00:00अयोध्या कांड का अध्याय 21 अत्यंत करुण और भावनात्मक प्रसंग है. इसमें भगवान राम, सीता और लक्षमन वन जाने की
00:08तैयारी करते हैं और पूरी अयोध्या शोक में डूब जाती है. ये अध्याय त्याग, प्रेम, धर्म और प्रजा के राम
00:17के प्रति गहरे प्
00:19अयोध्या कांड अध्याय 21 वन यात्रा की तैयारी और अयोध्या का शोक अयोध्या नगरी में जिस दिन राम के राज्या
00:29भिशेक की घोशना हुई थी, उसी दिन से पूरा राज्य उत्सव की तैयारी में जुट गया था. लेकिन अब परिस्थितियां
00:36पूरी तरह बदल �
00:38राज्यमहल के भीतर एक ऐसा निर्ने लिया जा चुका था, जिसने पूरे राज्य की खुशी को शोक में बदल देना
00:44था. राम ने अपने पिता के वचन को निभाने के लिए 14 वर्षों के वनवास को सुविकार कर लिया था.
01:19राम की तयारी
01:22उन्होंने अपने सभी आभूशन उतार दिये और साधारन वस्त्र पहन लिये. राज्यमहल की दासियां ये देख कर रोने लगी. उन्होंने
01:30कहा, महरानी, आप क्यों ये कश्ट सह रही हैं? सीता ने शांत स्वर में उत्तर दिया, पती का साथ ही
01:37पतनी का सबसे बड़ा धर्
02:08लक्षमन की निष्ठा
02:08जीवित नहीं रह पाऊंगा. लेकिन राम ने विनम्रता से कहा, पिताश्री, आपका वचन ही मेरा धर्म है. माताओं का विलाप.
02:17जब कौसल्या को ये समाचार मिला, तो उनका हरिदय तूट गया. उन्होंने राम को गले लगा कर रोते हुए कहा,
02:24बेटा, मैं तुम्हारे �
02:25बिना कैसे रहूंगी? राम ने अपनी माता को सांत्वना दी और उनके चर्णों में प्रणाम किया. अयोध्या की प्रतिक्रिया. धीरे
02:33धीरे ये समाचार पूरे अयोध्या में फैल गया. लोगों को जब पता चला कि राम वन जा रहे हैं, तो
02:39पूरा नगर शोक में डूब
02:54लोगों ने कहा, यदि राम वन जाएंगे, तो हम भी उनके साथ जाएंगे. ये दृष्य अत्यंत भावुक था. प्रस्थान की
03:01घड़ी. अंततह वो क्षण आ गया, जब राम, सीता और लक्ष्मन को अयोध्या छोड़नी थी. उन्होंने अपने माता-पिता को
03:09प्रणाम कि
03:09फिर उन्होंने अयोध्या की ओर अंतिम बार देखा. ये वही नगरी थी, जहां उन्होंने अपना पूरा जीवन बिताया था. अब
03:17उन्हें इसे छोड़ कर वन जाना था. दुख से भरी अयोध्या. जब राम महल से बाहर निकले, तो हजारों लोग
03:23रो रहे थे. सडकों प
03:25पर सन्नाटा चा गया था. जिस नगर में उत्सव होना था, वहां अब शोख की चाया थी. राम, सीता और
03:31लक्षमन धीरे धीरे वन की और बढ़ने लगे.
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