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भगवद गीता – अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग।Bhagavad Gita – Chapter 18: Moksha Sannyasa Yoga.
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00:00भगवत गीता, अध्याय 18, मोक्ष सन्यास योग, भाग एक, सन्यास और त्याग का रहिस्य, प्रारंभिक द्रिश्य
00:10कुरुक शेत्र की विशाल भूमी, दो सेनाएं आमने सामने खड़ी हैं, शंकों की गूंज धीरे धीरे शान्त हो चुकी है,
00:20रत के बीच खड़े हैं वीर धनुर्धर अर्जन और उनके सार्थी, जगत के परम मार्ग दर्शक श्री कृष्ण, अब तक
00:30श्री कृष्ण अर्जुन को ज्यान, कर्म, भक्ती और योग के अनेक रहस्य बता चुके हैं, लेकिन अब वे गीता के
00:39अंतिम और सबसे गहरे अध्
00:49अर्जुन विनम्रता से श्री कृष्ण से पूछते हैं, हे कृष्ण, मैं सन्यास और त्याग के वास्तविक अर्थ को समझना चाहता
00:57हूँ, कृप्या मुझे स्पष्ट बताईए कि इन दोनों में क्या अंतर है? अर्जुन का ये प्रश्ण बहुत गहरा है, क्योंकि
01:05अक्स
01:05अंतर लोग सोचते हैं, संसार छोड़ देना ही सन्यास है, और कर्म ना करना ही त्याग है, लेकिन क्या वास्तव
01:12में ऐसा ही है? द्रिश्य दो, श्री कृष्ण का उत्तर
01:17श्री कृष्ण मुस्कुराते हैं और बहुत शांत्स्वर में कहते हैं, अर्जुन, कुछ ज्यानी लोग कहते हैं कि इच्छाओं से प्रेरित
01:26कर्मों का त्याग करना ही सन्यास है, और वे आगे कहते हैं, जबकि सभी कर्मों के फल का त्याग करना
01:33त्याग कहलाता है
01:34ुसका सरल अर्थ, सन्यास, बराबर इच्छाओं से प्रेरित कर्मों को छोड़ देना
01:41त्याग, बराबर कर्म करते हुए उसके फल की इच्छा छोड़ देना
01:48कर्म को छोड़ना या भावना को
01:52श्रीकृष्ण अर्जुन को एक महत्वपून बात समझाते हैं
01:55अर्जुन मनुष्य के लिए कर्म को पूरी तरह छोड़ना संभव नहीं है
02:00जब तक शरीर है, तब तक कर्म तो होगा ही
02:04सांस लेना, चलना, बोलना, सोचना, सब कुछ कर्म ही है
02:09इसलिए असली त्याग ये नहीं है कि मनुष्य कर्म छोड़ दे
02:13असली त्याग है कर्म के फल की आसकती को छोड़ देना
02:17जब मनुष्य कर्म करता है लेकिन उसके परिणाम से आसकत नहीं होता
02:22तभी वो सच्चा त्यागी बनता है
02:26त्याग के बारे में अलग-अलग मत
02:28श्री कृष्ण बताते हैं कि इस विशय में विद्वानों के अलग-अलग विचार रहे हैं
02:34कुछ लोग कहते हैं सभी कर्मों का त्याग करना चाहिए
02:38लेकिन कुछ अन्य ज्यानी कहते हैं
02:40यग्य, दान, तप, इन तीन कर्मों को कभी नहीं छोड़ना चाहिए
02:45क्योंकि ये कर्म मनुष्य के हृदय को शुद्ध करते हैं
02:51श्री कृष्ण का अंतिम निर्नय
02:54श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं
02:56अर्जुन, यग्य, दान और तप जैसे पवित्र कर्म कभी नहीं छोड़े जाने चाहिए
03:02लेकिन इन्हें करते समय एक बात बहुत महत्वपून है
03:05क्या? इन कर्मों को बिना आसकती और बिना फल की इच्छा के करना
03:10जब ऐसा किया जाता है तो वही कर्म मनुष्य को धीरे-धीरे मोक्ष के मार्ग पर ले जाता है
03:18समापंद रिश्य
03:20कुरुक्षेत्र के आकाश में हल्की हवा चल रही है
03:23अर्जुन ध्यान से श्रीकृष्ण के शब्द सुन रहे है
03:26अब उन्हें समझ आने लगा है कि सच्छा सन्यास संसार से भागना नहीं है
03:32बलकि संसार में रहकर भी आसकती से मुक्त होकर कर्म करना है
03:37और इसी के साथ शुरू होता है भगवत गीता का अंतिमध्याय
03:42मोक्ष सन्यास योग
03:44भाग दो त्याग के तीन प्रकार और कर्म का सच्चा मार्ग
03:49प्रारम भिक्तरिश्य
03:52कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमी
03:54रत के बीच खड़े हैं वीर धनुर्धर अर्जुन
03:57और उनके सार्थी जगत के मार्ग दर्शक श्री कृष्ण
04:01अर्जुन अब सन्यास और त्याग का मूल अर्थ समच चुगे हैं
04:05लेकिन अब उनके मन में एक और प्रश्न उठता है
04:08अगर त्याग इतना महत्वपून है
04:10तो क्या सभी प्रकार के त्याग समान होते हैं
04:13या उनमें भी कोई अंतर है
04:16द्रिश एक त्याग के तीन प्रकार
04:19श्री कृष्ण कहते हैं
04:21अर्जुन त्याग भी तीन प्रकार का होता है
04:24और ये मनुष्य के स्वभाव और गुणों पर निर्भर करता है
04:27ये तीन प्रकार है
04:29एक, सात्विक्तियाग
04:31दो, राजसिक्तियाग
04:33तीन, तामसिक्तियाग
04:36यही तीनों गुण मनुष्य के कर्म और निर्नय को प्रभावित करते है
04:402. Tamsik Tiyag
05:10इसके बाद श्री कृष्न बताते हैं राजसिक Tiyag
05:12जब कोई व्यक्ति कर्म इसलिए छोड़ देता है क्यूंकि उसे कठिनाई से डर लगता है
05:17उसे शरीर की पीडा से भाय होता है या वो परिश्रम नहीं करना चाहता तो ये राजसिक Tiyag कहलाता है
05:24ऐसा व्यक्ति कर्म से बचना चाहता है लेकिन उसके मन में अभी भी फल की इच्छा और अहंकार छिपा रहता
05:31है
05:34अब श्री कृष्न बताते हैं सबसे श्रीष्ट Tiyag
05:38ये Tiyag वो है जिसमें मनुष्य अपने कर्तव्य को पूरी निष्ठा से करता है लेकिन उसके फल से आसक्त नहीं
05:46होता
05:47वो कर्म करता है क्यूंकि वो उसका धर्म है ना उसे सफलता का घमंड होता है ना असफलता का दुख
05:53यही सच्चा योग है कर्म करते हुए भी मन शांत रहता है और यही मार्ग मनुष्य को धीरे धीरे आध्यातनिक
06:02स्वतंतरता की ओर ले जाता है
06:07श्रीकृष्ण कहते हैं जो व्यक्ति कर्म से घ्रणा नहीं करता और शुब कर्मों से आसक्त भी नहीं होता वही सच्चा
06:15त्यागी है
06:15ऐसा व्यक्ति बुद्धिमान होता है शंकाओं से मुक्त होता है और जीवन के वास्तविक अर्थ को समझने लगता है
06:24अर्जुन अब और गहराई से समझ रहे हैं त्याग का अर्थ कर्म छोड़ना नहीं है बलकि कर्म के परिणाम से
06:31स्वयम को मुक्त करना है
06:33जब मनुष्य ये कला सीख लेता है तो वही कर्म उसे बंधन में नहीं डालता बलकि वही कर्म उसे धीरे
06:40धीरे मोक्ष की ओर ले जाता है
06:41और इसी के साथ श्री कृष्ण अब अर्जुन को अगला गहरा रहसे बताने वाले हैं कर्म के पाँच कारण और
06:48मनुष्य की वास्तविक भूमी का
06:50भाग तीन कर्म के पाँच कारण और एहंकार का भ्रम
06:55प्रारंभिक दृष्य कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमी
06:59रत के मध्य खड़े हैं महान योध्धा अर्जुन
07:02उनके सामने खड़े हैं उनके सार्थी जगत के गुरू योगेश्वर श्री कृष्ण
07:07अर्जुन अब त्याग का सच्चा अर्थ समझ चुके हैं
07:11But now, Shri Krishna is one of these 5 reasons.
07:15How does the human body come from?
07:18How does the human body come from?
07:211. Karma and 5 reasons
07:24Shri Krishna says,
07:26Hey Arjun!
07:27This is the 5 reasons.
07:30This is the first one.
07:321. Adhishthan.
07:342. Karta.
07:373. Karta.
07:393.
07:393. Karan, yani Indriya or Obkaran. 4. Vivid Cheshtaen, yani Vibhind Prayas or Kriyayen. 5. Dev, yani Ishvar ki Adrishya
07:51Vivastha.
07:52In 5. Kariyaan, yani Indriya or Obkaran. 4. Vivid Cheshtaen, yani Vibhind Prayas or Kriyayen. 5. Dev, yani Ishwar ki
08:04Adrishya Vivastha.
08:045. Vivid Cheshtaen, yani Vibhind Prayas or Kriyayen. 5. Vivid Cheshtaen, yani Vibhind Prayas or Kriyayen.
08:366. Vivid Cheshtaen, yani Vibhind Prayas or Kriyayen. 5. Vivid Cheshtaen, yani Vibhind Prayas or Kriyayen.
09:017. Vivid Cheshtaen, yani Vibhind Prayas or Kriyayen. 6. Vivid Cheshtaen, yani Vibhind Prayas or Kriyayen.
09:28बलकि एक दिव्य व्यवस्था का हिस्सा है
09:30जब ये सत्य स्पष्ठ हो जाता है
09:33तो एहंकार धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है
09:35और वहीं से शुरू होती है
09:37सच्ची आध्यात्मिक स्वतंत्रता
09:39अगले भाग में श्री कृष्ण बताएंगे
09:41ज्यान, कर्म और करता के तीन प्रकार
09:44ये समझने से पता चलता है
09:46कि मनुष्य की सोच और कर्म
09:48उसके गुणों के अनुसार कैसे बदलते हैं
09:50भाग चार
09:51ज्यान, कर्म और करता के तीन प्रकार
09:57प्रारम भिगद्रिश्य
09:59कुरुक्षेत्र की विशाल युद्ध भूमी
10:01आकाश में धूल उड रही है
10:03शंकों की ध्वनी गूंज रही है
10:06और उसी बीच खड़े हैं महान धनुर्धर अर्जुन
10:09उनके सामने खड़े हैं योगेश्वर, जगत के मार्गदर्शक श्री कृष्ण
10:14अभी अभी श्री कृष्ण ने कर्म के पांच कारणों का रहस्य बताया है
10:19अब वे अर्जुन को एक और गहरा सत्य समझाने वाले हैं
10:23मनुष्य का ज्यान, कर्म और कर्ता भी तीन प्रकार के होते हैं
10:28this are called antivarii.
10:31they are called antivarii.
10:33antivarii.
10:33antivarii.
10:34ard parisarii.
10:38law of Mahanaita vasza,
10:45antivarii.
10:46Chai-nei why.
10:48The antivarii.
10:50The antivarii.
10:51ovat the antivarii.
10:54God is the antivarii.
10:56श्रीकृिष्ण अब इन्ही तीनों के रहस्य को विस्तार से समझाते हैं.
11:03दृष्च 2. सात्विग्ञान
11:06सात्विग्ञान वो है जो एक्ता को देखता है.
11:09ऐसा ज्ञान रखने वाला व्यक्ति सभी प्राणियों में एक ही आत्मा को देखता है.
11:14He can feel the same.
12:12Transcription by CastingWords
12:15तामसिक ज्यान सबसे सीमित और भ्रमित होता है। ऐसा ज्यान रखने वाला व्यक्ति सत्य को ठीक से समझ ही नहीं
12:21पाता।
12:22वो किसी एक छोटी चीज को ही पूरी सच्चाई मान लेता है। उसकी सोच संकीन होती है।
12:28वो बिना तर्क और बिना गहराई के किसी बात पर विश्वास कर लेता है। ऐसा ज्यान मनुष्य को अज्यान और
12:35भ्रम में फसा देता है।
12:42अब श्री कृष्ण कर्म के तीन प्रकार बताते हैं।
12:48सात्विक कर्म वो है जो कर्तव्य के भाव से किया जाता है।
12:53ऐसा कर्म बिना अहंकार के, बिना फल की इच्छा के, शान्ती और संतुलन के साथ किया जाता है।
13:00ये कर्म मनुष्य को मुक्ती से, बंधन से मुक्त करता है।
13:06राजसिक कर्म राजसिक कर्म वो है जो इच्छा और स्वार्थ से प्रेरित होता है।
13:11This Kurm does not take Chantams There is no question whatsoever.
13:30Cha member has done with ur untrilled Moyes.
13:31He doesn't think can not be promised.
13:34He doesn't work without idea Keter.
13:48अब श्री क्रिष्न कर्ता के तीन प्रकार बताते हैं.
13:54सात्विक करता
13:55सात्विक करता अहंकार से मुक्त होता है, धैर्यवान और उत्साही होता है, सभलता और असभलता में समान रहता है, ऐसा
14:04व्यक्ति कर्म करता है, लेकिन कर्मों से बंधता नहीं.
14:10राजसिक करता
14:11राजसिक करता फल की इच्छा से प्रेरित होता है, अहंकार से भरा होता है, सभलता में खुश और असभलता में
14:18दुखी हो जाता है, उसकी शान्ती बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर होती है.
14:51तामसिक करता
14:53व्यक्तित्व गुण को बढ़ाता है, तो उसका ज्यान, कर्म और व्यक्तित्व सब कुछ बदलने लगता है, और यहीं परिवर्तन उसे
15:00धीरे-धीरे आध्यात्मिक स्वतंत्रता की ओर ले जाता है.
15:06अगले भाग में श्री कृष्ण बताएंगे बुद्धी और धृति यानि द्रणसा के तीन प्रकार.
15:12ये ग्यान हमें समझाता है कि मनुष्य के निर्णय और उसकी मानसिक शक्ति कैसे उसके जीवन की दिशा तै करती
15:19है.
15:19भाग पांच. बुद्धी और धृति के तीन प्रकार. कुरुक शेत्र की युद्ध भूमी. युद्ध शुरू होने ही वाला है. लेकिन
15:30युद्ध से पहले ज्यान का एक महान समबाद चल रहा है. महान धनुर्धर, अर्जुन और उनके सार्थी, जगत के गुरू,
15:39श्री क
15:49अर्जुन, मनुष्य के जीवन के दो और महत्वपूर्ण तत्व समझाते हैं. बुद्धी और धृति. बुद्धी क्या है? बुद्धी वो शक्ती
15:59है, जो हमें सही और गलत में अंतर करना सिखाती है. ये वही शक्ती है, जो निर्णय लेती है, क्या
16:06करना चाहिए और क्या �
16:08नहीं करना चाहिए। लेकिन हर व्यक्ति की बुद्धी समान नहीं होती। प्रकृती के तीन गुणों के अनुसार बुद्धी भी तीन
16:16प्रकार की होती है।
16:38सही अर्थ जानता है। उसकी बुद्धी ब्रहमित नहीं होती। वो जीवन के मार्ग को सपष्ट रूप से देख सकता है।
16:45ऐसी बुद्धी मनुष्य को सही निर्णय लेने की शक्ति देती है।
17:08इसलिए उसके निर्णय अक्सर अस्थिर होते हैं।
17:12तामसिग बुद्धी अज्ञान से धकी होती है। ऐसा व्यक्ति अधर्म को ही धर्म मान लेता है। वो वास्तविक्ता को उल्टा
17:22देखता है। उसके निर्णय अज्ञान, आलश्य और भ्रम से भरे होते हैं।
17:27ऐसी बुद्धी मनुष्य को धीरे-धीरे अंधकार और दुख की ओर ले जाती है।
17:33धृती यानि दृढता क्या है?
17:36अब श्री कृष्ण धृती का रहस्य बताते हैं।
17:39धृती का अर्थ है मन, प्राण और इंद्रियों को स्थिर रखने की शक्ती।
17:44यही वो शक्ती है जो कठिन परिस्थितियों में भी मनुष्य को अपने मार्ग पर बनाये रखती है।
17:51लेकिन धृती भी तीन प्रकार की होती है।
17:54सात्विक धृती मनुष्य को आत्म संयम देती है।
18:00ऐसा व्यक्ती अपने मन को नियंत्रित कर सकता है।
18:03इंद्रियों को संतुलित रखता है, ध्यान और योग में स्थिर रह सकता है. उसकी द्रड़ता आत्मिक विकास की और ले
18:11जाती है.
18:12राजसिक ध्रिती इच्छाओं और लक्षों से प्रेरित होती है. ऐसा व्यक्ति धन, सफलता और भोगों को पाने के लिए द्रड़
18:22रहता है. उसकी द्रड़ता उसे संसार में सफलता दिला सकती है, लेकिन आंतरिक शान्ती नहीं देती.
18:30तामसिक ध्रिती अज्ञान से जुड़ी होती है. ऐसा व्यक्ति आलस्य से चिपका रहता है. भय और दुख से बाहर नहीं
18:39निकल पाता. निराशा और भ्रम में अठका रहता है. उसकी द्रड़ता उसे आगे बढ़ने के बजाए और गेहरे अंधकार में
18:47ले जाती है.
18:48समापंद्रिश्य
19:18सुख के तीन प्रकार. ये ज्यान हमें समझाता है कि सच्चा सुख क्या है और कौन सा सुख हमें वास्तव
19:26में मुक्त करता है.
19:27भाग शे. सुख के तीन प्रकार और जीवन का सच्चा आनंद.
19:33प्रारम्भिग्द्रिश्य
19:34कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमी.
19:36चारों और विशाल सेना खड़ी है.
19:39रण भेरी बजने को तैयार है.
19:41लेकिन इस महान युद्ध से पहले एक और महान युद्ध चल रहा है.
19:45मन के भीतर का युद्ध.
19:47इस युद्ध में मार्ग दर्शन कर रहे हैं जगत की योगेश्वर, श्री कृष्ण.
19:52और उनके सामने खड़े हैं महान युद्धा, अर्जुन.
19:56अब श्री कृष्ण अर्जुन को जीवन का एक अत्यंत महत्वपून सत्य बताते हैं.
20:02सुख भी तीन प्रकार का होता है.
20:04द्रिश्य एक.
20:06सात्विक सुख.
20:07श्री कृष्ण कहते हैं, सात्विक सुख शुरुवात में कठिन लगता है,
20:12लेकिन अंत में अम्रित के समान हो जाता है.
20:15ये सुख आत्मग्यान, अनुशासन और आत्मसय्यम से पैदा होता है.
20:19जब मनुष्य ध्यान करता है, अपने मन को नियंतरित करता है,
20:24और सच्चाई और धर्म के मार्ग पर चलता है,
20:26तो शुरुवात में उसे महनत और संगर्ष महसूस होता है.
20:30लेकिन धीरे-धीरे उसका मन शान्त होने लगता है,
20:33और अन्त में उसे गहरी शान्ती और संतोश मिलता है.
20:37यही है सच्चा और स्थाई सुख.
20:40द्रिश्चिदो, राजसिक सुख.
20:43राजसिक सुख शुरुवात में बहुत आकर्षक लगता है.
20:46यह सुख इंद्रियों और भौतिक चीजों से जुड़ा होता है.
20:49जैसे स्वादिष्ट भोजन, धन और वैभव, प्रसिध्धी और प्रशंसा.
20:54शुरुवात में यह सुख अम्रत जैसा लगता है.
20:57लेकिन समय के साथ यह धीरे-धीरे विश्च बन जाता है.
21:00क्योंकि इच्छाएं कभी समाप्त नहीं होती.
21:03एक इच्छा पूरी होती है, तो दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है.
21:07इसलिए राजसिक सुख मनुष्य को स्थाई शांती नहीं दे पाता.
21:11द्रिश्यतीन
21:12तामसिक सुख
21:14तामसिक सुख अज्ञान से उत्पन्न होता है.
21:16ऐसा सुख मनुष्य को आलस्य, भ्रह्म और अंधकार में डुबो देता है.
21:21ये सुख मिलता है अत्यतिक सोने से, आलस्य से, नशे या भ्रह्म में रहने से.
21:26ऐसा सुख मनुष्य को अस्थाई आराम देता है, लेकिन धीरे-धीरे उसकी चेतना को कमजोर कर देता है
21:33ये सुख मनुष्य को आगे बढ़ाने के बजाए उसे पीछे की ओर ले जाता है
21:38सच्चे आनंद का मार्ग
21:39अब श्रीक्रिष्ण अर्जुन को समझाते हैं, सच्चा सुख बाहरी वस्तूओं में नहीं है
21:44सच्चा सुख मन की शांती में है
21:47जब मनुष्य अपने कर्तव्य को इमानदारी से करता है, अपने मन को संतुलित रखता है और परमात्मा से जुड़ता है
21:54तब उसके भीतर एक ऐसा आनंद उत्पन होता है, जो कभी समाप्त नहीं होता
21:59यही है आध्यात्मिक आनंद
22:02समापंद्रिश
22:03अब अर्जुन के सामने जीवन का एक और रहस्य स्पष्ठ हो चुका है
22:07हर सुख वास्तव में सुख नहीं होता
22:09कुछ सुख क्षणिक होते हैं
22:11और कुछ सुख मनुष्य को सदा के लिए बदल देते हैं
22:15जो व्यक्ति सात्विक सुख के मार्ग को अपनाता है
22:17वो धीरे-धीरे आत्मिक शान्ती और मुक्ती के मार्ग पर आगे बढ़ता है
22:22अगले भाग में श्रीकृष्ण बताएंगे
22:24मनुष्य के स्वभाव के अनुसार उसके कर्तव्य क्या है
22:27ये ज्यान हमें समझाता है कि हर व्यक्ति का जीवनपत अलग क्यूं होता है
22:32भाग सात
22:33स्वधर्म और समाज में चार वरणों के कर्तव्य
22:38कारिक्रम की आकरूशिया
22:40कुरुक्षेत्र की विशाल भूमी
22:43आकाश में धूल उड़ रही है
22:45हजारों योध्धा युद्ध के लिए तयार खड़े है
22:47लेकिन इस युद्ध भूमी पर सबसे बड़ा समवाज चल रहा है
22:52महान योधा, अर्जुन और जगत के मार्क दर्शक श्री कृष्ण के बीच
22:56अब श्री कृष्ण अर्जुन को जीवन का एक महत्वपूर्ण सिधान्त समझाते हैं
23:01स्वधर्म का सिधान्त
23:03द्रिश्य एक
23:05स्वधर्म क्या है
23:06Svadharm का अर्थ है अपने स्वभाव और गुणों के अनुसार किया जाने वाला कर्तव्य
23:11हर ममुष्य अलग होता है
23:13हर व्यक्ती की शमताएं, प्रवृत्तियां और स्वभाव अलग होते हैं
23:18इसीलिए हर व्यक्ती का कर्तव्य भी अलग होता है
23:22श्रीकृष्ण बताते हैं, समाज को संतुलित रखने के लिए
23:25मनुष्यों के स्वभाव के आधार पर चार प्रकार के कर्तव्य निर्धारित किये गए हैं
23:30इन्हें चार वर्ण कहा जाता है
23:33द्रिश्य दो, ब्रहम्मन के कर्तव्य
23:36पहला वर्ण है ब्रहम्मन
23:38ब्रहम्मन का स्वभाव ज्यान और आध्यात्मिक्ता की और जुका होता है
23:42उनके प्रमुक गुण होते हैं
23:45शांती, आत्मसंयम, सत्य, ज्यान और विवेक, आध्यात्मिक साधना
23:50उनका मुख्य कर्तव्य है ज्यान प्राप्त करना और समाज को सही मार्ग दिखाना
23:553. Shatriya ke karta vya.
23:592. Shatriya.
24:01Shatriya ka svabhav, sahas or netritv se jjuda haotahe.
24:05Unke gund hootetay hain virita, shakti, dhairya, nyaay ki raksha, kamzorong ki suraaksha.
24:12Unka karta vya hai saamaj ki raksha karna aur dharm ki sthapna karna.
24:164. Vyashya ke karta vya.
24:193. Vyashya.
24:21Vyashya ka svabhav, vyaapar aur sansadhano ke prabandhan se jjuda haotahe.
24:26Unke mukhe kariye hootetay hain kriši, vyaapar, pashupalan, dhan aur sansadhano ka santulit prabandhan.
24:33Vye samaj ki arthik vivaastha ko mzbūt banaate hain.
24:375. Shudr ke karta vya.
24:404. Shudr.
24:42Shudr ka karta vya hai samaj ki sewa karna aur vibhin kariyoh me sahiyog dena.
24:465. Unke kariyoh ke bina, samaj ka koi bhi tantra sahi tariqe se nahi chal saakta.
24:526. Isprakar, samaj ka har warg, eek dousre se jjuda huwa hai.
24:566. Drişya 6. Swadharam ka mehetv.
24:596. Ab Shri Krishna eek gehera sathya batathe hain.
25:027. Dousre ka shresht karm karne se bhetar hai,
25:05aapne swadharam ka sadharan palan karna.
25:078. Kiyunki, jab manushya aapne subhav ke anusar karm karta hai,
25:11toh woh adhik santulit aur sathal hootahe.
25:139. Lekin jab woh dousro ke marg ki nukal karta hai,
25:17toh woh bhram aur asaphalta ame phas saktta hai.
25:209. Samaapandrishya
25:21Ab arjun samajnene lage hai,
25:23hər vyakti ka jeevan eek visheish uddehshya ke saath judha hai.
25:2610. Jab manushya aapne subhav aur kartawya ko pahachan ta hai,
25:30aur imaandari se aapne swadharam ka palan karta hai,
25:33toh wohi karm dhire dhire usse aadhyatmik unnati
25:36aur moksh ki yor le jata hai.
25:3810. Aaglye bhaag mein Shri Krishna bataayenge,
25:40karm ko yog me badalne ka rahasya,
25:43aur param siddhi tak pahuncne ka marg.
25:4511. Bhag 8
25:47Aapne karm se param siddhi kaise prahapth hooti hai?
25:5111. Prarambhik drishya
25:5212. Kuruk shetra ki vishal bhoomii
25:5413. Suraj dhire dhire uopar u'th raha hai.
25:5814. Senayen yudh ke liye tajyar khađi hai.
26:0015. Lekin yudh se pahle,
26:0215. Eek or mahan yudh chal raha hai.
26:0515. Man ka yudh
26:0615. Is yudh me marg darshan kar raha hai
26:0815. Yogeshwar, Shri Krishna.
26:1115. Or u nki sámane khađe hai
26:1215. Mahan dhanur dhar, Arjun.
26:1516. Ab Shri Krishna Arjun ko
26:1715. Manushya aapne karm ke maadhyam se bhi
26:2015. Param siddhi prahapth kar saktta hai.
26:2216. Drishya 1
26:2315. Karm hii sadhana ban saktta hai.
26:2616. Aakstar log souchtay hai ki
26:2816. Aadhyatmikta ka arth hai
26:2916. Sab kut chhoed kar
26:3116. Janggal ya áashram me chalye jana.
26:3316. Lekin Shri Krishna
26:3416. Eek alag sattya bata tate hai.
26:3617. Vhe qehtate hai,
26:3718. Manushya aapne saadharan jeevan ki karmo ko bhi
26:4018. Saadhana bana saktta hai.
26:4219. Jab yakti,
26:4319. Eemandari se aapna karthavya karta hai,
26:4619. Bina svarth ke karm karta hai,
26:4820. Or phal ki icchha ko chhoed dayta hai,
26:5020. Tô vahe karm dhire dhire yog ban jata hai.
26:5420. Drixya 2
26:5521. Aapne swabhav ke anusar karm.
26:5722. Shri Krishna kehatе hai,
26:5922. Har vyakti ka swabhav alag hota hai.
27:0223. Isi liee,
27:0223. Harvyakti ka karthavya bhi alag hota hai.
27:053. When humans are in the same way, when humans are in the same way, when humans are in the
27:12same way, they are in the same way.
27:174. When humans are in the same way, when humans are in the same way, when humans are in the
27:30same way, when humans also in the same way, when humans oftenen alive, they operate a way and how they
27:43appear.
27:44Drix 4. Param Siddhi की अवस्था
27:47जब मनुष्य अपने करम को ईश्वर को समर्तित करता है, अपने मन को शांत रखता है और अपने कर्तव्य को
27:55धर्म की अनुसार करता है, तो धीरे-धीरे उसका मन शुद्ध हो जाता है, और शुद्ध मन आत्म ज्यान की
28:01ओर ले जाता है.
28:02यही आत्म ज्यान मनुष्य को परम सिध्धी और मोक्ष की ओर ले जाता है.
28:08समापंद रिश्य
28:09अब अर्जुन समझ चुके हैं, जीवन में हर कर्म महत्वपूर्ण है, कर्म से भागना समाधान नहीं है, बलकि कर्म को
28:17सही भावना से करना ही सच्चा योग है.
28:20जब मनुष्य अपने कर्म को इश्वर की सेवा समझ कर करता है, तो वही कर्म उसे धीरे-धीरे मुक्ती और
28:27परमशांती तक पहुचा देता है.
28:29श्री कृष्ण अर्जुन को बताएंगे परमशांती प्राप्त करने का अंतिम मार्ग और भक्ती का सर्वोच रहस्य.
28:36भाग नौ परमशांती और ब्रमभाव की प्राप्ती
28:41प्रारंभिक द्रिश्य
28:42कुरुक शेत्र की युद्ध भूमी, हजारो रत, असंख योद्धा और इतिहास का सबसे बड़ा युद्ध शुरू होने के एक अगार
28:50पर है.
28:51लेकिन इस युद्ध भूमी पर एक ऐसा समवाद चल रहा है, जो पूरे मानवितिहास को दिशा देने वाला है.
28:57रत के मध्य खड़े हैं योगेश्वर श्री कृष्ण और उनके सामने हैं महान धनुर्धर अर्जुन.
29:04अब श्री कृष्ण अर्जुन को बताते हैं परम शांती और ब्रम भाव प्राप्त करने का अंतिम मार्ग.
29:12द्रिश एक मन और इंद्रियों का नियंत्रण
29:15Shri Krishna says,
30:02Shri Krishna says,
30:25Shri Krishna says,
30:49Shri Krishna says,
31:15Shri Krishna says,
31:39Shri Krishna says,
32:07Shri Krishna says,
32:38Shri Krishna says,
32:57Shri Krishna says,
33:50Shri Krishna says,
34:21Shri Krishna says,
34:24Shri Krishna says,
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