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अजामिल के उद्धार के बाद, राजा परीक्षित अभी भी संसार के मोह-माया और कर्मफल के रहस्य पर विचार कर रहे हैं। शुकदेव जी उन्हें एक और अद्भुत कथा सुनाते हैं - राजा चित्रकेतु की, जो पुत्र मोह में डूबे हुए थे। कैसे एक ऋषि के वरदान से उन्हें पुत्र मिला, और फिर कैसे ईर्ष्या के कारण उनका संसार उजड़ गया? नारद मुनि और अंगिरा ऋषि ने उन्हें कैसे ज्ञान का मार्ग दिखाया और अंततः उन्हें पार्वती के श्राप का सामना क्यों करना पड़ा? जानिए इस महागाथा में जो वृत्रासुर के जन्म का रहस्य खोलेगी! #BhagavataPurana #Chitraketu #Vritrasura #Parvati #Shukadeva #Parikshit #NaradaMuni #HinduMythology
Transcript
00:00अजामिल की अलौकिक मुक्ती का वृत्तान्त सुनकर राजा परीक्षित के मन में भक्ती का रस्तो घुला, परंतु संसार के मोह
00:07का रहस्य अब भी अनसुलजा था।
00:10राजा परीक्षित ने नमरता पूर्वक हाथ जोड़ कर शुकदेव जी से पूछा की ज्यानी मनुष्य भी जानते हुए संतान और
00:18कुटुम के मोहजाल में क्यों फंस जाते हैं।
00:22परीक्षित ने प्रश्न किया कि कर्म के अटूट विधान और भगवान की माया के बीच मनुष्य को मोक्ष का मार्ग
00:29सपष्ट रूप से कैसे दिखाई दे सकता है।
00:33राजा के ऐसे परमहितकारी और गूर प्रश्नों को सुनकर शुकदेव जी के चहरे पर एक मन्द और कृपालू मुस्कान तैर
00:41गई।
00:42शुकदेव जी ने कहा कि भगवान श्री हरी की योगमाया अत्यंत दुर्जय है जो बड़े-बड़े विद्वानों को भी पुत्र
00:50और संपत्ती के अनुराग में बांध देती है।
00:54परीक्षित की संशमुक्ती के लिए शुकदेव जी ने शूरसेन देश के प्रतापी राजा चितरकेतु की एक प्राचीन और अध्भुत कथा
01:02सुनानी आरंभ की।
01:04शूरसेन प्रदेश के स्वामी राजा चितरकेतु अत्यंत वैभवशाली, धर्मनिष्ठ और प्रजापालक थे, जिनकी छत्रचाया में पूरी प्रित्वी सुख का अनुभव
01:14करती थी।
01:16उनके राजकोश में अपारधन, विशाल सेना और हजारो सुन्दर राणिया थी, परन्तु फिर भी राजा का हृदय भीतर ही भीतर
01:25उदास रहता था।
01:27राजा चित्रकेतु के दुहक का एक मात्र कारण यह था कि उनकी हजारो रानियों में से किसी से भी उन्हें
01:34एक पुत्र की प्राप्ती नहीं हुई थी।
01:37संतान न होने के कारण राजा का विशाल सामराज्य और सारा वैभव उनके लिए निरर्थक और भारस्वरूप प्रतीत होता था।
01:47एक दिन महर्षी अंगिरा अपनी इच्छा से विचरते हुए राजा चित्रकेतु के विशाल और स्वर्णमे राजप्रासाद में पधारे।
01:56महर्शी अंगिरा को अपने द्वार पर आया देख राजा चितरकेतु तुरंत अपने सिनहासन से उठे और उनके चर्णों में प्रणाम
02:05किया
02:06राजा ने महर्शी का यतोचित पूजन किया, परंतु महर्शी अंगिरा ने राजा के हंस्ते चहरे के पीछे छिपे गहरे शोक
02:14को ताड लिया
02:16महर्शी अंगिरा ने राजा से पूछा कि सब प्रकार का एश्वर्य होते हुए भी उनका मुख कमल कुमहलाया हुआ और
02:23कांतिहीन क्यों दिख रहा है
02:26राजा चित्रकेटु ने कापते शब्दों में अपने मन की व्यथा प्रकट की और कहा कि बिना संतान के उनका सारा
02:33जीवन निश्वल है
02:36महर्शी अंगिरा ने राजा को सचेत किया कि संसार की वस्तुएं और पुत्र मोह, हर्ष और शोक दोनों का कारण
02:44बनते हैं
02:46परंतु राजा की तीवर लालसा को देख कर महर्शी अंगिरा ने उनके लिए एक विशेश पुत्र प्राप्ती यग्य करने का
02:53संकल्प लिया
02:55राजमहल के विशाल आंगन में महर्शी अंगिरा द्वारा दिव्य वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ भव्य यग्य का आयोजन हुआ
03:04यग्य की पवित्र अगनी से एक अलौकिक चरू प्रसाद प्रकट हुआ जिसे महर्शी ने राजा की बड़ी रानी कृतद्यूती को
03:12ग्रहन करने के लिए दिया
03:15महर्शी अंगिरा ने राजा को चेताया कि यह पुत्र तुम्हारे लिए हरिशोक अर्थात हर्ष और अत्यंत शोक दोनों का कारण
03:23बनेगा
03:24गंभीर चेतावनी देने के पश्चात महर्शी अंगिरा राजा चितरकेतु और उनकी रानियों को अपने आशिर्वात से अभिभूत करके राजमहल से
03:34प्रस्थान कर गए
03:36महर्शी के जाने के उपरांत महारानी कृतद्यूती ने अटूट श्रधा और भक्तिभाव के साथ उस दिव्य प्रसाद रूपी चरु का
03:44सेवन किया
03:46समय बीतने के साथ जब महारानी कृतद्यूती गर्भवती हुई तो संपूर्ण शूरसिन देश में हर्ष और आनंद की एक लेहर
03:54दोड़ गई
03:56शुब महूर्त में महारानी ने एक अत्यंत सुन्दर और तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया जिसने राजा चित्रकेतु के वर्षों पुराने
04:04पुत्रहींता के दुख को समाप्त कर दिया
04:07पुत्र जन्मोट्सव के अफसर पर राजा चित्रकेतु ने अती प्रसन्न होकर योग्य ब्राह्मनों और प्रजाजनों को अपार स्वर्ण, भूमी और
04:16गोदान सहर्ष प्रदान किया
04:19दिन प्रति दिन जैसे जैसे राजकुमार बड़ा होने लगा, राजा चित्रकेतु का अनुरागी मन अपनी बड़ी रानी कृतद्यूती और उस
04:28बालक पर ही केंडरित रहने लगा
04:31राजा के इस एक तरफा प्रेन को देखकर उनकी अन्य पत्नियों के मन में उपेक्षा की तीवर भावना और भयंकर
04:38इर्षा की अगनी प्रजवलित हो उठी
04:42स्वय को तिरस्कृत मानकर उन रानियों ने अपने इर्षालू ह्रदय में अंधकार भरकर उस निश्पाप शिशु का अंत करने का
04:50दुस्साहस पूर्ण निर्णय लिया
04:52इरश्या से अंधी हुई उन रानियों ने अत्यंत गुप प्रूप से एक घातक और प्रानघाती विश्ट तयार कराया ताकि वे
05:00उस अबोध राजकुमार को सदा के लिए शांत कर सकें
05:04रात के गहन अंधकार में जब पूरा राजमहल निद्रा में मगन था एक शड्यंत्रकारी रानी चुपके से बालक के कक्ष
05:13में घुसी और उसे विश पिला दिया
05:16उस भयनकर विश का प्रभाव इतनी तेजी से फैला कि उस अबोध बालक की सांसे नेंद में ही सदासदा के
05:23लिए थम गई
05:25प्रातैकाल होते ही महारानी कृतद्यूती अपने प्राणप्रिय पुत्र को जगाने के लिए जैसे ही जूले के समीप पहुची उन्हें स्थिती
05:33असामान्य लगी
05:36बालक के ठंडे और निश्प्रान शरीर को स्पर्श करते ही महारानी कृतद्युती के मुख से एक हृदय विदारक चीख निकली
05:43और वे भूमी पर गिर पड़ी
05:46महारानी की अत्यंत करोन पुकार से पूरा राज महल कांप उठा और प्रहरी तथा अन्यदासी दास भैभीत होकर दोड़ पड़े
05:55चीख सुनकर बधवास राजा चित्रकेतु कक्ष में पहुँचे और अपने एक मात्र पुत्र को चेतना हीम पड़ा देख उनके पैरों
06:04तले जमीन खिसक गई
06:06असहनी अमानसिक आघात को सहन न कर पाने के कारण महाप्रतापी राजा चित्रकेतु अपनी चेतना खोकर भूमी पर मूर्चित होकर
06:15गिर पड़े
06:17अपने मृत पुत्र की चाती से लिपटकर रानी कृतद्यूती विलाप करते हुए अपने निश्थुर भाग्य और ईश्वर को कोसने लगी
06:26सारे राज्य में जो कल तक उत्सव मना रहा था अचानक इस भयंकर वजरपात से शोक और सन्नाटे की काली
06:33चाया चा गई
06:35मूर्चा तूटने पर राजा चित्रकेतु को महर्शी अंगिरा के वे शब्द याद आये कि यह पुत्र अत्यंत हर्ष और भयंकर
06:43शोक का कारण बनेगा
06:46अपने मृत पुत्र के पास बैठे राजा चित्रकेतु का हरदय पुत्रमोह के कारण अगाध दुख के सागर में डूग गया
06:53और वे संसार की नश्वर्ता के प्रती चिंतन करने लगे
06:57मृत राज कुमार के निश्प्रान शरीर को निहारते हुए राजा चित्रकेतु का चित्ट शोक के अगाध अंधकार में डूग गया
07:05और सम्पूर्ण राज सभा स्तंभित खड़ी रही
07:09उसी क्षण राज भवन का अंधकार में वातावर्ण सहसा एक अलोकिक दिव्य प्रकाश से जग्मगा उठा जब महर्शी अंगिरा देवर्शी
07:17नारत के साथ सभा भवन में प्रकट हुए
07:21परमग्यानी महर्शी अंगिरा ने अपने तपोबल से राजा के हृदय के भीशन संताप को भामपते हुए अत्यंत करुणा और सौमिता
07:29के साथ उनकी ओर कदम बढ़ाए
07:33अपने द्वार पर आये महर्शी अंगिरा और देवर्शी नारत को देख कर राजा चित्रकेतु ने अश्रुपूरित नेत्रों से उठकर उनके
07:41चर्णों में अपना मस्तक तेक दिया
07:44राजा ने रुंधे हुए गले से रिशी के समक्ष अपना दुख व्यक्त करते हुए पूछा की विधाता ने उन्हें पुत्र
07:51सुख देकर इतना भयंकर वजर्पात क्यों दिया
07:55महर्शी अंगिरा ने अत्यंत शांत भाव से राजा को समरण कराया कि उन्होंने पूर्व में ही यह चेताबनी दी थी
08:03कि यह पुत्र अत्यंत हर्ष और अपार शोक दोनों का कारण बनेगा
08:08महर्शी अंगिरा ने राजा को समझाते हुए कहा कि यह संपूर्ण संसार और इसके पुत्रपत्नी जैसे संबंध स्वपन की भांतीक
08:17शनभंगुर और माया का आवर्ण मात रहें
08:21तदोपरांथ देवर्शी नारद अपनी दिव्य महती वीना को संभालते हुए आगे आये और उनके सौमे मुखमंडल की आभा से राजा
08:30का अज्ञान चांटने लगा
08:32देवर्शी नारद ने कहा कि आत्मा अजर, अमर और अविनाशी है जो अपने कर्मों के अनुसार भिनभिन योनियों में नए
08:41वस्त्रों की भांती शरीर बदलती रहती है
08:45राजा के अज्ञान और पुत्रमोह के आवर्ण को पूनत है छिन्नभिन करने के लिए महर्शी अंगिरा ने अपने तपोबल से
08:52राजकुमार की मृत आक्मा को पुनह शरीर में आमंत्रित किया
08:57महर्शी के तपोबल से एक नीलाब दिव्य जोती मृत बालक के शरीर में प्रविष्ठ हुई और राजकुमार अचानक आखें खोल
09:05कर उठ बैठा
09:07अपने मृत पुत्र को जीवित देखकर राजा चितरकेतु और रानी कृतद्यूती अत्यंत व्याकुल होकर बालक की ओर दोडे और उसे
09:16पुनह अपने गले लगाने का प्रयास करने लगे
09:19परंतु उस बालक की आत्मा ने परम ज्यानी की भानती शांत वानी में पूछा की वे किस जन्म के पिता
09:26और किस जन्म की माता बनकर उससे मोह लगा रहे हैं
09:31आत्मा ने गंभीर स्वर में कहा कि अनादी काल चक्र में जीव अपने कर्मानुसार असंख्य शरीरों में कभी पुत्र, कभी
09:39पिता, तो कभी शत्रु बनता रहता है
09:42आथ कौन किसका स्थाई संबंधी है
09:46यह परम सत्यवानी कहने के पश्चात, वह दिव्य आत्मा पुनह उस नश्वर शरीर को त्याग कर आकाश मार्ग से अपने
09:54परमधाम की ओर प्रस्थान कर गई
09:57मृत पुत्र के मुख से इस परम ज्यान को सुनते ही राजा चित्रकेतु के हरिदय से अज्यान और मोह का
10:04अंधकार छंट गया और उन्हें परम वैराग्य की अनुभूती हुई
10:09रानी कृतद्युती तथा अन्यरानियों ने भी इस सत्य को स्विकार कर अपना क्रंदन बंद किया और संसार की असार्ता को
10:17समझकर शांत भाव धारन कर लिया
10:21ततपश्चात राजा चित्रकेतु ने पूर्णत आसकती रहित और शांत चित्थ होकर अपने पुत्र के पार्थिव शरीर का अंतिम संसकार शास्त्रोक्त
10:30विधी से पूर्ण किया
10:32मोह के बंधन से मुक्थ होकर राजा चित्रकेतु ने महर्शी अंगिरा और देवर्शी नारत के चर्णों में प्रणाम कर उनसे
10:40आत्मकल्यान और भगवद प्राप्ती का मार्ग पूछा
10:44प्रसन्न होकर महर्शी अंगिरा ने राजा चित्रकेतु को भगवान संकर्षन का परम गोपनिय दिव्य मंत्र प्रदान किया, जिससे उनके वैराध्यमय
10:53जीवन का नवीन अध्याय प्रारंभ हुआ
10:56महरशी अंगिरा से दिव्यमंत्र प्राप्त करने के पश्चात राजाचितरकेतु केवल जल का आहार लेते हुए एकाग्रचित से भगवान संकर्षन का
11:06अखंड जब करने लगे
11:08मात्र साथ रात्रियों के कठोर जब और अनन्य ध्यान के प्रभाव से राजा चित्रकेतु को सिध्धिया प्राप्थ हुई और वे
11:16विद्याधरों के स्वामी बन गए
11:19ततपश्चात राजा चित्रकेतु के समक्ष सहस्र फणो वाले अनन्त स्वरूप भगवान संकर्शन का परम अलोकिक और प्रभावानवित दिव्यदर्शन प्रकट हुआ
11:29भगवान संकर्षण के अत्यंत तेजस्वी और स्नेहमय स्वरूप को देखकर राजा चितरकेतु के नेत्रों से अश्रु बहने लगे और उन्होंने
11:38अश्रुपूरित नेत्रों से भगवान की स्तुती की
11:42प्रसन्न होकर भगवान संकर्षण ने चित्रकेतु को परमग्यान, निर्भैता और संपून ब्रहमांड में निर्बाद गती से विचर्ण करने वाला अलौकिक
11:51विमान प्रदान किया
11:54भगवान का आशिर्वाद पाकर चित्रकेतु अपने अलोकिक दिव्य विमान में विराजमान होकर सिध्धों और गंधर्वों के साथ श्री हरी के
12:02गुनों का गान करते हुए संपून आकाश मंडल में भ्रमन करने लगे
12:07एक दिन अपने दिव्य विमान में विचर्ण करते हुए चित्रकेतु का विमान पवित्र कैलाश परवत के अत्यंत हिम्मंडित और अलोकिक
12:16शिखरों के उपर से गुजरा
12:18वहाँ नीचे दृष्टिपात करने पर चित्रकेतु ने देखा कि रिशियों और सिध्धों की सभा के मध्य भगवान शिव अपनी गोद
12:26में माता पारवती को धारन किये हुए विराजमान थे
12:31अपने वैराग्य और ज्यान के अभिमान में आकर चित्रकेतु ने भरी सभा में भगवान शिव की उस स्थिती को देख
12:38कर उफास पूर्वक अट्ठास किया
12:41चित्रकेतु ने सभा के समक्ष चिल्ला कर कहा कि लोकमर्यादा के विप्रीत वेदवक्ता होकर भी भगवान शिव अपनी पत्नी को
12:49सब के सामने आलिंगन बद्ध किये हुए हैं
12:54चित्रकेतु के इनकटु और उफासात्मक वचनों को सुनकर भी भगवान शिव अत्यंत शांत, सौमय और मंद मुस्कान के साथ स्थिर
13:02बैठे रहे
13:04परंतु अपने स्वामी महादेव का ऐसा अनादर देखकर माता पार्वती का हृदय अत्यंत कृद्ध हो उठा और उनके नेत्रों से
13:12दिव्य ज्वालाएं प्रजवलित हो गई
13:15देवी पार्वती ने अपने स्थान से खड़े होकर चित्रकेतु की ध्रिष्टता और अहंकार की तीवर भर्टसना करते हुए उसे सभा
13:24के नियमों का स्मरण कराया
13:27क्रोधित होकर माता पार्वती ने चित्रकेतु को श्राप दिया कि वह इस दिव्य विद्याधर पद के योग्य नहीं है
13:34आथ वह स्वर्ग से पतित होकर असुर योनी में जन्म ले
13:39श्राप सुनते ही चित्रकेतु का संपून अभिमान क्षन भर में नश्ठ हो गया
13:44और वे तुरंत विमान से उतर कर भगवान शिव और माता पार्वती के चर्णों में साष्टान प्रणाम करने लगे
13:52चित्रकेतु ने अत्यंत विनमरता पूर्वक कहा कि वे इस श्राप को इश्वर का विधान मानकर सहर्ष स्विकार करते हैं
13:59और उन्हें केवल भगवान के चर्णों की भगती चाहिए
14:03शांत चित्थ और अगाध भगती से भरे चित्रकेतु देवी पार्वती और महादेव को प्रणाम करके वहां से अपने विमान द्वारा
14:12प्रसंता पूर्वक प्रस्थान कर गए
14:15चित्रकेतु के जाने के पश्चात भगवान शिव ने पारवती से कहा कि जो नारायन के सच्चे भक्त होते हैं, वे
14:22किसी भी परिस्थिती में भयभीट या दुखी नहीं होते
14:27कालांतर में वही चित्रकेतु देवी पारवती के उसी श्राप के फलस्वरूप प्रजाप्ती त्वश्टा के महान यग्यकुंड की प्रजवलित अगनी से
14:36अत्यंत विशालकाय असुर वृत्रासुर के रूप में प्रकट हुए
14:39इस प्रकार वृत्रासुर का बाह्य शरीर यद्यपी एक भयंकर राक्षस का था, परंतु उनके भीतर राजा चित्रकेतु की परम पवित्र
14:49भगवत भक्ती और दिव्य वैराग्य सदैफ प्रजवलित रहा
14:54चितरकेतु के इस वरित्रासुर बनने की प्रिष्ठ भूमी में उनके पूर्व जन्म के राजा चितरकेतु के जीवन की वह हृदय
15:01विदारक घटना है, जहां से उनके वैराग्यका मार्ग प्रशस्थ हुआ था
15:07संतानहींता के दुख में डूबे राजा चितरकेतु के महल में एक दिन परम तेजस्वी महर्शी अंगिरा पधारे, जिन्होंने राजा की
15:15व्यथा को समझ कर उन्हें यग्य का फल प्रदान किया
15:19महर्शी के आशिरवाद से रानी कृतद्यूती ने एक अत्यंत तेजस्वी और सुन्दर पुत्र को जन्म दिया, जिससे संपूर्ण शूरसिन सामराज्य
15:28में हर्ष का उच्सव मनाया जाने लगा
15:32नवजात शिशु के प्रती राजा चित्रकेतु का प्रेम इतना अगाध था कि वे अपना सारा समय केवल रानी कृतद्यूती और
15:40उस नन्हे बालक के साथ ही व्यतीत करने लगे
15:44राजा के इस पक्षपात और अपनी संतान हीनता से जलकर महल की अन्य रानियों के हृदय में इर्षया और क्रोध
15:52की एक भयानक अगनी धधकने लगी
15:55इर्षया की पराकाश्ठा में अंधी होकर उन निर्दही रानियों ने मिलकर उस निर्दोश बालक को हमेशा के लिए अपने मार्ग
16:03से हटाने का एक अत्यंत घिनोना शड्यंत्र रचा
16:07एक गुप्त रात्री में उनकप्टी रानियों ने अत्यंत तीवर और प्रांगातक कालकूट विश को एकत्रित कर उसे बालक के पें
16:15में मिलाने की तैयारी की
16:18जैसे ही उन्हें अफसर मिला एक दुष्ट दासी और रानी ने चुपचाप शिशु के कक्ष में प्रवेश किया जहां वह
16:26मासूम बालक पालने में शान्ती से सो रहा था
16:29उस निर्देई स्त्री ने सोते हुए मासूम बालक के मुख में वह विशैला दूध डाल दिया और बिना किसी पश्चाताप
16:37के वहां से दबे पाव भाग निकली
16:41विश के प्रभाव से उसको मल और निश्पाप बालक का शरीर धीरे धीरे तड़पने लगा और उसकी सासे थमने लगी
16:49पलक जपकते ही वह ननहा राजकुमार काल के करूर गाल में समा गया और उसके मुख का तेज हमेशा के
16:57लिए शान्त हो गया
16:59कुछ समय पश्चात जब मुख्य परिचारी का बालक को जगाने आई तो उसके निश्प्रान शरीर को देखकर वह भय और
17:06शोक से चीक उठी
17:09दासी के क्रंदन को सुनकर रानी कृतव्यूती पागलों की तरह दौरती हुई आई और अपने मृत पुत्र को देखकर मूर्चित
17:17होकर गिर पड़ी
17:19समाचार पाकर राजा चित्र के तुभी बधवास होकर वहाँ पहुँचे और अपने एक मात्र वंश को निर्जीव देखकर उनके पैरों
17:28तले की भूमी खिसक गई
17:30राजा ने अपने मृत बालक को छाती से लगा लिया और दहार मार कर रोने लगे उनका हृदय विदारक विलाप
17:38पूरे महल की दिवारों को कमपाने लगा
17:41देखते ही देखते शूरसेन सामराज्य के जिस राजमहल में उच्सव की शहनाईया गूंज रही थी वहां केवल कारुनिक क्रंदन और
17:50मातम छा गया
17:51कप्ती और ईश्यालू रानिया भी लोकलज्जा के भय से जूठे आसू बहाने लगी परन्तु उनके भीतर अपने कुकृत्य की सफलता
18:00का काला संतोश था
18:03राजा चित्रकेतु बार-बार विलाप करते हुए भाग्य और विधाता को कोस रहे थे उनका विशाल मुकुट भूमी पर गिरा
18:11हुआ था और उनके आभूशन बिखर चुके थे
18:15राणी कृतद्यूती अपने मृत्पुत्र के मुख को चूंते हुए अपने वस्त्र फाड रही थी उनका मात्रित्व दुहक के ऐसे अथा
18:23सागर में डूग गया था जिसकी कोई सीमा न थी
18:27जब राजा और रानी का दुहक असहनिय हो गया तब उनके इस अगाध मोह को नश्ट करने और उन्हें सत्य
18:35का भ्यान कराने के लिए देवर्शी नारद और महर्शी अंगिरा पुन्ह प्रकट हुए
18:40महर्शी अंगिरा ने अत्यंत करुनापून स्वर में बिलखते हुए राजा चितरकेटु को पुकारते हुए उनके अगाध शोक को शांत करने
18:49का प्रयास किया
18:51महर्शी अंगिरा ने राजा को स्मरण कराया कि कैसे उन्होंने पूर्व में पुत्र का वर्दान देते हुए यह संकेत दिया
18:58था कि यह संतान सुख और दुख दोनों का कारण बनेगी
19:03इसके बाद देवर्शी नारद ने अपनी महती वीना की मधुर जंकार के साथ राजा चित्रकेतु को संबोधित करते हुए जीवन
19:11की परम सत्यता का उधगातन करना प्रारंभ किया
19:16देवर्शी नारद ने समझाया कि काल की बहती नदी में मातापिता और संतान का मिलन रेट के कणों की भांती
19:23अस्थाई है जो समय के बहाव में एक साथ आते हैं और पुनह बिछड जाते हैं
19:30फूट फूट कर रोती हुई रानी कृतद्यूती ने भी नारद मुनी के इन सत्यवादी वचनों को सुना जो शरीर के
19:37नश्वर होने का ज्यान दे रहे थे
19:40राजा और रानी के अज्यान के आवर्ण को पूर्णतह नश्ट करने के लिए देवर्शी नारद ने अपनी तपोबल शक्ती से
19:48उस्मृत शिशुकी दिव्य आत्मा को पुनह वहां आमंत्रित किया
19:53राजसभा के मध्य अचानक एक अत्यंत प्रदीप्त स्वर्णिम जोति पुन्च के रूप में बालक की मुक्त आत्मा प्रकट हुई जिससे
20:01संपूर्ण कक्ष आलोकित हो उठा
20:04देवर्शी नारद ने उस अलोकिक जोति पुन्च से प्रश्न किया कि वह बताए कि इस संसार के अनंत जन्मों में
20:11राजा चित्रकेतु और रानी कृतज्यती उसके कौन से माता पिता है
20:17उस दिव्य और निर्मल आत्मा ने अत्यंत शांत तथा अलोकिक वानी में बोलना आरंभ किया जिसे सुनकर वहां उपस्थित सभी
20:26लोग स्थब्ध रह गए
20:28आत्मा ने बताया कि संसार के अनादी चक्र में वह न जाने कितने व्रिक्षों, पशुओं, देवों और मनुश्यों के रूप
20:35में जन्म ले चुकी है
20:37इसलिए उसके करोडों माता पिता रही है
20:41उस मुक्ट आत्मा ने राजा को बोध कराया कि भौतिक जगत में कोई किसी का वास्तविक संबंधी नहीं है
20:48सभी जीव केवल परमात्मा के नित्य और अमर अंश है
20:53मृत शिशु की आत्मा के इन परम ज्यान्युक्त वचनों को सुनकर
20:58राजा चित्रकेतु के भीतर छुपा अज्यान का अंधकार और पुत्रमोह क्षन भर में छिन्न भिन्न हो गया
21:05रानी कृतद्यूती ने भी उस सत्य को स्विकार किया
21:08और समझ गई की मिक्टी से बने इस नश्वर शरीर से मोह करना निरर्थक और अज्यानता पूर्ण है
21:16रिशियों और अपने पूर्व मातापिता को प्रणाम करके
21:20वह दिव्य जोति पुंज आत्मा पुनह उच्च आध्यात्मिक लोग की ओर अंतरध्यान हो गई
21:26अज्यान के बंधन से मुक्थ होकर राजा चित्रकेतु ने भक्ती और विनमर्ता से भरकर देवर्शी नारद और महर्शी अंगिरा के
21:35चर्णों में साष्टान प्रणाम किया
21:38देवर्शी नारद ने प्रसन्न होकर राजा चित्रकेतु को भगवान संकर्षन का अतिपावन और गोपनिय महामंत्र प्रदान किया, जो मोक्ष प्रदान
21:47करने वाला था
21:49महर्शी अंगिरा ने राजा को सांसारिक दुखों से पार पाने के लिए भगवत भक्ती जब और तीवर तपस्या का मार्ग
21:57अपनाने का उपदेश दिया
21:59राजा चित्रकेतु और रानी कृतद्युती ने पूर्ण वैराग्य और अनासक्ती के साथ अपने मृत बालक के पार्थिव शरीर का अंतिम
22:08संसकार संपन किया
22:10अपने विशाल सामराज्य, राजसी वस्त्रों और समस्थ भौतिक वैभव का त्याग करके राजा चित्रकेतु एक परम तपस्वी के रूप में
22:19राजमहल से बाहर निकल पड़े
22:22पवित्र नदी के तट पर बैठ कर राजा चित्रकेतु का मन पूरी तरह से आत्मा की अमरता और श्रीहरी के
22:29अनन्य ध्यान में लीन हो गया
22:31पवित्र नदी के तटपरलीन राजा चितरकेतु के समक्ष देवर्शी नारद और महर्शी अंगिरा प्रकट होकर उन्हें परमेश्वर के परम ज्ञान
22:40का उपदेश प्रदान करते हैं
22:44देवर्शी नारद ने चित्रकेतु को भगवान संकर्षन की स्तुती से परिपूर्ण एक दिव्य महामंत्र प्रदान किया, जो जीव को अज्ञान
22:52के अंधकार से मुक्त करता है
22:56नारद मुनी के दिये मंत्र का अनन्य भाव से जब करते हुए चित्रकेतु साथ रात्रियों तक केवल जल पीकर कठोर
23:03तपस्या में लीन हो गए
23:05साथ दिनों की अन्वरत साधना के उपरांत चित्रकेतु को विद्याधरों के स्वामी पद की सिध्धी प्राप्थ हुई और उनका चेतनास्तर
23:14अत्यंत दिव्य हो गया
23:16चित्रकेतु के ध्यान में प्रत्यक्ष प्रकट होकर शेशनाग स्वरूप भगवान संकर्षण ने अपनी हजार फणों की अनंतकांती से समस्त ब्रह्मांड
23:25को आलोकित कर दिया
23:28भगवान संकर्षण के अनुपम रूप का दर्शन कर चित्रकेतु के नेत्रों से अश्रूओं की धारा बह निकली और वे गदगत
23:35कंट से प्रभु के चर्णों में नत्मस्तक हो गए
23:39श्रीहरी के संकर्षण रूपने प्रसन्न होकर चित्रकेतु को निश्काम भक्ती, परमग्यान और सिध्धियों से युक्त एक अलौकिक दिव्य विमान प्रदान
23:48किया
23:49अब विद्याधर नरेश चित्रकेतु अपने अलौकिक विमान में सवार होकर तीनों लोकों में भगवान विश्नु के पावन गुनों का गान
23:58करते हुए विचर्ण करने लगे
24:01भगवान के संकीरतन में लीन होकर आकाश मार्ग से यात्रा करते हुए चित्रकेतु का दिव्य विमान कैलाश परवत के सुरमे
24:09वातावर्ण के उपर पहुँचा
24:11कैलाश परवत पर चित्रकेतु ने देखा कि भगवान शिव रिशियों की सभा में देवी पारवती को अपने अंक में बैठा
24:19कर आसीन है
24:22भगवान शिव के गूर और अप्रमे आध्यात्मिक स्वरूप को न समझ पाने के कारण चित्रकेतु के मन में एक क्षण
24:29के लिए अहम और अज्ञान का बीजारोपन हो गया
24:33चित्रकेतु ने रिशियों की सभा में उचे स्वर में हनस्ते हुए कहा कि समस्ट जगत के गुरू होकर भी भगवान
24:40शिव रिशियों के सम्मुख ऐसा आचर्ण कर रहे है
24:45परमशान्त और समदर्शी भगवान शिव चित्रकेतु के वचनों को सुनकर तनिक भी विचलित नहीं हुए और केवल एक मंद मुस्कान
24:53के साथ मौन रहे
24:55परंटु जगजञ्नी देवी पार्वती अपने स्वामी के प्रती चित्रकेतु के इस दुश्साहस और अज्यानपून आक्षेप को सहें न कर सकी
25:04और उनका रूप क्रोध से प्रदीक्थो उठा
25:08देवी पार्वती ने चित्रकेतु को धिक्कारते हुए कहा कि वह स्वयंको भगवान शिव और महाग्यानी रिशियों से भी बड़ा धर्मग्य
25:16समझने का दुस्साहस कर रहा है
25:20अत्यंत कुपित होकर माता पार्वती ने चित्रकेतु को श्राप दिया कि वह इस दिव्य विद्याधर पद से गिरकर एक क्रूर
25:28असुर योनी में जन्म ले
25:30श्राप सुनते ही चित्रकेतु तुरंत अपने अलोकिक विमान से नीचे उतरे और बिना किसी प्रतिरोध या क्रोध के देवी पार्वती
25:39के चर्णों में साधर प्रणाम किया
25:42चित्रकेतु ने विनमरतापूर्वक कहा कि वे माता के श्राप को शिरोधार्य करते हैं क्योंकि सुखदुख और स्वर्गनर्ग केवल कर्मों का
25:50चक्र और इश्वर की लीला है
25:54चित्रकेतु का ऐसा अलौकिक वेराग्य और सहनशील्टा देखकर भगवान शिव ने देवी पार्वती से कहा कि भगवत भक्त कभी किसी
26:02परिस्थिती से भयभीत नहीं होते
26:06देवी पार्वती के चर्णों में वंदन कर चित्रकेतु शांत चित्त से चले गए जो आगे चलकर महाबली और ज्यानी असुर्व
26:14रित्रासुर के रूप में प्रकट होने वाले थे
26:18कैलाश परवत से विदा लेकर राजा चित्रकेतु बिना किसी क्षोग या चिन्ता के अपने अलौकिक विमान में सवार होकर शांत
26:26चित्त से प्रस्थान कर गए
26:29अंतरिक्षपत पर विचर्ण करते हुए उन्होंने महर्शी अंगिरा और देवर्शी नारत द्वारा दिये गए परम वैशनव मंत्र का निरंतर स्मरण
26:37जारी रखा
26:39चित्रकेतु का हृदय भगवान संकर्षण के चर्णों में लीन था जिससे सिद्ध हुआ कि निशकाम भक्ती हर प्रकार के श्राप
26:47और सुखदुख से परे होती है
26:50श्री शुकदेव जी ने राजा परीच्षित को समझाया कि नारत जी के उपदेश से प्राप्त विद्याधर्पद और परम ज्यान ने
26:58चित्रकेतु को जण्मम्रक्यु के भै से मुक्त कर दिया था
27:02रिशियों के ज्यान से चित्रकेतु जान चुके थे कि आत्मा न कभी पैदा होती है और न मरती है बलकी
27:09केवल भौतिक वस्त्र बदलती है
27:13करोडों वर्षों तक चित्रकेतु ने विद्याधरों के स्वामी के रूप में गंधर्वों के साथ भगवान विश्नों के दिव्य यश्का गान
27:20करते हुए विचर्ण किया
27:23उनका मन निरंतर अनन्त देव भगवान संकर्षन के ध्यान में डूबा रहता था जिससे उनके मुखमंडल पर असीम अलोकिक कांती
27:31जलकती थी
27:33देवी देवता और महर्शी भी चित्रकेतु के इस अध्वितिय वैराग्य और संभाव की बारंबार प्रशंसा करते रहे
27:42काल्चक्र के प्रभाव से जब माता पार्वती के श्राप के फलीभूत होने का समयाया तो चित्रकेतु ने उसे इश्वर की
27:50इच्छा मानकर सहश स्वीकार किया
27:53उन्होंने बिना किसी दुहक या मोह के अपने विद्याधर शरीर का त्याग कर दिया और उनकी दिव्य चेतना नए जन्म
28:01की ओर अग्रसर हुई
28:03प्रजाप्ती त्वश्टा द्वारा किये गए महान यज्यकुंड की प्रजवलित अग्नी से एक अत्यंत विशाल और शक्तिशाली आकरिती प्रकट हुई
28:13यद्यपी उनका बाहरी स्वरूप वृत्रासुर नामक महाबली असुर का था, किन्तु उनकी आत्मा में राजा चित्रकेतु का वही परम वैशनव
28:22ज्यान विद्यमान था
28:24बाहर से वे भले ही भयंकर असुर प्रतीत होते थे, परंतु भीतर से वे भगवान नारायन के अनन्य और परम
28:31भक्त थे
28:33श्री शुकदेव जी ने परीक्षित को बताया कि वृत्रासुर और इंद्र का युद्ध केवल देवताओं की लीला का एक भाग
28:41मात्र था
28:42युद्ध भूमी में भी वृत्रासुर का ध्यान और बुद्धी भगवान श्रीहरी के चर्णों से क्षन भर के लिए भी विचलित
28:49नहीं हुई
28:51राजा परीक्षित यह सुनकर स्तब्ध रह गए कि एक असुर के रूप में भी चित्रकेतु की भक्ती इतनी निश्काम और
28:58पवित्र थी
29:00शुक्देव जी ने कहा कि भगवान नाम का आश्रे लेने वाले जीव को कोई भी श्राप या विपत्ती कभी विचलित
29:07नहीं कर सकती
29:09चित्रकेतु के वैराज्य और व्रिट्रासुर के पूर्वजन्म की यह कथा संपूर्ण संसार के लिए परम ज्यान और भक्ती की प्रेना
29:17है
29:19जो मनुष्य इस प्रसंग को भक्ति पूर्वक सुनता है, वह संसार के सभी मोहमाया, दुरक और अज्ञान के बंधनों से
29:27मुक्थ हो जाता है
29:29इस प्रकार श्री शुकदेव जी ने चितरकेटु के चरित्र का वर्नन समाप्त किया और परीक्षित का चित्त पूर्णता भगवत भाव
29:37में लीन हो गया
29:39भगवान विश्णों की अनुकम्पा से सिध्धों के राजा बने चित्रकेतु अपने अत्यंत देधी प्यमान विमान में बैठकर संपून ब्रहमांड का
29:48स्वेच्छा से भ्रमन कर रहे थे
29:50वे निरंतर भगवान श्रीहरी के मधुर यश्का गान करते हुए अनेक दिव्य लोकों और परवतों के उपर से आनन्द पूर्वक
29:58गुजर रहे थे
30:00ग्रमन करते हुए एक दिन उनका दिव्य विमान उस पावन छेत्र की ओर बढ़ा जहा रिशियों और सिध्धों की एक
30:07विशाल सभा जुड़ी हुई थी
30:10उस दिव्य सभा के मध्य में संपूर्ण जगत के स्वामी भगवान शिव रत्नजडित सिन्हासन पर विराजमान होकर रिशियों को धर्म
30:18का उपदेश दे रहे थे
30:21जगतगुरु शिव के बाएं अंग पर उनकी अर्धांगिनी देवी पारवती अत्यंत प्रेम और आदर के साथ विराजमान थी
30:30सभा में उपस्थित संकादी रिशी और महान तपस्वी सिर जुकाकर भगवान शिव के मुख से निकलते गूड वेदान्त ज्यान को
30:38ध्यानपूर्वक सुन रहे थे
30:40राजा चितरकेतु का स्वन विमान ठीक उस दिव्य सभा के उपर से गुजरा और उनकी द्रिश्टी नीचे बैठी मंडली पर
30:48पड़ी
30:50चितरकेतु ने देखा कि महान योगेश्वर शिव अनेक ज्यानियों के बीच बैठकर भी देवी पार्वती को अपनी गोद में धारन
30:58किये हुए हैं
30:59यह द्रिश्य देखकर चितरकेतु के मन में अत्यंत आश्चर्य और एक क्षणिक अज्यानता पूर्ण संकोच उत्पन्न हुआ
31:09उन्होंने सोचा कि जो शिव परम विरक्त और योगियों के गुरु माना जाते हैं, वे इस प्रकार सार्वजनिक सभा में
31:16स्त्री संग कैसे कर रहे हैं
31:19अपने ज्यान के गर्व और लोक मर्यादा के अभिमान में आकर चितरकेतु ने अपने विमान की गती धीमी कर ली
31:28चितरकेतु ने उस रिशिमंडल की ओर देखा और चहरे पर एक हलकी मुस्कान लाकर उंचे स्वर में टिपपणी करना प्रारंब
31:35किया
31:37चितरकेतु ने कहा कि ये शिव संपूर्ण जगत के गुरु और धर्म के रक्षक होकर भी साधारन कामुक मनुष्यों जैसा
31:44आचर्ण कर रहे हैं
31:47उन्होंने आगे कहा कि साधारन मनुष्य भी अपनी पत्नी के साथ एकांत में बैठते हैं परन्तु ये महात्मा भरी सभामे
31:55देवी को अंक में बैठाए हैं
31:59चित्रकेतु ने व्यंग्य करते हुए कहा कि जटाधारन करने वाले ऐसे महान तपस्वी को इस प्रकार की लोकमर्यादा का उलंधन
32:07नहीं करना चाहिए
32:10चित्रकेतु के इन अनुचित और दुस्साहसी वचनों को सुनकर सभा में बैठे महान रिशी स्तब्ध रह गए और संकोच से
32:17अपने नेत्र जुका लिए
32:20परम ज्यानी और समदर्शी भगवान शिव ने चित्रकेतु की इस टिपपणी को सुनकर भी कोई क्रोध नहीं किया और मंदमंद
32:28मुस्कुराते रहे
32:30किन्तु जगन माता देवी पार्वती के मुख मंडल पर चित्रकेतु के इस अहमकार युक्त दुस्साहस को देखकर अत्यंत गंभीर और
32:38कठोर भाव उभराए
32:41संपूर्ण वातावर्ण में एक क्षण के लिए सन्नाटा चा गया, मानो नेती किसी महान परिवर्तन और श्राप का संकेत दे
32:49रही हो
32:50अपनी भूल से अंजान अभिमान में डूबे चित्रकेतु शिवजी के मौन को देखकर अपने विमान में आगे बढ़ गए
32:59चित्रकेतु के इस अनुचित अटहास को देखकर जगनमाता देवी पारवती का सौमय रूप अत्यंत भीशन और उग्रहो उठा, मानो प्रलै
33:08का मेग घिर आया हो
33:10क्रोध से कमपायमान होते हुए देवी पारवती ने सभा के समक्ष अपनी गंभीर वानी में कहा कि इस अहंकारी विद्याधर
33:19ने मर्यादा की सारी सीमाएं लांग दी है
33:23परम शांत महादेव शिवजी ने देवी पारवती को शांत करने के लिए अपनी शांत और सौमय द्रिष्टी से उनकी ओर
33:30देखा, परंतु नेती का विधान अटल था
33:34देवी पारवती ने अपने दाहिने हाथ को उठा कर ब्रहमांडिय उर्जा को केंद्रित किया, जिससे संपूर्ण कैलाश पर्वत थर्थरा उठा
33:44अत्यंत क्रोधित होकर जगनमाता पारवती ने चित्रकेतु को श्राप दिया कि तुम स्वर्गलोक के अयोग्य हो, आथ तुम एक क्रूर
33:53और अज्यानी असुर योनी में जन्म लोगे
33:56देवी पारवती का वह भयानक श्राप एक चमचमाती हुई स्वर्णिम बिजली की तरहा आकाश मार्ग से होकर चित्रकेतु के दिव्य
34:04विमान की ओर बढ़ा
34:07श्राप की उस्तीक्षन ध्वनी को सुनकर राजा चित्रकेतु ने तुरंत अपने दिव्य विमान की गती को रोक दिया और भैभीत
34:15होने के बजाय वे अत्यंत शान्त हो गए
34:18अपने अहंकार का बोध होते ही चित्रकेतु अपने विमान से नीचे उत्रे और अत्यन्त विनमरभाव से कैलाश की पावन भूमी
34:27पर चले आए
34:29चित्रकेतु ने भगवान शिव और देवी पार्वती के चर्णों में आकर साश्टांग दंडवत प्रणाम किया जिससे उनका संपून अभिमान क्षण
34:37भर में चूर-चूर हो गया
34:40उन्होंने हाथ जोड कर अत्यन्त मधुरवानी में कहा कि हे देवी मैं आपके इस श्राप को सहर्ष स्विकार करता हूँ
34:48क्योंकि यह मेरे ही कर्मों का फल है
34:52चित्रकेतु के मुख पर लेशमात्र भी क्रोध या दुहक न देखकर पूरी देवसभा आश्चर्यच्कित रह गई उनके शब्दों में केवल
35:00भक्ती और समर्पन था
35:03भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए देवी पार्वती से कहा कि देखो प्रिय जो नारायन के अनन्य भक्त होते हैं वे
35:10स्वर्ब नरक या श्राप किसी से भी भैभीट नहीं होते
35:15चित्रकेतु ने दोनों देवों की परिक्रमा की उनके चर्णों की धूल अपने मस्तक पर लगाई और अत्यंत प्रसन्न मन से
35:23वहां से प्रस्थान किया
35:36समय बीतने के साथ चित्रकेतु ने अपने भौतिक शरीर का त्याग कर दिया और उनकी जीवात्मा उस महान नेती की
35:44ओर बढ़ चली जो अगले जन्म में पूरी होनी थी
35:48उधर देवराज इंद्र से अपने पुत्र विश्वरूप की हत्या का बदला लेने के लिए महर्शित वश्टा ने एक अत्यंत विशाल
35:56और उग्र यग्य का आरंभ किया
35:59महर्शित वश्टा ने अत्यंत क्रोध में आकर यग्यकुंड में आहुती डालते हुए मंत्रो चार किया कि इंद्र का शत्रु बनकर
36:07एक महान असुर उत्पन्न हो
36:10तभी उस धधकते हुए विशाल यग्यकुंड के भीशन काले धुए और लाल लप्टों के बीच से एक अत्यंत विशाल का
36:17आकरिती उभरने लगी
36:20उस अगनी से एक परवत के समान विशाल वजर जैसी कायावाला और प्रल्यंकारी तेश से युक्त महान असुर वृत्रासुर प्रकट
36:29हुआ जो चित्रकेतु का ही नया जन्म था
36:33पूर्वजन्म के संसकार और भक्ती को समेटे हुए वृत्रासुर का यह भयानक रूप स्वर्ग और प्रित्वी के बीच एक नय
36:40और महाविनाशकारी संधर्ष की नीम बनने जा रहा था
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