गरुड़ पुराण के इस नए और रहस्यमय एपिसोड में, भगवान विष्णु पक्षीराज गरुड़ को मुक्ति के अंतिम रहस्य से परिचित कराते हैं। जब आत्मा स्वर्ग और नरक के चक्र से भी ऊपर उठकर परम स्वतंत्रता की ओर बढ़ती है, तब वह किन बाधाओं को पार करती है? माया का बंधन क्या है और कैसे आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान कर इस मोहजाल को तोड़ सकती है? इस एपिसोड में जानें ज्ञान योग, भक्ति योग और निष्काम कर्म योग के उन गूढ़ रहस्यों को, जो आत्मा को जन्म-मृत्यु के इस अनंत चक्रव्यूह से निकालकर परम मोक्ष की ओर ले जाते हैं। क्या है जीवात्मा का अंतिम लक्ष्य? देखिए और समझिए आत्मज्ञान की इस अद्भुत यात्रा को! #गरुड़पुराण #मोक्ष #माया #कर्मयोग #ज्ञानयोग #भक्तियोग #आत्मा #पुनर्जन्म #विष्णु #गरुड़ #अध्यात्म #धार्मिककथा #हिन्दूधर्म #रहस्य #यूट्यूबसीरीज #भारतीयसंस्कृति #जीवनकासत्य
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00:00भगवान विश्णु जिनकी नीली काया से ब्रहमांडिय तेज प्रवाहित हो रहा था, गरूर से कहते हैं कि निशकाम कर्मोक्ष के
00:08पत पर मात्र प्रथम सोपान है न की अंतिन गंतव्य
00:12वे समझाते हैं कि कर्मों का फल अंत्त पुनर्जन्म के चक्र से बांधे रखता है, चाहे वे कितने भी पुन्यमय
00:20क्यों न हो, जब तक आत्मा को स्वयंका वास्तविक स्वरूप ज्यात न हो
00:25गरुड उनके शब्दों की गहराई से मंत्र मुग्ध होकर अधिक उचसुकता से पूछते हैं कि आत्मा इस शाश्वत चक्र से
00:33पूर्णता मुख्ध कैसे हो सकती है, जो स्वर्ग के सुखों को भी क्षणभंबुर बनाता है
00:40तब भगवान विश्णु एक गहन मुस्कान के साथ माया के रहस्य को उद्घाटित करना आरंभ करते हैं, वह शक्ती जो
00:48इस संपूर्ण जगत को एक भ्रमजाल में बांधे रखती है
00:53अद्रिश्य धागों से बनी एक सुक्ष्म, चमकदार चादर की तरह माया समस्त स्रिष्टी पर बिछी है, जो सत्य को छिपाकर
01:01शन्भंगुर वस्तूओं को शाश्वत रूप में प्रस्तुत करती है
01:06वे बताते हैं कि माया कैसे इच्छाओं, मोह और अहंकार के माध्यम से आत्मा को इस नश्वर संसार के प्रती
01:14आसक्त कर देती है, उसे अपने वास्तविक दिव्य स्वरूप से दूर रखती है
01:20गरूर उनके शब्दों से चकित होकर अपने स्वर्णिम पंखों को थोड़ा समयकते हैं, उनके चहरे पर माया की अविश्वस्निय शक्ती
01:29को समझने की गहरी चिन्ता और विस्मय जलकता है
01:34भगवान विश्नो आगे समझाते हैं कि माया के इस गहन जाल को भेदने का पहला कदम विवेख है, सत्य और
01:41असत्य, शाश्वत और नश्वर के बीच स्पष्ट भेड करने की ख्षमता
01:47वे कहते हैं कि विवेख के साथ वैराग्य आवश्चक है, संसार के क्षनिक सुखों और दुखों से अनासक्ती जो आत्मा
01:55को माया की पकड़ से मुक्त करती है
01:59एक आत्मा को माया के जटेल जाल में फंसे हुए दिखाया गया है, जो सांसारिक आकर्शनों के चमकडार धागों से
02:07बंधा हुआ है, पर मुक्ती के लिए छटपटा रहा है
02:12भगवान विश्नु बताते हैं कि वास्तविक आत्मज्यान स्वयं को शरीर, मन या बुद्धी से अलग शाश्वत ब्रह्मा का एक अविभाज
02:20अंश समझने में नहित है
02:23गरुड उनकी आखों में एक नई चमक के साथ, इन गेहन दार्शनिक सत्यों को आत्म साथ करने का प्रयास करते
02:31हुए एका ग्रचित होकर देखते हैं
02:35भगवान विश्णु आत्मा को एक छोटी लौ के समान बताते हैं, जो पर्मात्मा नामक विशाल, शाश्वत अगनी का ही एक
02:43अंश है, और दोनों अविभाज रूप से जुड़े हुए हैं
02:48एक छोटी सी सुनहरी लौ जो ब्रह्मान दिय अगनी के एक विशाल सागर से अलग हुई है, वापस उसी में
02:56विलीन होने के लिए उचसुक्ता से जूल रही है, मुक्ती की प्यास दर्शाती है
03:02वे कहते हैं कि इस सर्वोच सत्य को जानने का मार्ग ज्यान योग है, जो चिंतन, ध्यान और शास्त्र अध्ययन
03:10के माध्यम से आत्मसाक्षातकार की ओर ले जाता है
03:15वे अंतरद्रिष्टी और गेहन ध्यान के महत्व पर जोर देते हैं, जिससे व्यक्ती अपने भीतर ही उस परम सत्य को
03:22खोज सके, जो सभी भ्रमों से परे हैं
03:26गरुर के चहरे पर अब केवल जिग्यासा नहीं, बलकि एक गहरी समझ और आध्यात्मिक शान्ती की जलत दिखाई देती है,
03:34जैसे उन्होंने मुक्ती का गुप्ट द्वार ढूंड लिया हो
03:39भगवान विष्णू जीवन मुक्त की स्थिती का वर्णन करते हैं, वह दुरलब आत्मा जो शरीर में रहते हुए भी माया
03:46के बंधन से मुक्त हो चुकी है, परम ज्यान में स्थिर
03:50वे परम मोक्ष की अंतिन स्थिती का वर्णन करते हैं, पुनर्जन्म के चक्र से पूर्ण स्वतंत्रता और परम सत्ता के
03:58साथ आत्मा का अविच्छिन्न मिलन
04:01भगवान विश्नु अपने शब्दों को समाप्त करते हुए कहते हैं कि यह मार्ग दुशकर अवश्य है, किन्तु यह आत्मा का
04:09परम लक्ष है, जो वास्तविक स्वतंत्रता और अमर्थ्व प्रदान करता है
04:15भगवान विश्णु मुस्कुराते हुए कहते हैं कि परम ज्यान के इस मार्ग को समझने के लिए तुम्हें सर्वप्रथम उस माया
04:23के गूढ रहस्य को जानना होगा जो आत्मा को अपने ही सत्य से विमुख करती है
04:29वे आगे बताते हैं कि माया कोई ठोस वस्तु नहीं अपितु एक ऐसी भ्रामक शक्ती है जो असत्य को सत्य
04:37और क्षण भंबुर को शाश्वत प्रतीत कराती है जैसे रेगिस्तान में म्रिगत्रिश्ना
04:43माया के प्रभाव में आत्मा स्वयन को इस शरीर तक सीमित मान लेती है मैं और मेरा के जूठे बंधनों
04:51में उलचकर अपने असीन स्वरूप को भूल जाती है
04:55यह अहमकार यह मैंपन ही माया का पहला और सबसे शक्तिशाली बंधन है जो आत्मा को उसके शुद्ध चैतन्य स्वरूप
05:04से दूर रखता है
05:07इस मैं के साथ ही मेरा का भाव जन्म लेता है मेरा परिवार मेरी संपत्ती मेरे संबंध जो आत्मा को
05:14अंगिनत इच्छाओं और आसक्तियों के जाल में फंसा देता है
05:19इन आसक्तियों से उत्पन्न होती है इच्छा, फिर इच्छा पूर्ती के लिए प्रयास और अंतर अपूर्ण इच्छाओं से उत्पन्न होने
05:28वाली पीडा और निराशा
05:31माया की यही शक्ती है कि वह दुख को सुख और क्षणिक भोगों को परम आनन्द के रूप में प्रस्तुत
05:37करती है जिससे आत्मा इस भ्रमजाल में फंसी रहती है
05:43जन्ममृत्यू का यह चक्र माया के कारण ही अनवरत चलता रहता है क्योंकि हर जन्म में आत्मा नए संबंधों और
05:50कर्मों से बंद कर और गहरा उलज जाती है
05:55गरुड इस माया के जाल में फंसकर आत्मा अपनी वास्तविक पहचान को भूल जाती है यह भूल जाती है कि
06:02वह अविनाशी, शुद्ध और परमात्मा का अंश है
06:07यह संसार अपनी सारी विविधता और सुन्दर्ता के साथ माया का ही एक विशाल और जटिल खेल है जो आत्मा
06:15को अपने मोहपाश में जकडे रखता है
06:19वह बताते हैं कि अज्ञानता ही माया का पोशन करती है और जब तक आत्मा सत्य के प्रकाश को नहीं
06:26पहचानती तब तक वह इस अंधकार में भटकी रहेगी
06:31माया के प्रभाव से आत्मा यह मानती है कि मैं करता हूँ जबकी वास्तव में सभी क्रियाएं प्रकृती के गुनों
06:39द्वारा संचालित होती है और आत्मा केवल साक्षी है
06:44वे समझाते हैं कि मोह और आसकती दो ऐसे प्रबल बंधन हैं जो आत्मा को माया की दुनिया में सबसे
06:51गहराई से जकड़ते हैं जिससे मुक्ती अत्यंत कठिन हो जाती है
06:57गरुर के चहरे पर चिन्ता के भाव देखकर भगवान विश्नु धीरस बंधाते हुए कहते हैं कि इस गहन अंधकार में
07:05भी ज्यान और वैराग्य की एक जोती छिपी है
07:09वे भक्ती योग के महत्व पर प्रकाश डालते हैं जिसके माध्यम से अनन्य प्रेम और समर्पन से आत्मा माया के
07:17बंधनों को धीला कर सकती है
07:20कर्म योग के सिध्धान्त को समझाते हुए वे कहते हैं कि फल की इच्छा त्याक कर निश्काम भाव से कर्म
07:27करने पर आत्मा कर्म के बंधनों से मुक्त हो जाती है
07:32ज्यान योग के मार्ग पर आत्मा अपनी बुद्धी को तीक्षन कर भेदभाव को मिटा कर स्वयं को सर्वव्यापी ब्रहमा से
07:40अभिन देखती है
07:43वे कहते हैं कि जब आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेती है तो माया का सारा मोहजाल उसी प्रकार
07:51बिखर जाता है जैसे सूर्योदय से अंधकार
07:55यह वहक्षन होता है जब आत्मा जीवनमुक्त की स्थिती प्राप्त कर लेती है शरीर में रहते हुए भी सभी बंधनों
08:03से परे उन स्वतंत्रता और शान्ती में स्थित
08:06अंत में भगवान विश्णु कहते हैं कि माया का रहस्य जानना ही मोक्ष के गुप्ट द्वार की पहली कुझी है
08:14जो आत्मा को उसके शाश्वत गंतव्य की ओर ले जाती है
08:19भगवान विश्णु ने अपनी दिव्य मुस्कान के साथ गरुड की ओर देखा और गहरे स्वर में आत्मन के उस रहस्य
08:26को खोलना आरंभ किया जो सभी बंधनों से मुक्ती दिलाता है
08:32उन्होंने समझाया कि यह आत्मन न तो वह शरीर है जिसे हम देखते हैं नहीं वह मन जो विचार करता
08:39है और नहीं वह बुद्धी जो निर्णय लेती है बलकि यह इन सबसे परे हैं
08:46गरुड की आखों में गेहन जिग्यासा थी जैसे वह अपने भीतर उस अद्रिश सत्य की खोज कर रहा हो जिसके
08:53बारे में भगवान वर्णन कर रहे थे
08:56भगवान ने आगे कहा कि जिस प्रकार वस्त्र बदलते ही शरीर नहीं बदलता उसी प्रकार शरीर के बदलने पर आत्मन
09:04अप्रिवर्थित रहता है नित्य और शाश्वत
09:08उन्होंने आत्मा की उपमा ऐसे दीपक से दी जिसकी लौ कभी नहीं बुझती भले ही पात्र कितनी बार भी बदले
09:16या तेल समाप्थ हो जाए
09:18गरुर ने महसूस किया कि यह ज्यान केवल शब्दों का समोह नहीं बलकि एक दिव्य प्रकाश था जो उसकी आत्मा
09:26के गूर्तम कोनों को आलोकित कर रहा था
09:30भगवान ने स्पष्ट किया कि आत्मन शुद्ध, बुद्ध और नित्यमुक्त है यह न कभी जन्म लेता है और नहीं कभी
09:37मृत्यू को प्राप्थ होता है
09:40उन्होंने समझाया कि जन्म और मृत्यू केवल देह के धर्म है, आत्मा के लिए ये अवधार्नाय अर्थहीन है, क्योंकि वह
09:48काल के बंधन से परे है
09:51यह वह सुक्ष्म चेतन सकता है, जो सम्पूर्ण ब्रहमांड में व्याप्थ है, हर जीव के भीतर स्पंदित होती है और
09:59फिर भी अद्रिश्य रहती है
10:03गरूर के मस्तिश्क में सारे संशय मिटने लगे, जैसे सुभा के प्रकाश में रात का कोहरा छंट जाता है
10:11भगवान विश्णू ने जोर दिया कि आत्मन परमात्मा का ही अविभाज अंश है, ठीक वैसे ही जैसे सूर्य की एक
10:19किरन सूर्य से अलग नहीं होती
10:22यह वह सनातन सत्य है, जिसे जानने के बाद कोई द्वैत नहीं रहता, केवल अद्वैत की परम शांती रह जाती
10:30है
10:32इस आत्मज्यान के बिना मनुष्य जन्ममृत्यू के चक्र में भटकता रहता है, घ्रमित और दुखी
10:39लेकिन जब आत्मा स्वयन को पहचान लेती है, तो वह माया के सारे बंधनों को तोड़ कर अनन्थ स्वतंत्रता को
10:46प्राप्त करती है
10:49यह स्वतंत्रता शरीर की सीमाओं से परे, मन की चंचलता से मुक्त और बुद्धी के तरकों से उपर है
10:57गरुर के हृदय में एक अलौकिक शांती का अनुभव हुआ, जैसे सहसरों वर्षों का भार उसके कंधों से उतर गया
11:05हो
11:06भगवान ने कहा कि इस ज्ञान को धारण करना ही सच्चा यग्य है, सच्चा तप है और सच्चे धर्म का
11:13मूल है
11:15यह वह आंतरिक यात्रा है जो आत्मा को उसके वास्तविक घर्परमात्मा के साथ एकाकार होने की ओर ले जाती है
11:24मोक्ष कोई दूर का स्वर्ग नहीं, बलकि आत्मन की इस पहचान में ही नहित है, जो जीवन को पूनता प्रदान
11:32करती है
11:34भगवान विश्नु ने अपनी बात समाप्त की और गरुड ने महसूस किया कि अब वह न केबल ज्यान से बलकि
11:42दिव्य अनुभव से भी परिपूर्ण हो गया था
11:45भगवान विश्नु द्वारा मोक्ष के गूड रहसियों को प्रकट करने के बाद, गरुड ने उनके दिव्यमुख पर गहराई से द्रिष्टी
11:53डाली, मानोवे और भी गहन सत्य की प्रतीक्षा कर रहे हूँ
11:58उनकी जिग्यासा को भामपते हुए, भगवान विश्नु ने मंद मुस्कान के साथ अपने विशाल ज्यान का अगला अध्याय आरंभ किया,
12:07जो स्रिष्टी के मूल भूत ताने बाने को उजागर करने वाला था
12:12उन्होंने कहा, हे गरुड, यह संपूर्ण स्रिष्टी प्रकृती के तीन गुनों सत्व, रजस और तमस से संचालित है, जो हर
12:20जीव के स्वभाव और कर्मों का मूल आधार है
12:25सत्वगुन प्रकाश, पवित्रता और शांती का प्रतीक है, जो आत्मा को ज्यान और आनन से जोड़ता है
12:33सत्वगुन से प्रभावित जीव ज्यान की खोज में लीन रहता है, उसका मन शांत, स्थिर और प्रसन्न रहता है, जो
12:41उसे उच्छतर लोकों की ओर ले जाता है
12:54रजोगुनी व्यक्ति सदैव सक्रिय रहता है, महत्वा कांक्षाओ और उपलब्धियों की दौड में लगा रहता है, जिससे सुख दुख का
13:02चक्र निरंतर चलता रहता है
13:06और तीसरा गुन है तमस जो अंधकार, आलस्य और अज्यान का कारक है, जिससे आत्मा मोह और भ्रम में फंस
13:14जाती है
13:16तमोगुणी जीव अज्ञानता के अंधेरे में डूबा रहता है, आलस्य और प्रमाद में जीवन व्यतीत करता है, जिससे वह बार
13:24-बार निम्न योनियों में भटकता है
13:28भगवान विश्णु ने समझाया कि ये तीनों गुण एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और स्रिष्टी के हर कण में
13:34एक जटिल संतुलन बनाये रखते हुए कार्य करते हैं
13:39उन्होंने कहा, सत्व से ज्ञान और सुख की प्राप्ती होती है, परंतु यह भी जीव को उस ज्ञान और सुख
13:46के प्रती आसकती से बांधता है
13:50गरुर ने ध्यान पूर्वक अपने स्वामी के हर शब्द को सुना, उनके मन में स्रिष्टी की इस जटिल संरचना के
13:57प्रती एक नई समच जागरित हो रही थी
14:01भगवान विश्णू ने आगे कहा, रजस गुन व्यक्ती को कर्मों के जाल में उलजाता है, जहां वह अपनी इच्छाओं की
14:08पूर्ती के लिए निरंतर संधर्श करता है, चाहे परिणाम सुखद हो या दुखद
14:14और तमस अज्ञानता का वह अंधकार है जो बुद्धी को ढख लेता है, जिससे जीव विवेखीन होकर आलस्यक प्रमाद और
14:22निद्रा में लीन रहता है
14:25विष्णु जी ने स्पष्ट किया कि इस नश्वर संसार में कोई भी जीव इंतरे गुनों के प्रभाव से पूर्णता मुक्त
14:32नहीं है, यहां तक की देवता भी उनके अधीन रहते हैं
14:38यह गुन ही प्रत्येक जीव के स्वभाव, उसकी प्रवरित्तियों और उसके भाग्य का निर्धारन करते हैं, जिससे हर आत्मा एक
14:46अध्वितिय पत्थ पर अग्रसर होती है
14:50गरुर ने विनमर्ता से प्रश्न किया, हे प्रभु, यदि ये गुन इतने शक्तिशाली हैं, तो कोई आत्मा इनसे उपर उठकर
14:58मोक्ष कैसे प्राप्त कर सकती है
15:01भगवान विश्नु ने गरुर की ओर देखा और उत्तर दिया, इन गुनों को समझना ही इनसे मुक्ती का पहला सोपान
15:09है, क्योंकि ज्यान ही बंधन तोड़ने की कुंजी है
15:14उन्होंने समझाया कि गुनों से उत्पन होने वाले सुख दुख भी अस्थाई हैं, वे रितुओं के समान आते जाते रहते
15:21हैं, और इन क्षणिक अनुभवों में आ सकती ही बंधन का कारण बनती है
15:27जब आत्मा इन तीनों गुनों के प्रभाव से उपर उठ जाती है, तभी वह जन्मुम्रित्यू के चक्र से मुक्त होकर
15:35वास्तविक और शाश्वत शान्ती को प्राप्त करती है
15:39इसके पश्चात भगवान विश्णू ने ज्ञान योग की महिमा बताते हुए कहा कि यह वह दिव्य जोती है, जो माया
15:47के सबसे घने अंधकार को क्षण भर में नश्ट कर देती है
15:52वेदों और उपनिश्दों का स्वाध्याय मनुष्य की बुद्धी में विवेक की वह चिंदारी प्रज्वलित करता है, जिससे सत्य और असत्य
16:00का भेद स्पष्ट होने लगता है
16:03यह विवेक आत्मा को इस नश्वर भौतिक शरीर से अलग करके उसके अजर्मर और अविनाशी स्वरूप की पहचान कराता है
16:14भगवान ने समझाया की जैसे अंधकार में रस्षी को सांप समझकर भय उत्पन होता है, वैसे ही अज्यानता के कारण
16:22जीव इस मायावी संसार को ही सत्यमान बैठता है
16:27परंतु जैसे ही ज्यान की जोती जलती है, वह भ्रम और अज्यान से उपजा साराभय और बंधन स्वतह ही विलीन
16:34हो जाता है
16:37श्रीहरी ने ज्यान योग के तीन मुख्य चर्णों, श्रवन, मनन और निदिध्यासन का वर्णन करते हुए उनके महत्व पर प्रकाश
16:45डाला
16:55मनन द्वारा सुने गए सत्य पर गंभीरता से विचार करके तर्क और विवेक से अपनी सभी शंकाओं का समाधान किया
17:03जाता है
17:05तत्पश्चात निदिध्यासन में मन को स्थिर करके निरंतर उस पर ब्रह्म परमात्मा के स्वरूप का ही ध्यान लगाया जाता है
17:14जैसे जैसे ध्यान गहरा होता है व्यक्ति का अहंकार पिघलने लगता है और आत्मा परमात्मा की विराट चेतना में समाहित
17:22होने लगती है
17:25गरुर जी अत्यंत भक्ती और तनमयता से भगवान के इन अमरत्मई वचनों का पान कर रहे थे जिससे उनका हृदय
17:32परमशान्ती से भर गया
17:35विष्णु जी ने आगे बताया कि आत्मा हृदय रूपी गुफा में एक ऐसे दिव्य प्रकाश के समान स्थित है जो
17:42किसी भी सांसारिक मलिन्ता से अचूता रहता है
17:47विवेक के द्वारा आत्मा पर चढ़ी पंचकोश, अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विध्यानमय और आनंदमय की परतों को एक-एक कर हटाया
17:56जाता है
17:57इन पाचों कोशों के पार जाने पर ही आत्मा अपने विशुद्ध, स्वयम प्रकाशित और साक्षी स्वरूप का साक्षात कार करती
18:06है
18:07जब साधक को यह परम बोध होता है कि अह ब्रह्मास में अर्थात मैं ही वह परब्रह्म हूँ, तब उसके
18:14समस्थ संचित कर्म जलकर भस्म हो जाते हैं
18:19कर्मों का यह जाल नश्थ होते ही जन्म और मृत्यू के चक्र का अंठ हो जाता है और आत्मा सदा
18:25के लिए मुक्थ हो जाती है
18:28ऐसी जीवन मुक्थ आत्मा इस संसार में रहते हुए भी किसी भी भौतिक लाभानी या सुख दुख से विचलित नहीं
18:35होती
18:35वह मान अपमान, सर्दीगर्मी और अनुकूल प्रतिकूल परिस्थितियों में एक समान रहकर अखंड आनंद का अनुभव करती है
18:46भगवान विश्णूने घोशनाकी की ज्यान योग ही मोक्ष का वह गुप्ट द्वार है, जिसे खोल कर आत्मा पुनरजन्म के चक्रव्यू
18:54को सदा के लिए भेद देती है
18:58गरुर जी ने सिर जुका कर श्रीहरी के चर्णों में प्रणाम किया और ज्यान योग की इस पावन धारा में
19:04स्नान कर स्वयं को धन्य महसूस किया
19:08भगवान विश्णूने गरुर जी के शांत त्रिप्ट मुखमंडल को देखकर मंद मंद मुस्कुराते हुए एक और दिव्य मार्ग की ओर
19:16संकेत किया जो प्रेम और समर्पन से आत्मा को परमात्मा से जोडता है
19:22उन्होंने कहा कि भक्ती योग ही वह अनुपम मार्ग है जहां आत्मा किसी भी अपेक्षा के बिना केवल शुद्ध प्रेम
19:30और श्रद्धा से परमात्मा में लीन हो जाती है
19:34यह वह प्रेम है जो ज्ञान की सीमाओं से परे है तर्क और बुद्धी की बेडियों को तोड़ कर सीधे
19:41हृदय से हृदय का मिलन करवाता है
19:44गरुर जी ने उच्शुकता से अपने पंखों को थोड़ा फैलाया और इस सहज सरल मार्ग की गहराई को समझने के
19:52लिए अपने हृदय को पूरी तरह खोल दिया
19:56श्रीहरी ने नवधा भक्ती के नौ स्वरूपों का वर्णन करना आरंभ किया जो भक्त को इश्वर के निकट लाने के
20:03विभिन माध्यम है
20:05उन्होंने कहा पहला है श्रवनम जहां भक्त एकाग्रचित होकर मेरी कथाओं लिलाओं और गुनों का श्रवन करता है जिससे मन
20:14निर्मल होता है
20:17दूसरा है कीर्टनम, जहां भक्त मेरे पवित्र नामों का गायन और मेरी महिमा का गुनगान करता है, जिससे वातावर्ण में
20:25दिव्यता घुल जाती है
20:28तीसरा स्मर्णम है, जिसमें भक्त निरंतर मेरे स्वरूप, लीलाओं और गुनों का चिंतन करता है, जिससे मेरा स्मरण पलपल उसके
20:36साथ रहता है
20:39चौथा है पादसेवन्म, जहां भक्त मेरे चर्णों की सेवा करता है, और उन्हें अपने जीवन का परम आधार मानता है
21:25सामीप्य अनुभव होता है।
21:26जैसे मैं उसका प्रिय सखा हूँ।
21:29और नौवा है आत्मनिवेदन जिसमें भक्त अपनी आत्मा और शरीर को पूरी तरह मुझ पर नियोच्छावर कर देता है, जिसमें
21:38कोई कामना शेश नहीं रहती।
21:40भगवान ने बल देकर कहा कि भक्ती योग किसी भी वर्ण, आश्रम या ज्यान की अपेक्षा नहीं रखता, यह सभी
21:48के लिए सुलब है।
21:50यह अहंकार के उचे परवतों को पिघला कर हृदय को निर्मल करता है, जैसे वर्षा का जल कठोर भूमी को
21:58उर्वर बनाता है।
22:00जो भक्त इस मार्ग पर चलता है, वह एक अलौकिक आनंद और परमात्मा से सीधा समवाद अनुभव करता है, जैसे
22:09एक शिशु अपनी मा की गोद में शान्त हो जाता है।
22:13गरुर जी का हृदय भक्ती के इस अनमोल ज्ञान से भर गया, उनकी आखों में अशुरुधारा बह निकली और रोमरोम
22:21पुलकित हो उठा।
22:23उन्होंने अनुभव किया कि ज्ञान जहां बुद्धी को प्रकाशित करता है, वहीं भक्ती हृदय को प्रेम की दिव्य अगनी से
22:30प्रजवलित करती है।
22:33श्रीहरी ने अपनी दिव्यवानी में अंत में कहा कि भक्ती योग ही सबसे सीधा और सरल मार्ग है, जिससे जीव
22:41मुझे सहचता से प्राप्त कर सकता है।
22:44गरुर जी ने दोनों लोगों की महत्ता को हरिध्यंगम करते हुए, मोक्ष के दो गुप्ट द्वारों ज्ञान और भक्ती को
22:52अपने अंतर्मन में स्थापित कर लिया।
22:55पुना उन्होंने श्रीहरी के चर्णों में पूर्ण श्रधा से प्रणाम किया, उनकी आत्मा अब ज्ञान और प्रेन दोनों से प्रकाशित
23:03होकर मोक्ष की दिशा में द्रिड़ता से अग्रसर थी।
23:07ततपश्चात पक्षीराज गरुड ने अतीव नमर्ता से पूछा की संसार के विविद कर्मों में उलज़ा हुआ जीव किस प्रकार कर्मबंधन
23:15से मुक्ष होकर मोक्ष प्राप्थ कर सकता है।
23:20भगवान श्रीहरी ने अपनी मंद मुस्कान के साथ कर्म योग के उस परमगुप सिधान्त को प्रकट करना प्रारंब किया, जो
23:28जीव को संसार में रहते हुए भी माया से परे ले जाता है।
23:33श्रीहरी ने समझाया कि कोई भी प्राणी एक क्षन के लिए भी बिना कर्म किये नहीं रह सकता, क्योंकि प्रकृती
23:40के गुन हर जीव को निरंतर कर्म करने के लिए विवश करते हैं।
23:45वे बताते हैं कि जब मनुष्य अपने कर्मों के फल की लालसा से बंध जाता है, तो वही कर्म भारी
23:52जंजीर बनकर उसकी आत्मा को पुनरजन्म के चक्र में बांध लेते हैं।
23:58परंतु, जब वही कर्म बिना किसी फल की इच्छा के केवल कर्तव्य समझ कर किये जाते हैं, तो वे निशकाम
24:05कर्म बनकर आत्मा को मुक्त कर देते हैं।
24:08श्री विश्नु ने कहा कि जैसे एक निश्थावान राजा अपनी प्रजा का पालन बिना अपने व्यक्तिगत लाब के करता है,
24:17वैसे ही मनुष्य को अपना हर कर्तव्य निभाना चाहिए।
24:21वे गरूर को सचे करते हैं कि वासना और क्रोध ही वे महान शत्रु हैं जो जीव के विवेक को
24:28धककर उसे स्वार्थी कर्मों की ओर धकेलते हैं।
24:33इश्वर ने यग्यभावना का रहस्य समझाते हुए कहा कि अपने दैनिक कारियों को केवल समाज और परमात्मा की सेवा मानकर
24:41समर्पित करना ही सच्चा यग्य है।
24:45निश्काम कर्म करने से मनुष्य का अंतह करन और चित्त पूरी तरह शुद्ध हो जाते हैं, जिससे उसमें आत्म ज्यान
24:52का प्रकाश सुगमता से प्रवेश करता है।
24:56श्रीहरी ने सकाम और निश्काम कर्म का अंतर बताते हुए कहा कि फल की इच्चा रखने वाला व्यक्ती चक्रवियों में
25:04फंसता है, जबकि निश्काम योगी स्वतंत्र रहता है।
25:09गरुर जी ने देखा कि कैसे संपूर्ण स्रिष्टी का चक्र एक दूसरे के प्रती निहस्वार्थ कर्तव्य और समर्पन के दिव्यधागे
25:17से बंधा हुआ है।
25:19भगवान ने उदाहरण दिया कि जिस प्रकार कमल का पत्ता जल में रहकर भी जल से अचुता रहता है। उसी
25:26प्रकार कर्मयोगी संसार में रहते हुए भी पापुने के बंधन से अचुता रहता है।
25:32उन्होंने कहा कि अपने समस्त कर्मों के परिनाम को मेरे चर्णों में समर्पित कर देना ही कर्मफल त्याग का सर्वोच्च
25:40और अंतिम सोपान है
25:43इस प्रकार सर्वस्व अर्पन कर देने से जन्मांतरों का संचित कर्मों का पहाड क्षन भर में ज्ञानागनी और भक्ती की
25:51ज्वाला में भस्म हो जाता है
25:54श्रीहरी ने पुनह बल दिया कि अहंकार पूर्वक किया गया कोई भी धर्मकार्य बंधन बनता है, जबकी निरहंकार भाव से
26:02किया गया, तुछ कार्य भी मोक्ष का द्वार खोलता है
26:07वे बताते हैं कि ज्ञान योग, भक्ती योग और कर्म योग वास्तव में एक ही मोक्षस मुद्र में मिलने वाली
26:14तीन परम पवित्र नदिया है
26:17यह सुनकर पक्षीराज गरूर को वह अलौकिक द्रिश दिखा, जहां निश्काम कर्म करने वाले असंख्य जीव माया के जाल को
26:26तोड़कर परंपत की ओर बढ़ रहे थे
26:29भगवान नारायन ने आशिरवाद देते हुए कहा कि जो मनुष्य इस कर्म योग का पालन करता है, वह जीतेजी मुक्थ
26:37होकर अंत में मेरे शाश्वत धाम वैकुंठ को प्राप्थ होता है
26:42गरुर जी के अंतर्मन में अब कर्म, ज्यान और भक्ती का त्रिवेनी संगम हो चुका था, जिससे उनका हर संशय
26:50पूर्णत ह समाप्थ हो गया
26:52गरुर ने पुनह प्रभु के श्रीचर्णों में साश्टांग प्रणाम किया और मोक्ष के अगले परम गूढ रहस्यों को सुनने के
27:00लिए पूर्ण श्रधा से तत्पर हो गए
27:02प्रभु नारायन ने अपनी असीमित क्रिपा ग्रिष्टी गरुर पर स्थिर करते हुए मोक्ष के अगले पड़ाव जीवनमुक्त अवस्था के रहस्यमय
27:12द्वार को खोलना आरंभ किया
27:15भगवान विश्णु ने धीर गंभीर वानी में कहा के गरुर जीवनमुक्त वह परम भाग्यशाली आत्मा है जो भौतिक देह में
27:23रहते हुए भी माया के समस्त बंधनों से पूर्णता स्वतंत्र हो चुकी होती है
27:29ऐसे ग्यानी पुरुष संसार में कमल पुष्प की भानती रहते हैं जो जल में उत्पन होकर भी उससे अनासक्त रहता
27:37है नजल से लिप्थ होता है और नहीं जल से प्रभावित होता है
27:42वे सुखदुख, मानअपमान, लाभानी जैसे द्वंद्वों से परे होकर हर परिस्थिती में संभाव और स्थिर बुद्धी रखते हैं, मानों कोई
27:51लहर उन्हें चूही न पाती हो
27:54उनकी आत्मा अहमकार की काली चादर उतार फेंकती है और मैं तथा मेरा का कोई भाव उन्हें स्पर्ष नहीं कर
28:02पाता क्योंकि वे स्वयंको ब्रह्मांड का एक अभिन्न अंग मानते हैं
28:08उनकी सारी इंद्रियां विश्यों से विरक्थ हो जाती हैं और कामनाओं की कोई भी अगनी उनके अंतर्मन को जला नहीं
28:15पाती जिससे वे शांत सरोवर की तरह स्थिर रहते हैं
28:20वे बिना किसी फल की इच्छा के अपने कर्तवियों का पालन करते हैं मानो एक कलाकार अपनी कलाकृती में स्वयंको
28:28खोकर भी उसके परिणाम से निर्पेक्ष हो
28:32ज्यान के इस शिखर पर पहुँचे हुए वे स्वय में आनन्दित रहते हैं और किसी बाहरी वस्तु पर उनकी प्रसंता
28:40निर्भर नहीं करती जैसे सूर्य अपने प्रकाश में स्वयं प्रकाशित होता है
28:46गरुर जी ने श्रद्धा पूर्वक सिर जुकाते हुए प्रभु के इन वचनों को अपने हृदय में आत्म साथ किया मानो
28:53कोई प्यासा यात्री अमरित पान कर रहा हो
28:57नारायन ने आगे स्पष्ट किया कि जीवन मुक्त आत्मा की द्रिष्टी में संसार केवल एक लीला है एक स्वपन है
29:05जिसकी वास्तविक्ता केवल आत्मा में ही नहित है
29:09वे शुभशुभ के पार चले जाते हैं क्योंकि उनके लिए हर कर्म मात्र इश्वरिय इच्छा की अभिव्यक्ती बन जाता है
29:17जिसमें कोई निजी स्वार्थ नहीं होता
29:21ऐसे पवित्र पुरुषों की उपस्थिती मात्र से ही वातावर्ण में शान्ती और सकारात्मक उर्जा का संचार होता है जैसे एक
29:29सुगंधित पुष्प अपने आसपास के क्षेत्र को महका देता है
29:34उनके लिए भौतिक शरीर मात्र एक वस्त्र है जिसे आत्मा ने एक निश्चित काल के लिए धारण किया है और
29:42विस्वयं को इस नश्वर देह से कभी नहीं जोडते
29:46जब ऐसे ग्याने का शरीर छूटता है तो वह किसी बंधन की तरह नहीं बल्कि एक पुराने वस्त्र को त्यागने
29:54की सहच प्रक्रिया की तरह होता है
29:57उनकी आत्मा शरीर का त्याग करने के पश्चात बिना किसी अवरोध के परम ब्रह्मा में विलीन हो जाती है जैसे
30:05एक बूंध महासागर में मिलकर स्वयं महासागर बन जाती है
30:11भगवान ने अपने वाक्यों पर जोर देते हुए कहा कि यह अवस्था मात्र कल्पना नहीं बल्कि तीवर साधना और आत्म
30:19ज्यान से प्राप्त होने वाली परम सत्यता है
30:23गरुर जी की आखों में अब इस परम अवस्था को प्राप्त करने की अदमय इच्छा जलक रही थी मानोवे तुरंथ
30:31ही उस ज्यान मार्ग पर चल पड़ना चाहते हुँ
30:34प्रभु ने उन्हें समझाते हुए कहा इस अवस्था को पाने के लिए निरंतर आत्म चिंतन निस्वार्थ कर्म और पूर्ण समर्पन
30:42का मार्ग अपनाना पड़ता है
30:44हे गरुड आत्मसाक्षात कार ही मानव जीवन का सर्वोच उद्देश है जिसके बिना यह दुलब मनुष्य जन्म व्यर्थ माना जाता
30:54है जैसे बिना लक्ष का कोई तीर
30:58भगवान विश्णु ने अपनी दिव्य मुस्कान के साथ अपने इस गहन उपदेश को समाप्त किया जिससे गरुड का हृदय अब
31:05पूर्ण शान्ती और बोध से परिपूर्ण हो चुका था
31:10भगवान विश्णु की वानी से निकली ज्ञान गंगा ने गरुड के हृदय को पवित्र कर दिया था और अब वे
31:16एक गहन शान्ती में डूबे हुए थे
31:18मानो स्वयन ब्रह्मांड का रहस्य समझ रहे हो
31:23उनकी आखों में अब तक की सभी शंकाय मिख चुकी थी और एक नवजीवन का अनुभव हो रहा था जैसे
31:30गहन रात्री के बाद उदे होता सूर्य
31:33प्रभू ने गरूड की आंतरिक परिवर्तन को महसूस किया और अपनी मधुर शांत वाणी में विदेहमुक्ट अवस्था का रहस्य खोलना
31:42प्रारंभ किया जो आत्मा की परम स्वतंत्रता है
31:47उन्होंने समझाया हे गरूड जब एक आत्मा अपने स्थूल शरीर को त्यागती है तो वह बंधन मुक्थ होकर अपने शुद्धतम
31:55स्वरूप में लोट आती है जैसे नदी अपने उदगम स्रोत की ओर लोटती है
32:01यह वहक्षन है जब भौतिक संसार के सभी मोह, सभी इच्छाएं और सभी संचित कर्मों के फल समाप्थ हो जाते
32:10हैं और आत्मा परम शान्ती का अनुभव करती है
32:14जैसे एक जीर्णशियन वस्त्र को त्याग कर नया वस्त्रधारन किया जाता है वैसे ही आत्मा नश्वर शरीर को त्याग कर
32:23अपने शाश्वत स्वरूप में प्रवेश करती है
32:27विदेह मुक्त अवस्था में आत्मा का सूक्ष्म शरीर भी विलीन हो जाता है और वह केवल अपने कारण शरीर जो
32:34शुद्ध चैतन्य है के साथ रह जाती है
32:38यहां आत्मा की परम शुद्धता की यात्रा है जहां वह अज्यानता के सभी पर्दों को चीर कर सत्य के प्रकाश
32:46में स्नान करती है
32:48कोई कर्मफल, कोई संसकार, कोई वासना उस पर अपना प्रभाव नहीं डाल पाती, वह पूर्ण रूप से निर्मल और अडिक
32:57हो जाती है
32:57जैसे आकाश में निर्बाध उर्ता पक्षी
33:01इस अवस्था में आत्मा परम ब्रह्मा के साथ एकाकार हो जाती है
33:06जैसे बून सागर में मिलकर अपना प्रिथक अस्तित्व खो देती है
33:11यह विलींता न तो विलय है और नहीं नाश अपितु यह आत्मा का अपने मूल, शाश्वत और अप्रिवर्तनिय स्वरूप को
33:20पहचानना है
33:22वह परम ब्रह्मा में समाहित होकर उस अनन्त ज्यान, अनन्त आनन्द और अनन्त अस्तित्व का अनुभव करती है, जिसका वर्णन
33:30मानविय शब्दों में असंभव है
33:33यह जन्मम्रत्यू के भयावः चक्र से पूर्ण मुक्ती है, जहां आत्मा को फिर कभी संसार के बंधनों में नहीं बंधना
33:41पड़ता
33:43मुक्ष की यह अंतिम अवस्था ही आत्मा का सर्वोच लक्ष है, जहां वह परमशान्ती और चिरस्थाई आनन्द को प्राप्त करती
33:51है
33:53विदेह मुक्त आत्मा प्रकाश के एककन के समान ब्रहमांड के हर अनों में व्याप्त हो जाती है, फिर भी अपनी
34:00अद्वितिय चेतना बनाए रखती है
34:04प्रभु ने आगे कहा, यह वह द्वार है जो अज्ञान के कारागार से आत्मा को मुक्त कर उसे शाश्वत सत्य
34:11के राजमहल में ले जाता है
34:15गरुर ने आखे मून ली, अपने भीतर उस परम मुक्ती की अनुभूती कर रहे थे, मानोवे स्वया उस दिव्य यात्रा
34:22के साक्षी बन गए हो
34:25उनके रोम रोम में दिव्यता का संचार हो रहा था, और उन्हें लग रहा था कि यह केवल ज्ञान नहीं,
34:32बलकि स्वयम मुक्ष का अनुभव है
34:35भगवान विश्णू ने अपनी दिव्य आभा को और भी तेजस्वी करते हुए कहा, यही गरूर पुरान का सार है, जो
34:43आत्मा को उसके अंतिन गंतव्य तक पहुँचने का मार्ग दिखाता है
34:48और इस प्रकार अनन्त ब्रहमांड में भगवान विश्णू और उनके वाहन गरूर के बीच मोक्ष के गुप्ट द्वार का यह
34:56परम ज्ञान सदा के लिए प्रतिध्वनित हो गया
34:59भगवान विश्णू के इस परम ज्ञान को सुनकर पक्षी राज गरूर ने अत्यंत विनमर्ता पूर्वक अपने दोनों पंख जोड़कर प्रभु
35:07के चर्णों में अपना मस्तक जुका दिया
35:11गरूर जी गदगद कंट से बोले की है त्रिलो की नाथ आपकी अमरित्मई वानी ने मेरे मन के संपून अग्यान
35:18और मोहरूपी अंधकार को पलभर में नश्ट कर दिया है
35:23उन्होंने अपने प्रभु के प्रती असीम कृतग्यता व्यक्त करते हुए कहा कि आत्मा की इस यात्रा का सत्य जानकर अब
35:31संसार की भौतिक माया का बंधन तूट चुका है
35:35गरुर जी ने पुना अत्यंत कौतुहल और श्रद्धा के साथ निवेदन किया कि हे प्रभु मृत्युलोग के साधारन मनुष्यों के
35:43उद्धार के लिए ब्याभारिक धर्म का मार्ग भी बतलाने की कृपा करें
35:49उन्होंने जिग्यासा प्रकट की की कौन से ऐसे पवित्रवरत और उपवास हैं, जिनका पालन करने से मनुष्य इस जीवन में
35:57पापों से मुक्ष का पात्र बनता है
36:01पक्षियों के राजा गरूर ने आगे पूछा की मानव जीवन में जन्म से लेकर मृत्यू तक किये जाने वाले वैदिक
36:08संस्कारों का क्या आध्यात्मिक महत्व है
36:12गरूर की इस लोक कल्यानकारी जिग्यासा को सुनकर भगवान नारायन के दिव्य मुख मंडल पर एक मंद और करुणामई मुस्कान
36:21तैर उठी
36:22श्री हरी ने अपना अभय हस्त उठाकर गरूर की प्रशंसा करते हुए कहा कि संपूर्ण संसार के कल्यान के लिए
36:30तुम्हारे द्वारा पूछे गए ये प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है
36:35भगवान विश्नु ने समझाया कि केवल आत्मग्यान ही नहीं, बलकि जीवन में किये गए धर्मानुकूल कर्म और आचर्ण ही मनुष्य
36:44को मोक्ष के योग्य बनाते हैं
36:47प्रभू ने बताना आरंभ किया कि किस प्रकार दैनिक जीवन में किये जाने वाले सदकर्म और पूजन विधान आत्मा को
36:55निर्मल और निश्पाप बनाते हैं
36:58विष्णू जी ने एक आच्छी जैसे परम पवित्र व्रतों की महिमा का बखान करते हुए कहा कि ये व्रत मनुष्य
37:05के मन और अंतहकरण को शुद्ध करते हैं
37:10उन्होंने गरोर को बताया कि निहस्वार्थ भाव से किया गया दान और भक्ति पूर्वक किया गया प्रभुस मरण आत्मा के
37:17सुक्ष्म बंधनों को छिन्न भिन्न कर देता है
37:21भगवान ने तीर्थ यात्राओ और पवित्र नदियों में स्नान के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि इनसे संचित पापों
37:29का विनाश होता है
37:31इस पावन प्रसंद में गरोर की जिग्यासा और आगे का मार्ग की महिमा का वर्णन किया गया है
37:39गरोर जी अपने विशाल स्वर्णिन पंखों को समेट कर ध्यानपूर्वक भगवान के एक एक शब्द को अपने हृदय में अंकित
37:47करने लगे
37:48श्री हरी ने आगे 16 वैदिक संसकारों के गोपनिय रहस्य को प्रकट करते हुए बताया कि ये संसकार मानव चेतना
37:56को हर चरण में परिश्कृत करते हैं
37:59उन्होंने स्पष्ट किया कि जीवन के अंतिम पड़ाव पर विधिविधान से किया गया अंतिम संसकार आत्मा को परलोग की सुगम
38:08यात्रा प्रदान करता है
38:11भगवान के इन वचनों को सुनकर गरूर जी को ग्यान और व्याभारिक धर्म के अग्भुत समन्वय का बोध हुआ
38:19विष्णु जी ने आश्वासन दिया कि जो मनुष्य इस व्याभारिक मार्ग पर चलेगा वह इस लोग में सुख भोग कर
38:26अंतमे परम मोक्ष को प्राप्त करेगा
38:30व्यकुंठ लोग की दिव्याभा और अधिक प्रजवलित हो उठी क्योंकी भगवान विष्णु अब व्रतों और संस्कारों के अगले अध्याय को
38:38खोलने जा रहे थे
38:41पक्षिराज गरूर परम संतुष्टी और उच्सुकता के साथ पुना प्रभु चर्णों में जुक गए ताकि वे आगे का कल्यानकारी मार्ग
38:49श्रवन कर सकें
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