00:00वैदिक जोतिश में सूर्य हमारी आत्मा का तेज है। जब यह कुंडली के तृतिय भाव में बैठता है। तो यह
00:09हमारे पराक्रम साहस और इच्छा शक्ती को प्रजवलित कर देता है।
00:14महर्शी पराशर के अनुसार तृतिय भाव उपचय भाव है। जहां सूर्य की उपस्थिती व्यक्ती को अपने भाग्य का निर्माता स्वयं
00:24बनाने की शक्ती देती है।
00:26तृतिय भाव हमारे संकल्प और संचार, कम्यूनिकेशन, काक्षेत्र है। यहां स्थित सूर्य अपनी सात्वी पूर्ण द्रिष्टी सीधे, नवम भाव पर
00:38डालता है।
00:39एक और तृतिय भाव, जो हमारे छोटे प्रयासों, भाई बहनों और कौशल, स्किल्स का है।
00:47और दूसरी और नवम भाव, जो भाग्य, उच्च ज्यान और धर्म का प्रतिनिधित्व करता है। तृतिय भाव का सूर्य व्यक्ति
00:56को एक प्रभाव शाली वक्ता और साहसी व्यक्तित्व प्रदान करता है।
01:01ऐसे लोग अपनी वानी और लेखनी का उप्योग समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाने के लिए करते हैं।
01:12उनके व्यक्तित्व में एक स्वाभाविक नेत्रित्व क्षमता, नैचरल अथोरिटी और निडर्ता दिखाई देती है।
01:20लेकिन सूर्य की द्रिष्टी जब नवम्भाव पर पड़ती है, तो यह केवल भौतिक पुरुशार्थ तक सीमित नहीं रहती।
01:28यह व्यक्ति के कर्मों को धर्म और नैतिक्ता से जोड़ देती है।
01:34पिता का मार्गदर्शन, लंबी यात्राएं और उच्च शिक्षा, इन सभीक शेत्रों में सूर्य की उर्जा एक मार्गदर्शक प्रकाश की तरह
01:43कार्य करने लगती है।
01:45नवम्भाव हमारे विश्वास और उच्च आदर्शों का है।
01:50सूर्य की द्रिष्टी यहां व्यक्ती को संकीर्ण सोच से उपर उठा कर सत्य की खोज, सर्च फॉर ट्रूथ की ओर
01:58प्रेरित करती है।
01:59यह प्लेस्मेंट व्यक्ती को अपने पराक्रम से अपना भाग्य स्वयन लिखने की अध्भुत क्षमता देती है।
02:06यदि सूर्य यहां बल्वान हो, तो व्यक्ती अपने ग्यान और साहस से कुल की प्रतिष्ठा बढ़ाता है।
02:13लेकिन यदि सूर्य पीडित हो, तो भाई बहनों से विवा, अमकार या पिता के साथ वैचारिक मतभेद उत्पन न हो
02:21सकते हैं।
02:22यह प्लेस्मेंट एक महान शास्त्रिय संदेश देती है, कि सच्चा भाग्य केवल हाथ की रेखाओं में नहीं, बल्कि हमारे द्वारा
02:31किये गए पराकरम में छिपा है।
02:35जब त्रितिय भाव का सूर्य नवम भाव को देखता है, तो समझाता है कि कर्म और धर्म अलग नहीं, बल्कि
02:43एक ही सिक्के के दो पहलू है।
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