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मोक्ष के गूढ़ रहस्यों को समझने के बाद, गरुड़ अब भगवान विष्णु से पूछते हैं कि आखिर कौन से कर्म हैं जो आत्मा को इस पावन मार्ग पर आगे बढ़ाते हैं। इस एपिसोड में, भगवान विष्णु 'दान' के परम महत्व का रहस्योद्घाटन करते हैं - एक ऐसी शक्ति जो न केवल पुण्य अर्जित करती है, बल्कि जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाने में भी सहायक है। अन्नदान से लेकर विद्यादान तक, जानिए विभिन्न प्रकार के दानों की महिमा और कैसे एक सच्ची भेंट बदल सकती है आपकी नियति। क्या है दान देने का सही तरीका और किसे दान देने से मिलता है अधिकतम फल? इस रहस्यमय यात्रा में हमारे साथ जुड़ें! #गरुड़पुराण #GarudaPurana #दान #दानकीमहिमा #धर्म #मोक्ष #कर्म #पुण्य #सद्कर्म #Vishnu #Garuda #Hinduism #Mythology #SpiritualJourney #IndianCulture #PauranikKatha #YouTubeSeries
Transcript
00:00भगवान विश्णु द्वारा मोक्ष के गूढ रहसियों को जानने के पश्चात भी गरुर का मन अभी भी एक गहरे चिंतन
00:07में लीन था। मानो वह उस विराट ज्यान को अपने भीतर आत्म साथ कर रहा हो।
00:13उसके भीतर सैध्धान्तिक ज्यान की असीन गहराया व्याभारिक अनुप्रयोग की लालसा से टक्रा रही थी। एक अद्रिश्य प्रश्न उसके हृदय
00:22में आकार ले रहा था।
00:43जिन्होंने उसे अज्यान के अंधकार से निकालकर ज्यान के प्रकाश में प्रकाशित किया था।
00:50भगवान विश्नु जिनकी आखें ब्रहमांड के हर रहस्य को जानती थी ने एक शांत सरवग्य मुस्कान के साथ गरुड की
00:58आंतरिक जिग्यासा को भाप लिया और उसे बोलने के लिए प्रेरिक किया।
01:04विन्मर्ता पूर्वक हाथ जोड कर गरुड ने पहले भगवान के असीन ज्यान और कृपा के लिए हृदय से आभार व्यक्त
01:11किया।
01:12तत पश्चात उसने अपनी दुविधास पश्ट की की कैसे एक साधारन मनुष्य इस मायावी संसार के बंधनों में रहते हुए
01:21मोक्ष के परम लक्षय को प्राप्त कर सकता है।
01:25उसने विशेश कर्मों और धर्म प्रायन कृतियों के बारे में जानना चाहा, जो वास्तव में आत्मा को मुक्ती के कठिन
01:33मार्ग पर सहायता कर सकते हैं।
01:36गरुर ने माया और सांसारिक आसकतियों में उलजे हुए सामान्य मनुष्यों की पीड़ा और संघर्षों को बड़े ही मार्मिक धंग
01:44से व्यक्त किया।
01:46उसने पूछा कि क्या दयालुता के छोटे-छोटे कार्य या कोई साधारन त्याग भी मोक्ष के मार्ग में कोई महत्वपूर्ण
01:54भूमिका निभा सकते हैं।
01:56गरुड के मार्मिक प्रश्न सुनकर भगवान विश्नु का तेजोमय स्वरूप और भी अधिक करुना से दमक उठा, मानों उनके भीतर
02:05ब्रह्मांड का समस्त प्रेम उमड पड़ा हो।
02:09ततपश्चात भगवान विश्नु ने बोलना आरंभ किया, उनकी दिव्यवानी ब्रह्मांडी प्रतिध्वनी की तरह शांत और गहन थी, जो प्रत्येक अनों
02:18को पवित्र कर रही थी।
02:21उन्होंने समझाया कि मोक्ष केवल तपस्वियों या सन्यासियों के लिए ही नहीं है, बलकि उन सभी के लिए है, जो
02:28निशकाम भाव से कर्म करते हैं।
02:32उन्होंने संकेत दिया कि दान, दान, दानशीलता एक अत्यंत महत्वपूर्ण और व्याभारिक कदम है जो मोक्ष के मार्ग को सुगम
02:41बना सकता है।
02:43दान शब्द सुनते ही गरूर की आखें आश्चर्य और उच्सुक्ता से फैल गई, जैसे उसे एक नए रहस्य में द्वार
02:51का पता चला हो।
02:53भगवान विश्णू ने विस्तार से बताया कि दान का वास्तविक महत्व भेंट की मात्रा में नहीं, बलकि उसे देने वाले
03:01के भाव और शुद्धता में नहित है।
03:04उन्होंने वर्णन किया कि कैसे एक छोटी सी निस्वार्थ भेंट भी आत्मा के लिए असीमित आध्यात्मिक पुन्य और मोक्ष का
03:13द्वार खोल सकती है।
03:16उन्होंने निश्ठावान दान से हृदय के शुद्धिकरन और अहंकार के विसर्जन के बारे में बताया, जो मोक्ष की यात्रा में
03:23अत्यंत सहायक है।
03:26गरुर ने अत्यंत ध्यानपूर्वक सुना, धीरे धीरे मोक्ष के इस सर्लता भरे मार्ग की गहनता को समझते हुए, जो पहले
03:34उसे बहुत जटिल प्रतीत होता था।
03:37अपने वचन को पुष्ट करने और दान की अदरिश्य शक्ती को समझाने के लिए भगवान विश्णू ने अब एक प्रेनादायक
03:45कथा सुनाने की तयारी की।
03:49भगवान विश्णु ने अपनी मंद मुस्कान के साथ गरुर को एक प्राचीन नगरी की कथा सुनानी आरंभ की जहां जीवन
03:57अपनी साधारन गती से चलता था, परंतु नेती के सूत्र असाधारन धंग से बुने जाते थे
04:04उन्होंने एक ऐसे निर्धन लकड़ारे का उल्लेक किया, जिसका नाम धर्मदास था, जिसके पास भौतिक सुखों का अभाव था, किन्तु
04:13उसके हृदय में असीम श्रद्धा और परोपकार की भावना का अखंड दीपक प्रजवलित था
04:19धर्मदास प्रतिदिन धने वन में जाकर लकड़िया काटता और उन्हें बेचकर अपने परिवार का किसी तरह भरण पोशन करता था,
04:28उसका जीवन प्रकृती और परिश्रम के चक्र में बंधा था
04:32एक दिन भीशन गर्मी और भूख से व्याकुल धर्मदास को जंगल के पत्रीले रास्ते पर एक अत्यंत प्यासा राहगीर मिला,
04:41जो जीवन के अंतिन ख्षणों में पानी के लिए तड़प रहा था
04:45उसके पास स्वयं के लिए केवल एक मिट्टी का घड़ा था, जिसमें जीवन रक्षक जल की कुछ बूदे शेश थी,
04:53फिर भी उसने बिना सोचे वह पूरा पानी उस प्यासे राहगीर को अर्पित कर दिया
04:59जल पीकर राहगीर ने कृतग्यता से उसकी ओर देखा, उसकी आखों में जीवन की नई आशा जग्मगा रही थी, और
05:07अपनी यात्रा आगे बढ़ा दी, जबकि धर्मदास ने अपने खाली घड़े को विसमें से देखा
05:14धर्मदास के मन में क्षण भर के लिए अपनी निर्धनता और अगले भोजन की चिंता ने स्थान लिया, परंतु दान
05:21के उस अग्वितिय संतोष ने उसे सभी चिंताओं से मुक्त कर एक गहन शांती प्रदान की
05:28अदरिश्य लोकों में स्वय धर्म के देवता यमराज और अन्य रिशिगन इस छोटी सी किंतु हृदय से की गई भेंट
05:36को अत्यंत गंभीरता और विसमें के साथ देख रहे थे
05:41यमराज ने अपने पार्षदों से कहा कि इस जल के दान का पुने किसी बड़े यग्य से भी बढ़कर है
05:47क्योंकि यह पूर्ण निष्ठा और निस्वार्थ भाव से किया गया था
05:52वर्षों का चक्र चला और धर्मदास अब व्रिद्ध तथा दुर्बल हो चुका था फिर भी उसके मुख पर वही शांत
05:59मुस्कान और आखों में वही निर्मल जोती बनी हुई थी
06:04एक शीत काल की रात धर्मदास अपने कच्चे घर में शांती पूर्वक अंतिम सांसे गिन रहा था उसका मन सांसारिक
06:12मुहमाया से पूर्ण था विरक्ट और निर्मल था
06:16तभी उसके साधारन कमरे में एक अद्भुत स्वर्गिय प्रकाश फैल गया और भगवान विश्णु के तेजस्वी पार्षद उसे दिव्य लोकों
06:25में ले जाने के लिए स्वयम पधारे
06:28धर्मदास ने विनमरता से अपनी आखें खोली और पूछा कि क्या उन्होंने कोई ऐसी असाधारन सेवा की है जिसके लिए
06:36उन्हें स्वयन देवदूत लेने आये हैं
06:38उसका हृदय कृतग्यता से भर उठा था
06:42पार्षदों में से एक ने मुस्कुराते हुए उसे वह दिन याद दिलाया जब उसने अपनी अंतिम बूंद पानी एक प्यासे
06:50राहगीर को अर्पित कर करुणा का सर्वोच उदाहरन प्रस्थुत किया था
06:55उन्होंने समझाया कि वह दान केवल जलका नहीं था
06:59अपितू उसने अपने जीवन के संघर्षों में भी दूसरों के प्रती असीमित करुणा का सर्वोच उदाहरन प्रस्थुत कर आत्मा की
07:07शुद्धी का मार्ग प्रशस्त किया था
07:10उसक्षन धर्मदास का नश्वर शरीर छूट गया और उसकी निर्मल आत्मा उस दिव्य प्रकाश में विलीन होकर सीधे परमधाम वैकुंठ
07:19की ओर अग्रसर हुई
07:21गरुर ने विसमय से भगवान विश्णू को देखा दान की इस अप्रत्याशित शक्ती को समझ कर उसकी विशाल आखें नम
07:29हो गई उसे मोक्ष का एक नया आयाम दिखाई दिया
07:34भगवान विश्णू ने शांत्स्वर में कहा कि दान का वास्तविक मूल्य उसकी मात्रा में नहीं, बलकि देने वाले के हिर्दय
07:42की पवित्रता और भावना में नहित होता है
07:46उन्होंने बल दिया की सच्ची श्रद्धा, निशकाम भाव और परोपकार की भावना से किया गया छोटा सा दानभी व्यक्ति के
07:54लिए मोक्ष का शाश्वत द्वार खोल सकता है
07:58गरुर ने समझा की वास्तव में माया और अहंकार के बंधनों से मुक्त होने का यह एक सरल और सीधा
08:05मार्ग है जो किसी भी प्राणी के लिए किसी भी परिस्थिती में सुलब है
08:11भगवान विश्णू ने अपनी मधुरवानी में कहा गरुड समस्त दान कर्मों में अन्नदान का महत्व सर्वोच्च है क्योंकि यह सीधे
08:20जीवन का पोशन करता है और प्राणी को ततकाल पीडा से मुक्ति दिलाता है
08:27उन्होंने समझाया कि जब भूख की अगने किसी देह को जलाती है तब उस पीडा के समक्ष सभी लौकिक सुख
08:34व्यर्थ प्रतीत होते हैं और आत्मा भी व्याकुल हो उठती है
08:39इस विकट अवस्था में जो कोई भी भूखे को अन्न प्रदान करता है वह वस्तुथा उसे केवल भोजन नहीं अपितु
08:47जीवन, आशा और जीने की नई उर्जा भेंट करता है
08:52अन्न का एक कन भी जब किसी क्षुधागरस्त के उदर में जाता है तो उसकी आत्मा को तत्काल शान्ती मिलती
09:00है और उस दानवीर के प्रतीकृतग्यता के भाव उमड़ पड़ते हैं
09:05यह दान केवल शारिरिक पोशन नहीं देता, बलकि दान देने वाले के लिए अक्षय पुन्य का संचय करता है, जो
09:13उसे इस लोक और परलोक दोनों में शुब फल प्रदान करता है
09:19जैसे एक छोटे बीज को जल और पोशन मिलने पर वह विशाल व्रिक्ष बनकर फल देता है, वैसे ही अन्नदान
09:26का यह पुन्य कर्म अनंत गुना होकर दानकरता को वापस मिलता है
09:33विद्यादान, भूमिदान या वस्त्रदान भी महत्वपूर्ण हैं, किन्तु वे जीवन के लिए द्वितियक आवश्शक्ताएं हैं, अन्नदान ही प्रथम और मूल
09:41आधार है, जो जीवन को संभव बनाता है
09:46समस्त प्राणी, चाहे वे मनुष्य हों, पशु हों या पक्षी, सभी के लिए भूख एक सार्वभौमिक अनुभव है, जिससे मुक्ती
09:54ही सच्चा सुख है
09:57एक साधारण पर प्रेन से परोसा गया भोजन भी किसी के जीवन में आशा की किरन जगा सकता है, अन्धकार
10:04को चीर कर नई सुभ़ ला सकता है
10:08महत्व इस बात का नहीं कि दान में कितनी मात्रा दी गई, बलकि उस अन्ध को दान करते समय हृदय
10:15में कितनी शुद्ध भावना और करुणा थी
10:18एक बार की बात है, एक निर्धन वृद्धा ने अपनी एक मात्र रोटी का आधा भाग एक भूखे संथ को
10:26दान कर दिया, स्वया आधी रोटी पर जीवन निर्वाह करने के लिए
10:31उसके इस निस्वार्थ भाव और त्याग ने स्वर्ग में ऐसी लहर उत्पन्नकी की देवताओं ने उसकी प्रशंसा में पुष्प वर्शा
10:39की और उसे ततकाल उच्च लोकों में स्थान प्राप्थ हुआ
10:43गरुर ने यह सुनकर समझा की दान की महिमा उसकी भौतिक मूल्य में नहीं, बल्कि देने वाले की आत्मा की
10:51विशालता और उसके त्याग की गहराई में नहित है
10:55विश्णू ने आगे कहा, अन्नदान केवल एक बार का कर्म नहीं, अपितु यह एक निरंतर अभ्यास है जो हमें दूसरों
11:03के प्रती अपनी जिम्मेदारियों की याद दिलाता है
11:07जो प्राणी निरंतर भाव से अन्नदान करता है, वह कर्म के चक्र में बंधने के बजाए उसे काटता हुआ परोपकार
11:15के मार्ग पर आगे बढ़ता है
11:18यह कर्म न केवल दाता को आंतरिक सुख देता है, बलकि प्राप्त करता के आशिर्वाद और संतुष्टी के रूप में
11:26एक पवित्र उर्जा का प्रवाह भी स्थापित करता है
11:31अनदान ही वह माध्यम है जो हमें परोपकार के उच्चतम शिखर पर पहुँचाता है और आध्यात्मिक उत्थान का सबसे सरल
11:39और सुलब मार्ग प्रशस्त करता है
11:43भूख मिटाना ही मोक्ष की दिशा में पहला कदम है क्योंकि जब शरीर शान्त होता है तभी मन इश्वर चिंतन
11:51और आत्म ज्यान की ओर प्रवरिक्थ हो सकता है
11:55गरूर ने भगवान विश्णू के प्रतेक शब्द को आत्म साथ करते हुए महसूस किया कि वास्तव में सच्ची परोपकारिता ही
12:03आत्मा की मुक्ती का मूल आधार है
12:07इस प्रकार भगवान विश्णू ने गरूर को अन्नदान की महिमा का गहन रहस्य समझाया जो मुक्ष के मार्ग पर एक
12:15प्रकाश स्तंभ के समान है
12:18अन्नदान के महान फल को समझाने के पश्चात भगवान विश्णु ने गरूर को वस्त्रदान की महिमा बताते हुए कहा कि
12:26यह मनुष्य को सम्मान और गरिमा प्रदान करने वाला अत्यंत पावन कार्य है
12:32श्री हरी ने स्पष्ट किया कि जैसे वस्त्र शरीर को शीत, ताप और तूफानों से बचाते हैं, वैसे ही वस्त्रदान
12:40दाता की आत्मा को कालचक्र के कठोर प्रभावों से सुरक्षा प्रदान करता है
12:46जब कोई दयालू मनुष्य किसी वस्त्रहीन अथवा निर्धन व्यक्ती को सम्मान पूर्वक्स वच्ष और सुन्दर वस्त्र भेंट करता है, तो
12:54ईश्वर स्वया उस करुणा से त्रिप्थ हो जाते हैं
12:59भगवान विश्णु ने बताया कि सन्यासियों, योगियों और असहायों को वस्त्र अर्पित करने से दाता का आत्म सम्मान और सामाजिक
13:07सम्रिधी जन्म जन्मांतर तक बनी रहती है
13:12वस्त्रदान के इस द्रिश को देख कर स्वर्गलोग से देवगण हर्षित होकर पुश्पवरिष्टी करने लगे, जिससे वातावर्ण में अलौकिक सुगंध
13:20और शांती व्याप्थ हो गई
13:23परमपिता ने गरूर को अवगत कराया कि मृत्यू के उपरांत यमलोग के दुर्गम मार्गों पर चलने वाले वस्त्रदाता को यमदूतों
13:31के शीतल प्रहारों का सामना नहीं करना पड़ता
13:35जिन्होंने जीवन में दूसरों की नगनता और असहायता को ढखा था, उनकी आत्मा दिव्यवस्त्रों से सुसज्जित होकर मोक्ष के मार्ग
13:44पर निर्भैता से आगे बढ़ती है
13:47भगवान विश्णू के इन कल्यानकारी वचनों को सुनकर गरूर भक्तिभाव से भरकर अपने स्वामी के समक्षपुना नत्मस्तक हो गए
13:57वस्त्रदान के उपरांत भगवान विश्णू ने गरूर को समस्त दानों में सर्वश्रिष्ट और अनंत्फलदाई भूमिदान का गूढ रहस्य समझाना प्रारंब
14:06किया
14:08नारायन ने बताया कि यह संपून प्रित्वी साक्षात भूदेवी का स्वरूप है
14:13इसलिए भूमी का टुकडा दान करना वास्तव में सभी भौतिक एवं आध्यात्मिक दानों की नीम है
14:21जब कोई धार्मिक राजा या पुनियात्मा मनुष्य तामरपत्र और पवित्र जल से संकल्प लेकर ब्राहमन अथ्वा समाज को भूमी दान
14:29करता है तो उसके सारे पाप भस्म हो जाते है
14:34भगवान विश्णों के अनुसार दान में दी गई भूमी पर जब क्रिशी होती है और अन्न उपजता है तो उससे
14:41जितने जीवों का पोशन होता है उसका पुन्य निरंतर दाता को मिलता रहता है
14:48लहराते हुए हरे भरे खेट और उपजाव भूमी की यह समरिधी दाता के कुल में कई पीधियों तक धन्धान्य और
14:55आरोग्य का वर्दान बनकर वर्शा करती है
14:59इसके अतिरिक्त जब दान की गई भूमी पर निर्धनों के लिए आशरे और तीर्थयात्रियों के लिए विश्राम गरह निर्मित होते
15:07हैं तो दाता को असी मानसिक शांती की प्रापती होती है
15:13श्री हरी ने विशेश बल देते हुए कहा कि यदी दान की गई भूमी पर दिव्य मंदिर का निर्मान होता
15:20है तो उसका प्रभाव संपून ब्रहमांड में पुन्य की तरंगे उत्पन्न करता है
15:26उस भूमी पर स्थित मंदिर में जितने वर्षों तक प्रभो की पूजा और शंखनाध होता रहेगा उतने वर्षों तक दाता
15:34बैकुंठ धाम में आनंद पूर्वक निवास करता है
15:38भव्य नकाशिदार पत्थरों से निर्मिक मंदिर में प्रजवलित यग्य की अगनी और पवित्र वैदिक मंत्रों चार दाता की आत्मा को
15:46सर्वथा निश्पाप बना देते हैं
15:50विश्णु जी ने स्पष्ट किया कि जब तक सूर्य और चंद्रमा का अस्तित्व है घूमिदान का अक्षय पुन्य दाता की
15:57पीधियों को सुरक्षा कवच प्रदान करता रहता है
16:02गरुर ने भगवान विश्णु के इन अमूल्य उपदेशों को अपने हृदय में अंकित करते हुए अनुभव किया कि निस्वार्थ दान
16:10ही जीव के परम कल्यान का एक मात्र साधन है
16:14अंत्य भगवान विश्णु ने मंद मुस्कान के साथ गरुर को आशिरवाद दिया कि श्रद्धा पूर्वक दिया गया एक छोटा सा
16:22दान भी मोक्ष का विशाल द्वार खोल सकता है
16:27तदोपरांथ भगवान विश्णु ने अपनी दिव्यद्रिष्टी गरुर पर केंद्रित करते हुए दान के एक और परम पावन स्वरूप विद्यादान का
16:35महत्व प्रकट किया
16:37उन्होंने समझाया कि विद्यादान केवल पुस्तकों का वितर्ण नहीं अपितु अज्ञानता के अंधकार को चीर कर ज्ञान के सूर्य का
16:45उदे कराना है
16:48जैसे एक दीपक से हजारों दीपक जलाए जा सकते हैं वैसे ही एक ज्ञानवान व्यक्ति से असंख्य मनों में चेतना
16:56का प्रकाश फैल जाता है
16:58यह पीढ़ी दरपीढ़ी अज्ञानता की बेडियों को तोड़ कर समाज को प्रक्ती और बुद्धिमत्ता के पथ पर अग्रसर करता है
17:07जिससे चिरस्थाई समरिधी आती है
17:11गरुर ने परमपिता के इन गूड वचनों को आत्मसाथ करते हुए महसूस किया कि विद्याका दान वास्तव में आत्मिक उत्थान
17:19का सर्वोच माध्यम है
17:22विष्णु जी ने पुनह बल दिया कि यह केवल शास्त्रिय ज्यान नहीं अपितु जीवन के सत्य को समझने वाली वास्तविक
17:30बुद्धिमत्ता है जो जीव को मुक्ती की ओर ले जाती है
17:34एक सच्चा विद्यादानी अपने शिश्यों के हृदय में केवल शब्दों को नहीं बलकी जीवन के शाश्वत मुल्यों और नैतिक्ता के
17:43बीज बोता है
17:45ऐसे पर्मार्थी दाता को न केवल इस लोक में सम्मान मिलता है अपितु परलोक में भी उसे परमशान्ती और मोक्ष
17:53की प्राप्ती होती है
17:56इसके पश्चात भगवान विश्णू ने दुहक और पीड़ा के अंधकार को दूर करने वाले ओशधदान के महत्व का सविस्तार वर्नन
18:04किया
18:06उन्होंने कहा कि जब कोई रोगी पीड़ा से कराहता है तब ओशधदान से बढ़कर कोई सेवा नहीं क्योंकि यह जीवन
18:14बचाता है और आशा का संचार करता है
18:18जैसे बंजर भूमी पर वर्षा का जल जीवन ला देता है वैसे ही ओशधदान एक मरनासन प्राणे के लिए नवजीवन
18:27का अमरित सिध्ध होता है
18:29इस दान से न केवल शारिरिक कष्ट दूर होते हैं अपितु मन को भी शांती और आत्मा को नई उर्जा
18:37प्राप्थ होती है
18:39गरुर ने समझा कि ज्ञान और स्वास्थ्य का यह दोहरा दान वास्तव में समस्थ स्रिष्टी के कल्यान का आधार है
18:48भगवान विश्णु ने आगे बताया कि जो प्राणी इन दोनों दानों में सनलगन होते हैं उन पर देवताओं की असीम
18:55क्रिपा सदैव बनी रहती है
18:58महत्व केवल दान की मात्रा का नहीं अपितु उसे देने वाले हृदय की पवित्रता और निस्वार्थ भावना का है
19:07विद्यादान और औशधदान दोनों ही मिलकर समाज को स्वस्थ, शिक्षित और सशक्त बनाते हैं जो एक आदर्ष विश्व का आधार
19:16है
19:18ये दान कर्म केवल लौकिक लाभ ही नहीं देते, बलकि आत्मा को माया के बंधनों से मुक्ट कर मोक्ष के
19:25मार्ग पर द्रिड़ता से अग्रसर करते हैं
19:29आथा हे गरूर, श्रधा और प्रेन से किया गया प्रत्यक दान, चाहे वह ज्यान का हो या स्वास्थ्य का, परम
19:36कल्यान का मार्ग प्रशस्त करता है
19:40भगवान के इन अन्मोल वचनों को सुनकर गरुर का हृदय कृतग्यता और नवजागरन के प्रकाश से भर गया, उनका परम
19:47लक्ष अब और भी स्पष्ट था
19:51विष्णु जी ने मंद मुस्कान के साथ गरुर की ओर देखा, यह जानते हुए कि अब मोक्ष का अद्रिश्य द्वार
19:58उनके परम भक्त के लिए पूर्ण रूप से उजागर हो चुका था
20:03भगवान विष्णु ने अपनी मधुरवानी में गोदान के महत्व का वर्णन करना आरंभ किया, जो प्रित्वी पर सबसे पवित्र और
20:11जीवन दायनी पशु के प्रती श्रधा का प्रतीक है
20:15गरुर ने अत्यंत एकागरता से अपने दिव्यगुरु के वचनों को सुना, उनके मन में गाय की पवित्रता और उसके दान
20:23से मिलने वाले अक्षय पुन्य के प्रती जिग्यासा बढ़ती जा रही थी
20:28विश्नु जी ने समझाया की गाय स्रिष्टी की माता समान है जो अपने दूध, घी और गोबर से न केवल
20:36भौतिक जीवन का पोशन करती है बलकि आध्यात्मिक शुद्धी का भी आधार बनती है
20:43उन्होंने बताया की गौसेवा और गोदान से व्यक्ती के समस्थ पाप धुल जाते हैं और उसे स्वर्गलोक में उच्चस्थान प्राप्थ
20:51होता है जो अंत्ता मोक्ष के मार्ग को सुगम बनाता है
20:56विष्णुजी के वचनों से एक दिव्यद्रिश प्रकट हुआ जहां एक वृद्ध किसान भक्ति भाव से एक स्वस्थ गाय का दान
21:04कर रहा था और उसके मुख पर परम शांती का भाव स्पष्ट दिख रहा था
21:10गोदान के इस पवित्र कृत्य को देख कर गरुड का हरिदैश रधा और विस्मे से भर गया उन्होंने अनुभव किया
21:17कि यह केवल एक पशु का दान नहीं बलकि आत्मा की मुक्ती का मार्ग है
21:23ततपश्चात भगवान विश्णू ने जलदान की महिमा का बखान किया यह समझाते हुए कि जल समस्थ जीवन का आधार और
21:32परम पवित्रता का प्रतीक है
21:35उन्होंने कहा कि एक प्यासे को जल पिलाना या जल के स्रोत का निर्मान करना सभी दानों में श्रिष्ट है
21:42क्योंकि यह सीधे जीवन का दान है
21:46जल्दान से आत्मा को शीतलता और शांती मिलती है और यह प्राणी मात्र के कल्यान की भावना को दर्शाता है
21:54जो परमात्मा को अत्यंत प्रिय है
21:57एक और दिव्यदर्शन प्रकट हुआ, जहां एक तपस्वी भीशन गर्मी में प्यास से व्याकुल था, और एक दयालू यात्री ने
22:06उसे अमरित तुल्य जल अर्पित कर जीवंदान दिया
22:10इस दृष्य ने गरुर को भावुक कर दिया, उन्होंने देखा कि कैसे जल की एक बूंद भी किसी आत्मा को
22:17गहन कष्ट से मुक्ती दिला सकती है और पुन्य का मार प्रशस्त कर सकती है
22:23भगवान विश्णू ने बल दिया कि इन दोनों दानों में दान करने वाले के हृदय की शुद्धता और निहस्वार्थ भावना
22:31ही सबसे महत्वपूर्ण है
22:34सक्चे हृदय से किया गया छोटा सा दान भी अहंकार से किये गए बड़े दान से कहीं अधिक पुनेकारी होता
22:41है
22:42इन दानों के माध्यम से व्यक्ति केवल भौतिक वस्तूओं का ही त्याग नहीं करता बल्कि अपनी आसक्ती और स्वार्थ का
22:50भी त्याग करता है जिससे आत्मा शुद्ध होती है
22:55गरुर ने इन गूड शिक्षाओं को अपने हृदय में आत्म साथ कर लिया यह समझते हुए कि दान का वास्तविक
23:02मूल्य उसकी मात्रा में नहीं बल्कि उसके पीछे की भावना में नहित है
23:09विश्णु जी ने गरुर की और एक संतुष्ट मुस्कान के साथ देखा यह जानकर कि उनके प्रिय भक्तने मोक्ष के
23:16इन अद्रिश्य द्वारों की कुंजी पाली थी
23:20उन्होंने समझाया कि ये दान केवल कर्मकांड नहीं बल्कि प्रेम, करुणा और त्याग की पराकाश्था हैं जो आत्मा को परम
23:29सत्य की ओर ले जाते हैं
23:32प्रत्येक छोटा दान यदी शुद्ध हरिदय से किया जाए तो वह ब्रहमांड में एक सकारात्मक स्पंदन पैदा करता है जो
23:40दाता और प्राप्त करता दोनों को लाप पहुँचाता है
23:44इस प्रकार गोदान और जल्दान जैसे पवित्र कर्म न केवल सासारिक कष्टों से मुक्ती दिलाते हैं बलकि आत्मा को जन्मुम्रित्यू
23:54के चक्र से भी मुक्त करते हैं
23:57गरूर का हृदय अब पूर्ण रूप से शांत और प्रबुध हो चुका था उन्होंने समझा की मोक्ष का मार्ग जटिल
24:04अनुष्ठानों में नहीं बलकि सेवा और निहस्वार्थ दान के अग्रिश्य धागों में बुना है
24:11गरूर के शांत मन को संबोधित करते हुए भगवान विश्णु ने दान के गूड विध्यान को विस्तार से समझाना आरंभ
24:18किया जहां दाता का भाव और पात्र की योग्यता ही कर्म के फल को निर्धारित करती है
24:25उन्होंने समझाया कि सही पात्र को दिया गया दान चाहे वह कितना भी छोटा क्यों नहों एक बंजर भूमी में
24:33बोए गए बीज के समान है जो विशाल फल देता है
24:38उन्होंने एक वृद्ध तपस्वी रिशी का उदाहरन दिया जो अपनी जोपडी के बाहर बैठे थे जिनके पास न तो कोई
24:46सांसारिक संपत्ती थी और नहीं कोई आकांक्षा केवल आध्यात्मिक ज्ञान की अगाध गहराई थी
24:53इसके विपरीत उन्होंने एक ऐसे व्यक्ति की कलपना करने को कहा जो किसी अयोग्य लोभी व्यक्ति को दान देता है
25:01जिसका हृदय वासना और अहंकार से भरा है जो किसी भी भेंट को व्यर्थ कर देता है
25:09भगवान विश्णु ने तब भाव के महत्व पर जोर दिया क्योंकि यह दान की आंतरिक आत्मा है जो किसी भी
25:16भौतिक भेंट से कहीं अधिक मूल्यवान होती है
25:20उन्होंने व्याख्याकी की निस्वार्थ भक्ती और पूर्ण विनमर्ता के साथ दिया गया दान बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के ब्रह्मांड
25:29में अंगिनत सकारात्मक स्पंदन उत्पन करता है
25:34ऐसे दान का आध्यात्मिक पुन्य कई गुना बढ़ जाता है जो आत्मा को शुद्धता और मुक्ती की ओर अग्रसर करता
25:41है जैसे एक छोटी सी नदी महासागर से मिलती है
25:46उन्होंने एक गरीब महिला का द्रिश्टांत दिया जिसने अपनी पूरी संपत्ती केवल एक छोटा फल अत्यंत भक्ती और प्रेन से
25:55एक भूखे साधो को अर्पित कर दिया
25:58वह छोटा सा फल जो किसी के लिए महत्वहीन हो सकता था उसके शुद्धभाव के कारण ब्रहमांडिय रूप से एक
26:06विशाल दान बन गया जिसने उसे ततकाल मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर किया
26:11फिर उन्होंने एक धमंडी राजा का उल्लेख किया जिसने अपनी प्रजा को प्रभावित करने और अपनी शक्ती का प्रदर्शन करने
26:20के लिए बहुमूल्य रतनों और सोने का धेर दान किया
26:25हालांकि उसका दान भौतिक रूप से विशाल था किन्तु उसके अहंकार और प्रशंसा की इच्छा ने उसके कर्म के आध्यात्मिक
26:33फल को बहुत कम कर दिया
26:36गरुर ने इन गूर सत्यों को आत्म साथ किया उनका हृदय ज्यान के एक नए स्तर से प्रबुद्ध हो रहा
26:42था जैसे सूर्योदय अंधकार को दूर करता है
26:47भगवान विश्णु ने पुना पुष्टीकी की ब्रहमांड स्वयदान के पीछे की शुद्ध नियत को दर्स करता है न कि उसकी
26:55भौतिक मात्रा को
26:57हृदय की पवितरता ही दान की वास्तविक शक्ती का निर्धारन करती है जो आत्मा को सभी बंधनों से मुक्त करने
27:05में सक्षम है
27:07प्रत्येक शुद्ध कर्म एक सुक्ष्म फिर भी शक्तिशाली उर्जा उत्पन करता है जो ब्रहमांडिये चेतना में एक सकारात्मक चिन छोड़ता
27:16है जो युगों तक गूंजता रहता है
27:20इस प्रकार के निस्वार्थ दान और शुद्ध भाव से किये गए कर्म ही आत्मा को जन्मुमृत्यू के चक्र से मुक्त
27:27कर वास्तविक मोक्ष के द्वार खोलते हैं
27:31गरुर ने श्रद्धा पूर्वक अपने हाथ जोड़े उनके मुख पर कृतग्यता और गहरी समझ का भाव स्पष्ट था क्योंकि उन्हें
27:39जीवन का सबसे बड़ा रहस्य ज्यात हो चुका था
27:43भगवान विश्णू ने अपनी दिव्य आभा के साथ मंद मंद मुस्तुराया उनके मुख मंडल पर संतोष का भाव था कि
27:51उन्होंने अपने प्रियवाहन को परम सत्य का मार्ग दिखा दिया है
27:56उन्होंने गरूर को आशिरवाद दिया यह सुनिश्चित करते हुए कि यह ज्यान अंगिनत युगों तक सभी जिग्यासु आत्माओं का मार्ग
28:04दर्शन करेगा
28:06गरूर ने अंतह समझा कि मोक्ष केवल जटिल अनुष्ठानों या विशाल बलिदानों से नहीं मिलता बलकि एक शुद धर्दै से
28:14किये गए सबसे छोटे निहस्वार्थ दान में निहिट है
28:19इस ज्ञान के साथ गरूर जिन्होंने अब दान की अद्रिश शक्ती को पूरी तरह से आत्मसाथ कर लिया था
28:27एक नए उद्देश के साथ आगे बढ़ने को तयार थे अपने पंखों पर अनंत चेतना का भार लिये हुए
28:34गरूर ने अपनी नवनिर्मित अंतरद्रिश्टी से भगवान विश्णू की ओर देखा उनके शब्दों की गहराई को आत्मसाथ करते हुए
28:43तब भगवान विश्णू ने अपनी दिव्य मुस्कान को धारण करते हुए दान के एक दूसरे पहलू का अनावरण करना आरंभ
28:52किया
28:52जो उतना ही मायावी और खतरनाक था
28:56उन्होंने समझाया कि जब दान अहंकार, दिखावे या स्वार्थ से दूशित होता है तो वह अयोग्यदान बन जाता है उन्हे
29:04की बजाय पाप का कारण
29:07जो दान किसी गुप्त इच्छा, सांसारित लाब या दूसरों पर श्रेष्टता सिध करने की मनशा से दिया जाता है
29:14वह आत्मा को मुप्त करने के बजाय और बंधन में डालता है विश्नु जी ने गंभीरता से कहा
29:22उन्होंने आगे कहा कि जब दान अपात्र व्यक्ती को दिया जाता है, जो इसका दुरुप्योग करता है, तब भी दाता
29:29को उसके दुश्परिनामों का भागी बनना पड़ता है
29:34भगवान ने एक ऐसे घमंडी राजा का उदाहरन दिया, जिसने अपनी प्रजा पर अपना धन और शक्ती दिखाने के लिए
29:41भव्यदान समारोह आयोजित किया
29:45राजा के मन में यह दान सेवा भाव से नहीं, बलकि अपनी महिमा और लोगों की प्रशंसा अर्जित करने के
29:52लिए था, जो उसके अहंकार को और पोशित कर रहा था
29:57उस दान को प्राप्त करने वाले कुछ भिक्षू और दर्बारी लाल्ची थे, जो राजा की चापलूसी करके और भी लाप्त
30:05प्राप्त करने की फिराक में थे, न की वास्तव में आध्यात्मिक ज्यान के भूखे
30:11विष्णु जी ने स्पष्ट किया कि यद्यपी यह दान बाहर से भव्य प्रतीत होता था, परन्तु शुद्ध भावना की कमी
30:18के कारण इसने राजा के लिए कोई सच्चा पुन्य अर्जित नहीं किया
30:23इसके विप्रीत, राजा के अहंकार और उन अपात्रों के लालच ने मिलकर उसके कर्मों में नकारात मक्ता का एक अद्रिश्य
30:31भार जोर दिया
30:33फिर भगवान विश्णु ने एक धूर्त व्यापारी का वृत्तान्त सुनाया, जो अपने व्यापार में सफलता और यश पाने की गणना
30:41से मंदिर में भारी दान देता था
30:44उस व्यापारी के प्रत्येक दान के पीछे एक जटिल करना थी, जहां वह हर भेंट को भविश्य के निवेश के
30:52रूप में देखता था, जिससे उसे और अधिक धन की प्राप्ती हो सके
30:57वह सबके सामने उदार्ता का दिखावा करता था, लोगों से वाहवाही बटोर्ता, जबकि उसके हृदय में केवल व्यापारिक मुनाफा और
31:07सामाजिक प्रतिष्ठा की ही लालसा थी
31:10भगवान विश्णू ने समझाया कि ऐसी कैल्किलेटिव दानप्रक्रिया, चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो, आध्यात्मिक पत्पर कोई वास्तविक
31:19प्रक्ती नहीं देती, बलकि आत्मा को माया के बंधनों में और कस देती है
31:26कर्मफल का निर्धारन केवल बाहरी क्रिया से नहीं, बलकि क्रिया के पीछे छिपी हुई नियत और भावना से होता है,
31:33गरुर विश्णू जी ने जोर देकर कहा
31:37उन्होंने एक द्रिश्य का वर्णन किया, जहां स्वार्थी दान से उपजे सुक्ष्म नकारात्मक कर्म, अद्रिश्य रूप से आत्मा के चारों
31:45और एकत्रत होते जाते हैं, उसे भारी और बोजिल बनाते हुए
31:50इसलिए, हे गरुर, यह अत्यंत महत्वपून है कि तुम दान की शक्ती को पहचानो और इसे शुद्ध हृदय और सही
31:58उद्देश के साथ ही प्रयोग करो, अन्यथा यह तुम्हें गहरे गर्त में धकेल सकता है, भगवान ने सचेट किया
32:06गरुर ने भगवान विश्णू के प्रत्येक शब्द को अपने हिदय में गहराई से अनकित किया, अब वह दान की दोहरी
32:14तलवार की शक्ती और उसके परिनामों को पूर्णत है समझ चुके थे
32:19निस्वार्थ भाव से दिया गया एक पत्ता भी विशाल पुन्य प्रदान कर सकता है, जबकि अहंकार से किया गया स्वर्ण
32:26का दान भी केवल व्यर्थी सिद्ध होता है, विश्णू जी ने अपनी बात दोहराई
32:32इस प्रकार भगवान विश्णू ने गरूर को समझाया कि सच्चा धर्म बाहरी दिखावे में नहीं, बलकि मन की पवित्रता और
32:41हर कर्म में नहित निशकाम प्रेम में ही वास करता है
32:45भगवान विश्णु ने अपनी मधुरवानी में आगे समझाया कि दान की सक्ची शक्ती उसके पीछे छिपी भावना में है
32:53न कि उसकी भौतिक मात्रा में जो मन को शुद्ध करती है और आत्मा को मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर
33:00करती है
33:02उन्होंने एक व्रिद्ध और दीन ब्राहमन का दृष्टांत दिया जिसने अपनी अंतिम रोटी का आधाभाग एक भूखे अजन्बी को अर्पित
33:11कर दिया बिना किसी अपेक्षा के केवल करुनावश
33:14इस छोटी सी भेंट से उत्पन्पुन्य इतना विशाल था कि उसने न केवल उस ब्राहमन के अगले जन्मों को आलोकित
33:23किया बलकि उसकी आत्मा को ततकाल शांती और गेहन आध्यात्मिक उन्नती प्रदान की
33:30इसके विपरीत एक धन्वान राजा का उदाहरन था जिसने बड़े समारोहों में स्वर्ण और रत्न दान किये पर उसके मन
33:38में केवल अपनी प्रशंसा और लौकिक प्रसिद्धी की इच्छा थी
33:43ऐसे दान से भले ही उसे स्वर्ग में अस्थाई सुखों की प्राप्ती हुई किन्तु मन की वासनाएं और अहंकार बने
33:51रहे जिससे उसकी आत्मा मुक्ती के वास्तविक मार्ग से कोसों दूर रही
33:57भगवान विश्णू ने स्पष्ट किया कि मोक्ष का मार्ग दान की मात्रा से नहीं बलकि दान करने वाले के हृदय
34:04की शुद्धता और कर्मफल की आसकती से मुक्ती से प्रशस्थ होता है
34:09उन्होंने समझाया कि जब समस्त कर्म, दान सहित, निशकाम भाव से इश्वर को समर्पित किये जाते हैं तो वे बंधन
34:17नहीं बनते बलकि मुक्ती के सोपान बन जाते हैं
34:21यह निशकाम कर्म, जिसमें निशकाम दान भी सम्मिलित है, चित्तक मन की गहराईयों को शुद्ध करता है, सभी अशुद्धियों और
34:31कामनाओं को धो डालता है
34:34जैसे जैसे मन शुद्ध होता जाता है, अहंकार की छाया सिकुर्ती है और भौतिक आसकतियों की बेडियां धीरे-धीरे तूटकर
34:42गिर जाती हैं, जिससे आत्मा अपने मूल स्वरूप में लौट आती है
34:48गरुर ने भगवान के प्रत्येक शब्द को आत्मसाथ किया, उनके भीतर एक गहरा बोध जागरित हो रहा था, जैसे सदियों
34:56का अंधकार एक ही क्षण में प्रकाश में बदल गया हो
35:01विश्णु जी ने अपनी दिव्य मुस्कान के साथ आगे कहा कि निश्काम दान केवल वस्तूओं का त्याग नहीं, बलकि हृदय
35:09में असीन करुणा और समस्त जीवों के प्रती प्रेन का प्रस्फुटन है
35:14यह प्रेन ही व्यक्ति की चेतना को संकीन स्वार्थ से परे ले जाता है, उसे ब्रहमान की विशालता और सभी
35:22प्राणियों के साथ एकात्मता का अनुभव कराता है
35:26इस प्रकार निशकाम दान से चित निर्मल होता है, और आत्मा को अध्वैत, द्वैथीन्ता की परम अनुभूती होती है, जहां
35:35स्वय और परमात्मा के बीच कोई भेड नहीं रहता
35:40विश्णुजी ने आगे बताया कि जो प्राणी सच्चे मन से दान करते हैं, वे न केवल इस जीवन में सुख
35:47और समरिधी पाते हैं, बलकि अगले जन्मों में भी पुन्य और उत्तम भाग्य के भागी बनते हैं
35:54किन्तु उन्होंने चेतावनी दी कि यह पुन्य मात्र पुनर्जन्म के चक्र को बहतर बनाता है, वास्तविक मोक्ष तो सभी कर्मों
36:02के फलों की आसकती से पूर्ण विरक्ती में ही नहित है
36:07यहां तक की एक छोटे से बीज को भी निश्काम भाव से बोया जाएं, तो वह एक विशाल व्रिक्ष का
36:14रूप ले सकता है, जिसके फल अंगिनत आत्माओं को पोशन देंगे और मुक्ती की ओर ले जाएंगे
36:21गरुर ने अब दान के इस गहरे रहस्य को पूर्ण रूप से समच लिया था, उनके मन से सभी संदेह
36:28और भ्रम समाप्थ हो गए थे, और उनकी आत्मा प्रकाश से भर गई थी
36:34भगवान विश्णु का मुखमंडल दिव्य आभा से दमक रहा था, उनकी वानी में ब्रहमांड की समस्ट ज्यान समाहित थी, जो
36:42गरुर के हरिदय को पवित्र कर रही थी
36:45मुख्ष का मार्ग हालां की दुर्गम और कठिन था, अब दान के इस दिव्य सिध्धान से प्रकाशित हो चुका था,
36:52जिसने हर पथिक के लिए एक स्पष्ट दिशा प्रदान की
36:57गरुर ने परम भक्ती और कृत अग्यता के साथ भगवान विश्नु को प्रणाम किया, उनके हरिदय में अब दान के
37:04निश्काम मार्ग पर चलने का द्रिड संकल्प था, जो उन्हें मोक्ष की ओर ले जाएगा
37:10भगवान विश्नु के सम्मुक हाथ जोड कर खड़े पक्षी राज गरुड ने अत्यंत विनमर्ता पूर्वक इस मोक्षदायनी दानमहिमा को मृत्यू
37:19लोग के मनुश्यों तक पहुचाने का अपना द्रिड संकल्प व्यक्त किया
37:24उनकी इस परमभक्ती से प्रसन्न होकर भगवान विश्नु के मुखमंडल पर एक मंद और अत्यंत मनमोहक मुस्कान उभराई जिसने समस्त
37:33वैकुंठ लोग को दिव्यानन से सराबोर कर दिया
37:37श्रीहरी ने अपनी गंभीर और मधुरवानी में अंतिम उपदेश आरंभ करते हुए कहा कि हे गरुड सांसारिक धन का दान
37:45तो उत्तम है परन्तु अहंकार का परित्याग और स्वयन का पूर्ण समर्पन ही सर्वश्रिष्ट दान है
37:53गरुर ने अपने मस्तक को थोड़ा जुकाया और उनके विशाल स्वर्णपंख वैकुंट के प्रकाश में इस प्रकार चमक उठे मानोवे
38:01स्वयन सत्य के इस नवीम प्रकाश को ग्रहें कर रहे हुँ
38:06विश्णुजी ने समझाया कि जब एक निर्धन मनुष्य अपने पास बची अंतिन वस्तुभी श्रधापूर्वक किसी भूखे को सौंप देता है
38:14तो उसका वह लगुदान मेरू परवत के स्वर्ण दान से भी अधिक मूल्यवान हो जाता है
38:22ब्रहमांड के स्वामी ने बताया कि जो मनुष्य बिना किसी यश्या स्वर्ग की कामना के केवल कर्तव्य भाव से दान
38:29करता है वह सीधे मेरे परमधाम को प्राप्त करता है
38:34भगवान की वानी से प्रवाहित होने वाली करुणा से गरूर के नयन भराए और उन्हें स्रिष्टी के कंकन को जोडने
38:41वाले निस्वार्थ प्रेम के अग्रिश्य धागे स्पष्ट दिखाई देने लगे
38:46तभी शेशनाग ने भी अपनी सहसर फणों को धीरे से हिलाया मानो वेभी स्रिष्टी के इस आदिनियम का समर्थन कर
38:54रहे हों की सेवाही परमधर्म है
38:58नारायन ने अपने दाहिने हाथ को अभय मुद्रा में उठाया जिससे एक अत्यंत शीतल और दैविय प्रकाश पुंझ निकल कर
39:06गरूर के संपून अस्तित्व को आलोकित करने लगा
39:09इस दिव्य आशिरवाद को पाकर गरूर ने वैकुंट के सुवर्ण धरातल पर साश्टान दंडवत प्रणाम किया और उनके पंखों ने
39:18पूरे गर्भग्रह को ढख लिया
39:21भगवान विश्णू ने अत्यंत स्नेह से गरूर को उठने का संकेत दिया और कहा कि अब समया गया है कि
39:28तुम इस पवित्र गरूर पुरान के ज्ञान को रिशियों और मनुश्यों के कल्यान के लिए प्रिथवी पर ले जाओ
39:35जैसे ही गरूर खड़े हुए उनके हृदय में संसार के सभी प्राणियों के प्रती अगात करुणा उत्पन हो गई जो
39:43अज्ञानतावश कष्ट भोग रहे थे
39:46श्रीहरी ने आगे कहा कि दान केवल भौतिक वस्तूओं का ही नहीं अपितु किसी दुखी जीव को सांत्वना के दो
39:53शब्द कहना और भयभीत को अभय देना भी सबसे बड़ा दान है
39:59तभी स्वर्ग के देवताओं ने इस पावन समवाद के साक्षी बनकर वैकुंठ पर पारिजात के सुगंधित पुष्पों की वर्षा शुरू
40:07कर दी जिससे संपूर्ण वातावर्ण सुवासित हो गया
40:12भगवान विश्णु का दिव्यतेज अब अपने चरम पर था और उनके पीछे कोटी-कोटी सूर्यों के समान एक प्रकाष्ट क्र
40:19घूमने लगा जो मोक्ष के मार्ग को दर्शा रहा था
40:24उन्होंने अंतिम आशीश देते हुए कहा कि जो कोई भी इस दान और धर्म के मार्ग का निश्काम भाव से
40:31अनुसर्ण करेगा उसे संसार के किसी भी नरक का भय नहीं रहेगा
40:36गरुर ने भगवान के वचनों को अपने अन्तहकरण में स्थापित किया और उनका शरीर एक अपूर्व आध्यात्मिक उर्जा से भर
40:45गया जिससे वे सोने के समान चमकने लगे
40:48जह गरुर पुरान केवल नियमों की संहिता नहीं, अपितु जीवन से मृत्यू और मृत्यू से मोक्ष तक की यात्रा का
40:56एक दिव्य प्रकाश स्तंभ बन गया
40:59अपनी यात्रा का उद्देश्य पूर्ण कर गरुर ने भगवान विश्नु को अंतिन प्रणाम किया और प्रित्वी लोग की ओर उडान
41:07भरने के लिए अपनी मुद्रा बनाई
41:10और फिर एक तीवर गर्जना के साथ वे वैकुंट से प्रित्वी की ओर उड़ चले अपने साथ दान और मोक्ष
41:18का वह परम ज्यान लेकर जो आज भी मानवता का मार्ग गर्शन कर रहा है

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