00:00सहस्र शीर शाख पूरुशह सहस्राक्ष सहस्रपाद
00:12जनूबी इंडिया की रियासत आंध्र प्रदेश का गाउं कुर्मा
00:16जहां ना बिजली की सहूलत है और ना ही मुबाइल फॉन का इस्तमाद
00:19यहां की लोग आज भी लकडी जला कर खाना पकाते हैं
00:23हम कुर्मा गाउं में कदीम हंदुस्तानी सकाफत, रवायत और रस्म और रिवाज पर अमल करते हैं
00:29लकडी के इंडन पर खाना पकाना भी इसी जिन्दगी का हिस्सा है
00:32आज के जदीद दौर में ये अजीब लग सकता है
00:35लेकिन हम अपनी मुकामी तरज जिन्दगी को तरजी देते हैं
00:38याने अपनी ज़रूरियात अपने इर्द गिर्द दस्तियाब वसाइल से ही पीडिश कोड़न की
00:43यहां लोग गैस के बजाए सूखी लकडी, जर से उक्ड़े हुए दरखतों
00:47और सूखे गोबर के उपले इंदन के तोर पर इस्तमाल करते हैं
00:50गाउं के रहने वालों का कहना है कि वो बाहर से रौ माटिरियल मंगवाने के बजाए
00:55अपने इर्द गिर्द दस्तियाब वसाइल पर ही इन्हसार करते हैं
00:59ये गाउं कृष्णा के भक्तों ने बसाया है जिन में कुछ गैर मुल्की लोग भी शामिल हैं
01:04जो इस तरज जिन्दगी को अपना कर यहां आबसे हैं
01:08कुर्मा गाउं के बाहर की दुनिया और मुआश्रा अब इनसान के लिए वैसे मुफीद नहीं रहे
01:13इसलिए हम यहां एक ऐसी तहजीब खायम करने की कोशिश कर रहे हैं जो वाकई लोगों के काम आए
01:20आखिरकार हर इनसान को खुद देखना होता है कि कौन सी जिन्दगी उसे असल सुकून देती है
01:25ये गाउं तकरीबन सतर एकर पर फैला हुआ है
01:28जहां मिट्टी, चूना और बंबू से घर तयार किये जा रहे है
01:32मुल्क की मुख्तलिफ रियासतों से आए हुए खांदान यहां बसकर इसे अपना मुस्तकिल घर बना चुके हैं
01:39पहले हमारे बुजर्ग चूने से घर बनाया करते थे
01:42ऐसे गर न सिर्फ ज़्यादा पाइदार होते हैं बलकि मौसम के मुताबिक भी बहते रहते हैं
01:47गर्मियों में ठंडे और सर्दियों में गर्म, हम यहां वैसे ही घर तयार कर रहे हैं
01:51यह बैलों से चलने वाला चूना पीसने का निजाम है
01:58यहां पानी के लिए रिवायती कूओं पर इनहसार किया जाता है
02:02गाओं में रहने वाले खांदान अपनी डेरी चलाते हैं, जिरात करते हैं और अपने कपड़े खुद बुनते हैं
02:08गुजश्चता आठ सालों से तक्रीबन सौ खांदान यहां यह सादगी भरी जंदेगी गुजार रहे हैं
02:13इस गाओं में फोन का इस्तमाल पर भी पावंदी है
02:17हम जिरात करते हैं, गर का काम संभालते हैं और डेरी भी चलाते हैं
02:22हमने कुर्मा गाओं में इसलिए बसेरा किया क्यूंकि यहां की जिंदेगी बाहर की दुनिया से बेहतर है
02:28यहां रिवायती बरतन और कटलरी का इस्तमाल किया जाता है
02:31गाओं के रिहाईशी कहते हैं कि वो इबादत और रात की रौशनी के लिए सिर्फ आर इंडी की तेल से
02:37ही दिये जलाते हैं
02:39यहां कोई भी आकर रह सकता है
02:41अगर कोई ज्यादा औरसा नहीं रह सकता तो कुछ दिन गुजार कर वापस जा सकता है
02:45और अगर चाहे तो यहां हमेशा के लिए भी बस सकता है
02:48जो लोग यहां रहना चाते हैं उन्हें उनकी दुल्चस्पी के मताबिक काम की ट्रेनिंग दी जाती है
02:56मुझे यहां आट दिन हो गए हैं और सच कहूं तो यह जगा मेरी तवक्वात से ज़्यादा बहतर निकली
03:01हमें यहां मुक्तलिफ उनर सिखाया जाते हैं और अगर आपको जियारत में जुल्चस्पी हो तो उसकी ट्रेनिंग दी जाती है
03:07और अगर कोई बच्चा पौधों में शौक रखता हो तो उसे आयूरवेट सिखाया जाती है
03:12यहां हर शक्स को उसकी दिल्चस्पी के मताबिक हुनर सिखाया जाता है
03:17यह गाउं अपने मुख्तलिफ तर्ज जिन्दगी की वज़ा से उन लोगों को भी अपनी तरफ खीशता है जो इसे करीब
03:23से देखना चाहते हैं
03:24गाउं के रिहाईशी कहते हैं कि इस जगा का मकसद रिवायती दिहाती जिन्दगी को दोबारा जिन्दा करना है
03:53रिहाईशी कहते हैं कि कोई भी इस गाउं में आकर रह सकता है लेकिन यहाँ की रिवायत पर सकती से
03:58अमल करना जरूरी है
04:00आंद्रप्रदेश के डिपार्टमेंट अफ जॉर्निलिजम के प्रोफेसर सी रामकृष्णा के मुताबिक नौजवानों को रिवायती तर्जे जिन्दगी से रोशनास कराना एक
04:08दिलकश कोशिश है
04:09ताहम वो कहते हैं कि ऐसी कोशिशे उस वक्त ज्यादा लोगों को अपनी तरफ मुतावाजे कर सकती हैं जब किसी
04:16एक मज़भी या सकफाती तर्जे जिन्दगी को सब पर लाजमी ना किया जाए
04:20ज्मोगी कोशिशे लोगों कोशिशे जिन्दगी कर सकता है जब किसी मुतावे जगा है
Comments