श्रीमद्भागवत पुराण के 12वें स्कंध के अनुसार कलयुग के अंत और भगवान कल्कि के अवतार की सबसे भयानक और रहस्यमयी भविष्यवाणियां! जानिए कैसे राजा परीक्षित को शुकदेव जी ने बताया कि कलयुग में धर्म, सत्य और पवित्रता का नाश कैसे होगा, और कैसे शम्भल ग्राम में विष्णुयश के घर अवतरित होकर भगवान कल्कि कलयुग का अंत करेंगे। Watch the cinematic representation of Bhagavata Purana Canto 12. #Kaliyuga #KalkiAvatar #BhagavataPurana #Shrikrishna #Mahabharat #HinduMythology
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00:00पांडवों के हिमालय प्रस्थान के पश्चात महाराजा परीक्षित ने हस्तिनापूर के सिनहासन पर आरूढ होकर न्यायपूर्ण शासन का सूत्रपात किया,
00:09जिसकी चमक संपूर्ण प्रित्वी पर व्याप्ट थी.
00:13किन्तु इस शान्ती और धर्म के आवर्ण के नीचे एक अद्रिश्य घुटन भरा दबाव धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था,
00:21जो कलियुक के अशुब आगमन की मौन घोशना कर रहा था.
00:26राजधानी में छिट-पुट रूप से कुछ अनैतिक कृत्य और छोटे-मोटे अपराधों की खबरे आने लगी, जो पहले कभी
00:33इस पवित्र भूमी पर नहीं देखे गए थे.
00:37महाराजा परीक्षित अपनी पैनी द्रिष्टी से इन सूक्षम परिवर्तनों को भामपते हुए, अपने कुलगुरु और बुद्धिमान मंत्रियों के साथ गेहन
00:46विचारविमर्ष में लीन हो गए.
00:49उन्होंने अपने सामराज्य के दूरस्थ कोनों तक धर्म और न्याय के सिध्धानतों को द्रिड़ता से स्थापित करने का संकल्प लिया,
00:56मानोवि स्वयन कलियुक की बढ़ती लहरों के सामने एक अटूट चट्टान हो.
01:02इसी बीच कलियुक का दूट, एक धूमिल और अद्रिश्य शक्ती के रूप में जन्मानस में लोब, ग्वेश और अधर्म के
01:10बीज बोने लगा.
01:12धर्म के मार्ग से भटक कर, लोग अब छोटे-छोटे स्वार्थों और तात कालिक लाभों के लिए नैतिक्ता का त्याग
01:19करने लगे, जिससे समाज की नीम धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जा रही थी.
01:25एक दिन महाराज परीक्षित आखेट पर निकले थे, जब उन्होंने एक दूरस्थ गाव में एक बलवान व्यक्ती को एक निर्बल
01:33ग्राम वासी पर अन्याय करते देखा.
01:37परीक्षित ने तुरंथ हस्तक शेप किया, अन्याय को दंडित किया और पीडित को न्याय दिलाया, किन्तु उनके मन में एक
01:45गहरी चिंता घर कर गई कि यह अधर्म कहां से पनप रहा है.
01:50प्रत्येक दिन के साथ उन्हें यह महसूस होने लगा कि राज्य की अद्रिश्य दिवारे पतली होती जा रही हैं, और
01:58बाहर से एक भयावः शक्ती धीरे-धीरे भीतर प्रवेश कर रही है.
02:03एक व्रिद्ध और तपस्वी रिशी, जिन्होंने कलियुक के लक्षणों को भांप लिया था, राजा परीक्षित को चेतावनी देने पहुँचे कि
02:12अब धर्म का मार्ग और भी कठिन होने वाला है.
02:16राजा ने धर्म की स्थापना और प्रजा के नैतिक उत्थान के लिए कठोर नियम लागू किये, मंदिरों और आश्रमों में
02:24यग्य और अनुष्ठान पुनहा आरंभ करवाएं, ताकि अधर्म का प्रवेश रोका जा सके.
02:30इस बीच कलियुक का प्रतिनिधित्व करने वाला एक दुष्ट छायादार आकरिती अपनी गहरी लाल आखों से परीच्षित के प्रयासों को
02:39दूर से ही देखता रहा, उसके होठोन पर एक क्रूर मुस्कान तैर रही थी.
02:45समय बीतने के साथ प्रजा में नैतिक मूलियों के प्रती उदासींता बढ़ने लगी और कई लोग धर्म के कठिन मार्ग
02:53को त्याग कर आसान अनैतिक रास्तों पर चलने लगे.
02:57परीक्षित के विश्वसनिय सैनिक और प्रशासक दूरदराज के क्षेत्रों से बढ़ती अराजकता, चोरी और सामान्य अशान्ती की चिंताजंक रिपोर्टे लेकर
03:07लोटने लगे.
03:08इन रिपोर्टों से चिंतित होकर, महाराजा परीक्षित ने स्वयां अपने सामराज्य के दूरस्त हिस्सों का दौरा करने का निश्चय किया,
03:17ताकि वे स्वयां अधर्म के बढ़ते प्रभाव को देख सकें.
03:22यात्रा करते हुए, उन्होंने एक भयावह द्रिश्व देखा जहां एक शूद्र अपनी निर्दई चड़ी से एक गाय और एक बैल
03:30को बेर्हमी से पीट रहा था, जो दर्थ से कराह रहे थे.
03:34बैल के केवल एक पैर था और गाय के आसू बह रहे थे, उनकी पीड़ा धर्म के क्षीन होते स्वरूप
03:42का प्रत्यक्ष प्रमान थी.
03:44इस हृदय विदारक द्रिश्य को देखकर महाराजा परीक्षित का रक्त खॉल उठा, उन्होंने तुरंट अपनी तलवार खीची और अन्याई शूद्र
03:53के सामने आकर खड़े हो गए, उनकी आखों में राइटियस क्रोध धधक रहा था.
03:59शूद्र जो वास्तव में कलियुक का अवतार था, ने राजा की चुनोती का सामना करते हुए व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ
04:07उत्तर दिया, जिससे स्पष्ट हो गया कि यह सिर्फ एक व्यक्ती नहीं, बल्कि एक युक का संधर्ष है.
04:15गंगा के पवित्र तटपर कुशा के आसन पर विराजमान परम ज्यानी शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को संबोधित करते हुए
04:23भागवत पुरान के अंतिम और बारहवे सकंध का रहस्य में उपदेश देना प्रारंब किया.
04:30शुकदेव जी ने गंभीर वानी में कहा कि हे राजन काल चक्र का पहिया अपनी धुरी बदर रहा है और
04:36अब इस स्रिष्टी में एक ऐसे अंधकार युक का उदे होने जा रहा है जिसे टाला नहीं जा सकता.
04:44उन्होंने बताया कि जैसे जैसे कलियुक का प्रभाव बढ़ेगा, धर्म रूपी बैल के सत्यक दया और पवित्रता नामक तीन पैर
04:52नश्ट हो चुके होंगे और वह केवल दान रूपी एक ही कमजोर पैर पर खड़ा रहेगा.
04:59भविश्य की भयावता का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि इस युग में राजा और शासक अपनी प्रजा के रक्षक
05:06नहीं बलकी भक्षक बन जाएंगे और करके नाम पर निर्दोष जनता की संपत्ती लूटेंगे.
05:13समाज में नैतिक मूलियों का ऐसा पतन होगा कि केवल धन और शारिरिक बलही मनुष्य की श्रिष्ठता का एक मात्र
05:21मापदंड बन जाएगा, जबकि सत्य और सदाचार पूरी तरह विलुप्थ हो जाएंगे.
05:27विवाह जैसी पवित्र संस्था केवल शारिरिक आकर्शन और एक अस्थाई समझोते में बदल जाएगी, जहां रिष्ठों की मर्यादा और निष्ठा
05:36का कोई स्थान नहीं रह जाएगा.
05:39प्रकृती भी मनुष्य के पापों के भार से त्रस्थ हो जाएगी, जिसके कारण भयंकर सूखा पड़ेगा, नदिया सूख जाएंगी और
05:48उपजाव भूमी बंजर मरुस्थल में परिवर्तित हो जाएगी.
05:52धर्म के नाम पर पाखंड का बोलबाला होगा, जहां जूठे सन्यासी और धोंगी गुरु अपनी वासनाओं की त्रिप्ती के लिए
06:00अज्यानी जन्ता को घ्रमित और शोशित करेंगे.
06:04मनुष्यों की शारिरिक शम्ता और आयू अत्यंत क्षीन हो जाएगी, लोग बौने, रोगी और अलपायु होंगे तथा उनका मन सदाईश्य,
06:13क्रोध और चिंता से जलता रहेगा.
06:16वेदों का पवित्र ज्यान लुप्थ हो जाएगा, पवित्र मंत्रों की ध्वनी शान्त हो जाएगी और चारों और केवल अशान्ती, कोलाहल
06:24तथा नास्तिक्ता का अंधकार व्याप्थ होगा.
06:28शुकदेव जी के इस हृदय विदारक वर्णन को सुनकर राजा परीक्षित की आखों में करुणा के आसु छलक आए, परन्तु
06:36उनका मन संसार की नश्वर्ता को समझ कर और भी शान्त हो गया.
06:41तब शुकदेव जी ने राजा को सांत्वना देते हुए कहा कि कलियुग में यद्यपी दोशों का सागर है, परन्तु इसका
06:49एक महान गुण यह है कि केवल भगवान श्रीहरी के नाम संकीर्तन मात्र से ही जीव को परमगती प्राप्थ हो
06:56जाती है.
06:58उन्होंने आगे की भविश्यवानी करते हुए कहा कि जब कलियुग का अंत निकट आएगा, तब संपूर्ण प्रित्वी पर घनभोर अंधकार
07:06छा जाएगा और अधर्म अपने चरम बिंदु पर पहुँच जाएगा.
07:10उसी भीशन अंधकार को चीरते हुए, शंभल ग्राम में विश्नुईशा नामक ब्राहमन के घर भगवान विश्नु के अंतिम अवतार निश्कलंक
07:20भगवान कलकी का प्राकट्य होगा.
07:23शुकदेव जी ने कलकी के दिव्यस्वरूप का ध्यान करते हुए बताया कि वे एक अति सुन्दर और प्रतापी देवदत्त नामक
07:31श्वेत अश्व पर सवार होंगे, जिनके हाथ में ब्रहमांड को कमपायमान करने वाली चमचमाती खडग होगी.
07:39भगवान कलकी अपनी दिव्यत अलवार से प्रिथवी पर फैले हुए सभी अत्याचारियों, लुटेरों और पाखंडी मलेक्षों का सहार करके इस
07:48धर्ती को उनके पापों के बोज से मुक्त करेंगे.
07:52उनके इस पावन सहार के पश्चात आकाश से पुष्पों की वर्षा होगी और पुनह एक बार सत्ययुक का स्वर्ण सवेरा
08:00उदित होगा, जहां धर्म अपने चारों पैरों के साथ पुनह स्थापित होगा.
08:06अंत में शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को अमर्ता का बोध कराते हुए कहा कि हे राजन, तुम शरीर नहीं
08:13हो, इसलिए तक्षक नाग का विश केवल इस नश्वर शरीर को चू सकता है, तुम्हारी अमर आत्मा को नहीं.
08:21शुकदेव जी के इन परम कल्यानकारी वचनों को हृदय में धारण कर राजा परीक्षित ने अपनी आखे बंद कर ली
08:28और अपने मन को पूर्णत है परब्रहम परमात्मा श्रीहरी के चर्णों में लीन कर दिया.
08:34संपूर्ण सभा इस अद्भुत द्रिश को विस्मय से देखती रही, जहां राजा परीक्षित का मुखमंडल एक अलौकिक दिव्य जोती से
08:42चमक उठा और वे देहा भिमान से मुक्त होकर परमपत को प्राप्थ हुए.
08:48शुकदेव जी की प्रशान्त ग्रिश्टी सभा में उपस्थित रिशियों पर धीरे से घूमती है, जहां परम सत्य के बोध से
08:55एक गहन शांती चा गई थी.
08:58एक गहरी आह भरकर, उन्होंने काल के अटल चक्र और आने वाले अंधकार्मय कलियुक के विशय में बोलना आरंभ किया,
09:07जो इस पावन क्षण के बाद भी अटल था.
09:11उन्होंने समझाया कि यद्यपी परीक्षित ने मोक्ष प्राप्त कर लिया, तथा पी कलियुक के भरष्टाचार के बीज बोए जा चुके
09:18थे, और इसका प्रभाव शीघ्र ही पूरी प्रित्वी को निगलने वाला था.
09:24ततपश्चात शुकदेव जी ने भविश्य के शास्कों की ओर अपना ध्यान मोडा, और मगद सामराज्य के पतित होने की भविश्यवानी
09:32आरंभ की, जो कभी धर्म का प्रकाशस्तम्ध था.
09:37उन्होंने मगद के प्रारंभिट अपेक्शाकृत धर्म प्रायन राजाओं का उलेख किया, जो वैदिक सिध्धान्तों और न्याय का पालन करते हुए
09:45शासन करते थे.
09:47परंतु उन्होंने चेतावनी दी कि इनहीं वन्षों की भावी पीडिया पथभरष्ट हो जाएंगी, अपने स्वार्थ को प्रजा के कल्यान से
09:56उपर रखेंगी और अपने क्षत्रिय धर्म का त्याग कर देंगी.
10:01उन्होंने भविश्यवानी की की पहले प्रद्योत वन्ष और फिर शिशुनाग वन्ष के लालची शासक सत्ता में आएंगे, जिनकी शक्ती उनके
10:09लोग से ही मापी जाएंगी.
10:12शुकदेव जी ने वर्णन किया कि ये राजा कैसे अत्याचारी बन जाएंगे, अपनी प्रजा से अत्यधिक कर वसूलेंगे और उन्हें
10:21सामान्य चोरों की भांती लूटेंगे.
10:24उन्होंने नंद वन्ष के विशय में बताया, जो शक्तिशाली किन्तु अधर्मी शासक होंगे, जो सभी नैतिक सिध्धान्तों को ताक पर
10:32रखकर अथा धन संचित करेंगे.
10:35नंदों के पतन के बाद उन्होंने चंद्रगुप्ट मौर्य के उदे और उनके विशाल सामराज्य का वर्नन किया, जो व्यवस्था का
10:44एक क्षणिक परंतु क्षणभंगुर दौर था.
10:47फिर भी महान मौर्य वंश भी अन्तह पतित होगा, उसके सदाचारी सिध्धान्त शीन हो जाएंगे और शासक केवल अपनी व्यक्तिगत
10:56शक्ती पर केंद्रित रहेंगे.
10:59शुकदेव जी ने फिर शुम्वंश का उल्लेख किया, जो पुश्यमित्र के नेत्रित्व में धोखे से सत्ता हथी आएगा और अधर्मी
11:07शासन के चक्र को जारी रखेगा.
11:10उन्होंने विस्तार से बताया कि कन्व राजा इसके बाद आएंगे, अल्पकाल तक शासन करेंगे और दया से बिहीन होंगे, जिससे
11:19राज्य और अधिक नैतिक पतन में डूब जाएगा.
11:23भविश्यवानी आंध्र, सात्वाहन, राजाओं तक फैली, जो शक्तिशाली होंगे किन्तु कलियुक की भौतिकवादी इच्छाओं से बंधे रहेंगे.
11:33शुकदेव जी ने यवन, तुरुष्क और अन्यमलेच, विदेशी, शास्कों के आगमन का वर्णन किया, जो पवित्र भूमी और उसकी परंपराओं
11:41का अनादर करेंगे.
11:44उन्होंने कहा कि ये आक्रमनकारी धर्म को और अधिक बाधित करेंगे, धर्माक्माओं को सताएंगे और अराजकता तथा अपवित्र शासन का
11:53युग स्थापित करेंगे.
11:55उन्होंने एक गंभीर चित्रखीचा, जो मनमाने धंसे शासन करेंगे, न्याय या अपनी प्रजाके कल्यान की परवाह नहीं करेंगे और केवल
12:05अपनी इच्छाओं को प्राथमिक्ता देंगे
12:08इन दुष्ट शासकों के भार से दबी प्रित्वी मौन पीडा में कराह उठेगी, क्योंकि समाज से धर्म धीरे-धीरे लुक्त
12:16हो जाएगा
12:18शुकदेव जी ने अपनी भविश्यवानी के इस भाग का समापन पूर्ण नैतिक पतन का विलाप करते हुए किया, जहां इमानदारी,
12:26करुणा और बड़ों के प्रती सम्मान दुरलब गुन बन जाएंगे
12:31अंत में शुकदेव जी ने चेतावनी दी की जब अधर्म अपनी पराकाश्ठा पर होगा और प्रित्वी पर पाप का भार
12:38असहनी हो जाएगा, तब भगवान विश्नुकल्की के रूप में अवतार लेंगे
12:44कल्युग में पाखंडी और धूर्त व्यक्ती ही धार्मिक और पूजनिय माने जाएंगे, जबकि सच्चे धर्मात्माओं का उपहास किया जाएगा
12:53केवल शारिरिक बल ही समाज में शक्ती और सम्मान का एक मात्र मान्दंड बन जाएगा, जिससे दुर्बलों का जीवन अत्यंत
13:02कष्ट में हो जाएगा
13:04धन ही व्यक्ती की कुलवंश, योग्यता और धार्मिक्ता का पैमाना बन जाएगा, और जिसके पास धन होगा, वही समाज में
13:12श्रिष्ट माना जाएगा
13:14सत्य और इमानदारी केवल नाम मात्र के सिध्धान्त रह जाएंगे, क्योंकि लोग स्वार्थ पूर्ती के लिए जूट का सहारा लेने
13:22में संकोच नहीं करेंगे
13:25फ्रिदय से करुना और दया पूरी तरह लुप्थ हो जाएगी और लोग एक दूसरे के दुखदर्द के प्रती पूरी तरह
13:32असमवेदनशील हो जाएंगे
13:35मनुष्य की आयू घट्ती चली जाएगी और लोग अलपायू में ही विभिंध रोगों और चिन्ताओं से ग्रसित होकर काल के
13:43ग्रास बन जाएंगे
13:45लोगों की स्मरण शक्ती और बुद्धी का क्षय होगा जिससे वे शास्त्रों के ग्यान और प्राचीन विद्याओं को समझने में
13:53अक्षम हो जाएंगे
13:55गुरुजनों और वृद्धों के प्रती आदर सम्मान पूरी तरह से विलुप्थ हो जाएगा और युवा पीधी उनकी सलाह को तुछ
14:03मानकर उपहास करेगी
14:05विवाह जैसे पवित्र बंधन केवल कामुक सुख और क्षणिक लाब के लिए किये जाएंगे और प्रेम तथा निष्ठा जैसे उच्च
14:13आदर्शों का लोप हो जाएगा
14:16प्रित्वी की उर्वर्ता घट जाएगी जिससे अन्न की कमी होगी और चारों और भूखमरी तथा अकाल का भयावः प्रकोप फैल
14:25जाएगा
14:26राजा और शासक अत्यधिक क्रूर, लाल्ची और अन्याई हो जाएंगे जो अपनी प्रजा को केवल लूटने और सताने में व्यस्त
14:35रहेंगे
14:35गौए कम दूध देंगी और अन्याई पशु भी अपनी उत्पादक्ता और शक्तिक होते जाएंगे जिससे मनुष्य और पशुओं के बीच
14:45संबंध विच्छेद हो जाएगा
14:48पवित्र धर्म ग्रंथों की गलत व्याख्या की जाएगी और लोग अपनी स्वार्थ सिध्धी के लिए धार्मिक सिध्धान्तों को तोड मरोड
14:56कर प्रस्तुत करेंगे
14:58आकाश से वर्षा कम होगी जिससे नदिया सूख जाएंगी और जल के अभाव में धर्ती मरुस्थल में परिवर्तित होती चली
15:06जाएंगी
15:08नएने भयानक रोग उत्पन्न होंगे जो बिना किसी पहचान और उपचार के लोगों को पीड़ा देकर काल के गाल में
15:15धकेल देंगे
15:17घरबार असुरक्षित हो जाएंगे और लोग अपने ही निवासों में भी भय तथा चिन्ता से ग्रसित होकर जीने को विवश
15:25होंगे
15:26शहरों में अराजक्ता और असुरक्षा इतनी बढ़ जाएगी कि लोग शान्ती की तलाश में अपने घरों को छोड़कर जंगलों और
15:34पहाडों की ओर पलायन करेंगे
15:37पारिवारिक संबंध स्वार्थ पर आधारित हो जाएंगे और पुत्र अपने मातापिता का सम्मान नहीं करेंगे जबकि पत्निया पतियों के प्रती
15:47निश्ठाख हो देंगी
15:48पृत्वी पर भयानक प्राकृतिक आपदाय आएंगी जैसे की भूकंप, बाड़ और तूफान जो जीवन और संपत्ती को भारीक्षती पहुँचाएंगे
15:59अंतर जीवन इतनी निराशा और अराजक्ता से भर जाएगा कि लोग मृत्यु को ही एक मात्र शांती का मार्ग मानने
16:07लगेंगे और सर्वत्र केवल हताशा ही दिखाई देगी
16:12महामुनी शुकदेव राजा परीक्षित को कल्युक का भयानक सत्य बताते हुए कहते हैं कि भविश में पवित्र विवाह संसकार केवल
16:20शारिरिक आकर्शन और धन के लेंदेन का एक समझोता बनकर रह जाएगा
16:26राजा परीक्षित इस हृदय विदारक सत्य को सुनकर अत्यंत व्यत्थित हो जाते हैं और उनकी आखों में भावी मानवता के
16:34पतन को देखकर गहरे दुहक के आसु छलक आते हैं
16:39कल्युक के समाज में स्त्री और पुरुष केवल क्षणिक सौंदर्य और वासना के आधार पर एक दूसरे को चुनेंगे जहां
16:46आत्मा के मिलन का कोई स्थान नहीं होगा
16:50पवित्र अगनी को साक्षी मान कर लिये जाने वाले साथ फेरे केवल एक दिखावा बन कर रह जाएंगे और लोग
16:57स्वार्थ सिद्ध होते ही इन संबंधों को तोड़ फेंकेंगे
17:02सगे भाईयों के बीच कासने पूरी तरह समाप्थ हो जाएगा और वे भूमी के एक छोटे से टुकडे के लिए
17:09एक दूसरे के रक्त के प्यासे हो जाएंगे
17:12जिस मातापिता ने अपनी संतान को पालपोस कर बढ़ा किया उन्हें ही व्रिधावस्था में उनके अपने पुत्र अत्यंत क्रूर्ता से
17:21घर से बाहर निकाल देंगे
17:24मातरित्व की गरिमा भी धूल में मिल जाएगी और स्वार्थी माताएं अपने नवजात शिशुओं को सांसारिक सुखों की प्राप्ती के
17:32लिए असहाय छोड़ देंगी
17:34सच्ची मित्रता का नामों निशान मिक जाएगा और लोग केवल अपने स्वार्थ के लिए मित्र बनाएंगे और काम निकल जाने
17:42पर उन्हें धोखा दे देंगे
17:45इस विकृती के पीछे साक्षात कल्यूप का असुर होगा जो मनुष्य के मनों में वास करके उनके भीतर के धर्म
17:52और करुणा को नश्ट कर देगा
17:55गुरूओं का आदर केवल इतिहास की बाते रह जाएगा और अज्ञानी शिश्य अपने परम पूज्य गुरूओं का उपहास उड़ाकर स्वयन
18:04को श्रिष्ट घोशित करेंगे
18:05पवित्र नदिया जो कभी जीवन और मोक्षदाएनी थी वे मनुष्यों के लालच और गंदगी के कारण दूशित और विशैली हो
18:15जाएंगी
18:16देवताओं के निवास स्थान कहे जाने वाले विशाल परवत मनुष्यों द्वारा अपनी त्रिष्णा को शांत करने के लिए खोदे और
18:24नश्ट किये जाएंगे
18:26घने और पवित्रवन जो रिशियों की तपो भूमी थे उन्हें बेरहमी से काट दिया जाएगा जिससे वन्यजीव आश्रेहीन होकर भटकने
18:35लगेंगे
18:37गौमाता जो कभी पूजनिय और पूज थी उन्हें दूध देना बंद करते ही सडकों पर भूखा और प्यासा मरने के
18:45लिए बेसहारा छोड़ दिया जाएगा
18:48पवित्र देवालय केवल धन कमाने के साधन बन जाएंगे जहां धोंगी पुजारी और पाखंडी लोग धर्म के नाम पर सीधे
18:56साधे भक्तों को ठगेंगे
18:59सत्य का मार्ग पूरी तरह लुप्त हो जाएगा और समाज में केवल वही व्यक्ति सफल माना जाएगा जो सबसे बड़ा
19:06जूठ बोलने में कुशल होगा
19:09दान और पुन्य केवल आत्म प्रशंसा और जूठी कीर्ती पाने के लिए किये जाएंगे और गरीबों को दिये जाने वाले
19:17अन्न में भी मिलावट होगी
19:19नारी की सुरक्षा और सम्मान का पूर्ण हरास होगा और समाज उन्हें केवल उपभोग की वस्तु समझ कर उनके साथ
19:27अन्याय करेगा
19:29मानवता की इस दुष्टता के कारण वायुमंदल भी प्रदूशित और विशैला हो जाएगा जिससे लोग भयानक और असाध्य रोगों से
19:38ग्रसित होकर तड़पेंगे
19:40शुकदेव जी कहते हैं कि जब यह पाप और अराजक्ता अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाएगी तब प्रित्वी का उद्धार
19:48करने के लिए साक्षात भगवान विश्नुकल की रूप में अवतार लेंगे
19:53मनुश्यों के पापों से संतप्थ होकर प्रकृती अपना सौमे रूप त्याग देती है और आकाश में जीवनदायनी धूप के स्थान
20:01पर दमघोंटु काले धुएं और जहरीली गैसों का सामराज्य स्थापित हो जाता है
20:08सूर्य देव की किरने प्रिथवी तक पहुँचने में असमर्थ हो जाती हैं जिससे संपूर्ण धरापर एक भयानक धुंधला और पीला
20:16प्रकाश फैल जाता है जो जीवन के अंत का संकेत देता है
20:22गंगा और यमुना जैसी पावन नदिया पूरी तरह सूख कर केवल सूखी मिट्टी और मृत जलिये जीवों के कंकालों की
20:30गर्थ बनकर रह जाती हैं
20:33अनका एक भी दाना न उगने के कारण फटे पुराने वस्त्र पहने और भूख से व्याकुल मानव धूल से सनी
20:40सूखी धर्ती को अपनी हताश आखों से ताकते रह जाते हैं
20:46आकाश से जल के स्थान पर काले रंग की तेजाबी वर्षा होने लगती है जो बची-खुची वनस्पतियों को जला
20:53कर खाक कर देती है और मनुश्यों की त्वचा पर भयानक छाले पैदा कर देती है
21:00हरीभरी घाटियों और घने जंगलों के विशाल व्रिक्ष इस विशैली वर्षा के कारण जुलसकर काले निर्जीव दंठलों में परिवर्तित हो
21:08जाते हैं
21:10तेजाबी वर्षा के तुरंत बाद प्रकृती की क्रूरता और बढ़ती है और असहनिय बर्फीली हवाय तथा भीशन शीत लहरें बिना
21:18आश्रय के तड़कते लोगों को अपनी चपेट में ले लेती हैं
21:23ठंड से ठिठूरते हुए बेघर परिवार जिनके शरीर पर मात्र चित्रे बचे हैं सूखी टहनियों को जलाकर अपनी सांसों को
21:32बचाय रखने का अंतिन संधर्ष करते हैं
21:36धर्ती के लगातार कामपने और विनाशकारी भूकमपों के कारण कलियुक के बड़ेब्रे वैभवशाली नगर और पाशान महल ताश के पत्तों
21:45की तरहे ढहने लगते हैं
21:48विनाश से भैभीत होकर लाखों लोगों का हुजूम अपने घरों को छोड़कर सुदूर पहाडों और घने जंगलों की ओर एक
21:56अनिश्चित यात्रा पर निकल पड़ता है
22:00विनाश से भैभीत होकर लाखों लोगों का हुजूम अपने घरों को छोड़कर सुदूर पहाडों और घने जंगलों की ओर एक
22:08अनिश्चित यात्रा पर निकल पड़ता है
22:12पहाडी रास्तों पर हिंसक और भूखे जंगली पशु मनुश्यों की कमजोरी का लाब उठा कर उन पर घात लगा कर
22:19हमला करने लगते हैं
22:21भूख की चरम सीमा पर पहुची माताएं अपने रोते हुए बच्चों का पेट भरने के लिए पत्थरों के बीच से
22:28कड़वी जंगली जड़ें खोद कर निकालने का प्रयास करती हैं
22:33पुरुष भोजन की तलाश में खतरनाक उची पहाडियों की चट्टानों पर चड़कर जहरीली मधुमक्खियों के चट्टों से जंगली शहद निकालने
22:42का जानलेवा जोखिम उठाते हैं
22:46घने जंगलों के बीच स्थित अंधेरी और नम गुफाय ही अब इन बेसहारा मनुश्यों का एक मात्र सुरक्षित आश्रय बन
22:54जाती हैं जहां वे जंगली पशुओं की भाती रहने को विवश हैं
23:00गुफाओं के भीतर भी जहरीली हवा फैल जाने के कारण वृद्ध और दुर्बल लोग लगातार खांसते हुए अपनी अंतिम सासे
23:08गिनने लगते हैं
23:10संपूर्ण प्रिथवी की उर्वर्ता समाप्थ हो जाने से भूमी एक बंजर नमक जैसी सफेद परत से ढख जाती है जहां
23:18जीवनदायनी वनस्पती का उगना पूरी तरह असंभव हो जाता है
23:24प्यास से व्याकुल मनुष्य पत्रीले गढ़ों में जमा हुए गंदे और विशैले की चड़्युक्त पानी की आखिरी बूंदों के लिए
23:31आपस में ही हिंसक संघर्ष करने लगते हैं
23:36इन सुदूर जंगलों में कानून और व्यवस्था का नामों निशान मिट जाता है और क्रूर डाकु निरी शर्नार्थियों से उनकी
23:44अंतिम बची सूखी जड़े भी बलपूर्वक छीन लेते हैं
23:49स्रिष्टी का संतुलन इस कदर बिगड़ जाता है कि पशुपक्षी और सुन्दर जीव पूरी तरह लुप्थ हो जाते हैं और
23:56चारों और केवल सन्नाटा और राख का सामराज्य बचता है
24:01इस महाविनाश और नरक के बीच गुफाओं में छिपे अन्तिम जीवित मनुष्य कापते हाथों से उपर की ओर देखते हुए
24:09भगवान विश्णु के कलकी अवतार के आगमन की प्रार्थना करते हैं
24:15उन दैनिय पुकारों की गूंज अंतरिक्ष के शूने में तैरती हुई देवताओं और रिशियों के हृदय में गहरी वेदना उत्पन
24:23करती है
24:25इस गेहन अंधकार को भामपते हुए सिद्ध रिशिगन अपने ध्यान में लीन स्रिष्टी के मूल संतुलन की गंभीर चुनोती पर
24:33चिंतन करते हैं
24:36तभी परम ज्यानी शुकदेव रिशी अपनी दिव्यद रिश्टी से कल्यग के बढ़ते प्रभाव और अधर्म के भार को स्पष्ट रूप
24:43से देखते हैं
24:46अपनी गहरी सास छोड़ते हुए वे समस्त लोकों को धैर्य और आशा का संदेश देते हुए भगवान के भावी अवतार
24:54का वर्णन करना आरंभ करते हैं
24:58वे कहते हैं कि जब अधर्म और अन्याय का अंधकार अपनी चरम सीमा पर होगा तभी धर्म का सूर्य पुन्ह
25:05उदे होगा
25:06हे रिशियों वे गंभीर स्वर में कहते हैं इस ब्रहमांडिय रात्री में स्वय भगवान विश्णू एक दिव्य योजना के साथ
25:15अवतार लेंगे
25:17कलियुक के इस भयावह सागर के बीच शुकदेव रिशी आगे बताते हैं एक शांत पवित्र द्वीप की तरह शंभल नामक
25:25एक अध्भुत ग्राम बचेगा
25:27इसी शंभल ग्राम में एक धर्मनिष्ट ब्रहमन जिसका नाम विश्णू शा है अपनी सात्विक पत्नी के साथ एक साधारन कुटिया
25:36में निवास करता है
25:39विश्णूशा एक मध्यमकद का परोपकारी और शांत ब्राहमन जिसका शरीर तपस्या और सात्विक जीवन शैली के कारण दुबला लेकिन द्रिड
25:49है
25:50उनकी पतिवर्ता पत्नी सुम्ती अपनी विनमर्ता और सेवा भाव से घर में प्रेम और शांती का दीपक जलाए रखती है
26:00यह वही पवित्र घर है शुकदेव रिशी के शब्दों में जहां भगवान अपनी माया से स्वया अवत्रित होंगे एक बालक
26:08के रूप में
26:09एक रात जब पूरा ब्रहमांड गेहन निद्रा में था, शंभल ग्राम पर आकाश से एक दिव्य स्वर्णिम प्रकाश पुंच उतरता
26:18है
26:19उसी क्षण सुम्ती अपने स्वपन में देखती है कि एक भव्य नीले रंग का शिशु उसके गर्भ में प्रवेश कर
26:27रहा है, जो सहस्र सूर्यों के समान तेजस्वी है
26:32विश्नुईशा भी जागरित अवस्था में अपने घर को दिव्य सुगंध और अलौकिक उर्जा से भरते हुए महसूस करते हैं और
26:40उन्हें आने वाली महान घटना का पूर्वाभास होता है
26:44इस प्रकार परमपिता परमात्मा की असीम क्रिपा से शंभल ग्राम के इस पवित्र युगल के गर्भ में कलकी अवतार का
26:52दिव्यबीज रोपित होता है
26:55जैसे जैसे समय बीटता है शंभल ग्राम के निवासियों को भी एक विशेश आभास होता है कि कुछ असाधारन और
27:04पवित्र उनके बीच जन्म लेने वाला है
27:07यह बालक शुकदेव रिशी गर्व से कहते हैं समस्ट शस्त्रों में पारंगत वीर्ता और शौर्य का प्रतीक और धर्म का
27:16रक्षक होगा
27:16वह अधर्मी राजाओं और क्रूर शास्कों का सहार करेगा वे द्रेड़ता से कहते हैं और धर्ती पर पुनह सत्युक की
27:25स्थापना करेगा
27:28बाहर कलियुक का अंधकार अभी भी प्रित्वी को घेरे हुए है पर अब उस निराशा में एक नई आशा की
27:35किरण फूट पड़ती है
27:37जिस तरह सूर्योदय अंधकार को चीरता है शुकदेव रिशी अपनी कथा समाप्थ करते हुए कहते हैं उसी प्रकार कल्की का
27:46अवतार इस घोर कल्युक का अंध करेगा
27:49उसी क्षण शंभल ग्राम की पवित्र भूमी से एक अलौकिक तेज उत्पन होता है जहां भगवान विश्णु अपने दस्वे रूप
27:58में निश्कलंक कल्की अवतार के रूप में प्रकट होते हैं
28:02आकाश का सीना चीरते हुए देवराज इंद्रद्वारा भेजा गया परम दिव्यश्वेट अश्व देवदत्त प्रित्वी पर अवतरित होता है जिसके पंक
28:11साक्षात प्रकाश से बने हैं
28:15भगवान कल की अत्यंत वेग से उस तेजस्वी देवदत्त पर सवार होते हैं जिससे संपूर्ण ब्रहमाड में धर्म की पुनस्थापना
28:24का शंकनाद गूँच उठता है
28:27अपने दाहिने हाथ में वे न्याय की वह प्रजवलित तलवार उठाते हैं जिसकी दिव्यज्वाला कल्यक के सधन अंधकार को क्षण
28:35भर में भस्म करने की शक्ती रखती है
28:39राजाओं का स्वांग रचे हुए अधर्मी और लुटेरे शासक जब आकाश में इस दिव्यज्योती को देखते हैं तो उनके हृद्यों
28:47में मृत्यू का भय व्याप्थ हो जाता है
28:51देवदत्त के खुरों की थाप से प्रिथ्वी काप उठती है और भगवान कल्की बिजली की गती से उन पापी सेनाओं
28:58की ओर बढ़ते हैं जिन्होंने धर्ती को नरक बना दिया था
29:02हवा में उर्ते हुए दिव्य अश्व पर सवार होकर भगवान कल्की कल्यूगी राजाओं के अहंकार को चूर-चूर करने के
29:10लिए रणभूमी में उतरते हैं
29:13जैसे ही कल्की की तल्वार हवा में घूमती है पापी राजाओं के अस्त्रशस्त्रत इनके की तरहे तूटकर बिखर जाते हैं
29:21और उनके रत धूल में मिल जाते हैं
29:24करोडों की संख्या में एकत्रित हुए वेकरूर, दस्यू और राजा भगवान के एक ही प्रहार से पत्तों की तरहे कटकर
29:32गिरने लगते हैं
29:35अपनी पराजय निश्चित देखकर दुष्ट शासक रनभूमी से भागने का प्रयास करते हैं, परंतु देवगत्त की अलौकिक गती के सामने
29:43उनकी कोई चाल काम नहीं आती
29:47चारों और बिखरी हुई बुराई का अंत करते हुए भगवान कलकी का रूप साक्षात प्रलै के रुद्र जैसा प्रतीत होता
29:54है, जो स्रिष्टी का शुद्धिकरण कर रहे हैं
29:58रक्त और धूल से सने उस भयानक मैदान में भगवान कलकी अकेले ही धर्म की विजय पता का बनकर चमकते
30:05हैं, और उनका तेज हर दिशा को आलोकित करता है
30:10कल्यूग के माया भी असुर अपनी आसुरी शक्तियों से अंधकार फैलाने का अंतिन प्रयास करते हैं, पर कलकी की तलवार
30:18का तेज उनकी माया को तुरंत छिन्न भिन्द कर देता है
30:23भगवान कलकी के मुख मंडल पर क्रोध और करुणा का एक ऐसा दिव्य संतुलन है, जो केवल अधर्मियों का सहार
30:30ही नहीं, बल्कि उनके पापों का भी अंत कर रहा है
30:35कल्योगी सेनाओं का मुख्य क्रूर सेनाप्ती जब अपनी गदा लेकर आगे बढ़ता है, तो भगवान कलकी एक ही तीवर जटके
30:43में उसका अंत कर न्याय की विजय सुनिश्चित करते हैं
30:48उस अंतिन प्रहार के साथ ही प्रिथवी पर सदियों से जमा हुआ पाप का सामराज्य ताश के पत्तों की तरहे
30:55ढह जाता है
30:57आकाश से काली घटाएं छंटने लगती हैं और सदियों बाद धर्तिमा एक राहत की सास लेकर भगवान कलकी के चर्नों
31:05की वंदना करती हैं
31:08अपनी प्रजवलित तलवार को शांत करते हुए भगवान कलकी पूर्व दिशा की ओर देखते हैं जहां एक स्वर्णिन युग की
31:16पहली किरण फूटने के लिए व्याकुल है
31:19बचे हुए धर्मात्मा और रिशिमुनी गुफाओं से बाहर निकल कर भगवान कलकी की आरती उतारते हैं और उनके जैकारों से
31:28तीनों लोग गूंच उठते हैं
31:30इस प्रकार देवदत्त घोडे और न्याय की तलवार के बल पर भगवान कलकी कल्यक के घोर अंधकार को सदा के
31:38लिए मिटा कर सत्यूग की स्वर्ण सुभा का स्वागत करते हैं
31:43जैसे ही भगवान कलकी की उपस्थिती से अंधकार छटा प्रित्वी पर बचे हुए सभी प्राणियों के हृदय में एक अलोकिक
31:51शुद्धता का संचार हुआ
31:53उनके मन ततकाल निर्मल स्वटिक की तरह उज्वल हो गए
31:56यह मात्र मन की शुद्धी नहीं थी अपितु आत्मा का गेहन जागर्ण था जहां सभी अवांचित विचार और भावनाय सूर्योदय
32:06के समक्ष कुहरे की भाती विलुप्थ हो गई
32:10उसी क्षन्क ब्रमांडिय घडी ने एक नए युग की घोशना करते हुए सूर्य चंद्रमा और ब्रिहस्पती एक दुलब और शुभ
32:18खगोलिय संरेखन में आ गए
32:20जिससे आकाश गंदा में एक दिव्य प्रकाश प्रस्पुटित हुआ
32:24इस अद्भुत संरेखन ने प्रित्वी पर एक अविस्मर्निय स्वर्निम आभा बिखेरी जिसने अंधकार की सभी पर्तों को चीर कर एक
32:33नई पवित्र सुभा का आहवान किया
32:37वायुमंडल में शुद्धता घुल गई, वनस्पतिया जीवन्त रंगों में खिल उठीन और नदिया क्रिस्टल स्वच जल के साथ कलकल करती
32:45हुई प्रवाहित होने लगी
32:48पशुपक्षी अपने स्वाभाविक भाय को त्याग कर एक दूसरे के साथ सामंजस्य बिठाते हुए वन में एक अध्भुत शांती और
32:56एक ताका प्रदर्शन करने लगे
32:59प्रित्वी पर अब कोई बीमारी नहीं थी, कोई व्रिधावस्था नहीं थी और जीवन की प्रत्येक सास नवजीवन और अक्षय उर्जा
33:08से परिपूर्ण थी
33:10धर्म ने अपने चारों पैरों पर खड़े होकर सत्य, तप, गया और दान की पूर्णता के साथ पूरी धर्ती पर
33:18अपनी गरिमा पुनह स्थापित कर ली
33:21मानवता ने युद्ध और कलाय को भुला कर वेदों और उपनिश्दों के शाश्वत ज्यान में अपनी निश्था पुनह स्थापित करते
33:29हुए एक सामुहिक चेतना का अनुभव किया
33:33स्वय भगवान कल की अपनी प्रजवलित तलवार को विश्राम देते हुए इस नवजन्म प्रित्वी पर चारों ओर देखते हैं उनके
33:41दिव्य मुख पर एक संतुष्टी भरी मुस्कान है
33:46देव लोक में भी आनंद की लेहर दोड़ गई ब्रह्मा, विश्नु और महेश सहित सभी देवता इस स्वर्णिन परिवर्तन का
33:54साक्षी बनने के लिए आकाश गंगा से नीचे उतर आए
33:59वायुदेव ने मंद सुगंधित पवन का संचार किया, वरुन देव ने अमरित्सम वर्षा की बूदे बरसाई और इंद्र देव ने
34:06आकाश में रंगीन धनुष का निर्मान किया
34:10रिशिमुनियों ने दिव्यमंत्रों का जाब करते हुए वातावर्ण को पवित्र ध्वनी और सकारात्मक उर्जा से भर दिया, जिससे हर आत्मा
34:19में शांती स्थापित हुई
34:21ग्रिहस्थ जीवन में भी नैतिक्ता और धर्म का पूर्ण पालन होने लगा, जहां हर व्यक्ति दूसरों के प्रती प्रेम और
34:29सम्मान का भाव रखता था
34:31भूमी ने स्वयं ही प्रचुर फसले उगाई, व्रिक्षों ने मीठे फल दिये, और गोधन ने अमरित्सम दूध प्रदान किया, जिससे
34:40किसी को कोई अभाव नहीं रहा
34:43विज्ञान और अध्यात्म का अध्भुत संगम हुआ, जहां ज्ञान की खोजने ब्रह्मान के रहसियों को अनावरित किया और जीवन को
34:51और भी अर्थपूर्ण बनाया
34:54अहिंसा परम धर्म बन गया, और हर जीव एक दूसरे के प्रती करुणा और निस्वार्थ प्रेम की भावना से उत्प्रोत
35:01था, जिससे सभी बंधनों से मुक्ती मिली
35:05भगवान कलकी ने देखा कि उनका कार्य पूर्ण हो चुका है, और अब प्रित्वी पूर्ण रूप से सत्यूग के दिव्य
35:13प्रकाश में नहा चुकी है, उन्हें परम शांती का अनुभव हुआ
35:17इसके उपरांत भगवान कलकी अपने देवदत घोडे पर सवार होकर धीरे धीरे ब्रहमांडिय आकाश गंगा में विलीन होने लगे, अपने
35:27पीछे एक अमर प्रकाश छोड़ते हुए
35:29इस प्रकार सत्ययुग का पुनरजन्म हुआ, एक ऐसा स्वर्ण युग जहाधर्म, शांती और समरिध्धी ने अनंतकाल तक प्रिथवी पर अपना
35:39सामराजिस्थापित किया
35:42स्रिष्टी के इस महान चक्र और दिव्य लीलाओं को सुनकर राजा परीक्षित के हरिदय में असीम शांती और संतोष का
35:49संचार हुआ
35:51गंगा के पावन तट पर बैठे राजा परीक्षित ने अपने दोनों हाथ जोड़कर शुकदेव जी के चरनों में अपना मस्तक
35:58चुकाया
36:00परमेहंस शुकदेव जी ने राजा के मुख पर छाई शांती को देखा और उनके मन से मृत्यू के भय को
36:07सदा के लिए मिटाने का निश्चय किया
36:10शुकदेव जी ने गंभीर वाणी में कहा कि यह भौतिक शरीर पंच्टत्वों का बना एक नश्वर वस्त्र मात्र है जो
36:18समय के साथ नश्ठ होना निश्चित है
36:21उन्होंने समझाया कि आत्मा अजन्मा, अविनाशी और शाश्वत है इसलिए शरीर के नश्ठ होने को अपनी मृत्यू मानना केवल एक
36:30अज्ञानता भराभ्रम है
36:34शुकदेव जी ने कहा कि तक्षक नाग का विश्च केवल इस मिट्टी के शरीर को जला सकता है तुम्हारी अमर
36:40आत्मा को छूने की शक्ती उसमें नहीं है
36:45राजा परीक्षित को ब्रहमग्यान देते हुए शुकदेव जी ने उन्हें अपने मन को संपूर्ण रूप से निराकार परमात्मा में लीन
36:53करने का आदेश दिया
36:55राजा ने अपने नेत्र बंद कर लिये और शुकदेव जी के एक एक शब्द को अपने हृदय में उतार कर
37:01स्वयंको परम ब्रहमा के रूप में अनुभव किया
37:06शुकदेव जी ने अंतिम मंत्र देते हुए कहा कि तुम वही परम सक्त्य हो जो स्रिष्टी के आदी, मध्य और
37:12अंत में भी अक्षोन रहता है
37:16उन्होंने राजा को निर्देश दिया कि वे अपने चित को भगवान वासुदेव के परम पावन और आनंदमय रूप में स्थिर
37:23कर लें
37:25अब राजा परीक्षित के मन से हस्तिनापूर के राज्य, अपने परिवार और इस नश्वर संसार के प्रती अंतिम मोह भी
37:33सदा के लिए समाप्थ हो गया
37:35उनके मुख मंडल पर एक ऐसा दिव्यतेज उत्पन हुआ जिसने काल और मृत्यू के भयानक साय को भी पूरी तरह
37:43से फीका कर दिया
37:45शुकदेव जी ने राजा के मस्तक पर अपना वर्देहस्त रखा और उन्हें जीवनम्रत्यू के इस चक्रव्यों से सदा के लिए
37:53मुक्त घोशित कर दिया
37:55आकाश से देवगण और गंधर्व इस अध्भुत ग्रिश्य को देख रहे थे और उन्होंने स्वर्ग से अध्रिश्य पुष्पों की वर्शा
38:03करना प्रारंभ कर दिया
38:05राजा परीक्षित अब पूरी तरह से समाधिस्त हो चुके थे जहां न तो कोई दुख था न कोई भय और
38:12नहीं तक्षक के विश्का कोई अस्तित्व
38:15उसी समयत दूरक्षितिच पर काले और भयंकर मेग उमडने लगे जो विश्धर तक्षक नाग के आगमन का संकेत दे रहे
38:24थे
38:25हवाओं में विशैली फुफकार गूँजने लगी परंतु राजा परीक्षित अपने आत्मस्वरूप में इतने स्थिर्थे कि उन्हें इस बाहरी कोलाहल का
38:34कोई आभास तक न था
38:37अपने जीवन के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण कार्य को पूर्ण कर शुकदेव जी ने समच लिया कि राजा अब पूर्णत्य
38:45मुक्त हो चुके हैं
38:47शुकदेव जी मौन धारण कर धीरे धीरे हस्तिनापूर के उस पावन तट से विदा होने लगे पीछे छोड़ गए ज्यान
38:55का वह अमर प्रकाश जो कलियुक का मार्ग दर्शक बनेगा
38:59इस प्रकार शुकदेव जी का यह अंतिम मंत्र संपूर्ण मानव जाती के लिए मृत्यु के भय को मिटाने और मोक्ष
39:07प्राप्त करने का शाश्वत मार्ग बन गया