Discover the incredible story of Lord Shiva's Grihapati Avatar in Episode 57 of our Shiva Purana series. Picking up directly from the self-sacrifice of Ahuka and Ahukya, this episode follows their reincarnations, the pious Brahmin Vishwanara and his wife Shuchismati. Witness Vishwanara's extreme penance in Kashi, the divine birth of Grihapati, and the shocking prophecy of his death at age twelve. Watch how a young boy's fierce devotion and unmatched determination lead him to conquer death itself, forcing even Indra and Yamraj to bow before the power of Shiva. #ShivaPurana #GrihapatiAvatar #Mahadev #LordShiva #HinduMythology #Kashi #SpiritualJourney
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00:00पवित्र नर्मदा के पावन तट पर जहां नित्य ही देवों का वास होता है। सती सावित्री श ओपसाहूजे रुचिश्मती और
00:08उनका पती ग्राहमन विश्वावसु दैहिक सुख से परिपूर्ण अपने पूर्व जन्म की उस दिव्य संतान की अभिलाशा में लीन थे,
00:16�
00:16जिसका वचन एक विरक्त यती ने दिया था। उनकी आत्माएं जो पूर्व जन्म में शिकारी अहुक और उसकी पत्नी अहुक्या
00:25थी। इस नवीन जीवन में एक ऐसी आस लगाए बैठी थी। मानो मरुस्थल 85 भूमी वर्षा की पहली बून्द की
00:33प्रतीक्षा कर रही हो
00:35यह वही अभिलाशा थी जिसने काल के चक्र को घुमाया था, जिसने की भांती इन पवित्र आत्माओं को पुन्ह एक
00:43नए जन्म की ओर धकेला था। विश्व के रचिता ब्रहमा, जिनके चार मुख चारों दिशाओं में सत्य का प्रकाश फैलाते
00:52हैं, इस दिव्य नाटक क
00:53सूत्रधार बनकर सृष्टी के विधान को आकार दे रहे थे। और पालनहार श्री विश्नु अपनी अनंत शक्तियों के साथ इस
01:03पवित्र अवतरण के साक्षी बनकर ब्रहमांडिय संतुलन को बनाये रखने के लिए तक पर थे। नारद मुनी वीना वादन करते
01:11हुए अ�
01:26विश्वावसु और शुचिश्मती ने उनका आशिरवात प्राप्त किया था। उनके अंतर्मन में वह दिव्यबालक जिसने अभी जन्म भी नहीं लिया
01:36था, अपनी चेतना के प्रकाश से उस पवित्र स्थान को प्रकाशित कर रहा था।
01:41यह वहक्षन था जब नेती ने अपने ताने बाने को बुन्ना शुरू कर दिया था, जब भाग्य के धागे एक
01:48अलोकिक अवतरण की ओर बढ़ रहे थे।
01:52और उसी पल कैलाश परवत के शिखर पर महादेव शिव अपनी अनादी समाधी से जागे, मानो ब्रहमांड ने श्वास लिया
02:00हो।
02:01उनकी तृतिय नेत्र की अगनी जो स्रिष्टी को भस्म कर सकती है, नवजीवन के संकल्प से प्रजवलित हुई एक कोमल
02:10दिव्य उर्जा का संचार हुआ।
02:13देवी पारवती, आदी शक्ती, अपने स्वामी के हृदय में लीन होकर उस नवजीवन के आगमन का अनुभव कर रही थी,
02:21जो उनके ही अंश से उत्पन होने वाला था।
02:25अद्रिश्य लोक में यमराज, मृत्यू के देवता, अपने भयानक कारियों के लिए अपनी शक्ती को एकत्रित कर रहे थे, अन्भिग्य
02:33की उनकी गदा का प्रहार इस बार व्यर्थ होने वाला था।
02:38लेकिन नेती के विधान को कोई भी नहीं बदल सकता, न देव, न दानव और नहीं स्वयम रित्यू का अधिपती।
02:46विश्व की आत्मा एक नवजात शिशु के रूप में विश्वावसू और शुचिश्मती के हृदय में अवतरित होने को तैयार थी,
02:55जैसे सुभह का सूर्य उशा की लाली में खिलता है।
02:59और फिर एक दिव्यक्षन में नर्मदा के तटपर स्थित उस कुटिया में एक बालक का जन्म हुआ, जिसकी किलकारी ने
03:07स्वय देवों को प्रसन कर दिया।
03:10यह कोई साधारन बालक नहीं था, यह स्वय भगवान शिव का ग्रहपती अवतार था, जो धर्ती पर अपनी लीला रचने
03:18आये थे, जिसकी दृष्टी मात्र से विश्वावसु के हृदय में ज्यान का सागर उमड पड़ा, जिसने उन्हें अपने पूर्व जन्म
03:27की स्मृ
03:30और इस प्रकार द्रहपती के रूप में शिव ने अपना अवतार लिया, अपने भक्तों की अभिलाशाओं को पूर्ण किया और
03:38मृत्यू के देवता यमराज को भी अपनी शक्ती का आभास कराया।
03:57अश्रूओं के रूप में छलकने को आतुर थी। जैसे ही विश्वनार ने अपनी पत्नी को उदास देखा, उनके माथे पर
04:06चिंता की लकीरें उभराई।
04:09शुचिश्मती ने हाथ जोड कर अपने पती से कहा कि बिना संतान के यह ग्रिहस्थ जीवन उन्हें मरुस्थल के समान
04:17सूना प्रतीत होता है।
04:19उसकी आखों में एक विशेश स्वपन था, वह केवल पुत्र नहीं, बलकि स्वयन साक्षात महादेव को अपने आंगन में खेलते
04:28देखना चाहती थी।
04:30विश्वनार ने मुस्कुराते हुए कहा कि भगवान शिव का आशिर्वात प्राप्त करना अत्यंत कठिन तपस्या का मार्ग है।
04:40शुचिश्मती ने द्रिड स्वर में उत्तर दिया कि यदी शिव की इच्छा हो, तो इस ब्रहमांड में कुछ भी असंभव
04:46नहीं है।
04:59उन्हों ने निर्णय लिया कि वे भगवान शिव को प्रसंद करने के लिए मोक्षदाइनी नगरी काशी की यात्रा करेंगे।
05:31विश्वनार ने अपनी पत्नी को आश्वासन दिया कि वे रिक्थ हस्त वापस नहीं लोटेंगे।
05:38उनके बीच का यह समवाद केवल एक पति-पत्नी का नहीं, बलकि भक्त और भक्ती का अध्भुत मिल था।
05:46रिशी ने अपने तपोबल से जान लिया था कि यह मार्ग कठिन है, किन्तु शिव की कृपा अप्रमपार है।
05:55शुचिश्मती ने अपने आसूओं को पोच कर पती के चर्णों की धूल ली और उन्हें अपनी शुभकामनाय दी।
06:03आकाश में देवताओं ने भी इस महान संकल्प को देखकर उन पर पुश्प वर्शा की।
06:09अब विश्वनार का लक्षे केवल एक था, काशी का वह शिवलिंग जहां शिव स्वयन साक्षात प्रकट होते हैं।
06:18एक अटूट विश्वास के साथ, रिशी ने अपने कदम उस दिशा में बढ़ाए जहां से मोक्ष का मार्ग खुलता है।
06:27यही से आरंभ हुई ग्रहपती अवतार की वहगा था, जिसने स्वयन यमराज को भी अचम्भित कर दिया था।
06:35कठोर तपस्या के लिए विख्यात विश्वानर पवित्रकाशी नगरी में पहुँचते हैं, जहां की भूमी स्वयन शिव भक्ती से उतप्रोथ है।
06:45उन्होंने एक अत्यंत सुन्दर दिव्य शिवलिंग की स्थापना की, जो स्वया भग्वान शिव के तेज का प्रतीक था।
06:53विश्वानर ने शिवर्ष्ट कम का जाप आरंभ किया, उनके कंट से निकले प्रतेक शब्द में अनन्य भक्ती का सागर उमड
07:00रहा था।
07:02उनकी तपस्या इतनी तीवर थी कि उन्होंने अपने शरीर की पीड़ा और बाहरी जगत के शोर को पूर्णता भुला दिया।
07:11शुन्य में लीन उनका ध्यान ब्रह्मांड की गूर ध्वनियों से भी परे, केवल शिवरूप में एकाकार हो गया था।
07:19जैसे जैसे तपस्या की उश्मा बढ़ी, काशी की गलिया शान्त हो गई, मानो प्रकृती स्वयभी इस महायोगिनी की साधना का
07:28सम्मान कर रही हो।
07:30तपस्या की अगनी से उत्पन्न दिव्य उर्जा, वायुमंडल में फैल कर देवलोग तक पहुँचने लगी।
07:37स्वयम ब्रह्मा, स्रिजन के देवता, विस्मय से इस असाधारन भक्त की शक्ती का अनुभव कर रहे थे।
07:45भगवान विश्नु पालन करता, अपनी दिव्य चेतना से इस अनुठे भक्त की निष्ठा को देख रहे थे।
07:53महादेव स्वयं भूत भावन इस असीम भक्ती के आगे अत्यंत प्रसन्न हुए, मानो भक्त की पुकार उन्हें सीधे आकर्शित कर
08:02रही हो।
08:03विश्वानर का शरीर खीन हो रहा था, परंतु उनके प्राणों में शिवनाम की ध्वनी निरंतर गुंज रही थी।
08:11उन्होंने अपने रक्त का अरपन किया, अपनी ही नसों को खोल कर शिवलिंग पर धारा प्रवाहित की एक अभूत पूर्व
08:18बलिदान।
08:20इस असहनिय वेदना और रक्तारपन ने शिव को पिघला दिया, उनकी तपोभूमी पर साक्षात प्रकट होने का संकल्त लिया।
08:41मेरे प्रिय भक्त, तुम्हारी तपस्या ने मुझे विवश कर दिया है, मैं तुम्हारे घर में जन्म लूँगा, तुम्हारा ग्रहपती बनूँगा।
08:50विश्वानर की आखों से आनंद के अश्रुबह निकले, उनके जन्मों की तपस्या का फल आज मिल गया था।
08:58देवताओं के राजा इंद्र यमराज के साथ इस अभूत पूर्व घटना को देखकर विसमय में थे, शिव की लीला अगाध
09:06थी।
09:07यमराज जो मृत्यू के देवता हैं, शिव के भक्त की तपस्या और शिव के संकल्प को देखकर स्वय नत्मस्तक हो
09:15गए।
09:16काशी की पावन भूमी पर शिव के ग्रहपती अवतार की प्रतिग्याने, काल और मृत्यू पर भी विजय प्राप्त कर ली
09:24थी।
09:25यह अवतार केवल विश्वानर के लिए नहीं, बलकि समस्त स्रिष्टी के लिए एक अभूत पूर्व वर्दान था, जो शिव के
09:33वादसल्य का प्रतीक बना।
09:35विश्वनाथ अपने हृदय की गहराई से अपने इष्ट देव शिव की स्तुती कर रहे थे, जैसे कोई प्यासा हिरन जल
09:43के स्रोत के लिए तरसता है।
09:46उनकी अटूट भक्ती और निस्वार्थ तपस्या से महादेव इतने प्रसन हुए की कैलाश परवक्भी मानो आनन से जूंक उठा।
09:55जैसे ही ब्रहमांड के स्वामी ने अपनी दिव्य उपस्थिती प्रकट की, शिलिंग से एक अग्भुत प्रकाश पुंच फूट पड़ा, जिसने
10:04पूरे कक्ष को स्वर्णिम आभा से भर दिया।
10:06शिव त्रिकाल दर्शी अपनी मंद मुस्कान के साथ विश्वानाथ के सामने प्रकट हुए मानो ब्रहमांड का सारा ज्यान उनकी आखों
10:16में समाहित हो।
10:18उन्होंने विश्वानाथ से कहा, हे भक्त, तुम्हारी निष्ठा ने मुझे पिघला दिया है, आज मैं तुम्हें वह वर्दान दूंगा जो
10:26तुम्हारे हृदय की सबसे गहरी इच्छा है।
10:31विश्वानाथ ने हाथ जोड कर कहा, हे त्रिलो की नाथ, मेरी एक मात्र अभिलाशा यह है कि आप स्वय मेरे
10:38पुत्र रूप में अवत्रित हो, मेरे ग्रिहस्थ जीवन को धन्य करें।
10:43भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए कहा, तुम्हारी इच्छा मेरी आग्या है, हे भक्त, पूर्व जन्म के आहुका और आहुक्या के
10:51वचन को मैं अवश्य पूर्ण करूँगा।
10:54मैं स्वयन तुम्हारे घर में एक ग्रिहपती के रूप में जन्म लूँगा और तुम्हारे वंश को अपने दिव्य प्रकाश से
11:02प्रजवलित करूँगा।
11:04जैसे ही शिव का यह दिव्य वचन विश्वनात के कानों में पड़ा, मानों समय ठम गया हो और ब्रहमांड ने
11:11गहरी सांस ली हो।
11:13भगवान शिव ने अपनी पतनी मा पार्वती को भी इस अवतार में साथ आने का संकेत दिया, जिससे स्रिष्टी का
11:21संतुलन बना रहे।
11:23मा पार्वती, जो सदैव शिव के साथ रहती हैं, ने भी अपने दिव्य अंश को उस पवित्र ग्रिहस्थ में भेजने
11:31की स्विकृती दी।
11:33शिवलिंग से फिर एक बार प्रकाश की धारा बह निकली, जो अब घर-घर में खुशिया फैलाने का संदेश लेकर
11:40आई थी।
11:42यद्यपी शिव स्वयन यमराज के स्वामी हैं, उन्होंने अपने भक्त की खातिर यमराज के नियमों को भी एक विशेश परिस्थिती
11:50में जुकने पर विवश कर दिया।
11:52यह दर्शाता है कि महादेव के लिए उनके भक्त का प्रेम मृत्यू के भय से भी कहीं अधिक शक्तिशाली था।
12:01विश्वानाथ ने महादेव के चर्णों में सिर जुकाया, उनके हृदय में कृतग्यता का सागर उमड पड़ा, जो शब्दों में व्यक्त
12:08करना असंभव था।
12:11जैसे ही प्रकाश की किरने क्षीन हुई, शिव का दिव्य स्वरूप धीरे धीरे ओजल होने लगा, परन्तु उनका आशिर्वाद उस
12:19स्थान पर सदैव के लिए स्थापित हो गया।
12:23विश्वनाथ अब पूर्णत संतुष्ट और आनन्दित थे, उनके जीवन का लक्ष प्राप्थ हो चुका था, और उनका घर एक पवित्र
12:31मंदिर बनने की ओर अग्रसर था।
12:34यह ग्रहपती अवतार केवल एक जन्म नहीं था, बलकि यह भक्त और भगवान के बीच असीम प्रेम और विश्वास का
12:42एक सनातन प्रतीक बन गया।
12:44और इस प्रकार महादेव ने अपने भक्त की इच्छा पूर्ण की स्रिष्टी के इतिहास में एक और अलोकिक अध्याय लिख
12:52दिया।
12:54जैसे ही शुभ महूत आया, शुचिंती के आचल से एक दिवे शिशु का जन्म हुआ, जिसकी कांती ने पूरे ग्रह
13:01को प्रकाश से भर दिया।
13:03स्वर्ग लोक से देवगणों ने प्रसन्न होकर पुष्प वर्षा की और धर्ती पर मानो एक स्वर्गी उच्सव का वातावर्ण छा
13:11गया।
13:13उसके पिता विश्वानर ने उस बालक की अलोकिक आभा और ज्ञान को देखकर उसका नाम ग्रहपती रखा, जिसका अर्थ है
13:21घर का स्वामी।
13:23बालक ग्रहपती ने जैसे जैसे होश संभाला, वैसे वैसे उसकी बुद्धी और आध्यात्मिक तेज ने सभी को चकित कर दिया।
13:33वह कम आयू में ही वेदों और शास्त्रों का ऐसा ग्यान रखता था, मानो वह स्वय ग्यान का सागर हो।
13:40उसकी वानी में ऐसी मधूरता और सत्यता थी कि सुनने वाला मंत्र मुग्ध हो जाता था।
13:48ग्रहपती की ख्याती दूर-दूर तक फैलने लगी और लोग उसे साक्षात नारायन का अंश मानने लगे।
13:55लेकिन नेती को कुछ और ही मनजूर था और ग्रहपती के जीवन में एक ऐसी घटना आने वाली थी जिसने
14:03देवलोग को भी हिला दिया।
14:06एक दिन यमराज, मृत्यू के देवता स्वय ग्रहपती को लेने के लिए प्रिथवी पर पधारे।
14:13यमराज ने अपने भयानक रूप से ग्रहपती को अपनी और खीचने का प्रयास किया, पर ग्रहपती शांत रहे।
14:21ग्रहपती ने मृत्यू के देवता को संबोधित करते हुए कहा, है यमराज, क्या आप मेरे पिता का अपमान करने आये
14:28हैं।
14:30यमराज ने अपनी मृत्यू की शक्ती का प्रदर्शन किया, पर ग्रहपती के भक्त की शक्ती के आगे वह निर्बल लगने
14:37लगा।
14:38तब ग्रहपती ने शिव का स्मरण किया, और उनके भक्तों की रक्षा के लिए स्वय महादेव प्रकट हुए।
14:46शिव ने अपने त्रिशूल की एक जलक मातर से यमराज को पीछे हटने पर विवश कर दिया।
14:53मृत्यू के देवता को महादेव के तेज के सामने नत्मस तक होना पड़ा, और उन्होंने ग्रहपती को छोड़ दिया।
15:01ग्रेपती ने अपने भक्त के रूप में अपनी निष्ठा का परिचय दिया और शिव ने उसे वर्दान दिया कि वह
15:08सदा उसके साथ रहेंगे
15:10इस प्रकार ग्रेपती ने न केवल मृत्यु को हराया बलकि शिव के दिव्य प्रेम और सुरक्षा का भी अनुभव किया
15:19ग्रेपती अवतार की यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ती और अटूट विश्वास से किसी भी बाधा को पार
15:27किया जा सकता है
15:29यह शिव पुरान की वह गाथा है जहां प्रेम और विश्वास ने मृत्यु के भाय पर विजय प्राप्त की
15:37यग्य की पवित्र वेदियों से उठती सुगंधित धूप के बीच रिशी विश्वनर के आश्रम में बालक ग्रहपती के उपनेयन संसकार
15:45की भव्यत अयारिया पूर्ण हो रही थी
15:48नौ वर्ष की अलपायू में ही बालक ग्रहपती के मुख पर असाधारन तेज और दैविय शान्ती जहलक रही थी जो
15:56वहां उपस्थित हर किसी को अचम्भित कर रही थी
16:00मंत्रो चार के साथ रिशी विश्वनर और उनकी पत्नी शुचिश्मती ने अत्यंत श्रद्धा पूर्वक देवों का आहवान करते हुए होम
16:08की अगनी में आहुतिया अर्पित की
16:12हवन कुंड की धधक्ती हुई दिव्य अगनी ने पूरे यग्यशाला को एक सुनहरी आभासे भर दिया जो इस पवित्र अनुष्ठान
16:20की गवाह बन रही थी
16:22उसी पावनक्षण में वीना की मधूर जंकार के साथ देवर्शी नारत का स्वर्ग से प्रित्वी पर दिव्य अवतरण हुआ
16:31नारायन नारायन का जाब करते हुए देवर्शी ने जैसे ही आश्रम में प्रवेश किया
16:36संपूर्ण वातावर्ण में एक अपूर्व शांती और आनंद व्याप्थ हो गया
16:41परम ज्यानी नारत को अपने द्वार पर पाकर रिशी विश्वनर और माता शुचिश्मती अत्यंत हर्षित हुए और उन्हें सादर प्रणाम
16:50किया
16:52देवर्षी नारत ने मुस्कुराते हुए अपने वरध हस्त को उठाकर ग्रहपती और उसके मातापिता को अपना मंगलकारी आशिरवाद प्रदान किया
17:02बालक ग्रहपती ने अत्यंत विनमरता के साथ आगे बढ़कर देवर्षी के चर्णों में मस्तक जुकाया जिससे उसका मस्तक धूली से
17:11सुशोगित हो उठा
17:13रिशी नारद ने इस नहवश बालक का हाथ थाम लिया और उसकी हथेली तथा मस्तक की रिखाओं का सुक्षमता से
17:20निरीच्षन करने लगे
17:23परंतु अचानक बालक के भविश्य को पढ़ते ही देवर्षी नारद के चहरे की प्रसन्नता लुप्ठ हो गई और उनकी आखें
17:30गंभीर चिंता से घिर गई
17:33देवर्षी के मुखमंडल पर आई उस असमंजस और उदासी की चाया को देखकर माता शुचिश्मती का हृदय किसी अनहोनी की
17:42आशंका से काम उठा
17:44रिशी विश्वनर ने भी संकट को भांप लिया और उन्होंने कातर स्वर में देवर्षी से उनके इस मौन और उदासी
17:52का कारण पूछा
17:54नारद जी कुछ क्षणों तक मौन रहे उनकी आखें उस अबोध बालक की मासूमियत को देखकर आशुओं से भराई थी
18:03अंतह एक भारी सांस लेते हुए देवर्षी ने उस अत्यंत भयानक और वजर्पाक जैसी जोतिशिय भविश्यवानी को प्रकट किया
18:13उन्होंने बताया कि इस अगभुत बालक के जीवन पर बिजली और प्रचंड अगनी का एक भयानक काल चक्रमंडरा रहा है
18:22नारद ने अत्यंत दुखी मन से कहा कि विधी के विधान के अनुसार यह बालक केवल बारा वर्ष की आयू
18:29तक ही जीवित रहने के लिए भाग्यशाली है
18:33यह सुनते ही माता शुचिश्मती का संसार जैसे उजड़ गया और वे वजराहत होकर भूमी पर गिर पड़ी और विलाप
18:41करने लगी
18:43रिशी विश्वनर ने अपनी बिल्खती हुई पत्नी को सहारा दिया यद्यपी उनका अपना हृदय भी अथा दोहक के सागर में
18:51डूब रहा था
18:53परंतु वह दिव्यबालक ग्रहपती तनिक भी विचलित नहीं हुआ और उसने शांत मुद्रा में यग्यकी पवित्र अगनी की ओर देखकर
19:01महादेव का ध्यान किया
19:04जाने से पूर्व देवर्शी नारद ने रोते हुए मातापिता को केवल भगवान शिव की शरण में जाने की सलाह दी
19:11जो काल के भी महाकाल है
19:14जैसे ही विपत्ती का घंगोर बादल छाया ग्रहपती के मातापिता शोक और निराशा के सागर में डूब गए उनकी आखें
19:23अश्रुधार से लबालब भर गई
19:26परंतु बाल ग्रहपती इस आसन्न विनाश के भई से अचुते शांत और अडिक खड़े थे जैसे कोई अचल परवत राज
19:34तूफानों के बीच भी अड़ा रहे
19:37उन्होंने अपने शोकसंतप्त माता पिता को अपने कोमल हाथों से थामते हुए कहा
19:43है पिता माता अश्रु क्यों बहाते हो जब महादेव की कृपा का सूर्य सदैफ प्रकाशमान है
19:50ग्रहों की चाल कितनी भी कुरूर क्यों न हो, महादेव पर अटूट विश्वास किसी भी कालचक्र से कहीं अधिक शक्तिशाली
19:58है, बालक ने आस्था की लौ जलाते हुए कहा
20:02उसकी वानी में ऐसी द्रिड़ता थी, मानो वह स्वयंकाल को चुनौती दे रहा हो, मैं मृत्यू को वश्मे करूँगा और
20:10अपने विश्वास की शक्ती से अमर्ता को प्राप्त करूँगा
20:14इस संकल्प के साथ उसने अपने माता-पिता के चर्णों को चुआ, एक विजी योध्धा की भान्ती और काशी की
20:22ओर यात्रा का निश्चय किया
20:25मैं तपस्या की अगनी में स्वयं को तपाऊंगा, हे पित्रिदेव और मृत्यू के भाय को भस्म कर दूँगा, उसने वादों
20:32की पवित्रता को आत्म साथ करते हुए कहा
20:36उसकी यात्रा की शुरुवात, जैसे कोई ननहा बीज विशाल व्रिक्ष बनने की ओर अग्रसर हो, पवित्र और निर्भीक थी
20:45जैसे जैसे वह आगे बढ़ा, प्रकृती स्वया उसके मार्ग को प्रशस्त करती प्रतीत हुई, जैसे उसे दिव्य आशिर्वात प्राप्थ हो
20:55उसके मन में कोई भय नहीं, केवल महादेव के प्रती असीम श्रद्धा और अपनी नेती को बदलने का संकल्प प्रजवलित
21:03था
21:04जैसे जैसे वह काशी की पावन भूमी के निकट पहुँच रहा था, एक दिव्य प्रकाश पुंज उसकी ओर आकर्शित हुआ,
21:12स्वय महाकाल का संकेट
21:14उस पवित्र नगरी में, जहां स्वय महादेव वास करते हैं, उसने अपनी तपस्या की यात्रा आरंभ करने का निश्चय किया
21:24एक शांत कुटिया में, उसने स्वय को ध्यान और तपस्या के लिए समर्पित कर दिया, जैसे कोई शिल्पी अपने उतक्रिष्ट
21:32कृती को तराश रहा हो
21:34दिन और रात वह महादेव के नाम का जाप करता रहा, उसकी आत्मा तपकी अगनी में शुद्ध होती गई
21:42उसकी तपस्या इतनी तीवर थी कि स्वर्ग लोक में भी कमपन महसूस होने लगा, और देवताओं ने चिन्ता से महादेव
21:50की ओर देखा
21:52यमराज मृत्यू के अधिपती इस अभूत पूर्व तपस्या से क्शुब्ध हुए और उन्होंने स्वयन जाकर उस बालक को रोकने का
22:00निश्चय किया
22:02जैसे ही यमराज बालक के सम्मुख प्रकट हुए, ग्रहपती ने अपनी आखे खोली, मृत्यू के स्वामी के भैसे रहित केवल
22:10महादेव का स्मरन करते हुए
22:13और उसक्षण क्मृत्यू का स्वामी भी उस बालक की असीम श्रद्धा और महादेव के प्रती समर्पन के आगे नत्मस्तक हो
22:21गया, ग्रहपती की विजय का साक्षी बनकर
22:25वारांसी की पावन भूमी पर ग्रहपती ने अपने श्रद्धा के प्रतीक स्वरूप एक भव्य शिवलिंग की स्थापना की, जो उनकी
22:33अटूट भक्ती का मौन साक्षी बना
22:37ग्रीश्म की प्रचंड ज्वालाये हो या वर्षा की अनवरक बूदें, ग्रहपती अपने आसन पर अडिग रहे, मानो प्रकृती की हर
22:45परीक्षा उन्हें और भी द्रिड बना रही हो
22:48वन्य जीवों का भय भी उनके संकल्प को डिगा न सका, हिन्सक पशू भी उस पवित्र आभा के सम्मुक शान्त
22:56हो जाते, मानो इश्वरिय प्रेम ने उन्हें भी वश में कर लिया हो
23:01भूक और प्यास की पीड़ा उनके शरीर को जरजर कर रही थी, परन्तु उनका मन शिव के चर्णों में इतना
23:08लीन था कि देह की सुधबुध ही खो बैठी
23:12जैसे जैसे बारहवे वर्ष की अंतिन घड़ी निकट आई, ग्रहपती का पार्थिव शरीर क्षीन हो गया, परन्तु उनकी आध्यात्मिक जोती
23:20दिव्यकांती से प्रजवलित हो उठी
23:24यह जोती केवल प्रकाश नहीं थी, बलकि शुद्ध भक्ती का एक अभेद्य कवच बन गई, जो किसी भी नकारात्मक शक्ती
23:32को उनके निकट आने से रोक रही थी
23:35इसी तपस्या के चरम पर स्वय महादेव अपनी असीन करुणा के साथ ग्रहपती की निष्ठा का प्रत्यक्ष प्रमान लेने के
23:43लिए प्रकट हुए
23:45भगवान शिव ने ग्रहपती की भक्ती को अपनी आखों से देखा, जो उनके त्रिनेत्र के समक्ष किसी भी सांसारिक मोह
23:53माया से परे थी
23:55ग्रहपती ने अपनी आखें खोली और अपने सम्मुक साक्षात देवाधिदेव महादेव को पाकर उनका हृदय आनंद के अश्रु से भर
24:04गया
24:06महादेव ने ग्रहपती की तपस्या का फल प्रदान करने हेतु अपने भक्त के घर एक सामान्य बालत के रूप में
24:13अवतरित होने का निर्णे लिया
24:16अचानक एक दिव्य शिशु का जन्म हुआ जिसका तेज सूर्य के समान था और जिसने उस स्थान को आनंद और
24:23शांती से भर दिया
24:26ग्रहपती और उनकी पत्नी सुदेशना ने उस शिशु को अपनाया और उसे ग्रहपती नाम दिया मानोस्वय भगवान ने उनके घर
24:34का आश्रय लिया हो
24:37जैसे जैसे बालक ग्रहपती बढ़ा हुआ उसके अलौकिक गुन और दिव्य शक्तिया प्रकट होने लगी जो सामान्य बालकों से कहीं
24:45परे थी
24:46एक दिन यमराज मृत्यू के देवता उस बालक की असाधारन महिमा का अंत करने आये परंतु ग्रहपती की चेतना ने
24:55उन्हें रोक दिया
24:57बालक ग्रहपती ने यमराज की ओर देखा और उनके दिव्य नेत्रों से निकली करुणा की धारा ने यमराज के क्रोध
25:04को शांत कर दिया
25:06यमराज जो मृत्यू पर अपना अधिकार रखते थे उस बालक की दिव्यता के समक्ष नत्मस्तक हो गए यह स्विकार करते
25:15हुए कि वह सामान्य मानव नहीं स्वया महादेव का अंश है
25:20ग्रहपती ने यमराज को आशीश दी और मृत्यू के देवता को यह ज्यान दिया कि प्रेम और भक्ती मृत्यू पर
25:27भी विजय प्राप्ट कर सकती है
25:31यमराज ने उस बालक के चर्णों में अपना शीश नवाया और क्षमा याचना कर अपने लोग को लोट गए उस
25:38अद्भुत अवतार की शक्ती को स्विकार करते हुए
25:42इस प्रकार ग्रहपती अवतार ने सिद्ध किया कि सच्ची भक्ती और समर्पन से इश्वर स्वया अपने भक्तों की रक्षा के
25:50लिए प्रकट होते हैं और मृत्यू को भी जुकाने में सक्षम है
25:56तपोवन की शांत भूमी अचानक ही एक अद्भुत और दिव्य उर्जा के स्पंदन से थर्थरा उठी जहां बालक ग्रहपती अपनी
26:04कठिन साधना में लीन थे
26:07तभी बादलों के गरजने के साथ आकाश में एक तीवर विद्युत कौन्ध उठी जिसने संपूर्ण वन छेत्र को एक अलोकिक
26:15प्रकाश से आलोकित कर दिया
26:18स्वर्ग के राजा देवराज इंद्र अपने विशाल और एरावत हाथी पर सवार होकर गरचते हुए मेगों के बीच से प्रिथवी
26:26की ओर उतरने लगे
26:28छे दान्तों वाले एरावत के भारी कद्मों ने जब भूमी को स्पर्ष किया तो संपूर्ण तपोवन देवराज के वैभवशाली आगमन
26:37से गुँझ गुठा
26:39अपनी सजीली सून को उठाते हुए एरावत ने एक तीवर चिंधाड मारी जिसने बालक ग्रहपती के ध्यान को अपनी ओर
26:47आकर्षित किया
26:49सिन्हासन और सत्ता के मद में चूर देवराज इंद्र ने उपर से ही बालक को देखा और उनकी आखों में
26:56असीम अहंकार साफ ज़लक रहा था
26:59इंद्र ने वजर जैसी गंभीर आवाज में कहा, हे बालक, मैं स्वर्ग का स्वामी हूँ और तुम्हारी इस कठोर साधना
27:08से अत्यंत प्रसन्न हूँ
27:10मैं तुम्हें मृत्यू के इस चक्रव्यू से बचा सकता हूँ और तुम्हें वो समस्ट ऐश्वर्य दे सकता हूँ जिसकी तुम
27:17कलपना भी नहीं कर सकते
27:20किन्तु इसके बदले तुम्हें महादेव की इस निरर्थक पूजा को तुरंट छोड़ना होगा क्योंकि वे तुम्हें इस अस्मय मृत्यू से
27:28कभी नहीं बचा सकते
27:31देवराज की इस शर्थ को सुनकर बालक ग्रहपती के मुख पर तनिक भी भय नहीं आया बलकी उनकी आखों में
27:38शिव के प्रती भक्ती और गहरी हो गई
27:41ग्रहपती ने अपने ननहे हाथों से महादेव के लिंको और अधिक सुगरिड़ता से पकड़ लिया जैसे वे पूरी स्रिष्टी की
27:49शक्ती को अपने पास रखे हो
27:52बालक ने अपनी शांट किन्तु अत्यंत प्रभावशाली वानी में कहा है देवराज
27:57आपका यह प्रस्ताव अत्यंत लुभाव ना हो सकता है पर मेरे लिए तुछ है
28:05मैं महादेव के चर्णों की धूल में प्रान त्यागना स्विकार करूंगा
28:09बजाए इसके की मैं किसी अन्य देवता की शरण में जाकर अमरता की भीख मांगू
28:16मेरे महादेव ही मेरे रक्षक, मेरे स्वामी और मेरे सर्वस्व हैं
28:20उनके अतरिक्त मैं किसी अन्य के आगे अपना मस्तक कभी नहीं जुकाऊंगा
28:26ग्रेपती के इस दुस्साहस्पून उत्तर को सुनकर देवराज इंदर का मुख क्रोध से लाल हो गया
28:32और उनका अहंकार अत्यंत आहत हुआ
28:36उन्होंने अपनी मुठी में कड़कडाते हुए वजर को उपर उठाया
28:40जिससे निकलने वाली बिजली के जटके धर्ती को कपाने लगे
28:45इंदर ने गरस्ते हुए धमकी दी मूर्ख बालक
28:49यदि तुने अभी मेरी बात नहीं मानी तो मेरा यह वजर एक क्षण में तेरे अस्तित्व को भस्म कर देगा
28:58भयावा वजर के प्रहार की चेतावनी के बावजूद बालक ग्रहपती ने शांत भाव से अपनी आखे बंद कर ली और
29:05ध्यानमगन हो गए
29:08उन्होंने मन ही मन महादेव का स्मरण किया जैसे वे जानते थे कि शिव के साए में उन्हें काल का
29:14कोई भी अस्त्रचू भी नहीं सकता
29:17एक बालक की अडिग आस्था और देवराज के वजर के बीच का यह टक्राव अब उस परम सत्य को प्रकट
29:24करने वाला था जो स्रिष्टी को हिला देगा
29:28जब ग्रहपती की अटूट निष्ठा ने स्वय महादेव को द्रवित कर दिया तब शिलिंग से एक दिव्य प्रकाश पुन्च फूट
29:35पड़ा जिसने पूरे कक्ष को अपने दिव्य तेज से भर दिया
29:40भगवान शिव अपने ग्रहपती रूप में प्रकट होकर ग्रहपती के प्रती अपने अपार संतोष को व्यक्त करते हुए बोले के
29:48मेरे प्रिय भक्त इंद्र का वह रूप केवल तुम्हारी परीक्षा थी जो तुमने अत्यंत धैर्य और विश्वास से उत्तियन की
29:57उन्होंने आगे कहा काल का भय अब तुम्हें स्पर्ष नहीं करेगा क्योंकि मैंने तुम्हें मृत्युन्जय का वर्दान दिया है जो
30:05समय की सीमाओं से परे है
30:08आज से तुम दिखपालों में गिने जाओगे और अगनी लोग के अधिपती बनकर तुम दिशाओं का भी शासन करोगे
30:16और यह शिलिंग जिस पर तुमने अपना सर्वस्व नियोचावर किया आज से ग्रहपतिश्वर के नाम से विख्यात होगा जो भक्तों
30:25के लिए सुरक्षा का प्रतीक बनेगा
30:28ग्रहपती अपनी आखों में अविश्वास और हृदय में कृत अग्यतालिये प्रभु के चर्णों में जुक गया
30:35मानो ब्रहमांड की सारी महिमा उसी क्षण उसके समक्ष प्रकट हो गई हो
30:40शिव की वानी किसी अमरित धारा के समान ग्रहपती के कानों में गूंजी
30:45और उसने स्वयन को उस दिव्य प्रेम की वर्षा में सराबोर महसूस किया जिसने उसके जीवन को अर्थ दिया
30:53जैसे ही ग्रहपती ने अपना मस्तक उठाया, उसने स्वयं को काल के बंधनों से मुक्त पाया, एक ऐसी शांती और
31:01आनंद का अनुभव किया जो उसने पहले कभी नहीं जाना था
31:06यमराज जो मृत्यू के देवता थे, कैलाश परवत पर अपनी सभा में इस अध्भुत घटना का अवलोकन कर रहे थे,
31:14और शिव की शक्ती के समक्ष उन्होंने भी सम्मान में अपना सिर जुकाया
31:19शिव ने अपने भक्त को अमर्ता का वर्दान देते हुए कहा, अब तुम उस लोक में विचर्ण करोगे जहां काल
31:26का कोई बंधन नहीं, और तुम्हारी कीर्ती युगों-युगों तक गाई जाएगी
31:32अगनी देव स्वयन ग्रहपती के सामने प्रकट हुए अपने नए अधिपती का स्वागत करने के लिए और उनके आगमन से
31:40सारा वातावर्ण उश्मा और दिव्यता से भर गया
31:44ग्रहपती को अगनी लोग का स्वामी घोशित किया गया और दिशाओं पर उनका अधिकार स्थापित हुआ
31:50मानोवे स्वयन दिक्पालों के मध्य एक दिव्य आसन पर विराज मान हो
31:56ग्रहपती के घर का वह साधारन शिलिंग अब ग्रहपतिश्वर के नाम से पूजित होकर अंगिनत भक्तों के लिए आस्था और
32:04सुरक्षा का एक पावन केंद्र बन गया
32:07शिव ने ग्रहपती को न केवल अमर्ता दी बलकि उसे वह सामर्थ्य भी प्रदान किया जिससे वह अंधकार पर विजय
32:15पा सके जो उसके भक्तों के लिए एक अनमोल भेंट थी
32:20ग्रहपती की आखें जो पहले भय से भरी थी अब ज्यान और अनंत प्रेम के प्रकाश से चमक रही थी
32:27मानों उन्होंने स्वय महादेव के स्वरूप का साक्षातकार कर लिया हो
32:33देवतागन जो स्वर्ग से इस अलौकिक द्रिश्य को देख रहे थे शिव की क्रिपाद्रिष्टी और ग्रहपती के सौभाग्य पर प्रसन्न
32:41होकर उष्प वर्शा करने लगे
32:45ग्रहपतिश्वर लिंग के समक्ष ग्रहपती ने प्रभु को नमन किया यह जानते हुए कि उनका जीवन अब महादेव की सेवा
32:52और उनके भक्तों के कल्यान के लिए समर्पित है
32:57भगवान शिव अपने ग्रहपती अवतार में ग्रहपती को एक अंतिम आशिर्वाद देते हुए शांत भाव से बोले तुम्हारा विश्वास ही
33:06तुम्हारी शक्ती है इसे सदा बनाए रखना
33:10और इस प्रकार ग्रहपती ने न केवल मृत्यू पर विजय पाई बलकि महादेव के परम भक्त के रूप में अमर्ता
33:17और दिव्यता को प्राप्त किया जो सभी के लिए एक प्रेनासरोत बन गया
33:23ग्रेपतिश्वर का यह पावन धाम जहां स्वयन शिव ने अपने भक्त के घर जन्म लिया आज भी भक्तों की मनोकामनाए
33:31पूर्ण करता है और उन्हें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है
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