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  • 5 days ago
श्रीमद् भगवद गीता अध्याय 9 — राजविद्या राजगुह्य योग।Srimad Bhagavad Gita Ch 9— RajvidyaRajguhyaYoga.

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Transcript
00:00श्रीमत भगवद गीता, नवम अध्याय, राज विद्या, राज गुहिय योग, भाग एक, परम रहस्य का उद्घाटन
00:10कुरुक्षेत्र की विशाल भूमी पर युद्ध की आहट अब और भी स्पष्ट सुनाई देने लगी थी, दोनों सेनाएं आमने सामने
00:17खड़ी थी, शंखों की ध्वनी कभी-कभी आकाश को चीर देती और फिर कुछ क्षणों के लिए सब कुछ शान्त
00:23हो जाता
00:24रत पर खड़े अर्जुन अब पहले जैसे भ्रमित नहीं थे, पिछले अध्यायों में श्रीकृष्ण ने उन्हें आत्मा, कर्म, योग, भक्ती
00:33और परमधाम के रहस्यों का गहरा ज्ञान दिया था
00:37लेकिन श्रीकृष्ण जानते थे कि अभी भी एक ऐसा ज्ञान शेष है, जो सबसे महान है, एक ऐसा ज्ञान जो
00:44साधारन ज्ञान नहीं है, जो केवल बुद्धी से नहीं समझा जा सकता, जो हृदय से अनुभव किया जाता है
00:51श्रीकृष्ण ने अर्जुन की ओर देखा और शांत स्वर में कहा, हे पार्थ, अब मैं तुम्हें वो ज्ञान बताने जा
00:57रहा हूँ, जो सभी ज्ञानों में सर्वोच्च है, ये राज विद्या है, ज्ञानों का राजा, और ये राज गुहिये है,
01:04सबसे गुप्त रहस्
01:06अर्जुन ध्यान से सुनने लगे, उनके हृदय में जिग्यासा और श्रधा दोनों थी, ये ग्यान इतना महान क्यों है? श्रीकृष्ण
01:15ने कहा, ये ग्यान इसलिए महान है, क्योंकि ये मनुश्य को सीधे परमसत्य से जोड़ देता है, दुनिया में बहुत
01:22प्रकार के ग्
01:35परन्तु ये ग्यान आत्मा को परमात्मा से जोड़ देता है, और जब आत्मा अपने स्त्रोत से जुड़ जाती है, तब
01:42मनुश्य के जीवन में पूनता आ जाती है.
01:44सरल, लेकिन अत्यंत गहरा.
02:14सरिष्ण ने आगे कहा, हे पार्थ, ये पूरा संसार मेरी शक्ती से ही चल रहा है.
02:19सूर्य का प्रकाश, चंद्रमा की शीतलता, प्रित्वी की स्थिर्ता, हवा की गती, इन सब के पीछे वही एक परम शक्ती
02:27कारे कर रही है.
02:28लोग अलग-अलग रूपों में उस शक्ती को देखते हैं. कोई उसे प्रक्रती कहता है, कोई उसे ईश्वर कहता है,
02:34कोई उसे भ्रम कहता है.
02:36लेकिन सत्य ये है, कि वे सब एक ही परम सत्य के अलग-अलग रूप हैं.
02:41श्रिष्टी का रहस्य
02:42अर्जुन ने आश्चर्य से पूछा, हे कृष्ण, यदि ये पूरा संसार आपकी शक्ती से चल रहा है, तो क्या आप
02:49ही इस स्रिष्टी के निर्माता हैं?
02:51श्री कृष्ण मुस्कुराए, उन्होंने कहा, हाँ हे पार्थ, मैं ही इस स्रिष्टी का कारण हूँ, लेकिन मैं इससे बंधा हुआ
02:59नहीं हूँ.
02:59Unnohoneye samjhaya, Jyesee Hava Aakash met rehti hai,
03:03Lekin Aakash se bandhi nahi hoti,
03:06Vaisé hi ye Shrištji mujh met sthit hai,
03:08Parantuu mai usse bandha hua nahi huu.
03:10Shrištji samay-samay per utpandh hooti hai,
03:13Orphir samapt ho jati hai,
03:15Lekin Param Satyya kabhi nashhta nahi hota.
03:18Marybha Ram
03:19Shri Krishna ne ka ha,
03:21Dunya ke adhikansh log is Satyya ko nahi samjh paate,
03:24Vekewal bahari roo-p deekhthe hai,
03:26Vek ye nahi samjh paate,
03:56
04:15श्री कृष्ण ने अर्जुन को बताया, भक्ती केवल पूजा करने का नाम नहीं है, भक्ती का आर्थ है अपने हृदय
04:22को पूरी तरह परमात्मा के प्रेम से भर देना।
04:25जब मनुष्य का हरदय प्रेम से भर जाता है, तब उसके भीतर से भय, इरश्या और एहंकार समाप्त होने लगते
04:31हैं, और तब ही वो परमसत्य को अनुभव कर पाता है।
05:04अर्जुन का अनुभव
05:05आगे मैं तुम्हें बताऊंगा कि किस प्रकार परमात्मा हर जीव के हृदय में निवास करता है और किस प्रकार भक्ती
05:11के माध्यम से कोई भी व्यक्ति उस परमसत्य को प्राप्ट कर सकता है।
05:15भाग दो परमात्मा की सर्व व्यापकता का रहस्य।
05:21कुरुक्षेत्र की विशाल भूमी पर शाम धीरे धीरे गहराने लगी थी।
05:25युद्ध का वातावरण अब भी तनाव से भरा था।
05:29लेकिन अर्जुन के मन में एक नई शान्ती उतर रही थी।
05:33रथ के उपर खड़े अर्जुन अब केवल एक योधा नहीं रहे थे।
05:37वे अब एक जिग्यासु साधक बन चुके थे।
05:40जो जीवन के सबसे बड़े सत्य को समझना चाहता था।
05:45उनकी आखें श्रीकृष्न की ओर टिकी थी।
05:48श्रीकृष्न शान्त थे।
05:50उनका चहरा ऐसा लग रहा था,
05:52जैसे अनंत आकाश की गहराई उनमें समाई हुई हो।
05:56उन्होंने धीरे से कहा,
05:59हे अर्जुन,
06:00अब मैं तुम्हें उस रहसी के बारे में बताने जा रहा हूं,
06:03जिसे समझ लेने के बाद
06:05मनुष्य को संसार का भ्रह्म कभी नहीं सताता।
06:09अर्जुन ध्यान से सुनने लगे।
06:12परमात्मा हर जगह है।
06:14श्रीकृष्न बोले,
06:16हे पार्थ,
06:17ये संपूर्ण जगत मेरी अव्यक्त शक्ति से व्याप्त है।
06:21अर्थात,
06:22ये संसार जितना दिखाई देता है,
06:25उससे कहीं अधिक गहरा है।
06:27जो कुछ भी हम देखते हैं,
06:29धर्ती,
06:30आकाश,
06:31नदिया,
06:32पहाड,
06:33तारे,
06:33सूर्य,
06:34चंद्रमा,
06:35इन सब के भीतर एक अद्रिश्य शक्ति कारे कर रही है।
06:39वही शक्ति पूरे ब्रह्मांड को संतुलन में रखती है,
06:43वही शक्ति जीवन को चलाती है,
06:45और वही शक्ति पर्मात्मा है।
06:48लेकिन ये शक्ति हमेशा दिखाई नहीं देती।
06:51जैसे हवा दिखाई नहीं देती,
06:53लेकिन उसका अस्तित्व महसूस किया जा सकता है
06:56ठीक वैसे ही परमात्मा हर जगा मौजूद है
06:59लेकिन उन्हें देखने के लिए केवल आखे नहीं
07:03बलकि आत्मा की द्रिष्टी चाहिए
07:07श्रिष्टी और परमात्मा का संबंध
07:09अर्जुन ने पूछा
07:11हे कृष्टी यदि परमात्मा हर जगा है
07:14तो क्या ये पूरा संसार ही परमात्मा है
07:17श्री कृष्टी मुस्कुराए
07:19उन्होंने कहा
07:20नहीं है अर्जुन
07:22संसार परमात्मा मिस्थित है
07:24लेकिन परमात्मा संसार में बंधे हुए नहीं है
07:27उन्होंने एक उदारण दिया
07:29जैसे, समुद्र में असंखे लहरे उठती हैं
07:33हर लहर समुद्र से ही उत्तम्न होती है
07:36लेकिन समुद्र केवल लहर नहीं है
07:39समुद्र उससे कहीं अधिक वशाल है
07:41UselAPHUka.
07:436.
07:43You must have earned some consciousness and have never been touched upon by the fatto by the influence of 좋아하.
07:477.
07:487.
07:48The nature of the mind is the nature of the world.
07:508.
07:57Shri Krishna has said that this is nature of the nature.
08:029.
08:0310.
08:0310.lalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalalala.
08:1011.
08:10All the things that we have to do, are we going to start a new chakra.
08:16This is the way the chakra is going to run.
08:20But in all these things, one thing is always sthirt.
08:25That is the karma.
08:27They are the chakra.
08:29They are the chakra.
08:30They are the chakra.
08:30And they are the chakra.
08:32They are the chakra.
08:36Manущa is the chakra.
08:38That is the chakra.
08:38This chakra is the chakra.
08:40The chakra is the chakra.
08:44The chakra soha.
08:53And that this chakra soha.
08:56दूर कर देता है, क्योंकि वास्तविक्ता ये है कि मनुष्य केवल एक माध्यम है, उसके पीछे कारे करने वाली शक्ती
09:03परमात्मा की है, जब मनुष्य इस सत्य को भूल जाता है, तब उसके जीवन में दुख और भ्रम बढ़ने लगते
09:10हैं, अज्यानी और ज्यानी में अंतर
09:15श्री कृष्ण ने कहा, इस संसार में दो प्रकार के लोग होते हैं, पहले वे जो केवल बाहरी दुनिया को
09:23ही सत्य मानते हैं, वे धन, शक्ती और प्रतिष्ठा को ही जीवन का लक्ष समझते हैं, लेकिन उनका सुक हमेशा
09:31अस्थाई होता है, क्योंकि ये सभी चीजें समय क
09:34साथ बदल जाती हैं, दूसरे वे लोग हैं, जो जीवन के गहरे सत्य को समझने की कोशिश करते हैं, वे
09:41जानते हैं कि इस संसार के पीछे एक दिव्य शक्ती है, और वे उसी शक्ती से जुड़ने का प्रयास करते
09:48हैं, ऐसे लोग ही वास्तव में ज्यानी कहलाते हैं, भक्ती
10:29Shri Krishna has said that
10:59Shri Krishna has said that
11:01Shri Krishna has said that
11:48Shri Krishna has said that
11:50Shri Krishna has said that
12:34Shri Krishna has said that
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