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श्रीमद्भागवत पुराण के 12वें स्कंध में जानिए राजा परीक्षित का अंतिम क्षण और तक्षक नाग का दंश! महर्षि शुकदेव जी के दिव्य उपदेशों के बाद कैसे परीक्षित ने मृत्यु के भय को जीतकर मोक्ष प्राप्त किया? पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए राजा जनमेजय ने कैसे रचा ब्रह्मांड का सबसे भयानक 'सर्प सत्र यज्ञ'? जानिए आस्तीक मुनि के हस्तक्षेप और चारों प्रलयों (नैमित्तिक, प्राकृतिक, आत्यंतिक और नित्य) का अद्भुत रहस्य! Watch Bhagavata Purana Episode 99 for a deep cinematic experience.
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00:00गंगा के पावन तट पर शुकदेव गोस्वामी परम ज्यानी राजा परीक्षित को काल की गती और चार प्रकार के महाप्रलय
00:07का गेहन उपदेश देने लगे।
00:10शुकदेव जी ने कहा कि हे राजन यह द्रिश्य जगत नाशवान है और काल निरंतर हर क्षण स्रिष्टी के कंकन
00:17का विनाश करता रहता है जिसे नित्य प्रलय कहते हैं।
00:23स्रिष्टी का प्रत्येक जीव प्रतिपल मृत्यू की ओर अग्रसर है और इस क्षण भंगुर संसार में निरंतर होने वाला यहक्षय
00:31ही नित्य प्रलय का वास्तविक स्वरूप है।
00:35इसके बाद शुकदेव जी ने नैमित्तिक प्रलय का वर्णन किया जो ब्रह्मा जी के एक दिन के अंत में उनकी
00:42निद्रा के समय घटित होता है।
00:45जब ब्रह्मा जी योग निद्रा में लीन होते हैं तब भगवान संकर्शन के मुख से उत्पन होने वाली प्रल्यंकारी अग्णी
00:53तीनों लोकों को भस्म करने लगती है।
00:57भूर लोक, भुवर लोक और स्वर लोक इस महागनी की लप्टों में घिर कर सुलगने लगते हैं, जिससे सम्पून ब्रहमांड
01:04में केवल ताप ही शेश रह जाता है।
01:08तक पश्चात प्रल्यंकारी मेग उमरते हैं और सौ वर्षों तक लगातार ऐसी मूसलाधार वर्षा करते हैं कि तीनों लोक जल
01:16मगन हो जाते हैं।
01:19चारो और केवल एक ही विशाल महासागर दिखाई देता है, जिसे एकारनव कहा जाता है, जहां सम्पून स्रिष्टी जल में
01:27विलीन हो जाती है।
01:30शुकदेव जी ने आगे प्राकृत प्रलय का रहस्योद घाटन किया, जो तब होता है जब ब्रह्मा जी की आयू के
01:37सौ वर्ष पूर्ण होते हैं और प्रकृती अपने मूल तत्वों को वापस समेट लेती है।
01:44इस प्रलय में सबसे पहले प्रिथवी तत्व जल में विलीन हो जाता है, जिससे समस्थ ठोस जगत का अस्तित्व समाप्थ
01:51हो जाता है।
01:53फिर जल की रस्तन मात्रा को तेज अर्थात अगनी तत्व सोख लेता है, जिससे संपूर्ण ब्रहमांड में केवल धधकती हुई
02:01ज्वाला ही शेश रह जाती है।
02:04वह अगनी भी वायु तत्व में लीन हो जाती है, और तब केवल एक प्रचंड प्रचंड आंधी पूरे ब्रहमांड में
02:12बहती है, जो सब कुछ उड़ा ले जाती है।
02:16वायू तत्व आकाश में समा जाता है और फिर वह आकाश भी तामस अहंकार में विलीन हो जाता है जिससे
02:23केवल शून्य और अंधकार रह जाता है।
02:46आत्मा के परमात्मा में विलीन होने पर होता है। यह मोक्ष की वह अवस्था है जहां जीवात्मा माया के बंधनों
02:55से मुक्त होकर सच्चिदानन्द भगवान के परमधाम को प्राप्त करती है।
03:16इस नश्वर शरीर को डंसेगा, तुम्हारी अविनाशी आत्मा को छूब ही नहीं सकेगा।
03:22परीक्षित ने अपनी आखें बंध कर ली और स्वय को भगवान वासुदेव के ध्यान में पूरी तरह समर्पित कर दिया।
03:29उनका चित अब ब्रह्मा में लीन हो चुका था।
03:33गंगा तट पर उपस्थित समस्त रिशिमुनी इस अध्भुत द्रिश्य को देख कर मौन हो गए। मानोवे राजा परीक्षित के महाप्रयान
03:41के साक्षी बन रहे हो।
03:43उसी क्षन एक सुक्ष्म कीट के रूप में छिपा तक्षक नाग जो फलों की टोकरी में छिपकर आश्रम में प्रवेश
03:51कर चुका था। गंगा तट पर राजा परीक्षित की ओर रेंगता हुआ बढ़ा।
03:56यद्यपी राजा अपने ध्यान में लीन थे। गंगा तट पर उपस्थित समस्त विशिमुनियों ने वायुमंडल में एक अप्रत्याशित अशुब उर्जा
04:05का स्पंदन महसूस किया। जिससे उनकी शान्तिपूर्ण अभिव्यक्ती में हलकी चिंता चा गई।
04:12सहसा वह छोटा कीट अपने वास्तविक विशालकाय रूप में प्रकट हुआ। एक भयंकर तक्षक नाग के रूप में जिसकी चमकती
04:21हुई हरी तवचा सूर्य की रोशनी में जिल्मिला उठी।
04:25इससे पहले की कोई प्रतिक्रिया दे पाता, प्रचंड तक्षक ने राजा परीक्षित के नश्वर शरीर पर अपने विशैले फन से
04:33भीशन डंक मारा, जिससे एक तीवर मर्मभेदी पीडा का क्षन वातावर्ण में छा गया।
04:39दंक लगते ही, परीक्षित का भौतिक शरीर एक क्षन के लिए असहनिय दर्थ से काम उठा, फिर तेजी से नीला
04:47काला पड़ने देखते ही देखते, राजा का नश्वर देह धुएं और लप्टों के भयंकर आगोश में समा गया, जो उनके
04:55भौतिक अस्तित्व के त्वरि
04:56और अंतिम विनाश का संकेत था, जैसे ही अगनी की लप्टे चरम पर पहुँची, राजा के दाह संसकारित शरीर से
05:05एक सुक्ष्म, दिव्य, सुनहरी रोशनी धीरे से उपर उठी, जो उनकी अविनाशी आत्मा का प्रतीक थी,
05:13शुक्देव गोस्वामी ने अपनी गंभीर द्रिश्टी से उस आरोही प्रकाश का अनुसर्ण किया और शांति पूर्वक अपनी उंगली उठाई, मानो
05:22समस्त उपस्थित जन को आत्मा की अमर्ता की ओर संकेत कर रहे हूँ,
05:28इस अद्भुत और अलौकिक ग्रिश को देख कर, सभी रिशिमुनियों ने आत्मा के अमर्स्वरूप को हृदय से स्विकार कर लिया,
05:36उनके चहरे पर गहन शांती और मोक्ष की समझ जलक रही थी,
05:41शुकदेव जी ने अपनी दिव्यवानी में कहा, हे श्रिष्ठ विशियों, यह शरीर नश्वर है, जैसे एक पुराना वस्त्र किन्तु आत्मा
05:50अविनाशी है, जो शाश्वत ब्रह्मा का ही अंश है,
05:55उन्होंने समझाया कि जिस प्रकार दीपक की लौ अपने तेल और बाती के नश्ट हो जाने पर भी अपनी जोती
06:02के सार को खोती नहीं, उसी प्रकार आत्मा भी शरीर के अंत से अप्रभावित रहती है,
06:09परीक्षित की आत्मा एक शुद्ध प्रकाशितकन के रूप में गंगा तट के उपर उठकर धीरे धीरे भौतिक संसार की सीमाओं
06:17को पार करती हुई, अनंत आकाश की ओर बढ़ने लगी,
06:22उपर की ओर बढ़ते हुए, वह आत्मा एक असीम ब्रहमांडिय प्रकाश पुन्च की ओर आकर्शित हुई, जो समस्त स्रिष्टी को
06:30धारन करने वाले परम पुरुशार्थ परमपिता परमात्मा का ही सार था,
06:35अंतर परीट्षित की आत्मा उस असीमित और अनादी परमजोती में समाहित हो गई, जैसे एक गूंद सागर में मिलकर अपनी
06:44पहचान खोकर सागर ही बन जाती है,
06:48शुकदेव जी ने समापन करते हुए कहा कि जन्म और मृत्यु केवल एक भ्रामक नाटक है और आत्मज्यान से ही
06:56मनुष्य इस मायावी चक्र से मुक्ष प्राप्थ कर सकता है,
07:02समस्त्र शिमुनी इस सर्वोच ज्यान को प्राप्थ कर, कृतज्यता और गहरी श्रद्धा से शुकदेव गोस्वामी के चर्मों में नत्मस्तक हो
07:10गए, उनके हृदय प्रकाशमय हो उठे थे,
07:13अब अपना अंतिम उपदेश पूर्ण कर, शुकदेव गोस्वामी धीरे-धीरे अपने स्थान से उठे, उनकी उपस्थिती में एक अलौकिक शक्ती
07:23और शान्ती व्याप्त थी, मानो वे इस नश्वर लोक से विदा लेने को तत्पर होूं।
07:29जाने से पहले, उन्होंने उपस्थित समस्त रिशियों और गंगा तट पर बिखरी पवित्र भूमी पर एक अंतिम, करुणामय और आशिरवादी
07:38द्रिश्टी डाली, जिससे वातावर्ण दिव्य उर्जा से भरूठा।
07:43समस्त रिशिमुनी अपने हृदय में प्राप्त ग्यान और उस महान संत के स्मरण को संजोए हुए, मौन भाव से उन्हें
07:50विदा कर रहे थे, मानो एक युग का समापन देख रहे हुँ।
07:55फिर बिना किसी ध्वनी या हल चल के, शुकदेव गोस्वामी का दिव्य रूप धीरे धीरे प्रकाश में विलीन हो गया,
08:02और वे असीम आकाश में उज़ल हो गए, पीछे एक गहन शांती छोड़ते हुए।
08:09शुकदेव गोस्वामी के अंतरध्यान होने के पश्चात, राजा परीक्षित तक्षक के श्राप के भय से पूर्णतह मुक्थ होकर पवित्र गंगा
08:17तट पर कुश के आसन पर स्थिर बैठ गए।
08:21उन्होंने उपस्थित सभी परमज्यानी महर्शियों की ओर देखकर अत्यंत विनमरस्वर में कहा कि श्रीमत भागवत का श्रवन कर उनका अज्ञान
08:30सदा के लिए नश्ट हो चुका है।
08:33राजा ने रिशियों के चर्णों में अपना मस्तक जुका कर उनसे अपने अंतिन ध्यानमार्क के लिए आशिरवाद और अनुमती मांगी।
08:42महर्शी व्यास के शिश्यों और अन्यमहान संतों ने राजा परीक्षित पर पवित्र जल छिड़कते हुए उन्हें परमधाम की प्राप्ती का
08:51शुभ आशिरवाद प्रदान किया।
08:54ततपश्चात राजा परीक्षित ने पदमासन लगाया और अपनी द्रिष्टियों को स्थिर करते हुए अपने मन को पूर्ण रूप से भगवान
09:02श्रीक्रिष्न के चर्णों में समर्पित कर दिया।
09:05उन्होंने अपनी आँखों को मूंद लिया और बाह्य संसार की समस्त ध्वनियों, विचारों तथा मृत्यू के भई से अपना संबंध
09:13सदैव के लिए तोड़ लिया।
09:16राजा के हृध्यक्मल पर भगवान श्रीक्रिष्न का चार भुजाओं वाला परमसुंदर और तेजस्वी रूप प्रकट हो गया, जो कौस्तुभ मनी
09:25से सुशोभित था।
09:26उनकी प्राणवायू मूलाधार चक्र से उठकर सुशुम्ना नाडी के माध्यम से तीवर गती से ब्रहमरंध की और प्रवाहित होने लगी।
09:35गंधर्वों और देवों द्वारा बजाये जाने वाले अलौकिक संगीत की मधुर ध्वनी से संपूर्ण गंगा तटगूज उठा और वातावर्ण में
09:44शान्ती चा गई।
09:46पवित्र गंगा नदी की तीवर धाराएं भी राजा की ध्यान मुद्रा के सम्मुख मानों अत्यंत शान्त होकर बिना किसी कोलाहल
09:54के बहने राजा परीक्षित निर्विकल्प समाधी की उस परमस्थिती में पहुँच गए जहां सुखरुख, जीवनमरन और संसार का द्व
10:15समस्त रिशी मुनी मंत्र मुख्ध होकर इस अभूत पूर्व द्रिश्य को देख रहे थे कि कैसे एक राजा ने ज्यान
10:23के बल पर काल का भई जीत लिया
10:26आकाश मंडल में एकत्र हुए देवताओं ने राजा के अटूट भक्तिभाव को देख कर उन पर पारिजात पुष्पों की वर्षा
10:33करना प्रारंभ कर दिया
10:36राजा परीक्षित की चेतना भौतिक संसार से परेजा कर बैकुंठ लोग के नित्य आनंदमय धाम में विलीन होने लगी
10:44उनका नश्वर शरीर अब किसी अविचल परवत की भांती निश्प्राण किन्तु पूर्णत है पवित्र और द्योतिमान होकर वही स्थापित रहा
10:54दूर मार्ग में तक्षक नाग अपने विनाशकारी डंग के साथ राजा की ओर बढ़ रहा था
11:00किन्तु राजा की आत्मा भौतिक शरीर की सीमाओं से परेजा चुकी थी
11:06राजा के भीतर प्रजवलित हुई ध्यानगनी ने उनके सूक्षम शरीर के समस्त करमाश्यों को भस्म कर दिया
11:14उपस्थित महर्शियों ने सामवेद के पवित्र मंत्रों का सस्वर पाठ करना आरंभ किया
11:19जिससे समपूर्ण तट पर एक अभेद्य आध्यात्मिक सुरक्षाक्वच निर्मित हो गया
11:26श्रीकृष्ण भावना भावित होकर राजा परीक्षित अपने अंतिम क्षण में काल, समय और मृत्यु के मायावी जाल से सदास्दा के
11:34लिए मुक्थ हो गए
11:36जैसे ही राजा परीक्षित ने देह त्याग कर परमधाम की ओर प्रस्थान किया, संपूर्ण ब्रहमांड में एक अलौकिक शान्ती छा
11:44गई, मानों समय की धाराक्षन भर के लिए थम गई हो
11:49यग्यशाला में उपस्थित रिशियों के मुख से निहसरित वैदिक मंत्रों की प्रतिध्वनी आकाश गंगाओं में विलीन हो गई, और एक
11:56पवित्र प्रकाश पुंज ने राजा के निश्प्रान शरीर को घेर लिया
12:01महाराज परीक्षित का पार्थिव शरीर शान्त और दिव्य आभासे युक्त किसी योगी के समान ध्यानस्थ मुद्रा में बना रहा, जो
12:10उनके परमोच्च आध्यात्मिक उत्थान का प्रतीक था
12:14उसी क्षन नाग लोग के घने अंधकार में तक्षक को एक तीवर कमपन का अनुभव हुआ, जो उसके भीतर प्रतिशोध
12:22की ज्वाला को और भी अधिक प्रजवलित कर गया
12:26नागराज तक्षक एक विशालकाय, गहरे हरे रंग का, मानसल नाग जिसका उपरी धड मनुष्य जैसा था, अपनी गुफा से बाहर
12:35निकला, उसकी आखें लाल अगनी के समान चमक रही थी
12:39क्रूर प्रतिशोध से प्रेरित तक्षक ने राजा परीक्षित की और अपनी भयानक यात्रा आरंभ की, उसके प्रत्येक कुंडलित गती से
12:48धर्ती काप रही थी, और विशैली फुफकार वातावर्ण में भर रही थी
12:53तक्षक अपनी नागों की विशाल सेना के साथ वायुमंडल को भेदता हुआ आगे बढ़ा, जिसका एक-एक सदस्य उसके भयानक
13:02उद्देश में द्रिड़ता से समर्पित था, मानो मृत्यू स्वया अपने दूतों के साथ चली हो
13:09दूसरी और हिमालय की बरफीली चोटियों पर ध्यानस्थ कश्यप मुनी को अचानक एक अशुब संकेत मिला, जिसने उन्हें आने वाले
13:17विनाश से अवगत कराया और उनके हृदय में करुना जगा दी
13:22कश्यप मुनी ने अपनी दिव्यद रिष्टी से परीक्षित पर मंडराते मृत्यू के साए को देखा और तुरंथ ही शाप के
13:29प्रभाव को निश्वल करने के लिए तपोबल से युक्त आउश्धियों को सिध्ध करने का संकल्प लिया
13:35एक वृद्ध शांत चहरे वाले कश्यप मुनी ने अपने कमंडल और दंड के साथ यात्रा आरंभ की उनके प्रत्येक कदम
13:44में ब्रहमांडिय उर्जा और जीवों के प्रती असीमदया समाहित थी
13:49वन्य मार्ग से गुजरते हुए कश्यप मुनी को दूर से ही तक्षक की विशालकाई और भयानक आकरिती दिखाई पड़ी जो
13:57तीवर गती से परीच्षित की दिशा में आगे बढ़ रही थी
14:01अपनी योजना को विफल होते देख नागराज तक्षक ने ततकाल एक भयावा रणनीती बनाई और अपनी दिव्यमाया से एक साधारन
14:11ब्राहमन का रूप धारन कर लिया
14:14जैसे ही कशप मुनी और ब्राहमन वेश्धारी तक्षक आमने सामने आये तक्षक ने अपनी वास्तविक पहचान छिपाते हुए विनमरता पूर्वक
14:23मुनी से उनके गंतव्य का कारण पूछा
14:26कशप मुनी ने अपनी करुणा और परीक्षित को सर्प दंश से बचाने के अपने उद्देश को सपष्ट करते हुए ब्राहमन
14:34वेश्धारी तक्षक को विस्तार से अपनी यात्रा का कारण बताया
14:39तक्षक ने तब अपने ब्राह्मन रूप में कशप की क्षमताओं पर संदेह व्यक्त किया और उन्हें एक पेड़ पर अपने
14:47विश्का परीच अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करने के बाद कशप मुनी ने उसी जले हुए व्रिक्ष को अपने मंत्रों से
14:54पुनर जीवित क
14:55जिससे तक्षक की आखों में भय और विस्मय एक साथ जलक उठे तक्षक ने अपनी वास्तविक पहचान उजागर न करते
15:04हुए कशप मुनी को अपरिमित स्वन मुद्राओं और रतनों का लालच दिया ताकि वे अपने मार्ग से लोट जाएं और
15:12परीक्षित की सहायता न क
15:14करें लालच के मायाजाल में फंसे कशप मुनी के भीतर द्वंद्व छिड़ गया जहां एक और उनका करतव्य था वहीं
15:23दूसरी और असीम धन का प्रलोभन उन्हें अपनी और खीच रहा था
15:28अंतर भाग्य के अटल विधान और अगाध धन के प्रलोभन से विचलित होकर कशप मुनी ने तक्षक के प्रस्ताव को
15:36स्विकार कर लिया और अपनी यात्रा को बीच में ही त्याग दिया
15:41असीम धन प्राप्त कर कशप मुनी उसी मार्ग से वापस लोट गए जिससे तक्षक का मार्ग परिच्षित तक पहुँचने के
15:48लिए पूर्णत्या निर्बाध हो गया और नेती ने अपनी करूर चाल चली
15:54कशप मुनी के मार्ग से हटने के बाद तक्षक काल के दूट की भांती परीच्षित तक पहुँचने के लिए एक
16:01अग्रिश्य भयावः गती से आगे बढ़ा उसके मन में प्रतिशोध की ज्वाला धधक रही थी
16:07गंगा तटपर स्थित अपने आश्रम में राजा परीच्षित एक शांत और दिव्य आभा से घिरे ध्यानमगन बैठे थे अपने पार्थिव
16:17शरीर के अंत की प्रतीक्षा में उनकी आत्मा मोक्ष की ओर उन्मुख थी
16:22अंतिन विदाय के प्रतीक स्वरूप श्रधालू ब्राहमन और शिश्य अपनी श्रधा से भरे हुए राजा को अर्पित करने के लिए
16:31ताजे फल और सुगंधित पुश्पों से सजी टोक्रिया लेकर आश्रम में प्रवेश कर रहे थे
16:36इन्ही पुश्पों की एक टोक्री में अत्यंत सुख्ष्म रूप धारण कर तक्षक एक छोटे हरे रंग के कीट के समान
16:45चुपचाप जा बैठा अपने घातक उद्देश को छिपाये हुए नेती के अंतिन ख्षणों की प्रतीक्षा में
16:53अज्ञानतावश एक शिष्य ने वही टोक्री राजा परीक्षित के सम्मुख प्रस्तुत की जिसमें छिपा हुआ तक्षक अपने क्रूर कार्य को
17:01अंजाम देने के लिए आदश अफसर की प्रतीक्षा कर रहा था
17:06जैसे ही राजा परीक्षित ने अपनी आखें खोली और टोक्री से एक फल उठाया कीट रूपी तक्षक ने अपने वास्तविक
17:14भयावह स्वरूप में आने के लिए क्शन भर में अपना सुक्ष्म आवर्ण त्याग दिया
17:20पलक जपकते ही वह छोटा कीट एक विशालकाय भयानक नाग में परिवर्थित हो गया जिसका प्रत्येक पैमाना मृत्यू का संदेश
17:29दे रहा था और उसकी आखें प्रतिशोध की ज्वाला से धधक रही थी
17:34क्रोध और प्रतिशोध से भरा तक्षक एक तीवर गर्जना के साथ बिजली की गती से राजापरीक्षित की ओरलपका नेती के
17:43उस अटल विधान को पूरा करने के लिए
17:46तक्षक के घातक डंक ने राजा परीक्षित के शरीर को छूते ही एक भयंकर अगनी की ज्वाला में बदल दिया,
17:53जहां उनका पार्थिव देहक्षन भर में जल कर राख होने लगा
17:58देखते ही देखते, राजा परीक्षित का शरीर अगनी की लप्टों में समाहित हो गया, उनका भौतिक अस्तित्वक्षन भर में ही
18:06राख के कणों में विलीन हो गया, एक तेजस्वी प्रकाश को पीछे छोड़ कर
18:12जैसे ही भौतिक शरीर राख में बदल गया, राजा परीक्षित की दिव्य आत्मा एक शुद्ध तेजस्वी प्रकाश पुंच के रूप
18:20में उस जलते हुए शरीर से मुप्थ होकर आकाश की ओर प्रवाहित हो गई
18:26आत्मा जैसे ही उपर उठी, उसे वैकुंठ धाम का भव्य दर्शन हुआ, जहां पर्मानंद और अनंत शांती का सामराज्य था,
18:35भगवान विष्णु का दिव्य निवास
18:38वैकुंठ के द्वार पर देवदूतों और पार्शदों की स्वर्गिय भीड ने राजा परीक्षित की आत्मा का स्वागत किया, अपनी वीना
18:46और मृदं की मधुर ध्वनी से दिव्य संगीत छेड़ते हुए
18:50परम सत्ता के प्रती अपनी अटूट भक्ती के कारण, राजा परीक्षित की शुद्ध आत्मा सीधे भगवान विष्णु के दिव्य चर्णों
18:58में समाहित हो गई, मोक्ष के परम आनंद को प्राप्त करते हुए
19:03गंगा तट पर रिशिमुनियों ने परीक्षित के भौतिक शरीर के पूर्णता जल कर राख होने और उनकी आत्मा के दिव्य
19:11आरोहन को देख, परम मोक्ष के इस अध्भुत क्षण को आत्म साथ किया
19:17अपने क्रूर कार्य को सफलता पूर्वक अंजाम देने के बाद, तक्षक अपने विशालकाय रूप में गंगा के गहरे जल में
19:25तेजी से विलीन हो गया, अपने विशैले विजय का जश्न मनाता हुआ
19:30वायू के जोकों के साथ यह भयावह समाचार दूर-दूर तक फैल गया कि राजा परिक्षित का कालसर्प तक्षक के
19:38डंक से दुखद अंत हो गया है, जिससे सभी प्रजाजन शोक में डूब गये
19:43जब यह दारोन समाचार हस्तिनापुर पहुँचा, तो युवा राजकुमार जनमेजय अपने पिता के असामाईक निधन की खबर सुनकर गहरे शोक
19:52में डूब गये, उनका हृदय पीडा से विदियन हो गया
19:57जनमेजय के दुख ने जल्द ही एक भयंकर क्रोध का रूप ले लिया, उनके भीतर अपने पूज पिता के हत्यारे
20:04तक्षक से प्रतिशोध लेने की तीवर ज्वाला भड़क उठी
20:09अपनी मुठी भीच कर जनमेजय ने गर्जनाकी की वह समस्त सर्प जाती का विनाश कर देंगे अपने पिता की मृत्यू
20:17का राजा जनमेजय ने बिना किसी विलंब के अपने मंत्रियों और विद्वान राजपुरोहितों को एक ऐसे अभूत पूर्व सर्प सत्र
20:25यग्य की
20:25तैयारी करने का कठोर आदेश दिया जो पूरी सर्प जाती को भस्म कर दे प्राचीन शास्त्रों के पन्नों को पलटते
20:34हुए प्रकांड ब्राहमनों ने उस अत्यंत गुप्ट और जटिल महायग्य के नियमों का अध्ययन किया जिससे ब्रहमांड के हर कोने
20:42से सर्पों को अ
20:55महाबली की ज्वालाए आकाश को छू सकें।
21:25उन्दुलब और विनाशकारी मंत्रों का उच्चस्वर में उच्चारण शुरू किया जिनकी प्रतिध्वनी तीनों लोकों में सर्पों के लिए महाकाल का
21:34बुलावा बन गई। जैसे ही पहले मंतर की हुंकार गुमजी, यग्यकुंड से काला और सुनहरा धुआ उठकर प
21:55भांती भांती के छोटे ब्रे सर्प स्वतै ही अपने बिलों से खिंचे चले आने लगे। बेबस और असहाय चीतकार करते
22:03हुए, लाखों सर्प हवा में किसी जीवित रसी की भांती खिंचते हुए सीधे धधकती हुई यग्यगनी में आाकर गिरने लगे।
22:25जलती हुई पपडियों की गंध और सुनहरी चिंगारियों से रात का सन्नाटा भर गया, जबकी राजा जनमेजय बिना पलक जपकाए
22:33निश्ठूरता से आहूतिया समर्पित करते रहे।
22:55पहुचा और वहां देवराज इंद्र के चमचमाते सिनहासन के पीछे चुपकर शरण मांगने लगा।
23:01तक्षक ने देवराज इंद्र के सिनहासन पर कसकर अपनी कुंडली मारली और गिड़गिडाते हुए दुहाईदी की देवराज उसे इस भयानक
23:10मानवी यग्य से बचा लें।
23:13हस्तिनापुर में बैठे रिशियों ने अपनी दिव्यद रिष्टी से तुरंट जान लिया कि महाप्राधी तक्षक देवराज इंद्र के सनरक्षन में
23:21स्वर्ग में छिपा बैठा है।
23:24यह सुनते ही राजा जनमेजय का क्रोध अपनी सीमाय पार कर गया और उन्होंने गर्जना करते हुए पुरोहितों को आदेश
23:32दिया कि तक्षक के साथ साथ इंद्र को भी अगनी में खींच लाया जाए।
23:37पुरोहितों ने अत्यंत उग्र इंद्राय स्वाहा तक्षकाय स्वाहा के मंत्रों का पाठ शुरू किया जिससे एक विशाल स्वर्णिम बवंडर उत्पन
23:47होकर सीधे स्वर्ग की ओर लपका।
23:50स्वर्गलोग की धर्ती कामपने लगी और देवराज इंद्र का सिनहासन तक्षक सहित खींचता हुआ सीधे हस्तिनापुर के धधकते कुंड की
23:59ओर हवा में गिरने लगा।
24:02आकाश में विचर्ण करने वाले गंधर्व, देव और सिध पुरुष इस द्रिश को देखकर भैभीत हो गए कि एक नश्वर
24:09राजा का यग्य देवराज और स्वर्ग की मर्यादा को हिला रहा था।
24:14ठीक उसीक्षन, जब इंद्र का सिनहासन और तक्षक यग्यकुंड की विनाशकारी ज्वालाओं के ठीक उपर पहुँच गए, तभी युवा और
24:23शान्तचित रिशी आस्तीक ने यग्यभूमी में प्रवेश किया।
24:28यग्यभूमी में प्रवेश करते ही, युवारिशी आस्तीक के शांत और तेजस्वी आभामंडल ने तुरंत ही उस भयंकर विनाशकारी उर्जा को
24:37सोखना शुरू कर दिया, जिससे वातावर्ण में एक अध्भुत शांती और पवित्रता का संचार हुआ।
24:43अपने क्रोधित भाव में डूबे राजा जनमेजैने पहले तो आस्तीक को अनसुना कर दिया, लेकिन यग्यकी तीवर उर्जा में आई
24:52अचानक कमी से विचलित होकर उन्होंने धीरे-धीरे अपनी आखे घुमाई और उस तेजस्वी बालक को देखा।
25:01विनाशकारी ज्वालाओं के ठीक उपर अधर में लटके तक्षक, अपने प्राणों पर संकट देखकर अत्यधिक भयभीत था, लेकिन आस्तीक के
25:10प्रवेश ने उसे विनाश के इस महासागर में आशा की एक छोटी सी किरन दिखा दी।
25:16अगाध करुणा से भरे रिशी आस्तीक ने जनमेजय के समक्ष हाथ जोड कर विनमरता पूर्वक किन्तु द्रिड़ता से उस महाविनाशकारी
25:25यग्य को रोकने की याचना की, जिससे अंगिनत निर्दोष सर्पों का वध हो रहा था।
25:31महाराज जनमेजय ने अपने सिनहासन से नीचे उतर कर क्रोधित आखों से आस्तीक को घूरते हुए उसके इस अनुच्छ अपनी
25:40शांत वानी में आस्तीक ने अपनी माता मनसा देवी और पिता जरतकारु मुनी के वंश का परिचय दिया और बताया
25:48कि वह इस यग्य को रोक
26:01को अपने प्रतिशोध के मार्ग में एक बाधा मानते हुए उसे नागों का पक्षधर कहकर उपहास किया और अपनी प्रतिग्या
26:09पूरी करने पर अडिग रहे
26:11राजा के क्रोध और रिशी की द्रिड़ता के बीच यग्य करने वाले रित्विक ब्राहमनों के मंत्रों में थोड़ी अस्थिर्ता आ
26:19गई उनकी आवाजे लडखडाने लगी जिससे यग्य की गती धीमी पड़ गई
26:25आस्तीक के प्रभाव से इंद्र का सिनहासन और उस पर बैठा तक्षक जो कुछ ही पल पहले विनाशकारी कुंड में
26:33गिरने वाले थे वे हवा में स्थिर हो गए, मानों समय ही ठहर गया हो
26:38रिशी आस्तीक ने फिर एक बार राजा जनमेजय को धर्म, कर्म और प्रतिशोध की व्यर्थता पर एक गंभीर उपदेश दिया,
26:47उन्हें परीक्षित के मोक्ष की दैविये इच्छा का स्मरण कराया
26:52आस्तीक के तरकों और दिव्य ज्यान से जनमेजय के मन में गेहन द्वंद्व छिड़ गया, उनका क्रोध अब न्याय और
26:59धर्म के विचारों से जूजने लगा, उनके चहरे पर चिन्ता की रेखाये उभराई
27:05उपर आकाश में स्थित, गंधर्व, देव और सिध पुरुष इस असाधारन ग्रिश को देखकर रिशी आस्तीक के ज्यान और प्रभाव
27:13की प्रशंसा कर रहे थे, उनके चहरों पर श्रद्धा का भाव स्पष्ट था
27:19आस्तीक ने जन्मेजै से अंतिमबार, अत्यंत करुणा और ग्रिढ विश्वास के साथ अपने पूर्वजों की प्रतिष्ठा और धर्म की रक्षा
27:28के लिए इस प्रतिशोध के चक्र को समाप्त करने का आग रह किया
27:33जन्मेजै ने एक पल के लिए अपनी आखों को बंद किया, उनके भीतर की तीवर अगनी और धर्म का प्रकाश
27:40एक दूसरे से जूज रहे थे, और फिर उन्होंने एक गहरा निर्णय लेने के लिए अपनी मुठी भीच ली
27:48अंतह अपने क्रोध पर विजय प्राप्त कर, जन्मेजै ने भारी मन से यग्य को तुरंट रोकने का आदेश दिया, उनकी
27:56आवाज में अब भी द्रिड़ता थी, लेकिन प्रतिशोध का वह उन्माद नहीं
28:01राजा का आदेश सुनते ही, रित्विक ब्राहमनों ने तुरंट अपने मंत्रों का जाप बंद कर दिया, और यग्य की विनाशकारी
28:09शक्ती धीरे-धीरे शान्त होने लगी, जिससे वातावर्ण में शान्ती छा गई
28:15मंत्रों की शक्ती के समाप्थ होते ही, इंद्र का सिनहासन और तक्षक जो हवा में जमे हुए थे, वे धीरे
28:23-धीरे नीचे की ओर उतरने लगे और अन्तह सुरक्षित रूप से भूमी पर आ गए
28:29जन्मेजय ने भले ही उनका मन भारी था, आस्तीक के ज्यान और धर्म के मार्ग को स्विकार किया, और अपने
28:36प्रतिशोध के अंतिम अध्याय को समाप्थ करते हुए रिशी को सम्मान पूर्वक प्रणाम किया
28:44महाविनाशकारी सर्प सत्र यग्य की अगनी धीरे-धीरे शान्त हो गई, उसकी प्रचंड लप्टे बुझ गई, और केवल धुआ और
28:51एक बदली हुई, शान्तचित वातावर्ण ही शेश रह गया, जो एक नए अध्याय की शुरुवात का प्रतीक था
28:59शान्त हुए यग्यस्थल पर, जहां अभी भी यग्य की पवित्र भस्म बिखरी हुई थी, रिशी आस्तीक अपनी शान्त और तेजस्वी
29:08उपस्थिती से वातावर्ण को एक नई पवित्रता प्रदान कर रहे थे, मानो उन्होंने प्रकृती के क्रोध को भी शान्त कर
29:27दि
29:27उनके हृदय से एक भारी बोज उतरने का हैसास हो रहा था।
29:57मेजय के धर्म स्वीकार से अत्यंत संतुष्ट और प्रफुलित दिखे।
30:02यग्यस्थल पर एकत्र विशाल जनसमूह जिसने पूरे घटनाक्रम को सांस रोके देखा था, अब धीरे धीरे अपने भाय से मुक्त
30:11होकर शान्ती और आशा की एक नई लहर से भर उठा।
30:16स्वर्ग से सुरक्षित भूमी पर लोटे तक्षत जिसका विराट सरपरूप अब थोड़ा शान्त था, अपनी मृत्यू के मुक्ष से बच
30:24निकलने पर गहरा आत्मचिंतन कर रहा था, उसके भीतर अभी भी प्रचंड यग्यगनी का भय शेश था।
30:31देवराज इंद्र अपनी अदमय आभा के साथ सुरक्षित रूप से स्वर्ग लोटने से पहले एक अंतिन बार रिशी आस्तीक की
30:40ओर कृतग्यता पूर्वक देखा, मानों उनके हस्तक्षेप के लिए मौन धन्यवाद दे रहे हो।
30:46यग्य की समापती के प्रतीक के रूप में प्रशिक्षित सहायक धीरे-धीरे यग्यवेदी से पवित्र वस्तूओं को हटाने और यग्यस्थल
30:55को साफ करने लगे एक शांत और व्यवस्थित वातावर्ण का निर्मान करते हुए।
31:01जन्मेजय ने भीर से दूर एक एकांत स्थान पर अपनी शाही पोशाक को धीला कर गहरे चिंतन में लीन हो
31:09गए। उनके मन में प्रतिशोध और क्षमा के बीच का द्वंदव अभी भी गूंज रहा था।
31:15उन्हें अपने पिता परीच्षित की मृत्यू का क्षण याद आया, परंतु इस बार उस कटू स्मृती के साथ रिशी आस्तीक
31:23के क्षमा के वचन उनके मन में एक नई रोशनी जगा रहे थे।
31:28तभी रिशी आस्तीक शांती से उनके पास आये और जीवन के अनवरक चकरक कर्मों के फल और क्षमा के वास्तविक
31:36अर्थ आस्तीक के वचनों से प्रेरित होकर, जन्मेजय ने अपने हृदय से प्रतिशोध का बोज हटा दिया और धर्म, न्याय
31:44तथा करुना के साथ शासन
31:46करने का द्रिड संकल्प लिया, अपने राज्य के लिए एक नए युग का सूत्र पात करते हुए। यग्यस्थल से राजधानी
31:54हस्तिनापूर की और शाही जुलूस की वापसी की तैयारी शुरू हुई, जिसमें राजा के बदले हुए संकल्प की नई उर्जा
32:02स्पष्ट
32:02दिखाई दे रही थी। प्रस्थान से पहले जनमेजय ने सभी उपस्थित रिशियों और ब्राहमनों को बहुमूल्य उपहार और सम्मान प्रदान
32:12कर उन्हें विदा किया, उनके प्रती आभार और विनमरता व्यक्त करते हुए। अपना कार्य पूर्ण कर रिशी आस्तीक
32:21ने जनमेजय और अन्य सभी को आशिरवाद दिया और शांती पूर्वक अपनी तपस्या की ओर प्रस्थान किया, उनकी दिव्य आभा
32:29धीरे-धीरे क्षितिज में विलीन होती गई। जनमेजय अब अपने प्रतिशोध के बोज से मुक्त होकर एक नए शांत और
32:38प्रबु�
32:50जाल भीड ने अपने राजा का भव्य स्वागत किया, उनके चहरों पर खुशी और सुरक्षा का भाव था, मानो एक
32:57लंबी चिंता के बाद शांती लोटी हो। अपने महल में वापस आकर जनमेजय ने ततकाल अपनी शाही परिशत बुलाई और
33:07उन्हें अपने नए दर्�
33:08धर्म और न्याय के सिध्धानतों पर आधारित एक नए युग की शुरुवात की घोशना की। सर्प सत्र यज्य के बजाए
33:17यह क्षण हस्तिनापूर के इतिहास में एक मोर बन गया, जिसने प्रतिशोध के बजायक्षमा और करोना की एक शक्तिशाली विरासत
33:25स्थापित क
33:27इस प्रकार जन्मेजय ने अपने पूर्वजों के मार्ग पर चल कर क्रोध के अगनी को बुझा कर एक ऐसे राज्य
33:35की नीव रखी जहाँ धर्म, प्रेम और शांती का प्रकाश सदैफ प्रकाशित रहेगा।
33:56और अन्य रिशिगन यग्य की प्रचंड अगनी के समक्ष संशय में खड़े थे, क्योंकि राजा के नए आदेश अभी तक
34:03उन तक स्पष्ट रूप से नहीं पहुँचे थे।
34:30यग्य के पुरोहितों ने उस दिव्य बालक को देखा और उनकी अंतरात्मा ने तुरंत पहचान लिया कि यह कोई साधारन
34:38मनुष्य नहीं, बलकि स्वयन देवताओं का भेजा हुआ दूत है।
34:44मुख्य पुरोहित ने ततकाल अपने दूतों को राजा जनमेजय को इस असाधारन आगमन की सूचना देने के लिए भेजा, ताकि
34:52वे इस पवित्र अतिथी का उचित सतकार कर सकें।
34:56जनमेजय अपनी परिशद को छोड़ कर तुरंत यग्यशाला की ओर आये और रिशी आस्तीक के दिव्यरूप को देखकर स्वयन श्रद्धा
35:05से जुप गए।
35:07आस्तीक ने राजा जनमेजय के हृदय की पवित्रता और प्रतिशोध को त्यागने के उनके महान निर्नय की प्रशंसा करते हुए
35:15उनके धर्मनिष्ठ मार्ग को सर्वोच बताया।
35:19रिशी आस्तीक ने जन्मेजय को समझाया कि वास्तविक शक्ती प्रतिशोध में नहीं, बलकी क्षमा, करुणा और न्याय में नहित है
35:27जो एक सच्चे चक्रवर्ती समराट का मार्ग है
35:32अंत्र आस्तीक ने राजा से सर्प सत्र यग्य को ततकाल समाप्त करने का अनुरोध किया, यह कहते हुए कि इसका
35:40उद्देश अब पूर्ण हो चुका है और प्रकृती का संतुलन पुनह स्थापित होना चाहिए
35:46रिशी के दिव्य शब्दों से प्रेरित होकर जन्मेजय ने पुरोहितों को तुरंत यग्य की सभी क्रियाय रोकने और अग्नी को
35:54शांत करने का आदेश दिया
35:57राजा के प्रत्यक्ष आदेश और रिशी की दिव्य उपस्थिती के समक्ष पुरोहितों ने भारी मन से किन्तु आज्याकारिता के साथ
36:05यग्य की अंतिम आहुतियों को रोक दिया
36:09जैसे ही यग्यशान्थ हुआ तक्षक और अन्यशेश सर्पों को अगनी के तीवर आकर्शन से मुक्ती मिली और वे भैभीत होकर
36:17सुरक्षित स्थानों की ओर चले गए
36:20रिशी आस्तीक ने जन्मेजय के महान कार्य की सराहना करते हुए उन्हें दीरगायु, समरिध्धी और एक धर्मनिष्ट शासन का आशिर्वात
36:30प्रदान किया
36:32जन्मेजय ने आस्तीक के चर्णों में प्रणाम किया और उनके आगमन को इश्वर का वर्दान मानते हुए, अपने राज्य के
36:39लिए इस नए युग की शुरुवात का श्रे उन्हें दिया
36:44पूरे दर्बार में हर्ष की लहर दौड गई, क्योंकि प्रतिशोध के अंधकार पर धर्म और शान्ती की विजय हुई थी
36:52यग्य की अंतिम लप्ते बुझ गई और उनके साथ ही जन्मेजय के मन में प्रतिशोध की आखिरी चिंगारी भी शान्त
36:59हो गई
37:01जन्मेजय ने तब अपने राज्ज में शान्ती, न्याय और सभी प्राणियों के प्रती करुणा के नए कानुनों की घोशना की
37:09जो उनके शासन की आधार शिला बन गए
37:12अपना दिव्यकार्य पूर्ण कर रिशी आस्तीक एक अद्रिश्य उर्जा के साथ यग्यशाला से विदा हुए, मानों हवा में घुल गए
37:21हो अपने पीछे शान्ती और ज्ञान की सुगंध छोड़ते हुए
37:26इस प्रकार जन्मेजय ने अपने पूर्वजों के क्रोध की विरासत को समाप्त कर धर्म, शमा और सार्वभौमिक कल्यान की एक
37:34स्वर्णिम युग का सूत्रपात किया
37:38जन्मेजय के स्वर्णिम शासनकाल में धर्म और न्याय के सिध्धान्तों पर आधारित एक अभूतपूर्व शान्ती और समरिधी ने प्रित्वी को
37:46आच्छादित कर लिया था, जहां हर प्राणी सद्भाव में निवास करता था
37:52इसी शान्ति पूर्ण प्रिष्ठ भूमी में नैमिशारने के पवित्रवन में महान रिशी सूथ गोस्वामी अपने दिव्य ज्यान से शोभाय मान
38:00असंध्य जिग्यासु मुनियों से घिरे हुए थे
38:04रिशी सूत ने अपनी गंभीर वानी में प्राचीन रिशियों की ज्ञान परंपरा और उस आदिन ज्ञान का वर्णन करना प्रारंब
38:12किया जो स्रिष्टी के आरंब से ही मानवजाती को प्रकाशित कर रहा था
38:18उन्होंने बताया की कैसे युगो युगो पहले जब मानवजाती की चेतना अधिक शुद्ध और एकी कृत्थी तब एक ही अविभाजत
38:27वेद संपूर्ण ज्ञान का स्रोत था जो सभी के लिए सहज सुलब था
38:31फिर सूत गोस्वामी ने महान महर्शी वेदव्यास के प्रादुर्भाव का उल्लेख किया जो त्रिकालदर्शी और असीन ज्ञान के सागर थे
38:41जिन्हें स्वय भगवान का साहित्य अवतार माना जाता था
38:46व्यासदेव ने कल्युक के आगमन और उसमें मानवजाती की घटी हुई बुद्धी, स्मरण शक्ती और अलपायु को ध्यान में रखते
38:54हुए भविश्य की पीढियों के कल्यान के लिए गहन चिंता व्यक्त की
38:59उन्होंने दिव्य प्रेणा और समाधान प्राप्त करने के लिए एक पवित्र नदी के किनारे गहन तपस्या में लीन होकर अपनी
39:07चेतना को ब्रहमांडिय सत्य से जोड़ा
39:10अपनी तपस्या की पराकाष्ठा पर व्यासदेव को एक दिव्य द्रिश्टी प्राप्त हुई जिसने उन्हें युगधर्म के अनुसार वेदों को विभाजित
39:19करने का स्पष्ट मार्ग गर्शन प्रदान किया
39:22इस दिव्य आदेश का पालन करते हुए व्यासदेव ने उस विशाल एक ही वेद को मानव जाती की विभिननक शमताओं
39:31और रुचियों के अनुरूप सावधानी पूर्वक विभाजित करने का कार्य आरंभ किया
39:36इस प्रकार उन्होंने वेदों को चार प्रमुक शाखाओं में व्यवस्थित किया रिगवेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद, प्रत्येक अपनी अध्वितिय मंत्रों,
39:47अनुष्ठानों और दार्शनिक अंतरद्रिष्टी के साथ
39:51ततपश्चात उन्होंने इन विभाजित वेदों का ज्यान अपने योग्य शिश्यों, पैल, वैशंपायन, जैमिनी और सुमन्तु को प्रदान किया, ताकि यह
40:00पवित्र ज्यान भविश्य की पीढियों तक प्रसारित हो सके
40:05यद्यपी वेद विभाजित हो चुके थे, व्यासदेव ने अनुभव किया कि साधारन मनुश्यों के लिए अभी भी उन्हें समझना कठिन
40:13होगा, जिनकी ग्रहन शक्ती कल्यक के प्रभावों से और भी ख्षीन हो जाएगी
40:19इस गहरी अंतरग्रिष्टी के साथ उन्होंने पुराणों की अवधारना की कल्पना की ऐसी सरल, कहानियों और एतिहासिक वृत्तान्तों से भरी
40:29रचनाए जो वैदिक ज्यान को मनोरंजक और सुलब तरीके से प्रस्तुत कर सके
40:35ततपश्चात व्यासदेव ने अथक परिश्रम से 18 पुराणों और महाभारत जैसे इतिहास ग्रंथों की रचना की जिन में दिव्य लीलाए
40:44और नैतिक शिक्षाए संजोई गई थी
40:47इतना विशाल साहित्य रचने के बाद भी व्यासदेव को अपने हृदय में एक अप्रत्याशित रिक्तता का अनुभव हुआ
40:55मानो कोई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पहलु अभी भी अधूरा रह गया हो
41:00इसी असमंजस की स्थिती में अचानक देवर्शी नारद अपने वीना के मधूर संगीत के साथ वहां प्रकट हुए
41:08जिनके आगमन से वातावर्ण में एक दिव्य उर्जा का संचार हो गया
41:14नारद मुनी ने व्यासदेव को समझाया कि उन्होंने भले ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष पर बहुत कुछ लिखा है
41:21किन्तु उन्होंने भगवान की अहेतु की भक्ती का प्रत्यक्ष महिमामंडन नहीं किया है जिससे उनका हृदय अत्रिप्त है
41:30नारद के प्रेणादायक शब्दों को सुनकर व्यासदेव के हृदय में भगवान की महिमा का गुनगान करने की तीवर इच्छा जागरित
41:38हुई जिससे उन्हें अपनी आंतरिक अत्रिप्ती का मूल कारण स्पष्ठ हुआ
41:43इस नवप्राप्त प्रेणा से अभिभूत होकर व्यासदेव ने श्रीमत भागवतम की रचना का कार्य आरंभ किया एक अनुपम ग्रंथ जो
41:52केवल भगवान की सर्वोच लिलाओं और भक्ती का ही गुनगान करता है
41:58इस प्रकार श्रीमत भागवतम वेदों के सार और सभी पुराणों के पुष्प के रूप में प्रकट हुआ जो अंधकार्मे का
42:06लिग में मानवता के लिए ज्यान प्रेम और मोक्ष का एक शाश्वत मार्ग प्रकाशित करता है