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गरुड़ पुराण के दूसरे एपिसोड में भगवान विष्णु गरुड़ के गहन प्रश्नों का उत्तर देना शुरू करते हैं, जिसमें वे मृत्यु के रहस्य और आत्मा के पारलौकिक सफर की शुरुआत का वर्णन करते हैं। जानिए कैसे प्राण शरीर छोड़ते हैं, सूक्ष्म शरीर क्या होता है, यमदूतों का आगमन कैसा होता है और आत्मा अपनी यात्रा कैसे आरंभ करती है। यह एपिसोड आपको मृत्यु के बाद के पहले क्षणों की अनसुनी कहानियों और कर्म के तत्काल प्रभावों से रूबरू कराएगा। #गरुड़पुराण #मृत्युकासफर #आत्माकीयात्रा #यमलोग #कर्मफल #विष्णुपुराण #गरुड़संवाद #आफ्टरलाइफ #हिंदूधर्म
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00:00शीन होते संसार के रहसियों को जानने की प्रबल इच्छा से प्रेरित होकर देव गरोड ने भगवान विश्णु के समक्ष
00:07अपनी गेहन जिग्यासा प्रकट की उनकी दृष्टी में ब्रहमांड के अनुत्तरित प्रश्न तैर रहे थे।
00:14परम्पिता भगवान विश्णु ने अपने प्रियवाहन और अनन्य भक्त गरोड की नमर पुकार सुनी उनके मुख पर एक शांत दिव्य
00:22मुस्कान फैल गई जो अनन्त ज्यान का प्रतीक थी।
00:27त्रिलोकनाथ ने धीरे से अपना दिव्य प्रवचन आरंभ किया। यह समझाते हुए कि यह संपून दृष्यमान जगत एक माया का
00:35आवर्ण है जो हमारी इंद्रियों को घ्रमित करता है।
00:40उन्होंने स्पष्ट किया कि जीवन और मृत्यू, जन्म और विनाश ये सभी एक शाश्वत चक्र के ही दो पहलू हैं,
00:47जो निरंतर घूमते रहते हैं।
00:50भगवान विश्णू ने देह अर्थात भौतिक शरीर की प्रकृती को समझाया, जो पाँच तत्वों से निर्मित एक अस्थाई आवर्ण मात्र
00:59है और क्षण भंगुर है।
01:02उन्होंने वर्णन किया कि यह भौतिक शरीर जन्म लेता है, बढ़ता है, शय होता है और अंतर धूल में मिल
01:10जाता है, यह निरंतर परिवर्टन के अधीन है।
01:14फिर उन्होंने आत्मा का परिचय दिया, वह सनातन, अव्यक्त, अविनाशी और नित्य शुद्ध सार तत्व जो प्रत्येक प्राणी में निवास
01:23करता है।
01:25उन्होंने समझाया कि आत्मा शरीर के परिवर्टनों से अप्रभावित रहती है, जैसे वायु आकाश में विचर्ण करती है, परंतु स्वया
01:34आकाश नहीं बनती।
01:36गरुर को ज्यान देते हुए, भगवान ने वस्त्र बदलने का दृष्टांत दिया, जिसमें आत्मा पुराने शरीर को त्याग कर नए
01:44शरीर को धारन करती है।
01:47गरुर अत्यंत एकागरता से सुन रहे थे, उनके हृदय में उत्पन्प्रत्येक संदे भगवान के शब्दों की अमरित वर्षा से शांत
01:56हो रहा था।
01:57विष्णु ने आगे समझाया कि आत्मा का न तो जन्म होता है और नहीं वह कभी मरती है, यह शाश्वत
02:05है, अनादी है और अप्रिवर्तनिय है।
02:09उन्होंने बल दिया कि किसी भी प्राणी की सची पहचान उसके भौतिक रूप में नहीं, बलकि उसके भीतर नहित उस
02:17दिव्यचिंदारी उस आत्मा में है।
02:21विष्णू ने चेतावनी दी की क्षनभंगुर शरीर से अत्यधिक आसकती दुहक और मोह के बंधन में जकड लेती है, जिससे
02:29जीव भटकता रहता है।
02:32उन्होंने समझाया कि यह भौतिक संसार अपनी सभी सुख दुख के साथ आत्मा के लिए एक क्षनिक ध्रम मात्र है,
02:40एक चलती फिर्ती छाया।
02:42विश्णू ने सपष्ट किया कि मृत्यू केवल आत्मा का उसके जीर शीर वस्त्र यानी शरीर से मुक्ती है, एक नया
02:50जीवन प्रारंभ करने का अफसर।
02:53यह अंत नहीं है, बलकी एक यात्रा है, कर्मों के अनुसार, एक नए अनुभव की ओर संक्रमन, एक नए आयाम
03:01की ओर प्रस्थान।
03:03गरूर अब स्पष्टता से देखते हुए, नश्वर अस्तित्व की क्षनभंगुर्ता और आत्मा की अमर्ता पर गहराई से विचार कर रहे
03:11थे।
03:12भगवान विश्णू ने पुनह दोहराया कि मृत्यू का भय केवल आत्मा के सच्चे स्वरूप की अज्ञानता से उत्पन होता है।
03:22उन्होंने गरूर को आश्वस्त किया कि इस परम सत्य को समझना जन्म मृत्यू के चक्र से मुक्ती दिलाता है, परम
03:29शांती प्रदान करता है।
03:32भगवान विश्णू की गहन द्रिष्टी अनंत ज्यान का सागर थी, जो आगे आने वाले गूड रहस्यों के उद्घाटन का संकेत
03:40दे रही थी, मानो ब्रहमांड स्वयम बोल रहा हो।
03:44भगवान विश्णू ने अपनी नील्मनी सी दिव्य आभा बिखेरते हुए, मृत्यू के उस गूर क्षन को समझाना आरंभ किया, जहादे
03:53और आक्मा के बीच का सुक्ष्म बंधन तूटने लगता है।
03:58उन्होंने बताया कि कैसे मृत्यू से ठीक पहले, प्राणी की समस्त इंद्रिया अपनी बाहरी शक्तिक होने लगती हैं, जैसे संध्या
04:06काल में प्रकाश धीरे-धीरे मन्द पढ़ जाता है।
04:11द्रिष्टी धूमिल हो जाती है, श्रवन शक्ति समाप्थ होने लगती है, और वानी की सामर्थ्य धीरे-धीरे क्शीन होकर मौन
04:19में विलीन हो जाती है।
04:21फिर प्राण वायू जो जीवन का आधार है, शरीर के विभिन अंगों से सिमटकर केंद्रिय नाडी में एकत्रित होने लगती
04:29है, जैसे नदी की सभी धाराएं अंतह सागर में मिलती हैं।
04:35इस संकुचन की प्रक्रिया में प्राणे को असहनिय पीडा का अनुभव होता है, मानों उसके शरीर के हर अनों को
04:42अलग किया जाती है।
05:05गरुर, शान्त और गंभीर भाव से भगवान विश्नु के प्रत्येक शब्द को आत्म साथ कर रहे थे, उनके विशाल नित्रों
05:12में ब्रहमांडिय सत्य की जलक स्पष्ट दिख रही थी।
05:17भगवान विश्नु ने अपनी दिव्य मुस्कान के साथ आगे बताया कि कुछ प्राणियों के प्राण हृदय से निकलते हैं, तो
05:24कुछ के नाभी चक्र से यह उनके कर्मों पर निर्भर करता है।
05:30हृदय से निकलने वाले प्राणों को मोक्षगामी माना जाता है, जबकि अन्यमार्गों से निकलने वाले प्राण पुनह संसार चक्र में
05:38प्रवेश करते हैं।
05:41जिस क्षण प्राण देह का त्याग करते हैं, एक तीवर जंजनाहट और कमपन पूरे अस्तित्व में फैल जाता है।
05:48मानो ब्रहमांड स्वयं एक पल के लिए काप उठा हो।
05:52यह वह अंतिनक्षन होता है, जब आत्मा अपने चिरपरिचित खोल से विदा लेती है, उस देह से जिसका उसने जीवन
06:01भर पोशन किया था।
06:03उस समय प्राणी को ऐसा अनुभव होता है, जैसे वह एक गहरी खाई में गिर रहा हो, जहां न कोई
06:10प्रकाश है और न कोई सहारा।
06:13गरुर ने अपनी विशाल आखे जुकाई, मानो उस अद्रिश्य पीडा को स्वया अनुभव कर रहे हो, उनके मन में करुणा
06:21और जिग्यासा दोनों उमर पड़ी थी।
06:24भगवान विश्नु ने अपनी मधुर शांत वानी में उन्हें आश्वस्थ करते हुए कहा कि यह पीडाक्षनिक होती है, देह के
06:33छूटने के साथ ही समाप्थ हो जाती है।
06:36उन्होंने समझाया कि यह शरीर नश्वर है और आत्मा अविनाशी इस सत्य को समझना ही भैसे मुक्ति का मार्ग है।
06:46जैसे एक पुराना वस्त्रत्याक कर नया वस्त्रधारन किया जाता है, वैसे ही आत्मा एक जीन देह छोड़कर नवीन देह में
06:54प्रवेश करती है।
06:56यह केवल एक पड़ाव है, एक रूपानतरण है, अन्त नहीं, बलकि एक नए आरंभ की अलोकिक तयारी।
07:05भगवान विश्णू की आखों में अनंत ब्रह्मांड की शांती थी, जो गरूर को यह विश्वास दिला रही थी कि मृत्यू
07:13केवल एक भ्रम है, सक्य तो जीवन का निरंतर प्रवाह है।
07:18यह गूर ज्यान सुनकर गरूर का मन शांत हो गया, और वे आगे के रहस्यमय सफर को जानने के लिए
07:25और भी उत्सुखो उठे, मृत्यू के पार के लोक की यात्रा।
07:30भगवान विश्णू ने मुस्कुराते हुए गरूर को समझाया कि मृत्यू भौतिक शरीर का अन्त है, लेकिन आक्मा का अनन्त सफर
07:38यहीं से एक नए आयाम में प्रवेश करता है।
07:42उन्होंने आगे बताया कि जब प्रान देह का त्याग करते हैं, तब एक सुक्ष्म शरीर, जिसे लिंग शरीर भी कहते
07:50हैं, स्थूल काया से बाहर निकलता है।
07:54यह सुक्ष्म शरीर केवल एक प्रेत नहीं, बलकि मन, बुद्धी और अहंकार का सार है, जो जीव के हर विचार
08:02और अनुभव को संजोय रखता है।
08:06साथ ही, यह दस इंद्रियों के सुक्ष्म स्वरूपों को भी अपने साथ ले जाता है, जो जीवन भर की अनुभूतियों
08:13के आधार होते हैं।
08:15सबसे महत्वपून बात यह है कि यह सूक्षम शरीर पिछले जन्मों के सभी कर्मों और इस जीवन के संसकारों को
08:23अपने अंदर धारण करता है, जैसे एक बीज व्रिक्ष के भविश्य को समेटे होता है.
08:30जैसे ही सूक्षम शरीर स्थूल देह से पूर्णता विलग होता है, यह एक अदरिश्य उर्जा प्रवाह द्वारा अपनी अगली यात्रा
08:39की ओर खिंचने लगता है.
08:42कुछ पल के लिए वह सूक्षम शरीर अपनी छोड़ी हुई पार्थिव देह को पीछे मुर कर देखता है, जैसे एक
08:49यात्री पुराने घर को अलविदा कहता है.
08:53इस अलगाव के साथ ही वह अपने आपको सभी भौतिक बाधाओं और गुरुत्वाकर्शन के बंधनों से मुक्त अत्यन्त हल्का और
09:02स्वतंत्र महसूस करता है.
09:05फिर वह सुक्ष्म शरीर एक विस्त्रित अनंत ब्रह्मांडिय मार्ग पर अपनी यात्रा आरंभ करता है, जो उसे अज्यात लोकों की
09:13ओर ले जाता है.
09:15इस मार्ग पर उसकी दिशा और गती उसके संचित कर्मों के संसकारों द्वारा निर्धारित होती है, जो उसे एक अद्रिश्य
09:24धाद अपनी यात्रा के दौरान सुक्ष्म शरीर कभी कभी सुखद दिव्य द्रिश्यों या भयावा प्रेट लोक की जलक देखता है,
09:32जो उस
09:41पर लोक के द्वारों तक पहुचाने के लिए प्रकट होते हैं, यह एक पुल, एक सीमा या एक अद्रिश्य द्वार
09:49होता है, जिसे पार करते ही सुक्ष्म शरीर पूर्णत है पर लोक के दायरे में प्रवेश कर जाता है, इस
09:57क्षण सुक्ष्म शरीर अपने जीवन के अंत
10:00भौतिक संपर्क की स्मृति को त्याग कर एक गहरा और स्थाई अलगाव अनुभव करता है, हालांकि जीवन की स्मृतिया और
10:10अनुभव उसकी चेतना में जीवित रहते हैं, जो उसके अगले गंतव्य के लिए मार्कदर्शक प्रकाश बनते हैं, अब सुक्ष्म शरीर
10:20अ�
10:20अपने कर्मों द्वारा निर्धारित एक अद्रिश्य शक्ती द्वारा अपने अगले जन्म या विशिष्ट लोक की ओर खीचा जाता है, यह
10:29सुक्ष्म शरीर एक पवित्र पात्र के समान है, जो जीव के अस्तित्व के सार को उसके गुनों और दोशों को
10:36अनंत काल तक धा
10:38परन किये रहता है, यही वह आधार है जिस पर नए जन्म की संरचना खड़ी होती है, जिसके बीज वर्तमान
10:46अनुभवों से सिंचित होकर अंकुरित होते हैं, इस प्रकार सुक्ष्म शरीर पर लोक की यात्रा का अविस्मर्णिय यात्री है, जो
10:56प्रत्येक आत्मा को उसके
10:58कर्मों के अनुसार उचित गंतव्य तक पहुचाता है, यह गूर व्याख्या सुनकर गरूर के हरिदय में मृत्यू के प्रती भाय
11:07नहीं, बलकि उसके पीछे छिपी कर्मों की अटल व्यवस्था के प्रती गहरी श्रद्धा जागरित हो उठी, तक पश्चात भगवान वि
11:27ग्रसर होती है, उन्होंने व्याख्या की कि जब मृत्यू का क्षन निकट आता है, तो पापी आत्मा अपने पिछले दुशकर्मों
11:36का भयानत लिखा जोखा अपने मानसिक पटल पर सपष्ट रूप से देखने लगती है, इस गेहन पीडा और पश्चाताप के
11:45मध्य, शरी
11:46धीर धीरे धीरे अपनी जीवन्पता खोने लगता है, इंद्रिया शिथिल पढ़ जाती है और प्राणवायू भीतर ही भीतर छटपटाने लगती
11:54है, और फिर एक अद्रिश्य द्वार खुलता है, जहां से मृत्यू के भयानक अग्रदूत, यमदूत, अपनी कठोर उपस
12:28अभास कराना शुरू करते हैं।
12:33यमदूत अपनी पूरी भयावता के साथ प्रकट होते हैं, जिनके दर्शन मात्र से पापी आत्मा का हृदय थर्रा उठता है
12:41और वह भय से कामपने लगती है।
13:04जिनसे वे पापी आत्मा को बिना किसी दया के पकड़ कर खीचने के लिए तयार रहते हैं।
13:11मृत्यू के अंतिम क्षणों में आत्मा अपने प्रियजनों को अपने भौतिक शरीर को छोड़ने से पहले अंतिम बार देखने का
13:19प्रयास करती हैं।
13:20तो यमदूतों की उपस्थिती यह भी असंभव बना देती है।
13:25शरीर से निकलने में असमर्थ आत्मा अत्यधिक भय और पीडा से चीखने लगती है, जैसे वह अपने अंतिम शरन स्थान
13:34को छोड़ने से इनकार कर रही हो।
13:37यमदूत बिना किसी हिचकी चाहट के अपने भयावह पाश को उस आत्मा की ओर बढ़ाते हैं, जो अभी भी शरीर
13:45से चिपकी हुई है।
13:47वे अदमय शक्ती के साथ आत्मा को खीचते हैं, जिससे वह शरीर के प्रत्येक रोमचिद्र से, प्रत्येक तंत्रिका से, अत्यंत
13:56कष्ट के साथ बाहर निकलने के लिए विवश हो जाती है।
14:01यह निशकासन इतना क्रूर और दर्गनाक होता है कि आत्मा स्वय को एक विशाल दलदल से खीच कर बाहर निकलने
14:09जैसा अनुभव करती है।
14:11एक तीखी चीतकार के साथ आत्मा अंत्य शरीर से पूर्णत प्रिथक हो जाती है और पीछे रह जाता है केवल
14:20अब यहां आत्मा अपने सुक्ष्म शरीर में पूर्णत असहाय और भैभीत होकर यमदूतों के सम्मुख खड़ी होती है जो उसे
14:29एक कैदी की भांती देखते
14:30हैं वे तुरंत उस सुक्ष्म शरीर को अपने पाशों से कसकर बांध लेते हैं ताकि वह भागने का कोई प्रयास
14:39न कर सके या किसी भौतिक वस्तु से जुड़ न सके
14:44बांधे जाने के बाद यमदूत उस भैभीत और विलाप करती हुई आत्मा को मृत्यों लोग की ओर अपने साथ घसीटना
14:52शुरू कर देते हैं
14:54मार्ग में आत्मा को अपने दुश कर्मों के कारण उत्पन्न हुई भयानक यम यातनाओं के पूर्वसंकेट दिखाई देने लगते हैं
15:02जो उसके भैग को कई गुना बढ़ा देते हैं
15:06इस प्रकार पापी आत्मा अपनी कर्मों की भयानक यात्रा पर निकल पड़ती है जहां उसे अपने प्रत्येक पाप का हिसाब
15:15देना होता है जैसा कि विश्णु ने गरूर को बताया
15:19जैसे ही यमदूत आत्मा को आगे घसीटते हैं वह एक अंतिम प्रयास में पीछे मुड़कर उस स्थान को देखती है
15:27जहां अभी कुछ क्षण पहले ही उसने अपना शरीर त्यागा था
15:32वहां भूमी पर वह अपने ही मृत शरीर को निश्चल पड़ा देखती है जो अब मात्र एक खाली आवर्ण है
15:39जीवन से रहित और ठंडा
15:42उसके चारों और उसके अपने संबंधी, पुत्र, पुत्री, पत्नी और मित्र, छाती पीटते, बिलखते और अश्रु बहाते हुए, गहरे शोक
15:52में डूबे हुए है
15:54इस द्रिश को देखकर आत्मा के हृदय में तीवर मोह और अथाह दुख का एक पहला आधात लगता है, जैसे
16:02कोई अद्रिश तलवार उसके अस्तित्व को चीर गई हो
16:06वह बेथाशा अपने मृत शरीर की ओर लोटने का प्रयास करती है, जैसे कोई मचली पानी से बाहर निकल कर
16:14वापस अपने जलाशे में कूदना चाहे
16:17किन्तु यमदूत अपनी अलौकिक शक्ती से उसे कसकर पकड़े रखते हैं और निर्दैता से उसे पीछे की ओर खीचते हैं,
16:26उसकी छटपटाहट व्यर्थ जाती है
16:30आत्मा अपने बिलखते संबंधियों को पुकारती है, अपने नाम से उन्हें संबोधित करती है, मानों उन्हें जखजोर कर अपनी उपस्थिती
16:39का एहसास कराना चाहती हो
16:42किन्तु कोई भी उसे सुन नहीं पाता, नहीं देख पाता है, उसकी पुकारें और चीखे मात्र अद्रिश्य तरंगों की तरह
16:50उनके पास से गुजर जाती है
16:53इस अलगाव का अनुभव आत्मा को अत्यंत एकाकीपन और असहायता से भर देता है, जैसे उसे एक अनन्त शूने में
17:01धकेल दिया गया हो
17:04अपनी असहायता के क्षणों में, आत्मा के समक्ष अपने जीवन के सुख़द और दुख़द पल एक क्षण भंगुर स्मृती की
17:11तरह कौन्ध जाते हैं
17:14विशेशकर, परिवार के साथ बिताएवे मधुरपल, स्नेह और जुडाव के वे अटूट बंधन उसके मन में एक गहन कसक जगाते
17:23हैं
17:24यह मोह और संबंधियों से बिछडने का दुख उसके अद्रश्य शरीर को भी शारिरिक पीडा के समान विचलित कर देता
17:32है
17:33एक अंतिम बार वह अपने सबसे प्रियजन की ओर अपना अद्रश्य हाथ बढ़ाती है, जैसे अंतिम विदाई स्पर्श की याचना
17:42कर रही हो
17:43किन्तु उसका हाथ उनके आरपार निकल जाता है, जैसे वह हवा को छूने का प्रयास कर रही हो, यह अनुभव
17:51उसे और भी गहरे निराशा में धकेल देता है
17:55यमदूत अब और विलंब न करते हुए, उसे उस जगह से और दूर खींचना शुरू कर देते हैं, जहां उसके
18:03पूर्व जीवन के निशान मौजूद थे
18:06वह अपनी दृष्टी को अंतिमवार अपने परिवार पर टिकाए रखती है, उनकी आखों से बहते अश्रू और उनके विलाप उसके
18:14कानों में अब भी गूज रही है
18:18धीरे धीरे उसके जीवन का वह परिचित संसार धुंधला होकर उसकी पकड़ से दूर होता जाता है, जैसे रेक मुठी
18:26से फिसल जाती है
18:28यह एक गहन क्षती और अस्तित्वहींता का एहसास है, जैसे कोई अपनी जडों से कटकर अनंत आकाश में बह रहा
18:36हो
18:38आत्मा अब पूर्णत है अपने भौतिक बंधनों से मुक्तत, फिर भी हरिदय में एक भारीपन लिए अज्यात मार्ग पर आगे
18:45बढ़ती है
18:47उसके सामने अब केवल कर्मों का लेखा जोखा है और एक ऐसी यात्रा जो उसे उसके प्रत्येक पाप और पुने
18:55का फल देना
18:56कर्मों का लेखा जोखा उसके सम्मुक हाते ही एक अनंत पत अनायास ही खुल गया, जो उसे अपने गंतव्यकी ओर
19:03खीच रहा था
19:05तभी घने अंधकार से दो विशालकाय भयानक आकरितिया उभी जिनकी आखें अगनी के समान देहक रही थी
19:14उन यम्दूतों ने अपनी विक्राल भुजाओं से आत्मा को बलपूर्वक जकड लिया, उसकी सारी शक्ती क्षन भर में क्षीन हो
19:22गई
19:23बिना कोई शब्द कहे, यम्दूतों ने आत्मा को एक अग्यात विकट मार्ग पर खींचना शुरू कर दिया, जहां केवल अंधकार
19:32का सामराज्य था
19:34यह पत्ध दुर्गम खाईयों, नुकीले पत्थरों और भयानक घुमावों से भरा था, जो हर कदम पर आत्मा को और भी
19:42गहराई में खींचता जा रहा था
19:45आत्मा के भीतर एक गहन भय व्याप्त था, क्योंकि उसे अपनी नियती पर कोई नियंत्रन नहीं था और वह पूर्णत
19:52असहाय थी
19:55भौतिक देह त्यागने के बाद भी आत्मा को एक असहनिय भूख और प्यास का अनुभव हो रहा था, जैसे उसका
20:02अस्तित्व ही सूख रहा हो
20:05यम्दूत उसकी पीडा से अप्रभावित, उसे और भी तेजी से धकेलते रहे, उनकी क्रूरता हर गुजरते पल के साथ बढ़ती
20:13जा रही थी
20:15पत अब और भी वीरान हो गया था, जहां तप्ती रेत और नुकीली जाडिया आत्मा के सुक्ष्म शरीर को चीरने
20:22को तत पर थी
20:24अथक यात्रा से ठक कर आत्मा ने यम्दूतों से करूना की भीख मांगी, उसकी प्रार्थनाय केवल खाली हवा में विलीन
20:32हो गई
20:34यम्दूतों ने उसकी दैनिय याचना को उफास से ठुकराया और अपने भयावः शस्त्रों को दिखाते हुए उसे आगे बढ़ने की
20:42धमकी दी
20:44हर आशा को खोकर आत्मा ने एक क्षण के लिए अपने अस्तित्व के अंत को स्विकार कर लिया, एक गहरी
20:51निराशा ने उसे जकड लिया
20:54उन्हें एक ऐसे बंजर मैदान से गुजरना पड़ा जहां केवल सुखा, तूटे हुए व्रिक्षों के कंकाल और दूर तक फैली
21:01विरान भूमी थी
21:04इस असीन पीडा में आत्मा को अपने जीवनकाल के पापों की असपष्ट स्मृतिया क्षणिक चमक के रूप में याद आने
21:11लगी
21:13यमदूतों की क्रूरता अब और भी बढ़ गई थी, वे आत्मा को बिना किसी विराम के लगातार प्रताड़ित कर रहे
21:20थे
21:22अत्यधिक ठकान और यमदूतों के निरंतर धक्कों से आत्मा लड़ खड़ा कर नीचे गिर पड़ी, उसकी शक्ती पूरी तरह से
21:29क्षीन हो चुकी थी
21:31पर यमदूतों ने उसे कोई विश्राम नहीं दिया, उन्होंने आत्मा को बलपूर्वक घसीटते हुए पुन्ह खड़ा कर दिया
21:40उसक्षन आत्मा को आभास हुआ की यह केवल यात्रा का आरंभ है और आगे और भी भयानक कष्ट उसका इंतजार
21:48कर रहे हैं
21:50शितिजपर्क दूर कहीं यमलोक का एक धुन्धला और भयावा सिलुएट दिखाई दिया, जो उसकी आने वाली नेती का संकेत दे
21:59रहा था
22:00इस अमानवी मार्ग पर आत्मा को अनवरत कष्टों का सामना करते हुए अनिश्चित भविश्य की ओर घसीटा जा रहा था
22:09जैसे ही आत्मा उस पत पर आगे बढ़ी, भूटकाल के अग्रिश परदे उठने लगे और उसके कर्मों की पहली हलकी
22:17फुहारें उसके चारों और नित्य करने लगी
22:21अचानक एक तीवर द्रिश उभर आया जहां उसने धन के लालच में किसी गरीब का हक छीन लिया था, जिससे
22:29उसके भीतर एक तीखी पीड़ा उमड़ पड़ी
22:32इस कृत्य की विभीशिका ने आत्मा को भयभीत कर दिया, उसके अस्तित्व में गहरे पश्चाताप की लहर दोड़ गई, मानो
22:40वह स्वयं को पहचानने से इनकार कर रही हो
22:44फिर एक और भयावह चित्र सामने आया, जब उसने अपनी शक्ती के मद में किसी निर्दोष प्राणी को अकारण कश्ट
22:52पहुँचाया था
22:54प्रत्यक कर्म का प्रतिविंब एक तीखे बान की तरहा आत्मा को भेद रहा था, उसे अनंत निराशा के गहरे कुए
23:01में धकेल रहा
23:02ठीक उसी पल अंधकार के बीच से एक उजवल किरन फूटी, जिसने उसे एक प्यासे यात्री को पानी पिलाते हुए
23:10दर्शाया, एक क्षणिक संतोष का अनुभव कराते हुए
23:14इस पुन्यकर्म की स्मृती ने आत्मा को एक क्षणिक शान्ती और संतोष प्रदान किया, जैसे वर्षों के सूखे के बाद
23:22पहली वर्षा की बून्द गिरी हो
23:25किन्तु यह राहत क्षणभंगुर थी, क्योंकि शीघ्र ही पापों का विहवल सागर फिर से उमड पड़ा, और आत्मा को उसके
23:33अन्याई कृत्यों का सामना करना पड़ा
23:36एक और दुखद द्रिश में, आत्मा ने देखा कि कैसे उसने अपने व्रिद्ध मातापिता को उपेक्षित कर दिया था, उनकी
23:44अंतिम सासों तक प्रेम से वंचित रखा
23:48तत्पश्चात एक और स्मृती प्रकट हुई जहां उसने जूट और छल से किसी भोले भाले व्यक्ती का विश्वास तोड़ा था,
23:55जिससे उसे गहरा आगहात पहुँचा
23:59इन घेनित द्रिश्यों को देखकर आत्मा शर्म से सिकुड गई, उसके अस्तित्व की गहराई में एक अथा काली खाई खुल
24:07गई
24:08फिर एक क्षण आया जब उसने अपने कर्तवियों से मुह मोड लिया था, समाज या परिवार के प्रती अपनी जिम्मेदारियों
24:16को त्याग दिया था
24:18जैसे जैसे आत्मा यमलोग की ओर बढ़ती रही, ये कर्मचित्र केवल ज़ल किया नहीं रहे, बलकि एक भयानक वास्तविक्ता में
24:27विलीन होने लगे, जो उसे पूरी तरह से घेर रहे थे
24:31एक विशेश रूप से दर्गनाक द्रिश में, आत्मा ने देखा की कैसे उसके स्वार्थी निर्णय ने कई निर्दोशों के जीवन
24:39को अंधकार्मय कर दिया था
24:42कर्मों का यह बोज इतना भारी था कि आत्मा कामप उठी, उसके कणकण में विलाप और आत्मध्रेना का जवार उमड़
24:50पड़ा
24:51फिर भी एक क्षण के लिए, एक मंदिर में एक भूखे बच्चे को भोजन कराते हुए, एक निहस्वार्थ कार्य की
24:59स्मृती ने उसे थोड़ी देर के लिए मुक्ती का अनुभव कराया
25:03अच्छाई और बुराई के ये विरोधा भासी चित्र अब आत्मा के सामने उसके पूरे जीवन का एक स्पष्ट अविस्मनिय खाका
25:12प्रस्तुत कर रहे थे
25:14प्रत्यक कर्म का पच्चेहन, चाहे वह पुन्य हो या पाप, अब उसके सामने एक अमिट मार्ग बन रहा था, जो
25:21उसे उसकी नेती की ओर खीच रहा था
25:25यमलोक का भयावधवार अब और अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था, और कर्मों के ये द्रिश्य उसकी आने
25:32वाली परीच्चा की प्रस्तावना बन चुके थे
25:36इसक्षण आत्मा को पूर्णतह बोध हो गया था कि ये केवल अतीत की स्मृतिया नहीं, बलकि उसके आगामी न्याय की
25:44नीम है
25:46भगवान विश्णु ने पक्षी राज गरुड की ओर देखते हुए अत्यंत गंभीर स्वर में आगे कहा कि यदि प्रित्वी लोग
25:54पर सगे संबंधी मृत आत्मा के लिए शास्त्रोक्त अंतिम संस्कार और श्राध नहीं करते, तो एक भयंकर संकट उत्पन होता
26:02है
26:03जब मृत देह के निमित विधिवत पिंडदान और जलांजली अर्पित नहीं की जाती, तो जीवात्मा को नया सुक्ष्म आधार प्राप्त
26:12नहीं होता और वह लोग पर लोग के बीच अधर में अटक जाती है
26:17पवित्र मंत्रों और तिलजल के तरपन से वंचित होकर, वह बेबस आत्मा धीरे-धीरे एक अत्यंत क्षीन, धुंधले और कश्टदाई
26:26प्रेच्शरीर में परिवर्तित होने लगती है
26:30इस नए प्रेच्शरीर के धारन करते ही आत्मा को अचानक एक तीवर, असहनिय भूख और प्यास का आभास होता है,
26:38जिसे मिटाने का उसके पास कोई स्थूल साधन नहीं होता
26:43भौतिक संसार के मोह और अत्रिप्त लालसाओं के बोज से दबी हुई वह अशान्ट आत्मा तीवर तड़क में वापस अपने
26:51पूर्व संसारिक घर की ओर लोटने के लिए विवश हो जाती है
26:56अपने पुराने घर की देहलीज पर पहुँचकर वह प्रेत आत्मा देखती है कि उसके अपने सगे संबंधी अपने दैनिक कारियों
27:05में व्यस्थ हैं और उसकी उपस्थिती से पूर्णता अनभिग्य है
27:10वह विवश प्रेत अपने परिजनों को छूने और उनसे बात करने का बेताप प्रयास करता है किन्तु उसके पारदर्शी हाथ
27:18केवल हवा में से होकर गुजर जाते हैं
27:22भगवान विश्णू बताते हैं कि बिना अगनी और जल के तरपन के प्रेत आत्मा अपने ही परिवार के आसपास एक
27:30अद्रिश्य पीडादायक तपन के आवर्ण में जलती रहती है
27:35प्रसोई और जलपातरों के समीप मंडराते हुए वह प्रेत भोजन की सुगंध और जल को देख कर रोता है
27:42परंतु संसकारहीन होने के कारण वह एक बूंद भी ग्रहें नहीं कर पाता
27:48जब वह देखता है कि उसके संबंधी श्रद्धा पूर्वक श्राद करने के बजाए उसकी संपत्ती और धन के बंटवारे में
27:56उल्जिए
27:56अत्रिप्त आत्मा का यह गहरा असंतोश और परिजनों का अधर्म एक सुक्षम श्राप बनकर घर की वायू में घुल जाता
28:03है
28:04जो उस परिवार में निर्धनता और अशांती लाता है
28:09रात्री के घने अंधकार में वह भटका हुआ प्रेट थंडी हवाओं और सुनसान गलियों में अकेले भटकता है
28:16जिसकी करुन पुकार किसी भी मनुष्य को सुनाई नहीं देती
28:21भगवान विश्णु के इन वचनों को सुनकर पक्षी राज गरुर ने अश्रुपूरित नेत्रों से प्रणाम किया और पूछा की इस
28:28कष्टदाई प्रेट्योनी की अवधी कब और कैसे समाप्थ होती है
28:34श्रीहरी ने उत्तर दिया कि यदि उत्तर जीवी कोई भी संसकार न करें तो आत्मा वर्षों तक प्राकृतिक तत्वों के
28:41प्रकोप और असीम एकाकीपन में इसी रूप में तड़पती रहती है
28:47वह प्रेत आत्मा उच्च लोकों की ओर उड़ने का प्रयास करती है किन्तु अद्रिश्य उर्जात्मक बंधन उसे जटके से पुनह
28:55प्रित्वी की सीमाओं में खींच लेते हैं
28:59कांटेदार जाडियों, बरफीली हवाओं और छलावे की धूप से भरे इस अनिश्चित लोक में वह सुक्ष्म देह अकेले ही अपने
29:07कर्मों के असहय भार को ढोती है
29:11भगवान विश्णु ने पुत्रों और वंश्जों के उस पावन धर्म को रेखांकित किया, जिसमें काले तिल, कुशा घास और जल
29:18के साथ पवित्र पिंड अर्पित करने का विधान है
29:22उन्होंने बताया कि जब वंशच पूर्ण भक्ती और श्रद्धा से एक भी सच्चा पिंड दान करते हैं, तो प्रेट शरीर
29:30के बंधन ततकाल तूट जाते हैं और आत्मा स्वतंत्र हो जाती है
29:36बिना श्रद्धा के किये गए कर्म और संसकारों की अभेलना, जीवित और मृत दोनों के मार्ग में भयंकर कर्मबंधन उत्पन्न
29:44करती है, यह सत्य श्रीहरी ने स्पष्ट किया
29:48विष्णु भगवान की इस गंभीर वानी को सुनकर पक्षी राज गरोर का हृदय भक्ती और ज्यान से भर गया और
29:55उन्होंने मृत आत्मा की आगे की यात्रा जानने हेतु सिर जुकाया
30:00पक्षियों के राजा गरोर ने अत्यंत विनमरता पूर्वक अपने विशाल पंखों को समेट कर सिर जुकाया और भगवान विश्णु से
30:08प्रश्न किया कि मृत्यु के बाद जीवात्मा को यमलोग की कठिन यात्रा में संबल प्रदान करने वाले पिंड़ दान की
30:15गुप्
30:27दान करते हैं तो वह भौतिक अन्नसुक्ष्म उर्जा में परिवर्तित होकर परलोग की ओर प्रस्थान करता है।
31:01जैसे ही वह पुत्र श्रद्धा के आसुओं के साथ पहला पिंड पवित्र पत्तल पर अर्पित करता है, वैदिक मंत्रों की
31:08कमपन हवा में एक दिव्य प्रकाश पुंझ उत्पन करती है।
31:13वह भौतिक पिंड प्रित्वी की गुरुत्वाकर्शन सीमा को लांध कर दिव्य सुनहरी उर्जा तरंगों के रूप में सीधे उस धुंधले
31:21मार्ग की ओर बढ़ता है, जहां आक्मा तडप रही थी।
31:25उस भयानक और निर्जन मार्ग पर व्याकुल प्रेत आक्मा जैसे ही उस सुनहरी उर्जा को ग्रहन करती है, उसकी प्यास
31:33और कंठ की भीशन दाह ततकाल शांत हो जाती है।
31:38भगवान विशनु ने स्पष्ट किया कि अर्पित किये गए पिंड के चार भाग होते हैं, जिन में से दो भाग
31:45स्रिष्टी के तत्वों को एक भाग यमराज के दूतों को और अंतिम भाग स्वया उस आत्मा को त्रिप्ती देता है।
31:53इस विभाजन को देखकर यमराज के भयानक दूत भी प्रसन्न हो जाते हैं और वे आत्मा को बिना कोई कश्ट
32:01दिये अत्यंत आदर पूर्वक आगे का मार्ग दिखाते हैं।
32:05निरंतर मिलने वाले पिंडदान के प्रभाव से वह दुर्बल और भयावा प्रेच शरीर धीरे धीरे पिघलने लगता है और आत्मा
32:14को एक नवीन प्रकाश्मय सुक्ष्म शरीर प्राप्थ होता है।
32:19पक्षियों के राजा गरूर ने अपनी तीक्षन बुद्धी से इस अलौकिक द्रिश्य की कलपना की और उनके नेत्रों से अपने
32:27स्वामी के प्रती भक्ती के अश्रुच हलक पड़े।
32:30तभी श्रीहरी का मुखमंडल गंभीर हो गया और उन्होंने उन अभागे मनुश्यों की स्थिती का वर्णन किया जिनके वन्शज उनके
32:39लिए कभी पिंडदान नहीं करते।
32:41उन्होंने दिखाया की कैसे बिना श्राध और पिंड के भटकने वाली आत्माएं भूखी प्यासी होकर कांटो भरे मार्ग पर विलाप
32:50करती हैं और प्रेट योनी के भयंकर चक्रव्यूह में फंस जाती हैं।
32:55परंतु जब प्रित्वी पर बारहवे दिन सपिंडी करण का महान संसकार संपन्न होता है तो वह भटकाव सदा के लिए
33:03समाप्थ हो जाता है और आत्मा का पूर्वजों से मिलन सुनिश्चित होता है।
33:09पित्र लोग से दिव्यत तेजस्वी और श्वेत वस्त्रधारन किये हुए पूर्वज मुस्कुराते हुए स्वर्ग से नीचे उतरते हैं ताकि मंत्रों
33:18की शक्ती और पूर्वजों के आशिरवाद से उस नई पवित्र आत्मा के पैरों में बंधी हुई कर्मों की भारी �
33:25बेडियां सोने की धूल बनकर हवा में बिखर जाती हैं यम्राज के दूट जो पहले भयानक काल के रूप में
33:33दिखते थे अब उस तेजस्वी जीवात्मा के सम्मुख विनीत भाव से खड़े होकर उसे यमलोक के न्यायपूर्ण राजमहल की ओर
33:41ले चलते हैं
33:43मार्ग में आने वाली भयानक वैतर्णी नदी भी उस जीवात्मा के लिए शान्त हो जाती है क्योंकि उसके जीवित वंशजों
33:51द्वारा दिये गए गोदान का पुन्य उसे एक नौका के समान पार लगाता है
33:57भगवान नारायन ने गरूर से कहा कि पुत्र और परिवार द्वारा पूर्ण श्रग्धा से दिया गया एक एक तिल और
34:05अन्न का दाना पर लोक में उस आत्मा का अमिट धाल बन जाता है
34:10भगवान के इस परम रहस्य मेई और कल्यानकारी ज्ञान को सुनकर गरूर का संशय पूरी तरह मिट गया और उन्होंने
34:18यमलोक के अंतिन द्वार के रहस्यों को सुनने के लिए पुन्ह शीश नवाया
34:24भगवान श्री हरी विश्णु ने मंद मुस्कान के साथ गरूर की ओर देखा और गंभीर स्वर में कहा कि है
34:30पक्षी राज वैतर्नी पार करने के बाद जीवात्मा का सफर समाप्त नहीं होता बलकि वह यमलोक के अंतिन न्याय की
34:38ओर बढ़ती है
34:40उन्होंने समझाया कि मृत्यू के पश्चात यह प्रारंभिक मार्ग केवल कर्मों की परीक्षा का प्रवेश द्वार है जहां से आत्मा
34:49को अपने असली गंतव्य की ओर प्रस्थान करना पड़ता है
34:54तभी यमलोक का वह विशाल और भयानक मुख्य द्वार दिखाई देता है जो काले वजर पत्थरों से बना हुआ है
35:01और जिसके चारों और लाल दहपती हुई ज्वालाएं निरंतर उठती रहती है
35:07इस दुर्गम द्वार के भीतर धर्मराज यमराज अपने परम तेजस्वी और न्यायप्रिय रूप में विराजमान हैं जो ब्रहमांड के हर
35:16जीव के कर्मों का अंतिम न्याय करते हैं
35:20गरुड अपने विशाल स्वर्ण पंखों को समेट कर भगवान नारायन के चर्णों के समीप बैठ गए और अत्यंत विस्मय तथा
35:28श्रधा से उनकी ओर देखने लगे
35:32भगवान विश्णू ने आगे बताया कि यम्राज के समीप ही उनके परम ज्यानी मंत्री चित्रगुक्त बैठते हैं जो मनुष्यों के
35:40जीवनकाल में किये गए एक एक पाप और पुन्य का अचूक लेखा जोखा रखते हैं
35:46चित्रगुक्त के उस दिव्य और अनन्त ग्रंथ में संसार के प्रत्येक प्राणी का कर्म अनकित होता है जहां न तो
35:53कुछ छिपाया जा सकता है और नहीं किसी सत्य को बदला जा सकता है
35:59यमराज के न्यायालय में आते ही जीवात्मा को उसके कर्मों के अनुसार दो प्रमुख भागों में विभाजित मार्गों पर जाने
36:07का आदेश दिया जाता है
36:10दुष्ट और पापी आत्माओं को भयानक यमदूत बलपूर्वक उन अन्धकार में और कष्टप्रद मार्गों की ओर धकेल देते हैं जहां
36:18केवल भीशन यातनाएं उनका स्वागत करती है
36:23इसके विपरीत जिन्होंने अपने जीवनकाल में केवल परोपकार और धर्म का पालन किया है उन्हें अत्यंत आदर के साथ प्रकाश्वान
36:32और सुखद मार्गों पर भीजा जाता है
36:36भगवान नारायन के इस अध्भुत विवर्ण को सुनकर गरुड के मन में उन भयानक नर्कों के स्वरूप को विस्तार से
36:43जानने की तीवर जिग्यासा उत्पन्न हो गई
36:47उन्होंने हाथ जोड कर अत्यंत विनीत भाव से पूछा कि है प्रभु वे कौन-कौन से नर्क है और मनुष्यों
36:54को अपने किन कुकर्मों के कारण उन कश्टों को भोगना पड़ता है
36:59भगवान विश्नु ने गरूड की जिग्यासा को देखकर अत्यंत शांत भाव से कहा कि हे खगेश्वर कुल 28 मुख्य नर्क
37:07हैं जो भिन्नभिन श्रेनी के पापों के शुद्धिकरण के लिए बनाए गए हैं
37:13इन नर्कों में सबसे भयानक तामिस्र, अंधतामिस्र और रौरव जैसे स्थान हैं जहां केवल घोर अंधकार और असहनिय कश्टों का
37:22सामराज्य होता है
37:25वहाँ पापी आत्माओं को उनके द्वारा धर्ती पर दूसरों को सताने, चोरी करने और विश्वासखात करने के कारण कठोर दंड
37:33भुगतने पड़ते हैं
37:36भगवान ने स्पष्ट किया कि ये नरक आत्मा को नश्ट करने के लिए नहीं, बलकि उसके अहंकार और अशुद्धियों को
37:44जलाकर उसे पुनह पवित्र बनाने के लिए अस्तित्व में हैं
37:49स्रिष्टी का यह अकाट्यनियम है कि जो भी जीव इस नश्वर संसार में जन लेता है, उसे अपने कर्मों के
37:56फल से कभी मुक्ती नहीं मिल सकती जब तक वह उनका भोग न कर ले
38:02गरुर ने अत्यन्त आदर पूर्वक्षीश जुका कर कहा कि है सर्वेश्वर आपकी इस वानी ने मेरे हृदय के संपूर्ण अंधकार
38:10और अज्ञान को सदैव के लिए मिटा दिया है
38:14भगवान विश्णु ने अपने दाहिने हाथ को उठा कर गरुर को आशिरवाद दिया और कहा कि अब वे आगामी संबाद
38:22में प्रत्येक नरक के गूढ रहसियों को प्रकट करेंगे
38:26यहां रहसियमेई और ज्ञानवर्धक चर्चा यहां समाप्थ होती है और अब दर्शकों को यमलोक की उस अत्यंत रोमांचक और भयाद
38:34करेंगे