00:00वैदिक जोतिश में प्रथम भाव केवल आपके शरीर का विवरन नहीं है। यह वह प्रवेश द्वार है जहां से निराकार
00:09आत्मा एक भौतिक रूप धारन करती है। इसे लगन कहा जाता है। वह बिंदु जहां आकाश और प्रित्वी का मिलन
00:19होता है। प्राचीन रिश्य
00:21के अनुसार प्रथम भाव पूरी कुंडली का सार है। यदि अन्य सभी भाव भल देने के लिए तैयार हूं। लेकिन
00:30लगन निर्बल हो तो जातक उन खलों का उपभोग नहीं कर बाता। यह भाव आपके विवेक, आत्मसमा और प्राण शक्ति
00:40का नियंत्रण केंद्र है�
00:42आधुनिक जोतिशिय शोध बताते हैं कि प्रथम भाव आपकी ब्रांडिंग है। दुनिया आपको कैसे देखती है और आप चुनोतियों पर
00:52पहली प्रतिक्रिया कैसे देते हैं। यह आपके अवचेतन, सबकॉंशिस और चेतन, कॉंशिस मन के बीच का पुल है। विद्�
01:10अंदली के जिस भाव में बैठता है। व्यक्ति के जीवन का मुख्य उद्देश्य और उर्जा उसी दिशा में प्रवाहित होने
01:17लगती है। यह आपकी नियती का कमपास, यह भाव आपकी रोग प्रतिरोधक शम्ता, इम्यूनिटी और दीर घायु का भी निर्धारन
01:28करता
01:28है। एक बलिष्ट प्रतम भाव जातक को कठिन से कठिन परिस्थितियों से उबरने की मानसिक और शारिरिक शक्ति प्रदान करता
01:37है। प्रतम भाव को समझना स्वयं को समझने की दिशा में पहला कदम है। यह आपके जीवन का वह बीज
01:46है जिसमें पूरे व्रिक्ष की सं�
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