इच्छा है, तो ऐसा ही होगा। दूसरा वर्दान। लेकिन कैकई का दूसरा वर्दान सुनकर
02:50राजा दशरत का हिरदय तूट गया। कैकई ने कहा, मेरा दूसरा वर्दान ये है कि राम को चौधा वर्षों के
02:56लिए वनवास भेजा �
02:57ये सुनते ही दशरत स्तब्ध रह गए, उनकी आँखों से आसु बहने लगे। दशरत का दुख। दशरत ने कापते हुए
03:05कहा, कैकई ये तुम क्या कह रही हो, राम मेरा प्राण है, मैं उसके बिना कैसे जीवित रहूँगा। उन्होंने कैकई
03:13से विनथी की, कोई और वर
03:27वक्षण नहीं निभाएंगे, तो आपका सम्मान नष्ठ हो जाएगा। दशरत की असहायता। दशरत पूरी तरह तूट चुके थे, वे भूमी
03:35पर गिर पड़े और रोने लगे। उन्होंने बार-बार कहा, मैं राम को वनवास नहीं भेज सकता। लेकिन वे जानते
03:42थे क
03:42उन्होंने वचन दिया है। आने वाला निर्णै। उस रात राज महल में कोई नहीं सो पाया। अयोध्या में लोग उत्सव
03:50की तयारी कर रहे थे, लेकिन राजा दशरत के हिरदय में गहरा दुख और पीड़ा थी। अब वक्षण आने वाला
03:56था जब राम को ये भयानक सम
03:57अचार सुनना पड़ेगा। और यही घटना रामायन की सबसे महान यात्रा की शुरुआत बनने वाली थी।
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