00:00जब सूर्य कुंडली के नवं भाव में स्थित होता है, तो व्यक्ति का जीवन धर्म दर्शन और उच्च ज्यान से
00:08प्रकाशित हो उठता है।
00:10महर्शी पराशर के अनुसार नवं भाव भाग्य, गुरु, पिता और जीवन के उच्च आदर्शों का प्रतिनिधित्व करता है।
00:40यह गृष्टि ज्यान को कर्म और अभी व्यक्ति में बदल देती है।
01:10यह गृष्टि ज्यान केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहता। वह व्यक्ति के साहस, निर्णयों और दैनिक कर्मों में दिखाई देने
01:17लगता है।
01:18यहां भाग्य और पुरुशार्थ एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं।
01:23लेकिन यदि सूर्य पीडित या अत्यधिक प्रभावी हो, तो व्यक्ति अपने विचारों और मान्यताओं को लेकर अत्यधिक द्रिड हो सकता
01:32है।
01:32इसके कारण पिता, गुरु अत्वा छोटे भाई बहनों के साथ वैचारिक मत्भे, या अहमकार जनित तकराव भी देखने को मिल
01:41सकते हैं।
01:43नवंभाव का सूर्य हमें एक गहरा सत्य सिखाता है, कि भाग्य केवल प्रतीक्षा करने वालों का नहीं, बलकि धर्म सम्मत
01:51प्रयास करने वालों का साथ देता है।
01:54जब ज्यान दिशा देता है और पराकरम उस दिशा में कदम बढ़ाता है, तभी जीवन में वास्तविक सम्मान, सफलता और
02:03उद्देश्य की प्राप्ती होती है, क्योंकि सच्चा भाग्य वही प्रकट होता है, जहा धर्म और पुरुशार्थ एक साथ चलने लगते
02:12हैं।
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