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Garuda Purana Episode 13 delves deep into Chapter 13, revealing the ultimate ritual of liberation—Vrishotsarga. Discover how setting a sacred bull free on the 11th day after death shatters the chains of Yamaloka and rescues ancestors from the terrifying Preta Yoni. Watch as Lord Vishnu explains the divine metaphysics of this ancient ritual. #GarudaPurana #Vrishotsarga #Ancestors #Yamaloka #HinduMythology #LifeAfterDeath #Moksha #GarudPuranaEp13 #SpiritualScience
Transcript
00:00पिछले प्रवचन से प्रेरित गरुड ने दान की महिमा को आत्म साथ कर लिया था, किन्तु उनके मन में एक
00:06गहरा प्रश्न था जिसने उन्हें विचलित कर दिया।
00:30उन्हें अनंतकाल के लिए बांध चुका हो। इस दारोन द्रिश ने उन्हें व्याकुल कर दिया और वे ततकाल अपने स्वामी
00:38परंपिता भगवान विश्नु के पावन धाम की ओर चल पड़े। वैकुंट के स्वर्निम द्वारों से होते हुए गरुड ने भगवान
00:47विश
00:47को क्शीर सागर में शेशनाग पर विराज मान पाया, उनकी दिव्या आभा से संपूर्ण ब्रहमांड प्रकाशित हो रहा था। अत्यंत
00:56भक्ति और नमरता के साथ उन्होंने अपने स्वामी के चर्णों में साष्टान प्रणाम किया, उनका हृदय भारी और आखों में
01:04कर�
01:07गरुर ने अपनी आवाज में गहरी वेदना के साथ कहा, हे प्रभु, मैंने दान की महिमा और मोक्ष के मार्ग
01:15को समझा, परंतु मेरे मन में एक गहन चिन्ता है।
01:43उन्होंने उन्होंने उन्हात्माओं की पीडा बताई जो दुरघटनाओं में अचानक मारे गए और अपने जीवन के धागे को असामेक रूप
01:51से तूटते देखा।
02:05पास भावनाओं से भर्रा गई है जगत्पते। क्या इन असाय आत्माओं के लिए कोई निश्चित और तीवर मार्ग है जिससे
02:14वे इस भयानक यातना से मुक्त हो सकें।
02:17भगवान विश्णू ने धीर गंभीरता से गरुड की ओर देखा, उनके चहरे पर असीम करुणा का भाव उमर पड़ा।
02:25उनकी शांत दिव्य मुस्कान में अनंत ज्यान और समाधान का आश्वासन नहित था, जो गरुड की व्याकुलता को धीमा कर
02:34रहा था।
02:35भगवान ने अपनी दिव्यवानी में कहा, हे विंतापुत्र, तुम सत्य कहते हो, प्रेत योनी का कष्ट असहनिय है, और उससे
02:44मुक्ती अत्यंत कठिन।
02:46अस्मय मृत्यू के कारण भटकी आत्माएं, अधूरी इच्छाओं से ग्रसित प्रेत, साधारन दान या कर्मकान से सहच्टा से मुक्त नहीं
02:55होते।
02:56गरुर की व्याकुलता फिर से बढ़ गई, और उन्होंने तीवर स्वर में निवेदन किया, किंतु प्रभुक क्या कोई विशेश उपाय
03:04नहीं है, जो उन्हें इस अंधकार से तुरंत बाहर निकाल सके।
03:09उन्होंने यमलोग के कश्टों की भयावाता का स्मरण करते हुए, उन आत्माओं के लिए त्वरित मोक्ष की भिक्षा मांगी।
03:17भगवान विश्नु ने अपनी आखें खोली, उनके मुख पर एक अलौकिक तेज चा गया और उनकी वाणी में ब्रहमांड का
03:25सार गूज उठा।
03:27एक प्राचीन और अत्यंत शक्तिशाली अनुष्ठान है, हे गरुड जो प्रेत योनी से मुक्ती का मार्ग प्रशस्त करता है, भगवान
03:36विश्नु ने रहस्यमेई धंग से कहा, भगवान विश्नु ने अपनी दिव्यमुस्कान बिखेरते हुए कहा, यह अनुष्ठान हे
03:45गरुड विशोतसर के नाम से जाना जाता है, और यह साक्षात प्रेतत्व का अंत करने वाला है, गरुड की स्वर्ण
03:53आभा में उनकी आखें श्रधा और जिग्यासा से चमक उठीन, जैसे वे ब्रहमांड के किसी अंसुने रहस्य को पहली बार
04:01सुन रहे हुँ, भगवान व
04:09पवित्र और श्रिष्ट बैल का उपियोग होता है, जिसे विशेश विधियों द्वारा प्रतिष्ठित किया जाता है। यह बैल केवल एक
04:18पशु नहीं, अपितु स्वय धर्म का प्रतीक है, जो प्रित्वी पर उर्वर्ता, शक्ती और जीवन का प्रतिनिधित्व करता है
04:27इस अनुष्ठान में विध्वान ब्राहमनों द्वारा वेदमंत्रों के साथ उस बैल को पवित्रता और देवत्व का आवर्ण पहनाया जाता है।
04:56फिर उसे स्वतंत्र रूप से विचर्ण करने के लिए छोड़ दिया जाता है, उसका प्रत्येक कदम भूमी पर धर्म और
05:04मोक्ष का बीजारोपन करता है।
05:27ठीक वैसे ही जैसे सूर्य का प्रकाश अंधकार को चीर देता है, व्रिशोट सर्ग की शक्ती प्रेतत्व के गहनतम बंधनों
05:35को विदीन कर देती है।
05:38आत्मा का भारीपन दूर होता है और वह प्रेत योनी के पाश से मुक्त होकर तुरंत उर्ध्व लोकों की ओर
05:45उठने लगती है।
05:47गरुड के मुख पर विस्मय छा गया, क्योंकि उन्होंने इस अनुष्ठान की त्वरित और अचूक शक्ती को समझा।
05:56भगवान विश्णु ने अपनी वानी में और अधिक गामभीर्य लाते हुए कहा, सामान्य मोक्ष मार्ग जहां धीरे-धीरे तय होते
06:04हैं, वहीं व्रिशोत सर्ग एक शनिक और सीधा मार्ग है।
06:09यह उन आत्माओं के लिए अंतिम आशा है, जो कर्मों के घंभोर अंधकार में भटक गई हैं, जिनके लिए अन्य
06:16कोई द्वार नहीं खुलता।
06:19गरुर ने अपने स्वामी के चर्णों में जुक कर पूछा, तो यह अनुष्ठान, हे प्रभुक किसी भी प्रेट आत्मा को
06:26ततकाल मुक्ती प्रदान कर सकता है।
06:30भगवान विश्णू ने करुणामय नेत्रों से देखा और कहा, हाँ, हे गरुर यदि इसे श्रद्धा और पूर्ण विध्यविधान से किया
06:38जाए, तो इसकी शक्ती असीम है।
06:42यह केवल प्रेट को ही नहीं, अपितु अनुष्ठान करने वाले के पित्रों को भी सर्वोच लोकों में स्थान दिलाता है।
06:50इसकी शक्ती इतनी है कि यह संपूर्ण ब्रह्मांडिय संतुलन को पुनर स्थापित करती है, धर्म की विजय सुनिष्चित करती है।
07:00गरूर ने अपने पंक समेटे और भगवान विश्ठु के समक्ष साष्टान प्रणाम किया। उनके मुख से कृतग्यता के शब्द फूट
07:08पड़े।
07:10भगवान विश्ठु ने गरूर की भक्ती और जिग्यासा से प्रसन्न होकर उन्हें करूना भरी द्रिश्टी से देखा और व्रिशोत सर्ग
07:17के गहन रहस्य को खोलना आरंब किया।
07:21भगवान ने कहा, हे गरूर, यह व्रिशब केवल एक पशु नहीं, अपितु स्वय धर्म का साक्षात प्रतीक है, जो प्रिथ्वी
07:29पर अपने चारों चर्नों पर अटल खड़ा है।
07:33उन्होंने समझाया कि एक शक्तिशाली, निरोगी व्रिशब का चुनाव इसलिए किया जाता है, क्योंकि इसकी ओजस्विता, पौरुश और उर्वर्ता संसार
07:43में जीवन और समरधी का आधार है।
07:47इसकी काया का प्रत्येक वर्ण ब्रहमांडिय उर्जा से जुड़ा है, और आदर्श व्रिशब में शुद्ध श्वेत रंग की प्रधानता होनी
07:55चाहिए, जो पवित्रता और दिव्यता का द्योतक है। भगवान विश्णु ने स्पष्ट किया।
08:01उन्होंने व्रिशब के कूबड के महत्व पर प्रकाश डाला, जिसे मेरू परवत के समान ब्रहमांडिय स्थिर्ता और शक्ती का प्रतीक
08:09माना जाता है।
08:12आगे बढ़ते हुए, उन्होंने व्रिशब के सींगों का वर्णन किया, जो तीक्षन, नुकीले और सशक्त होने चाहिए, क्योंकि वे दिव्यशक्ती
08:21और आध्यात्मिक सुरक्षा के प्रतीक हैं।
08:25इसकी आखे निर्मल, शांत और तेजस्वी होनी चाहिए, भगवान ने कहा, वे उस आंतरिक शुद्धता और ज्ञान का दरपण हैं,
08:34जो प्रेत योनी से मुक्ती दिलाता है।
08:37उन्होंने व्रिशब के खुरों की द्रिड़ता और पूर्णता पर जोर दिया, क्योंकि वे प्रिथवी से जुड़े होते हैं और आत्मा
08:45को आध्यात्मिक यात्रा में स्थिरता प्रदान करते हैं।
08:50संपूर्ण व्रिशब उसके रोमरोम में जीवन शक्ती से ओतप्रोत होना चाहिए, क्योंकि उसकी यह उर्जाही प्रेत आत्मा के लिए मोक्ष
08:58का मार्ग प्रशस्त करती हैं। विश्नु ने समझाया।
09:02उन्होंने इन शारिरिक गुनों को ब्रहमांडिय तत्वों और दिव्य सिध्धानतों के साथ जोड़ा। यह दर्शाते हुए की कैसे प्रक्तियक विशेष्टा
09:11सुक्षमस्तर पर आत्मा की यात्रा को प्रभावित करती है।
09:16ऐसा चुना गया विशब हे गरुड प्रेट योनी में फंसी आत्मा के लिए एक शक्तिशाली सेतु बन जाता है जो
09:24उसे संसार के बंधनों से मुक्त कर देता है। भगवान ने रहस्योद घाटन किया।
09:30उन्होंने समझाया कि विशब को स्वतंत्रता प्रदान करना, उसे खुले मैदानों में चरने देना, सीधे तोर पर बंधी हुई आत्मा
09:39को कर्म के पाश से मुक्त करने के समान है।
09:43इसकी मुक्त विचर्ण करती काया, इसके द्वारा ग्रहन किया गया प्रत्येक घास का तिनका, उस दिवंगत आत्मा की उच्छ लोकों
09:51की यात्रा को पोशन देता है। भगवान विश्णों ने अपनी वानी में और गहनता लाते हुए कहा।
09:58उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल पशुदान नहीं है। अपितु आत्मा और ब्रहमांडिय उर्जा के बीच एक पवित्रक प्रतीकात्मक आदान
10:07प्रदान है, जो कर्म के जटिल चक्रों को तोड़ता है।
10:12इस अनुष्ठान की सफलता के लिए दान करने वाले के हृदय में शुद्धता और निस्वार्थ प्रेम का भाव होना अत्यंत
10:20आवश्चक है। यही इसकी वास्तविक शक्ती है। भगवान ने बल दिया।
10:25विश्णु ने कहा, इस व्रिशब के वंश्जों द्वारा प्रिथवी पर किये गए प्रत्येक कर्म, चाहे वह फसल उगाना हो या
10:33दूध देना, दिवंगत आत्मा के लिए सतत पुन्य का स्रिजन करता है।
10:38उन्होंने आगे बताया कि कैसे यह व्रिशब स्वय धर्म का अवतार होकर यमराज के समक्ष एक शक्तिशाली अधिवक्ता के रूप
10:47में खड़ा होता है, आत्मा की मुक्ती के लिए आग रह करता है।
10:53इसकी शक्ती इतनी है, हे गरुर की यह गहनतम कर्म के बंधनों को भी तोर सकती है, यहां तक की
11:00उन आत्माओं को भी मुक्त कर सकती है जो प्रेत योनी में अत्यधिक गहरे धन्स चुकी है।
11:07गरुर ने भगवान विश्नु के प्रत्येक शब्द को अपने हिदय में गहराई से संजोया
11:12उनके मुख मंडल पर एक अलोकिक ज्यान और शांती का भाव जलक रहा था
11:18भगवान विश्नु ने अपनी वानी को विराम देते हुए एक गहरी सांस ली और कहा
11:24यह वरिशोटसर्ग केवल एक अनुष्ठान नहीं अपितु मेरी असीन कृपा का एक प्रत्यक्ष प्रमान है जो प्रत्यक आत्मा को मोक्ष
11:33का मार्ग दिखाता है
11:35भगवान विश्नु ने गरूर को समझाया कि कैसे यह अनुष्ठान मृत्यु के ग्यारहवे दिन किया जाने वाला विरिशोटसर्ग आत्मा को
11:44प्रेत योनी के गहन अंधकार से निकाल कर दिव्य लोकों की ओर अग्रसर करता है
11:50उन्होंने उसक्षन का वर्णन किया जब प्रित्वी और परलोक के बीच एक अद्रिश सेतु का निर्मान होता है जहां दिव्य
11:58उर्जाय मिलकर प्रेत आत्मा को उसके नए गंतव्य तक पहुँचाने में सहायता करती है
12:05इस प्रकार गरूर को एक विस्तरित द्रिश्टी प्रदान की गई जहां उन्होंने स्वयन को उस ज्यारहवे दिन के अनुष्ठान के
12:13केंद्र में पाया जिसकी तैयारी अब तीवर गती से चल रही थी
12:18सबसे पहले पवित्र होंकुंड को शुद्ध मिट्टी और वैदिक मंत्रों से अभिमंत्रित करके तैयार किया गया ताकि वह दिव्य अगनी
12:27का आगार बन सके
12:29फिर शुद्धाम की लकडी और विभिन प्रकार की सुगंधित समिधाय जिन्हें विशिष्ट ग्रहों और देवताओं को समर्पित किया गया था
12:37यज्य में अर्पित करने के लिए एकत्र की गई
12:42जैसे ही मुख्य आचार्य ने अगनी मन्थन करके पवित्र अगनी प्रजवलित की वातावर्ण शुद्धता और दैवी उर्जा से भर उठा
12:50और धुए की पहली कुंडलिया आकाश की ओर उठी
12:55समवेट स्वर में रिशियों ने शक्तिशाली वैदिक मंत्रों का उच्चारण करना प्रारंभ किया जिनकी गुंचपूरे यग्यस्थल में एक गेहन और
13:04पवित्र कमपन उत्पन कर रही थी
13:07प्रत्येक मंत्रों चार के साथ घी और अन्य सुगंधित हविया अगनी में समर्पित की जा रही थी जिससे यग्यकुंड से
13:15उठने वाली दिव्य सुगंध चारों दिशाओं में फैल गई
13:20जैसे जैसे मंत्रों की शक्ती बढ़ती गई और हविया अगनी में समाहित होती गई, यज्यस्थल में एक अग्रिश्य परंतु तीवर
13:28आध्यात्मिक उर्जा का संचार होने लगा
13:32यह उर्जा प्रिथवी के धरातल से उठकर आकाश की और बढ़ती जा रही थी, मानो वहम्रित आत्मा के लिए स्वर्ग
13:39की और एक मार प्रशस्त कर रही हो
13:43इसी समय वेदों के गूर ज्यान के आधार पर पुरोहितों ने ग्रहों और नक्षत्रों की विशेश स्थिती का आहवान किया,
13:51जो उस आत्मा की यात्रा के लिए शुभ थी
13:53कुछ अनुभवी जोतिशी अपने प्राचीन पंचांगों और हस्तलिखित तालपत्रों का अध्ययन करते हुए सटीक ग्रहनक्षत्रों के सन्योग को सुनिश्चित कर
14:04रहे थे
14:05इसके बाद विशेश रूप से तयार किये गए मंत्रों का जाब किया गया, जो ब्रहमांडिय उर्जाओं को बुलाते हुए, आत्मा
14:14को उसके सुक्ष्म शरीर से मुक्ती दिलाने में सहायक होते हैं
14:19मृत व्यक्ती के परिजन, भय और आशा के मिश्रन से भरे हुए, इस पवित्र अनुष्ठान को अत्यंत श्रद्धा और मौन
14:27भक्ती के साथ देख रहे थे
14:29फिर व्रिशोत सर्ग के लिए एक विशेश रूप से चैनित, बलशाली और शुद्ध सफेद व्रिशब को अनुष्ठान स्थल पर लाया
14:38गया, जिसके आगमन से एक अलौकिक शान्ती चागई
14:42इस व्रिशब को जो धर्म का प्रतीक था, पवित्र गंगाजल से सनान कराया गया और उसे पुष्पों, चंदन और कुमकुम
14:50से सजाया गया
14:53व्रिशब के चारों और विशिष्ट मंत्रों का जाब किया गया, जो उसे प्रेत योनी में फंसी आत्मा के लिए एक
15:00वाहन के रूप में तयार कर रहे थे
15:03इसके बाद उसे भोजन और जल अर्पित किया गया, और एक विशेश अनुष्थान के माध्यम से उसे मृत आत्मा के
15:11मोक्ष का वाहक घोशित किया गया
15:14यह वहक्षन था जब प्रित्वी पर किये गए कर्म और पर लोग के नियम एक साथ आकर उस आत्मा को
15:21यमराज के दंड से मुक्ती दिलाते हुए आगे बढ़ाते हैं
15:25भगवान विश्णू ने मुस्कुराते हुए कहा इस प्रकार हे गरुड यह व्रिशोत सर्ग न केवल आत्मा को मुक्त करता है
15:34बलकि जीवितों को भी अपने पूर्वजों के प्रती कर्तव्य की पूर्ती का संतोष प्रदान करता है
15:41भगवान विश्णू ने गरुड की उच्सुक्ता भाम्पते हुए अपने दिव्य हस्त के एक शांत संकेच से आगे की प्रक्रिया का
15:49आहवान किया
15:50मानो ब्रहमांड की सभी शक्तियां उनके एक इशारे पर संरेखित हो जाती हो
15:56एक विशाल शुद्ध श्वेत विशब को धीरे से पवित्र वेदी के पास लाया गया
16:01उसकी प्रत्येक चाल में एक शांत गरिमा और आगामी परिवर्तन की अलोकिक चेतना नहित थी
16:09गरूर को समझाते हुए भगवान विश्णु ने कहा कि यह विशब अब केवल एक पशु नहीं
16:15बलकि ब्रहमांडी उर्जाओं को समाहित करने वाला एक जीवित पात्र बनने वाला है जो देवत्व का प्रतिरूप होगा
16:23एक अनुभवी आचार्य ने मंत्रो चार के बीच अगनिकुंड से एक विशेश लोहे के यंत्र को उठाया जो अब तक
16:32की सबसे महत्वपूर्ण क्रिया के लिए तैयार था
16:36पहले इस व्रिशब के एक पार्श्व पर हम त्रिशूल भगवान शिव का प्रतीक अनकित करेंगे भगवान विश्नु ने स्पष्ट किया
16:44यह स्रिजन्क संरक्षन और विनाश की त्रिमूर्ती शक्ती का द्योतक है
16:50जैसे ही आचार्य ने सावधानी से गरम त्रिशूल के यंत्र को व्रिशब के दाहिने पार्श्व पर लगाया एक क्षण के
16:58लिए बायुमंडल में एक रहस्यमय कमपन गुंजा
17:02त्रिशूल के अंकित होते ही व्रिशब के शरीर से एक नीली श्वेत उर्जा का प्रभामंडल फूट पड़ा, मानोस्वय भगवान शिव
17:10की शक्ती उसमें समाहित हो रही हो
17:14व्रिशब ने एक गहरी, शान्त सास ली, उसके पूरे शरीर में दिव्य उर्जा का संचार हुआ, जो उसे एक अद्रिश्य
17:22कवच प्रदान कर रहा था
17:25तत्पष्चात हे गरूर, हम इसके दूसरे पार्श्व पर चक्र, मेरे अपने दिव्य आयुध का चिना अंकित करेंगे, भगवान विश्नों ने
17:33समझाया, यह धर्म और न्याय का प्रतीक है, जो दुष्टों का सहार करता है और भक्तों की रक्षा करता है
17:42आचार्य ने अब चक्र के आकार वाले गरम यंत्र को व्रिशब के बाय पार्श्व पर कुशलता से रखा, जिससे एक
17:49और पवित्र प्रतिध्वनी अनुष्ठान स्थल पर फैल गई
17:53चक्र के अनकित होते ही व्रिशब से एक सुनहरी तेजो में उर्जा का स्फुरण हुआ, जैसे स्वय भगवान विश्णू की
18:01सनरक्षक शक्ती उसमें प्रवाहित हो गई हो
18:04अब दोनों दैविय प्रतीक, त्रिशूल और चक्र व्रिशब के दोनों पार्शवों पर चमक रहे थे, जो उसे ब्रहमान्डिय शक्तियों का
18:13एक जीता जागता वाहक बना रहे थे
18:16गरुड इस अलौकिक द्रिशकों विस्मय भरी द्रिश्टी से निहार रहे थे, उनके हृदय में व्रिशोत सर्ग के इस गहन रहस्य
18:24की समझ धीरे-धीरे जागरित हो रही थी
18:28भगवान विश्णू ने गरूर से कहा, ये दिव्य चिन्ह मात्र प्रतीक नहीं है, बलकि ये साक्षात शिव और मेरी शक्ती
18:35के संरक्षक आवर्ण हैं, जो इस व्रिशब को अजे बना देते हैं
18:41उन्होंने आगे बताया, ये चिन्ह ब्रह्मांडिय उर्जा के ऐसे कवच बनाते हैं, जो व्रिशब के चारों और एक अभेद्य सुरक्षा
18:50शेत्र का निर्मान करते हैं, किसी भी नकारात्मक शक्ती को पास फटकने नहीं देते
18:56उन्होंने स्पष्ट किया कि इस उर्जा की प्रचंडता यमदूतों के लिए असहनिय होती है, जो पवित्रता की इस आभा को
19:04भेदने का साहस नहीं कर सकते
19:08जैसे ही वे इस व्रिशब को देखते हैं, इन चेहनों से निकलने वाली तीवर उर्जा उन्हें भयभीट कर देती हैं,
19:15और वे उस आत्मा के निकट आने से भी कतराते हैं, जिसकी मुक्ती का यह वाहक बन जाता है
19:22अब व्रिशब केवल एक पशु नहीं था, बलकि वह मोक्ष का एक जीता जागता द्वार बन चुका था, जिसकी प्रत्येक
19:30चाल में दिव्य सनरक्षण की ध्वनी गूंज रही थी
19:34गरुर ने विनम्रता पूर्वक पूछा, हे प्रभु, यह उर्जा इतनी शक्तिशाली कैसे हो जाती है, कि वह यम्दूतों के सर्वशक्तिमान
19:43भय को भी परास्त कर देती है
19:46भगवान विश्णू ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, ये चिन देवताओं के सीधे हस्तक्षेट का प्रमान हैं, जहां ब्रहमांडिय नियम स्वया
19:55आत्मा के लिए मार्ग प्रशस्त करते हैं, किसी भी बाधा से परे
20:00भगवान विश्णू के वचन समाप्थ होते ही, उस पवित्र व्रिशब ने जैसे ही प्रित्वी पर अपना पहला कदम आगे बढ़ाया,
20:08वैसे ही उसके खुरों से एक स्वर्णिन प्रकाश की तीवर लहर फूट पड़ी
20:13वह पावन उर्जा देखते ही देखते भूमी के भीतर समाने लगी, जिससे मृत पूर्वजों के उध्धार का एक अद्रिश्य और
20:22चमकीला मार्ग स्वतह ही निर्मित हो गया
20:25प्रित्वी की गहरायों को चीरती हुई यह दिव्यतरंग सीधे यमलोक की उस भयावह सीमा में प्रवेश कर गई, जहां सामान्य
20:34परिस्थितियों में सूर्य की एक किरण भी नहीं पहुँच सकती
20:38वहां की अंथीन अंधकारमई खायों में, जहां केवल विलाप और यातनाओ का स्वर गूंजता था, अचानक एक अभूतपूर्व प्रकाश की
20:47किरण चमक उठी
20:50यमराज के करूर दूत, जो अब तक जीवात्माओं को दंड देने में व्यस्थ थे, इस असीम और पवित्र प्रकाश को
20:57देखकर भै से पीछे हटने लगे
21:00उसी अंधकार्मय कारागार के एक कोने में, वह पीडित पूर्वज की जीवात्मा भारी लोहे की जंजीरों में जकडी हुई अत्यंत
21:08दैनिय अवस्था में पड़ी थी
21:11जैसे ही व्रिशोत सर्ग की वह दिव्य उर्जा उस कोठरी तक पहुँची, उस पवित्र प्रकाश ने पीडित आत्मा को अपने
21:19घेरे में ले लिया
21:21उस दिव्य प्रकाश के स्पर्ष मात्र से यमलोक के उस भयानक कारागार की दीवारें और लोहे के सिंख्चे थर-थर
21:28कामपने लगे
21:30आत्मा को जकडने वाली वे भारी और अभिमंतरित यम जंजीरें जो सदियों के पापों के भार से बनी थी, उस
21:38पवित्र उर्जा के ताप से पिघलने लगी
21:41शन भर में एक प्रचंड गर्जना के साथ वे सारी जंजीरें तूटकर बिखर गई और यमदूतों के अत्याचार का वह
21:49काला सामराज्य वहीं ध्वस्त हो गया
21:53अपने बंधनों से मुक्थ होते ही उस पूर्वज की आत्मा का मलिन और पीडित स्वरूप धीरे-धीरे एक दिव्यक चमकते
22:00हुए देवपुत्र में बदलने लगा
22:03यमलोग के करूर प्रहरी इस दृष्य को देखकर थर-थर कामपने लगे क्योंकि वे जानते थे कि अब इस पवित्र
22:11आत्मा पर उनका कोई अधिकार नहीं रह गया था
22:15यमलोग के अधिपती धर्मराज यमराज ने अपने भव्य और न्यायपूर्ण दर्बार से इस अप्रत्याशित उर्जा के प्रवाह को महसूस किया
22:25उन्होंने अपनी दिव्य द्रिष्टी से देखा कि कैसे प्रित्वी पर किया गया एक पवित्र अनुष्ठान यमलोग के अटल नियमों को
22:33भी बदलने की शक्ती रखता है
22:36स्रिष्टी के नियमों और नारायन की इच्छा का आदर करते हुए यमराज ने अपने सिनहासन से उठकर उस मुक्ट आत्मा
22:44की दिशा में श्रधा पूर्वक प्रणाम किया
22:47अब वह मुक्ट आत्मा यमलोग के उस अंधकार्मय मार्ग को छोड़ कर उपर की ओर एक प्रकाशमान दिव्यपत पर अग्रसर
22:55होने लगी
22:57दिव्य विमानों से आये देवगणों ने उस मुक्ट आत्मा का स्वागत करने के लिए पुषपवर्शा शुरू कर दी जिससे पूरा
23:05वातावर्ण सुगंधित हो उठा
23:08यह सब देख रहे पक्षी राज गरूर का हृदय अत्यन्थ हर्ष और कौतुहल से भर गया और उन्होंने भगवान विश्नु
23:15की ओर विस्मय से देखा
23:18भगवान विश्नु ने मुस्कुराते हुए कहा के गरूर यही व्रिशोत सर्ग की महिमा है जो नरक के द्वारों को बंद
23:26कर मोक्ष के द्वार खोल देती है
23:29इस प्रकार प्रित्वी पर श्रद्धा पूर्वक किया गया यह एक महाकर्म यमराज के कठोर्तम बंधनों को भी शिथिल कर जीवात्मा
23:37को सदा के लिए मुक्त कर देता है
23:41इसके पश्चात भगवान विश्णों के मुखमंदल की मंद मुस्कान लुप्त हो गई और उनके नयन अत्यंत गंभीर और करुनामई हो
23:50गए
23:50जैसे वे स्रिष्टी के सबसे अंधकार्मय रहस्य को प्रकट करने जा रही हूँ
23:56भगवान नारायन ने कहा
23:58हे गरुड यदि प्रिथवी पर लोगी अथवा अज्यानी वन्षज अपने पूर्वजों के निमित इस परम पावन विशोत सर्ग महायज्य को
24:06नहीं करते हैं तो उस मृत आत्मा का मार्ग अत्यंत भयानक हो जाता है
24:12वह अभागा जीवात्मा उच्च लोकों की ओर बढ़ने के बजाएं अत्रिप्त वासनाओं और अपने ही कुल की उपेक्षा के अद्रिश्य
24:20पाशों में बंध कर वापस प्रिथवी की ओर खींच लिया जाता है
24:26व्रिशोत सर्ग के अभाव में वह मृत आत्मा एक अत्यंत भयावः और दुर्बल प्रेत का रूप धारन कर लेती है
24:33जो अनंत काल तक भूख और प्यास से तडपते हुए भटकने के लिए अभिशप्थ हो जाता है
24:40उस प्रेत योनी का कष्ट इतना भीशण है कि उस जीवात्मा का कंट सुई की नोक के बराबर संकुचित हो
24:47जाता है जिससे वह भोजन का एक ग्रास भी निगलने में असमर्थ हो जाता है
24:53जब भी वह तीवरक्षुधा से व्याकुल होकर प्रित्वी पर पड़े किसी अन्न के दाने को छूने का प्रयास करता है
25:01तो वह भोजन ततक्षन धधकते हुए अंगारों और राख में परिवर्तित हो जाता है
25:07उसकी जहवा प्यास के मारे मरुस्थल की भांती सूख जाती है परंतु जब वह शीतल जल के सुरोतों की ओर
25:14दोड़ता है तो वह जल उसके स्पर्ष मात्र से रक्त, मवाद और उबलते विश में बदल जाता है
25:22वह प्रेट पागलपन की स्थिती में जलती हुई रेत और कांटों से भरे जंगलों में भटकता रहता है जहां अद्रिश्य
25:30सूर्य की तीखी किरने उसके सुक्षम शरीर को निरंतर जुलसाती है
25:35घोर हताशा में डूबा हुआ वह जीव अंत्ता अपने पूर्व ग्रेह की ओर लोटता है और अद्रिश्य होकर अपने ही
25:43परिवार के सदस्यों को आनंद पूर्वक भोजन करते और उत्सव मनाते देखता है
25:50वह अपने प्रिजनों को पुकारने की चेश्टा करता है किन्तु उसके कंट से केवल एक मूख और अश्रव्य चीख निकलती
25:58है जो हवा के एक ठंडे जोके के रूप में परिजनों को केवल सहरन दे पाती है
26:05अपने वन्षजों को सांसारिक विलासिता पर धन लुटाते और अपने अंतिन संसकार की उपेक्षा करते देख उस जीव की असीन
26:14वेदना धीरे-धीरे एक भयानक क्रोध और कड़वाहट में बदल जाती है
26:19इस प्रकार उपेक्षित पूर्वज के मन में उत्पन्न होने वाला यह गहरा विक्षोग उस स्थान पर नकारात्मक शक्तियों और पिशाचों
26:28को आकर्शित करता है जो उस असहार प्रेत को चिढ़ाते हैं
26:33भगवान विश्णू ने बताया कि अमावस्या की अंधकार्मई रात्रियों में ये परित्यक्त आत्माएं अपने ही घरों की छतों पर बैठ
26:42कर अश्रु बहाती हैं और अपने निर्देई वन्षजों को शाप देती हैं
26:48पूर्वजों के इस मूख शाप के कारण उस परिवार में पित्री दोश का उदे होता है जिससे वन्षजों के घर
26:55में असाध्य रोग, अकाल, मृत्यू और निरंतर कलह का सामराज्य स्थापित हो जाता है
27:01उस अभागे प्रेट को रहने के लिए श्मशान घाटों, सूखे व्रिक्षों के खोखलों और दुरगंध युक्ट कचरों के धेरों जैसे
27:09अपवित्र स्थानों पर शरन लेने के लिए विवश होना पड़ता है
27:14यह सब सुनकर पक्षी राज गरूर के नेत्र अत्यंत कारूनिक अश्रूओं से भर गए और उनका हृदय उन असहाय भटके
27:22हुए जीवों के प्रती गहरी सहानु भूती से व्याकुल हो उठा
27:27भगवान विश्नु ने पुनह समझाते हुए कहा के गरूर्ट बिना व्रिशोद सर्ग के उस जीवात्मा को वैतर्णी नदी को पार
27:34करने के लिए कोई दिव्यमाध्यम प्राप्त नहीं होता
27:38वह अभागा जीव वैतर्णी के दहकते हुए खौलते जल और रक्त की लहरों के तट पर खड़ा होकर देखता है
27:46कि कैसे व्रिशोद सर्ग प्राप्त आक्माई दिव्य व्रिशब पर सवार होकर सुगमता से पार चली जाती है
27:54जबकि वह स्वयन उस उबलती हुई खौफनाक नदी के किनारे असहाय छोड़ दिया जाता है जहां यमराज के भयनकर दूट
28:02यमदूट उसे कोडों से मार कर जल में धकेलने के लिए तैयार खड़े रहते हैं
28:08इस प्रकार भगवान विश्णू ने इस अत्यंत भयानक रहस्य को समाप्थ करते हुए कहा कि प्रत्येक मनुष्य का यह परम
28:16कर्तव्य है कि वह अपने पित्रों को इस नरक से बचाने के लिए व्रिशोत सर्ग का संपादन अवश्य करे
28:23तब भगवान विश्णू ने गरूर से कहा कि गरूर व्रिशोत सर्ग का रहस्य मात्र एक आत्मा के लिए नहीं है
28:30बलकि इसका प्रभाव ब्रहमांड के अग्रिश्य धागों में गहराई से बुना हुआ है
28:37उन्होंने आगे समझाया यह दिव्यकर्म न केवल ततकाल मृत आत्मा को मुक्ती दिलाता है बलकि तीन पीधियों के पूर्वजों को
28:45प्रेत योनी के कश्टों से निकाल कर सीधा पित्रिलोक में पहुँचा देता है
28:51गरूर के नयनों में विस्मय भर गया जब उन्होंने उस अध्भुत शक्ती का श्रवन किया जो एक ही कर्म से
28:58अनंतकाल के बंधनों को तोड़ सकती थी
29:01उसी क्षण भगवान विश्नु ने अपने दिव्य द्रिष्टी से गरूर को प्रेत लोक के उन भयावध द्रिश्यों को दिखाया जहां
29:09अभागी आत्माएं अपने कर्मों के दंड भोग रही थी
29:13वहां एक व्रिध्धा आत्मा जिसकी आखें सूजी हुई थी और शरीर क्षीन वैतर्नी नदी के विशैले जल में गिरकर अनवरत
29:22कराह रही थी
29:24एक युवा आत्मा जिसके हाथ पेर जंजीरों से बंधे थे यमदूतों के कोडों की मार से लहुलुहान होकर चीख रही
29:32थी उसकी आशाएं धूमिल हो चुकी थी
29:36एक बालक की आत्मा भूख से बिल्खती हुई प्रिच्छिला पर लेटी थी जहां उसे कभी भोजन या जल नसीब नहीं
29:44होता था
29:45इन द्रिश्यों को देखकर गरूर का हृदय करुणा से भर गया उन्होंने भगवान विश्णू से पूछा कि क्या इन आत्माओं
29:53के लिए कोई आशा है
29:56भगवान मुस्कुराये और कहा हा गरूर आशा है और वह आशा उस व्रिशोत सर्ग में है जिसका संपादन प्रिथवी पर
30:05किया जाता है
30:07ठीक उसीक्षन प्रिथवी पर एक पवित्र ब्राहमन श्रद्धा और भक्ती से परिपूर्ण होकर विशोत सर्ग का अनुष्ठान कर रहा था
30:17व्रिशब को फूलों से सजाया गया था और वैदिक मंत्रों की पवित्र ध्वनी वातावर्ण में गूंज रही थी शुद्धिकरण का
30:24आवाहन करती हुई
30:27जैसे ही अनुष्ठान अपनी पराकाश्था पर पहुँचा एक स्वर्णिम उर्जा प्रित्वी से उठकर स्वर्ग की ओर बढ़ने लगी
30:35यह उर्जा एक अद्रिश्य सेतु की भाती प्रेत लोक की ओर बढ़ी उन पीडित आत्माओं को स्पर्ष करने के लिए
30:43जो मुक्ती की प्रतीक्षा कर रही थी
30:46अचानक वैतरने के दहकते जल शान्थ होने लगे और यम्दूतों के कोडे थम गए जैसे किसी अज्यात शक्ती ने उन्हें
30:54रोक दिया हो
30:56उस स्वर्णिम आभा के स्पर्ष से व्रिधा आत्मा के शरीर से जंजीरें तूट गई और उसके मुख पर शान्ती का
31:04भाव उभर आया
31:06युवा आत्मा के जख्म भरने लगे और बालक की आत्मा को पहली बार भोजन का अनुभव हुआ जो अम्रित के
31:13समान था
31:15तीन पीधियों की आत्माएं जो युगों से कष्ट सह रही थी अब उस स्वर्णिम पत पर चलने लगी जो उन्हें
31:22पित्रिलोग की ओर ले जा रहा था
31:26पित्रिलोग के द्वार खुले और उन्मुक्त आत्माओं का स्वागत दिव्यरिशियों और पित्रों ने पुष्प वर्षा और मधुर संगीत के साथ
31:34किया
31:35गरुर ने देखा कि कैसे एक छोटे से कर्म ने अनंत काल के लिए शांती और मुक्ती प्रदान की थी
31:42और उनके हृदय में श्रधा और भी गहरी हो गई
31:46भगवान विश्णु ने अन्त में कहा यही व्रिशोत सर्ग का गुप्त रहस्य है जो न केवल मृत्यू के बाद की
31:53यात्रा को सुगम बनाता है बलकि पीधियों को तारने का महास्त्र है
31:59भगवान विश्णु ने अपनी गंभीर द्रिश्टी गरूर पर टिकाते हुए कहा हे गरूर यह व्रिशोत सर्ग केवल एक कर्मकांड नहीं
32:07अपितु आत्मा और पर्माक्मा के बीच का पवित्र सेतु है
32:13उन्होंने आगे समझाया यदि इसे मात्र एक लेंदेन या मुक्ती पाने का त्वरित मार्ग समझा गया तो इसका समस्त प्रभाव
32:21क्षण भर में क्षीन हो जाएगा
32:24भगवान ने चेतावनी दी किसी भी प्रकार का कपट, कंजूसी या नीचनियता इस पावन अनुष्ठान की शक्ती को पूरी तरह
32:33से निश्प्रभावी कर देता है
32:36उन्होंने समझाया, जब हरिदय शुद्ध नहीं होता, तो दान केवल एक दिखावा बनकर रह जाता है, और उसका कोई आध्यात्मिक
32:44मूल्य नहीं होता
32:47भगवान ने कहा, जिस प्रकार एक खाली पात्र कभी प्यास नहीं बुझा सकता, उसी प्रकार लालच और स्वार्थ से किया
32:55गया व्रिशोत्सर्ग आत्मा को मुक्ती नहीं दिला सकता
32:59उन्होंने स्पष्ट किया, यदि दान देने वाला अपने धन को छिपाता है या कम दिखाता है, तो वह केवल स्वयन
33:07को और इश्वर को धोखा देता है
33:10भगवान ने चेताया, यह कर्मकांड तब एक विडमबना बन जाता है, जहां मुक्ती का द्वार खोलने के बजाएं यहां आत्मा
33:18को और गहरे बंधनों में जकड लेता है
33:22गरुर ने देखा कि कैसे भगवान के शब्दों में सत्य की प्रचंड उर्जा थी, जो हर कन को भेद रही
33:29थी
33:31भगवान ने समझाया, विशोत सर्क का मूल सार्तियाग और श्रद्धा में नहित है, न की भौतिक लाभ या सामाजिक प्रतिष्ठा
33:39में
33:40उन्होंने कहा, वह व्यक्ति जो केवल दिखावे के लिए दान करता है, वह न तो स्वयन को संतुष्ट कर पाता
33:47है और नहीं पित्रों को त्रिप्त
33:51भगवान ने एक गहरी सांस ली और बोले, सच्ची दानशील्टा का प्रकाश भीतर से आता है, जो समस्त अंधकार को
33:59मिटा देता है
34:01उन्होंने एक विदारक सक्त्य को उजागर किया, जो लोग अपने स्वार्थ के लिए धर्म का ढों करते हैं, वे अंत्त
34:09स्वयन को ही धोखा देते हैं
34:12गरुड ने कलपना की एक भव्य यग्य मंडप जहां सभी कर्मकांड प्रुटिहीं थे, पर यजमान का हृदय अंधकार में
34:21परिणाम स्वरूप वह पवित्र अगनी, जो मुक्ती का मार्ग प्रशस्त करती, मात्र धुआ बनकर रह जाती, जिसमें कोई ज्वाला न
34:29थी
34:41अद्रिश्य रूप से कई पीढियों को तारता है, गरुड के हृदय में यह बात घर कर गई की केवल बाह्य
34:49क्रियाय नहीं, अपितु अंतरात्मा की भावना ही सर्वोप्री है
34:54भगवान विश्णु ने अपनी वानी में और बल भरते हुए कहा, इस दान का विधान आत्मा का दर्पन है, जो
35:01तुम्हारे वास्तविक स्वरूप को दर्शाता है
35:06उन्होंने अंतिम रूप से चेताया, जो कोई भी दैविय नियमों को धोखा देने का प्रयास करता है, वह स्वयं को
35:13ही अनंतकाल तक के लिए बंधनों में जकड लेता है
35:18भगवान विष्णु ने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा, इसलिए हे गरूर मुक्ती का मार्ग केवल सच्ची श्रद्धा और निर्मल
35:26हृदय से ही प्रशस्थ होता है
35:29भगवान विष्णु के इन परम वचनों को सुनकर गरूर का हृदय अगाद श्रद्धा से भर गया और उन्होंने अपने विशाल
35:37पंखों को समेट कर प्रभू के चर्णों में अत्यंत आदर पूर्वक अपना मस्तक जुका दिया
35:43स्रिष्टी के पालनहार भगवान विश्णु ने अपने परम भक्त को सांत्वना देते हुए अपना वर्देहस्त उठाया जिससे शांत और शीतल
35:52प्रकाश की किरने फूट कर गरूर के संपूर अस्तित्व को आलोकित करने लगी
35:58परमात्मा ने गंभीर और मधुर स्वर में कहा हे पक्षी राज अब मैं तुम्हें उस अत्यंत गुप्त और दुर्गम मार्ग
36:05का रहस्य बताता हूँ जिस पर चलकर जीवात्मा यमराज की भयानक नगरी की ओर प्रस्थान करती है
36:13गरुर ने अपने दोनों हाथ जोड कर और सिर जुका कर एका ग्रचित्त होकर उस विस्मयकारी द्रिश की कलपना की
36:21जो प्रभु के मुखारविन से प्रकट होने वाले ब्रहमांडिय मार्गों को दर्शा रहा था
36:27भगवान विश्णू ने वर्णन करना आरंभ किया कि कैसे पापी आत्माएं प्रिथवी से प्रस्थान करने के बाद एक अत्यंत तप्त
36:35और भयंकर मरुस्थल से होकर गुजरती हैं जहां की रेट दहकते अंगारों के समान जलती है
36:43उन्होंने आगे बताया कि इस भयानक मार्ग के मध्य में अत्यंत दरावनी वैतर्णी नदी बहती है जो रक्त, पीप और
36:51अस्थियों से भरी हुई है और जिसके भीतर भयानक जलजीव पापी आत्माओं को नोचने के लिए आतुर रहते हैं
37:00प्रभू ने स्पष्ट किया कि जो मनुष्य अपने जीवनकाल में या जिसके निमित परिजन मृत्यू के पश्चात व्रिशोत सर्ग जैसा
37:08महान अनुष्ठान करते हैं उन्हें इस वैतर्णी को पार करने के लिए एक दिव्य नौका प्राप्त होती है
37:15यह सुनकर विस्मित गरोड ने उच्सुकता पूर्वक पूछा है जगत गुरू यह व्रिशोत सर्ग क्या है और किस प्रकार यह
37:23पवित्र कर्म यम्राज के क्रोध को भी शांत करने की शक्ती रखता है
37:29परमेश्वर विश्नु ने मुस्कुराते हुए रहस्योत गाटन किया कि व्रिशोत सर्ग का अर्थ है धर्म के प्रतीक एक हश्ट पुष्ट
37:37नील बैल का वैदिक मंत्रोच चार के बीच अत्यंत आदर पूर्वक दान और विसर्जन करना
37:43प्रित्वी लोग पर होने वाले इस भव्य अनुष्ठान में विद्वान ब्राह्मन वेदियों के समक्ष बैठ कर पवित्र अगनी में आहुती
37:51देते हैं और उस दिव्य बैल का पूजन कर उसे स्वतंत्र छोड़ देते हैं
37:57भगवान विश्णु ने कहा हे गरुड वह स्वतंत्र किया गया बैल प्रित्वी पर जितने कदम चलता है उतने ही वर्षों
38:05तक पित्रों को यमलोक के कश्टों से मुक्ती मिलकर स्वर्ग में स्थान प्राप्थ होता है
38:11इस अध्भुत और अलौकिक रहस्य को सुनकर गरुड का मन अत्यंत पुलकित हो उठा और उन्होंने स्रिष्टी के नियमों की
38:19इस सुन्दर और न्यायपूर्ण व्यवस्था की मन ही मन प्रशन सा की
38:23इसके पश्चात भगवान विश्णु ने अपने हाथ के संकेट से यमराज की उस विशाल और अभेद्य नगरी यमपूरी का दर्शन
38:32कराया जिसके द्वार अत्यंत विशाल और भयानक पत्थरों से निर्मित थे
38:38यम्पुरी के चारों दिशाओं में चार विशाल द्वार हैं, जिन में से प्रत्येक द्वार पर यम्राज के अत्यंत भयानक और
38:45निश्पक्ष पहरेदार कठोर्ता से पहरा देते हैं
38:50प्रभु ने दक्षिन द्वार की ओर संकेत करते हुए कहा कि यह द्वार केवल महापापियों के लिए है, जहां से
38:57प्रवेश करते ही आत्माओं को भयंकर अंधकार, आंधियों और चीतकारों का सामना करना पड़ता है
39:04इसके विपरीत, उत्तर दिशा का द्वार अत्यंत सुन्दर, स्वर्णिम और दैविय प्रकाश से जग्मगाता है, जहां से केवल धर्मात्मा और
39:13पुन्यात्मा लोग ही प्रवेश करते हैं
39:17यमपुरी के मुख्य राजदर्बार में न्याय के देवता यमराज अपने विशाल और चम्चमाते हुए स्वर्ण सिनहासन पर विराजमान है, जिनका
39:26स्वरूप अत्यंत भव्य, गंभीर और भयानक है
39:31उनके ठीक बगल में उनके परम सहायक चित्रगुप्त बैठे हैं, जो अत्यंत ध्यानपूर्वक अपने दिव्य ग्रंथ अग्रसंधानी में प्रत्येक प्राणी
39:40के भले और बुरे कर्मों का लेखा-जोखा दर्स करते हैं
39:45भगवान विश्णु ने स्पष्ट किया कि चित्रगुप की पैनी द्रिष्टी से संसार का कोई भी कर्म छिपा नहीं रहता, परंतु
39:53व्रिशोटसर करने वाले व्यक्ति के लिए यम्राज का यह कठोर दर्बार भी अत्यंत दयालू हो जाता है
40:00इस प्रकार आत्मा की इस अध्भुत यात्रा और व्रिशोटसर के महात्मे को सुनकर गरुड ने भगवान विश्णु को बारंबार नमन
40:09किया और यम्राज के उस अध्भुत न्याविधान को पूरी तरह से हृध्यंगम कर लिया

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