इस दिव्य एपिसोड में हम भागवत पुराण के एक ऐसे अध्याय में प्रवेश करते हैं जहाँ ब्रह्मांड का भाग्य एक महासागर के मंथन से निर्धारित होने वाला है! मत्स्य अवतार के बाद, देव और असुर एक बार फिर अमृत की तलाश में महा-संग्राम के लिए तैयार हैं। जानिए कैसे भगवान विष्णु ने 'कूर्म अवतार' धारण कर मंदराचल पर्वत को सहारा दिया और सृष्टि को हलाहल विष से बचाया। क्या देव अमृत पाने में सफल होंगे? इस महागाथा को देखने के लिए बने रहें! #SamudraManthan #KurmaAvatar #BhagavataPurana #HinduMythology #Vishnu #Shiva #Amrita #Halahala #PauranikKatha #DevasVsAsuras #Mandrachal #Vasuki #Nilakantha #SanatanDharma #EpicStories #YouTubeSeries #Spirituality #Mythology
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00:00महाप्रलय की भीशन्ता के उपरांत मत्स्य अवतार द्वारा बचाये गए जीवन बीजो से ब्रहमांड धीरे-धीरे नवकल्प के आरंभ में
00:08स्वयन को पुनरनिर्मित कर रहा था।
00:11नवकल्प के इस प्रभात में स्वर्ग लोक में देवगण अपनी चिरपरिचित आभासे विहीन, मंदप्रकाशित और अपनी शक्तियों के क्षीन होते
00:20प्रभाव को महसूस कर रहे थे।
00:23इसी अंतराल में पाताल लोक में असुरों की शक्ती में अनपेक्षित वृद्धी हो रही थी, उनकी आखें नए ब्रहमांड पर
00:31प्रभुत्व स्थापित करने की तीवर लालसा से धधक रही थी।
00:36अपनी दिव्य शक्तियों और ओज में लगातार आती कमी से चिन्तित देवगण अपनी असुरक्षा की भावना को अब और भी
00:44गहराई से अनुभव करने लगे थे।
00:46अपनी शक्तियों के इसक्षरण पर विचार विमर्ष करने के लिए सभी प्रमुख देवगण स्वर्गलोग की दिव्य सभा में एकत्र हुए,
00:55जहां उनके चहरों पर गहन चिन्ता स्पष्ट जलक रही थी।
00:59देवराज इंद्र, जिनका तेज कभी पूरे ब्रहमांड को प्रकाशित करता था, अब अपने वजर को धारन करने में भी स्वयन
01:08को असमर्थ पा रहे थे। उनकी आखों में भय की गहरी चाया थी।
01:13देवों के गुरु ब्रिहस्पती अपनी गहन ज्ञानद्रिष्टी से इस संकट का आतलन करते हुए, देवगणों को धैर्य रखने और परम
01:22समाधान हेतु मार्गदर्शन करने का परामर्ष दे रहे थे।
01:26गुरु ब्रिहस्पती के मार्गदर्शन पर देवगणों ने सर्वसम्मती से निर्ने लिया कि इस असाधारन संकट के समाधान के लिए उन्हें
01:35स्रिष्टी के निर्माता भगवान ब्रहमा की शरण लेनी होगी।
01:40इस गेहन समस्या का हल खोजने के लिए समस्त देवगण अपनी दिव्य यात्रा पर निकल पड़े उनके मन में ब्रहम
01:47लोग पहुँचने की द्रिड इच्छा थी।
01:51अनंत आकाश गंगाओं को पार करते हुए देवगण अन्ता ब्रहम लोग के दिव्य द्वारों तक पहुँचे जहां एक शांत और
01:58भव्य वातावर्ण व्याप्ट था।
02:01कमल के आसन पर विराजमान, स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रहमा ने शांतचित होकर देवों की विनमर प्रार्थना सुनी, जिनकी आखें
02:10ब्रहमांड के संतुलन को बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन खोज रही थी।
02:16ब्रहमा जी ने देवों को समझाते हुए बताया कि यह संकट केवल उनकी शक्ती का क्षरण नहीं, बलकि स्वयंग ब्रहमांड
02:24के मौलिक संतुलन में आया एक गहरा विकार है, जिसे केवल परम शक्ती ही ठीक कर सकती है।
02:31इस विशाल चुनौती का समाधान केवल पालन करता भगवान विश्नु के पास है। ऐसा कहकर ब्रहमा जी ने देवों को
02:39क्षीर सागर की ओर प्रस्थान करने का निर्देश दिया।
02:43ब्रहमा जी के निर्देश का पालन करते हुए देवगण पुन्ह अपनी यात्रा पर निकल पड़े इस बार उनकी दिशाक शीरसागर
02:51की ओर थी जहां भगवान विश्नु विश्राम करते हैं
02:57परमशांती और अतुल्य सौंदर्य से परिपूर्ण वैकुंठ लोक में पहुँचकर देवगणों ने क्शीरसागर के तटपर भगवान विश्नु के दर्शनार्थ प्रतीक्षा
03:06की
03:08शीरसागर की लहरों पर शेशनाग के विशाल शरीर पर परमशांती में लीन भगवान विश्नु विराजमान थे उनके चर्णों में देवी
03:16लक्ष्मी सेवा कर रही थी
03:19देवगणों ने विनमरता पूर्वक भगवान विश्णु के समक्ष अपनी दैनिय स्थिती का वर्णन किया, अपनी शक्तिहींता और ब्रहमांड पर मंदराते
03:28संकट की गाथा सुनाई
03:31भगवान विश्णु ने अपनी दिव्यमुस्कान के साथ देवों की व्यथा सुनी और उन्हें आश्वस्थ करते हुए अपनी असीन कृपा का
03:39संकेत दिया कि वे इस संकट का समाधान अवश्य करेंगे
03:44अपनी अनंत माया से अवगत कराते हुए भगवान विश्णु ने देवों को यह असाधारन रहस्य प्रकट किया कि अमरित प्राप्त
03:52करने हेतु उन्हें असुरों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मन्थन करना होगा
03:58भगवान विश्णु के इस अप्रत्याशित किन्तु महान समाधान को सुनकर देवगणों के मन में एक नई आशा जागरित हुई और
04:06उनके नेत्रों में एक असंभव से लगने वाले कार्य को पूरा करने की द्रिडता भर गई
04:13देवगणों ने भगवान विश्णु के अप्रत्याशित सुझाव पर गेहन चिंतन किया, उनके मन में असुरों के साथ मिलकर कार्य करने
04:21की नैतिक दुविधा और संभावित विश्वास घात का भय समाया हुआ था
04:26अंतह ब्रहमांड के कल्यान और अपनी लुक्तप्राय अमर्ता की रक्षा के लिए देवों ने अनिच्छा से भगवान विश्णु के आदेश
04:35का पालन करने और असुरों से संपर्क करने का निर्णय लिया
04:40देवों ने असुरों की सभा में प्रवेश किया जहां वीर दैत्यराज बली अपनी गरिमामई उपस्थिती में विराजमान थे उनके मुख
04:48पर देवों के आगमन पर हलकी सी उफासमई मुस्कान थी
04:53देवों ने विनमरता पूर्वक समुद्र मन्थन का प्रस्ताव रखा जिसमें अमरित प्राप्ट करने के लिए असुरों के सहयोग की आवश्शक्ता
05:02थी यह सुनकर असुरों में अविश्वास और व्यंग्य की लहर दौड गई
05:07ऐसे में देवर्शी नारद अपनी वीना के मधुर तारों को छेड़ते हुए वहां प्रकट हुए और उन्होंने असुरों को भगवान
05:15विश्णों की योजना की महानता और अमरित के सार्वभावमिक लाभ के बारे में समझाया
05:22नारद के तारकिक वचनों और अमरित की अनंत संभावनाओं से प्रभावित होकर असुरों ने समुद्र मन्थन में भाग लेने की
05:30सहमती दी लेकिन उन्होंने अमरित में बराबर की हिस्सेदारी की शर्ट रखी
05:36असुरों की शर्ट को स्वीकार करते हुए देवों और असुरों ने मिलकर क्षीर सागर के मंथन के लिए उचित मंदर
05:43परवत की खोज शुरू की जो मंथन का केंदर बिंदू बनने वाला था
05:48उन्होंने मंदर पर्वत को खोज निकाला, जो अपनी विशालता और स्थिर्ता के साथ ब्रहमांड में सबसे उचा खड़ा था, उसकी
05:57चोटी बादलों को चीरती हुई आकाश गंगाओं तक पहुँच रही थी
06:02किन्तु मंदर पर्वत की विशालता ऐसी थी कि देव और असुर्प अपनी संपूर्ण शक्ती लगाने के बाद भी उसे अपनी
06:10जगह से हिलाने में असमर्थ रहे, उनके चहरे पर निराशा चा गई
06:15तब भगवान विश्णु ने अपनी असीम शक्ती का प्रयोग करते हुए अपने दिव्यवाहन गरुर को बुलाया, जिसने अपनी अध्भुत शक्ती
06:24से मंदर पर्वत को सहज्टा से उठा लिया
06:28गरुर ने मंदर पर्वत को अपने पंखों पर लेकर उसे क्षीर सागर के तट तक पहुँचाया, जहां मन्थन की महायोजना
06:36को मूर्थ रूप देना था
06:38अब मन्थन के लिए रसी की आवश्शक्ता थी, जिसके लिए देव और असुर नागों के राजा, अत्यंत विशाल और बलवान
06:46वासुकी के पास पहुँचे
06:49वासुकी ने अपनी विशाल काया को मन्थन में रसी के रूप में उप्योग किये जाने पर आपत्ती व्यक्त की, उसे
06:56इस कठिन कार्य और उसके संभावित परिनामों का भय था
07:01देवगणों ने वासुकी को समझाया कि यह कार्य ब्रह्मांड के संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और उसे अमरित में
07:09भी भाग मिलेगा, जिससे नागराज सहमत हुए
07:14वासुकी देवताओं के अनुरोध और अमरित के प्रलोभन से सहमत होकर, अपनी विशाल काया को मन्थन के लिए प्रस्तुत करने
07:22को तयार हो गया
07:24वासुकी ने अपनी अध्भुत शक्ती और विशालता के साथ मंदर परवत को घेर लिया, उसके शरीर की प्रत्येक कुंडली मन्थन
07:32की तयारी में कस गई
07:35मन्थन शुरू करने से पहले, देवों ने वासुकी के पूँच वाले छोर को पकड़ा, जबकि असुरों ने उसके सिर्वाले छोर
07:43को संभाला
07:44किन्तु असुरों ने वासुकी के पूँच वाले छोर को पकड़ने से इनकार कर दिया
07:50इसे अशुब और देवों के लिए अपमानजनक मानते हुए
07:54अमरत प्राप्त करने की तीवर इच्छा के कारण
07:57देवों ने अनिच्छा से असुरों को वासुकी का सिर वाला छोर दे दिया और स्वयकूच वाला छोर संभाला
08:05जैसे ही मन्थन शुरू हुआ
08:07मंदर परवत अपनी स्थिर्ता खोने लगा और विशाल क्षीर सागर में धीरे धीरे डूगने लगा
08:13जिससे देवों और असुरों के मन में गहरी चिन्ता चा गई
08:18जैसे ही मंदर परवत गहरे क्षीर सागर में डूगने लगा
08:22देवों और असुरों के बीच हताशा की एक लेहर चा गई
08:26उनकी अथक मेहंत व्यर्थ होती दिख रही थी
08:30वासुकी की पकड धीली होने लगी और मन्थन की लए तूट गई
08:34जिससे महासागर का गर्जन और भी भयावह लगने लगा
08:39असुरों की क्रूर हंसी बंध हो गई और देवों की आशा भरी आखें
08:44अब गहरी चिंता से भर उठीन क्योंकी परवत का डूबना एक आसन्न आपदा का संकेत था
08:51देवराज इंद्र ने अपनी दिव्यदूर गर्शिता से इस संकट को समझा
08:56और अनुभव किया की केवल उच्चतर शक्ती ही इस ब्रहमांडिय असंतुलन को ठीक कर सकती है
09:14और बढ़ते हुए भय के बोज तले दबे हुए देवों ने मन्थन छोड़ दिया और एक नई आशा की तलाश
09:21में अपने नेता का अनुसर्ण किया
09:24वे ब्रहमांडिय आकाश गंगाओं से होते हुए सत्यलोक की ओर बढ़े जहां परम स्रिष्टिकर्ता ब्रहमा का निवास था
09:32अंतर वे सत्यलोक के स्वर्णिन द्वारों से होते हुए परम ज्यान और शांती के उस दिव्य लोक में पहुँचे
09:40वहां उन्होंने भगवान ब्रहमा को एक विशाल चमकदार कमल पर विराज मान देखा जो अपने चार मुखों से ब्रहमांडिय ज्यान
09:49की आभा बिखेर रहे थे
09:52इंद्र ने विनम्रता पूर्वक हाथ जोड कर और भय तथा चिन्ता से भरी आवाज में उन्हें समुद्र मन्थन की विफल
10:00होती प्रक्रिया का वृत्तांत सुनाया
10:03भगवान ब्रहमा अपनी असीम ज्यान द्रिष्टी से सब कुछ समझते हुए ध्यान पूर्वक देवों की पीडा को सुनते रहे
10:12उन्होंने समझाया कि परवत को स्थिर करने के लिए जो शक्ती आवश्चक है वह उनकी स्रिजंग्षमता से भी परे हैं
10:19और केवल ब्रहमांड के संरक्षक ही इसे प्रदान कर सकते हैं
10:25इस प्रकार उन्होंने देवों को भगवान विश्णों की शरण में जाने की सलाह दी जो इस महान ब्रहमांडिय कार्य को
10:32पूरा करने में सक्षम एक मात्र देवता थे
10:36ब्रह्मा की सलाह पाकर देवों के मन में एक नई आशा जगी और उन्होंने कृतग्यता पूर्वक उन्हें नमन किया
10:45वे सत्यलोक से विदा हुए उनके हृदय में अब वैकुंठ की ओर बढ़ने का अटल संकल्प था
10:52तारों से भरे ब्रह्मांडिय पथों से होते हुए देवों ने अपनी यात्रा तेज की वैकुंठ की दिव्य आभा की ओर
11:00बढ़ते हुए
11:02शीघर ही उन्होंने परमशान्ती और अनन्त सौंदर्य के धाम भगवान विश्नु के अलोकिक वैकुंठ लोक का दर्शन किया
11:11वहां उन्होंने महासागर के अनन्त विस्तार में आदिनाग अनन्त शेश पर आलस्य में लेटे हुए भगवान विश्नु को देखा
11:20उनके मुख पर अनन्त शान्ती और उनकी आखों में संपूर्ण ब्रहमांड का ज्यान झलक रहा था जो हर संकट का
11:27समाधान जानते थे
11:30देवों ने इंद्र के नेत्रित्व में ब्रहमांड के संरक्षक के सामने स्वयं को नमन किया उनसे सहायता की याचना करने
11:38के लिए तैयार
11:40देवों के राजा इंद्र ने अपनी स्वर्णमई कांती खोचुके मुख पर चिंता और निराशा लिये हुए ब्रहमांड के पालनकर्ता से
11:48अपनी और समस्थ देवलोग की दीन अवस्था का वर्णन करना आरंब किया
11:54उन्होंने बताया कि कैसे असुरों की बढ़ती शक्ती ने देवों का तेज छीन लिया है और स्वर्गलोग पर बार-बार
12:01आक्रमन कर रहे हैं जिससे ब्रहमांड में अधर्म बढ़ रहा है
12:07इंद्र ने यह भी कहा कि इस संकट से देवताओं का अस्तित्व खत्रे में पढ़ गया है और यदि शीधर
12:13समाधान न मिला तो संपूर्ण ब्रहमांड अंधकार में डूब जाएगा
12:19भगवान विश्णु ने अपनी अनंत्शया अनंत्शेश पर लेटे हुए धीरे से अपनी कमल के समान सुन्दर आखें खोली उनके मुख
12:28पर एक शांत और रहस्यमें मुस्कान फैल गई
12:32उनकी गहरी गूंजती हुई वानी ने ब्रहमांडिय शांती को भंग किया परन्तु वह वानी स्वयन एक शांती पूर्ण समाधान का
12:40वादाकर्ती प्रतीत हो रही थी
12:43भगवान विश्णु ने देवों की पीडा को स्वीकार किया और उन्हें आश्वासन दिया कि वे इस संकट से अंजान नहीं
12:51है और ब्रहमांडिय संतुलन को पुनरस्थापित करने का समया गया है
12:57उन्होंने एक अध्भुत और महाकाविक समाधान का रहस्योद घाटन किया समुद्र मंथन ब्रहमांडिय महासागर का मंथन जिससे अमरित की प्राप्ती
13:07होगी
13:08उन्होंने समझाया कि इस महासागर की असीन गहराईयों में अमरित छिपा हुआ है वह दिव्य नेक्तार जो अमर्त्व प्रदान कर
13:16सकता है
13:18यह अमरित्थी देवों की खोई हुई शक्ती को पुना लोटाएगा और उन्हें भविष्य के सभी युद्धों में अजे बना देगा
13:26जिससे ब्रहमांड में संतुलन स्थापित होगा
13:30देवों ने एक दूसरे की ओर देखा उनके चहरों पर अभी भी थोड़ी उल्जन थी कि एक विशाल महासागर का
13:38मन्थन कैसे संभव हो पाएगा
13:41विश्णू ने उनकी आशंकाओं को भाप लिया और समझाया कि इस महायग्य के लिए देवों और असुरों दोनों के सहियोग
13:49की आवश्षकता होगी
13:51उन्होंने देवों की जिजग को संबोधित करते हुए कहा कि भले ही असुर उनके शत्रू हो परन्तु अमरित के बड़े
13:58लक्ष के लिए अस्थाई गठ बंधन आवश्षक है
14:03विश्णू ने उन्हें असुरों को अमरित में समान हिस्सेदारी का वादा करके मन्थन में शामिल होने के लिए राजी करने
14:10का तरीका बताया
14:12उन्होंने आगे विस्तार से बताया कि मन्थन के लिए मेरू परवत को मन्थन दंड के रूप में इस्तिमाल किया जाएगा
14:19जो उसकी विशालता और स्थायत्व का प्रतीक होगा। और फिर उन्होंने नागों के राजा, महाशक्तिशाली वासुकी को मन्थन की रसी
14:29के रूप में उप्योग करने का सुझाव दिया, जिनकी शक्ती ब्रहमांड को भी मन्थन करने में सक्षम थी।
14:37देवों ने फिर एक दूसरे की ओर देखा, उनके मन में अभी भी कई शंकाय थी, परन्तु भगवान विश्नु की
14:44योजनाओं की भव्यता और उनकी दिव्य उपस्थिती से वे मोहित हो रहे थे।
14:50भगवान विश्नु ने उनके चहरों पर दिख रही अनिश्चित्ता को महसूस किया और उन्हें आश्वस्थ किया कि वे स्वय इस
14:57महाकार्य में उपस्थित रहेंगे और हर बाधा पर विजय प्राप्त करने में सहायता करेंगे।
15:04उन्होंने बल दिया कि इस योजना को अत्यंत गोपनियता और सावधानी से क्रियानवित किया जाना चाहिए ताकि असुरों की ओर
15:13से कोई अप्रत्याशित बाधा ना आए।
15:16विश्नु ने देवों को आदेश दिया कि वे इस महाभियान के लिए आवशक सभी तयारिया करें और इसके लिए आवशक
15:24शक्ती और साहस जुटाएं।
15:27और इस प्रकार एक नए युग की शुरुवात हुई जहाँ देवों ने भगवान विश्नु के दिव्यमार्ग दर्शन से प्रेरित होकर
15:35ब्रहमांडिय अमरित की खोज के लिए एक अकल्पनिय यात्रा पर निकलने का संकल्प लिया।
15:42भगवान विश्नु के आदेश के पश्चात भी देवों के मन में असुरों के साथ किसी भी प्रकार के गठ बंधन
15:49को लेकर गहरी शंका और बेचैनी चाई हुई थी।
15:53देवों के बीच एक गंभीर सभा बुलाई गई जहां वरिष्ट देवों ने सदियों पुरानी शत्रुता को भुलाकर असुरों के साथ
16:01जुडने के प्रस्ताव पर गहन मन्थन किया।
16:05देवों के राजा इंद्र ने विशेश रूप से इस विचार का कड़ा विरोध किया। उन्हें असुरों की कपटपूर्ण प्रकृती पर
16:12बिल्कुल भी भरोसा नहीं था।
16:15तभी देवर्शी नारद अपनी वीना के मधुर स्वरों के साथ प्रकट हुए और उन्होंने विश्णू के वचनों की पुष्टी करते
16:23हुए गठ बंधन की आवश्चक्ता पर बल दिया।
16:27स्रिश्टिकर्ता ब्रहमा भी वहां उपस्थित थे जिन्होंने इस अनोखे गठ बंधन को ब्रहमांडिय संतुलन के लिए आवश्चक बताते हुए विश्णू
16:36की योजना का पूर्ण समर्थन किया।
16:39अंतर भारी मन और गहन विचार विमर्ष के बाद देवों ने ब्रहमांड के हित में असुरों के साथ अस्थाई गठ
16:46बंधन करने की इस कठिन अनिवार्यता को स्विकार कर लिया।
16:51देवों का एक छोटा, लेकिन साहसी प्रतिनिध मंडल इंद्र के नेत्रित्व में एक अप्रत्याशित यात्रा पर असुरों के दुर्गम सामराज्यकी
17:00और निकल पड़ा।
17:02असुरों के सामराज्यकी सीमा में प्रवेश करते ही उन्हें राजा बली के विशाल और भव्य परंतु अंधकार में दर्बार का
17:10आभास हुआ, जहां शक्ती और प्रभुत्व का बोलबाला था।
17:15देवों के अचानक आगमन से राजा बली और उनके दर्बार के सभी असुर अचंभित और गहरे संदेह में पड़ गए,
17:23उनकी आखों में प्रश्न और चेतावनी का भाव था।
17:27अत्यंट सावधानी और विन्मर्ता से इंद्र ने भगवान विश्नु का संदेश और अमरित मंथन के लिए अस्थाई गठ बंधन का
17:35प्रस्ताव राजा बली के समक्ष प्रस्तुत किया।
17:39बली के मुख्य सलाहकारों, जिनमें शुक्राचार यभी शामिल थे, ने देवों की नियत पर गहरा संदेह व्यक्त करते हुए इस
17:47प्रस्ताव को एक छल बताया।
17:49असुर राजा बली ने इस अप्रत्याशित प्रस्ताव पर गहरे विचार में डूपते हुए अपने अभिमान और संभावित विशाल लाब के
17:58बीच एक आंतरिक द्वंदव का अनुभव किया।
18:01एक व्रिध असुर सेनापती ने अपनी गहरी अनुभवी आवाज में देवों के लंबे इतिहास की कपटपूर्ण चालों से सावधान रहने
18:11की चेतावनी दी।
18:12परंतु बली अपनी दूरगर्शी कूटनीती के लिए विख्यात था। उसने इस दुरलब अफसर में ब्रहमांडी अमरित प्राप्त करने की एक
18:22अनूठी संभावना देखी।
18:24अपनी शर्थ के अनुसार बली ने देवों के सामने कुछ कठोर मांगे रखी। जिन में अमरित का एक विशिष्ट और
18:32समान हिस्सा सुनिश्चित करने की प्रतिग्या शामिल थी।
18:36देवों के प्रतिनिधि मंडल ने आपस में विचार विमर्ष किया, बली की कठोर शर्थों पर चिन्ता व्यक्त करते हुए, पर
18:43अंत्त उनके पास कोई अन्य विकल्प नहीं था।
18:47देवों के राजा इंद्र ने गेहन अनिच्छा के साथ ब्रहमांड के व्यापक हित के लिए राजा बली की मांगों को
18:54स्विकार कर लिया।
18:56इस प्रकार देवों और असुरों के बीच एक गहरी अविश्वास की खाई के बावजूद एक आपचारिक और अस्थाई समझोता संपन
19:05हुआ।
19:06समझोते के बाद दोनों गुटों के योध्धा अपनी सदियों पुरानी शत्रुता को अस्थाई रूप से दरकिनार कर महा मंथन की
19:15विशाल तयारी में जुट गए।
19:17इस प्रकार ब्रहमांडिय अमरित की खोज के लिए मंच तयार हो चुका था, जहां देव और असुर एक अस्थाई और
19:25नाजुक समझोते के बंधन में बंधे थे।
19:29अमरित मंथन के लिए उप्युक्त मंथन दंड की खोज में देव और असुर दोनों ही गहन विचार विमर्ष में लीन
19:36थे, जहां प्रत्येक पक्ष अपनी शक्ती के अनुरूप सबसे विशाल और द्रिड परवत की कलपना कर रहा था।
19:43इसी विचार विमर्ष के दौरान तेजस्वी महर्शी अगस्तिर, जिन्होंने अपनी तपस्या से ब्रहमांड के रहस्यों को जाना था, ने मंथन
19:53के लिए मेरू परवत से भी विशाल मंदराचल को उचित बताया।
19:58मंदराचल अपनी विशालता और स्थिर्ता के लिए विख्यात, जिसके शिखर आकाश को छूते थे और जड़े पाताल में गहराई तक
20:06समाई थी, मंथन दंड के रूप में देवताओं और असुरों दोनों को ही उप्युक्त लगा।
20:12अगस्त्य मुनी के सुझाव को मान कर देवताओं और असुरों की विशाल सेना अपनी अस्थाई संधी के तहट मंदराचल परवत
20:21की ओर अग्रसर हुई, उनके हृद्यों में अमरित प्राप्ती की अदमें आशा धधक रही थी।
20:27देवों ने अपनी समस्थ दैविय शक्ती लगा कर अपनी भुजाओं और दिव्य अस्त्रों से मंदराचल को उखाडने का प्रयास किया,
20:36किन्तु परवत अपनी अटल जडों के साथ अविचल खडा रहा।
20:41देवों के विफल होने पर बलशाली असुरों ने अपनी मायावी और पाश्विक शक्ती से मंदराचल को हिलाने का प्रयास किया,
20:49उनकी गर्जना से धर्ती काप उठी, परंतु परवत तनिक भी नहीं डिगा।
20:54देवों और असुरों, दोनों के संयुक्त और अथक प्रयासों के बावजूद, मंदराचल परवत अपनी जगह से तस से मस न
21:02हुआ, जिससे उनके मुख मंडल पर निराशा और क्रोध की गहरी छाया मंदराने लगी।
21:09जब सभी उपाय निश्फल हो गए, तब स्रिष्टिकर्ता ब्रहमा की प्रार्थना पर ब्रहमांड के पालक भगवान विश्नु अपने दिव्य स्वरूप
21:17में प्रकट हुए, उनके मुख पर सौमय मुस्कान और नेत्रों में असीम करुणा थी।
21:23भगवान विश्नु ने अपने एक हाथ से मंदराचल को सहज्टा से उठाया, जैसे कोई बालक खिलोना उठाता है और तीनों
21:32लोकों के आश्चर्य के बीच उसे उसकी जड़ों से अलग कर दिया।
21:36भगवान विश्नु के दिशानिर देशन में देवों और असुरों ने मिलकर अब हलके हुए मंदराचल परवत को सावधानी पूर्वक उठा
21:45कर शीरसागर की ओर ले जाना आरंभ किया।
21:50शीरसागर के विशाल जल में मंदराचल को रखने के बाद देव और असुरों ने देखा की परवत बिना किसी आधार
21:57के धीरे-धीरे अतल गहराईयों में धंसने लगा, जिससे उनके प्रयासों पर पानी फिरने लगा
22:04मंदराचल को डूपता देख, भगवान विश्णू ने अपनी दिव्य अंतरग्रिष्टी से स्थिती का आकलन किया और तुरंत समझ गए की
22:12मंथन दंड को स्थिर रखने के लिए एक द्रिड आधार की आवश्शकता होगी
22:18ब्रहमांड की स्थिर्ता हे तु, भगवान विश्णू ने अपने भव्य स्वरूप को त्याग कर विशालकाय कूर्म अवतार का रूप धारन
22:26किया, जो परवत को अपनी पीठ पर धारन करने में सक्षम था
22:32विशाल कूर्म अपनी धीनी किन्तु द्रिड गती से क्षीर सागर की गहरायों में उत्रा, जहां उसकी विशाल पीठ मंदराचल के
22:40लिए एक अटल आधार बनने वाली थी
22:43अतल गहरायों में पहुँचकर, कूर्म अवतार ने मंदराचल परवत को अपनी द्रिड और विशाल पीठ पर धारन कर लिया, जिससे
22:51परवत की गती रुक गई और वह मंधन के लिए स्थिर हो गया
22:57मंदराचल के स्थिर होते ही, देवों और असुरों ने मंथन के लिए एक उप्युक्त रसी की तलाश शुरू की, जिसके
23:04लिए उन्होंने नागराज वासुकी का नाम सुझाया
23:08ब्रहमांड की शांती के लिए देवों और असुरों का एक प्रतिनिधिमंडल भगवान विश्नु के साथ पाताल लोक में नागराज वासुकी
23:17के समक्ष पहुँचा, ताकि उन्हें मंथन के लिए मना सके
23:22नागराज वासुकी ने मन्थन की पीड़ा और विशुगलने की संभावना को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की, जिससे उनके मुख पर
23:30एक शनिक भय और संकोच का भाव उभराया
23:35भगवान विश्णु ने वासुकी को अमरित में हिस्सेदारी और मन्थन के पश्चात सम्मान का आश्वासन देकर बड़ी सहचता से उन्हें
23:43इस महान कार्य के लिए राजी कर लिया
23:47अंतह नागराज वासुकी ने ब्रहमांड के हित में अपना योगदान देने का संकल्प लिया और अपनी विशाल चमकदार देह को
23:55मन्थन के लिए एक ब्रहमांडिय रसी के रूप में प्रस्तुत किया
23:59शीर सागर के एंद्रिक मध्यक्षेत्र में विशालकाय मंदराचल परवत स्थापित किया गया जिसकी स्वर्णिम चोटिया आकाश को छू रही थी
24:10नागराज वासुकी ने अपने दिव्य और अनंत शरीर को मन्थन की सुद्रिड रसी के रूप में मंदराचल परवत के चारों
24:18और कसकर लपेट लिया
24:21दैत्यराज बली के नेत्रित्व में असुरों ने अहंकारवश वासुकी के मुख की और का भाग पकड़ने की हट की क्योंकि
24:28वे पूँच को तुछ मानते थे
24:31भगवान विश्णु ने अपनी चिरपरिचित शांत मुसकान के साथ देवों को संकेट दिया कि वे सहर्ष पूँच की और का
24:39भाग स्विकार कर ले
24:42देवराज इंद्र के साथ समस्त देवताओं ने विन्मरता पूर्वक नागराज वासुकी की पूँच को कसकर थाम लिया और मन्थन के
24:50लिए तत्पर हो गए
24:52दूसरी और अपार शक्ती और गर्व से भरे असुरों ने वासुकी के विशैले फणों वाले मुख के निकट का हिस्सा
24:59मजबूती से पकड़ लिया
25:02जैश्री हरी और हुंकार के प्रचंड उद्गोश के साथ दोनों पक्षों ने वासुकी को खीचा और ब्रहमांडिय सागर में महामंथन
25:10का आरंभ हुआ
25:12जब दोनों पक्षों ने लैबध रूप से खिंचाव शुरू किया तो मंदराचल परवत सागर जल में तीवर गती से घुमने
25:20लगा
25:22मंदराचल की कठोर शिलाओं और नागराज वासुकी की त्वचा के बीच अत्यधिक घर्शन से ब्रहमांडिय अगनी की भयंकर चिंगारिया निकलने
25:31लगी
25:32मंधन के प्रचंड वेग से क्षीर सागर में गगन्चुंबी तरंगें उठने लगी जिससे संपूर्ण तीनों लोग कम्पित हो उठे
25:41जैसे जैसे मन्थन की गती बढ़ी नागराज वासुकी को अत्यधिक खिंचाव और रगड के कारण असहनिय शारिरिक पीडा होने लगी
25:51पीडा की पराकाश्ठा में नागराज वासुकी के मुख से विशैले, जलते हुए काले धुए और ज्वालाओं के विशाल बादल निकलने
26:00लगे
26:01वासुकी के फण से निकलती भयंकर ज्वालाओं और गर्म धुए ने असुरों के चहरों को जुलसा दिया, जिससे उनका गर्व
26:09चूर होने लगा
26:11इसके विपरीत भगवान विश्णों की क्रिपा से पूँच की ओर खड़े देवताओं पर शीतल और सुगंधित मंद पवन बहती रही
26:19पीड़ा और ज्वालाओं के बावजूद देवों और असुरों ने अपनी पूरी शक्ती लगाकर मंदराचल की घूर्णन गती को और तीवर
26:28कर दिया
26:28परंतु क्षीर सागर के तल में किसी सुद्रिड आधार के अभाव में विशालकाय मंदराचल परवत असंतुलित होकर डगमगाने लगा
26:39परवत के अत्यधिक भार और मंथन के तीवर दबाव के कारण मंदराचल धीरे-धीरे समुदर की अगाध गहराईयों में धंसने
26:47लगा
26:48मंदराचल को जल में विलीन होते देख देवों और असुरों के बीच हडकंप मच गया और चारों और भय की
26:55लेहर दोड़ गई
26:57महामंथन का महानकार्य अचानक रुख गया और परवत दूबने से दोनों पक्ष अत्यंत निराश और असहाय होकर खड़े रह गए
27:06इस विकट संकट को देख कर ब्रहमा जी सहित समस्थ देवताओं और असुरों ने रक्षा हेतु भगवान विश्णू की ओर
27:14कातर द्रिष्टी से देखा
27:17समस्त देवों और असुरों की आतुर पुकार को सुनकर भगवान विश्णु ने अपने विराट स्वरूप में हस्तक्षेप करने का अटल
27:25निश्चय किया जिससे स्रिष्टी का संतुलन बना रहे
27:28उनकी शान्त ध्यानमग्न मुद्रा में ब्रहमांडिय शक्तियों का केंद्र भगवान विश्णु ने मंदराचल को आधार प्रदान करने की अध्वितिय योजना
27:39पर गेहन चिंतन किया
27:41तत्पश्चात भगवान के हरिदय से एक दिव्य संकल्प का प्रकाश फूट पड़ा जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि ब्रहमांड के
27:49पालनहार अब स्वयें इस संकट में हस्तक्षेप करने वाले हैं
27:54विष्णू के चारों और एक अलोकिक नीलीहरी आभा प्रकट होने लगी जो उनके आसन्न परिवर्तन और अवतार के प्राकट्य का
28:03संकेट दे रही थी
28:05देव और असुर जो अभी भी मंदराचल के डूगने से हताश थे अब विस्मय और आशा भरी द्रिष्टी से भगवान
28:13विष्णू की ओर देख रहे थे उनकी दैविय क्रिया को समझने का प्रयास करते हुए
28:19धीरे धीरे विष्णू का मानव रूप परिवर्तित होने लगा और एक विशाल प्राचीन कच्छुए की आकरिती ने आकार लेना शुरू
28:27कर दिया जिसकी महिमा अपार थी
28:31अपने कूर्म अवतार में प्रकट होकर भगवान विष्णू ने महासागर की गहराई में एक धीमा गरिमापून अवतरन आरंभ किया मानो
28:40स्वयं ब्रहमांड उन्हें धारन करने को तयार हो
28:44महासागर की अतल गहराईयों में कूर्म अवतार ने शांत भाव से आगे बढ़ना जारी रखा उनकी गती में एक शाश्वत
28:52स्थिर्ता और शक्ती नहित थी
28:55तेजी से डूपते हुए मंदराचल परवत की ओर बढ़ते हुए कूर्म अवतार एक अतल मौन संकल्प के साथ अपने गंतव्य
29:04की ओर अग्रसर हुए
29:06विशाल कूर्म अवतार ने अपने महाकाय कवच को डूपते हुए मंदराचल के ठीक नीचे अत्यंत सटीक्ता और धैर्य के साथ
29:15स्थापित किया
29:16मानो वह युगों से इसी पल की प्रतीक्षा कर रहे हुँ
29:20पर्वत का विशाल भार कूर्म की मजबूत पीठ पर धीरे से स्थापित हो गया जिससे उसे एक ठोस और अचल
29:28आधार प्राप्थ हुआ जिसने पूरी प्रक्रिया को जीवंदान दिया
29:33मंदराचल पर्वत अब कूर्म के द्रिड कवच पर अचल हो गया था जो महा मन्थन के लिए एक स्थिर धुरी
29:39प्रदान कर रहा था
29:42इस दिव्य हस्तक्षेप से समुद्र की पहले की अशांती धीरे धीरे शांत होने लगी और एक नई स्थिर्ता ने अपनी
29:50पकड बना ली
29:52उपर देवों और असुरों ने अपनी आखों के सामने परवत को स्थिर होते हुए देखा जिससे उनके चहरों पर आश्चर्य
30:00और राहत के भाव उमड़ पड़े
30:02उन्होंने तत्क्षन समझ लिया कि यह कोई सामाने घटना नहीं बलकि स्वयं भगवान विश्नु का प्रत्यक्ष आशिर्वाद है जिसने उनकी
30:12आशा को पुनरजीवित किया है
30:15इस अप्रत्याशित दैविय सहायता से सभी के हृदय में एक नई आशा का संचार हुआ जिसने उन्हें अपने महान कार्य
30:23को फिर से शुरू करने के लिए प्रेरित किया
30:27अपनी निराशा को त्याग कर देव और असुर अब मंदराचल को घेर कर खड़े हो गए महा मंथन को पुनह
30:34आरंभ करने की तैयारी में
30:37उन्होंने एक बार फिर स्थिर मंदराचल की ओर देखा जो अब एक अद्रिश्य शक्ती के बल पर अटल खड़ा था
30:44उनके संकल्प को पुष्ट करता हुआ
30:48नए उच्साह के साथ देवों और असुरों ने वासुकी नाग को फिर से खीचना शुरू किया जिससे समुद्र मंथन का
30:56महान कार्य एक बार पुनह प्रारंभ हो गया
31:00गहरायों में कूर्म अवतार शांत और अडिग रहे एक मौन आधार के रूप में ब्रहमांडिय नाटक की नीव बने हुए
31:07जब तक अमरित की प्राप्ती न हो जाए
31:11वासुकी के शरीर पर हाथों की पकड मजबूत हुई और मंदराचल के चारों और लिपता नाग पुनह तेजी से घूमने
31:19लगा जिससे समुद्र की गहराई में एक भीशन हलचल मच गई
31:24मंधन का वेग इतना प्रबल हुआ कि ब्रहमांड की नीम तक हिलने लगी और उसकी भीशन गरजना से आकाश और
31:31पाताल दोनों गुंज उठे
31:34समुद्र के भीतर से उठने वाले दबाव ने उसके गहरे नीले जल को मत दिया जिससे एक अजीबो गरीब धूमिल
31:42रंग और तीवर दुरगंध चारों और फैलने लगी
31:46जैसे जैसे मन्थन तेज होता गया जल की गहराईयों से एक असपष्ट घनी चाया उपर की ओर बढ़ने लगी जो
31:54ब्रहमांडिय भय का अग्रदूत लग रही थी
31:57सहसा समुद्र के हृदय से एक गाढ़ा धूमिल और विशैला पदार्थ उपर उठना आरंभ हुआ जिसका रंग गहन अंधेरे के
32:06समान था और वह भयावा रूप से विकृत था
32:09और फिर एक भीशन विस्पोट के साथ हलाहल नामक महाविश अपने पूर्ण भयावा रूप में समुद्र से बाहर निकलाया जो
32:19स्वयम्रित्यु का साकार रूप था
32:22हलाहल का रंग भयानक रूप से काला था जिसमें से तीवर विशैली भाप उठ रही थी जो हर जीवित प्राणी
32:30के प्राण हर लेने की क्षमता रखती थी
32:33यह भयंकर विश हवा में फैलने लगा जिसकी हर बूंद में समस्त ब्रह्मांड को नश्ट करने की शक्ती समाहित थी
32:40और उसकी गंध हर सास के साथ मृत्यु ला रही थी
32:45उसका घातक प्रभाव तुरंक महसूस होने लगा जहां जहां उसकी विशैली हवा पहुँची पेड़ पौधे जुलसने लगे और जल स्रोथ
32:54सूखने लगे
32:56देवों और असुरों ने उस भयंकर विट्दा को अपनी आखों के सामने आते देखा उनकी मुस्कान भय में बदल गई
33:03और उनके हृदय आतंक से सिकुड गए
33:07महासागरों का जल जो अमरित के लिए मता जा रहा था अब विश्की गर्मी से उबलने लगा और उसका स्तर
33:14तेजी से गिरने लगा जिससे जीवजन्तु तडपने लगे
33:19स्वर्गलोग के दिव्य प्राणी भी उस विश्की भयावहता से कांप उठे जब उसकी काली छाया उनके स्वर्णिम लोकों पर मंदराने
33:27लगी
33:29नदिया सूख गई, पहाड जुलस गए और आकाश में उर्ते पक्षी भी उस विशैली हवा के संपर्क में आते ही
33:36धर्ती पर गिरने लगे
33:39ब्रहमांड के रचिता भगवान ब्रहमा और पालक भगवान विश्नु ने अपने अपने लोकों से इस अभूत पूर्व प्रल्यकारी संकट को
33:47ततकाल अपनी दिव्य द्रिश्टी से भांप लिया
33:51समस्त ब्रहमांड में एक भयावः चीक फैल गई क्योंकि हर प्राणी ने अपने अस्तित्व पर मंदराते इस आसन्न खत्रे को
33:59महसूस किया
34:01हलाहल का तेजी से बढ़ता ताप और उसकी दाहक गंध ने अंतरिक्ष को भी जुलसाना शुरू कर दिया जिससे तारों
34:08का प्रकाश भी मंद पढ़ने लगा
34:11देवों और असुरों के शरीर में एक असहनिय जलन होने लगी जैसे उनकी त्वचा पर तेजाप की वर्षा हो रही
34:19हो
34:20पूरे ब्रहमांड में एक असहनिय ताप और शुशकता फैल गई मानो स्वयनकाल उसे निगलने के लिए अपना मुख खोल रहा
34:28हो
34:29इस महाविपदा से बचने का कोई मार्ग न देखकर देव और असुर दोनों ही नहसहाई और व्याकुल होकर एक समाधान
34:37की तलाश में थे
34:39अपनी आखों में भय और प्रार्थना लिए सभी प्राणी देव और असुर एक साथ कैलाश परवत की ओर देखने लगे
34:48जहां महादेव शिव निवास करते हैं एक अंतिम आशा की किरण के रूप में
34:54भय भीत देव और असुर जिनके मुख पर कालिमा और आखों में याचना थी एक विशाल जनसमुह के रूप में
35:02कैलाश परवत की ओर उमड़ पड़े जहां ब्रहमांड का सर्वोच्च योगी ध्यान में लीन था
35:08देवताओं और दानवों की उस विशाल भीड के सामने कैलाश परवत अपनी बरफीली चोटियो और शांत वातावर्ण के साथ किसी
35:17दिव्य शांती के प्रतीक सा खड़ा था जो बाहर फैले हाहाकार से पूर्णता अच्छूता था
35:24कैलाश के हरिदय में भगवान शिव एक अविचल ध्यान में लीन थे उनकी जटाओं से गंगा प्रवाहित हो रही थी
35:31और उनका तीसरा नेत्र ब्रहमांड के रहस्यों में डूबा हुआ था
35:37महादेव के समीप देवी पारवती उनके मुख पर शाश्वत प्रेम और चिंता के भाव लिये ब्रहमांड के इस संकट को
35:44अपनी दिव्य दृष्टी से निहार रही थी
35:48ब्रहमांड के रचिता ब्रहमा और पालक विश्णु अपनी दिव्य आभासे मंडित कैलाश के द्वार पर पहुँचे उनके मुख पर भी
35:56इस अभूत पूर्व संकट की गहरी चिंता स्पष्ट थी
36:01सभी देव, असुर, रिशिमुनी और अन्यप्राणी अपनी सारी आशाय शिव पर केंद्रित कर एक स्वर में हाथ जोड कर महादेव
36:09से करुणा की प्रार्थना करने लगे
36:12जैसे जैसे प्रार्थनाय ब्रहमांड में गूंज रही थी, हलाहल विश्की काली, विनाशकारी ज्वालाये और भी प्रचंड होकर फैलने लगी, आकाश
36:22को लालिमा से भरती हुई, प्रित्वी को जुलसाती हुई
36:27अचानक उस असीम ताप और पुकार से महादेव शिव का ध्यान तूटा, उनकी पल के धीरे-धीरे खुली, और उनकी
36:35त्रिनेत्रिय द्रिष्टी ने पूरे ब्रहमांड के पीडा को एक पल में माप लिया
36:40महादेव ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से ब्रहमांड के कणकण में फैल रही उस भयावः पीडा, उस असहनियताप और जीवन के प्रती
36:48उस महाखतरे को एक साथ अनुभव किया
36:52तक्षण उनके मुख पर एक शांत करुणामय मुस्कान उभराई जो तीनों लोकों के भय को हरने और जीवन की रक्षा
37:00का आश्वासन देने वाली थी
37:03महादेव के उस करुणामय भाव को देखकर देवी पारवती की आखों में भी एक पल के लिए चिन्ता की एक
37:10लेहर उठी क्योंकि वह उनके त्याग के गहन अर्थ को जानती थी
37:16फिर एक अध्भुट शक्ती के साथ भगवान शिव अपने ध्यान की मुद्रा से उठे उनकी विशाल काया में ब्रहमांडी उर्जा
37:24का संचार हो रहा था और उन्होंने संकट की दिशा में कदम बढ़ाया
37:30समस्त देव और असुर निहश्वास होकर उन्हें देखते रहे क्योंकि महादेव निर्भय होकर उस स्थान की ओर बढ़ रहे थे
37:38जहां हलाहल विश अपनी प्रचंड शक्ती से ब्रहमांड को भस्म कर रहा था
37:44हलाहल एक जीवित भयावह इकाई की तरह काले और हरे धुए के विशालकाई बादलों में लिप्टा हुआ तीवर ध्वनी के
37:52साथ उफन रहा था मानो स्वयम्रित्यू साकार हो गई हो
37:57महादेव ने बिना किसी हिचकी चाहट के उस प्रल्यंकारी विश के सामने अपने हाथ बढ़ाए और उसे अपनी हथेली में
38:05समेटने लगे मानो वह कोई सामान्य जल हो
38:09उन्होंने उस भयावः ब्रह्मांद भक्षी विश को अपनी हथेली में धारण किया, जिसका एक कन भी सम्पून स्रिष्टी का नाश
38:17कर सकता था, और उसे अपने मुख की ओर बढ़ाया
38:22एक अविश्वस्नियक्षण में भगवान शिव ने उस पूरे विश को निगल लिया, और जैसे ही वह उनके गले से उत्रा,
38:29उनका कंठ धीरे-धीरे नीला पड़ने लगा, जो उनके असीन त्याग का प्रतीक था
38:36महादेव के इस महात्याग के प्रभाव से ब्रहमांड का ताप कम होने लगा, और भयावह हलाहल का विनाशकारी प्रभाव थम
38:44गया, जिससे सृष्टी को नवजीवन मिला
38:47असीन कृतग्यता से भरकर, देव और असुर दोनों ने अपने भय और चिंता से मुक्थ होकर, नीलकंठ महादेव के समक्ष
38:56अपना सिर जुकाया, जिन्होंने उन्हें महाविनाश से बचाया था
39:00और इस प्रकार महादेव नीलकंठ कहलाए, जिन्होंने अपनी असीम करुणा और त्याक से ब्रहमांड को कालकूट विश्के विनाश से बचाकर,
39:11समस्थ सृष्टी के लिए जीवन का मार्ग प्रशस्त किया
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