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श्रीमद्भागवत पुराण के ९वें स्कंध के १५वें अध्याय की इस अलौकिक गाथा में शुकदेव जी महाराज परीक्षित को चंद्रवंश की पावन धारा का विस्तार सुनाते हैं। जानिए कैसे राजा गाधि की पुत्री सत्यवती और महर्षि ऋचीक के विवाह से विश्वामित्र और जमदग्नि के वंश की नींव पड़ी। साथ ही देखिए भगवान दत्तात्रेय के वरदान से एक हजार भुजाओं वाले सहस्रार्जुन का महा-प्रताप, जिसने नर्मदा नदी के प्रवाह को रोक दिया था। परंतु जब उसी सहस्रार्जुन ने अहंकार में आकर महर्षि जमदग्नि की दिव्य कामधेनु का अपहरण किया, तब भगवान परशुराम ने अपने फरसे से धर्म की रक्षा हेतु कैसे सहस्रार्जुन की हजार भुजाओं को काटकर उसका अंत किया। देखिए भक्ति, तपस्या और न्याय का यह परम प्रामाणिक एपिसोड।
Transcript
00:00परम तपस्वी श्री शुकदेव जी राजा परीक्षित को चंद्रवंश के महान राजा पुरुर्वा के पवित्रवंश का विस्तार सुनाते हुए कहते
00:08हैं कि इस वंश में एक से बढ़कर एक प्रतापी राजाओं ने जन्म लिया जिन्होंने धर्म का मान बढ़ाया।
00:15उसी प्रतापी चंद्रवंश में राजा जहनु का प्राकट्य हुआ, जो न केवल एक शक्तिशाली और न्यायप्रिय राजा थे बलकी महान
00:24आध्यात्मिक शक्ति से संपन्य एक दिव्य योगी भी थे।
00:28एक समय जब राजा जहनु गंगा नदी के किनारे अपनी यग्यशाला में पवित्र यग्य अनुष्ठान कर रहे थे, तब गंगा
00:36की प्रचंड और तीवर तरंगों ने उनकी यग्यशाला को जल्मगन कर दिया।
00:42गंगा के इस अभिमान और व्यवधान से क्रोधित होकर, महात्पस्वी राजा जहनु ने अपनी योगशक्ती का प्रदर्शन किया और गंगा
00:50के संपून प्रवाह को एक ही घूंट में पी लिया।
00:54गंगा को लुप्त पाकर समस्त देवगन, रिशिमुनी और गंधर्व आकाश से उतर आये और उन्होंने भैभीत होकर राजा जहनु की
01:03स्तुती करते हुए गंगा को मुक्त करने की प्रार्थना की।
01:07रिशियों की प्रार्थना और विनय से संतुष्ट होकर उदार राजा जहनुने देवी गंगा को अपने कान के मार्ग से पुनह
01:15बाहर निकाल दिया, जिसके कारण गंगा का नाम जाहनवी पड़ा।
01:19राजा जहनु के बाद इस महान चंद्रवंश की परंपरा निरंतर आगे बढ़ी और इसी पावन वंश में आगे चलकर परंप्रतापी
01:28और धर्मनिष्ठ राजा कुष का जन्म हुआ।
01:32महाराज कुष ने अपने चार महातेजस्वी और पराक्रमी पुत्रों के साथ मिलकर अनेक दिवय यग्य किये, जिससे उनके राज्ज में
01:41सुख, समरिध्धी और धर्म की स्थापना हुई।
01:45राजा कुष के पराक्रमी पुत्र कुषानाब के वंश में आगे चलकर राजा गाधी का जन्म हुआ, जो अपनी वीर्ता, न्यायप्रियता
01:53और तेज के लिए तीनों लोकों में विख्यात थे।
01:56राजा गाधी ने कान्यकुब्ज के भव्य और स्वर्णमी सिनहासन पर आरूड होकर अपनी प्रजा का पुत्रवत पालन किया और अपने
02:05राज्जिकी सीमाओं को सुरक्षित किया।
02:08राजा गाधी के घर में एक अत्यंत सुन्दर और शीलवान पुत्री का जन्म हुआ, जिसका नाम सत्यवती रखा गया, जो
02:17अपने अपूर्व सौंदर्य और दिव्य गुनों से महल को आलोकित करती थी।
02:22इसी समय ध्रिगुवंश के महान तेजस्वी और तपस्वी रिशी रिचीक, राजा गाधी के भव्य दर्बार में राजकुमारी सत्यवती का विवाह
02:31प्रस्ताव लेकर उपस्थित हुए।
02:33एक निर्धन तपस्वी रिशी को अपनी सुकोमल राजपुत्री सौंपने में संकोच करते हुए, राजा गाधी ने विवाह के लिए एक
02:42अत्यंत कठिन और असंभव प्रतीत होने वाली शर्त रख दी।
02:47राजा गाधी ने कहा कि यदी रिशी रिचीक उन्हें शुल्त के रूप में एक सहस्र ऐसे श्वेट घोडे लाकर दें
02:54जिनके कान एक ओर से पूरी तरह श्यामवर्ण काले हों, तभी वे यह विवाह करेंगे।
03:00इस कठिन चुनौती को स्वीकार कर रिशी रिचीक समुद्र तट पर गए और उन्होंने वरुन देव की घोर तपस्या कर
03:08उनसे इन विशिष्ट दिव्य घोडों की याचना की।
03:11रिशी रिचीक की तपस्या से प्रसन्न होकर जल के देवता भगवान वरुन समुद्र से प्रकट हुए और उन्होंने रिशीक को
03:20एक सहसर श्यामकर्ण श्वेट अश्व प्रदान किये।
03:23रिशी रिचीक उन अध्भुत और अलौकिक घोडों के विशाल दल को लेकर राजा गाधी के महल पहुँचे जिसे देखकर राजा
03:32और समस्त दरबारी आश्चर यचकित रह गए।
03:35अपनी शर्थ पूरी होने पर राजा गाधी ने सहष अपनी सुन्दर पुत्री सत्यवती का विवाह विधिविधान के साथ रिशी रिचीक
03:44से संपन्न कराया।
03:45विवाह के पश्चात, अपनी पत्नी और सास को पुत्र प्राप्ती का वर्दान देने के लिए रिशी रिचीक ने मंत्रो चार
03:53के साथ दो अलग-अलग दिव्यचरू, खीर के पात्रत तयार किये
03:59किन्तु सत्यवती की माता ने अधिक बुद्धिमान और प्रतापी पुत्र की लालसा में गुप रूप से उन्दिव्य चरू पात्रों को
04:06आपस में बदल दिया, जिससे एक अभूत पूर्व नेती का जन्म हुआ
04:11जब सत्यवती और उनकी माता ने चरू का प्राशन किया, तो अज्यानता में सत्यवती ने क्षत्रिय गुन युक्त चरू और
04:19उनकी माता ने ब्राहमन गुन युक्त चरू का सेवन कर लिया
04:24कुछ समय बाद जब महर्शी रिचीक ध्यान से उठकर वापस आये तो उन्होंने दोनों स्त्रियों के चारों और एक अप्रत्याशित
04:32और विप्रीत उजा का आभास किया
04:35अपनी असीम तपोबल और दिव्यद्रिष्टी से महर्शी रिचीक ने तुरंत जान लिया कि उनकी सास की लालसा के कारण दिव्यचरू
04:43पात्रों का परसपर अदल्बदल हो चुका है
04:47गंभीर स्वर्मे रिशी रिचीक ने सत्यवती को सत्य बताया कि इस भूल के कारण उनकी होने वाली संता ने अपना
04:55मूल स्वभाव खो चुकी है
04:58उन्होंने प्रकट किया कि सत्यवती का पुत्र अत्यंत क्रोधी और हिंसक क्षत्री स्वभाव का होगा जबकि उनकी माता का पुत्र
05:07शांत और वेदों का ज्याता ब्राहमन बनेगा
05:10यह कठोर सत्य सुनते ही सत्यवती का हरिदय काम उठा और वे अत्यंत व्याकुल होकर अपने पती के चर्णों में
05:18गिर कर रोने लगी
05:21सत्यवती ने बिलखते हुए रिशी से प्रार्थना की कीवे उनके पुत्र को क्रूर क्षत्रिय बनने से बचा लें और यदि
05:28यह नेती अनिवार्य है तो यह प्रभाव उनके पौत्र में प्रकट हो
05:33सत्यवती की सच्ची भक्ती और अपार दुहकी मन को देखकर महर्शी रिचीक का हृदय द्रवित हो गया और उन्होंने उनकी
05:41इस विशेश प्रार्थना को स्विकार कर लिया
05:45समय बीतने पर सत्यवती ने एक अत्यंत तेजस्वी, शांत और धर्म प्रायन पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम महर्शी जमदगनी
05:54रखा गया
05:55दूसरी और सत्यवती की माता ने एक महाप्रतापी और तेजस्वीक शत्रिय बालक को जन्म दिया, जो आगे चलकर राजा विश्वामित्र
06:04के नाम से विख्यात हुए
06:07विश्वामित्र बड़े होकर एक पराक्रमी राजा बने और उन्होंने अपने बाहुबल से विशाल सामराज्यकी स्थापना करते हुए संपूर्ण प्रिथवी पर
06:16अपनी धाक जमाई
06:19इधर बालक जमदगनी ने बाल्यावस्था से ही वेदवे दांगों में निपुन्ता प्राप्त की और वे एक महान और तपस्वी रिशी
06:27के रूप में प्रतिष्थित हुए
06:29वयस्क होने पर महर्शी जमदगनी का विवाह राजा प्रसेंजित की अत्यंत रूपवती और पतिवर्ता पुत्री राजकुमारी रेनुका के साथ हुआ
06:39कालांतर में महर्शी रिचीक के उस पूर्व वर्दान का समय निकट आया और जगत के पालनहार भगवान विश्णू ने जमदगनी
06:47के घर अवतार लेने का संकल्प किया
06:51माता रेनुका ने चार श्रेष्ट पुत्रों को जन्म देने के पश्चात अपने पाँचवे पुत्र के रूप में साक्षात भगवान श्रीहरी
06:59के अवतार भारगव राम को जन्म दिया
07:02जन्म से ही उस बालक में एक प्रचंड तेज और अदमय छात्र उर्जा छलक रही थी जो की वर्षों पूर्व
07:09बदले गए चरू का प्रभाव था
07:12माता रेनुका और पिता जमदगनी के स्नेहपूर्ण संरक्षन में बालक राम अपने आश्रम के प्राकृतिक और पवित्र वातावर्ण में बड़े
07:21होने लगे
07:23महर्षी जमदगनी ने अपने पुत्र के भीतर छिपे अलौकिक गुन को पहचान कर उन्हें समस्त वेदों और अस्त्रशस्त्रों की गूड
07:31शिक्षा देना प्रारंभ किया
07:33वहीं दूसरी और राजा विश्वामित्र ने भी कालांतर में अपनी क्षत्रिय शक्ती से उपर उठकर ब्रहमर्शी पद प्राप्त करने हेतु
07:42उग्र तपस्या का मार्ग चुना
07:43इस प्रकार चरु के उस गुप बदलाव ने इतिहास की धारा को मोरते हुए ब्रहमर्शी विश्वामित्र और भगवान परशुराम जैसे
07:53महापुरुशों का पत्थ प्रशस्त किया
07:56इसी कालखंड में है है वन्ष के महा प्रतापी राजा कार्तवीर्य अरजुन ने भगवान दत्तातरे की घोर तपस्या करके अंगिनथ
08:04सिध्धिया प्राप्त की
08:06राजा कार्त वीर्य की निश्चल भक्ती से प्रसन्न होकर दत्तात्रे जी ने उन्हें सहस्र भुजाओं का वर्दान देकर अद्वितिय सहस्रार्जुन
08:15बना दिया
08:17सहस्र भुजाओं और अप्राजे शक्ती के अहंकार में अंधा होकर सहस्रार जुन समस्त प्रिथवी पर अपना एक आधिकार स्थापित करने
08:26लगा
08:27एक समय जलक्रीडा के दौरान सहस्रार जुन ने अपनी सहस्र बाहूं से बहती हुई पवित्र नर्मदा नदी के प्रवाह को
08:35पूरी तरह से रोक दिया
08:37नर्मदा के रुके हुए जल से जलमगन हुए किनारे पर रावन का शिवलिंग बह गया जिससे क्रोधित होकर लंकापती रावन
08:45ने सहस्रार जुन पर आक्रमन कर दिया
08:49परंतु सहस्रार जुन ने अपनी एक हजार भुजाओं की शक्ती से महाबली रावन को खिलोने की भांती बंदी बनाकर कारागार
08:57में डाल दिया
08:59महर्शी पुलस्त्य की प्रार्थना पर रावन को मुक्त करने के बाद सहसरार्जुन का अहमकार तीनों लोकों की सीमाओं को लांग
09:07गया
09:08एक दिन सहसरार्जुन अपनी विशाल चतुरंगिनी सेना के साथ सघन वनों में हिंसक पशुओं के आखे ठेतु निकला
09:17शिकार करते करते ठककर और भूख प्यास से व्याकुल होकर वह राजा महर्शी जमदगनी के शांत और पवित्र आश्रम में
09:25पहुँचा
09:26महर्शी जमदगनी ने राजा का सतकार करते हुए अपनी अलोकिक इच्छापूर्ती गाय कामधेनु का स्मरण किया
09:35कामधेनु ने अपने अलोकिक प्रभाव सेक्षन भर में पूरी राजसी सेना के लिए दिव्यव्यनजन और राजसी सुख सुविधाय प्रकट कर
09:43दी
09:45कामधेनु के इस असीमित चमतकार को देखकर राजा सहसरारजुन के मन में पापी लोब और अधर्म का अंकुर फूट पड़ा
09:54सहसरारजुन ने अहंकार में भर कर कहा कि ऐसी दुरलब कामधेनु किसी दरदर रिशी के पास नहीं बलकि राजा के
10:01राजमहल में होनी चाहिए
10:04महर्शी जमदगनी ने राजा के प्रस्ताव को विनमरता पूर्वक ठुकराते हुए कहा कि कामधेनु देवकारियों के लिए है किसी के
10:12भोग विलास के लिए नहीं
10:15रिशी के इनकार से तिल मिला कर सहसरार जुन ने अपने सैनिकों को कामधेनु और उसके बच्छडे को बलपूर्वक छीनने
10:23का पापपूर्ण आदेश दे दिया
10:25दुष्ट सैनिक रोती हुई कामधेनु और उसके बच्छडे को घसीट कर ले जाने लगे जबकी महर्शी जमदगनी मौन रहकर सब
10:34देखते रहे
10:34कुछ समय पश्चात जब युवा परशुराम समिधा और कुशा लेकर आश्रम लोटे तो उन्होंने आश्रम में मची तबाही और पिता
10:44को दुखी पाया
10:46पिता से सहसरारजुन के इस नीच अपराध और कामधेनु हरण की कथा सुनते ही परशुराम के नेत्र प्रल्यंकारी अगनी की
10:54भांती प्रजवलित हो उठे
10:57भगवान शिव द्वारा प्रदान किये गए अपने अतिभ्यंकर दिव्य परशु फरसे को हाथ में उठाकर परशुराम ने अधर्मी सहसरारजुन के
11:06अंत की प्रतिग्याली
11:08रुद्र अवतार परशुराम अपने प्रचंड महाक्रोध की ज्वाला में जलते हुए महिश्मती नगर की ओर काल बनकर अकेले ही निकल
11:16पड़े
11:18रिशी वशिष्ट की तपोबल शक्ती से पराजित होकर राजा विश्वामित्र को बोध हुआ की शस्त्रबल से श्रिष्ट ब्रहमबल है और
11:26उन्होंने अपना समस्त राजपाट त्यागने का संकल्प लिया
11:31आंकार और विलासिता के सामराज्य को सदा के लिए पीछे चोड़ते हुए विश्वामित्र ने मुणीयों के वेश में गंगा के
11:38तट पर स्थित घने वनों की ओर प्रस्थान किया
11:42शांट और पवित्र निर्जन वन में एक शिला पर बैठ कर विश्वामित्र ने अपनी इंद्रियों को वश्मे किया और भगवान
11:49शिव की घोर तपस्या का श्रीगनेश किया
11:53वर्षों बीट गए और विश्वामित्र ने ग्रिश्म रितु के प्रचंड सूर्य की तपन के बीच स्वयं को चारों और जलती
12:00हुई प्रजवलित अगनियों से घेर कर पंचागने तब प्रारंभ किया
12:05कड़कडाती शीत रितु की जमा देने वाली रातों में भी वे परवत से बहती बरफीली गंगा के ठंडे जल में
12:12केवल एक पैर पर खड़े होकर तपस्या करते रहे
12:17विश्वामित्र के इस प्रचेंड तपोबल के ताप से स्वर्ग के देवताओं के राजा इंद्र भैभीत हो गए की कहीं वे
12:23उनका इंद्रासन न छीन ले
12:26रिशी की तपस्या को भंग करने के लिए देवराज इंद्र ने स्वर्ग की सबसे रूपवती अपसरा मेंका को प्रित्वी पर
12:34भेजने का शड्यंत्र रचा
12:36मधुर संगीत और नूपुरों की जंकार के साथ मेंका ने विश्वामित्र के समक्ष आकर ऐसा अलौकिक नृत्य किया कि वन
12:44का वातावर्ण सम्मोहित हो उठा
12:48अपसरा के सौंदर्य और उसकी वीना के मधुर स्वर से मुग्ध होकर विश्वामित्र ने अपनी आखें खोल दी और उनका
12:55कठिन साधना मार्ग तूट गया
12:58दशकों तक सांसारिक सुखों में लीन रहने के बाद विश्वामित्र को अपने पतन का आभास हुआ और वे अत्यधिक आत्मगलानी
13:07से भर उठे
13:09अपनी भूल को सुधारने के लिए विश्वामित्र ने मेंका से विदाली और दक्षिन दिशा के घने जंगलों में जाकर और
13:16भी कठिन मौन व्रत धारन कर लिया
13:19इस बार देवराज इंद्र ने उनकी कठोर तपस्या से भैभीत होकर स्वर्ग की दूसरी प्रमुख अपसरा रंभा को मुनी का
13:27ध्यान भटकाने के लिए भीजा
13:30परंतु इस बार विश्वामित्र ने अपने कामवासना पर पूर्न विजय प्राप्त कर ली थी और रंभा के आते ही उनके
13:37भीतर तीवर क्रोध की ज्वाला भड़क उठी
13:41क्रोध के आवेग में आकर विश्वामित्र ने रंभा को पाशान की मूर्ती बन जाने का शाप दे दिया, परंतु ततकाल
13:48ही उन्हें बोध हुआ कि क्रोध ने उनके तपको पुना नश्ट कर दिया है
13:54क्रोध और काम दोनों पर विजय पाने की द्रिड प्रतिग्या लेकर विश्वामित्र पूर्व दिशा की ओर चले गए और वहां
14:01उन्होंने अनजल का पूर्ण त्याग कर दिया
14:05हजारों वर्षों की निराहार साधना के बाद विश्वामित्र का शरीर अत्यंत दुर्बल और हड्डियों का धाचा मात्र रह गया, परंतु
14:14उनके मस्तक से अलौकिक तेज निकलने लगा
14:17रिशी जब अपनी कठिन प्रतिग्या पूर्ण कर पारण करने बैठे, तब इंद्रदेव ने उनकी अंतिम परीच्षा लेने के लिए एक
14:25निर्धन ब्राहमन का रूप धरा
14:28बिना किसी क्रोध या संकोच के, मौनधारी विश्वामित्र ने अपनी हजारों वर्ष की तपस्या के बाद मिलने वाला भोजन सहर्ष
14:37उस अतिथी ब्राहमन को दान कर दिया
14:40इस परम्त्याग के पश्चात विश्वामित्र ने जैसे ही पुनह श्वास को रोका, वैसे ही उनके मस्तक से एक प्रचंड ब्रहमांडिय
14:48अगनी पुंज निकल कर सीधे स्वर्गलोग की ओर बढ़ने लगा
14:53तपस्या की इस पराकाषठा को देखकर स्वयन स्रिष्टिकर्ता ब्रहमाहंस वाहन पर सवार होकर आकाश से अवतरित हुए और उन्हें ब्रहमर्शी
15:03का पद प्रदान किया
15:05तदंतर उनके पुराने प्रतिद्वंद्वी महर्शी वशिष्ठ ने भी सहर्ष वहां पधार कर विश्वामित्र को गले लगाया और उन्हें सर्वश्रिष्ठ ब्रहमर्शी
15:14के रूप में स्विकार किया
15:17ब्रहमर्शी विश्वामित्र के आख्यान के पश्चात चंद्रवंश की महिश्मती नगरी में है है वंश के प्रतापी राजा कृत्वीर्य के पुत्र
15:25अर्जुन का आगमन हुआ, जिन्हें कालांतर में सहसरा अर्जुन के नाम से जाना गया
15:31राज्य के उत्तरदायत्वों को संभालते हुए युवा राजकुमार अर्जुन के मन में एक ऐसे शक्तिशाली और धर्मनिष्ठ राजा बनने की
15:40तीवर इच्छा जागरत हुई जो संपूर्ण प्रिथवी पर अधर्म का नाश कर सके
15:45जब राज्पुरोहितों ने अर्जुन को भगवान दत्तात्रे की महीमा बताई तो उन्होंने तुरंट निर्नैलिया की वे भगवान दत्तात्रे की शरण
15:55में जाकर उनकी घोर तपस्या करेंगे
15:58अपने राजसी वस्त्रों और सुक्सुविधाव का त्याग करके राजकुमार अर्जुन एका ग्रचित्थ होकर सहियादरी परवत के अतिपवित्र एवन दुर्गम वनों
16:08की ओर निकल पड़े
16:10घने वनों और कलकल बहती नदियों को पार करते हुए अर्जुन अंत्ता महर्शी अत्री और माता अंसुया के परमपवित्र पुत्र
16:18भगवान दत्तात्रे के दिव्य आश्रम पहुँचे
16:22वहां उन्होंने त्रिदेवों के एकीकृत स्वरूप भगवान दत्तात्रे के दर्शन किये जो अत्यंत शांत मुद्रा में विराजमान थे और जिनके
16:31समीब चार वेद रूपी श्वान तथा कामधेनु गाय विद्यमान थी
16:36भगवान दत्तात्रे के उस अलोकिक और प्रभावकारी रूप को देखते ही राजकुमार अर्जुन अतिभक्तिभाव से उनके श्रीचर्णों में साष्टान प्रणाम
16:46कर पड़े
16:47इसके पश्चात अर्जुन ने बिना किसी स्वार्थ के प्रतिदिन गुरु दत्तात्रे की तन्मन से सेवा करना और निरंतर उनके नाम
16:55का जाप करना प्रारंभ कर दिया
16:59ग्रिश्मरितु की प्रचंड धूप हो या वर्षा की तीवर बोचारें अर्जुन बिना विचलित हुए वर्षों तक भगवान दत्तात्रे की निश्काम
17:07सेवा और कठोर साधना में लीन रहे
17:10अर्जुन की इस निश्कल भक्ती और निश्काम सेवा से अत्यंत प्रसन्न होकर भगवान दत्तात्रे अपने पूर्ण दिव्य एवन तेजोमई स्वरूप
17:19में उनके समक्ष प्रकट हुए
17:22भगवान दत्तात्रे ने मधुर और गंभीर स्वर में कहा है अर्जुन
17:27तुम्हारी सेवा और तपस्या से मैं अतिप्रसन्न हूँ जो वर्दान तुम पाना चाहते हो सहर्श मांग लो
17:35अर्जुन ने विनमरता पूर्वक हाथ जोड़ कर कहा प्रभु
17:51तथास्तु कहते हुए जैसे ही भगवान दत्तात्रे ने अपना दाहिना हाथ उठाया
17:56क्यों ही एक प्रचंड ब्रहमांडी उर्जा का पुंझ अर्जुन के शरीर में प्रविष्ठ होने लगा
18:03देखते ही देखते अर्जुन का शरीर अत्यंत विशाल और प्रभावशाली हो गया
18:08तथा उनकी पीट से एक सहसर दिव्य और शक्तिशाली भुजाय प्रकट हो गई
18:14सहसरा अर्जुन ने अपनी एक हजार भुजाओं की असीम शक्ति का अनुभव किया
18:19जिससे संपूर्ण दिशाय और सहियादरी के परवत्तक कम्पित होने लगे
18:24इस अद्भुत वर्दान को प्राप्त करने के उपरांत सहसरा अर्जुन ने पुनह अपने परम गुरु दत्तात्रे के चर्णों में प्रणाम
18:33किया
18:33और उनका आशिर्वाद लेकर महिश्मती की ओर प्रस्थान किया
18:37जब सहसरार्जुन महिश्मती नगरी लोटे तो प्रजा और राजपुरोहितों ने पुश्पवर्शा और शंखध्वनी के साथ अपने महाप्रतापी समराट का अभूत
18:48पूर्व स्वागत किया
18:50शुभ महूर्त में वेदों के पवित्र मंत्रोच चार के बीच सहसरार्जुन का भव्य राज्याभिशेक संपन हुआ और वे है है
18:58सामराज्य के सर्वशक्तिमान चक्रवर्ती समराट बने
19:03गुरु दत्तात्रे के आशिरवाद से सहसरार्जुन ने महिश्मती में ऐसा न्यायप्रिय और समरिध राज्य स्थापित किया जहां अधर्म का नामों
19:12निशान नहीं था और प्रजा सर्वथा सुखी थी
19:16परंतु समय बीतने के साथ अपनी इस अपरतिन सहसरभुजाओं की शक्ती और अजय बल के कारण सहसरार्जुन के मन में
19:24अहंकार का सुक्ष्म अंकुर प्रसफुटित होने लगा
19:28एक दिन अपने शक्ती प्रदर्शन की लालसा में, समराट सहसरारजुन अपनी रानियों और विशाल सेना के साथ कलकल बहती पवित्र
19:37नर्मदा नदी के तटपर जलक्रीडा के लिए पहुँचे
19:41अपनी रानियों का मनोरंजन करने और अपनी अतुलनिय शारिरिक शमता को प्रदर्शित करने के उद्देश से सहसरारजुन नर्मदा की कलकल
19:50बहती तीक्षन धारा में उत्रे
19:53नदी के विशाल प्रवाह के बीच जाकर सहसरारजुन ने गुरु दक्तात्रे से प्राप्ट अपनी चमतकारिक शक्ती से अपने विशाल का
20:02सहसर भुजाएं प्रकट कर ली
20:04अपनी सहसरों भुजाओं को एक दूसरे में पिरोकर उन्होंने शक्तिशाली नर्मदा नदी के प्रचंड वेग और जल प्रवाह को पूरी
20:13तरह रोक कर एक सजीव बांध बना दिया
20:16जल का मार्ग रुकते ही नदी का प्रवाह पीछे की ओर लोटने लगा और उपर की ओर एक अत्यंत विशाल
20:23गगन्चुम्बी जील का निर्मान हो गया जहां रानिया जलक्रीडा करने लगी
20:29दूसरी और सहसरार जुन द्वारा जल रोके जाने के कारण नदी का निचला हिस्सा पूरी तरह सूख गया और उसकी
20:37रेट धूप में चमकने लगी
20:39उसी समय उसी सूखी नदी के निचले तट पर लंका का अत्यंत पराक्रमी और अभिमानी राक्षस राज रावन अपने विशाल
20:47सैन्य दल के साथ पड़ाव डाले हुए था
20:51नदी के सूखे तल को देख कर रावन ने प्रसन्न होकर वहीं बालू से एक भव्य शिवलिंग स्थापित किया और
20:58भक्तिभाव में लीन होकर अपने इश्टदेव महादेव की पूजा आरंभ कर दी
21:04काफी देर तक जल क्रीडा करने के पश्चात क्रीडा के आनंद में मगन सहसरारजुन ने अचानक अपनी सहसरों भुजाओं को
21:12हटा कर रुके हुए जल को मुक्त कर दिया
21:16रुका हुआ प्रचंड जल प्रवाह एक विक्राल और विनाशकारी बाढ़ के रूप में भयानक गर्जना करता हुआ सूखी नदी की
21:24घाटी में प्रचंड वेग से आगे बढ़ा
21:27उस अप्रत्याशित प्रचंड जल सहलाब ने क्षण भर में रावन के शिविर को तहसन हस कर दिया और उसके द्वारा
21:34स्थापित पूजे शिवलिंग को अपने प्रवाह में बहा ले गया
21:38अपनी पूजा भंग होने और शिवलिंग के जलमगन होने पर परम क्रोधी रावन क्रोध से काप उठा और उसकी दस
21:46जोड़ी आखों से अंगारे बरसने लगे
21:49रावन के गुपतचरों ने तुरंत लोटकर सूचना दी कि यह जलप्रलय प्राकृतिक नहीं बलकि महिश्मती के राजा सहसरारजुन की सहसरों
21:58भुजाओं की जलक्रीडा का परिनाम है
22:02यह सुनकर रावन के स्वाभिमान को गहरी चोट पहुँची और वह अपनी प्रसिद्ध चंद्रहास खडग उठाकर अपनी दैक्य सेना के
22:10साथ सहसरारजुन को दंड देने के लिए बढ़ा
22:14नर्मदा के तट पर पहुँचकर रावन ने दंभभी गर्जना करते हुए सहसरारजुन को ललकारा और अपनी त्रिलोक विजय के गाथा
22:23गाते हुए युद्ध की चुनोती दी
22:26रावन के दस सिरों और उसके डरावने स्वरूप को देख कर भी सहसरारजुन तनिक भी विचलित नहीं हुए और उन्होंने
22:34रावन के दंभ का उपहास करते हुए अट्ठास किया
22:38देखते ही देखते दोनों महाबलशाली वीरों के बीच नर्मदा के तट पर ऐसा भयंकर युद्ध छेड़ गया जिससे दिशाए और
22:46नभोमंदल थर्रा उठे
22:49रावन के भीशन प्रहारों को सहच्ता से निश्वल करते हुए सहसरारजुन ने अपनी विशाल शक्ती का प्रदर्शन किया और क्षन
22:57भर में रावन का अस्त्र छीन लिया
23:00अपनी सहसरों शक्तिशाली भुजाओं से सहसरारजुन ने दस सिरों वाले रावण को किसी छोटे बालक की भांती जकड लिया और
23:08उसे भारी लोहे की श्रिंखलाओं में बांध कर बंदी बना लिया
23:13अंतर रावण के पितामह महर्शी पुलस्त्य के आगमन और उनके अनुन्य विनय पर सहसरारजुन ने रावण के हंकार को पूर्णत
23:21है चूर करके उसे बंधमुक्त कर दिया
23:25रावन पर विजय प्राप्त करने के बाद परम प्रतापी राजा सहसरार्जुन अपनी विशाल चतुरंगिनी सेना के साथ सघन वनों में
23:33आखेट के लिए निकले
23:36सेना के पैरों से उठती हुई धूल के विशाल बाद लों और रथों की गड़गडा हट ने वन की शांत
23:42निरवता को पूरी तरह भंग कर दिया
23:45घंटों के कठिन परिश्रम और भीशन गर्मी के कारण राजा सहसरार्जुन और उनके सैनिक भूख और प्यास से व्याकुल होकर
23:54जल की खोज करने लगे
23:56तभी घंए व्रिक्षों की ओट में राजा सहसरार्जुन को महर्शी जमदगनी का अत्यंत शांत, पवित्र और सात्विक आश्रम दिखाई दिया
24:06राजा अपनी सेना के साथ उस तपोवन में प्रविश्थ हुए जहां महर्शी जमदगनी एक विशाल वटवरिक्ष के नीचे गहन ध्यान
24:14में लीन थे
24:16राजा के आगमन को भाम पकर महर्शी ने अपनी आखे खोली और अत्यंत विनमर्ता पूर्वक उनका और उनकी विशाल सेना
24:24का स्वागत किया
24:27सहसरार जुन ने अपने राजसी अहंकार में डूब कर महर्शी से कहा कि उनकी सेना बहुत विशाल है और इस
24:34साधारन कुटिया में उनका पेट भरना असंभव है
24:39महर्शी जम्दगनी ने मंद मुस्कान के साथ उत्तर दिया कि उनके यहां आया कोई भी अतिथी भूखा नहीं जाएगा चाहे
24:47वह पूरी सेना ही क्यों न हो
24:50ततपश्चात महर्शी जम्दगनी अपने आश्रम के आंतरिक कक्ष में गए और वहां विराजमान दिव्य कामधेनु गाय का प्रेमपूर्वक आहवान किया
24:59दिव्य कामधेनु ने महर्शी की प्रार्थना स्विकार की और उनके संकल्प को पूरा करने के लिए अपनी अलौकिक शक्तियों को
25:08जागरत किया
25:10शन भर में ही कामधेनु के आशिर्वाद से अनेक स्वर्ण पात्रों में अत्यंत स्वादिष्ट, सुगंधित और अमरित्तुल्य भोजन प्रकट होने
25:19लगा
25:20आश्रम के बटुकों और रिशिकुमारों ने उन चमतकारी पात्रों को उठा कर बाहर बैठी राजा की विशाल सेना की ओर
25:28ले जाना प्रारम्ध किया
25:30पंतियों में बैठे लाखों सैनेकों के समक्ष जब वे दिव्य भोजन परोसे गए तो वे सभी उसकी दिव्य सुगंध और
25:38प्रचुर्ता देखकर आश्चर्यचकित रह गए
25:41केवल साधारन फलफूल की आशा रखने वाली सेना को जब राजसी पकवान मिले तो वे त्रिप्थ होकर रिशी जमदगनी की
25:49जयजयकार करने लगे
25:52राजा सहसरारजुन के समक्ष भी एक अत्यंत मूल्यवान स्वर्ण थाल में ऐसा अध्भुत भोजन परोसा गया जिसकी तुलना स्वर्ग के
26:00अमरित से ही की जा सकती थी
26:03भोजन ग्रहन करने के बाद राजा की क्षुधा तो शान्त हो गई किन्तु उसके मन में महर्शी के प्रती इश्या
26:11और लोब की तीवर अगनी सुलग उठी
26:14सहसरार जुन ने विचार किया कि जो चमतकारी गाय पूरे सामराज्य को पाल सकती है वह इस निर्धन वनवासी रिशी
26:22के पास नहीं बलकि उसके राजकोश में होनी चाहिए
26:27उसने दूर खड़ी कामधेनु को देखा जो अपनी अलौकिक कांती से पूरे तपोवन को अंधकार से मुक्त कर प्रकाशमान बनाए
26:35हुए थी
26:37महर्शी जमदगनी राजा की आखों में छिपे उस कुटिल भाव को ताड़ गए किन्तु वे शांत रहकर इश्वर के विधान
26:45पर पूर्ण विश्वास बनाए रहे
26:47अंतह अपने अहंकार के वशीभूत होकर राजा सहसरार जुन ने महर्शी से उस परम पूजनिय कामधेनु को अपने साथ ले
26:56जाने की हट ठान ली
26:58महर्शी जमदगनी ने अत्यंत नमरता पूर्वक राजा को समझाया की कामधेनु केवल एक साधारन पशु नहीं बलकी देवलोग की धरोहर
27:07और यगिये आहुतियों का दिव्य आधार है जिसे व्यक्तिगत भोगविलास के लिए नहीं दिया जा सकता
27:14इस इनकार को सुनते ही सहसरारजुन का अहंकार तिल्मिला उठा और उसने गर्जना करते हुए कहा कि सामराज्यकी हर बहुमूल्य
27:23निधी पर केवल उसके चक्रवर्ती समराथ होने का ही सरवाधिकार है
27:29महर्शी जमदगनी ने बिना किसी भय के राजा की आखों में आखें डाल कर चेतावनी दी की अधर्म के मार
27:36पर चलने वाले समराथ की अपार शक्ती ही उसके संपूर्ण विनाश का कारण बनती है
27:43परंतु मद और निरंकुष शक्ती के नशे में अंधे सहसरार जुन ने महर्शी की चेतावनी को अनसुना कर अपने क्रूर
27:50सैनिकों को कामधेनु को बलपूर्वक छीनने का कठोर आदेश दे दिया
27:56राजा का आदेश पाते ही भारी अस्त्रशस्त्रों से लैस सैनिक लोहे की भारी श्रिंख लाए और मोटे रस्से लेकर कामधेनु
28:04तथा उसके ननहे बच्छडे की ओर जप्टे
28:08अलोकिक कांती से सुशोभित कामधेनु ने अपनी करुणा मई और बेबस आखों से महर्शी की ओर देखा मानो वह ईश्वर
28:16के अंतिन विधान की प्रतीक्षा कर रही हो
28:20आश्रम की देवी माता रेनु का रोती हुई सामने आई और उन्होंने राजा के समक्ष हाथ जोड कर प्रार्थनाकी की
28:27इस पवित्र माता और उसके छोटे शिशु को आश्रम से न जुदा किया जाए
28:33परंतु सहसरार जुन के निर्दई सेनाप्तियों ने रिशियों की अनुन्य विनय को ठुकराते हुए कामधेनु के गले में भारी धातु
28:41की श्रिंखलाए बांध दी
28:44जब सैनिकों ने रोते हुए छोटे बच्छडे को घसीटना शुरू किया तो पूरे शांत तपोवन में एक कारोनिक और हृदय
28:52विदारक चीतकार गूझ उठा
28:54महर्शी जमदगनी अपने स्थान पर निश्चल बैठे रहे और ईश्वर की दिव्य योजना पर विश्वास रखते हुए इस अमानविय अपमान
29:03को मौन रहकर सहते रहे
29:06कामधेनुने अत्यंत दुख में भर कर ऐसी तीवर और अलौकिक हुंकार भरी की आश्रम के विशाल व्रिक्ष कांप उठे और
29:14आसपास की पहाडिया प्रतिध्वनित होने लगी
29:17इस महापाप के होते ही आश्रम की पवित्र यग्यवेदी से भीशन लाल और नारंगी लप्तें उठने लगी जो आने वाले
29:26भयंकर विनाश का संकेट दे रही थी
29:29तपोवन के निर्मल आकाश में अचानक कालेघने बादलों का जमघट लग गया और सूर्य का प्रकाश धल कर एक रहस्य
29:37में अंधकार में बदल गया
29:40अपनी हजार भुजाओं में विविध अस्त्रशस्त्र चमकाते हुए सहसरारजुन अट्थासकर उठा और उसने अपनी विशाल सेना को तुरंत महिश्मतीपुरी लोटने
29:50का आदेश दिया
29:52निर्देई सैनिक कामधेनु और उसके रोते हुए बच्छडे को बलपूर्वक घसीटते हुए आश्रम के पवित्र धूल भरे मार्ग से बाहर
30:00ले जाने लगे
30:02आश्रम की पवित्र भूमी पर कामधेनु के खुरों के गहरे निशान और उसकी आखों से गिरे आसु एक मौन वेधना
30:10की गाथा लिखने लगे
30:12माता रेनु का न्याय की पुकार करती हुई भूमी पर गिर पड़ी और आश्रम के सभी रिशिमुनी अत्यंत शोब और
30:20भय में जम्दगनी के चारों और एकत रहो गए
30:23अपनी क्षणिक विजय के घमंड में डूबा सहसरारजुन और उसका विशाल सैन्य दल अपने ही सर्वनाश से बेखबर महिश्मती की
30:32ओर बढ़ चला
30:34महर्शी जम्दगनी ने धीरे से अपनी आखें खोली जिनमें न तो कोई भय था न दुर्भावना बलकि अपने पुत्र परशुराम
30:42के आने वाले प्रचंड महाक्रोध का स्पष्ट आभास था
30:47पूरे तपोवन में एक भारी और दरावनी शांती चा गई जो इस बात की पूर्वघोशना कर रही थी कि सहसरारजुन
30:55का यह पाप उसके संपूर्ण वंश का अंत लेकर आएगा
30:59संध्या की बेला में जब भगवान परशुराम हाथ में सनिध और समिधालिये आश्रम लोटे तो वहां का उजड़ा हुआ वातावर्ण
31:08देख उनका हृदय क्षोग से भर गया
31:11माता रेनुका और महर्शी जम्दगनी से सहसरार जुन के पाप तथा कामधेनु व बच्छडे के जबरगस्ती हरण का समाचार सुनते
31:19ही परशुराम के मुख पर महाकाल सा प्रचंड क्रोध छा गया
31:24अन्याई राजा के इस दुस्साहस पर भगवान परशुराम की आखें अगनी के समान प्रजवलित हो उठीन और उनके तेज से
31:32समस्थ तपोवन कामपने लगा
31:35भगवान शिव द्वारा प्रदान किया गया अभेद्य और दिव्य फर्सा उठाकर परशुराम ने अधर्म का नाश करने की भीशन प्रतिग्याली
31:44प्रचंड वेग से कदम बढ़ाते हुए परशुराम महिश्मती की दिशा में सहसरार जुन की विशाल सेना के पच्चेहनों का पीछा
31:52करने निकल पड़े
31:54कुछ ही क्षणों में परशुराम ने महिश्मती के निकट पहुँच कर सहसरार जुन की 17 अक्षोहिनी सेना को बीच मार्ग
32:02में ही घेर लिया
32:03एक साधारन तपस्वी वस्त्रधारी युवा को अकेला देखकर अहंकार में अंधे सहसरार जुन के सेनाप्ती उपहास करने लगे
32:13परशुराम ने अपने धनुष की प्रत्यंचा की ऐसी गर्जना की जिससे दसों दिशाय गूंज उठीन और है ह्यवंश के योध्धाओं
32:22के हृदय भय से काप उठे
32:24बिना किसी भय के भगवान परशुराम अकेले ही सहसरार जुन की विशाल अक्षोहिनी सेना पर काल बनकर तूट पड़े
32:33अपने दिव्य फरसे को बिजली की गती से घुमाते हुए परशुराम ने पलक जपकते ही सहसरार जुन के अग्नित रथों,
32:40हाथियों और घुडस्वारों को धराशाई कर दिया
32:44युद्ध भूमी में जहां तक दृष्टी जाती, सहसरार जुन के पराजित सैनिकों के शस्त्र और छत्र छिन्नभिन होकर बिखरे पड़े
32:52थे
32:54अपनी सत्रह अक्षोहिनी सेना का विनाश होते देख, क्रोधित सहसरार जुन अपने विशाल रथ पर सवार होकर अपनी हजार भुजाओं
33:02में अस्त्रशस्त्र सजाकर आगे बढ़ा
33:06सहसरार जुन ने अपनी एक हजार भुजाओं से एक साथ हजारो बान गदाए और शक्तियस्त्र भगवान परशुराम पर बरसाना शुरू
33:14कर दिया
33:16परशुराम ने अपने धनुष और फरसे के चमतकारिक प्रहारों से सहसरारजुन के समस्ट अस्त्रशस्त्रों को हवा में ही भस्न कर
33:24दिया
33:25लाल होते आकाश के बीच भगवान परशुराम ने एक विशाल छलांग लगाई और सहसरारजुन के विशाल काई रूप पर तूट
33:33पड़े
33:35परशुराम का तेज तर्रार फरसा हवा में लहराया और उसने सहसरारजुन की हजार भुजाओं को विश की शाखाओं की भानती
33:43एक एक करके काटना प्रारंब किया
33:46भयंकर पीडा से चीखते हुए सहसरारजुन की सैकड़ों कटी हुई भुजाए और अस्त्रशस्त्र रक्तरंजित भूमी पर गिरते चले गए
33:56अपनी समस्त भुजाए कट जाने के बाद अशक्त और अस्हाय हुआ सहसरारजुन परशुराम के साक्षात रुद्र रूप को देखकर थर्थर
34:04कापने लगा
34:06अधर्म और अहंकार के अंतिम अंत हेतु भगवान परशुराम ने अपने फरसे के एक अंतिम प्रचंड प्रहार से सहसरारजुन का
34:14मस्तक धड़ से अलग कर दिया
34:18कामधेनु तथा उसके बच्छडे को सहसरार जुन के चंगुल से मुक्त कराकर भगवान परशुराम शांति पूर्वक आश्रम की ओर लौट
34:26चले जबकि देवता आकाश से पुश पवर्शा करने लगे
34:31सहसरार जुन का वध करने के पश्चात भगवान परशुराम अत्यंत शांत और गंभीर भाव से दिवे कामधेनु और उसके बच्छडे
34:39को लेकर वापस अपने पिता के आश्रम की ओर बढ़ने लगे
34:44दूर से ही उन्हें महर्शी जम्दगनी के तपोवन की पवित्र अगनी का धुआ और वेदमंत्रों की गूंच सुनाई देने लगी
34:51जो मन को असीम शांती प्रदान कर रही थी
34:54एक विशाल वटवरिक्ष की घनी छाया में बैठे ब्रहमर्शी जम्दगनी ध्यानमकन थे तभी उन्होंने अपने पुत्र के आगमन की दिव्यत
35:04अरंगों को अनुभव किया
35:07पुत्र परशुराम को सुरक्षित और विजी लोटते देख माता रेनुका की आखों से हर्ष के अश्रुच छलक पड़े और वे
35:14कुटिया के द्वार पर आ गई
35:17कामधेनु और उसके नन्हे बच्छडे ने जैसे ही आश्रम की पवित्र भूमी पर पैर रखा उनकी आखों में अपने मूल
35:25स्थान पर लोटने का असीन संतोष तैर उठा
35:29भगवान परशुराम ने अपने कंधे से भारी फरसे को उतार कर भूमी पर रखा और अत्यंत विनीत भाव से अपने
35:36पिता के चर्णों में साश्टान प्रणाम किया
35:40महर्शी जमदगनी ने अपने पुत्र को उठने का संकेत किया परंतु उनकी द्रिश्टी परशुराम के फरसे पर लगे रक्त के
35:48अवशेशों पर टिक गई जिससे उनके मुख पर चिंता की रेखाएं उभराई
35:54परशुराम ने हाथ जोर कर विन्यपूर वक कहा कि उन्होंने अधर्मी और अत्याचारी राजा सहसरार जुन का सहार कर कामधेनु
36:02को उसके चंगुल से मुक्त करा लिया है
36:06माता रेनु का बड़े सनेह से कामधेनु के मस्तक पर हाथ फेर रही थी जबकि आश्रम के अग्य रिशिकुमार इस
36:13महान विजय की गाथा सुनने के लिए उचसुकता से एकत्र हो गए
36:19अपने आसन से उठकर महर्शी जमदगनी खड़े हुए और उनका दिव्य ओजस्वी रूप इस समय अत्यंत गंभीर और विचार्मगन दिखाई
36:27दे रहा था
36:29महर्शी जमदगनी ने गंभीर स्वर में कहा हे वत्स एक अभिशिक्त राजा का वध करना चाहे वह कितना भी दुष्ट
36:38क्यों न हो एक घोर पाप के समान है
36:42उन्होंने समझाते हुए कहा कि राजा प्रजा का रक्षक और ईश्वर का अंश होता है इसलिए उसका रक्त बहाने से
36:50ब्राहमन का तपोबल ख्षीन हो जाता है
36:53पिता ने द्रिड़ता से कहा शमा और सहनशीलता ही ब्राहमन के सच्चे आभूशन हैं, क्रोध और हिंसा से धर्म का
37:01कभी कल्यान नहीं हो सकता
37:04भगवान परशुराम जो साक्षात विष्णों के अवतार थे, ने अपने पिता के वचनों को धर्म का अंतिम सत्य मान कर
37:12अपने मस्तक को श्रधा से जुका लिया
37:15रिशी जमदगनी ने फिर आग्यादी की इस राजहत्या के पाप से अपनी आत्मा को शुद्ध करने के लिए तुम्हें एक
37:23वर्ष की कठिन तीर थे आत्रा पर जाना होगा
37:26उन्होंने बताया कि भारत वर्ष की पवित्र नदियों में स्नान करने और रिशियों के सत्सं से ही तुम्हारे इस प्रचंड
37:34तेज को परम शान्ती प्राप्थ होगी
37:37माता रेनुका के हृदय में अपने पुत्र के पुन्ह दूर जाने का दुहक था परन्तु वे धर्म की मर्यादा और
37:44अपने पती की आग्या के सम्मुख मौन रही
37:48परशुराम ने अपने पिता की इस आग्या को अत्यंत प्रसंता पूर्वक्स विकार किया और उसी क्षन तीर थेयात्रा के लिए
37:56प्रस्थान करने का संकल्प लिया
37:59महर्शी जमदगनी ने अपने पुत्र के मस्तक पर हाथ रख कर उसे आशिरवाद दिया जिससे परशुराम का सारा योध्धाकरोध शांत
38:08हो गया और वे एक परम योगी की भाती प्रतीत होने लगे
38:13हाथ में कमंडलू लेकर और अपने फरसे को आश्रम में ही छोड़कर भगवान परशुराम एक वर्ष के प्रायश्चित और तपस्या
38:21के लिए वन की राह पर चल पड़े
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