भागवत पुराण के इस अत्यंत भावुक और महत्वपूर्ण अध्याय में, हम भगवान श्रीकृष्ण की पृथ्वी से विदाई के अंतिम क्षणों को देखते हैं। प्रभास तीर्थ पर यादवों के विनाश के बाद, भगवान श्रीकृष्ण स्वयं अपने शरीर का त्याग करते हैं, जिससे पृथ्वी पर एक युग का अंत हो जाता है। इसके बाद अर्जुन द्वारका पहुँचते हैं और देखते हैं कि कैसे यह भव्य नगरी धीरे-धीरे समुद्र में समा जाती है। कृष्ण के बिना, अर्जुन की शक्ति का भी क्षय होने लगता है, जब एक साधारण भील लुटेरे उसके काफिले पर हमला करते हैं। यह एपिसोड एक नए युग के आगमन और दिव्य शक्ति के अप्रत्याशित परिवर्तन को दर्शाता है। #BhagavataPurana #KrishnaMahaprayana #DwarkaSubmerges #Arjuna #KaliYuga #HinduMythology #SpiritualJourney
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00:00प्रभास तीर्थ की रक्तरंजित भूमी पर भगवान श्री कृष्ण ने अपनी स्थिर द्रिश्टी से यादवों के आपसी सहार का भयावध
00:07द्रिश देखा, जहां काल की कुरूरता ने नेती का खेल रचा था।
00:12उन्होंने समझा की अब उनकी प्रिथवी पर लीला पूर्ण हो चुकी है और ब्रहमांदिय योजना के अनुसार अपने नश्वर शरीर
00:20का त्याग करने का समया गया है।
00:24इस गहन विचार के साथ वे उस स्थान से दूर एकांत की ओर चल पड़े जहां उन्हें अपनी अंतिम यात्रा
00:32की तैयारी करनी थी।
00:34चलते चलते वे एक विशाल प्राचीन वटवरिक्ष के नीचे पहुंचे जिसकी जड़े धर्ती में दूर दूर तक फैली हुई थी
00:42और जिसकी शान्ती ने उन्हें आकर्षित किया।
00:46वटवरिक्ष की छाया में उन्होंने अपने शरीर को विश्राम दिया, अपने दिव्य स्वरूप को नश्वर बंधनों से मुक्त करने की
00:53तैयारी करते हुए
00:56उनकी आखें धीरे से बंध हो गई और उनका शरीर आंतरिक प्रकाश से चमकने लगा, मानो ब्रहमांडिय उर्जा उनमें समाहित
01:04हो रही हो
01:06इसी समय जरा नामक एक भील शिकारी अपनी धनुशबान लिये शिकार की तलाश में उस घने जंगल में प्रवेश कर
01:14रहा था
01:16जरा की पैनी नजरे पेडो और जाडियों के बीच अपने शिकार को ढूंट रही थी, उसका ध्यान केवल जंगल के
01:23जीवन और अपनी अगली खोच पर केंद्रित था
01:27वह धीरे धीरे उस शांत वटवरिक्ष के पास पहुँच रहा था, जहां भगवान श्री कृष्ण विश्राम कर रहे थे, अभी
01:35तक अपनी अज्यानता में डूबा हुआ
01:38अचानक उसकी दृष्टी श्री कृष्ण के कमल चर्णों पर पड़ी, जो पत्तियों के बीच से हिरन के मुख की तरह
01:45दिख रहे थे
01:47बिना किसी संकोच के, शिकार की प्रवृत्ती से प्रेरित होकर, जरा ने अपने धनुष पर बान चड़ाया और निशाना साधा
01:56काल की क्रूर इच्छा से, जरा ने बान छोड़ दिया, जो अपने नियत लक्षे की और तेजी से बढ़ा
02:04बान ने उनके कोमल चरण को वेध दिया, जिससे हलका रक्त का प्रवाह हुआ, परंतु भगवान श्री कृष्ण के मुख
02:11पर कोई पीड़ा नहीं थी
02:14बान लगने पर उनकी आखें धीरे से खुली, एक शांत मुस्कान उनके अधरों पर फैल गई, मानों वे इस क्षण
02:22का अनादी काल से इंतजार कर रहे थे
02:25जरा अपने शिकार को देखने के लिए आगे बढ़ा, अभी भी अपनी घातक भूल से अंजान, परंतु उसके अंदर एक
02:33अनकही आशंका जागरित हो रही थी
02:37जैसे ही वह पास पहुँचा, उसने देखा कि एक दिव्य आकरिती बैठी हुई है, और उसका बान सीधे उस परंपुरुष
02:45के चरण में लगा था, भय और पश्चाताप की एक लहर ने उसे जकड लिया
02:51अपनी भूल का एसास होते ही, जरा कापते हुए धर्ती पर गिर पड़ा, उसके हाथ जोड कर काप रहे थे
02:58और उसकी आखों से अश्रुधारा बह रही थी
03:02उसने रोते हुए भगवान श्रीकृष्ण के चरण पकड़े, अपने अपराध के लिए क्षमा की भीख मांगी और अपनी घोर अज्ञानता
03:11पर विलाप किया
03:13भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम करुणा से उसे सांत्वना दी, उसे उठाते हुए उसके पूर्वजन्म के कर्मों का रहस्य समझाया,
03:22जिसने इस क्षण को नेती बना दिया था
03:25मोक्ष प्रदान करते हुए श्रीकृष्ण ने जरा को मुक्त कर दिया और स्वयं परमधान की ओर प्रस्थान की अंतिम तयारी
03:33में अपनी आखे बंद कर ली
03:36जरा के मोक्ष के पश्चात भगवान श्री कृष्ण ने अपनी आखे बंद कर ली उनकी दिव्य चेतना ब्रहमांडिय मौन में
03:44लीन होने को आतुर थी
03:47इसी गहन शान्ती के क्षण में एक भयंकर धूल का बवंडर उठाते हुए सार्थी दारुक का रत अंधाधुंध गती से
03:55उस ओर आता दिखाई दिया
03:57दारुक ने चारों और ग्रिष्टी डाली और प्रभास तीर्थ की भयावहता देखकर उसका हृदय काप उठा जहां यादवों के शव
04:06बिखरे पड़े थे और सर्वत्र विनाश का तांडव मचा हुआ था
04:10वह अपने स्वामी भगवान श्री कृष्ण को इस विनाश लीला में जीवित खोजने की हताश आशा में उनमादी होकर हर
04:18दिशा में भागने लगा
04:21अंतह एक विशाल वटवरिक्ष के नीचे उसने अपने आराध्य को गहरे ध्यान में लीन पाया जिनके शरीर पर बान का
04:29निशान स्पष्ट दिख रहा था
04:31यह द्रिश देखकर दारुक का हृदय विदीन हो गया और वह चीतकार कर भगवान के चर्णों में गिर पड़ा उसकी
04:39आखों से अविरल अशुरुधारा बहने लगी
04:43अपने स्वामी की ऐसी दशा देख दारुक ने बिलखते हुए उनके कमल चर्णों को पकड़ लिया और अपने दुर्भाग्य पर
04:50करोन क्रंदन करने लगा
04:53दारुक के विलाप से विचलित होकर भगवान श्री कृष्ण ने धीरे से अपनी कमल जैसी आखें खोली और करुणापूर्ण दृष्टी
05:01से उसे देखा
05:04भगवान ने अपनी दिव्यवानी में दारुक को सांत्वना दी, उसे नेती के अटल विधान को स्विकार करने और शांत रहने
05:11का आदेश दिया
05:14उन्होंने दारुक को र्यादवों के विनाश और अपने स्वयं के परमधाम प्रस्थान के बारे में बताया, समझाते हुए कि यह
05:21सब ब्रह्मान्दिय योजना का एक अनिवार्य अंग था
05:25तब भगवान ने दारुक को तुरंत द्वार का जाने और वहां बचे हुए अपने प्रियजनों को सूचित करने का निर्देश
05:33दिया
05:34उन्होंने दारुक को यह भी बताया कि उनके प्रस्थान के सात्वें दिन द्वार का नगरी समुदर में समा जाएगी, इसलिए
05:42सभी को सुरक्षित स्थान पर जाना होगा
05:46भगवान ने दारुक को वसुदेव, देवकी और बलराम की पत्नियों सहित सभी शेश परिवार जनों को हस्तिनापूर ले जाने का
05:54कार्य सौपा
05:56विशेश रूप से उन्होंने दारुक को हस्तिनापूर जाकर अर्जुन को इस विनाश और अपनी अंतिम लीला के बारे में सूचित
06:04करने का आदेश दिया
06:06इसके बाद भगवान ने दारुक को जीवन की क्षनभंगूरता, जन्म और मृत्यु के चक्र और सभी भौतिक बंधनों के मिध्यात्व
06:14पर गेहन उपदेश दिया
06:17उन्होंने समझाया कि भौतिक सुख और सांसारिक उपलब्धिया केवल भ्रम हैं, जो आत्मा को मोक्ष मार्ग से भटकाते हैं और
06:25क्षनभंगूर आनंद प्रदान करते हैं
06:29भगवान ने आत्मज्यान की परम आवश्शक्ता और अनन्य भक्ती के महत्व पर बल दिया, क्योंकि यही परम सत्य तक पहुँचने
06:37का एक मात्र मार्ग है
06:40अन्तिम उपदेश देने के बाद भगवान ने दारुक को बिना विलम किये अपने कर्तव्य पत पर आगे बढ़ने का आदेश
06:48दिया
06:49हृदय में गहन वेदना और कर्तव्य निष्ठा के साथ दारुक ने अपने आराध्य को अंतिम बार प्रणाम किया, उनकी कृपा
06:57को अपने हृदय में संजोते हुए
07:00और फिर दारुक ने भारी मन से रथ की ओर प्रस्थान किया, अपने स्वामी को उनके अंतिम एकांत क्षणों में
07:08अकेला छोड़ कर
07:10दारुक के प्रस्थान करते ही, भगवान श्री कृष्ण प्रभास तीर्थ के शांत एकांत में अपने परमधाम प्रस्थान के लिए गहन
07:18समाधी में लीन होने की तैयारी में थे, उनके मुख पर एक अलौकिक अविचल शांती छाई हुई थी
07:26जैसे ही उन्होंने अपनी चेतना को भीतर समेटना प्रारंभ किया, संपून ब्रहमांड में एक अध्भुत कमपनशीरी उर्जा फैलने लगी, जो
07:35हर लोग के देवों और रिशियों को उनके परम आराध्य के आसन्न विदाई का संकेत दे रही थी
07:43स्वर्गलोक में देवगणों ने इस अध्वितिय स्पंदन को अनुभव किया, जिसने उन्हें भगवान श्री कृष्ण के प्रिथवी पर लीलासमापन और
07:51परमधान गमन की सूचना दी, जिससे उनके हृद्यों में एक साथ श्रधा और विरह की भावना उमड़ पड़
07:59तत पश्चात, स्रिष्टी के रचिता ब्रहमाजी ने सर्वप्रथम अपने दिव्यद्रिष्टी से इस परम सत्य का साक्षात कार किया और तुरंट
08:08अन्य देवगणों को भगवान की अंतिम विदाई का साक्षी बनने का आवाहन किया
08:14ब्रहमाजी के आवाहन पर भगवान शिव, देवराज इंद्र और अन्य सभी प्रमुख देवतागन, रिशिमुनी, सिद्ध तथा गंधर्व ततकाल अपने अपने
08:23दिव्य विमानों और तेज के साथ प्रित्वी की ओर प्रस्थान करने लगे
08:29आकाश मंडल एक अध्भुत जोतिर्मय उत्सव में परिवर्तित हो गया, जहां देवगणों के आगमन से निकली दिव्य उर्जा प्रित्वी की
08:37ओर बहती हुई, प्रभास तीर्थ के वातावर्ण को पवित्र और तेजस्वी बना रही थी
08:44जैसे ही वे प्रित्वी के निकट आए, उन्होंने प्रभास तीर्थ के तट पर एक विशाल वट विक्ष के नीचे अपने
08:51परम आराध्य भगवान श्री कृष्ण को गेहन ध्यान में लीन देखा, जिनके चारों और एक अभूत पूर्व शान्ती व्याप्ट थी
09:00सभी देवगण, रिशिमुनी, सिध्ध और गंधर्व अपने अपने दिव्य स्वरूकों में हाथ जोड कर, नकमस्तक होकर भगवान श्री कृष्ण के
09:09समक्ष खड़े हो गए, उनके हृद्यों में भक्ती और विस्मय का अध्भूत संगम था
09:15सर्वप्रथम ब्रहमाजी ने अपनी चारों मुखों से एक साथ स्तुती आरंभ की, उनके शब्दों में स्रिष्टिकर्ता का ज्यान और भक्त
09:23का प्रेम स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहा था, जो ब्रहमांडिय लए में गूंज रहे थे
09:30उनके पश्चात भगवान शिव ने अपनी गंभीर, शांत मुद्रा में ब्रहमांडिय शांती और शक्ती का प्रतीक बनकर अपने हृदय से
09:39निकली भक्ती से पूर्ण स्तुती को मुख्रित किया, जिससे वातावर्ण और भी गेहन हो गया
09:45देवराज इंद्र ने भी अपनी वजरसी द्रिड़ता और स्वर्णसी आभा के साथ हाथ जोड कर भगवान के उन अनुपम गुनों
09:53का बखान किया, जिन्होंने प्रित्वी पर धर्म की स्थापना की और अधर्म का नाश किया
10:00समस्त्र शिमुनी, सिद्ध और गंधर्व भी अपने अपने दिव्यस्वर और वाध्ययंत्रों के साथ इस ब्रहमांडिय स्थुती में सम्मिलित हो गए,
10:09जिससे प्रभास तीर्थ का संपूर्ण वातावर्ण दिव्यसंगीत और पवित्र मंत्रों से गूंज उठा
10:15उनकी स्थुती में भगवान के मथुरा, व्रिंदावन और द्वार्का की सभी लीलाओं का गुनगान किया जा रहा था, हर शब्द
10:23उनके प्रेम, पराक्रम और करुनामय स्वभाव का जीवंत चितरन कर रहा था
10:30भगवान श्रीकृष्ण अपनी अलौकिक समाधी में लीन रहते हुए भी, अपनी दिव्य मुस्कान से सभी देवगणों की भक्ती को स्विकार
10:38कर रहे थे, उनकी उपस्थिती से ही ब्रहमांड में उर्जा का संचार हो रहा था
10:44देवताओं ने उनके विराट स्वरूप की महिमा का बखान किया, उस स्वरूप का, जिसमें संपून स्रिष्टी समाहित है और जिससे
10:52अनन्त ब्रहमांडों का उद्धव हुआ है
10:56उनके प्रतेक शब्द में गेहन श्रद्धा, प्रेम और परम ज्ञान का सार था, जो भगवान के प्रिथवी पर अवतरण के
11:03उद्धेश्य और उनकी लीलाओं के महत्व को उद्धाटित कर रहा था
11:08स्वर्ग से पुष्पों की वर्षा होने लगी, दिव्य सुगंद से वातावर्ण भर गया, और ब्रहमांडिय उर्जा का एक शांत प्रवाह
11:16सभी उपस्थित देवगणों को पवित्र कर रहा था
11:20इस गेहन ब्रहमांडिय स्तुती के मध्य, भगवान श्रीकृष्ण का मुखमंडल और भी अधिक तेजोमय हो उठा, उनकी आखें धीरे-धीरे
11:29खुलने लगी, जिससे एक दिव्य, मोहक प्रकाश चारों और फैल गया
11:35सभी देवगण उनकी इस अलौकिक छवी को देखकर भाव विभोर हो गए, उनके हृद्यों में एक साथ आनंद और आगामी
11:43वियोग की पीडा उमड पड़ी, जो उनके नेत्रों में स्पष्ट परिलक्षित हो रही थी
11:49और फिर एक अंतिन सामुहिक प्रार्थना के साथ समस्थ देवगणों ने अपने आराध्य को परमधाम प्रस्थान के लिए मौन स्विकृती
11:58दी, उनका प्रत्येक रोमकूप उनके दिव्य संस्पर्ष की प्रतीक्षा में था
12:04भगवान श्रीकृष्ण ने अपने समस्थ देवताओं और रिशियों को अंतिन द्रिश्टी प्रदान की, जिसमें युगों का ज्यान और अनंत प्रेन
12:12समाहित था, एक ऐसी विदाई जो समस्थ कालचकर में गूंज उठी
12:17उनके अध्रों पर एक अलौकिक मुस्कान खिली, जो समस्थ ब्रह्मांड को अपनी शाश्वत शांती और ज्यान का संदेश दे रही
12:25थी, मानो स्वय वैकुंट से अमरित बरस रहा हो
12:30ततपश्चात उन्होंने अपनी आखे धीरे-धीरे बंद कर ली, और उनकी चेतना भौतिक जगत की सीमाओं से उपर उठकर अनंत
12:38ब्रह्मांड में विलीन होने लगी
12:41उनके शरीर से एक अध्भुत स्वर्णिम आभा फूटने लगी, जिसने प्रभास तीर्थ की पूरी भूमी को दिव्य प्रकाश से नहला
12:49दिया, मानो स्वयन सूर्य देव का अवतरन हुआ हो
12:54देवगण और रिशिगण इस अभूत पूर्व द्रिश्य को देख कर स्थब्ध रह गए, उनके नेत्रों से आनंद और वियोग की
13:01अश्रुधारा बह निकली, जो उनके हृदय की गेहन भावनाओं को दर्शा रही थी
13:07प्रकाश की तीवरताक्षन प्रतिक्षन बढ़ती गई, और श्री कृष्ण का भौतिक शरीर धीरे-धीरे उस दिव्य जोती में विलीन होने
13:15लगा, जैसे अगनी में कपूर अपनी पहचान खो देता है
13:20अब उनका स्वरूब केवल शुद्ध, अनन्त उर्जा का पुंज मात्र रह गया था, जो अपनी गरिमा और तेज से आकाश
13:28गंगाओं को भी छोटा सिध कर रहा था
13:30एक ब्रहमांडिय सूर्य के समान
13:33यह प्रकाश पुंज धीरे-धीरे प्रित्वी से उपर उठने लगा, मानो कोई अनन्त शक्ती का पुंज अपनी निर्धारित वैकुंठ यात्रा
13:42पर निकल रहा हो
13:44जैसे जैसे वह उपर उठता गया, उसके चारों और एक असीम शान्ती का घेरा बनता गया, जो समस्त लोकों में
13:52फैल रहा था
13:53प्रत्येक कण को अलोकिक शीतलता प्रदान करते हुए
13:58संपून ब्रहमांड में एक अध्भुत मधुर कमपन सुनाई दिया, जो स्रिष्टी के हर कण में इश्वरिय चेतना का संचार कर
14:05रहा था, जैसे स्वयं ओम की ध्वनी गूंज रही हो
14:10यह दिव्य जोती अनंत आकाश को भेदती हुई, सीधे वैकुंठ लोक की ओर अग्रसर हुई, जो उनका परमधाम था, जहां
14:18से समस्त स्रिष्टी का उदगम होता है
14:22वैकुंठ में भगवान विश्णु अपने आदी स्वरूप में शेशनाग की विशाल शयापर विराजमान थे, उनकी आखें मंदमंद चमक रही थी,
14:32मानों उन्हें इस क्षण का चिरकाल से ग्याद था
14:36श्री कृष्ण का दिव्य प्रकाश उनके मूल स्वरूप भगवान विश्णु में समाहित हो गया, जैसे एक नदी अनंत सागर में
14:44मिलकर अपनी यात्रा पूर्ण कर लेती है
14:47इस महाप्रयान के साथ ही समस्त ब्रह्मांड में एक ऐसी शांती और संतुलन स्थापित हुआ, जिसकी कलपना भी असंभव थी,
14:56एक अध्भुत समर्स्ता फैल गई
15:00देवगणों ने अंतरग्यान से इसक्षण को महसूस किया और परम पूजय भगवान विश्णु को नमन करते हुए अपने अपने लोकों
15:08को प्रस्थान किया, उनके हृद्यों में भक्ती और विस्मय भरा था
15:13प्रिथवी पर रिशिग्नों ने अपने अश्रुपूरित नेत्रों से अंतिम बार उस रिक्ट स्थान को देखा, जहां से दिव्यता विदा हुई
15:21थी, उनके मन में एक युग के अंत की गहरी चाप थी
15:25उस रिक्टता के साथ ही, प्रिथवी पर सत्युग और त्रेता युग के मूलियों की समाप्ती का अनुभव हुआ, एक गहरा
15:33शूनी छा गया, मानो प्रिथवी ने अपना आधार खो दिया हो
15:38युगों युगों तक धर्म और न्याय के पालक रहे भगवान श्री कृष्ण के भौतिक शरीर के त्याग से द्वापर युग
15:44का भी अंत हो गया, और काल चक्र ने एक नया मोड लिया
15:49उनके महाप्रयान के पश्चात, वायू में एक सुक्ष्म परिवर्तन आया, जो काल चक्र के अगले पड़ाव का संकेत दे रहा
15:57था, एक अद्रिश्य उर्जा का संचार हो रहा था
16:02और इस प्रकार एक युग का समापन हुआ, जिसने न केवल प्रिथवी, बलकि समस्थ ब्रहमांड के भाग्य को एक नई
16:09दिशा दी, एक चिरंतन सत्य की स्थापना हुई
16:14भगवान श्री कृष्ण के महाप्रयान के पश्चात, समस्थ प्रिथवी पर एक गहरी उदासी छा गई, जैसे प्रकृती ने अपने सनरक्षक
16:22को खो दिया हो और वायुमंडल में एक असहनिय शूने भर गया हो
16:28प्रभास तीर्थ की पवित्रभू में, जो कभी यादवों की वीर्ता और जीवन से उतप्रोत थी, अब केवल विनाश और मृत
16:36शरीरों का एक भयावह कब्रिस्तान बन चुकी थी, जहां सन्नाटा चीख रहा था
16:42अपने परम आराध्य और समस्त यादव कुल के अंत को देखकर, सार्थी दारुक का हृदय गहन शोक से फट रहा
16:50था, और उसकी आखें अविश्वसनिय पीडा से भीग गई थी
16:55उस असहने द्रिश को सहन करने में असमर्थ, दारुक ने तय किया कि वह पांडवों विशेशकर अर्जुन को इस विनाशकारी
17:03समाचार से अवगत कराएगा, क्योंकि वे श्री कृष्ण के प्रिय सखा थे
17:09अपने रत को तयार करते हुए, दारुक ने एक अंतिम बार उस भूमी को देखा जहां उसके स्वामी ने अपना
17:16भौतिक शरीर त्याग दिया था, उसकी आत्मा गेहन पीडा से चीतकार कर रही थी
17:22उसने अपनी आत्मा पर भारी बोच लिये हुए हस्तिनापुर की और अपनी यात्रा प्रारंभ की, जहां उसके प्रत्येक कदम के
17:30साथ एक युग का अंत हो रहा था
17:34यात्रा के दौरान दारुक का मन भगवान श्रीकृष्ण और यादवों की स्मृतियों से भरा था, जिससे उसकी आत्मा पर दुहक
17:42का पहार तूट पड़ा था
17:44कई दिनों के अथक परिश्रम के बाद दारुक का रत हस्तिनापुर के विशाल और व्यभवशाली द्वार के समीक पहुँचा, उसकी
17:52ठकान उसके चहरे पर स्पष्ट जलक रही थी
17:56शहर की हलचल और जीवन की सामान्यता, दारुक के हृदय में छिपे भयंकर दुहक के साथ एक विडंबनापूर्ण विरोधाभास प्रस्तुत
18:05कर रही थी
18:07वह राजभवन के शांत और भव्य प्रवेश द्वार से गुजरा, जहां हर दीवार इतिहास और भव्यता की कहानिया सुनाती प्रतीत
18:15होती थी
18:17और फिर राजसभा में दारुक ने पांडवों को देखा अर्जुन, युधिष्ठिर और द्रौपदी जो किसी महत्वपूर्ण चर्चा में लीन थे
18:27पांडवों की द्रिष्टी उस पर पड़ी और उन्होंने दारुक के चहरे पर छाई असाधारन पीडा और चिन्ता को तुरंत भाप
18:35लिया
18:36अर्जुन अपने प्रिय सखा श्री कृष्ण के सार्थी को इस अवस्था में देखकर चिन्तित हो उठे और त्वरित गती से
18:44दारुक की ओर बढ़े
18:46दारुक ने बोलने का प्रयास किया लेकिन उसका गला सूख गया था और शब्द उसकी पीडा से भरी आत्मा में
18:54अटक कर रह गये थे
18:56अत्यंत कठिनाई से दारुक ने अंत्य यादवों के भयानक विनाश और उनके बीच हुए ग्रिहयुद का हृदय विदारक समाचार सुनाया
19:06राजसभा में सन्नाट आचा गया पांडवों के चहरों पर अविश्वास और भय की गहरी चाया पड़ गई जैसे समय ही
19:13ठहर गया हो
19:15इसके बाद दारुक ने भगवान श्री कृष्ण के परमधाम गमन का वर्णन किया शब्दों में वह पीड़ा थी जो समस्त
19:23ब्रहमांड को जखजोरने वाली थी
19:26अर्जुन अपने सबसे प्रियमित्र और मार्ग दर्शक के महा प्रयान की बात सुनकर तूट गए और धर्ती पर गिर पड़े
19:33उनका धनुष और बान उनसे दूर कहीं बिखर गए थे
19:38धर्मराज युधिष्ठिर अपनी शांत प्रकृती के बावजूद अपने आसूओं को रोक नहीं पाए और उनकी आखों से ज्ञान और विश्वास
19:47की धारा बह निकली
19:50द्रौपदी अपने पतियों के दूहक को देखकर और अपने प्रिय सखा के चले जाने से एक हृदय विदारक चीतकार के
19:57साथ अचेत होकर गिर पड़ी जिसकी गूंच पूरे महल में फैल गई
20:03द्रौपदी के अचेत होते ही राजमहल में एक गहरा सन्नाट आचा गया, मानो समय भी इस अपार दूहक को देखकर
20:11स्तब्ध रह गया हो
20:13युधिष्ठिर और अन्य भाईयों ने तुरंत द्रौपदी को सहारा दिया, जबकि अर्जुन इस द्रिश को देख अपनी सारी शक्ती बटोर
20:21कर धीरे धीरे उठ खड़ा हुआ
20:24उसकी आखों में अश्रु भले ही थे, परंतु अब उनमें एक अटल संकल्प की ज्वाला धधक रही थी, जिसने उसके
20:32हृदय की पीड़ा को एक द्रिढ निश्चय में बदल दिया
20:36अर्जुन ने अपने भाईयों की ओर देखा, जिनकी आखों में भी वही अथा, दुहक और अनिश्चित्ता का भाव था, और
20:44एक गहरी सास लेकर अपनी बात कही
20:47मैं द्वार का जाऊंगा, अर्जुन की वानी में द्रिढता थी, अपने प्रिय सखा के रानियों और बचे हुए यादवों को
20:55सुरक्षित स्थान पर ले जाने का मेरा कर्तव्य है
20:59युधिष्ठिर ने अपनी शांट आखों से अर्जुन को देखा, उनके हृदय में अपने भाई की पीड़ा और आने वाली चुनोतियों
21:07के प्रती चिन्ता उमड रही थी
21:10परंतु वे जानते थे कि अर्जुन का संकल्प अटल है और इस समय उसे रोकना असंभव है, आथ उन्होंने भारी
21:18मन से सहमती दे दी
21:20इसके पश्चात अर्जुन अपने शस्त्रागार की ओर बढ़ा, जहां उसने अपने दिव्यधनुष गांडीव और अमोग बानों को पुनह धारण किया
21:30उसने अपने शरीर पर युद्ध के लिए आवश्चक कवच धारण किया, जो उसकी वीर्ता और कर्तव्य प्रायंता का प्रतीक था
21:40हस्तिनापूर के महल में एक मार्मिक विदाई का अक्षन आया, जहां द्रौपदी और अन्यरानियों ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से अर्जुन को
21:48विदा किया
21:50अर्जुन अपने घोडे पर आरूड होकर, शोकगरस्थ हस्तिनापूर के विशाल द्वारों से अकेला ही निकल पड़ा, उसका हृदय भारी था
21:58और लक्षिस पष्ट
22:01पथरीले रास्तों और घने वनों से गुजरते हुए, हर पगपर उसके मन में अपने प्रिय सखा श्री कृष्ण की स्मृतिया
22:08कौन्ध रही थी
22:10उसके कानों में कृष्ण के उपदेश और उनके साथ बिताय सुखद पलों की गूंज अब भी जीवन्त थी, जो उसके
22:17वियोग को और गहरा कर रही थी
22:21जैसे जैसे वह द्वार का के निकट पहुँचता गया, एक अजीब सी खामोशी और उदासी वातावर्ण में घुलने लगी, जो
22:29उसके हृदय को विचलित कर रही थी
22:32नगर के बाहरी द्वार तक पहुँचते ही, उसने देखा कि सडके वीरान थी और चहल पहल पूरी तरह से गायब
22:39थी, मानो समय ठहर गया हो
22:42द्वार का नगरी में प्रवेश करते ही, अर्जुन को एक गहरा आघात लगा, भव्य महल और इमारतें अब खंड हरों
22:50में बदल चुकी थी
22:52हर जड़ह विनाश का भयावह मनजर था, जो यादवों के ग्रिहयुद्ध की क्रूरता और काल के अप्रिहार ये चक्र की
23:00गवाही दे रहा था
23:02अंतह, अर्जुन ने कुछ बचे हुए यादवों और भगवान श्री कृष्ण की विलाप करती रानियों को एक सुरक्षित स्थान पर
23:10पाया, जो अपने प्रेतम के वियोग में गहरे दोहक में डूबी थी
23:15उनकी हृदय विदारक चीखें और अश्रुधाराय अर्जुन के हृदय को भी चीर रही थी, परन्तु उसने स्वयं को संभाला और
23:23उन्हें सांत्वना देने का प्रयास किया
23:27अर्जुन ने उन्हें आश्वासन दिया कि वह उन्हें इस तबाह हो चुकी नगरी से सुरक्षित निकाल कर हस्तिनापूर ले जाएगा
23:34और उनकी रक्षा का भार संभालेगा
23:38अर्जुन ने बिना विलंब किये द्वारका के शेश नागरी को और श्रीक्रिष्न की रानियों की हस्तिनापूर यात्रा की तयारिया आरंभ
23:46कर दी
23:47उसने सार्थियों को आदेश दिया कि वे सभी उपलब्ध रथों, घोडों और बैलगाडियों को इस लंबी निश्क्रमन यात्रा के लिए
23:55तुरंट सुसज्जित करें
23:58महारानी रुकमिनी और सत्यभामा ने बहती अश्रुधारा के साथ द्वारका के उन भव्यस्वर्ण महलों को अंतिम बार देखा, जहां कभी
24:07लीलाधर का वास्थ था
24:09अर्जुन रोते हुए बालकों, व्रिधों और रोती हुई यादव नारियों के विशाल काफिले को द्वारका के विशाल मुख्य द्वार से
24:17बाहर ले जाने लगा
24:19जैसे ही अंतिम नागरिक ने द्वारका की सीमा लांगी, समुद्र की विशाल और भयंकर लहरिंग उग्र होकर नगरी की सुरक्षा
24:28दीवारों पर टक्राने लगी
24:30अर्जुन ने चौंक कर पीछे मुड कर देखा तो पाया की उफंता हुआ महास्मुद्र द्वारका के विशाल स्वर्ण शिखरों को
24:38निगलने के लिए तेजी से बढ़ रहा था
24:42विश्वकर्मा द्वारा निर्मित वह अलोकिक नगरी जिसके दिव्य महल और स्वर्ण मंदिर जग्मगाते थे शन भर में समुद्र के गर्जन
24:50के साथ जल्मगन होने लगी
24:53देखते ही देखते संपूर्ण द्वारका नगरी महासागर की अगाध गहराईयों में समा गई और केवल भगवान श्रीकृष्न का निजी भवन
25:02ही जल के उपर दिखाई दे रहा था
25:05अपने सर्वप्रिय श्रीकृष्न की बसाई सुन्दर नगरी का यूँ अंत देखकर अर्जुन का हृदय अगात शोक और विवशता से भर
25:13गया
25:14अर्जुन अपने गांडीव धनुष को संभाले हुए उस उदास और निसहाई काफिले को घने जंगलों के रास्ते हस्तिनापूर की ओर
25:22आगे बढ़ाने लगा
25:25तभी पंचनत देश के घने वनों में बरबर आभीर डाकूओं के एक विशाल जुन्ड ने उस असहाई और दुखी काफिले
25:32पर अचानक हमला कर दिया
25:34उन क्रूर डाकूओं ने यादव स्त्रियों के बहुमूल्य आभूशन और असहाई अवस्था देखकर कुलहाडियों और भालों के साथ जपट्टा मारा
25:44अर्जुन ने अपने पराक्रम पर भरोसा रखते हुए तुरंत अपने गांडीव धनुष को उठाया ताकि उन लुटेरों को एक ही
25:52क्षण में भस्न कर सके
25:55किन्तु अत्यंत भैभीत कर देने वाले क्षण में अर्जुन के हाथ कामपने लगे और वह अपने दिव्यास्त्रों को प्रकट करने
26:02वाले मंत्र भूल गया
26:05अर्जुन ने गांडीव की प्रत्यंचा चढ़ाने का भर्सक प्रयास किया परंतु उसका वह अलौकिक बाहुबल पूरी तरह लुप्थ हो चुका
26:13था
26:14जिस अक्षय तुनीर से कभी बान समाप्त नहीं होते थे वह अक्षय भाथा भी अचानक पूरी तरह से खाली हो
26:21गया
26:23आभीर डाकूओं ने अर्जुन की इस विवश्टा का लाब उठा कर धन समपत्ती लूट ली और असहाय स्त्रियों को अर्जुन
26:30के सामने ही खीच कर ले गए
26:33अर्जुन ने अपनी तलवार निकाल कर नगन हाथों से युद्ध करने का प्रयास किया परंतु उसकी तलवार तूट गई और
26:41वह थककर भूमी पर गिर पड़ा
26:43तूट चुके अर्जुन ने रोते हुए यह कड़वा सत्य स्विकार किया कि उसका संपून शौर्य और दिव्यास्त्र केवल भगवान श्री
26:52कृष्ण की उपस्थिती के कारण ही शक्तिशाली थे
26:56परम गलानी और भारी मन से अर्जुन बचे हुए अवशेश काफिले को लेकर सत्य और मार्ग दर्शन की खोज में
27:03महर्शी वेदव्यास के आश्रम की ओर बढ़ चला
27:07ग्लानी और निराशा से बोजिल मन से अर्जुन बचे हुए काफिले के साथ द्वारका के उजार बाहरी इलाकों में पहुचा
27:15जहां अब केवल सन्नाटा पसरा था और कभी कीर्तिमान नगरी अब एक परित्यक्त स्वपनसी प्रतीत होती थी
27:23उसने अपने चारों और फैले भयावह विनाश का सर्वेक्षन किया
27:28हर तूटी हुई सन्रचना और हर शांत गली उसके भीतर कृष्ण की अनुपस्थिती के भारीपन को और गहरा कर रही
27:35थी
27:36दूर एक तीले पर उसने राजमहल की उपरी मीनारों को देखा जो अभी भी बाहरी तौर पर अच्छूती खड़ी थी
27:44लेकिन उनमें भी एक दरावनी मुक उदासी व्याप्त थी जो नगरी के शेश भाग्य को दर्शाती थी
27:52तूटी हुई आत्मा और भारी हृदय से अरजुन ने महल के विशाल सुनसान द्वारों से प्रवेश किया जहां अब केवल
28:00प्रतिध्वनित चुप्पी ही उसके हर कदम का स्वागत कर रही थी
28:05जैसे ही वह अंदर गहरे चला महल के विशालकाय हौल में एक दुखद विलाप की धीमी तूटी हुई गूंज उसके
28:12कानों में पड़ी जो इस शाही आवास की दुखद शान्ती को भंग कर रही थी
28:18उसने ध्वनी का अनुसर्ण किया और एक आंतरिक कक्ष के द्वार पर रुप गया जहां से शोक और विलाप का
28:25प्रवाह स्पष्ट रूप से सुनाई दे रहा था जो हर क्षण और गहरा होता जा रहा था
28:32अंदर उसने क्रिष्ण की प्रिय रानियों को देखा जो अपने प्राण प्रिय क्रिष्ण के वियोग में गहरे शोक में डूबी
28:39हुई थी उनके मुखमंडल आसुओं से सने और हिदय विदारत पीडा से भरे हुए थे
28:45रानियों ने अपनी द्रिष्टी उपर उठाई और अर्जुन को द्वार पर देखा उनके विलाप ने एक नई तीवरता प्राप्त की
28:53दुरक और एक शनिक बेपसी भरी आशा के मिश्रन से उनकी आवाजे भर गई
29:00सबसे पहले रुकमिनी अपनी दिव्य सुन्दर्ता में भी शोक से जकडी हुई अपने अश्रुपूर्ण नेत्रों से अर्जुन की ओर देखते
29:08हुए दर्थ से भरी धीमी आवाज में बोली
29:12उसने अपने प्रियतम कृष्ण के चले जाने से उत्पन अथा शूने को व्यक्त किया उनके जीवन से उजाड़ चुकी खुशी
29:20और प्रेन को दर्शाते हुए उनके शब्दों में गहरा दुख उमड रहा था
29:25फिर सत्यभामा अपनी आखों में अगनी के साथ भीगा हुआ दुहक लिए कृष्ण के साथ बिताए गए अंतिम पलों की
29:33दर्धनाक यादों को साजा किया उनके चले जाने की कुरूरता पर विलाप किया
29:38हर रानी ने कृष्ण के चंचल स्वभाव उनके मनमोहक स्पर्ष और उनके दिव्य उपस्थित के अन्मोल क्षणों को याद किया
29:47जिससे उनकी यादें आसुओं में और भीग गई
29:51उनका विलाप धीरे धीरे अपने भविश्य के लिए भय में बदल गया क्योंकि वे कृष्ण के बिना अपने अस्तित्व की
29:59अनिश्चित्ता और असुरक्षा का सामना कर रही थी
30:03अर्जुन का हृदय उनकी असीमित पीड़ा को देख कर भारी हो गया और वह अपनी जुबान पर सही सांत्वना के
30:10शब्दों को खोजने के लिए संगर्ष कर रहा था
30:14अन्तह उसकी आवास भारी लेकिन द्रिढ कमरे में गूंज उठी उनकी पीड़ा को स्विकार करते हुए और अपने स्वयन के
30:22गहरे शोग को व्यक्त करते हुए
30:25उसने उन्हें हस्तिनापूर तक सुरक्षित मार्ग और अपनी अविचल सुरक्षा का वादा किया, उनके शेश जीवन की गरिमा सुनिश्चित करने
30:34का वचन दिया
30:36अर्जुन ने कृष्ण के प्रती अपनी अटूट निष्ठा और उनके परिवार के प्रती अपने कर्तवे को फिर से दोहराया, उन्हें
30:44आश्वासन दिया कि वे कभी अकेले नहीं होंगे
30:48उनकी आत्माए अभी भी गहरी पीडा में थी, फिर भी अर्जुन के द्रिड शब्दों ने उनके तूटे हुए हरिद्यों में
30:55सांत्वना की एक पतलीसी किरन जगाई
30:59इसके बाद अर्जुन ने तुरंत उनकी यात्रा की व्यवस्था करना शुरू कर दिया, हर एक रानी की सुरक्षा और सम्मान
31:07सुनिष्चित करने के लिए सावधानी पूर्वक योजना बनाई
31:11जल्द ही काफिला द्वारका को छोड़ने के लिए तयार था, कृष्ण की रानिया अपने एक बार के गौरवशाली घर को
31:19अंतिम बार देख रही थी, जो अब बस एक दुख़द स्मृती बन चुका था
31:25जैसे ही काफिला द्वारका के द्वार से आगे बढ़ा, भूमी एक गहरी विचलित कर देने वाली गड़गराहट के साथ काप
31:32उठी, जिसने आकाश को भेट डाला और सबकी आत्माओं को हिला दिया
31:38अर्जुन जो अब भी कृष्ण के विदाई वचनों से भारित था, तुरंत समझ गया कि यह कोई साधारन भूकम्प नहीं,
31:46बलकी काल की नेती का पहला संकेत था
31:50समुद्रक जिसने सदियों तक द्वारका को अपनी विशाल भुजाओं में समाहित रखा था, अब एक क्रोधित राक्षस की तरह दहाड
31:58रहा था, उसकी लहरें प्रचेंड गर्जना के साथ तटों से टक्रा रही थी
32:04काफिले में शामिल कृष्ण की रानिया और द्वारका के बचे हुए लोग भय से काप उठे, उनकी आखों में अपने
32:11प्यारे घर को अंतिम बार देखने की पीडा स्पष्ट जलक रही थी
32:16नगर के भव्य प्रासाद और उंची-उंची अट्टा लिकाएं जो कभी भगवान कृष्ण की महिमा का प्रतीक थी, अब थर्थरा
32:24रही थी जैसे किसी अद्रिश्य शक्ती ने उन्हें अपने हाथों में ले लिया हो
32:29अर्जुन ने अपने सार्थी को काफिला तेजी से आगे बढ़ाने का आदेश दिया, लेकिन उसकी आवाज में एक अनकहा दुहक
32:37और विवशता थी
32:40अचानक एक प्रचंड लहर तटबंधों को तोड़ कर नगरी के बाहरी हिस्सों में घुस आई, अपने साथ रेट, पत्थर और
32:47भयाभता का एक सैलाब लेकर
32:51जमीन जिस पर कभी भगवान कृष्ण के कमल पच्चिन पड़े थे, अब धीरे-धीरे धंसने लगी, जैसे स्वयन धर्ती माता
32:59अपने प्रिय पुत्र के वियोग में रो रही हो
33:02मकान और गलिया, जो कभी जीवन और उल्लास से परिपून थी, अब जल के एक अथा गर्त में विलीन होने
33:10लगी, जैसे किसी विशालकाय प्राणी ने उन्हें निगल लिया हो
33:26ग्रिश्न की रानिया, जो अब तक अपने रथों में बैठी थी, बिल्खने लगी, उनकी चीखें बढ़ते हुए समुद्र के गर्जन
33:34में खो गई
33:36अर्जुन ने एक पल के लिए पीछे मुड कर देखा, उसके हरदय में एक गहरा छेद हो गया, यह वही
33:42द्वारका थी जहां उसने कभी अपने परम मित्र और गुरु कृष्न के साथ असीमित सुख के क्षन बिताए थे
33:50उसकी आखों के सामने भगवान कृष्न का राजभवन जो कभी स्वर्णिम आभा से जग्मगाता था, अब समुद्र की अतल गहराईयों
33:59में समाता जा रहा था, जैसे कोई सपना तूट रहा हो
34:04बड़े-बड़े हाथी और घोड़े जो कभी द्वारका की सडकों पर शान से चलते थे, अब भयभीत होकर भाग रहे
34:11थे या समुद्र की लहरों में समाते जा रहे थे
34:15समुद्र का जल स्तर इतनी तेजी से बढ़ रहा था कि ऐसा लग रहा था मानो पूरा आकाश ही धर्ती
34:22पर उतर आया हो और जल प्रलै की एक नई कहानी लिखी जा रही हो
34:28अर्जुन को एसास हुआ कि वह काल के इस अटल विधान के समक्ष सर्वथा शक्तिहीन था उसके अजे गांडीव की
34:35शक्ती भी इस दैवी लीला के सामने नगण्य थी
34:40द्वारका के भव्य मंदिरों के शिखर जिनके उपर सुनहरे कलश शोभायमान थे एक एक करके जल में समाते गए जैसे
34:48तारे आकाश से तूटकर गिर रहे हूँ
34:51अंतरक द्वारका वह स्वर्णिन नगरी जिसने स्वय भगवान को आश्रे दिया था पूरी तरह से समुद्र की गहराईयों में विलीन
35:00हो गई
35:00उसकी जगह केवल गरस्ती हुई लहरें और अनंत जलराशी बची
35:05अर्जुन दूर खड़ी पहाडियों से इस अलोकिक और हृदय विदारक गृष्य का साक्षी बना
35:11उसकी आत्मा कृष्ण के अंतिम शब्दों की गूम्व से और भी अधिक भारी हो गई
35:17समुद्र की अनंत लहरें अब दौरका के गौरवशाली अतीत को अपने गर्भ में छिपाए हुए थी
35:24जो अब केवल यादों और महाकाव्य के शलोकों में जीवित रहेगी
35:29समुद्र के उस विराट जलमगन फैलाव को देखते हुए अर्जुन के हृदय में एक गहरा शून उतर आया
35:36जैसे काल की प्रचंड लहरों ने उनकी आत्मा के एक भाग को भी अपने साथ बहा लिया हो
35:43कृष्ण के अंतिम शब्द एक गुरुत्वा कर्शन की तरह उनके अंतर्मन में गूंज रहे थे
35:49उन्हें शेश द्वार कावासियों की रक्षा और उन्हें सुरक्षित हस्तिनापुर ले जाने के अपने कर्तव्य की याद दिला रहे थे
35:58भारी कड्मों और एक तूटे हुए हृदय के साथ अर्जुन उस उची पहाडी से नीचे उतरना शुरू करते हैं
36:05जिसका एक मात्र लक्षय अब कृष्ण के पीछे छोडी गई विरासत की रक्षा करना था
36:12निराशा और अनिश्चित्ता के घने बादल मंडरा रहे थे
36:15जब अर्जुन ने समुद्र तट के पास आश्रय लिये हुए श्री कृष्ण की रानियों और अन्य बचे हुए लोगों को
36:22देखा
36:22उनके चहरे पर भय और विस्थापन की गहरी चाप थी
36:27श्री कृष्ण की रानिया जिनकी दिव्य सुन्दर्ता अब आसुओं और दुख से धंकी थी
36:33उनके पास आकर अपनी सुरक्षा और भविश्य के लिए अर्जुन पर पूर्ण विश्वास के साथ आश्रय ले रही थी
36:41अर्जुन ने अपने भारी हृदय पर नियंत्रन पाते हुए शेश बचे द्वार का वासियो व्रिध, स्त्रिया और बच्चों को इकठा
36:49किया
36:50उन्हें एक नए जीवन की आशा दिलाने का प्रयास करते हुए
36:55सूर्य की पहली किरण के साथ निराशा और अनिश्चित्ता से भरे उस काफिले ने कृष्ण की अनुपस्थिती के भारी बोच
37:03को ढोते हुए
37:04हस्तिनापुर की ओर अपनी कठिन यात्रा आरंभ की
37:09रेगिस्तानी भूमी की धूल भरी पकडंडियों से गुजरते हुए
37:24उनके साथ साथ चल रही थी जो युगों के परिवर्तन और आने वाले कलिव के कठोर सत्य का मौन प्रतीक
37:31बन रही थी
37:33जैसे जैसे दिन धलने लगा यात्रियों की आखों में ठकान और आशंका बढ़ने लगी
37:38हर चाया में एक छिपे हुए खत्रे का डर मंदराने लगा
37:43शांत नीरव जंगल की हवा में एक अजीब सा तनाव घुलने लगा
37:48जो आगामी विपत्ती का पूर्वाभास करा रहा था
37:51जैसे प्रकृती भी अपनी चुप्पी तोड़कर चेतावनी दे रही हो
37:57दूरक्षितिच पर धूल के एक असपष्ट बादल के भीतर
38:00कुछ धुंधली आकरितिया दिखाई पड़ने लगी
38:03जो धीरे-धीरे आकार ले रही थी
38:06जिससे सभी यात्रियों के हृदय में भय की एक लहर दोड़ गई
38:11धूल का परदा छटा और अभीर नामक क्रूर भील लुटेरों का एक दल सपष्ट रूप से दिखाई दिया
38:17उनकी हिंसक आखें काफिले की ओर लालच और शत्रुता से चमक रही थी
38:23लुटेरों के भयावह युद्धनाद ने शांत वातावर्ण को चीर दिया
38:28जैसे एक भयानक तूफान ने शांती की अंतिम आशा को भी नश्ट कर दिया हो
38:34ततकाल अर्जुन ने अपनी द्रिढता को बनाए रखते हुए
38:38अपने महान गांडीव धनुष को उठाया
38:40उसकी गर्जना एक अंतिम चुनौती की तरह हवा में गूंज उठी
38:46गांडीव पर प्रत्यंचा चड़ाते ही अर्जुन ने एक अंजानी शक्ती का क्षय महसूस किया
38:52जैसे कोई अद्रिश शक्ती उनके शरीर से उनकी दिव्यता को खीच रही हो
38:58उनके बान जो कभी अगनी के समान तीवर और अचूक होते थे
39:02अब केवल साधारन तीरों की तरह उड़ रहे थे
39:06जिनमें न तो पहले जैसी गती थी नहीं कोई दिव्यशक्ती
39:11लुटेरों ने काफिले के एक कमजोर हिस्से को भेद दिया
39:15विशेशकर महिलाओं और बच्चों को निशाना बनाया
39:18जिससे अर्जुन का हृदय क्रोध और असहायता से भर गया
39:23अपनी आखों के सामने कुछ महिलाओं को लुटेरों द्वारा घसीकते हुए देख
39:28अर्जुन को अपनी शक्ती के हरास और कल्यक के प्रभाव का गहरा और दर्धनाक एहसास हुआ
39:35यह क्षण जब वह असहाय खड़ा था उसकी आत्मा को चीर गया
39:40उसे कृष्ण की अनुपस्थिती और अपनी स्वयन की क्षीन होती शक्तियों का भयानक सत्य स्विकार करने पर विवश कर दिया
39:48वह समझ गया की कालचकर ने अपना मार्ग बदल दिया है
39:52और दिव्ययुक का अन्थोकर कल्युक का क्रूर शासन अब प्रित्वी पर अपनी काली चाया डाल रहा है