Experience the hidden story of the Vrishabha (Bull) Avatar of Lord Shiva in Episode 55 of the Shiva Purana series. After the epic Hanuman Avatar, Sage Suta reveals a time when the universe faced a unique crisis—the sons of Lord Vishnu themselves had become a threat to the three worlds. Witness the manifestation of Shiva as the divine Golden Bull to restore cosmic order. #ShivaPurana #VrishabhaAvatar #LordShiva #Vishnu #Mythology #Mahadev #Spiritual #Hinduism
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00:00भयानक युद्ध के पश्चात, जब भगवान विश्णू ने पाताल लोक में असुरों का सहार कर शांती स्थापित की, तब उन्होंने
00:08वहीं एक युवा, तेजस्वी राजकुमार के रूप में कुछ काल तक निवास किया।
00:13इस अलोकिक निवास के दौरान प्रभु के तेज से उत्पन हुए कई शक्तिशाली पुत्रों ने जन्म लिया, जिनके बल और
00:21पराक्रम की गूमश्टीनों लोकों में फैलने लगी।
00:24इन में से एक पुत्र, जिसकी शक्ती सूर्य के समान प्रजवलित थी, उसने देवताओं के लिए एक गहन चिंता का
00:33विशय उत्पन कर दिया।
00:35देवताओं के आगरह पर स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रह्मा अपने दिव्यध्यान के साथ इस नवजात शक्ती को नियंत्रित करने के
00:44उपाय खोजने लगे।
00:46ब्रहमा ने महर्शी नारत को आदेश दिया कि वे जाकर भगवान विश्णू के पुत्रों को यह बोध कराएं कि उनकी
00:54उत्पत्ती का उद्देश्य स्रिष्टी का कल्यान करना है न की विनाश।
00:59किन्तु उन युवा और अत्यंत शक्तिशाली पुत्रों ने अपने पिता के बल के अहंकार में नारत के उपदेशों को विनमर्ता
01:07से अस्विकार कर दिया।
01:09नारत मुनिक देवताओं के हित में कैलाश परवत की ओर प्रस्थान कर गए अपनी व्यथा श्री शिव और देवी पारवती
01:17को सुनाने के उद्देश से।
01:20कैलाश की बरफीली चोटियों पर जहां वायू भी शिव के नाम का जाप करती प्रतीत होती थी, नारत ने अपनी
01:27कथा का आरंभ किया।
01:29भगवान शिव कैलाश के स्वामी अपने शांत दिव्य स्वरूप में देवी पारवती के साथ विराजमान थे, उनके चहरे पर असीम
01:39करुणा का भाव था।
01:40जैसे ही नारत ने विश्णों के पुत्रों की उद्दंडता और आसन्न संकट का वर्णन किया, महादेव की शांत मुद्रा में
01:49एक सुक्ष्म परिवर्तन आया।
01:52भगवान शिव की दिव्य भेकुटी तन गई और उनके त्रिनेतर से निकली अगनी की एक तीवर ज्वाला ने तीनों लोकों
01:59को कमपा दिया।
02:01उस प्रचन ज्वाला से एक विक्राल अत्यन तेजस्वी पुरुष का उद्भव हुआ, जिसका तेज सूर्य से भी अधिक था, जो
02:10अंधकार को चीरने में सक्षम था।
02:12यह व्रिशब अवतार जो वीरभदर के नाम से भी जाने जाते हैं, महादेव के क्रोध का साक्षात रूप थे, जिनका
02:21उद्देश्य दुष्टों का सर्वनाश करना था।
02:24व्रिशब अवतार अपने भयंकर गर्जन के साथ पाताल लोग की ओर प्रस्थान कर गए, जहां विश्नु के पुत्र अपनी शक्तियों
02:33का दुरुप योग कर रहे थे।
02:35जैसे ही व्रिशब अवतार ने उन शक्तिशाली पुत्रों का सामना किया, युध का भीशन गर्जन हुआ, जिसने समस्त पाताल को
02:43हिला कर रख दिया।
02:45उन पुत्रों के गर्व और अहंकार को चकनाचूर करते हुए, व्रिशब अवतार ने अपनी अलोकिक शक्ति से उनका सहार करना
02:54आरंभ कर दिया।
02:56प्रत्यक प्रहार के साथ उन असुर समान पुत्रों के अहंकार का दमन हो रहा था, और उनकी अपार शक्ति क्षीन
03:03होती जा रही थी।
03:05अंतह व्रिशब अवतार के प्रचंड वेग और अलौकिक शक्ती के सामने वे सभी शक्तिशाली पुत्र धराशाई हो गये, उनकी शक्ती
03:14का अंत हो गया
03:16इस प्रकार व्रिशब अवतार ने न केवल देवताओं के भाय का निवारण किया, बलकि विश्णू के पुत्रों को भी उनकी
03:23मर्यादा का पाठ पढ़ाया, जिससे स्रिष्टी में पुनह संतुलन स्थापित हुआ
03:29यह व्रिशब अवतार की कथा महादेव के क्रोध और न्याय का प्रतीक है, जो हमें सिखाती है कि अधर्म का
03:37परिणाम सदैव विनाशकारी होता है
03:41विश्णू के पुत्र अपनी दिव्यशक्ती और असीम बल के साथ तीनों लोकों में अहंकार और अधर्म का जंडा फहराते हुए
03:49अपनी महत्वा कांख्षा की ज्वाला में जल उठे
03:53अपने पिता के ही समान पराक्रमी वे नरक के द्वार खोल कर स्वर्ग की ओर अग्रसर हुए मानो देवलोक उनके
04:01चर्णों की दासी हो
04:03उन्होंने देवताओं के वैभव को लूटा, गंधर्वों के संगीत को मौन कराया और असुरों के साथ मिलकर धर्म की पवित्र
04:11पुस्तक को जला डाला
04:14त्रिभुवन के शासक बनने की धुन में उन्होंने इंद्र के सिनहासन को चुनोती दी और देवताओं की सभा में उत्पात
04:21मचाया
04:23नारद मुने अपने वीना के साथ इस अनाचार के साक्षी बने और कैलास परवत की ओर ज्यान और न्याय की
04:30पुकार लेकर बढ़े
04:33उन्होंने शिव और पारवती से भेंट की और अपने वीना की तानों में त्रिभुवन के पतन का मार्मिक संगीत सुनाया
04:41पारवती अपने करुणामय हृदय से द्रवित होकर शिव से इस अधर्म के विनाश का आगरह करती हैं
04:48उनका मुखमंडल चिन्ता की रेखाओं से घेर जाता है
04:53शिव अपने त्रितियनेतर की अगनी से प्रकट होते हुए
04:57उन पुत्रों के अहंकार को भस्न करने का संकल्प लेते हैं
05:01जिन्होंने धर्म की मर्यादा को लांधा था
05:05भगवान शिव व्रिशब के रूप में अवतरित होने की तैयारी करते हैं
05:09धर्म के रक्षक के रूप में अधर्म के ध्वज को अपने शक्तिशाली सींगों से उखाडने है तू
05:16कैलास की भूमी काम्प उठती है
05:18जैसे ही महादेव अपने वृषब रूप में प्रकट होते हैं
05:22उनकी गर्जना से दिशाएं गूंज उठती है
05:26व्रिशब रूपी शिव अपनी प्रचंड शक्ती के साथ तीनों लोकों में विचरते हैं जहां भी अधर्म का साया है वहां
05:34उनका कोप बरसता है
05:37विश्नु के पुत्र जो स्वयं को अजे समझते थे व्रिशब की उग्र गर्जना और उनके सींगों के प्रहार से भैभीत
05:45हो जाते हैं
05:48विशब शिव का एक ही प्रहार उन अहंकारी पुत्रों के दिव्यास्त्रों को निश्प्रभावी कर देता है, उनकी शक्ती का मत
05:55चूर चूर हो जाता है
05:58उन्होंने परास्त वीरों की भांती, शिव के चर्णों में शरण मांगी, उनकी वाणी में पश्चाताप और भय का स्वर्था
06:06शिव करुना के सागर उनके अहंकार का दमन कर उन्हें उनकी करनी का बोध कराते हैं, पर जीवन का वर्दान
06:14भी देते हैं
06:16उनकी शक्ती को नियंतरित कर, शिव उन्हें नए उद्देश प्रदान करते हैं, ताकि वे धर्म के मार्ग पर चल कर
06:24स्रिष्टी की सेवा कर सकें
06:27त्रिभुवन में पुना शान्ती स्थापित होती है, धर्म के ध्वच्तले, देव, दानव और मानव सभी शिव की क्रिपा से प्रसन्न
06:35होते हैं
06:36इस प्रकार व्रिशब अवतार ने सिद्ध किया कि अहंकार चाहे कितना भी प्रबल क्यों न हो, अन्ता धर्म और शिव
06:44की शक्ती के समक्ष नत्मस तक होता ही है
06:48और महादेव अपने भक्तों पर क्रिपा बरसाते हुए, त्रिकाल दर्शी बन भविश्य के उन रहस्यों को देखते हैं, जो अभी
06:57भी अनकहे थे
06:59देवताओं के राजा इंद्र, जिनके मुख पर चिन्ता की गहरी लकी रे थी, उन्होंने ब्रह्मांड के रक्षक भगवान विश्नु के
07:07पुत्रों द्वारा मचाई जा रही तबाही को देखा, जो अब उनके लिए एक भयानक दुविधा बन गई थी
07:14विश्नु के पुत्र, अपनी असीमित शक्ती के मद में चूर, देवताओं के लोकों में अनैतिक्ता और विनाश का ऐसा तांडव
07:22मचा रहे थे, कि धर्म का संतुलन डग्मगा रहा था
07:27देवताओं के समक्ष एक विकट प्रश्न खड़ा था, अपने संरक्षक के ही संतानों से कैसे युद्ध करें, जिन्होंने उन्हें यह
07:35स्रिष्टी सौंपी थी, यह विचार ही उनके हृद्यों को व्याकुल कर रहा था
07:40नारद मुनिक जो तीनों लोकों में विचर्ण करते थे, उन्होंने देवताओं की इस निराशा को देखा और एक ऐसे समाधान
07:48की तलाश में निकल पड़े जो सबको स्विकार्य हो
07:53उन्होंने सोचा, यदि विश्णों के पुत्रों को रोकना है, तो हमें किसी ऐसी शक्ती का आहवान करना होगा जो उनसे
08:00भी परे हो, एक ऐसी शक्ती जो धर्म की रक्षा के लिए कुछ भी कर सके
08:06उनकी द्रिष्टी कैलाश परवतपर्टी की, जहां आदी योगी, भगवान शिव अपनी दिव्य शक्ती के साथ निवास करते थे, वही इस
08:15समस्या का एक मात्र हल हो सकते थे
08:19उन्होंने तुरंट अपना वीना उठाया और शिवस्तुती के स्वर छेड़ दिये, जिनकी गूंश संपून ब्रहमांड में फैल गई, आदिनाथ को
08:27सचेत करने के लिए
08:29कैलाश की शांत गुफा में ध्यानमग्न आदियोगी भगवान शिव जिनकी नीली कांती बरफीली चोटियों से भी अधिक शीतल थी, उन्होंने
08:39इस दिव्य संगीत को सुना
08:42उनकी जटाओं से गंगा की अविरल धारा बहती थी, और त्रिशूल उनके पास शांत पड़ा था, मानोवे स्रिष्टी के गूड
08:50रहस्यों में लीन हो
08:52जैसे ही नारद का संगीत तीवर हुआ, शिव की आखे धीरे-धीरे खुली, उनमें ब्रहमांड की अनंत शक्ती और एक
09:00गंभीर निर्णय की चाया थी
09:03उन्होंने नारद से देवताओं की व्यथा सुनी और क्षन भर के लिए उनके चहरे पर एक गंभीर भाव आया, मानोवे
09:11किसी महाभयंकर कार्य का भार उठाने को तैयार हो
09:15शिव ने कहा, हे नारद, देवताओं का यह संकट मैं समझता हूँ, और विश्नु के पुत्रों के अहंकार का नाश
09:22अवश्यमभावी है
09:25उन्होंने अपने त्रिशूई को उठाया, जो अंधकार को चीर देने वाली शक्ती का प्रतीक था, और कहा, मैं व्रिशब रूप
09:33धारण कर उन दुष्टों का सहार करूंगा जो धर्म को कलंकित कर रहे हैं
09:39एक दिव्य गर्जना हुई और भगवान शिव का रूप परिवर्तित होने लगा, उनका दिव्य शरीर विशाल व्रिशब का रूप ले
09:47रहा था, जो बल और क्रोध का अध्भुत संगम था
09:52विशालकाय व्रिशब के रूप में शिव की आखें लाल अंगारों सी देहक रही थी, और उनका गर्जन संपूर्ण ब्रहमांड को
09:59कमपा देने वाला था
10:02अपने त्रिशूल को धारन किये हुए, व्रिशब रूपी शिव कैलाश से उतरे, मानो विनाश के देव स्वय अपनी प्रचंड उर्जा
10:10के साथ मित्यूलोग की ओर बढ़ रहे हूँ
10:14देवताओं ने आशा की द्रिश्टी से उनकी ओर देखा, क्योंकि शिव के इस उग्र अवतार में उन्हें अपने रक्षक के
10:21नियाय का दर्शन हो रहा था
10:24ब्रहमांड के हर कोने में यह संदेश फैल गया कि शिव व्रिशब रूप में अब विश्णु के अनियंतरित पुत्रों का
10:31सहार करने के लिए आ रहे हैं
10:34अब देवताओं को अपने रक्षक से आशा थी और साथ ही एक भयानक युद्ध की आशंका भी जिसमें धर्म की
10:42अंतिम विजय सुनिश्चित होनी थी
10:46देवताओं के समूह ने जिनके हृदय में भय और आशा की मिश्रित भावनाए थी कैलाश परवत की ओर प्रस्थान किया
10:54जहां स्वय भगवान शिव निवास करते थे
10:57ब्रहमा जो सृष्टी के रच्चिता थे ने विनमर्ता से देवाधिदेव महादेव से प्रार्थना की हे त्रिकालदर्शी ते कैलास्वासी आपकी शरण
11:07में हम सब आये हैं
11:10भगवान विश्णू के पुत्रों के अनियंत्रित कोप से त्राहित्राही कर रहे जगत को बचाएं अन्यथा यह विनाशकारी कृत्य समस्त ब्रहमांड
11:19में असंतुलन फैला देगा
11:21यह केवल हमारी क्षुद्र बुद्धी का प्रश्ण नहीं अपितु देवों और असुरों के मध्य सदियों से चले आ रहे शांतिपून
11:29सहस्तित्व का भी है प्रभु
11:32हमारा आग्रह है कि आप कोई ऐसा मार्ग दिखाएं जिससे विष्णु के पुत्रों का अंथो परंतु देवताओं और विष्णु के
11:41मध्य कोई स्थाई वैर्भाव उत्पन्न नहो
11:45महादेव ने अपनी दिव्य चेतना में समस्या की जटिलता को समझते हुए एक क्षण के लिए ध्यान की गहराईयों में
11:52गोता लगाया
11:53उनके त्रिनेत्र से निकली विचार किर्णों ने ब्रहमांड के रहसियों को भेदते हुए एक अद्भुत समाधान की ओर संकेत किया
12:03भगवान शिव ने धीरे से अपना ध्यान भंग किया और उनकी वाणी ने कैलाश की शान्त हवाओं में गूंचते हुए
12:10कहा चिंता न करें हे विधाता
12:13मैं एक ऐसा स्वरूप धारन करूंगा जो न तो पूर्णत है शिव होगा नहीं पूर्णत है कोई अन्य अपितु एक
12:21अद्भुत अनुठा अवतार
12:22यह अवतार जिसे व्रिशब अवतार कहा जाएगा विष्णू के पुत्रों के अहंकार को भंग करने के लिए परियाप्त शक्तिशाली होगा
12:33किन्तु यह अवतार अपनी प्रकृती से ही विश्नु के प्रती सम्मान बनाए रखेगा, जिससे किसी प्रकार के स्थाई संधर्ष की
12:41संभावना नहीं रहेगी
12:44इसके पश्चात महादेव ने कैलाश की बरफीली चोटियों पर खड़े होकर अपने भक्त नंदी को आदेश दिया, जाओ, और उस
12:52पवित्र बैल का आवाहन करो
12:55वह पवित्र आत्मा जो सदैव मेरे समीप रहती है, इस कार्य हेटु मेरा वाहन और मेरा ही एक अंश बनेगी
13:04नंदी जो शिव का परम्प्रिय पार्षद और वाहन है, अपने स्वामी के आदेश को शिरोधार्य कर कैलाश की शांत वादियों
13:12में विलीन हो गया
13:14कुछ ही क्षणों में कैलाश की पवित्र भूमी पर एक अभूत पूर्व द्रिश प्रकट हुआ, जहां शिव का व्रिशब अवतार
13:22और नंदी एकाकार होने लगे
13:25वह दिव्य बैल जो अब शिव का ही स्वरूप था, प्रचंड उर्जा और अदमय बल से परिपूर्ण होकर युद्ध भूमी
13:33की ओर अग्रसर हुआ
13:35उसके पदक्षेपों से प्रिथवी काप उठी और उसकी गर्जना ने दिशाओं को चीर दिया, यह घोशना करते हुए की न्याय
13:43का समया गया है
13:46ब्रह्मा और अन्य देवताओं ने संतोष की सांस ली, यह जानते हुए की महादेव ने एक ऐसा मार्ग प्रशस्त किया
13:54है जो स्रिश्टी के संतुलन को बनाये रखेगा
13:58व्रिशब अवतार न्याय और धर्म के प्रतीक के रूप में अब विश्णु के पुत्रों के अहंकार और दुराचार का अंत
14:05करने के लिए तयार था
14:08कैलाश के सर्वोच शिखर पर विराजमान महादेव ने जब विश्णु पुत्रों द्वारा मचाये गए हाहाकार को देखा
14:15तो उनकी आखों में धर्म की रक्षा के लिए एक नई ज्वाला प्रजवलित हो उठी
14:21माता पारवती ने व्याकुल होकर शिव की ओर देखा और ब्रहमान्ड के संतुलन को बनाय रखने के लिए उनसे उचित
14:29हस्तक्षेप करने का आग्रह किया
14:32स्रिष्टी के संहारत ने शांत भाव से अपनी आखे मूंद ली और अपनी अनन्त उर्जा को एक नए शक्तिशाली अवतार
14:40में केंद्रित करने लगे
14:43अचानक शिव के शरीर से एक दिव्य सुनहरा प्रकाश फूट पड़ा जिसने पूरे कैलाश परवत को सूर्य की भांती आलोकित
14:51कर दिया
14:52महादेव की माया से उनकी आकरिती बदलने लगी और एक विशालकाय तेजस्वी बैल की छाया उनके चारों और निर्मित होने
15:01लगी
15:02देखते ही देखते शिव का कोमल स्वरूप एक अत्यंत शक्तिशाली और स्वर्ण कांती वाले व्रिशब के रूप में परिवर्तित होने
15:10लगा
15:12व्रिशब अवतार की मान स्पेशियां फड़कने लगी और उनकी दिव्यत वचा पर स्वर्ण की ऐसी चमक उभरी जैसी पहले कभी
15:20नहीं देखी गई थी
15:22उनके माथे पर स्थित शिव का तीसरा नेत्र व्रिशब के मस्तक पर एक प्रजवलित अगनिपुंच की भानती चमकने लगा
15:31व्रिशब के विशाल सींग आकाश की उँचाईयों को चूने लगे मानोवे ब्रहमांड के स्तंभों जो अधर्म का नाश करने के
15:39लिए तयार है
15:41जब व्रिशब अवतार ने अपने खुरों से कैलाश की भूमी को स्पर्श किया तो संपूर्ण प्रिथवी उनके प्रभाव से दसो
15:49दिशाएं धर्रा उठी
15:51उनकी गर्दन में लटके स्वर्णिन घंटे जब बजने लगे तो उनकी ध्वनी से समस्थ ब्रहमांड में न्याय और धर्म का
15:59शंकनाद सुनाई देने लगा
16:01व्रिशब रूपी शिव का क्रोध इतना प्रचंड था कि उनके नथुनों से निकलने वाली श्वास भयंकर तूफान की तरह उमडने
16:09लगी
16:11देवर्शी नारद और अन्य देवताओं ने स्वर्ग लोग से शिव के इस अत्यंत दुरलब और शक्तिशाली अवतार के दर्शन किये
16:19और नत्मस्तक हो गए
16:21ब्रह्मा जी ने अपने सत्यलोग से व्रिशब अवतार की प्रचंड शक्ति को महसूस किया और जान लिया कि अब पापियों
16:29का अंत निकट है
16:32व्रिशब की पीठ पर अंकित दिव्यचिन उसकी अजेता का प्रमान दे रहे थे जो साक्षात शिव की शक्ति का प्रतीक
16:39थे
16:41शिव का यह अवतार न केवल विनाशकारी था बलकि इसमें न्याय और करुणा का एक अध्भुत संतुलन भी स्पष्ट दिखाई
16:49दे रहा था
16:50जब व्रिशब ने हुंकार भरी तो उस गर्जना ने समुद्र के जल को उद्वेलित कर दिया और परवतों को जड़
16:57से हिला दिया
16:59शिव की चेतना अब पूरी तरह से इस व्रिशब में समाहित हो चुकी थी जो अधर्म की ओर बढ़ने के
17:06लिए तयार था
17:08व्रिशब अवतार ने आकाश मार्ग से पाताल लोक और प्रिथवी की ओर प्रस्थान किया जहां विश्णु पुत्रों का आतंक व्याप्त
17:16था
17:17अंतर स्वर्णमे कांती से दीप्तिमान व्रिशब अवतार युद्धक्षेत्र के समीप पहुँचा और वहां उपस्थित हर प्राणी की सांसे थम गई
17:28जैसे ही व्रिशब अवतार ने पाताल लोक की ओर प्रस्थान किया प्रिथवी के गर्भ से एक ऐसी गर्जना उठी जिसने
17:36समस्थ लोकों को कमपा दिया
17:38पाताल की गहरायों में जहां अंधकार का सामराज्य था वह गर्जना मृत्यु का संदेश लेकर पहुँची
17:46अधर्म परायन वे विश्नु पुत्र जो अपनी आशुरी शक्ती पर घमंड करते थे उस गर्जना से कापने लगे
17:55व्रिशब के आगमन ने पाताल की शांती भंग कर दी जो अब तक अधर्मियों का सुरक्षित आश्रे स्थल बन गया
18:02था
18:04भगवान शिव बैल रूप में अपने प्रचंड वेक से उन दुष्ट राजकुमारों की ओर बढ़े मानो प्रलै का तूफान आ
18:11गया हो
18:13उनकी चाल में एक ऐसी शक्ती थी कि धर्ती थर्रा उठी और पाताल के शिलाखंड भी कमपाने लगे
18:21विश्णू के पुत्रों ने पहली बार मृत्यू को इतने निकट से देखा उनके अहंकार का पतन आरंभ हो चुका था
18:29विशब ने अपनी त्रिशूल सद्रिश सींगों से उन अधर्मी आत्माओं को चुनोती दी जो धर्म से विमुख हो चुके थे
18:38एक भयंकर गर्जना के साथ विशब अवतार ने अपना प्रथम प्रहार किया जो सीधे उस राजकुमार पर पड़ा जिसने सबसे
18:46अधिक अधर्म किया था
18:49जैसे ही पहला राजकुमार धराशाई हुआ पाताल की दीवारों पर भयानक छायाए नाचने लगी जो आने वाले सहार का संकेट
18:58दे रही थी
18:59अन्य राजकुमारों ने भागने का प्रयास किया परंतु विशब की गती के आगे उनकी कोई चालकारगर सिध्ध न हुई
19:08भगवान शिव के विशब रूप ने एक-एक करके उन सभी को अपने दिव्यकोप का पात्र बनाया जो धर्म की
19:16राह से भटक गए थे
19:18उनकी मृत्यू के साथ ही पाताल लोक में अधर्म का वह सामराज जढहने लगा जिसे उन्होंने अपने अहंकार से स्थापित
19:26किया था
19:28विशब अवतार की विजय ने यह संदेश दिया कि अधर्म कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो अन्ता उसका विनाश निश्चित
19:36है
19:37उसके चर्णों में पड़े हुए विश्णु पुत्र अपने पूर्व गौरव को खो चुके थे और केवल पतित आत्माओं के रूप
19:45में शेश थे
19:47पाताल लोक के निवासियों ने जो भयभीत थे पहली बार सत्य के देव का ऐसा विक्राल रूप देखा
19:55व्रिशब की गर्जना अब शान्थ हो चुकी थी परन्तु उसका प्रभाव पाताल के कणकण में व्याप्थ हो गया था
20:03भगवान शिव के इस अवतार ने अधर्मियों को उनके कर्मों का फल चखा दिया धर्म की विजय को सुनिश्चित किया
20:10इस प्रकार व्रिशब अवतार ने पाताल लोक में धर्म की पुनरस्था अपना की और अन्याई शास्कों का अंत किया
20:19और उन सभी ने जिन्होंने यह अध्भुत लीला देखी भगवान शिव के शक्ती और न्याय के स्वरूप का स्मरण किया
20:28विश्णु के हंकारी पुत्रों ने अपने दिव्य अस्त्रों को हवा में लहराते हुए भगवान शिव के व्रिशब अवतार पर चौतरफा
20:36आक्रमन शुरू कर दिया
20:38व्रिशब रूपी महादेव ने अपने विशाल खुरों को धर्ती पर पठका जिससे पाताल लोग की भूमी थर्थरा उठी और चारों
20:47दिशाओं में धूल का बवंदर उठ खड़ा हुआ
20:50सबसे बड़े राजकुमार ने अपने धनुष की प्रत्यंचा को कान तक खीच कर व्रिशब की ओर एक प्रचंड अगनिबान छोड़ा
20:58जो आकाश को चीरता हुआ आगे बढ़ा
21:02उस विनाशकारी अगनिबान को आते देख व्रिशब ने बस अपने सिर को एक ओर जुकाया और अपने दिव्यस्वन सींगों से
21:10उसे हवा में ही नश्ट कर दिया
21:13दूसरे राजकुमार ने अपनी जादूई गदा हवा में घुमाते हुए आसमान से कड़कती हुई बिजली की बौचार व्रिशब के उपर
21:21गिरा दी
21:23महादेव के उस बैल अवतार ने एक ऐसी भीशन हुंकार भरी की उस ध्वनी तरंग से बिजली के सारे प्रहार
21:30बीच में ही छिन्नभिन हो गए
21:33क्रोध से तम्तमाए हुए सभी राजकुमारों ने एक साथ मिलकर व्रिशब को चारों ओर से घेर लिया और अपने जादूई
21:41अस्त्रों का चक्रव्यू बना दिया
21:44व्रिशब के मस्तत पर स्थित महादेव का तीसरा नेत्र धीरे से खुला जिससे निकलने वाले तेज ने राजकुमारों के जादूई
21:52घेरे को पल भर में राख कर दिया
21:55अपनी हार से बौक लाए राजकुमारों ने मायावी विद्या का उप्योग कर हवा में हजारों उर्ते हुए भालों की एक
22:02सेना तयार की
22:04व्रिशब ने एक कदम आगे बढ़ाया और उनकी गती से उत्पन वायू के प्रचंड वेग ने उन हजारों मायावी भालों
22:12को तिनके की तरह बिखेर दिया
22:16राजकुमारों ने खुद को बचाने के लिए एक वज़र के समान मजबूत धाल का निर्मान किया लेकिन वरिशब के एक
22:23ही प्रहार ने उसे चकना चूर कर दिया
22:26हताश होकर उन्होंने व्रिशब को बांधने के लिए नागपाश और सोने की दैविय जंजीरों को उनकी ओर फेंका जो उनके
22:34पैरों से लिपट गई
22:37लेकिन महादेव की अनंत शक्ती के सामने वे सोने की मजबूत जंजीरें सूत के धागे की तरहे तूट कर बिखर
22:44गई
22:45तब राजकुमारों ने अपनी समस्थ शक्तियों को मिला कर एक सूर्य के समान चमकता हुआ महास्त्र हवा में जागरत किया
22:53उस धधकते हुए महास्त्र को व्रिशब ने अपने कूबड पर जेल लिया और उसकी सारी विनाशकारी उर्जा को अपने भीतर
23:02समाहित कर लिया
23:04अपने सबसे शक्तिशाली अस्त्र को विफल होते देख उन अहंकारी राजकुमारों का सारा घमंड और आत्म विश्वास पल भर में
23:12तूट गया
23:14व्रिशब ने हवा में एक उची छलांग लगाई जिससे उनके विशाल शरीर की छाया पूरे युद्धक शेत्र पर मंदराने लगी
23:23धर्ती पर वापस आते ही उन्होंने राजकुमारों के रथों और उनके घमंड के प्रतीकों को अपने पैरों तले कुचलना शुरू
23:31कर दिया
23:33परास्थ होकर वे राजकुमार भूमी पर गिर पड़े और उनकी आखे महादेव के इस बैल रूप की अलोकिक शक्ती को
23:40देखकर विस्मय से भर गई
23:43इस प्रकार व्रिशब अवतार ने अपनी स्थिर्ता और अनंत बल से धर्म की रक्षा की और ब्रहमांड को यह संदेश
23:51दिया कि अहंकार का अंत निश्चित है
23:55शीरसागर की अनंत गहरायों में भगवान विश्नु शेशनाग की शयापर योग निद्रा में लीन थे जबकी ब्रहमांड में एक भयंकर
24:04विनाश लीला चल रही थी
24:06तभी महादेव के व्रिशब अवतार की प्रचंड और ब्रहमांड कमपाने वाली हुंकार से वैकुंठ लोग के स्तंभिल उठे
24:15भगवान विश्नु के वे उद्दंड पुत्र जिन्होंने स्रिष्टी में हाहाकार मचा रखा था इस दिव्य बैल के पैरों तले कुछ
24:23ले जा रहे थे
24:25युद्ध भूमी से उठने वाली विनाशकारी तरंगें क्षीर सागर के शांत जल को अशांत करते हुए सीधे नारायन के हृदय
24:33तक पहुची
24:34स्रिष्टी में बढ़ते धर्म के पतन और अपने पुत्रों के आर्थनाद को सुनकर जगतपालक भगवान विश्णू की दिव्य आखें धीरे
24:42-धीरे खुलने लगी
24:45अपनी योग निद्रा से जागते ही नारायन का मुख मंडल भ्रम और अपने पुत्रों के प्रती गहरी चिंता से घिर
24:52गया
24:53उन्होंने अपनी दिव्य द्रिष्टी को जागरत किया और ब्रहमांड के उसकोने की ओर देखा जहां महाविनाश का तांडव चल रहा
25:01था
25:02नारायन ने देखा कि कैसे महादेव का वह रुद्र रूपी बैल उनके शक्तिशाली पुत्रों के अहंकार को पल भर में
25:09धूल में मिला रहा था
25:12महान माया के प्रभाव में बंधे होने के कारण अपने पुत्रों का यह हश्र देखकर भगवान विश्णू के हरिदय में
25:19तीवर क्रोध की ज्वाला भड़क उठी
25:22क्रोधित होकर नारायन ने अपने दाहिने हाथ में अत्यंत संहारक सुदर्शन चक्र का आहवान किया जो ब्रह्मांडी उर्जा से चमकने
25:31लगा
25:32अपने दिव्यशस्त्रों से सुसज्जित होकर भगवान विश्णू इस भयानक युद्ध को रोकने के लिए वैकुंठ धाम से प्रस्थान करने लगे
25:42नारायन अपने महाशक्तिशाली वाहन पक्षीराज गरूर पर सवार हुए जो सोने के समान पंखों को फैला कर गगन मार्ग से
25:50नीचे उत्रे
25:52जैसे ही गरूर युद्ध भूमी के उपर पहुँचे उनके विशाल पंखों की वायू से वहां की धूल और धुआ छटने
26:00लगा
26:01महादेव के अवतार दिव्यबैल व्रिशब ने अपना सिर उठाया और अपनी तीन लाल आखों से आते हुए नारायन की ओर
26:09देखा
26:11भगवान विश्णु ने अत्यंत गंभीर स्वर में व्रिशब को पुकारा और अपने पुत्रों का वद करने का कारण जानना चाहा
26:19उत्तर में व्रिशब ने एक ऐसी गर्जना की जिससे दसों दिशाए गूंज उठीन मानोवे नारायन को उनके पुत्रों के पापों
26:28का स्मरण करा रहे हुँ
26:30माया के वशीभूत होकर नारायन ने सत्य को स्वीकार नहीं किया और अपने अस्त्रशस्त्रों को संधान के लिए तैयार कर
26:38लिया
26:40पालनकर्ता और संहारक के बीच इस संभावित महासंग्राम को देखकर स्वर्ग में बैठे देवतागन और रिशिमुनी भाय से थर्थर कामपने
26:48लगे
26:50व्रिशब के भाल पर स्थित महादेव का तीसरा नेत्र धीरे से खुला जिससे निकलने वाले ज्ञान प्रकाश ने विश्नु की
26:57आखों पर पड़े मोह के परदे को जग जोरा
27:00अब दोनों महाशक्तिया आमने सामने खड़ी थी और पूरा ब्रहमांड सांसे रोक कर इस अत्यंत तनावपूर्ण क्षण के परिणाम की
27:10प्रतीक्षा कर रहा था
27:12भगवान शिव व्रिशब रूप में अपने दिव्यत रिशूल को उठा कर अपने नित्रों से धर्म की ज्वाला प्रजवलित करते हुए
27:20विश्नु के सम्मुख प्रकट हुए
27:23विश्नु अपने मोह के आवर्ण को भेदते हुए अपने पुत्रों के अधर्म की भयावता को देखकर एक क्षण के लिए
27:30स्तब्ध रह गए
27:32शिव ने कहा हे नारायन तुम्हारे पुत्रों ने धर्म की सीमाओं का अतिक्रमण कर अपनी वासनाओं के दास बनकर धर्ती
27:41को पाप से भर दिया है
27:43विश्णु ने अपने पुत्रों के कुकृत्यों की श्रिंखला को याद किया, उनकी स्वार्थ प्रायंता और प्रजापर किये गए अत्याचारों को
27:52हृदय में महसूस किया
27:54उन्होंने देखा की कैसे वे धर्म के मार्क से भटक गए थे और उनके कारियों ने देवों और मनुश्यों दोनों
28:01को भैभीत कर दिया था
28:04विश्णु ने अपने पुत्रों की इंद्रियत रिप्ती को सत्य का आवर्ण समझा था और उनकी आसक्ती ने उनकी द्रिष्टी को
28:11धुमिल कर दिया था
28:13यह स्वीकार करते हुए कि वे स्वयन इस पतन के लिए आशिक रूप से जिम्मेदार थे विश्णु का हृदय पश्चाताप
28:21की अगनी से जल उठा
28:24उन्होंने शिव के व्रिशब हरूप की ओर देखा जहा धर्म की अविरल शक्ती और न्याय का अवतार प्रकट था
28:32शिव ने कहा तुम्हारे पुत्रों का अंत आवश्चक है क्योंकि वे ही अधर्म के बीज हैं जो स्रिष्टी को विनष्ट
28:39कर सकते हैं
28:41विश्णू ने गहन शांती के साथ सिरहिलाया यह स्विकार करते हुए कि देवों के अपने पुत्रों के प्रती आसक्ती पर
28:49नियंत्रन रखना सर्वोप्री है
28:53उन्होंने कहा हे महादेव मैं अब सत्य को देखता हूँ और मुझे आपकी क्रियाओ को स्विकार है क्योंकि यह स्रिष्टी
29:01के कल्यान के लिए ही है
29:04विष्णू ने शिव से प्रार्थना की कीवे उनके पुत्रों को नश्ट करें और इस प्रकार धर्म की पुनर्स्थापना करें जो
29:11उनके आसक्ती के कारण विस्मृत हो गया था
29:15शिव ने सहमती में गर्जना की जो ब्रहमांड में गूँज उठी यह घोशना करते हुए कि न्याय का पहिया फिर
29:23से घूमना शुरू हो गया है
29:25इस प्रकार विश्णू ने अपनी आसक्ती को त्याग दिया यह समझते हुए कि कभी कभी स्रिष्टी के संतुलन के लिए
29:33प्रीजनों का त्याग भी आवश्यक होता है
29:37शिव के विश्णू के स्विकारोक्ती को स्विकार किया और उन्होंने उस अधर्म को समाप्त करने की ओर कदम बढ़ाया जिसने
29:46धर्ती को अंधकार में डुबो दिया था
29:49यह विश्णू के लिए एक कठिन पाठ था कि पित्रि मोह कितना भी गहरा क्यों न हो धर्म की रक्षा
29:56सर्वोप्री है
29:58शिव ने धर्म के रक्षक के रूप में अब उस अंधकार को दूर करने की अपनी भूमी का निभाई जो
30:05विश्णू के मोह के कारण पनप गया था
30:09विश्णू ने कृतग्यता से सिर जुकाया और महादेव के विशब रूप के प्रती अपना गहरा सम्मान व्यक्त किया
30:17इस प्रकार धर्म की विजय हुई क्योंकि एक पिता ने अपने मोह पर विजय प्राप्त की और देवों के राजा
30:24ने अधर्म का नाश किया
30:27शांती की पुनरस्थापना के पश्चात विशब रूपी भगवान शिव ने एक गहन ध्यान में लीन होकर स्वयं को ब्रहमांड के
30:35तानेबाने में विलीन कर लिया
30:36जैसे कोई परवत शिखर मेगों में उज़ल हो जाता है
30:41रिशी सूट ने उस अनुपम अवतार का स्मरण करते हुए समझाया कि कैसे विशब रूप ने न केवल अन्याई पुत्रों
30:49का सहार किया बलकि स्रिष्टी के नियमों को भी सुद्रिड किया
30:53उन्होंने कहा यह अवतार हमें सिखाता है कि सत्ता के उच्चतम शिखर पर भी धर्म और व्यवस्था का पालन व्यक्तिगत
31:02संबंधों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है
31:06भगवान विश्णु जिन्होंने अपने पुत्रों के अहंकार को देखा था अब अपने प्रभू के इस निर्णय को स्विकार करते हुए
31:13अत्यंत गंभीर मुद्रा में दिखाई दिये
31:17उनकी आखों में पुत्र मोह का प्रतिबिंभ होते हुए भी विधिक संप्रभुता के प्रती उनकी निष्ठा अतल थी जैसे किसी
31:25महान राजा का अपने न्याय के प्रती समर्पन
31:29ब्रहमा जी स्रिष्टी के रच्चिता इस वृत्तांत के साक्षी बनकर ब्रहमांडिय संतुलन के इस गहन सत्य को समझते हुए मौन
31:38धारण किये रहे
31:40नारद मुनिक जो ग्यान और संगीत के वाहक हैं उन्होंने इस घटना के गहरे अर्थ को समझा कि कैसे दिव्य
31:47शक्तिया भी नियमों के अधीन है
31:51यह व्रिशब अवतार स्वयं के अहंकार पर विजय पाने और सत्य के मार्ग पर अडिग रहने का शाश्वत संदेश देता
31:59है जो किसी भी भौतिक या पारिवारिक बंधन से परे है
32:04भगवान शिव की लीलाएं केवल विनाशकारी नहीं अपितू वे स्रिष्टी को उसके सही मार्ग पर बनाये रखने वाली एक अद्रिश
32:12शक्ति का स्वरूप है
32:15इस अवतार का गहरा तात्पर्य यह है कि धर्म ही परम सत्य है और देवत्व भी अपने कर्मों के लिए
32:22उत्तरदाई है जैसा कि स्वयन शिव ने प्रदर्शित किया
32:26यह पाठ न केवल असुरों के लिए अपितू समस्थ देवगणों और प्राणियों के लिए भी था कि वे अपनी शक्ती
32:34का दुरूपयोग न करें
32:36भगवान शिव अब अपने अगले अवतरण की ओर अग्रसर होंगे जो स्रिष्टी के नित्य प्रवाह और ईश्वर की असीम लिलाओं
32:44का प्रतीक है
32:46हर अवतार एक विशिष्ट उद्देश की पूर्ती करता है जैसे किसी महान नदी का समुद्र में विलीन होने से पूर्व
32:54विभिन घाटियों से होकर बहना
32:57विशब अवतार का यह अध्याय हमें स्मरण कराता है कि सत्यक न्याय और धर्म ही शाश्वत मूल्य हैं जिनके आगे
33:06सब गौण है
33:08भगवान शिव की यह लीला एक ऐसे शिक्षक की भांती है जो कठोर्ता से भी श्रिष्ठतम ज्यान प्रदान करता है
33:16ताकि ब्रहमांड का संतुलन बना रहे
33:19यह सत्यकी स्वय देव भी नियमों के बंधन में हैं समस्त प्राणियों को विनमर्ता और उत्तरदायत्व का पाठ सिखाता है
33:29व्रिषब अवतार की यह कथा आने वाले समय में भगवान शिव के उन अन्य महत्वपून अवतरनों की प्रिष्ठ भूमी तैयार
33:37करती है जो धर्म की पुनरस्थापना के लिए होंगे
33:41जैसे एक कुशल माली कटिफ्टी डालियों को छांट कर व्रिक्ष को नया जीवन देता है वैसे ही शिव अपने अवतारों
33:49से स्रिष्टी का काया कल्प करते हैं
33:52अंतर व्रिषब अवतार हमें सिखाता है कि व्यक्तिगत इच्छाओं पर ब्रह्मांडिय व्यवस्था को प्राथमिक्ता देना ही सक्चा देवत्व है
34:02और इस प्रकार व्रिषब अवतार की लीला समाप्थ होती है
34:06हमें इश्वरिय न्याय और कर्तव्य की सर्वोच्छता का गहन बोध कराते हुए।
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