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प्रभास तीर्थ पर एकत्रित यादवों के बीच ऋषियों के शाप और नियति का खेल अपने चरम पर पहुँच जाता है। शराब के नशे में धुत यादव अपने ही कुल के विनाश का कारण कैसे बनते हैं? सात्यकि और कृतवर्मा के बीच भड़की चिंगारी कैसे एक भीषण गृहयुद्ध में बदल जाती है? भगवान श्रीकृष्ण और बलराम इस महासंहार को कैसे देखते हैं? इस एपिसोड में देखें यादवों के विनाश का हृदयविदारक दृश्य, बलराम का महाप्रयाण और श्रीकृष्ण की अंतिम लीलाओं का आरम्भ। क्या यह द्वारका के अंत की शुरुआत है? जानें इस रहस्यमयी अध्याय में! #भागवतपुराण #द्वारका #यादववंश #श्रीकृष्णलीला #महासंहार #प्रभासतीर्थ #बलराम #सत्यकि #भगवतगीता #पौराणिककथा
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00:00द्वारका के यादव भगवान श्री कृष्ण के आदेश पर प्रभास तीर्थ के पवित्र तट पर पहुँचे जहां उन्होंने स्नान और
00:07तपस्या का संकल्प लिया
00:10विशाल समुद्र की असीन शांती और शीतल वायूने क्षण भर के लिए उनके मनों को शांत किया परंतु शाप का
00:18अद्रिश्य प्रभाव वायूमंडल में धीरे-धीरे घुर रहा था
00:22तपस्या के लिए लाए गए भंडारों के बीच कुछ युवा यादवों ने अनायास ही मदिरा के कलश खोज निकाले जो
00:30शायद शाप के प्रभाव से ही वहां प्रकट हुए थे
00:34पहले संकोच और फिर बढ़ती हुई धिठाई के साथ उन्होंने मदिरा का सेवन करना आरंभ किया और क्षण भर में
00:42ही सन्यम की दीवारे तूटने लगी
00:45मदिरा के तीवर प्रभाव से उनके मन और इंद्रिया मधोश होने लगी जिससे उनकी आवाजों में ठाहाके और अट्थास घुलने
00:53लगे जो वातावर्ण में गूंज रहे थे
00:57भगवान श्री कृष्ण अपने दिव्य नेतरों से यह सब देखते हुए गहन दोहक और नेती की अनिवार्यता को समझते हुए
01:05एक शांत वेधना में लीन हो गए
01:08धीरे धीरे अधिक से अधिक यादव अपने तपस्या के संकल्पों को त्याग कर इस मादक उच्सव में शामिल होते गए
01:16जिससे तट पर उनमाद बढ़ने लगा
01:19जैसे जैसे रात गहराती गई और मदिरा का प्रभाव बढ़ा उच्सव का माहौल धीरे धीरे कल है और तीखी बहस
01:27में बदलने लगा
01:29पुरानी क्षुद्र शिकायतें और दबे हुए मतभेद मदिरा के नशे में सतह पर आने लगे जिससे छोटे-छोटे बिवाद हर
01:37जगह भड़क उठे
01:40दो प्रमुख यादव कुलों के बीच सदियों पुरानी प्रतिद्वंद विता मदिरा के उगर प्रभाव से पुनह जागरित हो उठी और
01:48उनके नेताओं के बीच तीखी जड़क शुरू हो गई
01:52नशे में धुत यादवों के बीच अभधर गालिया और उग्र उत्तेजनाय तीजी से बढ़ने लगी जिससे वातावर्ण और भी अधिक
02:00विस्पोटक हो गया
02:03व्यक्तिगत अपमान और वन्शगत लांचन एक दूसरे पर फेंके जाने लगे जिससे हर शब्द तलवार की धार की तरह चुबने
02:11लगा और शान्ती की कोई संभावना नहीं बची
02:15जैसे जैसे कलह गहराती गई शाप का अद्रिश प्रभाव और भी प्रबल होता गया जिससे यादवों की आखों में एक
02:23भयानक अमानविये चमक आ गई
02:26भगवान बलराम अपनी विशाल काया और शान्त किन्तु द्रिढ आवास के साथ हस्तक्षेप करने के लिए आगे बढ़े परंतु नशे
02:34में धुत यादवों ने उनकी दिव्यवानी को अनसुना कर दिया
02:39बलराम के हस्तक्षेप की अभेलना ने कुछ यादवों के क्रोध को और भी अधिक भड़का दिया और वे उन्हें भी
02:46चुनौती देने लगे
02:48शन भर में एक छोटी सी धक्का मुक्की ने भयंकर हाथा पाई का रूप ले लिया जिससे रेट पर धूल
02:55उड़ने लगी और चीखें गूंज उठी
02:59जैसे आग जंगल में फैलती है वैसे ही अन्य नशे में धुत यादव भी इस उभरते हुए संधर्ष में खिंचे
03:06चले आए जिससे स्थिती और भी भयावह हो गई
03:11देखते ही देखते प्रभास तीर्थ का पवित्रतट एक हिंसक युद्धक्षेत्र में बदल गया जहां यादव एक दूसरे पर निर्मम्ता से
03:19प्रहार कर रहे थे
03:22क्रोध और नशे में अंधे होकर उन्होंने पत्थर, लाठी और अपने ही शरीर को शस्त्र बना कर एक दूसरे पर
03:29निर्दई वार करना शुरू कर दिया
03:33भगवान श्रीक्रिष्न अपने हृदय में अथाह पीडा लिये, अपने ही वंश को मदिरा और शाप के प्रभाव में पूरी तरह
03:40से आत्मविनाश करते हुए निहारते रहे
03:44मदिरा के तीवर प्रभाव में यादवों के बीच दशकों पुराने द्वेश और गुप्ट शत्रुताए अब खुले तौर पर सतह पर
03:52आने लगी, हर आखों में एक हिंसक चमक तैरने लगी थी
03:57इसी उन्मादपूर्ण वातावर्ण में वीर सात्यकी की रक्तलाल आखें सहसा कृत्वर्मा पर जाटी की, जिसके प्रती उनका मन महाभारत के
04:06काल से ही घ्रिना से भरा हुआ था
04:09मदिरा के नशे और पूर्व के कटू अनुभवों से धधकते हुए, सात्यकी ने कृत्वर्मा की ओर कदम बढ़ाए, उनके मुख
04:17पर एक खतरनाक मुस्कान खेल रही थी जो आसन्न क्रोध का संकेत थी
04:23सात्यकी ने अपनी भारी आवाज में कृत्वर्मा को एक कायर कायर कहकर पुकारा, उसके महाभारत युध के दौरान रात के
04:32अन्धेरे में सोते हुए वीरों पर किये गए हमलों की याद दिलाते हुए
04:37क्रोध में धूद सात्यकी ने कृत्वर्मा पर आरोप लगाया कि वह योध्धा नहीं, बलकि एक नीच हत्यारा है, जिसने सोते
04:45हुए पांडवों के पुत्रों की निर्मम्ता से हत्या कर दी थी
04:50क्रित्वर्मा सात्यकी के तीखे आरोपों और अपमान से बौखला कर क्रोध से लालपी लाहो उठा और अपनी आत्मरक्षा में पलटवार
04:59करते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी
05:02सात्यकी कृत्वर्मा की प्रतिक्रिया से और भी अधिक उत्तेजित होकर उसके कायरता पूर्ण कृत्यों को बार-बार दोहराता रहा, उसकी
05:11प्रतिष्ठा को सार्वजनिक रूप से रौंदता रहा
05:15शब्दों की लड़ाई जल्दी ही नियंत्रन से बाहर हो गई और नशे में धूत सात्यकी ने एक भयानक दहाड के
05:22साथ कृत्वर्मा की ओर जप्ता, उसकी आखों में केवल प्रतिशोध की ज्वाला थी
05:28सात्यकी ने ततकाल पास पड़े एक तूटे हुए बर्तन के नुकीले टुक्डे को उठाया, जो अब उसके क्रोधित हाथों में
05:36एक घातक हथियार बन गया था
05:39एक क्षण भी बर्बाद किये बिना, सात्यकी ने उस नुकीले टुक्डे से कृत्वर्मा पर वार किया, जिससे प्रभास तीथ की
05:47धर्ती पर एक और भयावा रक्तपात की शुरुआत हुई
05:52कृत्वर्मा, सात्यकी के अप्रत्याशित और घातक वार से लहू लुहान होकर, अपनी अंतिम सास लेते हुए पवित्र प्रभास तीर्थ की
06:00रेट पर लुढक गया, उसके जीवन की जोती बुच चुकी थी
06:05कृत्वर्मा के पतन ने उसके समर्थकों में एक उनमादी क्रोध जगा दिया, जिन्होंने तुरंथ सात्यकी पर पलटवार करने के लिए
06:13हथियार उठा लिये, जिससे एक और रक्त पिपासु संधर्ष छेड़ गया
06:19सात्यकी अपने हत्यारे क्रोध में अभी भी धूत, कृत्वर्मा के क्रोधित समर्थकों पर तूट पड़ा, एक के बाद एक कई
06:27लोगों को अपने हाथ से मार गिराया
06:30प्रभास तीर्थ की पवित्र भूमी पर वीर यादव योध्धाओं के शवों का धेर लगने लगा, जिन्होंने एक दूसरे पर नफरत
06:38और नशे की धुन में हमला किया था
06:41यह खौफनाक ग्रिश देखकर बलराम जी का हृदय पीड़ा से विदीर्न हो गया, वे अपने ही वंश का इस तरह
06:49विनाश होते देख स्तंभित रह गए
06:52भगवान श्रीकृष्ण गहरी पीड़ा और शांत करुणा से भरे हुए, अपने कुल के इस आत्मधाती युद्ध को विवश होकर देखते
07:00रहे, जानते हुए कि यह ब्रह्मा के विधान का अटल परिनाम है
07:06सात्यकी और कृत्वर्मा के समर्थकों के बीच की यह प्रारंभिक जड़क जंगल की आग की तरह फैली, जिससे प्रभास तीर्थ
07:14में उपस्थित सभी यादवों के बीच हिंसक प्रतिशोध भड़क उठा
07:19वंश के विभिन गुट, पुरानी शिकायतों और शराब के नशे में अंधे होकर एक दूसरे पर तूट पड़े, जिससे प्रभास
07:27तीर्थ का पवित्र तट एक कतलेयाम में बदल गया
07:31कोई भी शांत नहीं रह सका, हर यादव योध्धा अपने ही भाई या पडोसी के खून का प्यासा हो गया,
07:38जैसे शाप ने उनके विवेग को पूरी तरह से निगल लिया हो
07:43देखते ही देखते, यादवों का यह ग्रहयुध एक अनियंत्रित बवंडर बन गया, जो अपने ही वंश को जड़ से मिटाने
07:51के लिए निकला था, और कोई भी इसे रोकने में सक्षम नहीं था
07:56वंश के विभिन गुट, पुरानी शिकायतों और शराब के नशे में अंधे होकर एक दूसरे पर तूट पड़े, जिससे प्रभास
08:04तीर्थ का पवित्र तट एक कतलेयाम में बदल गया
08:08कोई भी शांत नहीं रह सका, हर यादव योद्धा अपने ही भाई या पडोसी के खून का प्यासा हो गया,
08:15जैसे शाप ने उनके विवेक को पूरी तरह से निगल लिया हो
08:20देखते ही देखते, यादवों का यह ग्रहयुद्ध एक अनियंत्रित बवंडर बन गया, जो अपने ही वंश को जड़ से मिटाने
08:28के लिए निकला था, और कोई भी इसे रोकने में सक्षम नहीं था
08:33जमीन पर उगी हुई इरका नामक जंदली घास, जो तब तक एक मूख दर्शक थी, अब इस विनाशलीला का एक
08:40क्रूर साधन बनने वाली थी
08:44जैसे ही एक क्रोधित यादव योध्धाने, जिसका विवेक शराब और प्रतिशोध ने पूरी तरह ग्रस लिया था, जमीन से इरका
08:52घास का एक बड़ा गुच्छा उखाड़ा, उसे हथियार समझ कर फेंका
08:57परन्तु जैसे ही उसने उसे हवा में उच्छाला, शाप के प्रभाव से वह साधारन घास पलक जपकते ही एक भयंकर
09:05लोहे के मूसल में बदल गई, जिसकी धार सूर्य की अंतिम किर्णों में चमक उठी
09:12स्तब्ध और भयभीत होने के बावजूद, उस यादव ने बिनाक्षन गवाए उस नवनिर्मित घातक शस्त्र से अपने ही एक परिजन
09:20पर वार कर दिया, जिससे रक्त का फववारा फूट पड़ा
09:24यह चमतकार देख, बाकी यादव योध्धा पहले तो क्षन भर के लिए ठिठक गए, उनकी नशे में धुत्त आखें इस
09:32अकलपनिय परिवर्तन को समझने की कोशिश कर रही थी
09:36लेकिन शाप की माया इतनी प्रबल थी की क्षन भर में ही उनका संशय समाप्थ हो गया और उन्होंने भी
09:44उसी घास को उखाड़ना शुरू कर दिया
09:47प्रभास तीर्थ की पवित्र भूमी पर हर उखाड़ा गया धास का तिनका लोहे के धारदार शस्त्र में बदलता गया
09:54जैसे भूमी स्वय अपने विनाश के उपकरण पैदा कर रही हो
09:59पवित्र तट पर अब केवल धातु के टकराने की करकश ध्वनी घायलों की चीखें और मरने वालों की कराहें गूंज
10:07रही थी
10:07जो पहले केवल मुठी भर और मौखिक युद्ध था
10:12शाप का प्रभाव इतना गहरा था कि उन्होंने अपने ही खून को पहचानना छोड़ दिया था
10:18और हर चहरा उनके लिए एक दुश्मन का चहरा बन गया था
10:23पिता पुत्र पर भाई भाई पर मित्र मित्र पर निर्दैता से प्रहार कर रहे थे
10:29जैसे कि उन्हें कोई अद्रिश शक्ती नियंत्रित कर रही हो
10:33पवित्र प्रभास तीर्थ का तट अब शवों और रक्त के प्रवाह से लाल हो चुका था
10:39जहां हर कदम पर एक यादव का अंठ हो रहा था
10:43भगवान श्रीकृष्ण अपनी दिव्य मुस्कान खोकर इस भयावा आत्मघाती लीला को गहरे दुख और विवशता के साथ देख रहे थे
10:52उनकी आखें अपने ही बंश के विनाश को सह रही थी
10:56वे जानते थे कि यह शाप अटल था और इसे रोकने की अब कोई शक्ती नहीं थी
11:02यह उनके दिव्य योजना का ही एक अप्रिहार्य अंश था
11:07बलराम जिनके चहरे पर पहले कभी चिन्ता की चाया नहीं दिखती थी
11:12अब इस आत्मगाती युद्ध को देखकर अत्यंत विचलित और गहरे दुख से भरे हुए थे
11:19अपने वंश का ऐसा क्रूर अंत देखकर बलराम ने भी संसार से विदा लेने का निश्चय कर लिया
11:25और वे युद्ध भूमी से दूर एक शांत स्थान की ओर बढ़ने लगे
11:30वे समुद्र तट पर एक एकांत स्थल पर पहुँचे जहां उन्होंने अपनी आखे मूंदली और गहन समाधी में लीन हो
11:39गए
11:39उनका मन परम शांती की ओर उनमुख हो गया
11:43और फिर उनके मुख से एक विशाल श्वेच सर्प शेशनाग प्रकट हुआ
11:48जो धीरे धीरे उनके शरीर से बाहर निकल कर दिव्य चमक बिखेरता हुआ समुद्र की गहरायों में विलीन हो गया
11:55जिससे बलराम का महाप्रयान संपन हुआ
11:59अपने प्रिय अगरज बलराम के महाप्रयान को अपनी आखों के सामने घटित होते देख
12:04भगवान श्री कृष्ण की आखों में अगाध शांती और एक गहरा मौन स्विकार भाव भर गया
12:12उन्होंने प्रभास तीर्थ की रक्तरंजित भूमी पर बिखरे यादवों के शवों की ओर देखा
12:18जहां उनके वंश का विनाश नेती के कठोर हाथों से लिखा गया था
12:23उनके शांत चित में रिशियों के शाप की गूंच सुनाई दे रही थी
12:27जो आज इस भूमी पर अपनी अंतिम परिंती पा रही थी
12:32उन्होंने अनुभव किया कि अब उनका प्रिथवी पर लीला समाप्त करने का समय निकट आ गया है
12:38और यह सहार उसी महालीला का अंतिम अध्याय था
12:43तभी उनके प्रियसार्थी दारुक, जिन्होंने इस भीशन युद्ध में किसी तरह स्वयं को बचाया था, भैभीत और व्याकुल होकर उनके
12:52पास पहुँचे
12:54भगवान श्रीकृष्ण ने दारुक को निर्देश दिया कि वह द्वार का जाकर उनके परिजनों को सूचित करे और उन्हें हस्तिनापूर
13:02जाकर पांडवों के संरक्षन में रहने का आदेश दे
13:07आज्या पाकर दारुक ने भारी मन से उन्हें प्रणाम किया और अंतिम बार अपने प्रभो की ओर देख अश्व पर
13:14सवार होकर द्वार का की ओर तेजी से बढ़ चला
13:18अब भगवान श्री कृष्ण उस विस्त्रित मौन रणभूमी में अकेले थे जहां उनके पूरे वन्ष का अंथ हो चुका था
13:27उन्होंने अपने कमल समान नेत्रों को शांत भाव से बंद किया और समस्थ सांसारिक मोह से मुक्त होकर एक धने
13:35वन की ओर प्रस्थान किया
13:36वन में एक प्राचीन पीपल व्रिक्ष के नीचे उन्होंने शांतिपूर्वक अपने शरीर को त्यागने का निश्चय किया जहां उन्होंने ध्यान
13:46मुद्रा में आसन ग्रहन किया
13:49उनके चरण जो कमल के समान कोमल और दिव्य आभा से युक्त थे, हलके से एक दूसरे पर रखे हुए
13:56थे, जिससे एक मनमोहक द्रिश्य बन रहा था
14:00उसी वन में जरा नामक एक शिकारी, जो हिरन का शिकार करने निकला था, अपनी धनुश बान लिये हुए धीरे
14:08-धीरे आगे बढ़ रहा था
14:10उसने दूर से पीपल व्रिक्ष के नीचे बैठी आकरिती के कमलवत चर्णों को हिरन का मुख समझ लिया, जिसकी चमक
14:18ने उसे भ्रमित कर दिया था
14:21बिना एक क्षण भी गवाए, शिकारी जरा ने अपना धनुश उठाया और अपने विशैले बान को जिसे उसने विशेश रूप
14:29से बनाया था, लक्षे की ओर साधा
14:32बान तीवर गती से आगे बढ़ा और सीधा भगवान श्री कृष्ण के कोमल चरण को भेदता हुआ, उनके दिव्य शरीर
14:40में गहरा समा गया
14:42बान लगने के बावजूद भगवान श्री कृष्ण के मुख पर कोई पीडा या क्रोध नहीं था, बलकी एक अध्भुत शान्ती
14:50और चिरंतन मुस्कान बनी रही
14:53अपनी गल्ती का एसास होते ही, शिकारी जराभय और पश्चाताप से काप उठा, जब उसने देखा कि उसने कोई हिरन
15:02नहीं, बलकी स्वयन जगत के पालक को घायल कर दिया था
15:06भगवान श्रीकृष्ण ने जरा को सांत्वना दी और उसे बताया कि यह घटना पूर्व निर्धारित थी और यह उनके धर्ती
15:14पर अपनी लीला समाप्त करने का ही एक हिस्सा है
15:19यह कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने शरीर को त्यागना आरंभ किया, उनका दिव्य स्वरूप धीरे-धीरे अपने भौतिक आवर्ण से
15:28मुक्त होकर उपर उठने लगा
15:31और फिर एक दिव्य प्रकाश पुंज में विलीन होते हुए भगवान श्रीकृष्ण का आत्मा परम ब्रह्मा में समा गया, जिससे
15:39उनके प्रिथ्वी पर की लीला का भव्य समापन हुआ
15:43भगवान श्रीकृष्ण के परमधाम गमन को देखकर बलवान बलराम जिनकी आखें विशाल और रक्तवर्ण थी तथा जिनके वस्त्र नीले थे,
15:53उस भयानक और रक्तपात भरे यादव सहार के अप्रत्याशित द्रिश को गहरी पीरा और शांत अस्वीकृती के साथ निह
16:02इस पावन प्रसंग में बलराम का महाप्रयान आदिशेश में विलय की महिमा का वर्णन किया गया है।
16:34उन्होंने उस भयावध द्रिश को देखा, जहां उनके अपने ही बंधु एक दूसरे के रक्त में सने हुए पड़े थे,
16:41जिससे उन्हें अपने जीवन के उद्देश्य और प्रित्वी पर लीला के अंत की निश्चित्ता का बोध हुआ।
16:48इस पावन प्रसंग में बलराम का महाप्रयान आदिशेश में विलय की महिमा का वर्णन किया गया है।
16:57बलराम ने गहन चिंतन में अपनी आखें बंद की और उन्हें ग्यात हुआ कि अब उनका समय भी प्रित्वी लोग
17:04से जाने का आ गया है क्योंकि श्री कृष्ण के बिना यह संसार उनके लिए सूना था।
17:10इस पावन प्रसंग में बलराम का महाप्रयान आदिशेश में विलय की महिमा का वर्णन किया गया है।
17:18शांत मन और अविचल संकल्प के साथ बलराम जो शक्तिशाली हल और मुसल धारन करते थे एक एकांत स्थान पर
17:26विशाल सागर के किनारे एक प्राचीन वटवरिक्ष के नीचे गहन योग मुद्रा में बैठ गए।
17:32इस पावन प्रसंग में बलराम का महा प्रयान आदिशेश में विलय की महिमा का वर्णन किया गया है।
18:04जैसे जैसे उनकी समाधी गहरी होती गई, उनके शरीर से एक असाधारन दिव्य प्रकाश उत्सर्जित होने लगा, जो आसपास के
18:13वातावर्ण को एक शांट अलौकिक आभा से भर रहा था।
18:18इस पावन प्रसंग में बलराम का महा प्रयान आदिशेश में विलय की महिमा का वर्णन किया गया है।
18:26उनके योग बल से उनकी चेतना धीरे-धीरे उनके नश्वर शरीर से उपर उठने लगी एक अद्रिश्य उर्जावान खिंचाव के
18:35साथ।
18:36इस पावन प्रसंग में बलराम का महा प्रयान आदिशेश में विलय की महिमा का वर्णन किया गया है।
18:44और फिर एक अविश्वसनिय और दिव्य घटना के रूप में उनके मुख से एक अत्यंत विशाल चमकदार श्वेट सर्प धीरे
18:52-धीरे प्रकट होने लगा, जिसकी त्वचा मोतियों सी चमक रही थी।
18:57इस पावन प्रसंग में बलराम का महाप्रयान आदिशेश में विलय की महिमा का वर्णन किया गया है।
19:05वह श्वेट सर्प जो स्वय आदिशेश का अंश्था बलराम के शरीर से पूरी तरह बाहर निकलाया, एक दिव्य चमक और
19:14अपरतिन गरिमा के साथ।
19:16इस पावन प्रसंग में बलराम का महाप्रयान आदिशेश में विलय की महिमा का वर्णन किया गया है.
19:24बलराम का पार्थिव शरीर अब एक खाली दिव्य प्रकाश से युक्त खोल मात्र रह गया था, जिससे उनकी आत्मा और
19:32शक्ती का पूर्णत्या विमोचन हो चुका था.
19:36इस पावन प्रसंग में बलराम का महाप्रयान आदिशेश में विलय की महिमा का वर्णन किया गया है.
19:44धीरे धीरे वह विशाल श्वेच सर्प अपनी अध्भुत चमक के साथ सागर की ओर रेंगने लगा, उसकी गती में एक
19:52अलोकिक शांती और द्रिडता थी.
19:55इस पावन प्रसंग में बलराम का महाप्रयान आदिशेश में विलय की महिमा का वर्णन किया गया है.
20:03उसका विशालकाई शरीर सागर के तट पर पहुँचते ही, उसने अपनी शक्तिशाली फुंकार के साथ लहरों को चीरते हुए गहरे
20:12नीले जल में प्रवेश करना प्रारंब किया.
20:15इस पावन प्रसंग में बलराम का महाप्रयान आदिशेश में विलय की महिमा का वर्णन किया गया है.
20:23जैसे ही वह सागर की गहराई में उतरता गया, उसका दिव्य प्रकाश पानी के भीतर एक स्वर्णिम मार्ग बनाता गया,
20:31जो उसकी वापसी के मार्ग को प्रकाशित कर रहा था
20:35इस पावन प्रसंग में बलराम का महा प्रयान आदिशेश में विलय की महिमा का वर्णन किया गया है
20:43सागर के अतल गहराई में पहुँचकर वह दिव्य सर्प अपने मूल और अनन्त स्वरूप सहस्त्रशीश आदिशेश जहां भगवान विश्नु विश्राम
20:52करते हैं में विलीन होने के लिए प्रयासर्थ था
20:56इस पावन प्रसंग में बलरान का महाप्रयान आदिशेश में विलय की महिमा का वर्णन किया गया है
21:05धीरे धीरे वह श्वेट सर्प अदिशेश के असीमित देह में समाहित हो गया जैसे एक गूंद सागर में मिल जाती
21:12है जिससे अदिशेश का गौरव और अधिक बढ़ गया
21:16इस पावन प्रसंग में बलरान का महाप्रयान आदिशेश में विलय की महिमा का वर्णन किया गया है
21:25और इस प्रकार बलराम का महाप्रयान पूर्ण हुआ, उनकी चेतना आदिशेश के अनंत स्वरूप में विलीन होकर ब्रहमांड के आधार
21:33स्तंभ के रूप में अपनी भूमिका में लोट आई
21:37इस पावन प्रसंग में बलराम का महाप्रयान आदिशेश में विलय की महिमा का वर्णन किया गया है
21:45बलराम जी के महाप्रयान के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण प्रभास छेत्र के शांत और निर्जन वन में अकेले खड़े होकर यदुवन्ष
21:54के विनाश पर विचार करने लगे
21:57उसी क्षण महाविनाश की लप्टों से बचकर निकले उनके निष्ठावान सार्थी दारुक हाहाकार करते हुए अपने प्रभु को खोचते हुए
22:05बहां पहुँचे
22:07अपने परम आराध्य और स्वामी श्रीकृष्ण को सुरक्षित देखकर दारुक की आखों से आसुओं की धारा बहने लगी और वे
22:15उनके समीप दोडे
22:18दारुक ने तुरंत भगवान के चर्णों में अपना सिर रख दिया और सुबक्ते हुए कहा कि यदुवन्शियों के बिना यह
22:25संसार उनके लिए अंधकार्मय हो गया है
22:29करुणा सिंधु श्री कृष्ण ने अपने प्रिय सार्थी को सहारा देकर भूमी से उठाया और उनके हृदय को सांत्वना देने
22:37के लिए उनके सिर पर अपना दिव्या हाथ रखा
22:41भगवान ने गंभीर और मधुरवानी में कहा कि यह सब काल की अग्रिश्य शक्ती के कारण हुआ है जिसे कोई
22:49भी टाल नहीं सकता था
22:51श्री कृष्ण ने दारुक से कहा कि यदुवंश का लीला समवरन पूर्ण हो चुका है और अब उनके स्वयंके इस
22:58लोग से प्रस्थान का समय भी आ गया है
23:02इसके बाद श्री कृष्ण ने दारुक को अपना अंतिम और अत्यंत महत्वपूर्ण आदेश देते हुए हस्तिनापूर जाने का निर्देश दिया
23:12भगवान ने कहा दारुक तुम बिना विलंब किये हस्तिनापूर जाओ और पांडवों विशेश कर मेरे परम सखा अर्जुन को इस
23:21महाविनाश की सूचना दो
23:23उन्होंने दारुक को समझाया कि द्वारका में जो भी व्रिद्ध, स्त्रिया और बालक जीवित बचे हैं उनकी सुरक्षा का भार
23:31अब केवल अर्जुन ही उठा सकते हैं
23:35श्रीकृष्ण ने एक अत्यंत गंभीर चेतावनी दी की उनके इस लोक से जाते ही समुद्र की विशाल लहरें द्वारका पुरी
23:43को अपने भीतर डुबो देंगी
23:46इसलिए अर्जुन को तुरंत द्वार का पहुँचकर सभी जीवित नगरवासियों को सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिए कहना होगा
23:55भगवान के वचनों को सुनकर दारुख का हृदय भराया और उन्होंने कापती हुई आबाज में पूछा की वे अपने प्राणप्रिय
24:03प्रभु को इस निर्जन वन में अकेला छोड़ कर कैसे जा सकते हैं
24:09श्री कृष्ण ने दारुख को गले लगाया और उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि कर्तव्य का पालन ही इश्वर की
24:16सच्ची आराधना है
24:19भगवान ने दारुख को अपने विराठ स्वरूग का स्मरण कराते हुए कहा कि वे सदैव उनके हृदय में निवास करेंगे
24:26इसलिए शोग का त्याग करें
24:29इस परम ज्ञान को प्राप्त कर दारुख ने अपने आसूओं को पोच्छा और भगवान की अंतिम आग्या को शिरोधार्य किया
24:38दारुख ने रोते हुए मन से भगवान श्री कृष्ण की तीन बार परिक्रमा की और उनके चर्णों में अंतिम बार
24:45वंदन किया
24:46फिर वे अपने दिव्यरत पर आरूढ हुए और नम आखों से पीछे मुड़कर अपने स्वामी को देखते हुए हस्तिनापूर की
24:55ओर तीवरता से प्रस्थान कर गए
24:58रत की धूल धुन्धली होने तक भगवान श्री कृष्ण वहीं खड़े रहे और फिर वे एकांत में आगे की लीला
25:05के लिए वन के भीतर चले गए
25:08अंतह परमेश्वर श्री कृष्ण एक शांत स्थान पर बैठ गए और अपने दिव्य स्वरूप में लीन होकर अपने अंतिम महाप्रयान
25:16की प्रतीक्षा करने लगे
25:19परमेश्वर श्रीकृष्ण एक शांत वनस्थली में अपने अंतरध्यान में लीन कालचक्र के अंतिम मोड की शांति पूर्वक प्रतीक्षा कर रहे
25:28थे, जहां उनकी अंतिम पार्थिव लीला पूर्ण होनी थी
25:33उधर्क द्वारका के समस्त यादव, प्रभु के आदेशानुसार, प्रभास तीर्थ के पवित्र तटों की ओर, दान, स्नान और तपस्या के
25:41संकल्प के साथ उच्साह पूर्वक प्रस्थान कर रहे थे
25:46प्रभास के रमनिये तट पर पहुँचकर, यादवों ने भव्य उच्सवों का आयोजन किया, जहां रित्यत, संगीत और दानपुने का वातावर्ण
25:54चारों और व्याप्थ हो गया
25:57किन्तु पुने कर्मों के बीच ही, मदिरापान का प्रचलन बढ़ गया, जिसने उच्सव की मर्यादा भंकरनी शुरू कर दी और
26:05विवेक पर अंधकार छाने लगा
26:08नशे की धुन में, पुराने वैर और छोटी-छोटी बाते भी विक्राल रूप लेने लगी, और यादवों के मुख से
26:15कटू वचन निकलने लगे, जो उनके नाश का मार्ग प्रशस्त कर रहे थे
26:21अचानक एक अद्रिश्य शक्ती ने प्रभास के तट पर उगी साधारन एर का घास को लोहे के तीक्षन मुसलों में
26:28परिवर्तित कर दिया, जो उनके क्रोध और विनाश का प्रतीक बन गए
26:33शन भर में एक क्रोधित यादव ने परिवर्तित मुसल उठाया और अपने ही वन्ष के एक सदस्य पर घातक प्रहार
26:41कर दिया, जिससे रक्तपात और अराजकता का भयावः अध्याय आरंभ हो गया
26:47भगवान बलराम अपने श्वेत और तेजस्वी स्वरूप में इस अकल्पनिय ग्रहयुद्ध को देखकर स्थब्ध और हताश खड़े थे, उनके दिव्य
26:56नेत्रों में अथाह वेदना और अश्रु भराय थे
27:00अपनी भुजाओं को फैला कर बलराम ने उन-उनमत यादवों को रोकने का प्रयास किया, किन्तु मदिरा और क्रोध में
27:08अंधे हुए वे उनकी दिव्य उपस्थिती को भी अंदेखा कर गए
27:12जब सारे प्रयास विफल हो गए और यादवों का उनमाद चरम पर पहुँच गया, तब बलराम ने अपनी आशा खोदी
27:20और नेती के इस क्रूर खेल के सामने स्वयन को असहाय पाया
27:25अंतर योगमाया से युक्त बलराम ने इस मरंशील संसार को त्यागने का निश्चय किया और उनके मुख से एक विशाल
27:33सहस्रमुखी श्वेट सर्प, शेशनाग, प्रकट होकर पाता लोग की ओर अग्रसर हुआ
27:40अपनी एकांत लीला में लीन प्रभु श्रीकृष्ण को अपने जैश्ट भ्राता बलराम के महाप्रयान और यादवों के संपूर्ण सहार का
27:48आभास दिव्यद्रिष्टी से हो गया, जिससे उनका हृदय विदीर्ण हो गया
27:54अपनी दिव्य एकागरता से बाहर आकर भगवान श्रीकृष्ण, शोक और नेती के भारी बोज तले, तक्तरंजित और शांत प्रभास तीर्थ
28:03की और दृत गती से बढ़े, जहां केवल मृत्यु का सन्नाटा पसरा था
28:09उन्होंने अपने प्रिय वन्ष के अंतिम अवशेशों को देखा, चारों और बिखरे हुए शव, तूटे हुए रत और शस्त्र, जो
28:17नेती की क्रूरता और उनके ही श्राप की परिंती का मौन प्रमार थे
28:22अपने वन्ष के विनाश को अपनी आखों से देख कर, श्री कृष्ण ने प्रभास के उस भयावह स्थल से मुख
28:29मोडा और एक घने वन की ओर अंतिम गंतव्य की तलाश में प्रस्थान किया
28:35अंतह एक शान्त और एकांत स्थल पर एक विशाल वटवरिक्ष के नीचे उन्होंने शान्ति पूर्वक आसन ग्रहन किया, अपने अंतिम
28:44महाप्रयान के लिए स्वयं को पूर्णतह तयार करते हुए
28:49उसी समय जारा नामक एक भील शिकारी धनुषबान लिये मृग्या की तलाश में उसी घने वन से होकर धीरे धीरे
28:57आगे बढ़ रहा था
28:59वन में श्री कृष्ण के पैर के कमलवत तलवे को एक हिरन के मुख के समान देखकर, जारा ने अंजाने
29:06में अपना धनुष उठाया और अचूक निशाना साधा
29:11बिना किसी संशय के, जारा ने अपने धनुष की प्रत्यंचा खीची और घातक बान को श्री कृष्ण के कोमल चर्णों
29:19की ओर छोड़ दिया, जो नेती की अद्रिश्य योजना का एक हिस्सा था
29:24बान ने प्रभु के दिव्य चरण को भेदा, और उसके बाद जारा ने अपने सामने भगवान श्री कृष्ण के पूर्ण
29:31स्वरूप को देखा, जिससे वह भय और पश्चाताप से काप उठा
29:37अपने तीक्ष्ण बान से प्रभु के चरण को बिंधा देख कर, बहेलिया जारा अत्यंत शुकाकुल हो उठा और श्री कृष्ण
29:44के चरणों में गिरकर बिल्ख बिलख कर क्षमा मांगने लगा
29:49परम दयालू श्री कृष्ण ने अपने नेत्र खोल कर जारा की ओर देखा और मंद मुस्कान के साथ उसे आश्वस्त
29:56किया कि यह घटना केवल नेती की पूर्व निर्धारित योजना का भाग थी
30:02श्री कृष्ण ने जारा को उसके पूर्व जन्म का स्मरण कराते हुए कहा कि त्रेतायुग में बाली के रूप में
30:09छिपकर मारे जाने कारिन आज इस बान के माध्यम से पूर्ण हो गया है
30:15भगवान के दिव्य वचनों को सुनकर जारा का सारा भय और पश्चाताप मिट गया और वह प्रभु की आज्या पाकर
30:22परमधाम की प्राप्ती के लिए विदा हुआ
30:25जारा के प्रस्थान के पश्चात श्रीकृष्ण प्रभास तीर्थ में पवित्र सरस्वती नदी के तटपर स्थित उस विशाल पीपल व्रिक्ष के
30:34नीचे पूर्णत है एकांत में बैठ गए
30:38तटपश्चात प्रभु श्रीकृष्ण ने अपने चतुर्भुज नारायन स्वरूप को प्रकट किया जिसमें उनके हाथों में शंक, चक्र, गदा और पद्म
30:47सुशोभित हो रहे थे
30:49संपूर्ण ब्रहमांडिय आकाश में अलौकिक कांती फैलने लगी और मेगों में सुनहरे और बैंगनी रंगों की दिव्यत अरंगे लहराने लगी
30:59भगवान श्रीकृष्ण ने अपने कमल समान नेत्रों को मुदलिया और अपने योगबल द्वारा संपूर्ण स्रिष्टी की उर्जा को अपने भीतर
31:07समेटना प्रारंभ किया
31:10महाकाल और समय के दिव्य प्रतिनिधी हाथ जोड़ कर थोड़ी दूरी पर खड़े हो गए प्रभु के अंतिम संकेत की
31:17प्रतीक्षा करने लगे
31:20अंतरिक्ष में देवगण, गंधर्व और अपसराएं एकत्र होने लगी और उन्होंने आकाश से पारिजात तथा मंदार के सुगंधित पुष्पों की
31:29वर्षा आरंभ कर दी
31:31चार मुखों वाले ब्रहमाजी अपने दिव्यहंस वाहन पर सवार होकर महर्शी नारद और अन्य प्रजाप्तियों के साथ इस परम्क्षन के
31:40साक्षी बनने पहुँचे
31:42भगवान शिव अपने व्रिशब नंदी पर देवी पार्वती के साथ पधारे और अपने इष्टदेव श्री कृष्ण के इस अलोकिक रूप
31:51के दर्शन कर भाव विभोर हो गए
31:54स्वराट इंद्र और सभी दिगपाल अपने-अपने अलोकिक वाहनों पर स्थित होकर हाथ जोड कर श्री कृष्ण की लीलाओं का
32:01स्थुतिगान करने लगे
32:03श्री कृष्ण के श्री विग्रह से एक प्रचंड और सर्वव्यापी सुवर्ण कांती उत्पन हुई जिसने सम्पून प्रभास शेत्र और तीनों
32:12लोकों को आलोकित कर दिया
32:15प्रित्वी, जल, अगनी, वायू और आकाश, पाचों महाभूत प्रभु के चर्णों में नत्मस्तक होकर उस भौतिक देह के तत्वों को
32:23अपनी शरण में स्विकार करने लगे
32:26सुदर्शन चक्र, पंचजन्य शंक और प्रभु के समस्ट अस्त्रशस्त्र अपने अपने दिव्य स्वरूकों को धारण कर वैकुंठ धाम की ओर
32:35अग्रसर हुए
32:37श्रीकृष्ण का वह सच्चिदानंद विग्रह धीरे धीरे पंचभौतिक ग्रिष्टी से उजल होकर केवल शुद्ध जोतिर्मय प्रकाश के रूप में परिनत
32:45होने लगा
32:47स्वर्ग लोक में देवदुन्दुभिया बज उठीन और शंकध्वनी की मंगल गूंच से दिशाविदिशाय गुंजायमान हो गई
32:55भगवान श्रीकृष्ण का वहपरम जोतिर्मय स्वरूप प्रित्वी मंडल और सूर्य मंडल को भेदता हुआ सीधा नित्य वैकुंठ धाम की और
33:04प्रस्थान कर गया
33:06प्रभास छेत्र में चारों और एक अलौकिक स्थब्धता और परमशान्ती चा गई जिससे श्रीकृष्ण के इस प्रित्वी पर लीलावतार का
33:15पूर्ण समापन हुआ
33:17उस परमशान्ती के बीच प्रभास वन के एकांत कोने में भगवान श्रीकृष्ण का अप्रतिन देह अभी भी योगनिद्रा में लीन
33:25प्रतीत हो रहा था
33:27मानो समय भी उनके सामने ठहर गया हो
33:31तभी उस धने वन की खामोशी को चीरता हुआ
33:34जरा नामक एक व्याद अपनी शिकार की तलाश में धीमे कदमों से आगे बढ़ा
33:40उसकी पैनी द्रिष्टी वर्षों के अभ्यास से सधी हुई
33:44दूर दूर तक किसी भी हलचल को भाप लेती थी जो उसके जीविको पारजन का आधार थी
33:51जाडियों के एक पुंज के पीछे उसे कुछ असपष्ट सा दिखा
33:55एक ऐसा आकार जिसे उसकी शिकारी आखें अनजाने में एक हिरन का मुख मान बैठी
34:02वह वास्तव में भगवान श्री कृष्ण का कमल सा कोमल चरण था
34:07जिस पर अध्वितिय पद्मा का चिनह अनकित था और जो जाडियों के बीच से चमक रहा था
34:14नेती के विधान ने उसक्षन व्याध जरा की बुद्धी पर परदा डाल दिया
34:18और उसने उस दिव्य चरण को मुरिग का माया भी मुख समझ लिया
34:23बिना किसी संशय के उसने अपनी शिकारी प्रवृत्ती के अनुसार अपने धनुष पर एक तीक्षन बान चड़ाया
34:31जिसका लक्ष अब उस अध्रिश मृग का मुख था
34:35हवा में एक शनिक सन्नाटा चा गया
34:37मानो प्रकृती भी इस आकस्मिक और फेटफुल घटना की प्रतीक्षा कर रही हो
34:43एक हलकी सी सरसराहट के साथ बान धनुष से छूटा और अध्रिश गती से अपने लक्ष की ओर बढ़ चला
34:51जैसे नेती का संदेश वाहक हो
34:54उस बान ने भगवान श्री कृष्ण के कोमल चरण को भेद दिया
34:59जिससे नेती ने अपनी अंतिम लीला का सूत्रपात कर दिया
35:03अपनी शिकार को खोजने की उचसुकता में व्याध जरा जाडियों के पास पहुँचा
35:09जहां उसने अपने बान को लक्षे पर साधा था
35:13लेकिन जैसे ही परदा हटा उसकी आखे फटी रह गई
35:17सामने कोई म्रिग नहीं बलकी साक्षात भगवान श्री कृष्ण का दिव्य तेजस्वी रूप लेटा हुआ था
35:25अपनी भयंकर प्रुटी का बोध होते ही व्याध जरा भय और पश्चाताप से काम पता हुआ भगवान के चर्णों में
35:32मूर्चित होकर गिर पड़ा
35:35अश्रुधाराय उसकी आखों से बह निकली और वह बार-बार क्षमा याचना करने लगा है प्रभु
35:41यह मैंने क्या कर दिया मुझे एक शमा कर दें तब भगवान श्री कृष्ण ने अपने दिव्यस्वरूप में भी उसी
35:51शांट और मधुरवानी में व्याध जरा को सांत्वना दी
35:56उठो वत्स तुमने कुछ गलत नहीं किया यह तो नेती का विधान था जिसके द्वारा मेरा प्रिथवी पर अवतार पूर्ण
36:04हुआ है
36:07भगवान ने जरा को अपने धाम में स्थान प्रदान किया जिससे उसके सभी पापों का क्षय हो गया और उसे
36:14मोक्ष की प्राप्ती हुई
36:17ततपश्चात भगवान श्रीकृष्ण का वह पार्थिव शरीर भी एक अलोकिक जोती में विलीन हो गया ब्रहमाड में एक नए युग
36:24का संकेट देते हुए
36:27उधर प्रभास तीर्थ पर भगवान बलराम अपने अनुज श्रीकृष्ण के इस महाप्रयान को अपनी योगद्रिष्टी से अनुभव कर चुके थे
36:35और अब उनकी भी लीला समापन की वेला आ चुकी थी
36:40उन्होंने अपनी योगमाया से देह का त्याग किया और उनके मुख से एक विशाल श्वेट सर्प आदिशेश के रूप में
36:48प्रकट होकर समुद्र में समा गया जिससे प्रिथवी का भार हलका हुआ
36:53भगवान बलराम के महाप्रयान के पश्चात प्रभास तीर्थ का शांत समुद्र एक रहस्यमय सन्नाटे में डूब गया जहां अनंत शेशनाग
37:02के ब्रहमांडिय विस्तार की गूंज हवा में घुल मिल गई
37:06उसी क्षण स्वर्ग लोकों में देवगण जिनके मुख पर अचरज और भय के भाव स्पष्ट थे विश्णू के दोनों स्वरूपों
37:15के एक साथ अंतरध्यान होने के साक्षी बने जिससे उनके दिव्य सामराज्यों में एक अभूत पूर्व कमपन फैल गया
37:23प्रभास तीर्थ पर बचे हुए यादव अपने ही कृत्य और दोनों महाप्रभों के विलुप्त होने से स्थब्ध और भयभीत अब
37:31तक हुए विनाश को विचलित दृष्टी से देख रहे थे जहां उनके गर्व और अहंकार की राख मात्र शेश थी
37:39द्वारका नगरी में भी भयावह अशुब संकेत मंदराने लगे थे विशाल लहरिंग तट से टक्रा रही थी शहर की नीम
37:47काप रही थी और समुदरी तूफान की गर्जना अब पहले से कहीं अधिक तीवर हो गई थी
37:54कुछ वृद्ध और पुन्यात्मा यादवों ने इन संकेतों को देख कर समझा की रिशियों का शाप अब पूर्ण हो रहा
38:01है और द्वारका का अंत निश्चित है जिससे उनके हृद्यों में गहरा पश्चाताप और दुख भर गया
38:09समुद्र का जल धीरे धीरे द्वारका की नीची भूमी को निगलना शुरू कर चुका था शहर के किनारे के महल
38:16और मंदिर अब डूबने लगे थे जो आने वाले महाविनाश की स्पष्ट चेताबनी थी
38:23नगर के सामान्य निवासी अपनी आखों के सामने द्वारका को डूबते हुए देखकर भयावा आतंक में चीक उठे और अपनी
38:32थोड़ी भुद संपत्ती समेट कर भागने लगे परंतु भाग्य उनका साथ नहीं दे रहा था
38:38इसी बीच अर्जुन जिन्हें कुछ अप्रत्याशित आशंकाएं घेरे हुए थी तेजी से द्वारका की ओर आ रहे थे और दूर
38:47से ही उन्हें डूपती हुई नगरी का दर्धनाप द्रिश्य दिखाई देने लगा
38:52अर्जुन में तूटी हुई दिवारों और धेते हुए महलों के बीच द्वारका में प्रवेश किया जहां हर कदम पर उन्हें
38:59यादवों के अवशेश और सर्वत्र फैले विनाश के संकेट दिखाई दिये जिससे उनका हृदय विदीन हो उठा
39:07उन्होंने कुछ बची हुई महिलाओं और बच्चों को पाया जो अब पूरी तरह से असहाई और भयभीत थे अपने प्रियजनों
39:15और आश्रे को खोकर दिशाहीन भटक रहे थे
39:19अर्जुन को तब भगवान श्री कृष्ण का वह वचन याद आया कि वे द्वारका और उसके लोगों की रक्षा करेंगे
39:27और अब उन्हें अपने मित्र के चले जाने का भयानक शून्य और विश्व की अस्थिर्ता महसूस हुई
39:34उन्होंने शेश बची हुई यादव महिलाओं बच्चों और व्रिद्धों को तुरंत द्वारका से निकलने की तैयारी करने का आदेश दिया
39:42क्योंकि नगरी पलपल डूबती जा रही थी
39:46समुद्र का क्रोध चरम पर था, उंची लहरें इमार्तों को निगल रही थी, भव्य महल ताश के पत्तों की तरहे
39:53धै रहे थे और अमूल्य रत्न गहरे जल में समाते जा रहे थे
39:58अर्जुन ने इन बचे हुए लोगों को एक दर्दनाक जुलूस के रूप में द्वार्का से बाहर निकाला, पीछे मुर कर
40:05देखते ही उनके नेत्रों से अश्रुधारा बह निकली
40:10जैसे ही वे द्वार्का की सीमा से बाहर निकले, वह महानगरी पूरी तरहे से समुधर में समा गई, एक स्वर्ण
40:17युग के अंत और एक नए अनिश्चित काल के आरंभ का प्रतीक बन गई
40:23प्रवास के मार्ग पर शोक ग्रस्थ और ठके हुए बचे हुए लोगों पर लुटेरों के एक समुह ने हमला किया,
40:30जिन्होंने उनकी शेश बची संपत्ती और महिलाओं को छीनने का प्रयास किया
40:36अर्जुन अपने दिव्य अस्त्रों की शक्ती खो चुके थे और गहरे शोक में डूबे थे, फिर भी उन्होंने अपनी पूरी
40:43शक्ती से यादव महिलाओं की रक्षा के लिए युद्ध किया, परन्तु इस बार वह अजेय योद्धा नहीं थे
40:50कई महिलाएं और बच्चे लुटेरों के हमले में मारे गए और अर्जुन ने श्री कृष्ण के बिना अपनी शक्ती हीन्ता
40:57का अनुभव किया, यह समझते हुए कि अब वह अकेले इस विश्व का भार नहीं उठा सकते
41:04अंतह अर्जुन कुछ शेश बचे हुए यादवों के साथ हस्तिनापूर पहुँचे, जहां उन्होंने युधिष्थिर और अन्य पांडवों को यह हृदय
41:13विदारक समाचार सुनाया
41:16विद्ध पांडवों ने भारी हृदय से इस विनाशकारी समाचार और बचे हुए लोगों का स्वागत किया, यह समझते हुए कि
41:24उनके युग का भी अब अंतनिकट है और धर्म अपने सुख्षम रूप में समाहित हो रहा है