- 49 minutes ago
- #नरक
गरुड़ पुराण के इस भयावह अध्याय में, हम आत्मा के यमलोक में प्रवेश के बाद के भीषण दंडों की गहराई में उतरते हैं। भगवान विष्णु, गरुड़ को तामिस्र, अंधतामिस्र, रौरव और कुंभीपाक जैसे नर्कों की यातनाओं का विस्तृत वर्णन देते हैं, जहाँ पापी आत्माएँ अपने कर्मों का फल भुगतती हैं। लेकिन इस अंधकार के बीच, मुक्ति की एक किरण फूटती है! गरुड़ के प्रश्न के उत्तर में, विष्णु अवधूत अवतार की अद्भुत कहानी सुनाते हैं, एक ऐसे संत की जिसने प्रकृति के 24 गुरुओं से ज्ञान प्राप्त कर परम मोक्ष प्राप्त किया। इस एपिसोड में जानें कैसे वैराग्य, संतोष और प्रकृति के गहन पाठ हमें जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति दिला सकते हैं और नरक के भय से परे ले जा सकते हैं। इस रहस्यमय सफर में हमारे साथ जुड़ें! #गरुड़पुराण #नर्क #अवधूतअवतार #मोक्ष #वैराग्य #आत्माकासफर #हिंदूधर्म #अध्यात्म
Category
🦄
CreativityTranscript
00:00के गरुड यमलोक के द्वार से पार होकर महापापी आत्माओं को सीधे उन भयाव अंधकार्मय लोकों में धकेला जाता है
00:08जहां कोई भी प्रकाश की किरण नहीं पहुँचती।
00:12गरुर का हृदय प्रभु के शब्दों से सहम उठा जैसे उनकी आखों के सामने पापी आत्माओं का दारोन भविश्य प्रकट
00:20हो रहा हो।
00:21फिर द्रिश बदलता है जहां एक भयानक लौजडित द्वार अंधेरे में धनसा हुआ खड़ा है जो नरक के भीशन लोकों
00:30के प्रवेश का सूचक है।
00:33यह तामिसर लोक है जहां अंधकार इतना घना है कि वह स्वय एक ठोस इकाईसा प्रतीत होता है। आत्माओं को
00:41अपने अस्तित्व के हर पल पर कसकर जकड लेता है।
00:46सहसरों पापी आत्माएं जिनके कर्मों का लेखा जोखा यमराज के दर्बार में हो चुका है। भयभीत चीखे निकालते हुए इस
00:55अंधकार में धकेली जा रही है।
00:58एक आत्मा का चहरा घबराहट से विकृत हो जाता है। जैसे वह जानता हो कि यह अंधकार अब उसकी अंतिम
01:06नेती है। जहां से कोई वापसी नहीं।
01:09उन्हें अगाध शून्य में धकेला जाता है, जहां गुरुत्वाकर्शन और दिशा का कोई बोध नहीं रहता, बस अंधीन पतन का
01:17भयावः अनुभव होता है।
01:20इस धनगोर अंधकार में भयानक यमदूतों की डरावनी आकृतिया धीरे-धीरे उभरती हैं, जिनके हाथ में भारी गदाये हैं, जो
01:30आसन्न पीडा का संकेत देती हैं।
01:34यमदूत अपनी करूर गदाओं से आत्माओं को निर्मम्ता से पीटते हैं, प्रत्येक वार अंधकार में एक दर्धनाक चीख गुंचता है,
01:42जो तुरंत ही घुटकर रह जाती है।
01:46तामिस्र की गहराई से भी नीचे एक और लोक है जिसे अंधतामिस्र कहते हैं, जहां अंधकार और पीडा की कोई
01:54सीमा नहीं है, जहां चेतना भी धुंधली पड़ जाती है।
01:59जिन आत्माओं ने धर्ती पर दूसरों को धोखे से लूटा या पराई स्त्री का हरण किया, उन्हें तामिस्र से खीच
02:06कर अंधतामिस्र के अथा कुंड में धकेल दिया जाता है।
02:11यहां आत्माए द्रिष्टी, श्रवन और स्पर्ष जैसी सभी इंद्रियों से वंचित हो जाती हैं, केवल अथा पीडा का अनुभव करती
02:20हैं, जो उनकी चेतना को चीर देती है।
02:24यमदूत नुकीले भालों और तीक्षन अस्त्रों से इन आत्माओं के शरीर पर अनवरत प्रहार करते हैं, मानों वे उनके हर
02:32पाप का हिसाब चुका रहे हूं।
02:35हर चीक अंधकार में समा जाती है, हर दर्दनाक कराह बिना किसी प्रतिध्वनी के मिट जाती है, केवल अनन्त यातना
02:43का मौन सामराज शेश रहता है।
02:47उस आत्मा को अपने क्षण भंगुर सांसारिक जीवन की जहलत दिखती है, जब उसने एक छोटी सी बेमानी की थी,
02:55जिसका मौल अब अनन्त पीडा से चुकाना पड़ रहा है।
02:59आत्माएं पीडा से चट पटाती हैं, भागने का असफल प्रयास करती हैं, लेकिन यमदूतों की पकड़ और अंधकार की जकड़
03:08से कोई बच नहीं पाता।
03:10यह यातना निरंतर और अटूठ है, युगो-युगो तक चलती रहती है, जब तक की आत्मा अपने पापों का पूरा
03:18फलभोग न ले।
03:20भगवान विश्नु का स्वर फिर से गूंजता है, इस घोर दंड के पीछे के नियाय को समझाते हुए, जो सत्य
03:27और करुणा के हर छोटे से भी उलंगन पर आधारित है।
03:32गरुड इस भयावः ज्यान को आत्म साथ करते हुए, गेहन चिंतन में डूब गए, उन्हें अब कर्मों के सुक्ष्म से
03:40सुक्ष्म परिनामों की गंभीरता का अनुभव हुआ।
03:44इस प्रकार, तामिस्र और अंध तामिस्र के प्रारंभिक नरक दंड का विवर्न समाप्थ हुआ, किन्तु यमलोग के भयानत लोकों की
03:51यात्रा अभी भी जारी है।
03:53हे गरुर
03:55हे गरुर तामिसर के बाद यमलोग का वह भयानक मार्ग आरंभ होता है जहां पापी आत्माओं का सामना रौरव नामक
04:03अत्यंत कश्टकारी नरक से होता है
04:07इस नरक की भूमे तपते हुए लोहे के समान दहपती रहती है जिस पर पैर रखते ही आत्माओं के पैर
04:14जलने लगते हैं और वे चीतकार कर उठती है
04:19यहां रौरू नामक भयानक सर्प जैसे क्रूर जीव निवास करते हैं जिनके तीखे दात और विशैली फूतकार आत्माओं के भीतर
04:27तक भय पैदा कर देती है
04:30जिन मनुश्यों ने प्रित्वी पर दूसरों को प्रताड़ित कर अपनी कुरूरता का प्रदर्शन किया था उन्हें ये रौरू जीव अपने
04:38नुकीले दातों से बेरहमी से नोचते हैं
04:42भगवान विश्नु बताते हैं कि यह पीडा और कुछ नहीं बलकि उन जीवों के संचित पापों का परिणाम है जो
04:50दूसरों को अब सुनो गरुड उन लोभी मनुश्यों की नियती जिन्होंने छलकपट से दूसरों का धन और पैत्रिक संपत्ती हडप
04:57ली थी
04:59वे आत्माय रौरव से भी अधिक भीशन और अंधकार में नरक महारौरव की गोर धके ली जाती हैं जहां केवल
05:07अंथीन क्रंदन ही सुनाई देता है
05:10महारौरव में विशाल काई लोहे और तामबे के कड़ाहे रखे हैं जिन में उबलता हुआ तरल तामबा और खौलता हुआ
05:18तेल भरा होता है
05:21यमदूत उन कप्ती और धनलोभी पापियों को उठा कर सीधे उस पिघले हुए दहकते तामबे में डाल देते हैं
05:30जैसे ही पापी का शरीर उस खौलते द्रव्य के स्पर्ष में आता है उसकी त्वचा और मास पिघलने लगते हैं
05:37जिससे उत्पन असहनिय वेदना से वह बार-बार मूर्चित होता है
05:43किन्तु यमलोग के विधान के अनुसार वह आत्मा मरती नहीं उसका शरीर पुन्ह तुरंट ठीक हो जाता है ताकि वह
05:51दंड का चक्र भुगत्ती रहे
05:53इस असहनिय पीडा के बीच उन्हें अपने सांसारिक जीवन में निर्दोशों पर ढाये गए अत्याचार और उनकी आखों के आसूस
06:02पष्ट दिखाई देते हैं
06:05महारारव के रुरुसर प्रौरव से भी अधिक विशाल और विशैले होते हैं जो खौलते टामबे से बाहर निकलने की कोशिश
06:13करने वालों को फिर भीतर धकेल देते हैं
06:16इन भयानक कश्टों की बात सुनकर गरुर का हृदय काप उठा और उन्होंने अपनी आखे बंद कर इस न्याय के
06:24पीछे के गहरे सत्य को समझा
06:27भगवान विश्णों आगे कहते हैं कि कर्मों का यह न्याय अटल है जहां हर व्यप्ति को अपने कर्मों का फल
06:34उसी तीवरता से भुगतना पड़ता है
06:38जिन क्षणभंगुर सुखों के लिए मनुश्यों ने दूसरों को रुलाया था वे ही सुख अब इस महा भयानक नरक में
06:45उनके अनन्तकाल का रुदन बन जाते हैं
06:49यहां की वायू भी धधकते हुए अंगारों और जलते हुए मास की गंद से भरी होती है
06:55जिससे पापी आत्माओं का दम भुटने लगता है पर उन्हें मृत्यू का आश्रय नहीं मिलता
07:01यह असहनिय यात्ना केवल कुछ दिनों की नहीं बलकि युगो युगो तक चलती है जब तक कि उस जीव के
07:09पापों का अंतिम अंश भी नश्ट नहीं हो जाता
07:13गरुर ने अत्यंत करुणा भाव से पूछा कि क्या इन पापियों के लिए कभी कोई मुक्ती का मार्ग संभव है
07:20या वे सदा इसी प्रकार तडपते रहेंगे
07:24भगवान विश्णु मंद मुस्कान के साथ कहते हैं कि इस अंधकार से परेभी आत्म ज्यान का एक मार्ग है जो
07:31अवधूत के 24 गुरुओं के अध्भुत रहस्य में छिपा हुआ है
07:37भगवान विश्णु ने गरूर की उच्शुकता देख अपने दिव्य मुख मंदल पर एक अलोकिक मुस्कान सजाते हुए अवधूत की उस
07:45परम यात्रा का रहस्य खोलना आरंभ किया जिसने उन्हें जीवन के हर पहलू में गुरु ढूंडने की ख्शमता दी थी
07:53उन्होंने बताया की कैसे एक समय में एक परम ज्ञानी अवधूत जो वैराग्य और आत्म ज्ञान की पराकाश्था पर था
08:01संसार में सत्य की खोज में विचर्ण कर रहा था
08:05उस अवधूत ने स्वयन को गुरु विहीन अनुभव करते हुए भी ब्रह्मांड के प्रत्येक तत्व और प्रानी को अपना शिक्षक
08:13बनाने का निश्चय किया
08:14सबसे पहले अवधूत ने विशाल प्रत्वी को अपना गुरु बनाया जिसकी सहनशीलता और पोशन करने की क्षमता अद्वितिय है
08:25प्रत्वी ने उसे सिखाया कि कैसे सभी भारों को सहन किया जाए और बदले में बिना किसी अपेक्षा के सभी
08:33जीवों का पोशन किया जाए
08:35इसके बाद उसने सर्वव्यापी वायू को अपना गुरु माना, जो बिना किसी आसकती के सब कुछ स्पर्ष करती है और
08:44फिर भी शुद्ध रहती है
08:47वायू ने उसे सिखाया कि कैसे संसार के सुख दुख को बिना लिप्थ हुए अनुभव किया जाएं, जैसे हवा हर
08:54वस्तु से गुजरती है पर किसी से नहीं चिपकती
08:58फिर उसने अनंत आकाश को अपना गुरु चुना, जो हर वस्तु को अपने भीतर समाय हुए है, फिर भी स्वयन
09:05सरवदा अचुता और निरले प्रहता है
09:09आकाश ने उसे सिखाया कि कैसे आत्मा भी सभी शरीरों में व्याप्थ होते हुए भी उनसे भिन और निर्विकार रहती
09:17है
09:18जल को अपना गुरु मान कर अवधूत ने उसकी स्वाभाविक पवित्रता और सभी को शुद्ध करने की क्षमता का अवलोकन
09:26किया
09:27जल ने उसे सिखाया कि कैसे एक संथ का मन स्वाभाविक रूप से शुद्ध और निर्मल होता है जो दूसरों
09:34को भी पवित्र करता है
09:37अगनी को गुरु बना कर उसने उसकी रुपान तरणकारी शक्ती और बिना भेदभाव के सब को प्रकाशित करने की क्षमता
09:44को समझा
09:57फिर उसने चंद्रमा की कलाओं को गुरु माना जो घटा बढ़ता है पर उसका सार तत्व सदास्थिर रहता है
10:05चंद्रमा ने उसे सिखाया कि कैसे आत्मा भी शरीर के परिवर्तनों से अप्रभावित रहती है जैसे चंद्रमा की कलाएं बदलती
10:13हैं पर चंद्रमा वही रहता है
10:17सूर्य को गुरु मान कर अवधूत ने उसकी निस्वार्थ देने की ख्षमता और अपनी उर्जा से सब को प्रकाशित करने
10:25का गुन सीखा
10:26सूर्य ने उसे सिखाया कि ज्ञानी पुरुष कैसे अपने ज्ञान को बिना किसी अपेक्षा के संसार में बाटता है, जैसे
10:34सूर्य अपने प्रकाश को
10:37एक कबूतर के जोडे की अत्यधिक आसकती देखकर अब धूत ने आसकती के भयानक परिनामों का मार्मिक पाठ सीखा
10:56और महासागर से उसने जीवन की गहराई, उसकी असीमित सहनशीलता और स्थिर्ता का पाठ ग्रहन किया, चाहे कितनी भी नदिया
11:05आकर मिले या लहरें उठेन, वह अपनी समता कभी नहीं छोड़ता
11:10आगे बढ़ते हुए, अवधूत ने एक पतंगे को दीपक की लौकी ओर उनमुक्त होकर आकरशित होते देखा, जो उसे जीवन
11:19की क्षनभंगुर्ता और इंद्रे सुखो की मोहक शक्ती का बोध करा रहा था
11:24उसने देखा कि पतंगा, अपनी समस्ट चेतना से उस चमकीली अगनी की ओर लपका और क्षन भर में ही अपनी
11:32देह त्याग कर भस्म हो गया, जो आसक्ती के विनाशकारी परिनाम का मूक उदाहरण था
11:38इस घटना ने अवधूत को यह गहन शिक्षादी की इंद्रियों के आकर्शन में अंध होकर भटकना, अंत्ह प्राणी को आत्मभाती
11:47मार्ग पर धकेलता है, जिससे मुक्ती असंभव हो जाती है
11:52आगे बढ़ते हुए, उसने देखा कि मधुमक्खिया फूलों से पराग एकत्र कर रही थी, लेकिन उनका ध्यान केवल अमरित पर
12:00था, न कि फूलों की सुन्दर्ता पर, जो उसे एक नया पाठ सिखा गया
12:06अवधूत ने मधुमक्खियों से सीखा कि ज्ञान का संग्रह भी उसी प्रकार करना चाहिए, जैसे वे विभिन स्रोतों से अमरित
12:14एकत्र करती हैं, बिना किसी एक पर अत्यधिक आसक्त हुए
12:19फिर उसने देखा कि एक शहद इकठा करने वाला व्यक्ति आकर, मधुमक्खियों के वर्षों के परिश्रम से एकत्र किये गए
12:27शहद को एक ही क्षण में ले गया, जिससे उसे अनासक्ती का पाठ मिला
12:33शहद इकठा करने वाले से अवधूत ने समझा कि जिस प्रकार मधुमक्खियों का परिश्रम क्षण भर में किसी और का
12:41हो जाता है, उसी प्रकार कर्मों के फल पर भी मनुष्य का पूर्ण अधिकार नहीं होता
12:47अपनी यात्रा में अवधूत ने एक नर हाथी को देखा जो एक गड़े में फस गया था, जिसे एक हथिनी
12:55की मोहग चाल से लालच देकर फसाया गया था
12:59फसा हुआ हाथी अपनी शक्ती के बावजूद वासना के बंधन में इतना जक्रा हुआ था कि अपनी स्वतन प्रताख हो
13:06चुका था, यह द्रिश अवधूत को गहरा विचार करने पर विवश कर गया
13:12इस अनुभव से अवधूत ने सीखा की इंद्रे सुख, विशेश कर वासना, मनुष्य को कैसे अपनी शक्ती और विवेक से
13:20वंचित कर सकता है, जिससे वह माया के जाल में फंस जाता है
13:25आगे बढ़ते हुए, अवधूत ने एक हिरन को देखा जो बांसुरी की मधूर ध्वनी पर मोहित होकर अपनी सुरक्षा भूल
13:33गया और एक शिकारी के जाल में फंस गया
13:37शिकारी ने धीरे-धीरे मधूर संगीत की और आकर्शित हुए हिरन को अपने जाल में फसा लिया, जिससे अवधूत को
13:44यह पाठ मिला की इंद्रिया कैसे मन को धोखा दे सकती है
13:49इस घटना ने अवधूत को यह शिक्षादी की मनुष्य को केवल मधूर आवाजों या सुखदायक ध्वनियों के पीछे नहीं भागना
13:57चाहिए क्योंकि वे अक्सर प्रलोभन के जाल होते हैं
14:02एक दिन अवधूत ने एक मचवारे को देखा जो मचली पकड़ने के लिए आटे का चारा लगा कर उसे लुभा
14:10रहा था जिससे मचलीया स्वाद के मोह में खिंची चलिया रही थी
14:15जैसे ही मचली ने चारा निगला उसे तुरंत कांटे से खींच लिया गया यह देखकर अवधूत को यह एहसास हुआ
14:23कि स्वाद मनुष्य को कैसे संसार के चक्र में फसा सकता है जहां क्षनिक आनंद के लिए जीवन दाफ पर
14:33लग जाता है
14:35फिर अवधूत ने एक शहर में एक वेश्या पिंगला को देखा जो रात भर अपने धनवान प्रेमी का इंतजार करती
14:43रही पर वह नहीं आया
14:46उसने देखा कि पिंगला की आशा धीरे धीरे निराशा में बदल गई और अन्ता उसने सभी भौतिक इच्छाओं को त्याग
14:53दिया जो उसे गहरी आंतरिक शान्ती की ओर ले गई
14:58पिंगला से अवधूत ने सीखा की जब तक मनुष्य आशाओं और इच्छाओं का त्याग नहीं करता तब तक उसे सच्ची
15:06मुक्ति आशान्ती नहीं मिल सकती चाहे वह किसी भी परिस्थिती में हो
15:11आगे बढ़ते हुए अवधूत ने एक कुर्री पक्षी को देखा जो मास के एक टुक्डे के लिए अन्य पक्षियों के
15:18जुन से जूज रहा था जिससे उसे लगातार असुरक्षा महसूस हो रही थी
15:24अंत्र कुर्री पक्षी ने मास का टुक्डा छोड़ दिया और जैसे ही उसने अपनी आसकती त्यागी उसे तुरंत शान्ती और
15:32स्वतंत्रता का अनुभव हुआ जो भीड से अलग एकांत में मिली
15:38कुर्री पक्षी से अनासकती का पाठ सीखने के बाद अवधूत ने एक छोटे बच्चे को खेलते हुए देखा जो सभी
15:46चिन्ताओं और इच्छाओं से मुक्थ होकर पून आनंद में लीन था
15:51बच्चे की निश्चिन्तता और सहच प्रसन्ता ने अवधूत को सिखाया कि सच्ची खुशी बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती बलकि
16:00आंतरिक शान्ती और इच्छाओं के अभाव से उत्पन होती है
16:05इसके बाद अवधूत ने एक अकेली युवती को देखा जो चावल कूट रही थी और उसकी कलाईयों पर मौझूद चूडिया
16:13आपस में टक्रा कर शोर कर रही थी
16:17युवती ने ध्यान दिया कि चूडियों का शोर उसे अपने कार्य में एकागर नहीं होने दे रहा था
16:23इसलिए उसने धीरे-धीरे उनमें से कुछ को हटा दिया जब तक की केवल दो चूडिया न रह गई फिर
16:30एक जिससे शान्ती आ गई
16:32इस घटना से अवधूत ने सीखा कि जब बहुत से लोग एक साथ होते हैं तो संधर्ष और अनावशक शोर
16:40उत्पन होता है एकांथी सच्ची शान्ती और आध्यात्मिक उन्नती का मार्ग है
16:47अपनी यात्रा जारी रखते हुए अवधूत ने एक कुशल तीरंदाज को देखा जो अपने लक्षे पर पूरी तरह से केंद्रित
16:55था बाहरी दुनिया की किसी भी चीज से बेखबर
16:59तीरंदाज ने अपनी समस्ट चेतना को तीर और लक्षे के बीच के संबंध में केंद्रित कर दिया था जैसे कि
17:06वे एक ही इकाई बन गए हो
17:09इस अवलोकन से अवधूत ने सीखा कि परम सत्य की प्राप्ती के लिए मन की ऐसी ही अटूट एकागरता आवश्चक
17:17है जहां साधक और साध्य एक हो जाते हैं
17:21अपनी आध्यात्मिक यात्रा में आगे बढ़ते हुए अवधूत ने एक सर्प को देखा जो एक पुराने बिल से निकल कर
17:29बिना किसी निश्चित निवास के खुले मैदान में विचर रहा था
17:33कुछ समय बाद उसी सर्प ने अपनी पुरानी जेनशीन त्वचा को त्याग दिया नए जीवन और नवीनी करण का प्रतीक
17:42बन गया
17:43सर्प से अवधूत ने सीखा कि वास्तविक रिशी कभी भी एक घर से बंधे नहीं रहते और उन्हें पुराने कर्मों
17:51और अशुद्धियों को सर्प की त्वचा की तरहे त्याग देना चाहिए
17:56अपनी गहन तपस्या के दौरान अवधूत ने एक मकडी को देखा जो अपने भीतर से रेशे निकाल कर एक जटिल
18:03और सुन्दर जाला बुन रही थी
18:06मकडी ने अध्भूत धैर्य और सटीक्ता के साथ अपने ही शरीर से निकलने वाले महीन धागों से एक विस्त्रित और
18:14सम्मित सनरचना का निर्मान किया
18:17कुछ समय बाद मकडी ने उसी जाले को धीरे धीरे निकल लिया जैसे कि उसने उसे अपने भीतर समाहित कर
18:24लिया हो और फिर से अपने मूल स्वरूप में लोट आई
18:29मकडी से अवधूत ने सीखा कि ब्रहमांड उसी तरह से स्वय भगवान द्वारा अपने भीतर से उत्पन्न किया जाता है
18:36और अंत्थ उन्ही में समाहित हो जाता है जैसे मकडी अपना जाला बनाती और निगलती है
18:44अपनी यात्रा के अंतिम पड़ाव में अवधूत ने एक भ्रिंगी को देखा जो एक छोटे से कीट को अपने घोसले
18:51में ले जा रही थी और लगातार उसे डंक मार कर रुपांतरित कर रही थी
18:57निरंतर डंक मारने और ध्यान के कारण छोटा कीट धीरे-धीरे अपनी मूल प्रकृती को भूल कर स्वयं को भ्रिंगी
19:05के रूप में मानने लगा अंता उसी रूप में परिवर्तित हो गया
19:09इस घटना से अवधूत ने सीखा की जिस तरह कीट भ्रिंगी के निरंतर ध्यान से भ्रिंगी बन जाता है उसी
19:17प्रकार मनुष्य भी निरंतर इश्वर का ध्यान करके स्वयं इश्वर स्वरूप को प्राप्त कर सकता है
19:24इस प्रकार अवधूत ने प्रिथवी, जल, अगनी, वायू, आकाश, सूर्य, चंद्रमा जैसे महान तत्वों से लेकर छोटे किया
19:33प्रत्यक गुरु से प्राप्त ढ्यान को आत्मसात करते हुए अवधूत ने अंत्य प्रमग्यान और आत्मसाक्षातकार को प्राप्त किया, एक सच्चेज्ञानी
19:42के रूप में ब्रह्मांड के रहस्यों को समझा
19:46युवा अवधूत संसार के मायाजाल से परे सच्चे ज्यान की तलाश में एकांट और चिंतन के मार्ग पर निकल पड़े
19:55उनकी द्रिष्टी गहन चिंतन में डूबी प्रिथवी पर पड़ी जिसने अनंत धैर्य और उदार्ता का गूर पाठ सिखाया
20:03अवधूत ने प्रिथवी को देखा जो बिना किसी शिकायत के सभी जीवजन्तूओ और पहाडों का भार सहती है जिससे उन्होंने
20:11सहनशील्टा का महत्व समझा
20:14जिस प्रकार प्रिथवी बिना किसी अपेक्षा के अपने फल, फूल और खनिच प्रदान करती है उसी प्रकार अवधूत ने नहस्वार्थ
20:23भाव से देने का पाठ सीखा
20:26प्रिथवी से ज्ञान प्राप्त करने के बाद उनकी आखें पास बहती एक पवित्र नदी की और मुडी जहां जल अपने
20:33रहसियों को प्रकट कर रहा था
20:36जल की स्वाभाविक पवित्रता ने उन्हें सिखाया की कैसे मन को रागदवेश और सभी अशुद्धियों से मुक्त करके निर्मल रखा
20:44जा सकता है
20:46जिस प्रकार जल अपने मार्ग में आने वाली हर बाधा के अनुकूल स्वयं को ढाल लेता है उसी प्रकार अवधूत
20:54ने जीवन की चुनोतियों में लचिलेपन का पाठ सीखा
20:58जल निरंतर आगे बढ़ता रहता है कहीं रुकता नहीं इस प्रवाह ने अवधूत को अनासक्ती का संदेश दिया कि कैसे
21:07जीवन में कर्म करते हुए भी फल की इच्छा न रखें
21:11जल के पाठों को हृदय में संजोते हुए उनकी चेतना अब अद्रिश्य वायू की और मुडी जो अपने मौन अस्तित्व
21:19से गहन ज्यान प्रदान करती है
21:22वायू हर वस्तु से होकर गुजरती है फिर भी किसी से लिप्ट नहीं होती इस गुण ने अवधूत को सिखाया
21:29की कैसे संसार में रहकर भी मौहमाया से अप्रभावित रहें
21:34वायू हर जगह उपस्थित है जीवन का आधार है फिर भी स्वयं अद्रिश्य रहती है इस रहस्य ने उन्हें सभी
21:42प्राणियों में ब्रहमा की सर्वव्या पक्ता का बोध कराया
21:46जिस प्रकार वायू सुगंध और दुर्गंध दोनों को धारन करती है परंतु स्वयं उनसे प्रभावित नहीं होती उसी प्रकार अवधूत
21:55ने सुख दुख में संभाव रहने का रहस्य समझा
21:59वायू के सुख्ष्म पाठों को ग्रहन करने के बाद अवधूत की आत्मा ने अनंत आकाश की ओर देखा जो परंव्यापक्ता
22:07का प्रतीक था
22:09आकाश की विशालता ने उन्हें सिखाया कि आत्मा कितनी असीम और सर्वव्यापी है जो सभी सीमाओं से परे हैं
22:18जिस प्रकार आकाश किसी भी वस्तु को धारन करता है पर स्वय उनसे कभी जुड़ा नहीं होता उसी प्रकार अवधूत
22:27ने पूर्ण अनासक्ती का सिध्धान्त समझा
22:30आकाश बिना किसी भेदभाव के सभी घटनाओं का साक्षी बनता है इस अवलोकन ने अवधूत को साक्षी भाव और तटस्थ
22:39ग्रिष्टा बनने की प्रेणा दी
22:41प्रिथवी, जल, वायू और आकाश इन चार महान गुरूओं से प्राप्त गेहन शिक्षाओं को अवधूत ने अपने भीतर आत्मसाथ किया
22:50जिससे उनकी आध्यात्मिक नीम्व मजबूत हुई
22:54उन्हें यह स्पष्ट हो गया कि केवल इन तत्वों में ही नहीं, बलकि पूरी स्रिष्टी के प्रत्येक जीव और वस्तु
23:01में ज्ञान का असीमित स्रोत छिपा है
23:05इस गेहन अंतरग्रिष्टी ने उन्हें अपने चारों ओर की दुनिया का और भी बारीकी से अवलोकन करने और प्रत्येक अनुभव
23:13से सीखने के लिए प्रेरित किया
23:16अपने प्रारंभिक गुरुओं के आशिर्वाद से अवधूत ने शांती और स्पष्टता प्राप्त की अब वे अपने शेश चौबीस गुरुओं से
23:25ज्ञान प्राप्त करने के लिए तयार थे
23:28भगवान विश्णु अपने परम वाहन गरूर को समझाते हैं कि अवधूत ने स्रिष्टी के छोटे-छोटे जीवों से जीवन के
23:36उन रहस्यों को सीखा जो मनुष्य को मोक्ष की ओर ले जाते हैं
23:41वन की शांत और हरीभरी वादियों में घूमते हुए अवधूत की द्रिष्टी एक उचे व्रिक्ष पर बसेरा बनाने में व्यस्त
23:49कबूतरों के एक सुन्दर जोडे पर पड़ी
23:52उन कबूतरों ने अत्यंत प्रेम और लगन से अपने घूसले में कोमल अंडों से निकले नवजात शिशुओं का पालन पोशन
23:59करना शुरू कर दिया
24:02बच्चों के प्रती मातापिता का अत्यधिक और अंधा मोह देखकर अवधूत को यह समझने में देर नहीं लगी कि यह
24:09आ सकती
24:10एक दिन जब मातापिता भोजन की खोज में दूर गए थे तभी एक चतुर बहेलिये ने उस घूसले के नीचे
24:17अपनी बिछाई हुई घातक जाल को फैला दिया
24:21ना समझ और उड़ने में असमर्थ ननहे बच्चे भोजन के लालच में घूसले से नीचे गिरे और बहेलिये के करूर
24:28जाल में बुरी तरह फंसकर तडपने लगे
24:32जैसे ही कबूतरी वापस लोटी और अपने बच्चों को जाल में तडपते देखा उसका हृदय अत्यधिक शोक से फट गया
24:40और वह अपने होश खोकर सीधे उसी जाल में जाफंसी
24:45अपनी पतनी और बच्चों को फंसा हुआ देख नर कबूतर भी गहरे शोक और मोह के वश में होकर बिना
24:52सोचे समझे स्वयन को उसी जाल में जोक बैठा
24:56बहेलिया उस पूरे परिवार को एक साथ जाल में कैद कर खुशी खुशी वहां से ले गया जिसे देखकर अवधूत
25:03ने समझा की अत्यधिक मोह और आसकती केवल विनाश की ओर ले जाती है
25:09इस दुखद घटना से सीख लेते हुए अवधूत ने यह निश्चय किया कि जीवन में किसी भी भौतिक वस्तुया समबंद
25:17से सीमा से अधिक जुडाव आत्मा के पतन का कारण बनता है
25:23अपनी यात्रा को आगे बढ़ाते हुए अवधूत की द्रिष्टी एक विशालकाय अजगर पर पड़ी जो एक घने ज़ाड के नीचे
25:30बिना किसी हलचल के चुपचाप लेटा हुआ था
25:34उस अजगर ने भोजन के लिए न तो कोई दौर भाग की और नहीं कोई प्रयास किया वह केवल अपनी
25:41नियती और संतोष के साथ इश्वर के विधान पर निर्भर था
25:46अजगर की इस शांत मुद्रा से अवधूत ने सीखा कि एक सच्चे साधक को अपनी बुनियादी आवश्शक्ताओं के लिए व्याकुल
25:54होने के बजाए इश्वर पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए
25:58संतोष की यह परम पराकाश्था देखकर अवधूत के मन की बची खुची चिन्ताएं भी समाप्थ हो क्योंकि उन्होंने समच लिया
26:06कि जो भाग्य में है वह स्वतह ही प्राप्थ होगा
26:11आगे बढ़ने पर अवधूत को मधुमक्खियों का एक जुन्ड दिखाई दिया जो फूलों के चारों और गुनगुनाते हुए बड़ी ही
26:18सावधानी से मकरंद इकठा कर रहा था
26:21उन मधुमक्खियों ने प्रत्येक सुन्दर फूल से केवल उतनी ही मिठास ग्रहन की जितनी उन्हें आवश्चकता थी बिना उस फूल
26:30को कोई नुकसान पहुचाए या उसकी सुन्दर्ता को नश्ट किये
26:35अवधूत ने इस अध्भुत क्रिया से यह दिव्यपाठ सीखा कि एक सन्यासी को भी समाज से केवल उतनी ही भिक्षा
26:42लेनी चाहिए जितनी उसके जीवन को चलाने के लिए अनिवार्य हो
26:47तभी एक मधुमक्खी पालक ने उस छत्ते को आग और धुए से जला कर सारा संचित शहद जबरन चीन लिया
26:55और बेचारी मधुमक्खियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा
26:59इस विनाश को देखकर अवधूत ने जाना कि आवशक्ता से अधिक धन और वस्तूओं का संचय करना अंत्ता मनुष्य की
27:08मृत्यू और सर्वनाश का कारण बनता है
27:12भगवान विश्णू इस उपदेश का समापन करते हुए गरूर से कहते हैं कि इन तुछ माने जाने वाले जीवों ने
27:19अवधूत को वह ज्यान दिया जो बड़े-बड़े ग्रंत भी आसानी से नहीं समझा पाते
27:25धन के अनावशक संचय के इस विनाशकारी द्रिश्टांत से गहन शिक्षा लेकर अवधूत ने अपनी यात्रा आगे बढ़ाई, मन में
27:34नए ज्यान की पिपासा लिये हुए
27:37आगे बढ़ते हुए अवधूत ने एक छोटे से पतंगे को देखा जो रात्री के अंधकार में एक जलते हुए दीपक
27:44की ओर उनमत्त सा खींचा चला जा रहा था
27:48उस पतंगे की आखों में एक अजीब सी ललक और तीवर इच्छा थी, जैसे वह उस जोती में ही अपना
27:55अस्तित्व विलीन कर देना चाहता हो
27:58अपनी मृत्यू से अंजान वह नादान जीव उस चमकदार अगनी की मोहक सुन्दर्ता में पूरी तरह डूब गया, अपने पंखों
28:06को तीजी से फर्फडाता रहा
28:09और फिर एक ही क्षण में वह प्रकाश की माया में फंसा पतंगा जल कर राख हो गया, केवल एक
28:16सुक्षम राख का धेर छोड़ कर
28:19अवधूत ने इस घटना से यह शिक्षाली की मनुष्य भी इंद्रियों के बाह्य आकर्शनों में फसकर बिना सोचे समझे अपनी
28:27विनाश की ओर अग्रसर होता है
28:30पतंगे से प्राप्त ज्यान को हरिदय में धारण कर अवधूत ने अपनी खोज जारी रखी प्रकृती के गहन रहसियों को
28:38और अधिक जानने के लिए उच्शुक
28:41तभी उन्होंने एक विशाल जंगली नर हाथी को देखा जो अपनी प्रचंड शक्ती और आकार के बावजूद एक मादा हाथी
28:49की मोहक पुकार पर पूरी तरह मोहित हो गया था
28:53उस नर हाथी की आखों में कामुक्ता की एक तीवर चमक थी जो उसे हर खत्रे से अंजान कर रही
29:00थी
29:02शिपे हुए शिकारी घात लगाए बैठे थे उन्होंने उस शक्तिशाली जीव को फंसाने के लिए एक गहरा गढ़्धा खोद रखा
29:10था जिसे सूखे पत्तों और टहनियों से सावधानी से ढखा गया था
29:15शारिरिक वासना में अंधा होकर वह नर हाथी बिना किसी संकोच के उस फंदे की ओर लपका जिसका कारण एक
29:23पालतु मादा हाथी का मोहक निमंतरण था
29:27और देखते ही देखते वह विशालकाय प्राणी धोखे से ढखे हुए गढ़्धे में गिर गया उसकी शक्ती और गौरव ख्षन
29:35भर में एक पिंजरे में बदल गए
29:38अवधूत ने इस द्रिश से समझा की काम और वासना की अंधी दोड अंतह पतन और पराधीनता का कारण बनती
29:45है
29:47हाथी की नियती से सीख लेकर अवधूत ने अपनी यात्रा जारी रखी और शीघर ही एक और रहस्य में घटना
29:55के साक्षी बने
29:56एक कुशल शिकारी एक सुन्दर म्रिग को फसाने के लिए तयार था जिसके पास कोई हिंसक हथियार नहीं बलकि एक
30:05मधूर बासुरी थी
30:07शिकारी ने धीरे धीरे अपनी बासुरी पर एक ऐसी मनमोहक धुन छेडी जो जंगल की शान्ती में घुल मिलकर म्रिग
30:15के कानों तक पहुँच गई
30:17उस मधूर संगीत में खोकर म्रिग अपने चारों ओर के खत्रे से पूरी तरह बेखबर हो गया और धीरे धीरे
30:25शिकारी की ओर बढ़ने लगा
30:27जैसे ही म्रिग संगीत की सम्मोहन में पूरी तरह डूग गया शिकारी ने अपनी चाल चली और आसानी से उस
30:35असहाई जीव को अपने जाल में फंसा लिया
30:39अवधूत ने इस घटना से सीखा की अत्यधिक श्रवन सुख की लालसा भी मनुष्य को मायावी जाल में फंसा कर
30:46उसके विनाश का कारण बन सकती है
30:50इस पावन प्रसंग में इच्छाओं पर विजयत पतंगा, हाथी और हिरन की महिमा का वर्नन किया गया है
30:58भगवान विश्णु ने अपनी दिव्यवानी में गरूर को आगे का ज्यान देते हुए पिंगला नाम की गणिका की कथा का
31:05वर्नन करना प्रारंभ किया
31:08अवधूत ने विदेह नगरी में घूमते हुए उस सुन्दर पिंगला को देखा, जो अपनी असीम सुन्दरता और धन की लालसा
31:16के कारण एक गहरे भ्रम में जी रही थी
31:19रात धलने लगी थी और पिंगला सुन्दर वस्त्रों और कीमती आभूशनों से सचकर अपने द्वार पर किसी धनी प्रेमी की
31:27प्रतीक्षा कर रही थी
31:30जैसे जैसे रात का अंधकार गहरा होता गया, कोई भी प्रेमी नहीं आया, जिससे उसका हृदय गहरी व्याकुलता और निराशा
31:38से भर उठा
31:40अत्यधिक निराशा के उसक्षण में पिंगला के भीतर अचानक एक दिव्य चेतना जागी और उसने लालसा के व्यर्थ बंधनों को
31:48पहचान लिया
31:50उसने अपनी जूठी आशाओं को सदा के लिए त्याग दिया, द्वार बंद किया और अनासक्ती की गहरी शान्ती में खो
31:58गई
31:59इस घटना को देखकर अवधूत ने समझा कि आशा ही परम दुहक है और आशा का त्याग ही परम सुख
32:06का मार्ग है
32:09इसके बाद भगवान विश्णू ने बताया कि कैसे अवधूत को अगला ज्यान एक अबोध और निश्चिंत बालक से मिला
32:17अवधूत ने एक छोटे बच्चे को धूल में खेलते हुए देखा जो मान अपमान और भविश्य की चिंताओं से पूरी
32:25तरह मुक्थ होकर हंस रहा था
32:27उस बालक की निश्पाप हंसी को देख कर अवधूत ने सीखा कि सच्चा आनंद केवल वर्तमान क्षण में और अहंकार
32:35से मुक्थ होने में है
32:38फिर नारायन ने बताया कि कैसे अवधूत को एकागरता का अमूल्य पाठ एक अकेली युवती से मिला
32:46वह युवती अपने घर में आने वाले अतितियों के लिए भोजन तयार करने हेतु धान कूट रही थी लेकिन उसके
32:53हाथों की चूडिया शोर कर रही थी
32:57चूडियों की खंखन से महमानों को अपनी गरीबी का पता न चले इसलिए उसने एक एक कर अपनी सारी चूडिया
33:04तोर दी और केवल एक ही छोडी
33:07जब केवल एक चूडि बची तो सारा शोर बंध हो गया और उसने पूरी शान्ती और एकागरता के साथ अपना
33:15कार्या अवधूत ने इस घटना से सीखा की भीड में रहने से कलह और अशान्ती होती है जबकि एकांत ही
33:22शान्ती और परम ध्यान का मार्ग है
33:26भगवान विश्णु ने कहा कि इन 24 गुरुओं से प्राप्त ज्यान को संजो कर अवधूत, पूर्णत, शान्त, निर्दवंद्व और मुक्त
33:34हो गए
33:35वे बिना किसी आसकती के जंगलों, परवतों और नदियों के किनारे घूमते हुए, केवल अपनी आत्मा में ही आनंदित रहने
33:44लगे
33:45गरुर ने भगवान के इस अद्भुत उपदेश को सुनकर उनके चर्णों में शीष जुकाया और अपनी शंकाओं के निवारण पर
33:53आभार व्यक्त किया
33:56नारायन ने अंत में समझाया कि जो मनुष्य प्रकृती और अपने परिवेश से सदा सीखता है, वह इस संसार में
34:03रहते हुए भी मुक्त रहता है
34:06इस प्रकार गरुर पुरान के इस पावन अध्याय में अवधूत के 24 गुरुओं का यह अध्भुत रहस्य और पूर्ण स्वतंत्रता
34:14का मार्ग समाप्थ होता है
34:17गरुर की श्रद्धा से अभिभूत होकर भगवान विश्णु ने अपनी गहन द्रिष्टी से उन्हें देखा और अपनी दिव्यवानी में आगे
34:26का उकदेश प्रारंभ किया
34:27मानो अनंत ज्यान का सागर अब अपनी अंतिम लहरें तट तक पहुँचा रहा हो
34:33उन्होंने समझाया कि अवधूत के प्रत्येक गुरु उस शाश्वत सत्य के प्रतीक हैं जो अज्ञान के अंधकार को चीर कर
34:41आत्मा को वास्तविक मुक्ती की ओर ले जाते हैं
34:46नारायन ने बल दिया कि ये शिक्षाय मात्र ज्यान नहीं अपितु जीवन का वह सार हैं जो किसी को भी
34:53जन्ममृत्यू के चक्र से परे जाकर परमशान्ती दिला सकती हैं
34:58उन्होंने गरूर को समझाया कि वैराग्य, संतोष और इंद्रिय इच्छाओं पर विजय ही वह त्रिवेणी है जो आत्मा को सांसारिक
35:07मुहमाया के दलदल से बाहर निकालती है
35:11वैराग्य की शक्ती वह है जो मन को क्षणभंगूर सुखों से हटा कर अनंत आनंद की ओर मोर देती है
35:18जैसे एक कमल का पत्ता जल में रहकर भी उससे अलिप्त रहता है
35:24संतोष वह अमूल्यधन है जो किसी भी स्थिती में मन को शांत और स्थिर रखता है दरिद्रता में भी समरिद्धी
35:31का अनुभव कराता है
35:34और इंद्रिय इच्छाओं पर विजय पाना, स्वयम पर पूर्ण नियंत्रन स्थापित करना है जिससे मन मायावी प्रलोभनों के चंगुल से
35:42मुक्त हो जाता है
35:44जो प्राणी इन तीनों गुनों को धारण करता है वह इस संसार में रहते हुए भी कर्मों के बंधन से
35:51उपर उठ जाता है जैसे आकाश में उर्ता पक्षी धर्ती से निरलिप्त रहता है
35:58भगवान ने आगे कहा कि धर्म का जीवन जीना ही नरक्की पीडा को पार करने का एक मात्र मार्ग है
36:05क्योंकि धर्म ही पुन्य कर्मों का बीज बोता है
36:09सत्य अहिंसा, दान, तपस्या और सेवा जैसे पवित्रकार्य आत्मा को शुद्ध करते हैं और उसे उर्ध्व लोकों की ओर खीचते
36:18हैं
36:20उन्होंने समझाया कि प्रत्य कर्म एक बीज है जो अपने फल अवश्य देता है भले ही वह ततकाल प्रकट न
36:28हो
36:29पुन्य कर्म सुख और शान्ती लाते हैं जबकि पाप कर्म पीड़ा और अशान्ती को जन्म देते हैं यह प्रकृती का
36:37अटल नियम है
36:39फिर भी भगवान नारायन ने गरुड को आश्वस्त किया कि कर्मों के इन गंभीर परिनामों के बावजूद भी आशा की
36:47एक किरण सदैव विद्यमान रहती है
36:51यह आशा है आत्मज्यान और ईश्वर की भक्ती की जो किसी भी आत्मा को अंधकार से प्रकाश की और खींच
36:59ले जाती है
37:01परम आध्यात्मिक स्वतंत्रता वह अवस्था है जहां आत्मा कर्मों के जाल से मुक्त होकर अपने वास्तविक दिव्य स्वरूप को प्राप्ट
37:10करती है
37:12यह जन्म और मृत्यू के चक्र से मुक्ती है, जहां आत्मा ब्रह्मांड के साथ एकाकार होकर असीम चेतना का अनुभव
37:20करती है
37:22गरूर प्रत्येक शब्द को अपने हृदय में उतारते हुए अपलक भगवान के दिव्य स्वरूप को निहार रहे थे, उनके मन
37:30से सभी शंकाएं पूर्नत्या विलीन हो चुकी थी
37:34नारायन ने अंत में अपने भक्त गरूर को आशिरवाद देते हुए कहा कि इस ज्ञान का प्रचार करो ताकि हर
37:41आत्मा मुक्ती का मार्ग जान सके
37:44इस प्रकार भगवान विश्णू ने गरूर पुराण के इस पावन अध्याय का समापन किया
37:50जहां अवधूत की शिक्षाओं का सार और गरूर ने परमपिता के चर्णों में पुनह शीश जुकाया
37:56अपने हृदय में ज्ञान की जोती लेकर अब वे अपने अगले कर्तव्य और यात्रा के लिए पूर्णत है तत्पर थे