अमेरिका के कैलिफोर्निया स्थित एक फायर स्टेशन में 'सेंटेनियल लाइट' (Centennial Light) नाम का एक ऐसा ऐतिहासिक बल्ब लगा हुआ है, जो पिछले 125 साल से बिना बुझे लगातार जल रहा है। अब ज़रा सोचिए—अगर सवा सौ साल पहले वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के पास ऐसी तकनीक थी जो ज़िंदगी भर चलने वाला बल्ब बना सकती थी, तो आज हमारे घरों की ट्यूबलाइट, एलईडी और महंगे स्मार्टफोन्स महज़ एक-दो साल में खराब क्यों होने लगते हैं?
अपने बचपन के दौर को याद कीजिए जब पुराने टीवी दशकों तक बिना किसी खराबी के चलते थे, और नोकिया का वह साधारण फोन जिसे छत से गिराने पर भी कुछ नहीं होता था और एक बार चार्ज करने पर बैटरी हफ़्तों चलती थी। लेकिन 1920 के दशक में दुनिया भर की दिग्गज कंपनियों और उद्योगपतियों ने मिलकर 'फीबस कार्टेल' (Phoebus Cartel) नाम का एक गुप्त गठजोड़ बनाया। उनका मकसद बिल्कुल साफ था—अगर कोई उत्पाद कभी खराब ही नहीं होगा, तो ग्राहक दोबारा दुकान पर नया सामान खरीदने क्यों आएगा?
यहीं से बिज़नेस की दुनिया में जन्म हुआ 'प्लांड ऑब्सोलेसेंस' (Planned Obsolescence) का, जिसके तहत कंपनियों ने जानबूझकर अपने प्रॉडक्ट्स की लाइफ को छोटा करना शुरू कर दिया ताकि वे एक तय समय बाद खुद ही बेकार हो जाएं। आज हर गैजेट, बैटरी, अप्लायंसेज और पैकेज्ड डिब्बों पर एक्सपायरी व वारंटी का यह खेल इसी कॉर्पोरेट रणनीति का हिस्सा है, ताकि आपकी जेब से हर महीने पैसे निकलते रहें और कंपनियों का मुनाफा लगातार बढ़ता रहे।
क्या आपको लगता है कि सरकारों को इस कॉर्पोरेट खेल पर रोक लगाने के लिए सख्त राइट-टू-रिपेयर कानून लागू करने चाहिए? कमेंट बॉक्स में अपनी राय ज़रूर साझा करें और दुनिया के ऐसे ही अनसुने बिजनेस सीक्रेट्स के लिए चैनल को सब्सक्राइब करें!