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  • 1 week ago
"जिस सड़क का सरकारी टेंडर 9 करोड़ रुपये का निकलता है, वह असल में महज़ 50 लाख में बनकर तैयार हो सकती है!" यह सनसनीखेज दावा किसी आम नागरिक का नहीं, बल्कि खुद एक पूर्व सरकारी ठेकेदार का है। उनका कहना है कि अगर उस 9 करोड़ के बजट में से सिर्फ 3 करोड़ रुपये भी सड़क पर ईमानदारी से लगा दिए जाएं, तो अगले पाँच साल तक उस पर एक खरोंच या गड्ढा तक नहीं आ सकता।

लेकिन सवाल उठता है कि राज्यों में मुख्यमंत्री के बाद PWD यानी लोक निर्माण विभाग को सबसे ताकतवर और मलाईदार मंत्रालय क्यों समझा जाता है? असल में यह पूरा ढांचा ही इस तरह से काम करता है जहाँ सरकारी ठेके अपने चहेतों को बांटे जाते हैं, और वहाँ से निकलने वाला भारी कमीशन नीचे इंजीनियर से लेकर ऊपर अफ़सरों और सफेदपोश नेताओं तक पहुँचता है।

हर रोज आम भारतीय नागरिक अपनी मेहनत की कमाई से इनकम टैक्स, पेट्रोल पर सेस और हर छोटी चीज़ पर भारी जीएसटी चुकाता है, लेकिन बदले में हमें सिर्फ जानलेवा गड्ढे और टूटी हुई सड़कें नसीब होती हैं। यह पूरा सिस्टम टैक्सपेयर के पैसों पर चलने वाला वो खेल बन चुका है जहाँ जवाबदेही कहीं नजर नहीं आती।

क्या आपको लगता है कि सरकारी ठेकों में भ्रष्टाचार कभी खत्म हो पाएगा या सिस्टम ऐसे ही चलेगा? अपनी बेबाक राय कमेंट बॉक्स में ज़रूर दर्ज करें और ऐसे ही कड़वे सच सामने लाने वाले विश्लेषणों के लिए चैनल को सब्सक्राइब करें!

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