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श्रीकृष्ण के परमधाम गमन के बाद पृथ्वी पर छाए अंधकार और कलियुग के पूर्ण आगमन का क्षण। अर्जुन हस्तिनापुर लौटकर पांडवों को द्वारका के विनाश और अपनी शक्तियों के क्षय का हृदयविदारक समाचार सुनाते हैं। इस गहन दुख और नियति के सामने, पांडव अपने राजपाट का त्याग कर, परीक्षित को सिंहासन सौंपकर महाप्रयाण की ओर अग्रसर होते हैं। द्रौपदी और भाइयों के साथ स्वर्ग के द्वार तक की उनकी अंतिम, त्याग और धर्म से भरी यात्रा का मार्मिक चित्रण। क्या युधिष्ठिर धर्म की इस अंतिम परीक्षा में भी खरे उतरेंगे? जानिए इस महाकाव्य यात्रा के रहस्यों को! #Mahaprasthan #Pandavas #KrishnaDeparture #BhagavataPurana #KaliYuga #Yudhishthira #Arjun #Moksha #HinduMythology #EpicJourney
Transcript
00:00हस्तिनापूर की प्राचीन दीवारों के सम्मुख एक थकाहारा रथ आकर रुखता है, जिसके भीतर से अर्जुन का शक्तिहीन धुंधलाया चेहरा
00:09बाहर जाकता है, जिस पर गेहन शोक की गहरी रेखाए स्पष्ट दिख रही हैं.
00:15नगर के मुख्य मार्ग से गुजरते हुए, अर्जुन का रथ एक मौन शोकगीत की तरहे प्रतीत होता है, मानो स्वयम
00:23मार्ग भी उनके हृदय के दुहक से भारी हो गया हो.
00:27नगरवासियों की आखों में अपने प्रिय अर्जुन की यह दशा देख कर आश्चर्य और चिंता की गहरी लहर दौड जाती
00:35है, मानो किसी अशुब घटना की आहट ने उन्हे घेर लिया हो.
00:40महलों के उचे द्वारों से प्रवेश करते हुए, अर्जुन की ठकी हुई आकरिती शाही रक्षकों को भी विचलित कर देती
00:47है, जो उनके चहरे पर छाए गहरे विशात को भाम्प लेते हैं.
00:53न्यायस भामे प्रवेश करते ही, युधिश्थिर, भीम, नकुल और सहदेव अर्जुन की इस अप्रत्याशित और शक्तिहीन अवस्था को देखकर एक
01:02साथ स्टब्ध रह जाते हैं.
01:05युधिश्थिर, जिनके चहरे पर सदैव धैर्य और शांती जलकती थी, अब अपने भाई की पीड़ा को देखकर गहरे चिंता में
01:13डूब जाते हैं, उनकी आखें प्रश्न और गर्द से भरी हैं.
01:19बहुत कठिनाई से अर्जुन अपना सिर उठाते हैं, उनके होंट कापते हैं और उनकी आवाज लडखडाती हुई निकलती हैं, जैसे
01:28कोई गहरी खाई से पुकार रहा हो.
01:31भारी मन से अर्जुन श्रीकृष्न के परमधाम गमन का दुहखद समाचार सुनाते हैं, उनके शब्दों में न केवल दुहख बलकी
01:39एक युग के अंत का भार भी समाहित है.
01:43उनके वर्णन के साथ द्वार का नगरी के समुद्र में समाहित होने का भयानक ग्रिश्य पांडवों के मानस पटल पर
01:51उभराता है, जैसे लहरेंग एक प्राचीन सभेता को निगल रही हो.
01:56संपूर्ण सभापर एक गहरा सननाटा चा जाता है, मानो समय थम गया हो और हर किसी के हृदय में एक
02:04अनकहा भय और अनिश्चित्ता का बोज उतर गया हो.
02:08अत्यधिक पीडा के साथ अर्जुन अपनी व्यक्तिगत शक्तियों के क्षय का वर्णन करते हैं, कैसे भीलों के सामने उनका गांडीव
02:16धनुष भी निश्प्रभ हो गया था.
02:19उन्होंने भीलों द्वारा यादव स्त्रियों के अफरन का हृदय विदारक वृत्तांत सुनाया, जब उनकी वीरता और अस्त्रशस्त्र भी निश्पल हो
02:28गये थे, जैसे समयने उनसे उनकी क्षमता छीन ली हो.
02:33इस अपमान और विवशता की कथा कहते हुए, अर्जुन का सिर जुक जाता है, उनका हृदय गलानी और आत्म गलानी
02:40से भर जाता है, मानो समस्त ब्रह्मान उनके इस अस्फलता का साक्षी हो.
02:46यह सुनकर भीम का विशालकाई शरीर क्रोध और निराशा से काप उठता है, उनकी मुठिया कस जाती है, मानो वे
02:55अद्रिश्य शत्रु पर तूट पड़ना चाहते हूँ.
02:58अर्जुन की आवाज अंत्त तूट जाती है, वह अपने आसूओं को रोक नहीं पाते और उनका हृदय कापते हुए इस
03:06युग के भयानक अंत्त की गवाही देता है.
03:10युधिष्ठिर गहरे चिंतन में डूबे हुए, अपने माथे पर हाथ रखते हैं, उनके चहरे पर एक ऐसी गमभीर समझ आती
03:18है, जो केवल धर्म और नेती के गहरे ज्ञान से ही आ सकती है.
03:24उनका मन एक अप्रत्याशित सत्य को स्वीकार करता है, श्रीकृष्ण के परमधाम गमन के साथ धर्ती से धर्म का एक
03:32युग समाप्थ हो चुका है, और कलियुग का आरंभ हो गया है.
03:37इस विनाशकारी सत्य के सामने सभी पांडव गहरे शोक और निराशा में डूब जाते हैं, क्योंकि उन्हें यह स्पष्ट हो
03:45जाता है कि अब उनका समय भी प्रित्वी पर समाप्थ हो चुका है.
03:51युधिष्ठिर की गंभीर आवाज गूंजती है, हे भाईयों, हमारा कार्य अब समाप्थ हो गया है, इस प्रित्वी पर हमारा समय
04:00अब पूरा हो चुका है, उनके शब्द नेती के एक अटल निर्नय की घोशना करते हैं.
04:07सभी पांडव एक दूसरे की ओर देखते हैं, उनकी आखों में एक साजह दुहक और अंतिम यात्रा पर निकलने का
04:15अटल संकल्प दिखाई देता है, मानो वे एक नए अंजाने मार्ग पर चलने को तयार हो.
04:22एक गहरी असहनिय पीडा उनके हृदय में घर कर गई, प्रत्येक पांडव अपने प्रिय सखा, अपने मार्ग दर्शक के जाने
04:30के सत्य को आत्म साथ कर रहा था, मानो ब्रहमांड का ही एक महत्वपून स्तंभ तूट गया हो.
04:38विशेशकर अर्जुन, जिनका संपून अस्तित्व श्रीकृष्ण के बिना अधूरा था, एक असीम शुने में विलीन होता महसूस कर रहे थे,
04:46जैसे उनके जीवन का आधार ही छीन लिया गया हो.
04:50अपने अंतिन सहारा, गांडीव को उठाने का प्रयास करते हुए, अर्जुन की भुजाओं में वह पूर्व शक्ती नहीं रही, मानो
04:59देवत्व ही उनसे दूर चला गया हो और धनुष मात्र एक भार बन गया हो.
05:05गांडीव उनके हाथों में भारहीन, शक्तिहीन होकर गिरा, जिसने अर्जुन को अपनी संपूर्ण शक्ती के क्षै का भयानक एहसास कराया,
05:14मानो उनके प्राण ही निकल गये हुँ.
05:17दूर से यह द्रिश्य देखते हुए, धर्मराज युधिश्थिर की आखों में गहन वेदना और आने वाले युग की स्पष्ट भविश्यवानी
05:25जलक रही थी, जैसे वे समय के प्रवाह को स्पष्ट देख रहे हुँ.
05:31उन्हें श्री कृष्ण के वे शब्द याद आए, जब मैं प्रित्वी त्यागूंगा, कली का प्रभाव चरम पर होगा, जो अब
05:38एक भयाव सत्य के रूप में सामने था, उनके हृदय में एक गंभीर सत्यता स्थापित कर रहा था.
05:46बाहर सूर्य का तेज मन्द पढ़ गया था, पवन अपनी शितलता खो चुका था, और व्रिक्षों के पत्तों में एक
05:53उदासी भरी सरसराहट थी, मानो प्रकृती भी इस महान क्षती पर शोक मना रही हो.
06:00पशुपक्षी भी अपनी स्वाभाविक चहचहाहट खो चुके थे, उनकी आखों में एक अंजानाभय और निराशा स्पष्ट दिखाई दे रही थी,
06:09जैसे वे आने वाले कलियुक की आहट महसूस कर रहे हूं.
06:13इन अशुब संकेतों और अर्जुन की शक्तिहींता को देखकर, युधिष्ठिर में स्विकार कर लिया कि यह कलियुक का अटल आगमन
06:22है, अब कोई भी शक्ती इसे रोक नहीं सकती थी.
06:26उनकी गंभीर वानी फिर गुमजी, हे भ्राताओं, श्रीकृष्ण के परमधाम गमन के साथ ही कलियुक पूर्ण रूप से स्थापित हो
06:34चुका है, और धर्म का सूर्य अब अस्थ हो गया है.
06:40महाबलशाली भीम भी इस कटू सत्य को सुनकर कुछ पल के लिए विचलित हुए, पर फिर उन्होंने अपने अग्रच के
06:46शब्दों को स्वीकार कर लिया, अपने हृदय में उमरते तूफान को शांत करते हुए.
06:53नकुल और सहदेव, अपने बड़े भाई के ज्यान पर अटल विश्वास रखते हुए, मौन रूप से इस युग परिवर्तन की
07:00कठोर वास्तविक्ता को हृद्यंगम कर रहे थे, उनके चहरे पर गहरी उदासी थी.
07:06द्रॉप दी, जिनकी आत्मा भी श्री कृष्ण के जाने से व्याकुल थी, अपने दुखों को समेकते हुए, एक अडिग द्रिड
07:14संकल्प से युक्त द्रिश्टी से भविश्य की ओर देख रही थी, मानो स्वयंको और अपने प्रियजनों को दिलासा दे रही
07:21हो.
07:23युधिष्ठिर ने स्पष्ट किया कि प्रिथवी पर उनके सभी उद्देशों की पूर्ती हो चुकी है, धर्म की स्थापना अब भावी
07:30पीधियों का दायत्व है, और उनका कार्य अब समाप्थ हो गया है.
07:36इस बोध के साथ ही, सभी पांडवों और ग्रॉपदी ने एकमत होकर संसार के मोपाश से मुक्थ होने और महाप्रयान
07:44पर निकलने का निर्णय लिया एक अंतिम आध्यात्मिक यात्रा पर.
07:49उन्होंने अपने एकमात्र जीवित वन्शज अभिमन्यु के पुत्र राजा परीक्षित को हस्तिनापूर का सिनहासन सौंपने का शुब संकल्प लिया, ताकि
07:59धर्म का ध्वज सदा लहराता रहे.
08:02युधिष्ठिर ने विदुर, संजय और अन्य मंत्रियों को परीक्षित का मार्ग गर्शन करने और धर्म परायन राज्य चलाने का दायत्व
08:10सौपा एक मस्बूत उत्तराधिकार सुनिश्चित करते हुए.
08:15राजसी वस्त्रों और आभूशनों का त्याग कर, उन्होंने संसार के सभी बंधनों से स्वयं को मुक्त करने का प्रतीक बनाया,
08:23एक नए सरल अस्तित्व की ओर कदम बढ़ाते हुए.
08:27उन्होंने साधारण वलकल वस्त्रधारण किये, जो उनकी त्याग और वैराग्य की भावना का प्रतीक था, एक नई आध्यात्मिक यात्रा का
08:37आरंभ सांसारिक सुखों से परे.
08:40अंतिम बार हस्तिनापुर के भव्य प्रासादों और प्रिय भूमी को देखकर, वे सब मौन भाव से पीछे मुड़े और एक
08:48अंजानी दुर्गम यात्रा पर निकल पड़े, स्वर्ग की ओर.
08:52हस्तिनापुर की सीमाएं पीछे छूट चुकी थी, और पांडव बंधु अपने मौन सहियात्री, एक वफादार श्वेत श्वान के साथ, प्रकृती
09:01के विस्तृत और कठोर आलिंगन में अनंत यात्रा पर अग्रसर थे.
09:06उन्होंने नदियों, जंगलों और विशाल मैदानों को पार किया, जहां हर कदम उनके सांसारिक मोह के बंधन को तोड़ता और
09:15उन्हें स्वर्गारोहन की ओर एक कदम और आगे बढ़ाता था.
09:20उनकी यात्रा केवल भागोलिक नहीं थी, अपितु आत्मा की एक गेहन खोज थी, जहां हर थका देने वाला मील उन्हें
09:28नश्वर्ता के त्याग और अमर्ता की ओर ले जा रहा था.
09:32विशाल परवतमालाओं की ओर बढ़ते हुए, एक बरफीले मैदान के दुर्गम मार्ग पर द्रौपदी के कदम लड़खडाने लगे और उसकी
09:41आखें क्षीन होती जा रही थी, मानो उसका प्राणवायू साथ छोड़ रहा हो.
09:47अचानक द्रौपदी लड़खडाकर नीचे गिर पड़ी, उसके अंतिन क्षणों में भी एक शांत स्विकृती का भाव था, जैसे उसने अपनी
09:56जीवन यात्रा का अंत स्विकार कर लिया हो.
09:59भीम ने अपनी पीडा को नियंत्रित करते हुए युधिश्थिर से पूछा, हे धर्मराज।
10:28युधिश्थिर के शब्दों का भार लिये सहदेव, जिनकी बुद्धी अतुलनिय थी, लड़खडाकर उसी बरफीले मार्ग पर गिर पड़े, मृत्यू के
10:37आगोश में समाते हुए.
10:39भीम ने फिर एक बार प्रश्न किया, हे धर्म के ग्याता।
10:44सहदेव, जिसने कभी किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया, वह क्यों काल के ग्रास में सबसे पहले गिरा।
10:52युधिष्ठिर ने अपने अटल स्वर में उत्तर दिया, सहदेव को अपने ज्यान पर अत्यधिक गर्व था, और यही अभिमान उसके
11:00पतन का कारण बना।
11:02उनकी यात्रा आगे बढ़ी और कुछ ही क्षणों बाद, नकुल, जिसकी सुन्दर्ता अध्वितिय थी, भी अपने शरीर को छोड़कर उसी
11:11मार्क पर गिर पड़े।
11:13भीम ने एक बार फिर अपनी आत्मा की वेदना को शब्दों में पिरोते हुए पूछा, हे धर्मराज, नकुल जिसने कभी
11:22किसी को अपमानित नहीं किया, वह क्यों मृत्यू को प्राप्थ हुआ।
11:26युधिष्ठिर ने गंभीर्ता से जवाब दिया, नकुल को अपने रूप पर अत्यधिक अभिमान था, और यही दोश उसके अंतिन यात्रा
11:35में बाधा बन गया।
11:36तीवर बरफीली हवाओं के बीच, अर्जुन, जिसकी धनुर विद्या तीनों लोकों में विख्यात थी, उसके शरीर ने भी साथ छोड़
11:45दिया और वह भी उसी मार्क पर गिर पड़ा।
11:48भीम ने एक गहरी सांस लेकर अपने प्रियभाई के पतन से द्रवित होकर पूछा, हे महाराज, अर्जुन जिसने कभी युद्ध
11:58में हार नहीं मानी, वह क्यों इस यात्रा में विफर रहा?
12:03युद्धिष्थिर ने अत्यंत धैर्य से समझाया, अर्जुन को अपने बल पर और अपनी वीर्ता पर बहुत अभिमान था, उसने प्रतिग्या
12:11की थी कि वह शत्रों को एक ही दिन में जला देगा, पर ऐसा कर नहीं पाया.
12:17और फिर हिंसे ढखे उस दुर्गम पत पर भीम भी लडखडाते हुए गिर पड़े, उनके पराक्रमी शरीर ने भी अपनी
12:25अंतिम सांस ली, जिससे युद्धिष्थिर अब अकेले रह गए, केवल अपने श्वान के साथ.
12:32युद्धिष्थिर अपने वफादार श्वान के साथ आगे बढ़ते रहे, उनके मन में कोई दुहक या आश्चर्य नहीं था, क्योंकि उन्होंने
12:40संसार के क्षणभंगुर स्वभाव को पूर्ण रूप से आत्मसाथ कर लिया था.
12:46जैसे ही वे मेरू परवत की सबसे उची चोटी के पास पहुँचे, चारों और बरफीले तूफान की प्रचंड ताथी और
12:54आकाश से एक दिव्य स्वर्णिम रत चमकते हुए उनकी और उत्रा.
12:59रत से स्वयन देवराज इंद्र प्रकट हुए, उनके मुख मंडल पर दिव्य तेज और हाथ में वजर धारन किये हुए,
13:07उन्होंने युधिष्थिर को स्वर्ग में प्रवेश करने का निमंत्रन दिया.
13:12युधिष्थिर ने अपनी आखें देवराज इंद्र की ओर उठाई, उनके मुख पर अविचल द्रिडता थी, और उन्होंने स्पष्ट किया कि
13:20वह अपने वफादार श्वान को त्यागे बिना स्वर्ग में प्रवेश नहीं करेंगे, जिसने उनका साथ जीवन भर निभ
13:29देवराज इंद्र ने समझाया कि स्वर्ग के द्वार पशुओं के लिए वर्जित हैं, और युधिष्थिर को अपने पवित्र तप का
13:36फल प्राप्त करने के लिए उसे छोड़ना होगा।
13:57अचानक एक दिव्य और प्रतापी रूप में परिवर्तित हो गया, स्वयन धर्मदेव, न्याय और नीती के प्रत्यक्ष देवता।
14:06धर्मदेव ने युधिष्थिर की प्रशनसा की कीवे किसी भी कीमत पर सक्य और निष्ठा के मार्क से विचलित नहीं हुए
14:13और इस प्रकार उन्होंने सभी सांसारिक मोह माया पर विजय प्राप्त की।
14:18अब युधिष्थिर, धर्मदेव और देवराज इंद्रत तीनों उस स्वर्णिम रत में सवार हुए जो सीधे स्वर्ग के उच्च लोकों की
14:27ओर उडचला, बरफीले शिखरों को पीछे छोड़ते हुए।
14:31जैसे जैसे रत उपर उठा, स्वर्ग के भव्य और चमकदार द्वार उनके सामने प्रकट हुए, जो अन्मोल रतनों और दिव्य
14:40धातुओं से जड़े थे, जिनकी शोभा अद्वितिय थी।
14:44रत स्वर्ग के भव्य प्रांगण में उत्रा, जहां चारों और दिव्य संगीत गूंज रहा था और अग्भुत सुगंध हवा में
14:52फैली हुई थी, जो मन को असीम शांती प्रदान कर रही थी।
14:57हाला की स्वर्ग की अनुपम सुन्दर्ता से वे मोहित थे, युधिश्थिर के हृदय में एक अजीब सी रिक्तता का अनुभव
15:04हुआ, क्योंकि उन्होंने अपने भाईयों और द्रौपदी को वहा नहीं देखा।
15:10उनके मन में अपने प्रियजनों की स्मृती कौंध उठी और उन्होंने देवराज इंद्र से विनमरता पूर्वक पूछा की उनके भाई,
15:18भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव और उनकी पतनी द्रौपदी कहा है।
15:24इंद्र ने उत्तर दिया कि उनके भाई और द्रौपदी इस समय स्वर्ग में नहीं हैं, बलकि वे अपने पापों का
15:31प्रायश्चित करने के लिए एक अन्य लोक में हैं और उन्हें शुद्धिकरन की प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है।
15:39यह सुनकर युधिष्ठिर के मन में करुणा और द्रिड़ता भराई और उन्होंने घोशना की की यदि उनके प्रियजन पीड़ा में
15:47हैं, तो वे स्वर्ग का सुख त्याग कर उनके साथ उसी स्थान पर जाएंगे, चाहे वह नरक ही क्यों न
15:53हो।
15:55इंद्र के आदेश पर एक दिव्यदूत प्रकट हुआ, जिसका मुख मंडल तेजस्वी था और जिसने युधिष्ठिर को नरक के उन
16:03मार्गों की ओर ले जाना शुरू किया जहां उनके प्रियजन कथित रूप से थे।
16:24जैसे जैसे वे आगे बढ़ते गए, चारों और से भयानक चीखें, कराहें और पीडा की आवाजे सुनाई देने लगी, जो
16:33हर कदम पर उनके हृदय को विचलित कर रही थी।
16:37फिर एक क्षण ऐसा आया, जब युधिष्ठिर ने नरक के सबसे भयानक द्रिश्यों में से एक को देखा, एक जलती
16:44हुई नदी, जहां पापियों की आत्माय असहनिय पीडा में डूब रही थी।
16:50इसी भयावः वातावर्ण में, युधिष्ठिर को अपने प्रिय भाईयों भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव और द्रौपदी की चीखें सपश्ट रूप से
16:59सुनाई दी, जिनके स्वर पीडा से भरे हुए थे।
17:03अपने प्रियजनों की यह दैनिय स्थिती देख कर, युधिष्ठिर का हृदय तूट गया, लेकिन एक पल की निराशा के बाद,
17:11उनके मन में एक अटूट द्रिड संकल्प जागा की वे उन्हें अकेला नहीं छोडेंगे।
17:17वे नरक के उस भयावह स्थान में ही रुक गए, अपने प्रियजनों के साथ रहने का निर्णय लेते हुए, यह
17:24जानते हुए कि उनका अस्तित्व ही उनके लिए सबसे बड़ा सहारा होगा।
17:30दिव्यदूत ने युधिष्थिर से पुना विचार करने का आग रह किया। यह समझाते हुए कि नरक में उनका यहक्षनिक अनुभव
17:38केवल उनके धैर्य और करुणा का अंतिन परीक्षण है।
17:42युधिष्थिर ने अपने दुख से सने हुए चहरे पर एक द्रिढ मुस्कान लाते हुए कहा कि वे अपने प्रीजनों को
17:50भले ही वे कष्ट में हो, कभी त्याग नहीं सकते, चाहे परिनाम कुछ भी हो।
17:56यह देख दिव्य दूट ने युधिष्थिर के अटूट धैर्य और करुणा से अभिभूत होकर, उन्हें यह रहस्य बताया कि यह
18:04भयानक द्रिश्य मात्र एक मायावी परीक्षा थी, जिसे देवताओं ने उनकी द्रिढता जाचने के लिए रचा था।
18:12जैसे ही दूट के शब्द गूंजे, नरक का भयावह अंधकार एक म्रिगत्रिशना की भाती बिखरने लगा, और उसकी जगह एक
18:20उजजवल स्वर्गिय प्रकाश ने ले ली, जिसने पूरे द्रिश्य को दिव्य आभा से भर दिया।
18:26उस दिव्य प्रकाश में पांडवों और द्रौपदी की यातनागरस्ट छविया लुक्त हो गई, और उनकी जगह स्वर्गिय आभा से दीप्तिमान,
18:35शांत और गौरवशाली रूप प्रकट हुए, जो असीम शांती बिखेर रहे थे।
18:41युधिष्ठिर ने इस क्षणिक माया को समझा, और अपने प्रियजनों को कष्ट से मुक्त देखकर, उनके हृदय में कृतग्यता और
18:49शांती का सागर उमड पड़ा, उन्होंने अपनी अटल आस्था के लिए देवताओं का आभार व्यक्त किया।
18:56क्षण भर में वे सभी उस स्वर्गिय प्रकाश में विलीन हो गए, और स्वयं को एक ऐसे दिव्य लोक में
19:03पाया, जहां की हवा भी अमरित के समान थी, और हर कण में असीन सौंदर्य और शांती व्याप्त थी।
19:11इसी क्षण देवताओं के राजा, इंदर अपने एरावत हाथी पर विराज मान होकर प्रकट हुए, उनके मुख मंडल पर एक
19:19भव्य मुस्कान थी, और उनकी आखें युधिष्ठिर के धर्मनिष्ठा की प्रशंसा से चमक रही थी।
19:26इंदर ने युधिष्ठिर को गले लगा कर उनका स्वागत किया और समझाया कि नरक का वह अनुभव उनके सभी पापों
19:34को धोने और स्वर्ग में सर्वोच स्थान प्राप्त करने के लिए अंतिम शुद्धिकरण था।
19:41युधिष्ठिर इंदर के शब्दों से संतुष्ठ होकर अपने भाईयों और द्रौपदी से मिले जहां उनके मुखमंडल पर न कोई दुख
19:49था नहीं कोई शिकायत केवल असीम प्रेम और संतोष जलक रहा था।
19:55उन्होंने इंदर के साथ स्वर्ग में प्रवेश किया जहां अपसराओं और गंधर्वों ने उनका भव्य स्वागत किया और उन्हें वह
20:03स्थान मिला जिसकी महिमा और सौंदर्य शब्दों में वर्नित नहीं की जा सकती थी।
20:08प्रित्वी पर वापस हस्तिनापुर में युवा राजा परीक्षित का राज्याभिशेक धूमधाम से चल रहा था।
20:39उन्होंने अपनी सभी राजसी जिम्मेदारियों और सांसारिक मोहमाया का त्याग करने का निर्णय लिया। यह जानते हुए कि उनका परम
20:48उद्देश अब इस भौतिक जगत से परे हैं।
20:52अपने त्याग के प्रतीक के रूप में उन्होंने अपनी बची हुई सभी धनसमपत्ती, स्वन, वस्त्र और आभूशन गरीबों और जरूरत
21:01मंद ब्राहमनों में बाट दिये, अपने हाथों से दान करते हुए।
21:06तत्पश्चात उन्होंने अपने राजसी वस्त्रों का त्याग कर साधारन तपस्वी वस्त्रधारन किये, जो उनकी अंतिम यात्रा और भौतिक दुनिया से
21:15पूर्ण विरक्ती का प्रतीक था।
21:18महल के प्रांगण में प्रजा एकत्रित थी और पांडवों तथा द्रौपदी ने अपनी प्रजा को अंतिम विदाई दी, एक उदासी
21:26भरी शान्ती पूरे वातावर्ण में छा गई।
21:29युवा राजा परीक्षित एक भावुक हृदय के साथ अपने महान पूर्वजों के चर्णों में जुके उनके आशिरवात की आचना की
21:38ताकी वे राज्यका भार सफलता पूर्वक वेहन कर सकें।
21:43इसके बाद पांडवों और द्रौपदी ने महल का द्वार पार किया, उनके पीछे हस्तिनापूर के वैभव को छोड़कर उनके मन
21:51में केवल हिमालय की ओर अग्रसर होने का द्रिड संकल्प था।
21:56उनकी महाप्रयान की यात्रा शुरू हुई, एक मौन और द्रिड संकल्प के साथ वे उत्तर दिशा की ओर बढ़ते चले
22:03गए, हर कदम के साथ सांसारिक बंधनों को त्यागते हुए।
22:08धीरे धीरे दूरक्षितिच पर हिमालय की बरफीली चोटिया द्रिश्टि गोचर होने लगी, उनकी अंतिन गंतव्य जहां उन्हें अपने पार्थिव शरीर
22:17त्याग कर परमधाम की ओर प्रस्थान करना था।
22:21जैसे जैसे वे आगे बढ़ते गए, हिमालय की वायू और भी अधिक तीखी होती गई, उनके सांसारिक वस्त्राभूशन अब उनके
22:30शरीर को ठंड से बचाने में अक्षम प्रतीत होने लगे थे।
22:35रास्ता अब और भी दुर्गम हो गया था, नुकीली चट्टाने और बरफीले ढलान उनके हर कदम को चुनोती दे रहे
22:43थे, मानो प्रकृती उनकी द्रिड़ता की अंतिम परीक्षा ले रही हो।
22:48सभी में महारानी द्रौपदी के कोमल पैर इस कठोर पत पर सबसे अधिक लड़कडा रहे थे, उनके हर श्वास में
22:56ठकान और कष्ट की गहरी चाप दिख रही थी।
23:00युधिश्थिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव सभी द्रौपदी को लगातार गिरते हुए देख रहे थे, उनके चहरों पर चिंता की
23:08गहरी लकीरें खिंची हुई थी, पर किसी ने कुछ कहा नहीं।
23:13द्रौपदी के मन में एक सुक्ष्म स्मृती, एक अंतिम आसकती का बीज अभी भी प्रज्वलित था, जो अर्जुन की वीरता
23:21और प्रेम के प्रती उसके हृदय में कहीं गहरे छिपा था।
23:26अचानक द्रौपदी का एक पैर बरफीली धलान पर फिसला और वह लड़ खडा कर अपना संतुलन खोने लगी, उसकी आखें
23:34भय और थकावट से भर गई।
23:36एक तीखी चीक उसके कंट से निकली और वह अपने घुटनों के बल धराशाई हो गई, उसका नश्वर शरीर बरफीली
23:45चट्टानों पर दर्ध से कराह उठा।
23:48पांडवों ने द्रौपदी को गिरते देखा और उनके कदम ठिठक गए, उनके हृदय में एक अप्रत्याशित आशंका ने घर कर
23:56लिया।
23:57द्रौपदी ने अपने अंतिम बल को एकत्रित कर उठने का व्यर्थ प्रयास किया, पर उसके शरीर ने अब उसका साथ
24:05छोड़ दिया था, शक्ति हिंता ने उसे जकड लिया था।
24:09एक अंतिम कंप कंपी के साथ द्रौपदी का शरीर लड़ खडाया और वह पूरी तरह से धरा पर निढ़ाल होकर
24:16गिर गई, उसकी आत्मा ने अपने नश्वर शरीर का त्याग कर दिया।
24:22द्रौपदी के पतन को देखकर पांडव तुरंत उसके पास आए, उनके चहरे पर दुख, असमंजस और अपने नेती की स्विकार्यता
24:30के भाव उभर आए।
24:32गहरे दुख से द्रवित होकर भीम ने युधिश्थिर की ओर देखा, उनके स्वर में आश्चर्य और प्रश्न का भाव था,
24:40मानो इस अकस्मात अंत को स्विकार न कर पा रहे हो।
24:44भीम ने अपने हृदय में उमरते हुए प्रश्नों को नियंत्रित करते हुए गंभीर स्वर में पूछा, हे धर्मराज, महारानी द्रॉपदी
24:53ने ऐसा क्या पाप किया कि वे सबसे पहले धराशाई हुई।
24:58युधिश्थिर ने द्रॉपदी के निश्चल शरीर पर एक पल के लिए अपनी गंभीर द्रिश्टी डाली, उनके मुख पर एक शांत
25:05पर अटल भाव था, जैसे वे पहले से ही यह जानते थे।
25:10गहरी सांस लेते हुए, युधिश्थिर ने अपने भाईयों की ओर देखा और अत्यंत विनमर्ता से धर्म के सुक्ष्म और जटिल
25:18नियमों को सपष्ट करना आरंभ किया।
25:22युधिश्थिर ने बताया, द्रौपदी यद्यपी हम सभी की पतनी थी, पर उनके हृदय में अर्जुन के प्रती कुछ अधिक ही
25:29आ सकती थी, एक पक्षपात पूर्ण प्रेन जो उन्होंने कभी त्यागा नहीं।
25:35इस रहस्योद घाटन को सुनकर पांडवों के चहरे पर आश्चर्य और आत्मचिंतन के भाव स्पष्ट रूप से दिखाई दिये, वे
25:43एक दूसरे को देखते रहे।
25:46युधिष्थिर ने आगे कहा, स्वर्गग्मन के लिए मन की पूर्ण शुद्धी आवश्चक है और सभी प्राणियों के प्रती संभाव ही
25:54परम धर्म है, जिसमें किसी भी प्रकार का पक्षपात नहीं होना चाहिए।
25:59पांडवों ने युधिष्थिर के शब्दों को स्विकार किया, द्रौपदी के पतन का गहन अर्थ समझते हुए, उनके हृदय में एक
26:07नई प्रकार की गंभीरता और त्याग का भाव जागा।
26:11एक क्षण के लिए वे सभी द्रौपदी के नश्वर शरीर की ओर देखते रहे, फिर एक गहरी सास लेकर अपने
26:19अंतिम महाप्रयान की यात्रा को जारी रखने का द्रिढ निश्चय किया।
26:24ग्रौपदी के पतन से मिले गूड संदेश को हृदय में धारण कर, शेश पांडवों ने अपनी अविचलित यात्रा को फिर
26:32से आरंभ किया, प्रत्येक कदम अनंत की ओर बढ़ता हुआ।
26:37मार्ग अत्यंत दुरगम था, पत्रीले ढलान और बरफीली हवाएं उनके द्रिढ संकल्प की कठोर परीच्षा ले रही थी, हर सास
26:45में चुनोती और ठकान घुल रही थी।
26:49कुछ और दूरी तय करने के बाद सहदेव के कदम लडखडाने लगे, उनके गहन ज्यान से भरी आखों में अब
26:56शारिरिक दुरबलता की स्पष्ट जलक दिखाई दे रही थी।
27:01अपने असाधारन ज्यान पर कभी-कभी उपजने वाले सुक्ष्म अभिमान की छाया उनके मन पर पड़ रही थी, मानो उनकी
27:08आत्मा एक अद्रिश्य बोच से दब रही हो।
27:12अंतह बर्फीले मार्ग पर चलते हुए सहदेव का शरीर अचेतन होकर गिर पड़ा, उनकी यात्रा का महाप्रयान मार्ग पर यहीं
27:21अंत हो गया।
27:23युधिष्थिर ने अपने शांत पर द्रिड स्वर में कहा, सहदेव तुम्हें अपने ज्यान पर किंचित अभिमान था, यहीं तुम्हारे पतन
27:31का कारण बना।
27:33शेश पांडव सहदेव के पतन और युधिष्थिर के शब्दों से स्तब्ध रह गए, उनके हृदय में अपने सुक्ष्म दोशों के
27:40प्रती एक गहन आत्मचिंतन का ज्वार उमड पड़ा।
27:45अपने भाई के नश्वर शरीर को वहीं छोड़ कर, उन्होंने भारी मन से और भी अधिक सचेत होकर अपनी स्वर्गारोहन
27:52की कठिन यात्रा को पुन्हा आरंभ किया।
27:56कुछ ही समय बाद नकुल भी अपने कदम संभालने में असमर्थ महसूस करने लगे, उनका आकरशक रूप अब थकान और
28:04आध्यात्मिक परीक्षा की भेंट चड़ रहा था।
28:08अपने सौंदर्य पर कभी कभी उपजने वाला सूक्षम घमंड उनके हृदय पर एक अद्रिश भार डाल रहा था, मानो दरपण
28:16में स्वयंकी छवी ही उनका अंतिम बंधन बन रही हो।
28:21अंतह उस उबढखाबड और बरफीले मार्ग पर नकुल भी अपने शरीर का त्याग कर स्वर्ग के द्वार की ओर बढ़ने
28:28वाली यात्रा में थम गए।
28:52भीन ने गहरी सांस लेते हुए युधिश्थिर से पूछा, धर्मराज हमारे सभी प्रियजन क्यों एक एक करके इस महाप्रयान मार्ग
29:01पर गिरते जा रही हैं।
29:04युधिश्थिर ने उत्तर दिया, प्रत्येक प्राणी के हरिदय में छिपे सुक्ष्म दोश ही उनके स्वर्गारोहन में बाधा बनते हैं, जो
29:12अंत्ता उन्हें इस मार्ग पर रोक देते हैं।
29:16अर्जुन ने युधिश्थिर के वचनों को ध्यान पूर्वक सुना, उनके मन में एक गहरी शान्ती और अपने शेश जीवन के
29:23प्रती अटूट संकल्प जागरित हो उठा।
29:27भीम ने अपने विशालकाय शरीर को सीधा किया, उनके चहरे पर दुख के बावजूद एक अविचल द्रिडता जहलक रही थी,
29:35जो आगे बढ़ने के लिए कमर कस चुके थे।
29:39द्रौपदी, सहदेव और नकुल को पीछे छोड़ते हुए, युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन ने अपने वफादार श्वान के साथ स्वर्ग के
29:47अंतिम मार्ग की गोर चलना जारी रखा।
29:51उस निर्जन यात्रा में केवल वह निष्ठावान श्वान ही उनका एक मात्र जीवित साथी था, जो हर पक पर अपनी
29:59निहस्वार्थ भक्ती का प्रमान दे रहा था।
30:02शितिजपर हिमालय की अथाह चोटिया अनंप चुनोती और स्वर्ग के अंतिम द्वार का संकेट दे रही थी, जहां उनका महाप्रयान
30:11अपनी परिंती तक पहुँचना था।
30:14बरफीले तूफानों और अथाह हिमखंडों के बीच पांडव अपने वफादार श्वान के साथ स्वर्गारोहन की उस दुर्गम यात्रा पर आगे
30:23बढ़ते रहे, जहां प्रकृती का हर रूप उनकी सहनशीलता की चरम परीक्षा ले रहा था।
30:30सहसरों युद्धों में विजय प्राप्त करने वाले अर्जुन के बलशाली कदम भी अब डग्मगाने लगे थे और उनके हिदय में
30:37एक अप्रत्याशित दुर्बलता घर कर रही थी।
30:41अपने अद्वितिय पराक्रम और एक ही दिन में शत्रूओं का सहार करने की प्रतिग्या का अभिमान जो कभी उनकी शक्ती
30:49था, अब उनके कदमों को भारी कर रहा था।
30:53अचानक उनका पैर फिसला और एक असहिय वेदना के साथ वह उस बरफीले मार्ग पर घुटनों के बल गिर पड़े,
31:01उनके हाथों से धनुष भी छूट गया।
31:04उनकी आखों में एक अंतिम पश्चाताप जलक उठा और फिर पार्थ का शरीर अनन्थिम में समाहित होकर मृत्यू की शीतल
31:12गोध में विलीन हो गया।
31:15युधिष्ठिर ने रुक कर भारी मन से भीम को समझाया कि अर्जुन अपने शत्रूओं को एक ही दिन में नश्ट
31:22करने की अपनी प्रतिग्या और युद्ध में अपने अभिमान के कारण गिरे हैं।
31:28भीम का हृदय शोक से भर गया, किन्तु जेश्ट भ्राता के वचन सुनकर उन्होंने अश्रुपूरित नेत्रों से अपने भाई को
31:36अंतिम विदाई दी और शेश यात्रा के लिए आगे बढ़े।
31:40मार्ग अब और भी दुर्गम हो चला था, जहां हर पक पर मृत्यू की आहट सुनाई परती थी और हड्डियों
31:47को चीर देने वाली शितलता हर सांस को जमा रही थी।
31:52अपनी अदमे भूख और शारिरिक शक्ती पर अत्यधिक अभिमान रखने वाले भीमसेन भी अब दुर्बल पढ़ने लगे थे, उनके विशाल
32:00शरीर में उर्जा का स्रोट सूखता जा रहा था।
32:04भोजन के प्रती उनका अगाध प्रेम और अपनी भीमकाय शक्ती का गर्व जिसने उन्हें रणभूमी में अजे बनाया था, अब
32:12उन्हें उसी मृत्यू की ओर धकेल रहा था, जिससे वह कभी नहीं डरे थे।
32:17अंतह उनके विशालकाय शरीर ने भी उनका साथ छोड़ दिया, और वह एक भारी गर्जना के साथ उसी बरफीले पत
32:26पर धराशाई हो गए जहां उनके भाई गिरे थे।
32:31युधिष्ठिर ने एक बार फिर अपनी शांत वानी में, श्वान के समक्ष अपने भाई की मृत्यू का कारण बताया कि
32:38भीम अपने अत्यधिक भोजन और दूसरों को नीचा दिखाने वाले अपने बल के अभिमान के कारण गिरे हैं।
32:46उस धंगोर एकांत में केवल वह निष्ठावान श्वान ही युधिष्ठिर के साथ खड़ा रहा। उसकी आखें अपने स्वामी के दूहक
32:55को समझती हुई प्रतीत हो रही थी।
32:58अब युधिष्ठिर ने अकेले ही उस असीम हिमपात के बीच अपना महाप्रयान जारी रखा। उनके कदम अडिग और उनका संकल्प
33:06अटल था।
33:08यह यात्रा अब केवल शारिरिक बलकी नहीं, बलकी उनके धर्म, सत्यनिष्ठा और अंतरात्मा की अंतिम परीक्षा थी, जहां हर प्रलोभन
33:18और पीडा ने दम तोर दिया था।
33:21उन्होंने उंची चोटियों को पार किया, जहां केवल नीरव शान्ती और हिम की अनंत चादर बिची थी, जो स्वर्ग के
33:28निकट्टा का संकेत दे रही थी।
33:31उनके मुख पर अब कोई दुहक या पश्चाताप नहीं था, केवल एक शान्त ग्रिड़ता थी, जो उनके अंतिम लक्षे की
33:39ओर बढ़ती जा रही थी।
33:41वह निश्थावान श्वान बिना किसी शिकायत के, हर पल उनके पीछे चलता रहा, मानो वह भी इस पवित्र यात्रा का
33:50एक अभिन्न अंग हो।
33:52जैसे जैसे वे उपर चड़ते गए, प्रित्वी की मोहमाया उनसे छूटती गई और स्वर्ग के दिव्य प्रकाश की आभा उनके
34:00मार्ग को रोशन करने लगी।
34:03अब उनके सामने केवल अनन्त आकाश और बर्फ की एक रहस्यमय अचूती सीमा थी, जो स्वर्ग के अंतिम द्वार का
34:11संकेत दे रही थी, जहां उनका महाप्रयान अपनी परिंती तक पहुँचना था।
34:17युधिष्थिर और श्वान ने उस बर्फीले वीरान शिखर को पार कर लिया था, जहां हवा में स्वर्ग की शितलता और
34:24शांती घुली हुई थी, यह उनकी यात्रा का अंतिम पड़ाव प्रतीत होता था।
34:30महाराज ने एक गहरी सांस ली, अपने अतीत के बोज और भविष्य की अनिश्चित्ता को महसूस करते हुए, फिर भी
34:38उनका द्रिड संकल्प परवत की तरह अटल रहा।
34:42वह निश्ठावान श्वान बिना किसी शिकायत के युधिष्ठिर के ठीक बगल में शांती से बैठा था, उसकी आखें अपने स्वामी
34:51के प्रती अटूट भक्ती को दर्शा रही थी।
34:54अचानक अनंत आकाश में एक अत्यंत तेजस्वी प्रकाश पुंच प्रकट हुआ, जो सहस्र सूरियों के तेज को भी फीका कर
35:02रहा था, और उसकी भव्यता से सारी दिशाय प्रकाशित हो उठीं।
35:07उस अध्भुत प्रकाश के केंद्र से एक दिव्य रत धीरे धीरे धर्ती की ओर उतरने लगा, जिसमें स्वर्गिय रतनों की
35:15आभा और अमुल्य धातूओं की चमक थी।
35:18रत पर देवों के अधिपती देवराज इंद्र स्वय विराज मान थे, जिनका तेजस्वी स्वरूप और भव्य उपस्थिती ब्रहमांड को चकित
35:28करने वाली थी।
35:30इंद्र देव ने एक गंभीर परंतु सौमे स्वर में युधिश्थिर को संबोधित करते हुए, उनके अतुलनिय धर्म और अटूप द्रिड़ता
35:38की प्रशनसा की।
35:40देवराज ने युधिश्थिर को अपने स्वर्गिय रत पर बैठ कर स्वर्गलोक में प्रवेश करने का निमंतरन दिया, जिससे उनकी चिर
35:48प्रतीक्षित यात्रा का अंध हो सके।
35:52युधिश्थिर ने एक पल के लिए अपने वफादार श्वान की ओर देखा, फिर इंद्र की ओर उनकी आखों में एक
35:59अनकहा प्रशन था, जो उनके धर्म प्रायन हृदय की दुविधा को दर्शाता था।
36:05महाराज युधिश्थिर ने विन्मर्ता से परंतु द्रिड़ता से कहा कि वे अपने इस वफादार साथी को छोड़ कर स्वर्ग में
36:13प्रवेश नहीं कर सकते।
36:15इंद्रदेव ने इस पर आपत्ती जताई, यह समझाते हुए कि स्वर्ग लोक में श्वान का प्रवेश वर्जित है और यह
36:23दिव्य नियमों के विरुद्ध है।
36:26उन्होंने युधिष्ठिर को श्वान को यहीं छोड़ कर अकेले रत पर चड़ने का आगरह किया। यह तर्क देते हुए कि
36:33निम्न श्रेणी के प्राणी स्वर्ग के योग्य नहीं होते।
36:37परंतु युधिष्ठिर अपने निर्णय पर अटर रहे और उन्होंने स्पष्ट किया कि वे उस प्राणी का परित्याग नहीं कर सकते
36:45जिसने उन्हें इतनी निष्ठा और प्रेन दिया है।
36:49उन्होंने बलपूर्वक कहा कि ऐसे वफादार प्राणी को त्यागना उनके धर्म के सिध्धानतों का घोर उलंधन होगा और वे ऐसा
36:58पाप कदापी नहीं करेंगे।
37:01इंद्रदेव जो पहले गंभीर और अडिक थे, अब युधिष्ठिर की धर्मनिष्ठा और करुणा को देखकर विस्मय और प्रशंसा के भाव
37:09से भर उठे।
37:11तभी युधिष्ठिर और इंद्र की आखों के सामने वह श्वान धीरे-धीरे अपने पशुरूप को त्यागने लगा, उसकी आकरिती दिव्य
37:19प्रकाश में बदलने लगी।
37:22उस कुत्ते का आकार धीरे-धीरे विलीन हो गया और उसके स्थान पर धर्मदेव स्वय अपने शांत और तेजस्वी मानव
37:30स्वरूप में प्रकट हुए।
37:33धर्मदेव ने अपने वास्तविक स्वरूप को प्रकट करते हुए युधिष्ठिर की असीन धर्म प्रायंता और अटूट सत्यनिष्ठा की हृदय से
37:41प्रशन साकी।
37:43उन्होंने समझाया कि यह संपूर्ण घटना युधिष्ठिर के धर्म के प्रती अटल निष्ठा की अंतिम और सबसे कठिन परीच्षा थी।
37:52धर्म देव ने युधिष्ठिर को आशिरवाद दिया, उन्हें स्वर्गलोग के योग्य घोशित किया और इंद्र के साथ स्वर्ग में प्रवेश
38:00करने का निमंतरण दिया, जहां उनकी अमर गाथा प्रतीक्षा कर रही थी।
38:05धर्म देव के आशिरवाद और स्वर्गलोग के निमंतरण को सहर्ष स्विकार करते हुए, युधिष्ठिर ने अपने सत्य और धर्म के
38:14मार्ग पर अडिग रहने का संकल्प दोहराया, जिससे स्वयन देवताओं को भी विस्मय हुआ।
38:21ततपश्चात इंद्र के नेत्रित्व में, युधिष्ठिर ने धर्म देव के साथ स्वर्गलोग की ओर अपना दिव्य आरोहन प्रारंभ किया, जहां
38:30प्रत्येक चरण ब्रहमांडिय उर्जा और अनंत शांती से भरा था।
38:35स्वर्गलोग के भव्यद्वार उनके समक्ष खुले, जहां से एक अवर्णनिय प्रकाश और दिव्य संगीत का प्रवा हुआ, जो युधिष्ठिर के
38:43मन को असीम शांती से भर गया।
38:46स्वर्ग में प्रवेश करते ही, युधिष्ठिर ने अद्भुत उध्यानों, स्वर्णमंदित महलों और दिव्य प्राणियों के बीच एक अलोकिक सौंदर्य और
38:56चिरंतन आनंद का अनुभव किया।
38:59परंतु इस अपार सुख के मध्य भी, उनके मन में अपने प्रिय भाईयों और धर्मपत्नी द्रौपदी की अनुपस्थिती का गहरा
39:06एहसास हुआ, जिससे उनके आनंद में एक सुक्ष्मरिक्टता व्याप्थ हो गई।
39:12युधिष्ठिर ने तुरंत इंदर से अपने भाईयों भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव और द्रौपदी के विशय में जिग्यासा व्यक्त की, जिनकी
39:21अनुपस्थिती उन्हें विचलित कर रही थी।
39:24इंदर ने युधिष्ठिर को बताया कि उनके परिजन, अपने जीवनकाल के कुछ गौन पापों के कारण अभी एक अस्थाई नरक
39:32जैसे लोक में कश्ट भोग रहे थे, जहां उन्हें अपने कर्मों का फल भुगतना था।
39:38यह सुनकर युधिष्ठिर को गहरा आघात लगा, और उनके स्वर्गिय आनंद के स्थान पर अपने परिवार के प्रती तीवर वेदना
39:47और चिन्ता चागई।
40:08जहां उनके बंधु और द्रौपदी हैं, भले ही वह कितना भी कश्ट प्रद क्यों न हो।
40:14इंद्रक युधिष्ठिर की अटल निष्ठा से प्रभावित होकर, अनिच्छा से उन्हें उस मायावी नरक की ओर ले जाने को सहमत
40:21हुए, जहां उनके परिजन कथित रूप से कश्ट भोग रहे थे।
40:26जैसे ही वे नीचे उत्रे, एक भीशन दुरगंध, अन्धेरा और चीखों की ध्वनी ने युधिष्ठिर को घेर लिया, यह सब
40:34एक भयावा मायावी नरक का भ्रम था।
40:37उस अंधकार और कश्ट के बीच, युधिष्ठिर ने अपने भाईयों और ग्रॉपदी की धुंधली आकरितियों को देखा, जो असहनिय पीडा
40:46में कराह रहे थे, जिससे उनका हृदय विदीर्ण हो गया।
40:50यह देख युधिष्ठिर का धैर्य तूट गया, और उन्होंने क्रोध तथा दोहक से भर कर देवताओं को अपने प्रीजनों पर
40:58हो रहे इस अन्याय के लिए फटकारा।
41:02अचानक एक दिव्य और गंभीर वानी, जो स्वय धर्म देव की थी, प्रकट हुई और उसने घोशना की की यह
41:09युधिष्ठिर के धर्म और सत्यनिष्ठा की अंतिन परीच्षा थी।
41:14शन भर में वह भयानक मायावी नरक का भ्रम पूरी तरह से तूट गया और उसके स्थान पर एक अत्यंत
41:21उजजवल और दिव्य स्वर्गलोग प्रकट हुआ।
41:25युधिष्ठिर ने अपने समस्त भाईयों भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव और अपनी धर्म पत्नी द्रौपदी को जो अब दिव्य स्वरूप में
41:33थे, चिरंतन आनंद और शांती से युक्ट स्वर्ग में पाया।
41:38इसी परम सुख केक्षण में भगवान श्रीकृष्ण स्वय अपनी दिव्य जोतिर्मय छवी में प्रकट हुए, उनके आगमन से पूरा स्वर्गलोग
41:47और भी अधिक दैदी प्यमान होग उठा।
41:51युधिष्ठिर ने अपने आराध्य श्रीकृष्ण के चरण कमलों में प्रणाम किया और अपने समस्थ परिजनों सहित उनके दिव्य दर्शन प्राप्त
41:59कर अनंत शांती और मोक्ष को प्राप्त हुए।
42:02इस प्रकार समस्थ पांडवों और द्रौपदी के साथ युधिष्ठिर के परमधाम गमन से द्वापर युग का पूर्ण अन्त हुआ और
42:11एक नवीन युग की शांती पूर्ण स्थापना हुई।

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