00:00रामायन के बालकांड का अध्याय चार उस महत्वपून चरण का वर्णन करता है, जहां महरिशी वालमेकी द्वारा रचित रामायन का
00:07काव्य रूप आकार लेता है, और उसके प्रचार प्रसार की शुरुवात होती है.
00:11इसी अध्याय में लव और कुष को रामायन गाने की शिक्षा देने का प्रसंग भी आता है, नीचे इसका विस्तरित
00:18कथा वर्णन प्रस्तुत है.
00:20बालकांड अध्याय चार रामायन काव्य का प्रसार और लव कुष का शिक्षन
00:26ब्रह्मा के आश्रवात के बाद महर्शी वालमीकी के हृदय में एक अध्भुत उर्जा जाग उठी थी.
00:31अब उनका जीवन एक महान उद्देश्य से भर गया था.
00:34भगवान राम की कथा को काव्य के रूप में संसार के सामने प्रस्तुत करना.
00:39वे जानते थे कि ये केवल एक कहानी नहीं है,
00:42बल्कि ये धर्म, सत्य और आदर्श जीवन का संदेश देने वाला महान महा काव्य बनने वाला है.
00:48काव्य रचना की शुरुआत
00:50महरशी वालमीकी ने अपने आश्रम में एक शांत स्थान चुना.
00:55वहाँ वे प्रते दिन ध्यान में बैठते और अपने दिव्वे ज्यान के माध्यम से भगवान राम के जीवन की घटनाओं
01:00को देखते.
01:01धीरे-धीरे वे उन घटनाओं को सुन्दर छंडों में लिखने लगे.
01:06उनकी वानी में ऐसी मधुर्ता और लै थी कि प्रत्येक श्लोक सुन्ने वालों के हृदय को छुजाता था.
01:12रामायन की रचना करते समय उन्होंने धर्म का गहरा संदेश, आदर्श जीवन के सिध्धान्त, प्रेम, त्याग और साहस की कहानियां
01:20सब को एक साथ पे रो दिया.
01:22धीरे-धीरे ये काव्य हजारों श्लोकों का विशाल ग्रंथ बन गया.
01:26रामायन का स्वरूप
01:27जब ये काव्य पूर्ण हुआ, तब इसमें लगभग 24,000 श्लोक थे.
01:32इसे साथ मुख्य भागों में विभाजित किया गया, जिन्हें कांड कहा जाता है.
01:36ये साथ कांड थे, बाल कांड, अयोध्या कांड, अरण्यकांड, किशकिंधा कांड, सुन्दर कांड, युद्ध कांड और उत्तर कांड.
01:46प्रत्ये कांड में भगवान राम के जीवन की अलग-अलग घटनाओं का विस्तार से वर्नन किया गया.
01:52कावे को जन-जन तक पहुँचाने का विचार
01:55रामायन की रचना पूरी होने के बाद, महर्शी वालमीकी ने सोचा, कि ये महान कावे केवल मेरे आश्रम तक सीमित
02:01नहीं रहना चाहिए.
02:02इसे लोगों तक पहुचाना अवश्चक है, ताकि हर व्यक्ती राम के आदर्शों से प्रेणा ले सके.
02:08लेकिन एक प्रश्न था, इस कावे को लोगों तक कैसे पहुचाया जाए?
02:12उस समय पुस्तकों की प्रतियां बनाना आसान नहीं था.
02:15अधिकतर ज्यान कंठस्त करके गाया या सुनाया जाता था.
02:19इसलिए वालमीकी ने सोचा, कि रामायन को संगीत के रूप में गाया जाए, ताकि लोग इसे आसानी से याद रख
02:25सकें.
02:26लव और कुष का परिचै
02:27उसी समय उनके आश्रम में दो बालक रहते थे, लव और कुष.
02:32ये दोनों अत्यंत बुद्धिमान, तेजस्वी और मधुर स्वरवाले थे.
02:37महारिशी वालमीकी उन्हें बहुत सनेह करते थे.
02:40उन्होंने इन दोनों को वेद, शास्त्र और संगीत की शिक्षा दी थी.
02:44इन दोनों बालकों की वानी इतनी मधुर थी,
02:46कि जब वे कोई श्लोग गाते, तो सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते.
02:50शिक्षा का प्रारंब
02:52एक दिन महरशी वालमीकी ने लव और कुष को अपने पास बुलाया.
02:56उन्होंने कहा,
02:57हे बालकों, मैंने एक महान का विकी रचना की है.
03:00ये भगवान राम की जीवन की कथा है.
03:03मैं चाहता हूँ कि तुम दोनों इसे सीखो और संसार को सुनाओ.
03:07लव और कुष अत्यंत प्रसन्न हुए.
03:09उन्होंने विनमरता से कहा,
03:10गुरुदेव, हमें ये महान कार्य करने का आफसर देने के लिए हम आपके आभारी हैं.
03:17इसके बाद महरशी वालमीकी ने उन्हें रामायन के शलोक सिखाने शुरू किये.
03:22वे प्रत्येक्ष लोक का अर्थ समझाते और फिर उसे मधुर स्वर में गाने का अभ्यास करवाते.
03:27धीरे-धीरे लव और कुष ने पूरी रामायन कंठस्त कर ली.
03:31जब वे दोनों मिलकर रामायन गाते,
03:33तो उनका स्वर इतना मधुर होता कि सुनने वाले भाव विभोर हो जाते.
03:37उनके गीत में भक्ति की भावना, करुणा की गहराई और वीर्ता की चमक सब कुछ एक साथ जलकता था.
03:45आश्रम में पहला गायन
03:46एक दिन महरिशी वाल मीकी ने अपने आश्रम में सभी रिशियों और विद्वानों को आमंत्रित किया.
03:52उन्होंने लव और कुछ से कहा, आज तुम सब के सामने रामायन का गायन करो.
03:57लव और कुछ ने वीना की मधुर धोनी के साथ रामायन गाना शुरू किया.
04:02जैसे जैसे वे गाते गए, आश्रम में बैठे सभी लोग मंत्रमुग्ध हो गए.
04:06कुछ लोग राम के त्याग को सुनकर भावुक हो गए, तो कुछ उनके पराक्रम को सुनकर गर्व से भर उठे.
04:11गायन समाप्त होने पर सभी रिशियों ने लव और कुछ की प्रशन साकी.
04:16रामायन का प्रसार
04:18इसके बाद लव और कुछ विभिन स्थानों पर जाकर रामायन का गायन करने लगे.
04:22वे नगरों, आश्रमों और राज सभाओं में राम कथा सुनाते.
04:26लोग बड़ी श्रद्धा से उनकी कथा सुनते और भगवान राम के आदर्शों से प्रेर्णा लेते.
04:31धीरे धीरे रामायन पूरे भारत में प्रसिद्ध हो गई.
Comments