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Dive into Episode 56 of the Shiva Purana series as Sage Suta narrates the deeply moving story of the Yatinatha Avatar! Discover how Lord Shiva, disguised as a wandering ascetic (Yati), tests the ultimate boundaries of hospitality and devotion through a humble tribal couple, Ahuka and Ahukya. Their selfless sacrifice in the dense forests of Arbuda leads to an emotional climax, a majestic cosmic revelation, and the promise of a future divine incarnation. Watch this cinematic retelling of love, duty, and supreme devotion!

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Transcript
00:00रिशी सूत कहते हैं, जब व्रिशब के दिव्य संग्राम का घोश शांत हुआ, तब उन्होंने ग्रिहस्थ धर्म के शांत, पवित्र
00:07आलिंगन की ओर ध्यान मोडा, जो भक्ती की गहराई को दर्शाता है.
00:13अर्बुदा परवत की गोद में, जहां नदिया अमरित की भांती बहती हैं, एक साधारण आदिवासी जोडा रहता था, जिनकी निष्ठा
00:22परवतों सी अडिक थी.
00:24इस जोडे के हरिदय में, जिसका नाम भील था, कोई अहंकार न था, केवल इश्वर के प्रती अटूट प्रेम था,
00:32जो उन्हें प्रत्येक सास में समाहित था.
00:35उसकी पतनी भीली कमल सी निर्मल थी जिसका प्रत्येक कार्य प्रत्येक विचार पतिवरत धर्म की पवित्रता से उत्परोथ था
00:45वे दिन रात बिना किसी स्वार्थ के अपने जीवन की हर सास को महादेव की सेवा में समर्पित करते थे
00:52मानोवे स्वय कैलाश पर निवास कर रहे हूँ
00:56उनकी दिन्चर्या, वर्षा और ग्रिश्मरितु में एक नदी के समान अविरल थी
01:02जो न केवल जीवन्यापन करती थी बलकि आत्मा को भी पवित्र करती थी
01:08एक दिन जब वे अपने साधारन कुटिया में बैठे थे
01:12तभी एक तेजस्वी, तपस्वी योगी उनके समक्ष प्रकट हुए, जिनका तेज सूर्य के समान था
01:20वह योगी यतिनात के रूप में महादेव स्वय थे, जिनका भेश भिक्षुक का था, पर जिनकी आखों में स्रिष्टी का
01:28सार समाहित था
01:30योगी ने भिक्षा मांगी, पर वह भिक्षा केवल अनकी नहीं, अपितु उनकी भक्ती की, उनके निर्मल प्रेम की परीक्षा थी
01:39भिल और भीली ने बिना किसी संकोच के, अपना सब कुछ, अपनी रोटी, अपने फल उस महान योगी के चर्नों
01:47में अरपित कर दिये
01:49योगी ने उनके प्रेम को स्वीकार किया, पर उनकी अगनी परीक्षा अभी समाप्त नहीं हुई थी, क्योंकि महादेव की लीलाएं
01:57गूड होती है
02:00अचानक एक भीशन दानव प्रकट हुआ, जिसकी लाल आखें क्रोध से धधक रही थी, और उसने उस योगी को भस्म
02:08करने की धमकी दी
02:10यह दानव जिसने वर्षों से उस चेत्र को त्रस्ट कर रखा था, महादेव की माया था, जो उनकी परीक्षा की
02:18चरम सीमा थी
02:20भील और भीली अपने इश्ट की रख्षा के लिए बिना किसी हथियार के उस दानव के समक्ष खड़े हो गए,
02:27मानोवे स्वयन मृत्यू से नडरते हुँ
02:30उनका अदमय साहस देखकर महादेव प्रसन हुए और उस दानव का सहार करने के लिए अपना त्रिशूल उठा लिया
02:39त्रिशूल की प्रहार से दानव राख हो गया और उस स्थान पर केवल महादेव की कृपा का प्रकाश शेश रह
02:46गया
02:48महादेव ने भिल और भीली की ओर देखा, उनकी आखों में कृतग्यता और असीम प्रेम था, जो जन्मों के बंधन
02:56को तोड़ता था
02:58उन्होंने कहा, तुम्हारी भक्ती ने मुझे मोहलिया है, तुम ही सच्चे ग्रिहस्थ हो, जिनका धर्म मुझे भी पूजनिय बनाता है
03:07इस प्रकार महादेव ने यतिनाथ अवतार लेकर सबसे दीन जनों की भक्ती की परीक्षाली और उन्हें सर्वोच्च सम्मान से अलंकृत
03:16किया
03:18सुक्ष्म ज्यान यह है कि इश्वर जन्म या जाती में नहीं, बलकि हृदय की शुद्धता और अटूट भक्ती में वास
03:25करते हैं, जैसा कि भिल और भीली ने सिद्ध किया
03:29अर्बुदा पर्वत की घनी चाया में, जहां प्रकृती स्वयन शिव के विराट स्वरूप का गायन करती थी, वहार एक दीनहीन
03:37कुटिया थी, जो भक्तों की अटूट श्रधा का प्रतीक थी
03:42इस तुछ आश्रय में निवास करते थे आहुक, एक धर्मात्मा शिकारी, जिनकी आत्मा वन्य जीवों की तरह निर्मल थी, और
03:51उनकी पत्नी आहुक्या, जिनका हृदय शिव के प्रती अगाध प्रेन से परिपूर्ण था
03:57उनका जीवन एक पवित्र व्रत का साक्षात प्रमान था, कि कोई भी द्वार पर आया याचक, चाहे वह कोई भी
04:04हो, कभी भी निराश नहीं लोटेगा
04:08भिक्षा का कोई अभाव नहीं था, पर उनके पास संपत्ती का नामो निशान तक न था, फिर भी उनके भीतर
04:15का धन, शिव के प्रती उनकी अन्मोल भक्ती थी
04:19एक दिन जब सूर्य देव अपनी स्वर्णिम रश्मियों से धरा को आलोकित कर रहे थे, एक असाधारन अतिथी का आगमन
04:27हुआ, जिसने उनकी परीच्षा की घड़ी को सूचित किया
04:31द्वार पर खड़े थे एक तेजस्वी सन्यासी, जिनका रूप परम शक्तिशाली और अलोकिक लग रहा था, मानोस्वय कैलाश से उतर
04:41आये हो
04:42उनकी जटाएं गंगा की भाती शोभाय मान थी, कंठ में वास्की नाग शोभापा रहा था, और उनके त्रिनेत्र से ब्रहमांड
04:50का ज्यान तपक रहा था
04:53आहुक्या ने अतिथी के प्रती अपने प्रेम से प्रेरित होकर ततकाल अपने पती को उस महा पुरुष की सेवा के
05:00लिए प्रेरित किया
05:02आहुक ने अपने हृदय में शिव के प्रती पूर्ण समर्पन के साथ सन्यासी का चरण स्पर्ष किया और उन्हें विनमर्ता
05:10से घर में प्रवेश का निमंत्रन दिया
05:14सन्यासी ने मुस्कान के साथ स्वीकार किया और जैसे ही उन्होंने कुटिया में कदम रखा एक अलोकिक शान्ती और दिव्य
05:22सुगंध ने पूरे वातावर्ण को भर दिया
05:25आहुक्या ने श्रधा पूर्वक सन्यासी को आसन ग्रहेन करने का आग्रह किया जबकि आहुक वन से ताजी जड़ी बूटिया और
05:33कंदमूल लाने के लिए निकल पड़े
05:36परंतु जब आहुक लोटे तो उन्होंने पाया कि सन्यासी एक अध्भुत तेजस्वी रूप धारन कर चुके थे
05:43मानो स्वयम्रित्युन जय महादेव उनके सम्मुख प्रकट हुए हो
05:49वस्त्र वही थे पर उनमें से शिव का विराठ ब्रहमांडिय रूप प्रकट हो रहा था जिसने भक्त युगल को विस्मय
05:56और भय के सागर में डुबो दिया
05:58शिव ने आहुक्या से पूछा तुम मुझे क्या भोजन कराओगी हे देवी और आहुक्या का हृदय अत्यंत विनमृता से भर
06:07गया
06:08तब आहुक्या ने अपने घर के सबसे अमूल्य खजाने को याद करते हुए संकोच के साथ कहा
06:15मेरे प्रभुक मेरे पास केवल एक पका हुआ बास पक्षी है क्या मैं उसे आपके चर्णों में अर्पित कर सकती
06:22हूँ
06:23शिव मुस्तुराय और जैसे ही आहुक्या ने उस पक्षी को समर्पित किया
06:28वह अगनी की एक ज्वाला में परिवर्तित हो गया जो स्वयन शिव की उर्जा का प्रतीक थी
06:35तब शिव ने आहुक्या से कहा तुमने मुझे सबसे प्रियवस्तु अर्पित की है क्योंकि तुमने अपनी आत्मा को मेरे प्रती
06:43अर्पित कर दिया है
06:45शिव ने आहुक्या के हाथ में एक अभिमंत्रित कमंडल और आहुक के हाथ में एक दिव्य धनुष प्रकट किया, जो
06:53उनकी अटूट भक्ती का पुरसकार था
06:55इस प्रकार यतिनाथ अवतार ने आहूक और आहूक्या की परीक्षाली और उनकी निशकलंक भक्ती से प्रसन्न होकर उन्हें अपने आशिरवाद
07:06से कृतार्थ किया
07:08उनकी कुटिया अब केवल एक आश्रय नहीं बलकी शिव के प्रेम और उनकी कृपा के अनन्त विस्तार का पवित्र तीर्थ
07:16बन गई थी
07:18प्रल्यंकारी अन्धकार के सागर में जहां काल का सर्प भी भैसे का पता है महादेव ने एक निर्मल तेजस्वी फिर
07:26भी रहस्यमय योगी का रूप धारण किया जिनका नाम था यतिनाथ
07:31जैसे जैसे वह योगी उस घंगोर वन की ओर बढ़े घंगोर अन्धकार ने उनके दिव्य तेज के समक्ष घुटने टेक
07:39दिये मानो सूर्य स्वयन धर्ती पर अवतरित हो गया हो
07:44वन की हर आहट, हर सरसराहट मानो महादेव के आगमन का ही गुनगान कर रही थी, प्रकृती भी उनके दिव्य
07:51दर्शन से पुलकित हो उठी
07:54यह यतिनाथ अवतार कोई सामान्य मानव रूप नहीं था, अपितु स्वयं परमिश्वर का वह आहवान था, जो निशकाम भक्ती की
08:03पराकाश्ठा को जग को दिखलाना चाहता था
08:07वे किसी दैविय लक्षे की ओर बढ़ रहे थे, जहां कर्म और फल की माया से परे, एक प्रेमी युगल
08:14अपनी प्रेम की पवित्रता से महादेव को रिजाने की तैयारी में था
08:19जैसे जैसे यतिनाथ आगे बढ़ते, प्रकृती ने स्वया अपना मार प्रशस्त किया, कंटीली जाडिया पीछे हट गई और अंधेरा भी
08:28रास्ता छोड़ने को विवश हो गया
08:30वन के भयानत जीव जो सामान्यता भय के प्रतीक थे, यतिनाथ के शांट तेज के समक्ष नत्मस्तक हो गए, मानो
08:39वे भी उस दिव्य उर्जा को महसूस कर रहे हूँ
08:43उनकी चरंधूली से पावन हुई वह भूमी मानो स्वर्ग का एक टुकड़ा बन गई थी, जहां कंकन में महादेव का
08:50आशिश समाया हुआ था
08:53आकाश में बिजली कड़क रही थी, पर यतिनाथ के अंतर्मन में शांती का सागर लहरा रहा था, मानो वे किसी
09:01और लोक में विचर्ण कर रहे हूँ
09:04वह योगी जो यतिनाथ कहलाए, हर कदम पर अपने भक्त के प्रती अटूट विश्वास और प्रेन को अपने साथ लेकर
09:12चल रहे थे
09:14जैसे जैसे वे उस निर्जन कुटिया के समीप पहुँचे, हवा में भक्ती की एक ऐसी सुगंध फैल गई, जिसने यतिनाथ
09:22के हरदय को भी अभिभूत कर दिया
09:25वह कुटिया भले ही साधारण थी, पर वहां से निकलने वाली प्रेम और समर्पन की उर्जा, यतिनाथ को सीधे ब्रहमांड
09:33के हरदय तक ले जाने वाली थी
09:36देवताओं के देव स्वयं यतिनाथ के रूप में उस घंगोर रात में एक अगनी परीक्षा का सूत्रपात करने के लिए
09:44पधारे थे
09:46उनकी चाल में एक गरिमा थी, उनकी आखों में एक करुणा, मानो वे उस प्रेम की ज्वाला को और प्रजवलित
09:53करने आये हो, जो उनके भक्तों के हरिदय में जल रही थी
09:58यह यतिनात का आगमन स्वयन स्रिष्टी के नियमों को चुनौकी देने वाला था, जहां भक्ती की शक्ती सभी सांसारिक बाधाओं
10:07से परेश सिध्ध होने वाली थी
10:10जैसे जैसे वह उस जोपडी के द्वार पर पहुँचे, रात के सन्नाटे में केवल उनके पच्चाप की ध्वनी गूंज रही
10:17थी, जो आने वाले अलौकिक शन का संकेट थी
10:21आकाश में जहां तूफान मचा था, वहीं यतिनाथ के आगमन से उस कुटिया के आसपास एक दिव्य शांती का आबर्ण
10:29छा गया
10:31यह यतिनाथ अवतार केवल एक परीक्षा नहीं, अपितु भक्ती के उस पावन स्वरूप का उद्गोश था, जो इश्वर को अपने
10:39भक्तों से कितना प्रेन है, यह दर्शाता है
10:44और इस प्रकार यतिनाथ के रूप में महादेव ने अपना दिव्य खेल आरंभ किया, जहां प्रेम की अगनी में तपकर
10:52ही भक्तों का खरा सोना सिध्ध होना था
10:55उस रात उस एकांत वन में, यतिनाथ का आगमन केवल एक योगी का आगमन नहीं था, अपितु स्वयन परम्पिता का
11:03वह पवित्र बुलावा था, जो भक्ती की सर्वोच्छता को स्थापित करने आया था
11:08A tempest raged outside Ahuka's humble dwelling, each thunderclap a cosmic drumbeat against the relentless deluge, as if the heavens
11:18themselves wept in sorrow
11:21Suddenly, a solitary figure, cloaked and weathered by the storm, appeared as if conjured from the very downpour, a divine
11:29stranger at their threshold
11:32With a gentle yet firm knock, like the whisper of destiny, the stranger sought refuge from the wrathful elements, his
11:40presence announcing an unexpected blessing
11:44Ahuka, the devout householder, opened his door not to a mere traveller, but to a celestial guest, his heart swelling
11:52with a reverence reserved for the divine incarnate
11:55His wife, Ushika, her face alight with devotion, echoed her husband's sentiment, seeing in the stranger the embodiment of Atithi
12:06Devo Bhava, a sacred duty and profound honour
12:10Without hesitation, they welcomed the enigmatic month into their humble abode, the storm outside mirroring the tempest of blessings about
12:19to descend upon them
12:21The couple, acting as humble conduits of divine grace, knelt to wash the feet of their esteemed guest, their actions
12:30a silent prayer of gratitude for his presence
12:34Water flowed, not just cleansing dust but washing away earthly attachments, purifying the space for a divine encounter that transcended
12:43the mundane
12:45Their meagre provisions, a humble offering born of love, were presented with boundless joy, for in the guests' acceptance lay
12:54their true spiritual reward
12:56The ascetic, a beacon of tranquillity amidst the storm, accepted their offering with a grace that transformed the humble meal
13:05into a sacred sacrament
13:08As they shared the simple meal, the hut, usually filled with the sounds of their quiet life, now resonated with
13:15an unspoken divinity, each bite a communion with the sacred
13:20The storm outside, a furious symphony of wind and rain, now seemed a mere backdrop to the profound peace that
13:29had settled within the hearts of the devoted couple
13:33Yatinatha, observing their selfless devotion, felt a surge of divine affection, recognizing in them the purest souls, worthy of his
13:42profound blessings
13:44He spoke, his voice a low rumble, like the distant echo of sacred chants, assuring them that their piety had
13:52not gone unnoticed by the celestial powers
13:56Their act of radical hospitality, an unwavering flame of dharma in the face of adversity, had sown seeds of immense
14:05spiritual merit in their lives
14:08As the night deepened, Yatinatha prepared to rest, his presence filling the small hut with an aura of profound peace,
14:16a sanctuary from the ragging storm outside
14:20Ahuka and Ushika, their hearts brimming with gratitude, lay awake, cherishing the divine presence that had graced their humble home,
14:29their faith reaffirmed
14:30The storm continued its fierce onslaught, yet within the hut, a celestial calm prevailed, a testament to the power of
14:39selfless service and unwavering devotion
14:43Thus, the night unfolded not merely as a shelter from rain, but as a sacred crucible, forging the couple's virtue
14:52into an unbreakable bond with the divine
14:55As dawn approached, the storm began to recede, mirroring the dissipation of trials when met with the pure light of
15:03selfless love and divine grace
15:09This is the name of the sea
15:27सुरक्षित स्थान था आहुक ने स्वयम बाहर अपने धनुशबान के साथ उस घंगोर रात्री में रक्षक बनकर पहरा देने का
15:36गौर्वपूर्ण संकल्त लिया शिव जो की त्रिकाल दर्शी हैं आहुक के हरिदय की पवित्रता और नहस्वार्थ भाव को भली भाती
15:46समझ �
15:46गए परंतु महादेव की परीच्षा का विधान तो कुछ और ही था जिसमें भक्त के समर्पन की कसोटी अभी बाकी
15:55थी तभी उस निस्तब्धरात्री में एक अंजानी आहट ने सारे वातावर्ण को भय और आशंका से भर दिया जंगल के
16:05सन्नाटे को चीरती हुई एक विक
16:10प्रत्यक कन को कमपा दिया आहूक अपने वीर हृदय के साथ उस दैत्य के सम्मुख धाल बनकर खड़ा हो गया
16:19उसकी भुजाओं में नई शक्ती का संचार हुआ शिव जिन्होंने स्वयं उस दैत्य को बल प्रदान किया था आहूक के
16:28इस अप्रत्याशित साहस को देखकर म
16:30ही मन मुस्कुरा रहे थे दैत्य ने अपने नुकीले नखों से आहूक पर प्रहार किया जिसका उद्देश था उसे पल
16:38भर में धराशाई कर देना परंतु आहूक अपने गुरु के ध्यान से प्राप्त अलौकिक शक्ती से उस घातक वार से
16:47बाल-बाल बच निकला इस अप
16:59सर देखा और अपने तरकश से एक विश्युक्त बान निकाला जो सीधे दैत्य के हृदय की ओर लक्षित था जैसे
17:07ही बान छूटा वह हवा को चीरता हुआ दैत्य के वक्षस्थल में समा गया जिससे एक भयानक चीतकार गुन्ष उठी
17:16विश्का प्रभाव तीवर था और दैत्य का विक्राल शरीर का अपने लगा उसकी शक्ती क्षीन होने लगी
17:24अंत्र वह महा दैत्य अपने विशाल शरीर को संभाल न सका और धडाम से भूमी पर गिर पड़ा जिससे धर्ती
17:32काप उठी
17:34आहूक अपने कर्तव्यपत पर अडिग अपने शरीर पर कुछ खरोचों के बावजूद पूर्णता विजी मुद्रा में खड़ा था
17:42शिव अपने भक्त की परीक्षा सफलता पूर्वक उत्तीन होते देख आहूक के सम्मुख प्रकट हुए एक दिव्य आभा के साथ
17:52उन्होंने आहूक के सिर पर हाथ रख कर कहा तुम्हारे प्रेम और साहस ने आज मुझे भी प्रसन्न कर दिया
17:59है वत्स
17:59घोर रात्री के अंधकार में जंगल की खामोशी को चीरती हुई एक भयावा दानवी श्वापद यतिनाथ और अहुक्य को विश्राम
18:09करते देख अपनी पाश्विक द्रिष्टी उस पर टिकाता है
18:14बारिश की बूंदों के बीच निद्रालीन अतिथी की रक्षा का भार अपने कंधों पर लिए अहुक्य बिजली की गती से
18:21उठता है उसकी आखें आने वाले खत्रे को भांप लेती है
18:27जैसे ही दानवी श्वापद गरचता हुआ जपटता है अहुक्य अपनी पूरी शक्ती से उसका सामना करता है उसकी तलवार एक
18:35तूफानी लहर की तरह हवा में लहराती है
18:39अंधेरे में कीचड और वर्षा के बीच एक मूख हताश संधर्श शुरू होता है जिसमें तलवार की खनक और दानव
18:47की घुरगुराहट गूजती है
18:50अहुक्य अपनी पीठ पर अंगिनक धावों के साथ फिर भी अदमय साहस दिखाता है अपने अतिथी की सुरक्षा को अपनी
18:59जान से उपर रखता है
19:02जैसे ही एक घातक पंजा उसके पेट पर लगता है अहुक्य की आखों में एक शनिक पीड़ा कौन्ध जाती है
19:09जो उसके अटूट कर्तव्य के सामने फीकी पढ़ जाती है
19:14उसकी ताकत ख्षीन हो रही है परंतु उसके हृदय में अतिथी का भय उसे लड़ने की प्रेणा देता है जब
19:22तक की उसका शरीर जवाब न दे जाए
19:25जैसे ही दानव अंतिम वार के लिए आगे बढ़ता है अहुक्य अपनी अंतिम शक्ती जुटा कर गिरते हुए भी अपनी
19:33तलवार से उसे रोकने की कोशिश करता है
19:37लेकिन दानवी शक्ती असीन थी और अहुक्य का प्रयास व्यर्थ साबित होता है जब वह अनियंत्रित होकर गिर पड़ता है
19:47उसके प्रान पखेरू उर जाते हैं लेकिन उसके चहरे पर एक अजीब शान्ती चाजाती है जैसे उसने अपना अंतिम कर्तव्य
19:55पूरा कर लिया हो
19:57दानवी श्वापद अपनी जीत से संतुष्ट अहुक्य के निस्तेज शरीर को देखता है उसकी पाश्विक आखें अंधेरे जंगल में वापस
20:06छिपने लगती है
20:08कुछ क्षणों बाद यतिनाथ अपने भक्त की आहट से जागरित होकर बाहर आता है और अपने रक्षक के अचेत पड़े
20:17शरीर को देखकर उसका हृदय विदीर्न हो जाता है
20:21अहुक्य का रक्तरंजित शरीर जो अब तक वीर्टा का प्रतीक था बारिश की ठंडी बूंदों में निढाल पड़ा है यतिनाथ
20:29की आखों में एक गहरी करुना उमर पड़ती है
20:33शिव यतिनाथ रूप में अपने समर्पित भक्त को देखता है जिसके बलिदान ने इस क्षणिक विश्राम को संभव बनाया था
20:42और उसका मौन शोका कुल हो जाता है
20:45उसने अहुक्य के निश्चल बलिदान को अपनी आखों में समाहित किया एक ऐसे भक्त का जिसने अपनी अंतिम श्वास तक
20:53अपने अतिथी की रक्षा की
20:56जंगल के अंधकार में यह एक अत्यन्त दुखद क्षण था जहां एक भक्त का बलिदान परमेश्वर के हृदय में अमिट
21:04छाप छोड़ गया
21:06यतिनाथ ने अहुक्य के माथे को धीरे से सहलाया, मानो उसे अंतिम विदाई दे रहा हो और उसके अविस्मर्निय साहस
21:14को नमन कर रहा हो
21:16उसने निश्चय किया कि अहुक्य का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा और वह दुष्ट श्वापत को उसके कर्मों का दंड अवश्य
21:24देगा
21:25यह केवल एक योध्धा का अंत नहीं था, बलकि एक भक्त की अविचल निश्ठा का प्रमाण था, जिसने स्वयन महादेव
21:33को भी द्रवित कर दिया
21:36भोर की पहली किरने, जो अब तक मृत्यू के अंधेरे को चीरने का वादा करती थी, अहुक्या और योगी राज
21:43के बाहर कदम रखते ही एक भयानक सत्य का परदाफाश करती है
21:49आहुक ने अपने प्रिय पुत्र, आहुक के निश्प्राण, रक्तरंजित शरीर को धर्ती पर पड़ा देखा, जैसे किसी क्रूर नीती ने
21:57उसे निगल लिया हो
21:59उसके हृदय का हर स्पंदन मानो एक तूटा हुआ सितार बज रहा था, विलाप करते हुए अहुक्या का गलारुद गया,
22:07उसके आसुओं से धर्ती भी नम हो गई
22:11लेकिन इस असहनिय दुहक के सागर में भी उसने उस पवित्र यात्री को दोशी ठहराने से इनकार कर दिया, जिसने
22:18न केवल उसके घर को, बल्कि उसके दिल को भी छू लिया था
22:23उसने अपने आसुओं को अपने होठों से रोका, स्वयं को संभाला, क्योंकि एक मा का धैर्य, पुत्र के बलिदान के
22:31सामने किसी भी दुर्भाग्य से बढ़ा था
22:35भुक्या ने अपनी आवाज को स्थिर करते हुए उस योगी राज से बात की, जिसकी आखों में ब्रहमांड का ज्यान
22:42और शान्ती जल की
22:44के महात्मा, उसने कहा, मेरे पुत्र का जीवन आपकी सेवा में एक पुष्प की तरह चड़ा है, एक ऐसा बलिदान
22:53जिसे मेरा हृदै स्विकार करता है
22:56उसने आहुक के मृत शरीर को एक कोमल हाथ से थप्थ पाया, यह न तो आपकी गलती है, नहीं काल
23:04का प्रकोप, बल्की मेरे पुत्र का अपने करतव्य के प्रतीपरम समर्पन है
23:10योगी राज जिनकी उपस्थिती से ही वातावर्ण पवित्र हो जाता था, अहुक्या के शब्दों से प्रभावित हुए, उनकी आखों में
23:18असीन करुना और सम्मान का भाव था
23:21उन्होंने धीरे से सिरहिलाया, उनकी खामोशी अहुक्या के शब्दों से अधिक शक्तिशाली थी, मानों वे उस्मा की निस्वार्थता को स्विकार
23:30कर रहे हूं
23:32फिर उस योगी राज ने, जिनके पैर जहां पड़ते थे, वहां दिव्यता खिल उठती थी, अहुक्या को अपने साथ चलने
23:40का संकेत दिया
23:43उन्होंने आहुक्या के नश्वर शरीर के पास एक क्षण का मौन धारन किया, जैसे कि वे उस वीर आत्मा को
23:49स्वर्ब की ओर जाते हुए विदा कर रहे हूं
23:53अहुक्या एक मा के हरिदय की असीन पीडा को समेटे, अपने बेटे के शांत मुख की और अंतिन बार देखती
24:00है, एक ऐसी विदाई जो हमेशा के लिए उसके दिल में बस जाएगी
24:06जैसे ही वे उस दुख़द स्थान से दूर जाने लगे, अहुक्या ने पीछे मुड कर नहीं देखा, उसके कदम यतिनात
24:14के पवित्र पत पर द्रिड़ता से पढ़ रहे थे
24:17योगी राज की उपस्थिती एक शान्त ओस की बून की तरह थी, जो अहुक्या के जले हुए हृदय पर गिरकर
24:24उसे शान्ती और शक्ती प्रदान कर रही थी
24:28उन्होंने अहुक्या के एका की हृदय पर एक अद्रिश्य हात फेरा, जैसे कि वह उसे आश्वस्थ कर रहे हों कि
24:36यह अंत नहीं, बलकि एक नई दिव्ययात्रा की शुरुवात है
24:41अहुक्या ने अपने आखें खोली और उस योगिराज के शान्त मुख में उसने अपने पुत्र की आत्मा की जलक देखी,
24:49जो अब देवताओं के लोक में शान्ती से विराज रही थी
24:53यह नई सुबह, जो आहुक के दुखद अंत की गवाह थी, अब अहुक्या के लिए एक नई आशा का प्रतीक
25:01बन गई, एक ऐसा विश्वास की बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता
25:06और इस प्रकार, यतिनाथ अवतार के उस हृदय विदारक प्रभात ने दुख को भी एक पवित्र अगनी परीक्षा में बदल
25:14दिया, जिसने अहुक्या के विश्वास को और भी प्रजवलित कर दिया
25:19जैसे ही यतिनाथ, शिव के परमभक्त, अतिथी के रूप में पधारे आहुक्या के हृदय में अपने प्रियतम पती के वियोग
25:26का गहरा संताप उमर पड़ा
25:29पती के परलोक गमन की असहनिय वेदना में आहुक्या ने अपने प्रियतम के साथ ही अगले लोक में जाने का
25:36द्रिढ निश्चय कर लिया
25:38बिना किसी विलंब के उसने सूखी लकडियों को एकत्र करना आरंभ कर दिया मालो वह कोई पवित्र यग्य की वेदी
25:46सजा रही हो
25:48इस अप्रत्याशित विग्ण के लिए उसने यतिनाथ सेख शमा याचना की उसकी वानी में विनमर्ता और हृदय में अपार पीडा
25:56का मिश्रन था
25:58हे महायोगी शमा करें यदि मेरी व्यवस्थाओं से आपको कोई असुविधा हुई हो मेरा हृदय तो आपसे विदा लेने की
26:06तैयारी कर रहा है आहुक्या ने कापती आवाज में कहा
26:11यतिनाथ ने आहुक्या की व्यथा को समझा परन्तु एक योगी के रूप में उन्होंने स्वयन को इस अगनी परीक्षा में
26:19तटस्त रखना उचित समझा
26:22आहुक्या ने शान्तचित से लकडियों के ढेर को एक उचे चबूत्रे पर व्यवस्थित करना प्रारंभ किया मानो वह किसी देव्यध्य
26:30की तैयारी कर रही हो
26:32उसका इरादा स्पष्ट था अपने पती के साथ सती होने का एक ऐसा प्रण जो उस युग की पतिवर्ताओं के
26:40लिए आदश माना जाता था
26:43यतिनाथ जो स्वयन शिव का ही एक रूप थे आहुक्या की इस अनूठी अगनी परीक्षा को अपनी दिव्यध्रिष्टी से देख
26:51रहे थे
26:52आहुक्या ने अगनी प्रजवलित करने के लिए मंत्रो चारण किया जैसे ही पहली ज्वाला भड़की उसने अपना वस्त्रांचल अगनी की
27:01ओर बढ़ाया
27:02उसकी आखों में मृत्यु का भय नहीं अपितु प्रेतम से पुनर्मिलन की एक अध्भुत आशा ज्हलक रही थी
27:11जैसे ही उसने अगनी में प्रवेश करने का प्रयास किया यतिनाथ ने उसे रोक लिया उनका हाथ वजर के समान
27:18द्रिड़ता से उसका हाथ थामे हुए था
27:22आहुक्या चौंक उठी उसने देखा कि वह कोई सामान्य तपस्वी नहीं बलकि स्वय महादेव का ही एक रूप है जिसकी
27:30शक्ती अपार थी
27:33यतिनाथ बोले हे आहुक्या अपने पती का वियोग असहनिय है परंतु सती होना ही एक मात्र उपाय नहीं भक्ती के
27:41अन्यमार्ग भी है
27:44उन्होंने आहुक्या को समझाया कि सच्ची भक्ती शरीर के त्याग में नहीं, बलकि कर्म और प्रेन के निरंतर प्रवाह में
27:51नहित है
27:54तुम्हारी निष्ठा और प्रेन स्वयन तुम्हारे पती को तुम्हारे समीट लाने की शक्ती रखते हैं, मेरे भक्त धैर्य रखो, यतिनाथ
28:02ने उसे आश्वासन दिया
28:05आहुक्या के हृदय से दुखों का बादल छंट गया, उसने यतिनाथ के चर्णों में शीश नवाकर उनका आभार व्यक्त किया
28:14यतिनाथ ने तब उस भड़की हुई अगनी को शांत किया, मानो हवा के जोके से दीपक बुझ गया हो और
28:21आहुक्या के जीवन में एक नई आशा का संचार किया
28:24इस प्रकार यतिनाथ अवतार ने आहुक्या को न केवल मृत्यु के मुख से बचाया, अपितु उसे भक्ती का एक उच्चतर
28:33अधिक कर्मनिष्ठ मार्ग भी दिखाया
28:37जैसे ही आहुत्य ने जलती हुई चिता पर कदम रखा, काल के करूर चक्र को पलटने की घड़ी आ गई
28:43थी
28:44तभी उसी क्षण उस तपस्वी यतिनाथ ने अपना नश्वर रूप त्याग कर स्वय महादेव के स्वरूप में प्रकट होकर अगनी
28:53की ज्वालाओं को जैसे जड़वत कर दिया
28:56काल चक्र स्वयन थम गया और वन के कंकन में महादेव के दिव्य ओयरा का प्रसार हो गया
29:04चंद्रमा की शीतलता और सूर्य का तेज दोनों शिव के चर्णों में समा गये थे
29:10त्रिशूल की त्रईशक्ती, स्रिष्टी, स्थिती और सहार का प्रतीक महादेव के हाथ में खेल रही थी
29:18आहूत्य की भक्ती, अगनी की भांती शुद्ध महादेव के हिदय में जाबसी
29:24ब्रहमांड के रचिता ब्रहमा विस्मय से इस दिव्य लीला का अवलोकन कर रहे थे
29:31अनंत की गहराई से भगवान विश्नु अपने गरोड पर सवार होकर मुस्कुराते हुए प्रकट हुए
29:38नारद मुनी वीना के मधूर स्वर के साथ इस अलोकिक खशन का गान करने लगे
29:45देवगन स्वर्गलोक से उश्प वर्शाकर इस अविश्वसनी द्रिश्य का अभिनन्दन कर रहे थे
29:52प्रकृती भी महादेव के इस प्रक्तिकरन से पुलकित होक उठी वन के व्रिक्ष जुमने लगे
29:59आहुत्य महादेव के चर्णों में गिरकर कृतग्यता से अश्रुधार बहाने लगा
30:06महादेव ने आहुत्य को उठाया तेरी भक्ती ने स्वयम मुझे यहां आने पर विवश किया है वत्स
30:13यह अगने तुछ है जब हृदय में मेरा वास हो
30:18तुझे शिवत्व का वह वर्दान प्राप्त है जो मृत्य को भी पराजित कर दे
30:24महादेव ने आहुत्य को अपने त्रिशूल से स्पर्श किया और आहुत्य का स्वरूप दिव्य प्रकाश में परिवर्तित हो गया
30:32आहुत्य अब न केवल भक्त थे वे शिव का अंश बन गए थे यतिनाथ के भक्त शिरोमी
30:40महादेव की यह लीला भक्त और भग्वान के अटूट संबंध का शाश्वत प्रमान बन गई
30:47और इस प्रकार यतिनाथ अवतार ने सिद्ध कर दिया कि प्रेम और भक्ती से बढ़कर कोई शक्ती नहीं
30:55अत्यंत प्रसन्न महादेव अपने परम भक्तों की अगाध भक्ती से अभिभूत होकर उनके अंतहकरण को जन्मुम्रत्यू के चक्र से ततकाल
31:04मुक्ती का वर्दान देते हैं
31:07उन्होंने भविश्यवानी की की अगले जन्म में वे राजा विश्वानर और रानी शुचिश्मती के रूप में जन्म लेंगे और स्वय
31:15महादेव उनके प्रिय पुत्रत ग्रहपती के रूप में अवतरित होंगे जिससे उनका शाश्वत बंधन और भी सुद्रिड होगा
31:24देवताओं के राजा इंद्र अपनी मायावी शक्तियों का प्रयोग कर राजा विश्वानर के दर्बार में एक भयानक शिकारी का वेश
31:32धर कर प्रकट होते हैं
31:35शिकारी का वेश धरे इंद्र राजा विश्वानर को चुनोती देते हैं कि वह अपनी प्रजा की रक्षा के लिए किसी
31:42भी वन्यजीव का शिकार कर सके
31:45रानी शुचिश्मती अपने पती की रक्षा के लिए व्याकुल स्वया उस भयानक शिकारी का सामना करने का द्रिढ निश्चय करती
31:53हैं
31:55जैसे ही शुचिश्मती शिकारी का सामना करती हैं, महादेव ग्रहपती के बाल रूप में एक अप्रत्याशित और चमतकारी उपस्थिती के
32:04साथ प्रकट होते हैं
32:07ग्रहपती अपनी बाल सुलब निर्दोष्टा में शिकारी से पूचते हैं कि क्या वह अपनी ही परचाई को डराने आया है,
32:15जिससे सभी हतप्रभ है जाते हैं
32:19शिव की इस बाल लीला से चकित इंद्र अपना शिकारी वेश त्याग देते हैं और महादेव के समक्ष अपने वास्तवित
32:27दिव्य स्वरूप में प्रकट होते हैं
32:30महादेव ग्रहपती के रूप में इंद्र को बताते हैं कि उनकी परीक्षा उनके अपने अहमकार की थी, न कि राजाया
32:38रानी की निष्ठा की
32:40इंद्र अपनी भूल स्विकार करते हुए महादेव से क्षमा याचना करते हैं और उनके विराठ स्वरूप की महिमा का गान
32:49करते हैं
32:51महादेव ग्रहपती के रूप में इंद्र को वर्दान देते हैं कि राजा विश्वानर और रानी शुचिश्मती की भक्ती उनकी प्रजा
32:59के लिए भी समरिध्धी और सुरक्षा लाएगी
33:03अपने भक्त की परीक्षा पूर्ण होने पर महादेव ग्रहपती के रूप में राजा और रानी को यह विश्वास दिलाते हैं
33:10कि उनका प्रेम और भक्ती सदैव सनरक्षित रहेगी
33:15ग्रहपती अपनी बाल लिलाओं से सभी को मोहित करते हुए यह संदेश देते हैं कि इश्वर प्रत्येक भक्त के हृदय
33:22में निवास करता है केवल विश्वास की आवश्शक्ता है
33:27अगनी परीक्षा के सफलता पूर्वक उत्तीन होने पर राजा विश्वानर और रानी शुचिश्मती को महादेव द्वारा प्रदान किये गए मोक्ष
33:36के वर्दान का स्मरण होता है
33:40देवताओं और रिशियों ने महादेव के इस अवतार की प्रशनसा की जिसने भक्ती की शक्ती और इश्वर की असीम क्रिपा
33:47को प्रदर्शित किया
33:50ग्रहपती के रूप में महादेव का यह अवतार, भक्त और भगवान के बीच अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक बन
33:57गया
33:58राजा विश्वानर और रानी शुचिश्मती ने अपने पुत्र ग्रहपती के रूप में महादेव की उपस्थिती को स्विकार करते हुए अपने
34:07शेश जीवन को भक्ती और सेवा में समर्पित कर दिया
34:10इस प्रकार यतिनाथ अवतार ने यह सिद्ध किया कि सच्ची भक्ती किसी भी परीच्शा से बढ़कर होती है और इश्वर
34:19अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं
34:25ग्रहपती के रूप में महादेव का यह अवतार न केवल एक परीच्शा थी बलकि भक्तों को यह सिखाने का एक
34:32माध्यम था कि इश्वर उनके भी तरही विद्यमान है
34:37अंतह राजा विश्वानर और रानी शुचिश्मती ने महादेव के आशिरवाद से जन्ममृत्यू के बंधन से मुक्ती पाई अपने शाश्वत प्रेम
34:46और भक्ती के कारण शिव लोक में स्थान प्राप्त किया
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