00:00रामायन के बालकांड का दूसरा अध्याय बहुत महत्वपून है क्योंकि इसमें महर्शी वालमीकी के जीवन की वो घटना आती है
00:08जिसने उन्हें पहला शलोक रचने की प्रेरना दी. यही घटना आगे चल कर पूरी रामायन की रचना का कारण बनती
00:15है.
00:16बालकांड अध्याय दो
00:18तमसा नदी और प्रथम शलोक क्योत पत्ती
00:21देवर्शी नारद के जाने के बाद महर्शी वालमीकी का मन लंबे समय तक उसी वार्ता में लगा रहा.
00:28नारद ने जिस पुरुष का वर्णन किया था, जो सत्यवादी, धर्मनिष्ट, वीर और करुणा में था, वे थे भगवान राम.
00:36राम के गुणों और उनके जीवन की कथा ने वालमीकी के हृदय को गहराई से स्पर्ष किया था.
00:42वे सोच रहे थे, क्या वास्तव में इस पृत्वी पर ऐसा आदर्ष पुरुष हुआ है? क्या मैं उसकी कथा को
00:49संसार के सामने प्रस्तुत कर सकता हूँ?
00:51इन विचारों में डूबे हुए महर्शी वालमीकी धीरे धीरे अपने आश्रम के भीतर टहलने लगे.
00:58उनके शिश्य भी उनके पास ही थे, लेकिन वे अपने गुरु के शांत और चिंतनशील चहरे को देखकर समझ रहे
01:05थे कि वे किसी गहरे विचार में लीन है.
01:07नदी की ओर प्रस्थान
01:09कुछ समय बाद महर्शी वालमीकी ने अपने प्रिय शिश्य भरद्वाज को बिलाया.
01:15उन्होंने कहा, हे भरद्वाज, आज मेरा मन आश्रम से बाहर जाने का है.
01:20चलो, हम निकट की पवित्र नदी तक चलते हैं.
01:23वहर का शान्त वातावरण मन को और भी शुद्ध करता है.
01:27भरद्वाज ने तुरंत आज्या का पालन किया.
01:30दोनों गुरू और शिश्य आश्रम से बाहर निकले और वन की ओर चल पड़े.
01:35जंगल का वातावरण अत्यंत सुन्दर था.
01:37उचे उचे व्रिक्षों की चाया धर्ती पर फैली हुई थी.
01:41हलकी हवा चल रही थी.
01:42और पत्तियों की सरसराहट एक मधुर संगीत जैसी लग रही थी.
01:46कई प्रकार के पक्षी व्रिक्षों पर बैठ कर मधुर स्वर में गा रहे थे.
01:51हिरण और अन्यवन्यजीव निर्भाय होकर जंगल में घूम रहे थे.
01:55ये द्रिश्य इतना शांत और सुन्दर था कि मानो प्रकृती स्वयम ध्यान में लीन हो.
02:00तमसा नदी का दर्शन
02:02कुछ देर चलने के बाद वे एक सुन्दर नदी के किनारे पहुँचे.
02:06ये थी तमसा नदी, एक शांत और निर्मल धारा वाली नदी.
02:11उसका जल इतना स्वच्छ था कि नदी का तल साफ दिखाई देता था.
02:15महर्शी वालमीकी ने नदी को देख कर कहा,
02:18देखो भरदवाज, ये नदी कितनी शांत और पवित्र है.
02:21इसका जल इतना निर्मल है कि मनुष्य यहां स्नान करके अपने मन और शरीर दोनों को शुद्ध कर सकता है.
02:29नदी के किनारे हरी घास उगी हुई थी.
02:32आसपास अनेक व्रिक्ष थे जिनकी शाखाएं नदी के ऊपर जुकी हुई थी.
02:36पूरा वातावरण अत्यंत मनमोहक और शांत था.
02:40क्रॉंच पक्षियों का द्रिश्य.
02:42उसी समय महर्शी वालमीकी की द्रिश्टी पास के एक व्रिक्ष पर पड़ी.
02:47वहां उन्होंने दो सुन्दर पक्षियों को देखा.
02:50वे क्रॉंच पक्षी थे.
02:51एक नर और एक माधा.
02:53दोनों पक्षी अत्यंत प्रेम से साथ बैठे हुए थे.
02:56वे कभी उड़ते, कभी एक दूसरे के पास आकर मधुरस्वर में चहकते.
03:01उनका प्रेम और स्नेह देखकर महर्शी वालमीकी के चहरे पर मुस्कान आ गई.
03:06उन्होंने अपने शिश्य से कहा,
03:08देखो भरद्वाज, ये दोनों पक्षी कितने प्रेम से साथ रह रहे हैं.
03:12प्रकृती में हर जीव के जीवन में प्रेम और स्नेह का कितना महत्व है.
03:17दोनों पक्षी अपने संसार में मगन थे.
03:20उन्हें ये भी पता नहीं था कि पास ही एक महान रिशी खड़े होकर उन्हें देख रहे हैं.
03:25शिकारी का आगमन.
03:27लेकिन अचानक उस शांत वातावरण में एक अप्रत्याशित घटना घटी.
03:32पास ही कहीं एक शिकारी छिपा हुआ था.
03:34वो धनुष और बान लेकर शिकार की तलाश में घूम रहा था.
03:38उसकी द्रिश्टी उन दोनों क्रॉंच पक्षियों पर पड़ी.
03:41उसने सोचा, ये एक अच्छा अफसर है.
03:44मैं इन में से एक को मार सकता हूँ.
03:46उसने तुरंट अपना धनुष उठाया और बान को प्रत्यंचा पर चड़ा दिया.
03:51दुखत घटना.
03:52अचाना के एक तीखी आवाज हुई.
03:54शिकारी का बान तेजी से उड़ता हुआ आया और नर क्रॉंच पक्षी को लग गया.
04:00बान लगते ही वो पक्षी जोर से चीखता हुआ जमीन पर गिर पड़ा.
04:03उसकी मृत्यू हो गई.
04:05ये दृष्य अत्यंत दुखत था.
04:08मादा क्रॉंच पक्षी अपने साथ ही को जमीन पर गिरते देखकर अत्यंत दुखी हो गई.
04:12वो जोर जोर से रोने लगी.
04:15वो उसके चारों ओर उड़ती और करुण स्वर में चिल्लाटी रही.
04:19वालमेकी का करुणा से भर उठना.
04:21यह दृष्य देखकर महर्शी वालमेकी का हरिदय करुणा से भर उठा.
04:25उन्होंने उस मादा पक्षी का विलाप सुना.
04:28उसकी पीड़ा इतनी गहरी थी कि मानों उसका हरिदय तूट गया हो.
04:32महर्शी वालमेकी को यह देखकर अत्यंत दुख हुआ.
04:35उन्होंने सोचा, यह कितना क्रूर कार्य है.
04:39इन दोनों पक्षियों का प्रेम कितना पवित्र था.
04:41और इस शिकारी ने बिना किसी कारण के उन में से एक को मार दिया.
04:45उनके हृदय में उस शिकारी के प्रती करोद और दुख दोनों उत्पन हो गए.
04:50पहला श्लोक
04:51उसी क्षण महर्शी वालमीकी के मुक्से स्वतह एक वाक्य निकला.
05:03इसका अर्थ है, हे निशाद यानि शिकारी, तुम्हें कभी भी स्थाई प्रतिष्ठा प्राप्त न हो, क्योंकि तुमने प्रेम में मग्न
05:11क्रॉंच पक्षियों के जोड़े में से एक को मार डाला है.
05:13यह श्लोक महर्शी वालमीकी के मुक्से स्वतह निकला था. उन्होंने पहले कभी इस प्रकार की छंद बद्ध रचना नहीं की
05:20थी.
05:21वालमीकी का आश्चर्य
05:51।
05:53इसी कारण महर्शी वालमी की को आदी कवी कहा जाता है अर्थात संसार के पहले कवी आश्रम की और वापसी
06:00इसके बाद महर्शी वालमी की और उनके शिश्य वापस अपने आश्रम की और लोटने लगे लिकिन उनका मन अब भी
06:06उसी घटना में लगा हुआ था
06:07They thought, can you see Ram's mind that Ram's mind should be written in the face of the face?
06:13In the meantime, Ram's mind is the thought of the thought of Ram's mind.
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