Skip to playerSkip to main content
साम्ब के विवाह के बाद, देवर्षि नारद द्वारका पधारे भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं को समझने। क्या वे खोज पाएंगे उस रहस्य को कि कैसे एक ही श्रीकृष्ण एक साथ 16,108 महलों में उपस्थित रहते हैं? इस एपिसोड में देखें नारद मुनि की अद्भुत यात्रा, जहाँ वे श्रीकृष्ण की योग-माया के अप्रतिम दर्शन कर अचंभित रह जाते हैं! उनकी हर पत्नी के साथ विभिन्न भूमिकाओं में श्रीकृष्ण को देखकर नारद को परम सत्य का ज्ञान प्राप्त होता है। #BhagavataPurana #KrishnaLeela #NaradaMuni #Dwaraka #YogaMaya #HinduMythology #EpicStories #DivineVision #YouTubeSeries #S3Ep66
Transcript
00:00हस्तिनापुर में शांती स्थापित होने और साम्ब के विवाह के उपरांत देवर्शी नारत के मन में भगवान श्री कृष्ण की
00:07असीम योगमाया को प्रत्यक्ष देखने की तीवर अभिलाशा जागरत हुई.
00:12अपनी महती वीना के तारों पर नारायन नारायन का मधूर कीर्टन करते हुए नारत मुनी दिव्य अंतरिक्ष में विचर्ण कर
00:20रहे थे, परन्तु उनके विचार द्वारका के अध्भुत रहस्यों में डूबे हुए थे.
00:26वे विस्मय में थे की कैसे एक ही पूर्ण पुरुशोत्तम भगवान श्रीकृष्ण एक ही समय में अपनी 16,108 रानियों
00:35के साथ ग्रिहस्थ धर्म का निर्वाह करते हैं.
00:39इस अलौकिक रहस्य का प्रत्यक्ष साक्षी बनने के लिए परमज्यानी नारद ने तुरंत प्रित्वी लोग की ओर प्रस्थान करने का
00:47निश्चय किया.
00:49स्वर्ग लोग की सीमाओं को पार करते हुए बादलों के बीच से मार्ग बनाते हुए देवर्शी नारद तीवर गती से
00:56नीचे की ओर बढ़ने लगे.
00:59अचानक बादलों के छटने पर नीले समुद्र के विशाल वक्षस्थल पर तैरती हुई स्वर्ग से भी सुन्दर और भव्य द्वार
01:07का नगरी नारद जी के नेत्रों के सामने प्रकट हुई.
01:11द्वारका की स्वर्णमे दीवारें विशाल गोपुर द्वार और सूर्य की किर्णों में चमकते हुए अट्टालक देवर्शी को विस्मय से भर
01:19रहे थे.
01:21जैसे ही नारद मुनी के चरन द्वारका की पावन और सुवर्णमे भूमी पर पड़े, वे वहां के कनकन से बहती
01:28दिव्य उर्जा का अनुभव कर पुलकित हो उठे.
01:32द्वारका की चोड़ी और स्वच सडकों पर चलते हुए नारद जी ने देखा कि वहां के मार्ग सुगंधित जल से
01:39सिंचित थे और दोनों और विशाल कल्प वरिक्ष जैसे सुन्दर वरिक्ष शोभाय मान थे.
01:45मार्ग में आते जाते सुखी और समरिध नागरिक देवर्शी को देख कर श्रधा पूर्वक जुपकर प्रणाम कर रहे थे, जिससे
01:53द्वारका की उच्च संस्कृती स्पष्ट जलक रही थी.
01:57चलते चलते नारत जी उस विशाल अंतहपुर के समीप पहुँचे, जहां भगवान श्री कृष्ण की 16,108 पत्नियों के भव्य
02:06और विशाल महल स्थित थे.
02:09नारत जी ने सोचा की क्या भगवान वास्तव में हर महल में एक ही समय पर उपस्थित रहकर अपनी लीलारच
02:16रहे हैं, या यह केवल उनकी कलपना है.
02:20अपनी जिग्यासा को शांत करने के लिए, उन्होंने सबसे पहले पट्रानी देवी रुकमिनी के अत्यंत वैभवशाली और मुख्य महल में
02:29प्रवेश करने का मन बनाया.
02:32रुकमिनी जी का वह महल वैदूर्य मनियों और हीरों से जड़ा हुआ था, जिसके शिखरों पर फहराते रेश्मी ध्वजवायू के
02:39वेग से लहरा रहे थे.
02:42जैसे ही नारद जी ने महल के मुख्य गर्भग्रिह में कदम रखा, उन्हें दिव्य पारिजात पुष्पों की मनमोहक सुगंध और
02:50अलौकिक शान्ती का अनुभव हुआ.
02:53महल के भीतर प्रवेश करते ही नारद जी ने देखा कि साक्षात द्वारकाधिश भगवान श्रीकृष्ण अपनी पत्रानी रुक्मिनी के साथ
03:01अत्यंत शान्त मुद्रा में विराजमान है.
03:06पितामबर धारी मयूर्मुकृट सुशोभित भगवान श्रीकृष्ण का वहश्याम वर्ण रूप और उनके गले का कौस्तुभ मनी पूरे कक्ष को प्रकाश
03:14मान कर रहा था.
03:17देवी रुक्मिनी अपने कोमल हाथों से चमवर डुला कर प्रभु की सेवा कर रही थी और दोनों के मुख पर
03:23एक परम संतोष की आभा जहलक रही थी.
03:27नारद मुनी को आते देखकर भगवान श्रीकृष्ण तुरंत अपने आसन से उठ खड़े हुए और उनके चहरे पर एक चिरपरिचित
03:36प्रेम्मई मुस्कान बिखर गई.
03:39नारद जी ने श्रधा से सिर जुकाया, परंतु उनके मन की उठसुकता और बढ़ गई की क्या अन्य महलों में
03:46भी प्रभु इसी तरह उपस्थित होंगे.
03:49रुक्मिनी के महल से विदा लेकर देवर्शी नारद उठसुकता से भरे कदमों से बाहर निकले और उनके मन में द्वारका
03:57के अन्य महलों के रहसियों को जानने की तीवर अभिलाशा जागरित हो गई.
04:03द्वारकापुरी के मुख्य राजपत पर आते ही नारद जी ने देखा कि वहां की सडके मनियों से जड़ी थी और
04:10चारों और स्वर्ण तथा स्वटिक से बने उचे-उचे प्रासाद आकाश को छू रहे थे.
04:16जिग्यासा के वशी भूत होकर देवर्शी नारद दूसरे विशाल महल के सिंहदवार पर पहुँचे जिसकी सुरक्षा अत्यंत पराक्रमी और दिव्य
04:25आयुधों से सुसजित यादव रक्षक कर रहे थे.
04:29महल के भीतर प्रवेश करते ही नारद जी ने एक अलौकिक उपवन देखा, जहां कल्प व्रिक्ष के समान व्रिक्षों पर
04:36दिव्य पुष्प खिले थे और स्वर्ण के फवारों से सुवासित जल की धाराय बह रही थी.
04:43जैसे ही नारद जी ने मुख्य कक्ष में कदम रखा, वे यह देखकर स्तब्ध रह गए कि भगवान श्री कृष्प
04:50वहां अपनी पट्रानी सत्यभामा के साथ अत्यंत प्रेम पूर्वक चौपड खेल रहे थे.
04:56नारद जी को देखकर इस महल के श्री कृष्प भी तुरंत उठ खड़े हुए और उन्होंने देवर्शी का वैसे ही
05:03आदर सत्कार किया, जैसे कि वे उनसे आज पहली बार मिल रहे हुँ.
05:09इस विस्मयकारी लीला से चकित होकर नारद जी ने वहां से प्रस्थान किया और वे अत्यंत उठसुकता से तीसरी पट्रानी
05:17जामबवती के महल की ओर तेजी से बढ़े.
05:21जामबवती के महल में प्रवेश करते ही देवर्शी के आश्चर्य की सीमा न रही, क्योंकि वहां भी श्री कृष्ण अपनी
05:28इस रानी के साथ बैठ कर अपने ननहें बालकों को धनुषबान चलाना सिखा रहे थे.
05:35वहां उपस्थित श्री कृष्ण ने भी जैसे ही नारत जी को देखा, वे हाथ जोड कर आगे बढ़े और मधुर
05:42वचनों से उनका स्वागत करते हुए उन्हें श्रिष्ट आसन पर बैठाया.
05:47अपने संशय को दूर करने के लिए व्याकुल नारत जी उस आसन पर अधिक समय न रुख सके और वे
05:54तुरंथी चौथी पट्रानी कालिंदी के महल की ओर चल पड़े.
05:59कालिंदी के महल में पहुँचकर देवर्शी ने देखा कि श्याम सुन्दर वहां अत्यंत शांत मुद्रा में विश्राम कर रहे थे
06:06और देवी कालिंदी उन्हें मधुर स्वर में वन्शी सुना कर रिजहा रही थी.
06:12हैरान परेशान नारत जी अब महल से बाहर आ गए और उन्होंने अपनी दिव्य शक्ती से आकाश में उड़कर द्वार्का
06:20के सभी महलों को एक साथ देखने का निश्चय किया.
06:24आकाश से देखने पर नारत जी को द्वार्का के सभी 16,108 महलों में एक समान चहल पहल और एश्वर्य
06:32का सामराज्य दिखाई दिया.
06:35उन्होंने देखा कि नगर के सुखी और समरिध नागरिक रेश्मी वस्त्र और बहुमूल्य आभूशन पहने हुए भगवान द्वारकाधीश की महिमा
06:44के कीर्टन में मगन थे.
06:46अपनी शंका के समाधान के लिए देवर्शी नारद ने द्वारका की मुख्य राजसभा सुधर्मा में प्रवेश किया, जहां राज्य के
06:54महत्वपूर्ण विश्यों पर विचार विमर्ष होता था.
06:57वहां उन्होंने देखा कि भगवान श्रीकृष्ण महाराजा उग्रसेन और अन्यवरिष्ट यादव मंत्रियों के साथ बैटकर बड़ी गंभीरता से राजकार्य का
07:08संचालन कर रहे थे.
07:10यह देखकर नारत जी का मनपूर्ण तह विस्मित हो गया कि एक ही श्रीकृष्ण एक ही समय में सभी महलों
07:17और राजसभा में अलग-अलग रूपों में साक्षात उपस्थित हैं.
07:23देवर्शी अब द्वारका के दिव्य बाजारों से होकर गुजरे जहां व्यापारी रतनों और देवदुलब फलों का क्रयविक्रे करते हुए भी
07:31प्रभु के नामों का जब कर रहे थे.
07:34नारद जी ने द्वारका के छोर पर स्थित समुद्र को देखा, जो अपनी स्वर्णमे और शांत तरंगों से इस दिव्य
07:42नगरी के चर्णों को अत्यंत श्रधापूर्वक पखार रहा था.
07:46अपने हृदय को भक्ती और विस्मय के सागर में डूबा पाकर देवर्शी नारद ने अपनी वीना के तारों को जंकृत
07:54किया और वे श्री कृष्ण की इस अध्भुत योगमाया का गान करने लगे.
07:59अपनी वीना को थामे हुए देवर्शी नारद ने रुकमिनी देवी के उस भव्य और स्वर्णिम महल के मुख्य द्वार की
08:06ओर अपने कदम बढ़ाए, जिसके शिखर बादलों को छू रहे थे.
08:12महल के भीतर प्रवेश करते ही नारद जी स्वटिक मनी से निर्मित गलियारों की अलौकिक चमक देखकर मंत्र मुख्ध हो
08:19गए, जहां चारों और दिव्य सुगंध व्याप्त थी.
08:23जब देवर्शी उस मुख्य कक्ष के समीप पहुँचे, तो उन्होंने रिश्मी और सुनहरे परदों से सजेद्वार पर अत्यंत विनीत और
08:32आदरपूर्ण पहरेदार दासियों को खड़े देखा.
08:36जैसे ही नारत जी ने धीरे से परदे को हटा कर भीतर जाका, उनके नेत्र विस्मय और परम आनन से
08:43पूरी तरह खिल उठे.
08:45कक्ष के मध्य में एक अलोकिक रत्नजरित स्वर्ण हिंडोले पर भगवान श्रीकृष्ण अपनी परम प्रिय पत्रानी रुक्मिनी के साथ विराजमान
08:54थे.
08:55देवर्शी ने देखा कि द्वारका के अधिपती और स्रिष्टी के पालनहार श्रीकृष्ण स्वय अपने हाथों से मयूर पंख का पंखा
09:03लेकर रुक्मिनी देवी को हवा कर रहे थे.
09:06इस मधुर ग्रिहस्थ द्रिष्ण में श्रीकृष्ण ने एक सुवर्ण पात्र से अत्यंत शीतल और सुवासित जल लेकर रुक्मिनी देवी को
09:15अपने हाथों से पिलाया.
09:18रुक्मिनी जी के मस्तक से जब उनका रेश्मी आचल थोड़ा खिसक गया, तो प्रभु ने अत्यंत कोमलता से उसे पुनह
09:26उनके सिर पर सुसजित कर दिया.
09:29रुक्मिनी देवी ने भी अत्यंत प्रेम पूर्वक अपने कोमल हाथों से एक सुगंधित तामबूल तयार कर अपने प्राणप्रिय प्रभु के
09:37मुख में सादर अर्पित किया.
09:40नारद मुनी इस परमपावन और निश्कपट दामपत्य प्रेम के दर्शन कर भावविभोर हो गये और उनका हृदय प्रभु की इस
09:48अध्भुत लीला के प्रतीकृत अग्यता से भर गया.
09:52अपनी उपस्थती दर्श कराने के लिए देवर्शी ने अपनी खड़ाओं की ध्वनी की और वे मुस्कुराते हुए उस दिव्यकक्ष के
09:59भी तरा गए.
10:01नारत जी के आगमन की आहट पाते ही भगवान श्रीकृष्ण तुरंत अपने हिंडोले से उठ खड़े हुए और उनका मुखमंडल
10:09आदर के भाव से दीप्थो उठा.
10:12रुकमिनी देवी ने भी अत्यंत आदर पूर्वक खड़े होकर अपने मस्तक को जुकाया और देवर्शी के पावन चर्णों में अपनी
10:20श्रधा अर्पित की.
10:23श्रीक्रिष्ण ने आगे बढ़कर देवर्शी नारत का हाथ अपने हाथों में थाम लिया और अत्यंत प्रेम के साथ उन्हें गले
10:30लगाकर उनका स्वागत किया.
10:34द्वारकाधीश ने देवर्शी को एक उचे अत्यंत दिव्य स्वर्णेम आसन पर बिठाया, जो केवल श्रेष्ट देवताओं और पूज रिशियों के
10:42लिए आरक्षित था.
10:45रुकमिनी देवी तुरंत स्वर्ण कलश में गंगाजल लेकर आई, जिससे भगवान श्री कृष्ण ने स्वय अपने हाथों से देवर्शी के
10:53चर्णों का प्रक्षालन किया.
10:55चर्णों को धोकर श्री कृष्ण ने उस पवित्र जल को अपने और रुकमिनी जी के शीश पर छिड़का, जिससे ग्रिहस्थ
11:03धर्म की पराकाश्ठा सिध्ध हुई.
11:06प्रभु ने अत्यंत मधुर्वानी में पूछा, हे देवर्शी, आपकी यह यात्रा मंगल में रही न? हम आपके आगमन से धन्य
11:16हो गए हैं.
11:18नारत जी ने कहा, हे अच्चुत, आपकी यह अध्भुत ग्रिहस्थ लीला देखकर मेरा मन विस्मय से भर गया है, जो
11:26संपूर्ण चराचर जगत को मर्यादा सिखाती है.
11:31नारत जी ने सोचा की उन्होंने श्रीकृष्ण को केवल इसी रूप में पालिया है, परंतु वे अभी योगमाया के उस
11:38विराट कौतुक से पूरी तरह अनभिग्य थे, जो आगे प्रतीक्षा कर रहा था.
11:44रुकमिनी जी के राजभवन से बाहर निकल कर नारत मुनी उच्सुकता और चंचलता से भरे कदमों से सत्यभामा के भव्य
11:52महल की ओर बढ़ने लगे.
11:55प्रभु श्री कृष्ण के आतिथ्य सत्कार की मधूर स्मृती उनके मन में तैर रही थी, पर वे यह जानने को
12:02आतुर थे कि अन्य महलों में क्या गतिविधिया चल रही हैं.
12:07देवी सत्यभामा का महल पन्नों की हरियाभा और सुगंधित पारिजात पुष्पों से सजे सुन्दर उध्यानों से सुशोगित हो रहा था.
12:17द्वारपालों ने अत्यंत श्रद्धा से जुपकर महर्शी नारत का स्वागत किया और उन्हें सत्यभामा के निजी कक्ष की ओर जाने
12:24का मार्ग दिखाया.
12:27देवर्शी ने सोचा था कि वे वहारानी सत्यभामा को अकेली या अपनी सक्खियों के साथ विश्राम करते हुए पाएंगे.
12:35परंतु जैसे ही वे रेश्मी परदों को हटा कर कक्ष के भीतर प्रविश्थ हुए, उन्हें हाथी दात के पासों की
12:42खनक और मधुर हास्य की ध्वनी सुनाई दी.
12:46कक्ष के मध्य में हाथी दात और सोने से जड़े मंच पर भगवान श्रीकृष्ण को सत्यभामा के साथ चौपड खेलते
12:53देख नारद जी स्तब्ध रह गए.
12:57श्रीकृष्ण के श्याम वण शरीर पर पीतामबर लहरा रहा था और वे मंद मुसकान के साथ पासे हाथ में थामे
13:04सत्यभामा से हासपरिहास कर रहे थे.
13:07रानी सत्यभामा लाल रेश्मी वस्त्रों और चम्चमाते आभूशनों से सुसज्जित होकर पूर्ण तनमयता से खेल का आनंद ले रही थी
13:17नारद मुनी को देखते ही श्री कृष्ण ने चौपड का खेल रोक दिया और अत्यन्त प्रसन्नता से आसन से उठकर
13:25उनकी ओर बढ़े
13:27भगवान ने पुनः वही दिव्य आत्मियता दर्शाते हुए कहा अहो देवर्शी आज हमारे इस महल में आपका आगमन अत्यन्त शुब
13:36है
13:38नारत जी का मन गहरे विस्मय और भ्रम में डूब गया क्योंकि कुछ ही क्षण पूर्वे प्रभु को रुकमिनी के
13:45महल में छोड़ा आये थे
13:47देवर्शी ने श्रीकृष्ण के मुखारविंद को ध्यान से देखा, किन्तु वहा किसी शीघरता या माया के छलका लेशमात्र भी संकेट
13:56नहीं था
13:57रानी सत्यभामा ने भी सम्मान पूर्वक आगे बढ़कर महर्शी के चर्णों में प्रणाम किया और उन्हें मनियों से जड़े सुंदर
14:05आसन पर बैठने का आगरह किया
14:09आसन पर बैठते हुए नारत जी ने सोचा कि क्या श्रीकृष्ण अत्यंत तीवरगती से रुक्मिनी के महल से निकल कर
14:16यहां पहले ही पहुच गए है
14:19अपने संदेह को शांत करने के लिए नारत जी ने पूछा है प्रभु क्या आप अभी अभी रुक्मिनी जी के
14:27राजभवन से यहां पधारे हैं
14:31श्रीकृष्ण ने बड़ी सरलता से उत्तर दिया है मुनिवर मैं तो प्रभात काल से ही यहां सत्यभामा के संखेल में
14:39मगन हूँ
14:39मुझे अन्यत्र जाने का समय ही कहा मिला
14:43प्रभु का यह उत्तर सुनकर देवर्शी के रोंगटे खड़े हो गए और उनका ज्यानी हृदय इस अलौकिक लीला के सामने
14:51नत्मस्तक होने लगा
14:52वे समझ गए कि यह मात्र कोई साधारन संयोग नहीं बलकि भगवान की अगाध योगमाया का एक ऐसा रहस्य है
15:01जिसे भेदना असंभव है
15:05अपने कौतुहल को और बल मिलते देख नारत जी ने निश्चय किया कि वे द्वारका के अन्य सभी महलों में
15:12जाकर इस दिव्य कौतुक की सत्यता पर खेंगे
15:16अत्यंत उच्शुक्ता और विस्मय से भरे देवर्शी नारत जी ने रुकमिनी देवी के भवन से बाहर कदम रखा और तुरंत
15:23ही पार्श्व में स्थित एक दूसरे भव्य महल की ओर प्रस्थान किया
15:28जैसे ही नारत जी ने दूसरे महल के भीतर प्रवेश किया वे यह देखकर चकित रह गए कि वहाँ साक्षात
15:36श्री कृष्ण को महारानी सत्यभामा और उनकी दासिया सुवर्ण कल्शों के सुगंधित जल से स्नान करा रही थी
15:44उत्सुकता और बढ़ने पर जब देवर्शी तीसरे महल में पहुँचे तो उन्होंने देखा कि नटखट श्यामसुंदर अपने छोटे-छोटे हंस्ते
15:52हुए बच्चों के पीछे दौड रहे हैं और उनके साथ लुकाच्छिपी का खेल खेल रहे हैं
15:59चौथे भव्य महल में कदम रखते ही नारत जी ने देखा कि भगवान श्री कृष्ण अत्यंत शांत मुद्रा में कुशा
16:07के आसन पर विराजमान होकर पवित्र अगनी के समक्ष गायत्री मंत्र का जाब कर रहे हैं
16:14पांचवे महल के प्रांगण में पहुँचने पर नारत जी की आखें फटी की फटी रह गई जहां श्री कृष्ण एक
16:21वीर सेनापती के रूप में अपने मंत्रियों के साथ चम्चमाते रथों और शस्त्रों का निरीक्षन कर रहे थे
16:28छठे प्रासाद में प्रवेश करते ही देवर्शी ने देखा कि द्वार काधीश अत्यंत विनमर्ता पूर्वक अपने हाथों से दिव्य भोजन
16:37परोसकर हजारों वेडपाथी ब्राहमनों को त्रिप्त कर रहे हैं
16:42साथवे महल के संगीत कक्ष में श्री क्रिश्न अपनी एक प्रियरानी द्वारा बजाई जा रही वीना की मधूर्तान पर आखे
16:50मूदे संगीत के अलोकिक रस में पूरी तरह डूबे हुए प्रतीत हो रहे थे
16:56आठवे महल के अंतहपुर में देवर्शी ने देखा कि करुणामई प्रभू अपनी पट्रानी जामबवती के माथे पर अत्यंत प्रेम से
17:04सुगंधित चंदन का तिलत लगा रहे हैं
17:08नोवे महल के विशाल यग्यशाला में श्री कृष्ण यग्योप वीत धारण कर रित्विजों के साथ वेद मंत्रों के सस्वर उच्चारण
17:16के बीच धधकती हुई पवित्र आहुती अग्निदेव को समर्पित कर रहे थे
17:22दसवे महल में नारद जी ने देखा कि लीलाधर श्री कृष्ण एक मखमली शया पर विश्राम कर रहे हैं और
17:29उनकी अर्धांगिनी अत्यंत श्रद्धा पूर्वक उनके कोमल चरण कमलों को सहला रही हैं
17:36ज्यारहवे महल की न्यायस भा में बैठकर श्री कृष्ण द्वारका के दो नागरिकों के बीच चल रहे गंभीर विवाद को
17:43अत्यंत न्यायप्रिय और धर्मनिष्ठ राजा की भाती सुलजा रहे थे
17:49बारहवे महल के क्रीडा ग्रह में प्रवेश करते ही नारत जी ने देखा कि प्रभू अपनी रानी के साथ चौपड
17:55के खेल में मगन हैं और अपनी चाल चलते हुए मंदमंद मुस्कुरा रहे हैं
18:02तेरहवे महल के विशाल गोशाला में द्वार काधीश अपने दिव्य हाथों से सोने के पक्तरों से मढ़े सिंगो वाली हजारों
18:10दुधारू गायों को दरिद्र ब्राहमनों को दान में दे रहे थे
18:14चौधवे महल के शांत पुस्तकालय में श्री कृष्ण अत्यंत आदरपूर्वक हाथ जोड कर एक व्रिद्ध तपस्वी गुरू से प्राचीन वेदों
18:23और उपनिश्दों का गूड ज्यान ग्रहें कर रहे थे
18:27पंद्रवे महल के मुख्य द्वार पर खड़े होकर प्रभु द्वारका के निर्धन और असहाय याचकों को सुन्दर वस्त्र अन्न और
18:35सुवर्ण मुद्राएं बाटने के कार्य का स्वय निरीक्षण कर रहे थे
18:40सोलवे महल के चंद्रिका से आलोकित जरोखे के नीचे श्री कृष्ण अपने परम बुद्धिमान सखा उद्धव के कान में अत्यंत
18:48गुप्त और महत्वपूर्ण राजनीतिक रणनीतियों की चर्चा कर रहे थे
18:53सत्रहवे महल के विस्तृत सैन्य मैदान में योगेश्वर श्री कृष्ण अपने शक्तिशाली धनुषपर बान चढ़ा कर अचूक निशाने बाजी का
19:01अभ्यास कर रहे थे और उनका मुख तेज से दमक रहा था
19:06अठारहवे महल के सघन उपवन में सावन की रिमजिम फुहारों के बीच श्री कृष्ण अपनी रानी कालिंदी के साथ पुष्पों
19:14से सजे जूले पर बैठ कर आमोध प्रमोध कर रहे थे
19:18उननीसवे महल के विशाल जलाशय के किनारे खड़े होकर श्री कृष्ण अस्ताचल गामी सूर्यदेव को अर्ध्य देकर संध्यावन्दन की पवित्र
19:27वैदिक क्रियाओं को पूर्ण कर रहे थे
19:31भगवान की इस अचिंत्य, अनन्त और सर्वव्यापी योगमाया के प्रत्यक्ष दर्शन कर देवर्शी नारत का अहंकार पूरी तरह विलीन हो
19:39गया और वे अश्रुपूर्ण नेत्रों से प्रभु के चर्णों में गिर पड़े
19:44जब देवर्शी नारत अश्रुपूर्ण नेत्रों से भगवान के चर्णों में जुके, तब द्वारकाधीश श्रीकृष्ण ने उन्हें अत्यंत प्रेमपूर्वक अपने दिव्य
19:53हाथों से उठा कर गले लगाया
19:56अगले महल में प्रवेश करते ही नारत जी ने देखा कि श्रीकृष्ण शांत मुद्रा में बैठ कर परम ज्यानी रिशियों
20:03से वेदों के गूड रहसियों और उपनिश्दों का श्रवण कर रहे हैं
20:0921 वे भव्य महल के विस्तृत प्रांगण में श्रीकृष्ण एक वीर योध्धा के रूप में सचकर एकागरता के साथ धनुषबान
20:17से अचूक लक्ष साधने का अभ्यास कर रहे थे
20:2122 वे महल की विशाल सभा में सिन्हासन पर विराज मान होकर द्वारकाधिश अत्यंत गंभीर्ता के साथ अपनी प्रजाकी समस्याओं
20:30को सुनकर न्यायपूर्ण निर्नय दे रहे थे
20:3423 वे महल की स्वर्णमंदित गउशाला में पहुँचकर नारत जी ने देखा की प्रभूस्वया अपने हाथों से कपिला गायों को
20:42हरी घास और मधूर नैविध्य खिला रहे हैं
20:4624 वे महल के रत्नजडित भोजन कक्ष में श्रीकृष्ण अपनी पत्रानी मित्रविंदा के साथ बैठकर अत्यंत प्रेनपूर्वक 56 भोग का
20:55आनंद ले रहे थे
20:5725 वे महल के विशाल यज्यमंडप में बैठकर श्रीकृष्ण पवित्र मंत्रो चार के बीच धधक्ती अग्निदेव की ज्वालाओं में घी
21:05और समिधा की आहुतिया दे रहे थे
21:0926 वे महल के हवादार बरामदे में श्रीकृष्ण अपनी चंचल रानी सत्यभामा के साथ बैठकर हनस्ते खिल खिलाते हुए चौपड
21:17के खेल का आनंद ले रहे थे
21:2027 वे महल के अखाडे की धूल में श्रीकृष्ण युवा यादव राजकुमारों को गदा और तलवार बाजी के दाम पेच
21:28सिखाते हुए एक कुशल गुरु की भूमिका निभा रहे थे
21:3228 वे महल के मुख्य द्वार पर खड़े होकर परोपकारी श्रीकृष्ण दिन्दुखियों और ब्राहमनों को स्वर्ण मुद्राय तथा रेश्मी वस्त्रदान
21:41में दे रहे थे
21:4229 महल के शीतल और सुगंधित शयनकक्ष में विश्राम करते हुए प्रभु के श्रीचर्णों को महारानी रुक्मिनी अत्यंत श्रद्धा और
21:52अनुराग के साथ दबा रही थी
21:5530 महल के सुंदर उपवन में कदम के व्रिक्ष के नीचे खड़े होकर श्रीकृष्न जब मधूर बांसुरी बजा रहे थे
22:03तब जुन्द के जुन्द हिरन और मयूर मंत्रमुग्ध होकर उनके निकट खिंचे चले आ रहे थे
22:0931 गुप्ट मंत्रणा कक्ष में श्रीकृष्न अपने चतुर मंत्री उद्धव के साथ बैठकर राज्य की सुरक्षा और कूटनीती पर गंभीर
22:18विचार विमर्ष कर रहे थे
22:2132 महल के राज की ये पुस्तकाले में बैठकर श्रीकृष्न भोजपत्रों पर विशेश संदेश लिखकर अन्य राज्यों के राजाओं के
22:29पास दूट भेजने की तयारी कर रहे थे
22:3333 महल के संगमर्मर के जलाशय में सेवकगन श्रीकृष्न को सुगंधित औश्धिय तेलों और केवडे के जल से स्नान करा
22:42रहे थे
22:43जोतिश और अध्यात्म की चर्चा करते हुए 34 महल में श्रीकृष्न जिग्यासु शिश्यों को जीवन, मृत्यू और आत्मा के अमर्त्व
22:52का सर्वोच ज्यान प्रदान कर रहे थे
22:5535 महल के विशाल राजकोष में बैठ कर श्रीकृष्न स्वर्ण और रत्नों के संचय तथा प्रजाकल्यान के बजट का बारीकी
23:04से निरीक्षन कर रहे थे
23:06इन सभी अध्भुत द्रिश्यों को एक ही समय पर घटित होते देख विस्मित नारत जी महलों से बाहर आकर द्वारका
23:13के विशाल प्रांगण में खड़े हो गए
23:16तभी संपूर्ण आकाश में श्रीक्रिष्न का विराट और अनन्त रूप चमक उठा जिसमें सभी महल और ब्रहमांड के कंकन प्रभु
23:25की योगमाया से आलोकित हो रहे थे
23:29भगवान की इस परमपावन और असीम योगमाया के रहस्य को समझ कर देवर्शी नारत हाथ जोड़कर गदगद कंट से प्रभु
23:37की स्तुती गाते हुए आकाश मार्ग की ओर प्रस्थान कर गए
23:42आकाश मार्ग में उपर की ओर बढ़ते हुए देवर्शी नारत का मन भगवान श्री कृष्ण के उस अनंत बहुआयामी और
23:49विस्मेकारी रूप के चिंतन में पूरी तरह मगन हो गया
23:53जब उन्होंने पीछे मुड कर नीचे देखा तो उन्हें स्वर्णमी द्वार का नगरी योगमाया की एक रहस्यमे बैंदनी और सुनहरी
24:02धुंध में लिप्टी हुई किसी अलोकिक दिव्यरत्न की तरह चमक्ती दिखाई दी
24:07अपने ज्यान और बुद्धी के अहंकार को पूरी तरह तूटा हुआ पाकर नारत जी ने अपनी दिव्यवीना के तारों को
24:15चुआ और प्रभु की शर्नागती का एक अत्यंत मधुर और करुनापूर्ण राग छेर दिया
24:21अपनी आखे बंद कर देवर्शी ने मानस पटल पर देखा कि कैसे एक ही परमेश्वर बिना किसी विभाजन के हजारों
24:29महलों में एक आदर्श ग्रिहस्थ, पिता और राजा की भूमी का पूरी तरह निभा रहे थे
24:35उसी मानसिक दर्शन में श्री कृष्ण के वे अंगिनत रूप धीरे-धीरे एक होकर शंक, चक्र, गदा और पद्मधारन किये
24:44हुए चतुर्भुज भगवान नारायन के आदिस्वरूप में विलीन हो गए
24:49जब नारत जी ने अपनी आखें खोली और टिम्टिमाते तारों को देखा, तो उन्हें आभास हुआ कि यह संपूर्ण भौतिक
24:57जगत श्री कृष्ण की मात्र एक तिर्ची चित्वन से उत्पन हुआ एक खिलोना है
25:03जब वे गंधर्वों और यक्षों के लोकों से होकर गुजरे तो वहां के दिव्य निवासी नारत जी के मुख पर
25:10छाई असीम शांती और भक्तिमय तेज को देखकर विस्मय से भर गए
25:15एक शांत और अलौकिक निहारिका के पास ठहर कर देवर्शी शूने में तैरते हुए उस अचिंत्य भेदाभेद के सिध्धान्त को
25:23समझने का प्रयास करने लगे जो बुद्धी की सीमा से परे हैं
25:29उन्होंने विचार किया कि जब स्वयन स्रिष्टी के रचिता ब्रह्मा और संहारक भगवान शिव भी श्रीकृष्ण की इस मधुर लीलामाधुरी
25:37से मोहित हो जाते हैं तो किसी साधारन जीव की क्या विसा
25:42उनके हृदय में भक्ती का ऐसा तीवर प्रवाह उम्रा कि उनके सारे मानसिक संशय बह गए और उनके नेत्रों से
25:50पर्मानंद के अश्रु अविरल धारा बनकर बहने लगे
25:54तभी ब्रहमान्ड के असीम अंधकार के बीच से एक अत्यंत कोमल और दिव्य सुनहरी आभा प्रकट हुई जिसने देवर्शी के
26:03संपूर्ण अस्तित्व को अपनी उश्मा से सराबोर कर दिया
26:07उस परम प्रकाश के भीतर नारद जी को भगवान की उस पराशक्ती देवी योगमाया की सुक्ष्म उपस्थिती का आभास हुआ
26:15जो इस चराचर जगत के परदे के पीछे से सब संचालित करती है
26:21अगले ही क्षन ब्रह्मांडिय बादलों के बीच से अश्ट भुजाधारी देवी योगमाया अत्यंत तेजस्वी और मनमोहक रूप में प्रकट हुई
26:30और उन्होंने नारद जी की ओर देखकर मंद मुस्कान बिखेरी
26:35देवर्शी ने हवा में ही हाथ जोड़ कर उस आध्याशक्ती को नमन किया जो अभिमानी लोगों से भगवान को छिपा
26:43देती हैं और अनन्य भक्तों के सामने उन्हें प्रकट कर देती हैं
26:48वह रहस्यमई देवी देखते ही देखते पुना ब्रह्मांड के अनन्त तानेबाने में विलीन हो गई और पीछे छोड़ गई केवल
26:56टिम्टिमाते तारों की एक दिव्यन अदी
26:59अपने जीवन के सबसे बड़े रहस्य को साक्षात देखकर गदगद हुए नारत जी ने पूरी शक्ती से अपनी वीना पर
27:07नारायन नारायन का महामंत्र जंकृत कर दिया
27:11उस पावन महामंत्र की ध्वनी तरंगे अंतरिक्ष के सूनेपन को चीरती हुई सभी दिशाओं में फैल गई जिससे पूरे ब्रहमांड
27:19के जीवों के हृदय में परम शान्ती का संचार होने लगा
27:24उन्होंने उर्ध्व लोकों की ओर ग्रिश्टी की और यह समझ गये की जो लीला उन्होंने अभी द्वारका में देखी है
27:31वह वास्तव में नित्य गोलोक और वैकुंठ में सदा प्रवाहित रहती है
27:37ज्यान का सारा अहंकार त्याग कर महान देवर्शी ने संकल्प लिया कि वे अब तीनों लोकों में केवल श्री कृष्ण
27:45की इस अगाध और निश्चल प्रेमलीला का ही प्रचार करेंगे
27:49जैसे ही देवर्शी नारद अंतरिक्ष की अगाध नीलिमा में विलीन हुए नीचे स्थित द्वारका नगरी प्रभु की अचिंत्य लीला के
27:58साक्षी के रूप में दैदी प्यमान खड़ी रही
28:01अंतरिक्ष के उच्च लोकों से पुनह उतर कर देवर्शी नारद द्वारका के मुख्य राजप्रसाद की ओर मुड़े
28:09जैसे ही नारद मुनी ने भगवान श्री कृष्ण के निजी कक्ष में प्रवेश किया, वहां का वातावर्ण असीन शान्ती और
28:17अलौकिक सुगंध से भर गया
28:19कक्ष के सुन्दर स्वर्ण सिनहासन पर साक्षात जगदगुरु भगवान श्री कृष्ण अपनी महारानी रुक्मिनी के साथ विराजमान थे
28:3016108 महलों में प्रभु के एक साथ दर्शन करने का अद्भुत अनुभव नारत के हिरिदय में अब भी तरंगित हो
28:37रहा था
28:39नारत जी ने अपने दोनों हाथ जोड कर अपनी वीना को विश्राम दिया और परमिश्वर के समक्ष अत्यंत विनमरता से
28:46खड़े हो गए
28:48उसी क्षन भगवान श्री कृष्ण ने अपनी कमल्नियंद रिष्टी उठाई और नारत मुनी की ओर मंदमंद मुस्कुराते हुए देखा
28:57प्रभु की उस रहस्यमय और मायावी मुस्कान में संपूर्ण ब्रहमांड का ज्यान और लीला का अगाध सागर समाया हुआ था
29:06उस मुस्कान ने नारत को यह भली भांती जता दिया कि प्रभु उनकी हर जिग्यासा और परीक्षा लेने के भाव
29:14से पूरी तरह अवगत थे
29:16श्री कृष्ण की सर्वग्यता को भापकर देवर्शी का हरिदय अपने इस अग्यान पर लजजित और प्रभु के प्रेम से गदगधो
29:24उठा
29:25वह मुस्कान कोई साधारण हनसी नहीं बलकि योगमाया का वह अनादी द्वार थी जिसके पीछे स्वयन परंब्रंग छिपे रहते हैं
29:35उस एक ही मुस्कान के प्रभाव से नारत मुनी का बचाकुचा बौधिक अहंकार भी पूरी तरह से भस्म हो गया
29:44नारत ने समझा की प्रभू एक ही समय में निरलिप्त योगी भी हैं और 16,108 ग्रिहस्थियों के पूर्ण समर्पित
29:52स्वामी भी
29:54भगवान की अचिन्ते शक्ती का ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव पाकर देवर्शी का प्रत्यक रोमरों आनंद से पुलकित हो गया
30:03मंद मुस्कान बनाय रखते हुए श्रीक्रिष्ण ने नारत से पूछा है देवर्शी क्या आपकी द्वार का यात्रा सुगम और आनंदमई
30:12रही
30:13श्रीक्रिष्ण के मधुर वचनों और मुस्कान से गदगद होकर नारत मुनी सीधा प्रभु के चरंकमलों में साश्टान प्रणाम कर पड़े
30:22नारत मुनी ने गदगद कंट से कहा कि है प्रभु आपकी इस महामाया को समझना ब्रह्मा और महादेव के लिए
30:29भी अत्यंत कठिन है
30:32भगवान श्रीकृष्ण ने अपना अभय वरध हस्त उठाकर देवर्शी को आशिर्वाद दिया और अपनी वह चित्तचोर मुस्कान बनाय रखी
30:42प्रभु का आशिर्वाद पाकर नारद मुनी का हृदय परमज्यान और अनन्य भक्ती के पावन प्रकाश से परिपूर्ण हो गया
30:51श्रीकृष्ण की वह अध्भुत मुस्कान नारद के लिए इश्वर की अनन्त लिया और निर्पेक्ष प्रेम का नित्य प्रतीक बन गई
30:59अतह देवर्षी नारद ने प्रभु को अंतिम प्रणाम किया और संपूर्ण ब्रह्मांड में श्रीकृष्ण की इस अलोकिक माया का यशगान
31:08करने के लिए प्रस्थान किया
31:11देवर्षी नारद आकाश गंगा के बीचों बीच तैरते हुए अपनी स्वर्णिन वीना की जंकार से भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का
31:19प्रथम स्वर अलापते हैं जिससे संपूर्ण ब्रह्मांड मुग्ध हो जाता है
31:24अपनी दिव्ययात्रा में नारद मुनी ब्रहम लोग पहुँचते हैं जहां वे स्रिष्टी के रचिता ब्रहमाजी के सम्मुक श्रीकृष्ण को चराचर
31:33जगत का आदिसरोत और परमकारण घोशित करते हैं
31:38नारत जी गदगद स्वर में ब्रहमा जी को बताते हैं कि कैसे वे परमिश्वर जो ब्रहमांडों के नियंता हैं
31:45द्वारका में एक साधारण ग्रिहस्ट की भाती लोग कल्यान के लिए लीलाए कर रहे हैं
31:52वे गाते हैं कि भगवान की योगमाया इतनी अध्भुत है कि वह बड़े-बड़े ज्यानियों के मन को भी विस्मित
31:59कर देती है, फिर भी भक्तों को परम गती प्रदान करती है
32:04इसके पश्चात देवर्शी कैलाश परवत की ओर प्रस्थान करते हैं, जहां देवों के देव महादेव अपनी समाधी से उठकर श्रीकृष्ण
32:13की इस अलौकिक गाथा को सुनने के लिए लालायत होते हैं
32:18शिव जी के सम्मुख नारद जी वर्णन करते हैं कि कैसे प्रभू श्रीकृष्ण एक ही समय में 16,108 महलों
32:26में अलग-अलग नित्यकर्मों का सम्पादन कर रहे हैं
32:31नारद की वानी सुनकर भगवान शिव पर्मानंद में मगन हो जाते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि श्रीकृष्ण ही धर्म
32:38की मर्यादा स्थापित करने वाले साक्षात परमेशवर हैं
32:43नारद आगे गाते हैं कि यद्यपी श्री कृष्ण पूर्ण काम है और उन्हें किसी वस्तु की आवश्शक्ता नहीं है, फिर
32:51भी वे एक राजा और आदर्श पती के रूप में समाज का मार्ग गर्शन कर रही हैं
32:58कैलाश से विदा होकर देवर्शी देवराज इंद्र की अमरावती सभा में पहुँचते हैं, जहां उच्सुक देवता उनकी इस दिव्यस्तुती का
33:07श्रवन करने के लिए एकत्र होते हैं
33:10इंद्र की सभा में नारद जी बताते हैं कि कैसे समस्त ब्रह्मांड के स्वामी श्री कृष्ण के चर्णों की धूली
33:17को बड़ेब्डे देवता अपने मुकुट पर धारन करने के लिए तरस्ते हैं
33:23वे देवराज को समझाते हैं कि श्री कृष्ण की यह लीला मनुश्यों को सांसारिक मोह से मुक्त कर उन्हें शाश्वत
33:30भक्ती के पत्पर अग्रसर करने की एक अनूठी योजना है
33:35सभा में उपस्थित, गंधर्व और अपसरायभी नारद की वीना के साथ सुर से सुर मिलाकर श्री कृष्ण के अनुपम रूप
33:43और सुन्दर मुस्कान का गान करने लगती हैं
33:48ततपश्चात नारद मुनि प्रित्वी लोग के हिमालय शेत्र में स्थित रिशियों के पावन आश्रमों में पहुँचते हैं, जहां यग्य की
33:55अगनी प्रजवलित हो रही होती है
33:59रिशियों के बीच बैठ कर नारद जी बताते हैं कि वेदों और उपनिश्दों के अंतिम लक्ष साक्षात परब्रहम ही द्वारका
34:07में श्यामसुन्दर के रूप में अवतरित हुए हैं
34:11वे वर्णन करते हैं कि कैसे प्रभु द्वारका के अपने राजसिनहासन पर बैठ कर पूरे ब्रहमांड की व्यवस्था को पलक
34:18जपकते ही अत्यंत सुगमता से संचालित करते हैं
34:23नारत की स्तुती को सुनकर तपस्वी रिशियों की आखों से प्रेमाश्रूओं की धारा बहने लगती हैं और वे समझ जाते
34:31हैं कि केवल अनन्य भक्ती से ही उस अजन में इश्वर को पाया जा सकता है
34:37इसके बाद नारत की यह मधुर स्तुती मृत्यो लोक के राजाओं और साधारन प्रजा के कानों तक पहुँचती है जिससे
34:45उनके अशांत मन को असीम शांती की अनुभूती होती है
34:50नारत जी एक विशाल परवत के शिखर पर खड़े होकर सागर की गर्जना के बीच दोनों हाथ उठाकर श्रीकृष्ण को
34:58संपून स्रिष्टी का एक मात्र और परम आश्रय घोशित करते हैं
35:04इस स्तुती के प्रभाव से नारत के हरिदय में भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य विराट रूप की एक शनिक परंतु अती
35:11दिव्य जोती प्रकट होती है जो उनके ज्ञान को पूर्णता प्रदान करती है
35:17अंतह अपनी वीना पर हरे कृष्ण महामंत्र की तान छेड़ते हुए देवर्शी नारत अनंत ब्रहमांडों में श्रीकृष्ण के इस अध्भुत
35:26मायारहस्य का प्रचार करने के लिए आगे बढ़ जाते हैं
35:31देवर्शी नारत जिन्होंने अभी अभी योग माया के रहस्य का साक्षात कार किया था
35:36अब अपनी वीना की दिव्यतान छेड़ते हुए अनंत ब्रहमांडों में श्रीकृष्ण की महिमा का गुनगान करने निकल पड़े
35:44उनकी वीना से प्रवाहित हरे कृष्ण की ध्वनी प्रत्येक लोक में गुमजती हुई
35:50सभी प्राणियों के हृद्यों को श्रीकृष्ण के अनुपम प्रेम और एश्वर्य की ओर आकर्शित कर रही थी
35:57कुछ ही क्षणों में वे देवलोग की एक भव्य सभा में पहुँचते हैं
36:02जहां इंद्र सहित अनेक देवता और रिशिमुनी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे
36:06उनके चहरे पर जिग्यासु भाव स्पष्ट था
36:10नारग मुनी ने अपनी वीना को एक ओर रख कर सभा में उपस्थित सभी देवों और रिशियों को सादर प्रणाम
36:18किया
36:18उनके मुख मंडल पर दिव्य शांती और प्रफुलता का अनोखा संगम था
36:24उन्होंने अपनी यात्रा का वृत्तान सुनाना आरंभ किया
36:28द्वार का नगरी की अलोकिक शोभा और भगवान श्री कृष्ण के 16,108 महलों का वर्णन करते हुए
36:36देवतागन और रिशिमुनी उनकी बात सुनकर अचम्भित रह गए
36:40उनके चहरों पर विश्वास और विस्मय का अद्भुत मिश्रन दिखाई दे रहा था
36:46नारद ने एक एक कर उन महलों में श्री कृष्ण की लीलाओं का वर्णन किया
36:51जहां वे प्रत्येक रानी के साथ भिन्नभिन भूमिकाओं में उपस्थित थे
36:55एक आदर्श पती, पिता और मित्र के रूप में
36:59एक व्रिद्ध रिशी ने अपनी भौहे सिकोडी और विनमरता पूर्वक नारद से पूछा
37:05हे देवर्शी क्या यह अद्भुत घटना योगमाया के बिना संभव है या यह केवल हमारा भ्रम है
37:13नारद मुनी ने उस रिशी की ओर देखकर मुस्कुराया और कहा यह कोई भ्रम नहीं महात्मन
37:19यह परमेश्वर श्री क्रिश्न की अचिंत्य योगमाया का प्रत्यक्ष प्रमान है
37:26उन्होंने समझाया कि योगमाया भगवान की वह आंतरिक शक्ती है
37:31जिससे वे असंभव को संभव कर दिखाते हैं और एक ही समय में अनेक रूपों में प्रकट हो सकते हैं
37:39नारद ने बताया कि श्री क्रिश्न की यह लीला उनकी सर्वव्यापक्ता, सर्वग्यता और अध्वितिय शक्ती का प्रमान है
37:47जो उन्हें समस्त स्रिष्टी का परमेश्वर सिद्ध करती है
37:52यह सुनकर सभा में उपस्थित सभी देवगणों और रिशियों ने एक स्वर में भगवान श्री क्रिश्न की जैजैकार की
37:59उनके हृद्यों में श्रधा और भक्ती का सागर उमड़ पड़ा
38:04नारद मुनी ने एक बार फिर अपनी वीना उठाई और अब अधिक मधुर्ता तथा गहनता के साथ हरे क्रिश्न महामंत्र
38:12का गायन करते हुए आगे की यात्रा पर निकल पड़े
38:16उनकी अगली मनजिल सत्यलोक थी जहां ब्रह्मा, स्रिष्टी के रचिता अपने कमल सिनहासन पर विराजमान थे और गहन चिंतन में
38:25लीन थे
38:27जैसे ही नारद सत्यलोक में प्रवेश करते हैं, ब्रह्मा अपनी तपस्या से उठते हैं और अपने प्रियमानस पुत्र का गर्मजोशी
38:36से स्वागत करते हैं
38:39नारत ब्रहमा को प्रणाम करते हैं और उन्हें द्वारका में श्रीकृष्ण की अग्धुत लीला का पूरा वृत्तांत सुनाते हैं जिसे
38:47उन्होंने स्वयन देखा था
38:49ब्रहमाजी मुस्कुराते हैं और नारद की बात की पुष्टी करते हुए कहते हैं कि भगवान की माया अकलपनिया है और
38:57उनकी लीलाए ब्रहमांड के परे हैं
39:01ब्रहमाजी ने नारद को आशिर्वाद दिया और उन्हें भगवान श्री कृष्ण की महिमा का निरंतर प्रचार करने के लिए प्रेरित
39:09किया ताकि सभी जीव इस परम सत्य को जान सकें
39:13इस दिव्य समबाद के पश्चात नारद मुनी ने अपनी वीना की ध्वनी को और भी उचा कर दिया उनके हृदय
39:21में श्री कृष्ण के प्रती अगाध प्रेम और श्रधा चरम पर थी
39:25वे निरंतर ब्रहमांड के विभिन लोकों में विचर्ण करते रहे जहां भी गए उन्होंने भगवान श्री कृष्ण की अध्भुत योगमाया
39:34और उनकी 16,108 पत्नियों की लीला का गुनगान किया
39:40प्रत्येक प्रानी जिसने नारद के मुख से यह कथा सुनी वह श्री कृष्ण के प्रती और अधिक श्रधावान बन गया
39:47उनकी भक्ती और प्रेम की लहरें समस्थ स्रिष्टी में फैल गई
39:52इस प्रकार नारद मुनी का यह अध्भुत दर्शन केवल एक व्यक्तिगत अनुभव नहीं रहा बलकि समस्थ मानव जाती और ब्रहमांड
40:01के लिए भगवान श्री कृष्ण की परमसत्ता और योगमाया के गहरे संदेश का अमर प्रतीक बन गया
40:08देवर्शी नारद आज भी अपनी वीना के साथ अनन्त ब्रहमांडों में विचर्ण कर रहे हैं हरे कृष्ण का महामंत्र गाते
40:16हुए हर हृदय में परमसत्य की जोती प्रजवलित करते हुए
40:21उनकी इस अनवरत यात्रा से यह सिद्ध होता है कि भगवान श्री कृष्ण केवल एक पौरानिक पात्र नहीं बलकि शाश्वत
40:29परमसत्य हैं जिनकी लीलाएं अनमोल और अनन्त हैं
Comments

Recommended