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वामन अवतार के बाद, भागवत पुराण हमें एक और अद्भुत कहानी की ओर ले जाता है - महाप्रलय और मत्स्य अवतार की! जब ब्रह्मांड पर प्रलय का खतरा मंडराया, एक छोटी सी मछली ने कैसे बचाया जीवन और ज्ञान को? इस एपिसोड में देखें, कैसे राजा सत्यव्रत को मिला भगवान का दिव्य दर्शन और कैसे मत्स्य अवतार ने मनु, सप्तऋषियों और समस्त सृष्टि का उद्धार किया। एक ऐसी कथा जो जीवन, प्रलय और पुनरुत्थान के गहरे रहस्यों को उजागर करती है! #MatsyaAvatar #BhagavataPurana #MahaPralaya #HinduMythology #Vishnu #Satyavrata
Transcript
00:00वामन अवतार के पश्चात भगवान विश्णों ने राजा बली को पाताल के वैभवशाली सुतल लोक का अधिपती बनाकर ब्रहमांड में
00:08एक नए दिव्यव्यवस्था की स्थापना की थी, जहां बली धर्म प्रायन राजा के रूप में शासन कर रहे थे.
00:16समस्थ देवलोक में वामन देव की महिमा का गुनगान हो रहा था, और स्वर्ग के देवता अपनी खोई हुई प्रभुता
00:23पाकर हर्शोलास में निमगन थे, स्वर्णिम सिनहासन पर आसीन देवराज इंद्र के नेत्रों में संतोष का प्रकाश चमक रहा था.
00:33ब्रहम लोक में स्रिष्टी के आदिनियंता, चतुर मुखी ब्रहमा अपने दिव्य सिनहासन पर आसीन शांत चित्त से ब्रहमांड के सुक्षम
00:41से सुक्षम स्पंदनों का अवलोकन कर रहे थे, उनके चार मुखों पर त्रिकालदर्शी ज्यान की आभा व्याप्त थी.
00:49वे अपने प्रत्येक दिवस को एक विशाल कल्प के रूप में अनुभव करते थे, जिसके आरंभ में नई स्रिष्टी का
00:57सूत्रपात होता और अंत में उसकी पूर्णता, यह अनंत चक्र ही ब्रहमांड का मूल आधार था.
01:04ब्रहमा की प्रत्येक रात्री एक महा प्रलय थी, जब उनकी आखों के बंध होते ही समस्त्रिलोक जल्मगन हो जाते और
01:12स्रिष्टी के सभी जीव गहन निद्रा में लीन होकर उनके पुनः जागर्ण की प्रतीक्षा करते.
01:19इस युग के अन्त के निकट सुक्ष्म परिवर्तन ब्रहमांड के तानेबाने में जलकने लगे थे, प्रकृती का संतुलन डग्मगा रहा
01:27था और धर्म की आभा धीरे-धीरे क्षीन होती जा रही थी.
01:32दूरस्थ हिम्षिकरों की शांत गुफाओं में तपस्यारत सब्तर्शिगन और अन्यमहर्शिगन ब्रहमांडिय संकेतों और अलौकिक शक्तियों में हो रहे बदलावों को
01:42अपनी दिव्यद्रिष्टी से अवलोकन कर आसन्न महाप्रलय की आहट को भाप रहे थे.
01:48एक पुनियात्मा राजा, वैवस्वत मनु जो अपनी प्रजा को त्याग कर गेहन तपस्या में लीन थे, अपने अंतर्मन में आने
01:56वाले विराट परिवर्तन को महसूस कर रहे थे.
02:00धीरे-धीरे कालचक्र अपनी अंतिन घडियों की ओर अग्रसर हो रहा था, प्रतेक पल के साथ एक विशाल युग का
02:08समापन निकट आता जा रहा था, और ब्रहमांड एक गहरे मौन में डूपता जा रहा था.
02:14धरा पर अधर्म और स्वार्थ की छाया सधन होती जा रही थी, मनुष्य अपने नैतिक मूलियों से विमुख हो रहा
02:22था, जिससे प्रकृती का संतुलन और भी अधिक बिगरता जा रहा था.
02:28स्वर्गलोक में देवगण, प्रित्वी पर बढ़ती अशान्ती और आसन्न संकटों को देख कर चिन्तित थे, और उन्होंने इस विशय पर
02:36विचार विमर्ष करने है तू ब्रहमा जी की सभा में उपस्थित होने का निर्णय लिया.
02:42परम्पिता ब्रहमा ने अपनी दिव्यद रिष्टी से देखा कि यह मनवंतर अपने पूर्णत्व को प्राप्त कर रहा था, और महाप्रलय
02:50का समय निकट आ रहा था, जिसके पश्चात एक नए मनवंतर का उदे होना निश्चित था.
02:57शीरसागर में अनंत नाग पर शेश्चाई भगवान विश्णु अपनी योग निद्रा में लीन थे, पर उनकी शांत आभा में भी
03:04ब्रहमांड के हर स्पंदन की गहरी चेतना विद्यमान थी, वे सब कुछ जानते थे और देख रहे थे.
03:12देवर्शी नारद अपनी वीना महाती पर मधुर धुन छेड़ते हुए तीनों लोकों में भ्रमन कर रहे थे, उनके मुखमंडल पर
03:20गहन चिन्ता के भाव थे, वे आने वाले परिवर्तनों के संकेतों को स्पष्ट रूप से पढ़ रहे थे.
03:28गंगा तट पर वेवस्वत मनु अपने आश्रम में शिश्यों को धर्म और नीती के सिध्धान्त सिखा रहे थे, उनके शब्दों
03:35में ज्ञान की गहराई और आने वाले समय की गंभीरता की चाया थी.
03:41दूरक्षितिच पर आकाश में एक गहरा, असामा ने काला बादल धीरे-धीरे आकार ले रहा था, जो की आसन्न जल
03:49प्रलै की पहली फुस्फुसाहट थी, एक शांत लेकिन भयावह संकेत.
03:55व्यवस्वत मनु इन सबसे अन्भिग्य अपनी एकागर तपस्या में लीन थे, गंदा की शीतल धारा में खड़े होकर वे भगवान
04:03विश्णु का ध्यान कर रहे थे, अपनी आत्मा को पवित्र कर रहे थे.
04:09ब्रहमांड के इस महाचकर में प्रलय केवल एक अंत नहीं था, अपितु यह एक नए आरंभ का, एक नए मनवंतर
04:16और एक नए स्वर्णिम युग के बीज का रोपन था.
04:21समस्त लोकों में एक शांत परंतु गहरी प्रत्याशा व्याप्त थी, जैसे प्रकृती स्वयं एक महान रहस्योद घाटन की प्रतीक्षा कर
04:29रही हो, एक दिव्य हस्तक शेप की.
04:33जैसे एक विशाल, स्वर्णिम सूर्य अपने दिन की यात्रा पूरी करक्षितिच के पार अस्थ होता है, वैसे ही यह मनवंतर
04:41अपनी भव्यता के साथ धीरे-धीरे समापन की ओर अग्रसर हो रहा था, एक नए प्रभात की आशा जगाते हुए.
04:49धीरे-धीरे ब्रहमांड के आंतरिक स्पंदनों में एक सुक्ष्म परिवर्तन महसूस किया जाने लगा, जैसे समय की नदी अपने सामान्य
04:58मार्ग से हटकर एक अप्रत्याशित मोड ले रही हो.
05:02प्रित्वी पर रितूओं का चक्र अनियमित हो चला था और प्रकृती के लए में एक अंजानी अशान्ती घुलने लगी थी,
05:10जो आने वाले विग्टन का पूर्वाभास करा रही थी.
05:14महासागरों की गहरी शांत लहरों में भी एक अप्रत्याशित हल्चल दिखने लगी, उनकी सतह पर उठती विशाल तरंगे किसी अग्रिश्य,
05:23आगामी शक्ती की सूचना दे रही थी.
05:27वनो और परवत कंदराओं में तपस्या कर रहे, महान रिशिमुने अपनी गहन समाधियों में भी इस ब्रहमांडिय विपलव के संकेतों
05:35को महसूस कर रहे थे.
05:37स्वर्गलोक में देवगण भी चिंतित होकर इन खगोलिय परिवर्तनों पर विचार विमर्ष कर रहे थे, उनके स्वर्णिम आभा मंडलों पर
05:46आशंका की छाया मंडरा रही थी.
05:49ब्रहम लोक में महान रिशियों और ब्रहम पुत्रों ने स्वयन लोकपिता ब्रहमा के समक्ष इस आसन्न संकट पर गहन चर्चा
05:57आरंभ की.
05:59देवर्षी नारद अपनी वीना के शान्त स्वरों के साथ विभिन लोकों में यह अशुब संदेश लेकर यात्रा कर रहे थे,
06:07उनकी वानी में गंभीर चेतावनी गूंज रही थी.
06:11अचानक आकाश में काले बादलों का घंगोर जमावडा हो गया और सामान्य वर्षा के विप्रीत जल की अविराम धाराय प्रित्वी
06:20पर बरसने लगी.
06:22समुद्र का जलस्तर तेजी से बढ़ने लगा, जिससे तटियन अगर और छोटे द्वीप देखते ही देखते जलमगन होते चले गए
06:30और भय का सामराज फैलने लगा.
06:34मनुष्यों में हाहाकार मच गया, वे अपने घरबार छोड़कर उचे स्थानों की ओर भागने लगे, परंतु जल का रौद्र रूप
06:41उन्हें हर दिशा से घेर रहा था.
06:43इस विकट स्थिती में अनेक महान रिशी और योगी एक पवित्र परवत शिखर पर एकत्रित हुए, उनके मुखों पर चिन्ता
06:53की गहरी लकीरें उगरी हुई थी.
06:56उन्होंने अपने आखें बंद कर ली और एकागरता से ब्रहमांड के सनरक्षक भगवान विश्णू से इस प्रलै से रक्षा हेतु
07:04करुन प्रार्थनाय करने लगे.
07:07सूर्य का तेज पूरी तरह से ढख गया था और आकाश से मूसलाधार वर्षा बिना किसी विराम के प्रित्वी को
07:14डुबोती जा रही थी, मानो स्वय मेग भी रो रहे हुँ.
07:19नदिया अपनी सीमाओं को तोड़ कर एक विशाल अनियंत्रित जलराशी में बदल चुकी थी, जो मार्ग में आने वाली हर
07:27चीज को बहा ले जा रही थी.
07:30प्राचीन नगर, जो कभी जीवन और संस्कृती के केंद्र थे, अब जल के अथा सागर में खो रहे थे, उनकी
07:37भव्य संरचनाए धीरे धीरे डूब रही थी.
07:42वन्यजीव और पक्षी भी भयभीत होकर, अपने आश्रे स्थलों को छोड़कर उंचे पेडों और बचे हुए शुष्प तीलों पर शरण
07:49ले रहे थे, उनकी आखों में आतंक था.
07:53इस भयंकर प्रलै की भयावहता देखकर, देवगन ब्रहमा लोक में पुनह एकत्रित हुए और अपने अधीर मन से लोकपिता ब्रहमा
08:02के समक्ष उपस्थित हुए.
08:04चार मुख वाले भगवान ब्रहमा अपने कमल सिनहासन पर शांत मुद्रा में विराजमान थे, उन्होंने स्रिष्टी के इस अवश्यम भावी
08:13अंत को स्वीकार करते हुए एक गहरी सांस ली.
08:17उन्होंने देवगणों को धैर्य रखने और इस महाप्रलय के बीच स्रिष्टी के पालत भगवान विश्णू की शरण में जाने का
08:25निर्देश दिया.
08:27जैसे जैसे ब्रह्मा के शब्द वातावर्ण में गुंजे, नीचे मृत्यूलोक में जल का स्तर और भी तेजी से बढ़ने लगा,
08:35हर एक आत्मा को निगलने को उद्यत, एक विशाल दैत्यसा.
08:40मृत्यूलोक के निचले प्रांतों में महाप्रलय का उनमत्त जल एक क्रूर सर्प की भाती फैलता हुआ, जीवन के अंतिम अवशेशों
08:48को निगलने को आतुर था.
08:51ऐसे घंगोर संकट के बीच, द्रविड देश के धर्मात्मा राजा सत्यवरत की नगरी में शान्ती की एक धूमिल आशा अभी
08:59भी जीवन्त थी, जहां उन्होंने अपनी प्रजा को धर्म और सन्यम से जीवन जीने की शिक्षा दी थी.
09:06ज्यान और तपस्या में लीन, राजा सत्यवरत प्रतिदिन पवित्र कृत्माला नदी के तट पर जाते थे, जहां वे आत्म ज्यान
09:14और विश्व कल्यान हेतु घोर तप करते थे.
09:18भोर के समय जब प्रकृती शांत थी, राजा सत्यवरत अपने दैनिक तरपन कर्म के लिए पवित्र नदी के शीतल जल
09:26में श्रद्धा पूर्वक उत्रे, उनका मन इश्वर के ध्यान में मगन था.
09:31उन्होंने अपनी अंजली में नदी का पवित्र जल भरा और सूर्यदेव को अरपन करने के लिए उपर उठाया, उनका हृदय
09:39ब्रहमांड के प्रती कृतज्यता से उत्प्रोत था.
09:43तभी उनकी अंजली में जल के साथ एक अती लगु अत्यंत चमकीली मचली प्रकट हुई, जो अपने सुक्ष्म रूप में
09:51भी एक असाधारन आभा बिखेर रही थी.
09:55मचली ने एक मानव स्वर में, हे महाराज, मुझ दीन प्राणी की रक्षा करो, मुझे इस विशाल नदी के करूर
10:03जल्चरों से बचाओ, कहकर राजा को चकित कर दिया.
10:08राजा मचली की दैनिय पुकार से द्रवित होकर, उसके जीवन की रक्षा का द्रिड संकल्प लेते हैं, यह समझते हुए
10:16कि हर जीव का सम्मान उनका परम धर्म है.
10:20सावधानी पूर्वक, राजा ने अपनी अंजली से उस लगु मचली को अपने पवित्र कमंडलू में डाल दिया, ताकि वह सुरक्षित
10:28रह सके और उसके जीवन को कोई खत्रा न हो.
10:32कुछ ही पलो में कमंडलू के भीतर वह मचली इतनी बढ़ गई कि उसके लिए वहां रहना असंभव हो गया,
10:40मानो वह किसी अद्रिश्य शक्ती से पोशित हो रही हो.
10:44राजा सत्यवरत ने अपनी आखों पर विश्वास न करते हुए, इस अलौकिक वृध्धी को देखा और मन ही मन विचार
10:52किया कि यह कोई साधारन मचली नहीं, अपितु कोई दिव्यप्राणी है.
10:58राजा ने तुरंट उस बढ़ती हुई मचली को अपने आश्रम के एक बड़े मिट्टी के पात्र में स्थानांतरित किया, यह
11:05सोचकर कि अब उसे परियाप्त स्थान मिल जाएगा.
11:09पर वह मचली भी कुछ ही क्षणों में उस विशाल पात्र में इतनी बढ़ गई कि उसके लिए वह स्थान
11:16भी अपरियाप्त सिद्ध हुआ, जिससे राजा का आश्चर्य बढ़ता ही गया.
11:21अब राजा ने उस अद्भुत मचली को अपने आश्रम के निकट एक गहरे कुए में सावधानी पूर्वक उतारा, यह विश्वास
11:29करते हुए कि यह विशाल स्थान उसकी बढ़ती काया के लिए परियाप्त होगा.
11:35किन्तु कुछ ही क्षणों में कुए का जल भी मचली की विशाल काय बढ़ती काया को समाहित न कर सका,
11:41और वह कुए के मुख से बाहर जाकने लगी एक अध्भुत द्रिश्य प्रस्तुत करती हुई.
11:48राजा ने अब उसे एक विस्तृत सरोवर में ले जाने का निर्णय लिया, जहां कमल के फूल खिले थे, यह
11:55सोचते हुए कि इसकी विशालता अब उस दिव्य प्रानी के लिए परियाप्त होगी.
12:00पर जैसे ही मचली सरोवर में पहुँची, उसने एक बार फिर अपनी काया इतनी विशाल कर ली कि वह पूरा
12:08सरोवर ही उसके लिए छोटा पड़ गया, मानो वह ब्रहमांड को ही निगलने वाली हो.
12:14अब राजा सत्यवरत को पूर्ण विश्वास हो गया कि यह कोई साधारन मचली नहीं, अपितु स्वयन स्रिष्टी के पालक भगवान
12:22विश्णु का ही प्रत्यक्ष अवतार है.
12:26तब उस विराट मच्य ने गरचते हुए कहा, मैं ही परब्रहम विश्णु हूँ, हे धर्मात्मा राजा, और मैंने तुम्हें महाप्रलय
12:34की सूचना देने के लिए यह रूप धारन किया है.
12:38मच्य अवतार ने राजा को आदेश दिया कि उसे अब विशाल सागर में स्थापित किया जाएं, जहां वह अपनी पूर्ण
12:46महिमा में प्रकट होकर ब्रहमांड की रक्षा करेगा.
12:51ततपश्चात राजा सत्यवरत ने भगवान मच्य अवतार के आदेश का पालन करते हुए, उस विशालकाय मच्छी को अपने कमंडल से
12:59निकाल कर अनंत सागर की गहराईयों में विसर्जित किया.
13:03सागर में पहुँचते ही, वह दिव्य मच्य देखते ही देखते एक विशाल परवत के समान बढ़ने लगा, जिसका शरीर स्वर्णसी
13:12आभा से जग्मका रहा था.
13:14राजा सत्यवरत ने विस्मय से देखा कि कैसे वह छोटी मच्छी अब ब्रहमांड को धारन करने वाली विशाल सत्ता में
13:22परिवर्तित हो गई थी.
13:24तब मत्स्य अवतार ने अपनी दिव्यवानी में कहा के राजा सत्यवरत आज से सात्वे दिन यह पूरी स्रिष्टी प्रलै के
13:32विक्राल जल में डूब जाएगी.
13:35उन्होंने राजा को आदेश दिया कि वह सभी प्रकार के बीजों, औश्धियों और साथ महान रिशियों को एकत्र कर एक
13:43विशाल नौका का निर्मान करें.
13:46राजा सत्यवरत ने भगवान के इस अद्भुत रहसियोद घाटन को हृिदय में धारण कर आने वाली भीशन आपदा के लिए
13:54तैयारी आरंभ करने का संकल्प लिया.
13:57धीरे धीरे आकाश में काले, धने बादल चाने लगे और वायुमंदल में एक अजीब सी खामोशी पसर गई, जो आने
14:06वाले महाविनाश का संकेत दे रही थी.
14:09मत्स्य अवतार ने पुनह प्रकट होकर राजा को बताया कि प्रलय के समय एक विशालकाए सर्प उनकी नौका को अपने
14:17सीम से बांधने के लिए आएगा.
14:20राजा सत्यवरत ने ततकाल अपने राज्य के सभी कोनों से साथ महान तपस्वी रिशियों को बुलवाया, जिनकी आत्माय ज्यान और
14:29तपस्या से परिपूर्ण थी.
14:31इसके साथ ही उन्होंने सभी प्रकार के वनस्पती बीज, औश्धिय जड़ी बूटिया और प्रित्वी के सभी जीवों के छोटे-छोटे
14:40जोडे भी एकत्र किये.
14:42दिव्य मार्ग दर्शन में एक विशालकाय और मजबूत लकडी की नौका का निर्मान युद्धस्तर पर प्रारंब हुआ, जिसे हर आपदा
14:51से रक्षा के लिए डिजाइन किया गया था.
14:54ठीक सात्वे दिन आकाश फट पड़ा और मूसलाधार वर्शा ने प्रित्वी को घेर लिया, नदिया उफनने लगी और सागर अपनी
15:03मर्यादा भूल गया.
15:05जैसे ही जलस्तर बढ़ने लगा, नवनिर्मित नौका अपने स्थान से उठकर प्रलय के भीशन जल में तैरने लगी, एक अकेली
15:13आशा की किरन बनकर.
15:16राजा सत्यवरत, सभी रिशी, एकत्रत बीज और जीवों के जोडे सुरक्षित रूप से नौका में प्रवेश कर गए, भविश्य की
15:24पीढियों के संरक्षक बनकर.
15:27पूरी पृत्वी जल मगन हो चुकी थी, केवल उस विशाल नौका के सिवा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था,
15:34जो अकेले ही उस अनन्त जलराशी में डग्मगा रही थी.
15:38ठीक उसीक्षन एक परवत के समान विशाल स्वर्ण मच्य अवतार अपने दिव्यतेज के साथ प्रलै के गर्जनापूर्ण जल से प्रकट
15:47हुए.
15:48मच्य अवतार के सींग पर एक विशालकाय वासुकी नाग प्रकट हुए, जिन्होंने अपने शरीर को रसी की भाती लपेट कर
15:57नौका को मच्य से जोड़ा.
15:59तब भगवान मच्य उस विशाल नौका को लेकर प्रलै के गर्जनापूर्ण सागर में हजारों वर्षों तक विचन करते रहे, सभी
16:08प्राणियों को सुरक्षित रखते हुए.
16:11नौका के भीतर, राजा सत्यवरत और सबतर्शी भगवान के इस असीम अनुग्रह के लिए गहन ध्यान और प्रार्थना में लीन
16:19थे, आशा की किरण को थामे हुए.
16:22इस प्रकार, मत्स्य अवतार ने अंधकार्मय प्रलय के बीच ज्यान और जीवन के बीजों को सुरक्षित रखकर, एक नए युग
16:30की भोर तक ब्रहमान को मार्गदर्शित किया.
16:34प्राचीन काल में एक धर्म प्रायन और न्यायप्रिय राजा सत्यवरत प्रातहकाल की बेला में पवित्र नदी में अपने दैनिक अनुष्ठान
16:42कर रहे थे, उनके हाथ श्रद्धा पूर्वक अंजुली में जुडे थे.
16:47अचानक उनकी अंजुली में एक अती सुक्ष्म, चावल के दाने जितनी चमकती हुई मचली प्रकट हुई, जिसके शल्क स्वर्णिम आभा
16:56बिखेर रहे थे, जिससे राजा आश्चर्यच्कित रह गए.
17:00उस ननही सी मचली ने एक आश्चर्यजनक रूप से स्पष्ट और मधूर स्वर में राजा से नदी के बड़े शिकारियों
17:08से अपनी रक्षा करने की विंती की, जिससे राजा का हृदय करुणा से भर गया.
17:14उसकी दीन प्रार्थना से प्रभावित होकर, दयालू राजा सत्यवरत ने उस अतिचंपदार मचली को धीरे से अपने छोटे से कमंडल
17:22में डाल दिया, ताकि वह सुरक्षित रह सके.
17:26चंद पलों के भी तरही, मचली ने अविश्वसनिय गती से बढ़ना शुरू कर दिया, उसका छोटा शरीर तेजी से फैल
17:34कर पूरे कमंडल को भर गया, जिससे वह उसके लिए बहुत छोटा पढ़ने लगा.
17:40कमंडल की दिवारों से हलका सा टकराते हुए, अब काफी बड़ी हो चुकी मचली ने पुनह राजा से एक अधिक
17:47विशाल स्थान की याचना की, उसकी आखों में एक अजीब सी चमक थी.
17:52उसके चमतकारिक विकास पर चकित होकर, राजा सत्यवरत ने मचली को सावधानी से एक बहुत बड़े मिट्टी के मटके में
18:00स्थानांतरित कर दिया, यहाँ आशा करते हुए कि अब उसे परियाप्त जगह मिल जाएगी.
18:07परंतु कुछ ही क्षणों में, मचली ने उस बड़े मटके को भी पार कर लिया, उसका चमकता हुआ शरीर अब
18:14मिट्टी की दीवारों से सट रहा था और वह और अधिक स्थान की तलाश में थी.
18:20मटके की सीमाय शीघर ही बहुत प्रतिबंधात्मक साबित हुई और बढ़ती हुई मचली, अब एक फुट लंबी ने फिर से
18:28राजा से एक भव्य निवास का अनुरोध किया.
18:32अपने अतिथी के असाधारन स्वरूब को पहचानते हुए, राजा उसे एक गहरे पत्थर से बने कुए के पास ले गए,
18:40जहां उन्होंने उस सुद्रिध मचली को उसकी ठंडी गहराई में छोड़ दिया.
18:46आश्चर्य गहरे विस्मय में बदल गया, जब मचली ने शीघरता से पूरे कुए को भर दिया, उसका विशाल आकार गोलाकार
18:53सीमाओं के भीतर घूम रहा था और आगे विस्तार की मांग कर रहा था.
18:59कुए के भीतर गूंजती एक तातकालिक याचना के साथ, अब हाथी जितनी बड़ी मचली ने हैरान राजा से एक सागर
19:07जैसे विशाल विस्तार की विंती की.
19:10एक दैविय उपस्थिती के प्रती आश्वस्थ होकर, राजा सत्यवरत ने उस राजसी मचली को श्रधा पूर्वक एक विशाल स्वच सरोवर
19:19में ले जाकर छोड़ दिया.
19:22मचली ने तुरंट उस विशाल सरोवर को भर दिया. उसका विशाल शरीर एक किनारे से दूसरे किनारे तक फैला हुआ
19:30था. फिर भी उसका विकास रुकने का नाम नहीं ले रहा था. वह अनंत स्थान की माम कर रही थी.
19:37जल में एक ब्रहमांडिय कमपन हुआ जब उस परवताकार मचली ने अब शलकों और पंखों का एक विशालकाय धेर एक
19:45बार फिर गरजनापूर्ण स्वर में राजा से सबसे बड़े संभव निवास की आचना की.
19:51गहरे विनय और अटूट विश्वास के साथ राजा सत्यवरत ने अकल्पनिय प्रयास से उस विशालकाय मचली को पवित्र घूमती हुई
20:00शक्तिशाली गंगा नदी की धाराओं की ओर निर्देशित किया.
20:05जैसे ही मचली गंगा में प्रवेश करती है, वह एक अकल्पनिय पैमाने तक फैल जाती है, उसका दिव्य रूप नदी
20:13की पूरी चोड़ाई और लंबाई में फैल जाता है, उसका चमकता हुआ शरीर स्वर्गिय प्रकाश से जग्मगा रहा था.
20:21इस विस्मयकारी द्रिश्य से अभिभूत होकर, राजा सत्यवरत घुटनों पर गिर पड़े, उनका हृदय भय और भक्ती दोनों से भरा
20:29हुआ था, क्योंकि मचली के रूप से एक अचूक दिव्यता की आभा निकल रही थी.
20:36एक सुनहरी प्रकाश की चकाचौंध में, उस विशाल मत्स्य ने स्वयं को भगवान विश्नु के रूप में प्रकट किया, जो
20:43तेजस्वी और शांत थे, और उन्होंने राजा सत्यवरत को ब्रहमांडिय ज्यान के साथ संबोधित किया.
20:51भगवान मत्स्य ने तब स्वर्ग में गूंजती हुई आवाज के साथ, विस्मय में डूबे राजा को आने वाले सार्वभामिक प्रलय
20:59और सभी जीवन रूपों तथा ज्यान को संरक्षित करने के पवित्र कर्तव्य के बारे में बताया.
21:06भगवान मत्स्य ने तब राजा सत्यवरत को समझाया कि आने वाला महाप्रलय न केवल शारिरिक जीवन को मिटा देगा, बल्कि
21:14सभी ज्यान, वेद और धर्म को भी निगलने की क्षमता रखता है, इसलिए उन्हें इनका संरक्षन करना होगा.
21:22मत्स्य देव ने आदेश दिया कि राजा एक विशाल और मजबूत नाव का निर्मान करें, जिसमें प्रिथवी पर मौझूद सभी
21:30प्रकार के बीज, औश्धिय जड़ी बूटिया और प्रत्येक प्रजाती के प्राणियों के जोड़े को एकत्र किया जा सके.
21:38उन्होंने राजा को चेतावनी दी की ठीक सात्वे दिन से यह विनाशकारी प्रलय आरंभ होगा, जब आकाश से मूसलाधार वर्शा
21:46होगी और समुद्र उफान पर आकर पूरी प्रिथवी को जल्मगन कर देगा.
21:52मत्स्य भगवान ने वचन दिया कि जब प्रलय अपने चरम पर होगा, तब वह स्वयं एक विशाल स्वर्ण श्रिंगिय मचली
22:00के रूप में प्रकट होंगे, जिससे राजा अपनी नाव को बांध कर सुरक्षित रह सकेंगे.
22:06उन्होंने सत्यवरत को आश्वासन दिया कि न केवल वे स्वयं, बलकि आने वाले साथ महान रिशी, सब्तर्शी भी उनके साथ
22:15नाव में सुरक्षित रहेंगे और उनके दिव्य सनरक्षन में ज्यान की लौ प्रजवलित रहेगी.
22:21इन गंभीर निर्देशों और आश्वासनों के बाद भगवान मत्स्य का दिव्य स्वरूप धीरे-धीरे मंद पड़ने लगा, उनकी सुनहरी आभा
22:30चारों और सिमट्ती हुई प्रतीत हुई, जैसे कोई प्रभात का सूर्यक्षितिज में विलीन हो रहा हो.
22:37एक अंतिम स्वर्गिय प्रकाश के साथ भगवान मत्स्य सत्यवरत की आखों के सामने से पूरी तरह अद्रिश्य हो गए, जिससे
22:46राजा के हरिदय में एक गहराशून्य और साथ ही एक अविचल संकल्प शेश रह गया.
22:52घुटनों पर जुके हुए, राजा सत्यवरत ने धीरे-धीरे स्वयं को संभाला, उनके मस्तिश्क में भगवान के शब्द गुंज रहे
23:00थे, और उन्होंने महसूस किया कि उनका जीवन अब एक ब्रहमांडिय मिशन के लिए समर्पित हो चुका है.
23:09शीघ्रही सत्यवरत अपने शाही महल में लौट आए, उनके चहरे पर एक ऐसी ततकाल नीता और ग्रिड़ता अंकित थी जो
23:17उनके मंत्रियों ने पहले कभी नहीं देखी थी, एक अप्रत्याशित संकट की आहट लेकर.
23:23उन्होंने तुरंट अपने सबसे बुद्धिमान मंत्रियों और कुशल शिल्पकारों को बुलाया. उन्हें आने वाले प्रलै की दिव्यभविश्यवानी और जीवन को
23:33बचाने के लिए एक विशाल नाव के निर्मान की आवशकता के बारे में बताया.
23:38पूरा राज्य अभूत पूर्व गती से जुट गया. कारीगर लकडी इकठा करने लगे. इंजिनेरों ने एक विशालकाय नाव का खाका
23:47तयार किया और लोग सावधानी पूर्वक जीवन के हर रूप के लिए आवशक सामगरी एकत्र करने लगे.
23:55दूर दूर से सब्तर्शी, सात महान रिशी, राजा के संदेश पर प्रतिक्रिया देते हुए, गंभीर मुखमंडल और ज्ञान की आवहा
24:03के साथ इस पवित्र मिशन में शामिल होने के लिए प्रस्थान करने लगे.
24:09राज्य के हर कोने से विभिन प्रकार के पशुओं के जोडे, दुरलब पौधों के बीज और आशधिय जडी बूटिया सावधानी
24:17पूर्वक एकत्र की गई और विशाल नाव स्थल पर लाई गई.
24:22नाव का निर्मान अभूत पूर्व गती से आगे बढ़ रहा था. हर कील और तक्ता मानविये द्रिड संकल्प और दैविये
24:29मार्ग दर्शन का प्रमाण था, एक ऐसा धाचा जो आने वाले महाविनाश का सामना करने के लिए तयार हो रहा
24:36था.
24:38साथ दिन तेजी से बीट गए, आकाश ओमिनसली गहराने लगा, असामान्य हवाय चलने लगी और समुद्र तट पर अजीबो ग्रीब
24:46जवार भाटे आने लगे, जो आसन्न प्रलय का सपष्ट संकेत दे रहे थे.
24:52पहले तो वर्षा की बूदे धीरे-धीरे गिरी, फिर वे मूसलाधार बारिश में बदल गई, जिससे नदिया तेजी से उफनने
25:00लगी और भूमी पर पानी की धार बहने लगी.
25:04समुद्र भयावह रूप से मतने लगा, उसकी लहरेंग पहाडों से भी उची उठने लगी, तटवर्ती भूमी को निगलती हुई आगे
25:12बढ़ती जा रही थी, जिससे सभी ओर हाहाकार मच गया.
25:17जैसे ही जलस्तर अपने चरम पर पहुँचा, राजा सत्यवरत सबतर्शियों और सभी प्राणियों के साथ अपनी विशाल और द्रिढ नाव
25:26पर सवार हो गए, जो अब ब्रहमांडिय जल में एक अंतिम आशा के रूप में तैर रही थी.
25:33नाव भीशन लहरों द्वारा फेंकी जा रही थी, एक ब्रहमांडिय प्रलय के बीच एक छोटा सा पात्र, जब अचानत एक
25:41चमतकारी घटना ने सभी को आश्चर यच्खित कर दिया.
25:45तभी अगाध गहरायों से एक विशाल स्वन श्रिंगिय मचली मत्स्य बाहर निकली, जिसका आकार इतना बड़ा था कि उसने पूरी
25:54प्रित्वी को ढख लिया, अपने दिव्यवादे को पूरा करते हुए.
25:59जैसे ही वह विराट स्वन श्रिंगिय मचली नाव के समी पाई, उसका दिव्य आभामंडल प्रखर होता गया, जो ब्रहमांडिय जल
26:08में भी एक अभूत पूर्व प्रकाश उत्पन कर रहा था.
26:12सहसा, उस मत्स्य के विशालकाय स्वरूप में एक अलौकिक रूपांतरन होने लगा, उसकी निचली देह मचली की भाती ही रही,
26:21किन्तु उपरी भाग से एक तेजस्वी मानविय आकरिती उभरने लगी, जो पूरे क्षितिच को घेर रही थी.
26:28और फिर उनके सम्मुख भगवान विश्नु अपने विराट मत्स्य अवतार में प्रकट हुए, जिनका उपरी धड निल्मनिसा तेजस्वी चार भुजाओं
26:38से सुशोभित था, और निचले भाग में स्वर्णशल्क वाली एक विशाल मचली थी, जिसने पूरे ब्रहमां�
26:44को अपने आभामंडल से भर दिया।
27:14प्रलय के भीशन शोर को भी शांत करती हुई, राजा सत्यवरत और सभी सब्तर्शियों के अंतर्मन में समा गई।
27:23भगवान ने कहा, हे धर्मनिष्ठ राजा सत्यवरत, मैं ही ब्रहमांड का पालक भगवान विश्नु हूँ, और यह प्रलय मेरी ही
27:30इच्छा से घटित हो रही है, जिससे स्रिष्टी का शुद्धिकरण हो सके।
27:36उन्होंने समझाया कि यह महाजल प्रलय अवश्यम भावी है, जो युगों के अंत और एक नए सत्ययुक के आरंभ का
27:43प्रतीक है, और यह स्रिष्टी के नए सर्गिक चक्र का एक महत्वपूर्ण अंग है।
27:50भगवान मत्स्यने राजा को आने वाले भीशन महाजल प्रलय की चेतावनी दी, जिसके जल से समस्थ प्रित्वी और सभी लोक
27:58डूग जाएंगे, और कोई भी प्राणी सुरक्षित नहीं रहेगा, सिवाई उन चुनिंदा लोगों के जिन्हें वह स्वयं बचाएंगे।
28:19भगवान ने उन्हें आदेश दिया कि वे प्रित्वी के सभी प्रकार के बीज, औश्धिया और पशुपक्षियों के जोड़े अपनी नाव
28:28में एकत्रित कर लें, ताकि नए युग में सृष्टी का पुन्ह आरंभ हो सके।
28:33मत्स्य भगवान ने राजा सत्यवरत और उनके साथ मौझूद सभी लोगों को आश्वासन दिया कि वे स्वयं अपनी असीम शक्ती
28:42से उन्हें इस भीशन प्रलै से पार लगाएंगे और उनकी रक्षा करेंगे।
28:47यह सुनकर राजा सत्यवरत का हरिदय कृतग्यता और अगाध भक्ती से भर गया, उन्हें अपने जीवन का परम उद्देश्य समझा
28:56गया और उन्होंने भगवान के चर्णों में अपना मस्तक जुका दिया।
29:02सबतर्शिगन ने भी हाथ जोड़ कर भगवान मस्य की स्तुती की, उनके मुख से पवित्र मंत्रों चार फूट पड़े और
29:09उनके मन को दिव्य ज्यान की निर्मल धारा से प्रकाशित कर दिया गया।
29:14मत्स्य भगवान ने राजा सत्यवरत को अपनी नाव को अपनी विशाल स्वन श्रिंगिय सींग से बांधने का निर्देश दिया, ताकि
29:22वे सुरक्षित रूप से इस महा प्रलय के जल में विचर्ण कर सकें।
29:27राजा सत्यवरत ने तुरंट आग्या का पालन किया और नाव को भगवान मत्स्य के विशाल और दिव्य सींग से मजबूती
29:35से बांध दिया, जो अब प्रलय के जल में उनकी एक मात्र आशा का प्रतीक बन गया था।
29:42जैसे ही नाव बंधी, मत्स्य भगवान ने अपनी असीम शक्ती से उस विशालकाय नाव को अपने साथ खींचना शुरू कर
29:50दिया, जो अब प्रलय के भीशन जल में भी एक अटल और सुरक्षित नौका के रूप में बह रही थी।
29:58मत्स्य भगवान अपनी दिव्य महिमा में राजा सत्यवरत को महा प्रलय के इस अंधकार पूर्ण काल में स्विश्टी के रहसियों,
30:06ज्यान और धर्म के शाश्वत सिध्धान्तों का उपदेश देने लगे।
30:11राजा सत्यवरत ने एक आगरम मन से उस दिव्य ज्यान को आत्म साथ किया, जो वेदों के गूड सिध्धान्तों और
30:18ब्रहमांड के मूल रहसियों से भरा था, जिससे वे वैवस्वत मनु के रूप में पुनरजन्म के लिए तयार हो रहे
30:24थे।
30:25धीरे धीरे मत्स्य भगवान का विराट अत्यधिक तेजस्वी रूप अपने सबसे तीवर चमक को थोड़ा कम करने लगा।
30:55कर रही थी। ज्यान और आशा से भरी वह नौका, दिव्य मत्स्य के अविचल मार्ग गर्शन में अभी भी अपेक्षाकृत
31:04शांत ब्रहमांडिय महासागर की गहराई में एक नए युग के उदे की प्रतीक्षा में अपनी पवित्र यात्रा पर अग्रसर थी।
31:13धीरे धीरे ब्रहमांडिय क्षितिच पर सुदूर चमकती हुई आकाश गंगाओं के बीच एक अजीब सी हलचल और कमपन महसूस होने
31:22लगी जो आने वाले महाप्रलय की पहली सुक्ष्म चेताबनी थी।
31:27ब्रहमांडिय जल के भीतर की धाराय सशक्त होने लगी एक अव्यक्त उर्जा पूरे वातावर्ण में फैल गई जो अस्तित्व की
31:35नीम को हिलाने को आतुर थी।
31:38राजा सत्यवरत अब वैवस्वत मनु के रूप में अपनी गहरी द्रिष्टी से बदलते हुए ब्रहमांड को निहारते रहे उनका मुखमंडल
31:47गहन ज्यान और अटूट विश्वास से आलोकित था।
31:51नौका के शांत कक्ष में सब्तरिशी अपनी गहन समाधी में लीन थे, उनकी उपस्थिती से एक शांत और स्थिर उर्जा
31:59का संचार हो रहा था, जो बाहरी हलचल से अप्रभावित थी।
32:04नौका के एक अन्यभाग में विभिन प्रकार के जीवजन्तों के जोड़े अपनी प्राकृतिक सहज्ता में शांती पूर्वक विश्राम कर रहे
32:13थे, मानो किसी अद्रिश्य आश्वासन से सुरक्षित हो।
32:17बाहर दूरवर्ती ब्रहमांडिय घटनाये और अधिक तीवर होने लगी, चमकते हुए निहारिकाये अब और तेजी से घूमने लगी, जो आने
32:27वाले महाविनाश की स्पष्ट पूर्वसूचना थी।
32:31ब्रहमांडिय महासागर की सतह अब स्पष्ट रूप से हिलोरें ले रही थी, बड़ी ब्ली लहरें उठने लगी थी, जो धीरे
32:39-धीरे विशालकाय आकार लेने को तयार थी।
32:43मत्स्य अवतार अपने विशाल और तेजस्वी रूप में एक अथा शक्ती के साथ नौका को आगे खीच रहे थे, उनकी
32:51दिव्य आखें ब्रहमांड के हर मोर पर केंद्रित थी।
32:55आकाश नाटकिय रूप से गहरा होने लगा, और ब्रहमांडिय बिजली की लकीरें अंधकार को चीरने लगी, जो महाप्रलय के विध्वन्सकारी
33:04आगमन का सपष्ट संकेत था।
33:08विशालकार ब्रहमांडिय लहरें नौका के इर्दगिर्द तक्राने लगी, लेकिन यह दिव्य शक्ती से सुरक्षित होकर चमतकारी धंग से स्थिर बनी
33:17रही।
33:18मनु एक तक बाहर इस प्रल्यंकारी द्रिश्य को देखते रहे, उनका मुखमंदल इस अराजक्ता के बीच भी श्रद्धा और द्रिड
33:26विश्वास से भरा था।
33:29सब्तरिशियों ने धीरे-धीरे अपनी आखें खोली, उनकी शांत और ज्ञानी द्रिश्टी प्रलय के इस विक्राल नरित्य को स्विकार कर
33:37रही थी।
33:38उनके चारों और का संपून ब्रहमांड घूमते हुए, जल और धहते हुए तारों के एक भीशन भवर में परिवर्तित हो
33:46गया, जो स्रिश्टी के अंत की घोशना कर रहा था।
33:50मत्स्य अवतार का दिव्य सींग अब स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था, जो प्रलय के भयंकर प्रवाह में नौका
33:57को सुरक्षा प्रदान करते हुए, विशाल सरपरसी को द्रिडता से पक्रे हुए था।
34:04नौका को भीशन रूप से जटके लग रहे थे और वह पलट रही थी, फिर भी एक दिव्य उर्जा धालने
34:11उसे पूर्ण विनाश से चमतकारी रूप से बचाए रखा था।
34:15दूर एक उजजवल दिव्य लोक में तेजस्वी देवगण इस प्रलय को गंभीरता से देख रहे थे, जो कालचकर के चक्रिय
34:24स्वरूप को जानते थे।
34:26ब्रहमांडिय विग्टन की ध्वनी, तत्वों के टक्राने की गड़गडाहट, शूने में गूंजगुठी, जो सर्वनाश का एक गर्जनापून शोर था।
34:35मनुने हाथ जोड़कर ब्रहमांडिय महासागर में अपने रक्षक, मत्स्य भगवान के प्रती गहरे कृतग्यता के मौन प्रार्थनाय अर्पित की।
34:46जैसे ही पुराना ब्रहमांड एक विशाल, शांत ब्रहमांडिय महासागर में विलीन हो गया, ज्यान और नए जीवन की एक मात्र
34:54आशा के रूप में नौका स्थिर्ता से तैरती हुई एक नए स्रिजन की प्रतीक्षा करने लगी।
35:00अनंत गर्जती तरंगों के बीच अंधकार्मय क्षितिच को चीरते हुए भगवान मत्स्य का एक अलौकिक स्वर्णमी सींग दिव्य प्रकाश फैलाता
35:10हुआ प्रकट हुआ।
35:12राजा सत्यवरत ने विस्मय से भर कर देखा कि प्रलय के उफंते सागर से भगवान मत्स्य का विशालकाए देदी प्यमान
35:20स्वन रूप प्रकट हो रहा है जो संपून ब्रहमांड को ढखने में सक्षम था।
35:26भगवान मत्स्य की दिव्य गूंजती वानी ने राजा सत्यवरत और सब्तरिशियों को निर्देश दिया कि वे नागराज वासुकी के माध्यम
35:34से इस विशाल नौका को उनके सीम से कसकर बांध दें।
35:39नागराज वासुकी ने प्रसनता पूर्वक अपने विशाल सरपरूप का विस्तार किया, जिनकी मरक्मनी जैसी चमक्ती त्वचा और बहुमूल्य मनियों से
35:49जड़ाफन नौका के अग्रभाग पर एक अटूट रसी के रूप में लपट गया।
35:53राजा सत्यवरत और मुनियों ने नागराज वासुकी के दिव्य शरीर का उप्योग करके उस महाकाय नौका को भगवान मत्स्य के
36:03तेजस्वी सीम से सुद्रिडता से बांध दिया।
36:06बंधन पूर्ण होते ही भगवान मत्स्य उस विशाल नौका को प्रलै के भयानक महासागर में सहच्ता से खीचते हुए अंधकार
36:15की अगाध गहराईयों को पार करने लगे।
36:18जैसे जैसे नौका उफंती लहरों पर आगे बढ़ती गई, सब्तरिशियों ने अपने करबध हाथों से वेद मंत्रों का गुंच्टा हुआ
36:26पाठ करके संपूर्ण जलराशी को पवित्र उर्जा से भर दिया।
36:31जल्मग्न होते लोकों के बीच, राजा सत्यवरत ने भगवान मत्स्य के सम्मुख अत्यंत नमरता पूरवक जुक कर उनसे आत्मज्यान और
36:40परम ब्रहमज्यान प्रदान करने की आचना की।
36:44भगवान मत्स्य ने अपने श्रीमुख से अमरवानी में मत्स्य पुरान के गूढ रहसियों का ज्ञान प्रकट किया, जिससे प्रलै के
36:52अंधकार में दिव्य चेतना का प्रकाश फैल गया
36:55इस परम ज्ञान का श्रवन करते हुए राजा सत्यवरत का हृदय अलौकिक आनन से भर गया और उन्हें जीवन मृत्यू
37:03तथा समय के चक्र का परम सत्य प्राप्थ हुआ
37:07दूसरी और महा प्रलै के अगाध जल के नीचे हयगरीव नामक भयंकर असुर ब्रहमाजी से चुराए गए पवित्र वेदों को
37:15अपने हाथों में दबाए घमंड से छिपा हुआ था
37:19हयगरीव की उपस्थिती को भापकर भगवान मत्य तीवर्ता से अगाध जल की गहराईयों में उत्रे जिससे प्रलै का सागर अलौकिक
37:28तरंगों से सिहर उठा
37:31पाताल महासागर के अंधकार में भगवान मत्य का सामना उस दानवी गदाधारी हयगरीव से हुआ जो क्रोध से अपनी आखें
37:39लाल किये खड़ा था
37:41जल के भीतर एक भीशन युद्ध छिड़ गया जहां भगवान मत्य के तेज और हयगरीव की तामसिक शक्ती के टकराव
37:49से महासागर में महाविस्पोट होने लगे
37:53अंत्य भगवान मत्य ने हयगरीव का सहार कर दिया और उसके चंगुल से ब्रहमा जी के चारों पवित्र वेदों को
38:00पुनह सुरक्षित प्राप्त कर लिया
38:03वेदों की रक्षा करके भगवान मत्स्य पुनह सतह पर आये, जहां नौका अंधकारमई लहरों पर अब भी सुरक्षित रीती से
38:11तैर रही थी
38:13मत्स्य रूपी प्रभु ने वेदों का परम ज्यान पुनह स्थापित करते हुए नवस्रिष्टी के लिए ज्यान के दिव्यबीज को अक्षोन
38:21बना दिया
38:22धीरे धीरे प्रलाई की प्रचेंड तरंगे शांत होने लगी और महासागर का जल एक दरपन की भांती स्थिर तथा निर्मल
38:30हो गया
38:32भगवान मत्स्य ने राजा सत्यवरत को आशिरवाद दिया कि अब से वे वैवस्वत मनु कहलाएंगे और आगामी मनवंतर में मानव
38:40सभ्यता के जनक होंगे
38:43जैसे ही भगवान मत्स्य का रूप दिव्य जोती में विलीन हुआ, शांत महासागर के उपर नव्युक का स्वर्णिन सूर्य उदित
38:51हुआ, जो एक नई स्रिष्टी के शुभारंध की घोशना कर रहा था
38:56नए युग के स्वर्णिन सूर्य की किर्णों में राजा सत्यवरत शांत खड़े होकर उस नौका से अनन्त महासागर की ओर
39:03देख रहे थे, जहां स्रिष्टी के पुनरनिर्मान की सुग्बुगाहट शुरू हो चुकी थी
39:09परंतु इस शांत वातावर्ण के भीतर, समुद्र की गहरी खाईयों में एक भयानक अंधकार पनप रहा था, जहां हयगरीव नामक
39:18क्रूर असुर चुराए गए वेदों को छिपाए बैठा था
39:22जब ब्रह्मा जी की निद्रा के दौरान स्रिष्टी अचेत थी, तब इस दुष्ट दैत्य ने वेदों के पवित्र ज्यान को
39:29चुरा कर ब्रह्मांड को अज्यानता के घोर अंधकार में धकेलने का प्रयास किया था
39:35वेदों के अफ़रन से उत्पन्य इस संकट को टालने के लिए भगवान विश्णु पुनह अपने विराट मत्स्य रूप में महासागर
39:43की अगाध गहराईयों में उत्रे
39:46जैसे ही भगवान मत्स्य पाताल की ओर बढ़े उनके शरीर से उत्सर्जित दिव्य प्रकाश ने समुद्र के सबसे घने अंधकार
39:54को भी चीर कर आलोकित कर दिया
39:57गहरे जल में छिपे असुर हयगरीव को जैसे ही दिव्य शक्ती का आभास हुआ
40:02वह क्रोध से दहार उठा और उसकी आखों से विनाशकारी लाल अगने की लप्टे निकलने लगी
40:10महासागर की गहराईयों में भगवान मत्स्य और हयगरीव का आमना सामना हुआ
40:15जहां एक और दैविय शांती थी और दूसरी और असुर का विनाशकारी अहंकार
40:21क्रोधित होकर हयगरीव ने अपनी विशाल गदा से भगवान मत्स्य पर वार किया
40:27जिससे जल के भीतर भयानक गरजना हुई और तीवर लहरें उठने लगी
40:33भगवान मत्स्य ने बड़ी सहचता से उस प्रहार को अपनी स्वर्ण गदा से रोक दिया
40:38जिससे निकले प्रकाश ने पूरे समुद्र को कमपित कर दिया
40:43इसके बाद भगवान मत्स्य ने अपने उपरी हाथ में घूमते हुए सुदर्शन चक्र को आदेश दिया
40:49जो सूर्य के समान प्रचंड तेश के साथ जल में तैरने लगा
40:55हयग्रीव ने अपनी आसुरी माया का उप्योग कर काले बादलों और विशैले जल की एक धाल बनाई
41:01किन्तु सुदर्शन चक्र के दिव्य तेश के सामने उसकी माया तुरंत छिन्नभिन हो गई
41:07एक अंतिम और निर्नायक प्रहार में सुदर्शन चक्र ने असुर हयग्रीव के घमंड को चूर-चूर कर उसका सहार कर
41:15दिया
41:16जिससे समुद्र की सारी बुरी उर्जा नश्ट हो गई
41:20हयग्रीव के अंत के साथ ही उसके द्वारा छिपाए गए पवित्र वेद दिव्य प्रकाश पुंच के रूप में बाहर निकलाए
41:27और समुद्र के भीतर तैरने लगे
41:31भगवान मत्स्य ने आदर पूर्वक उन चारों वेदों को अपने हाथों में सुरक्षित रख लिया जिससे ब्रहमांड का परम ज्यान
41:38पुन्ह अक्षोन और सुरक्षित हो गया
41:42वेदों को प्राप्त कर भगवान मत्स्य तीवर्ता से समुद्र की सतह की ओर बढ़े उनके पीछे जलका मार्ग दिव्यस वर्णिम
41:49प्रकाश से चमक उठा था
41:52समुद्र की शांत सतह पर प्रकट होकर भगवान मत्स्य ने ब्रहम लोक से पधारे भगवान ब्रहमा को वेदों का वह
42:00पावन ज्यान पुनह सौंप दिया
42:03भगवान ब्रहमा ने अत्यंत प्रसन्नता के साथ उन वेदों को स्विकार किया जिससे आने वाले कल्प में नई स्रिष्टी की
42:10रचना का आधार सुनिश्चित हो गया
42:13अपनी नौका से इस अलौकिक द्रिष्य को देखते हुए राजा सत्यवरत ने दोनों देवों को नमन किया और उनका मन
42:21परमशांती तथा संतोश से भर गया
42:24भगवान मत्स्य ने सत्यवरत को आशिरवाद देते हुए कहा कि वे नए युग के निर्माता बनकर संसार को धर्म और
42:32सदाचार का मार्ग दिखाएंगे
42:35अंतह भगवान मत्स्य का वह दिव्य रूप अनंत आकाश की जोतियों में विलीन हो गया और वेदों की शक्ती से
42:42सराबोर नव्यूग की उजवल किरने संपूर्ण प्रित्वी पर फैल गई

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