00:00रामायन के बालकांड का अध्याय आठ कथा का एक महत्वपून मोड है। इसी अध्याय में महान तपस्वी विश्वामिक्र अयोध्या आते
00:09हैं और राजा दशरत से भगवान राम को अपने साथ ले जाने का आग रह करते हैं। ये घटना राम
00:15के जीवन के पहले बड़े धर
00:16कार्य की शुरुवात बनती है। नीचे इस अध्याय का विस्तृत कथा वर्णन प्रस्तुत है। बालकांड अध्याय आठ रिशी विश्वामित्र का
00:26आगमन। अयोध्या नगरी में समय शान्ती और सम्रिध्धी के साथ बीत रहा था। चारो राजकुमार अब युवा व
00:46प्रियता देखकर उन्हें गर्व होता था। इसी समय एक दिन अयोध्या में एक महान घटना घटी। महान रिशी का आगमन।
00:54एक सुभह राज महल के द्वार पर सूचना पहुँची कि महान तपस्वी रिशी विश्वामित्र अयोध्या पधारे हैं। ये सुनकर राजा
01:01�
01:01दशरत तुरंत उठ खड़े हुए। रिशी विश्वामित्र उस समय के सबसे महान और शक्तिशाली रिशियों में से एक थे। उनका
01:08तप इतना प्रबल था कि देवता भी उनका सम्मान करते थे। राजा दशरत स्वयम महल से बाहर आये और अत्यंत
01:15आदर के साथ रिशी व
01:30भा में बैठाया गया। वहाँ उपस्तित सभी मंत्री, विद्वान और रिशी उनके देखकर सम्मान से जुग गये। राजा दशरत ने
01:38उनके चरंड होए और उनके आसन प्रधान किया। कुछ समय तक धर्म और राज्य के विशयों पर चर्चा होती रही।
01:44फिर राजा द
02:00उनके आगे कहा, वे राक्षस इतने शक्तिशाली हैं कि मेरी शिश्यों और आश्रम के लोगों के लिए उनसे रक्षा करना
02:06कठिन हो गया है। फिर उन्होंने कहा, मैं चाहता हूं कि आपका पुत्र राम मेरे साथ आए और उन राक्षसों
02:13से मेरे यग्ग की रक्षा करे। �
02:15दश्रत की चिन्ता.
02:16ये सुनकर राजा दश्रत चिन्तिद हो गए.
02:19राम उस समय अभी बहुत युवा थे.
02:21राजा दश्रत ने कहा,
02:22हे महर्षे, राम अभी बालक हैं.
02:25वे युद्ध के लिए बहुत छोटे हैं.
02:27यदि आप चाहें, तो मैं अपनी पूरी सेना आपके साथ भेज सकता हूँ.
02:30लेकिन रिशी विश्वामित्र ने कहा,
02:32राजन, मुझे केवल राम चाहिए.
02:35वही इन राक्षसों का सामना कर सकते हैं.
02:38सभा में मौन चा गया.
02:40राजा दशरत के मन में अपने पुत्र के प्रती प्रेम और चिंता दोनों थे.
02:44वे राम को किसी भी खत्रे में नहीं डालना चाहते थे.
02:47लेकिन रिशी विश्वामित्र का आग्रह भी अत्यंत महत्वपूर्ण था.
02:50गुरु वशिष्ट की सलाह.
02:53उसी समय राज गुरु वशिष्ट ने राजा दशरत को समझाया.
02:56उन्होंने कहा,
02:57राजन, महर्शी विश्वामित्र की बात को स्वीकार करना ही उचित है.
03:01Guru-va-shishth jantay thay ki vishwamitr ke saath jane se rama ko mahan gyan aur anubhav praapth ho ga.
03:07Ram ki svi kriti
03:09Jib rama ko is vishay me bata ya gaya, to onho ne bina kishi sankoch ke aapne pita ki agya
03:14svi kara kar li.
03:15Ram nene kaha,
03:16Pita shri, yadhi ye dharm ki raksha ka kariya hai, to mai awash jau ga.
03:21Lakshman nene bhi turant kaaha ke vay aapne bhai rama ke saath jayenge.
03:25Prasthan ki tayyari
03:26Raja Dashrat nene bhari man se aapne putrong ko vidah karne ki tayyari ki.
03:30Maatayen bhi aapne putrong ko dhekkar bhaavuk ho gai,
03:33Lekin vhe janti thin ki ye bharm aur karthavya ka marg hai.
03:37Ram aur lakshman nene aapne maata pita aur gurujanon ke charan sparsh kiye.
03:41Phir vhe rishi vishwamitr ke saath ayodhya se nikal pade.
03:44Yatra ka praramb
03:45Jib rama aur lakshman ayodhya se baahar nikale,
03:49To ayodhya ki praja unheh dhekne ke liye marg ke dhonon aur khađi ho gai.
03:53Log unke liye aashiruvat dhenne lagay.
03:54Rishi vishwamitr ke saath chalte huye ram aur lakshman nai yatra ki aur bada rahe thay.
04:00Ye yatra keval rakshaso se yudh ki nahi thi.
04:02Ye yatra thi gyan ki,
04:05Dharm ki,
04:05Aur mahan kariyong ki shuruvat ki.
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