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भागवत पुराण के 40वें अध्याय में देखिए भगवान वामन और दैत्यराज बलि की अद्भुत गाथा। जब शुक्राचार्य की चेतावनी के बाद भी राजा बलि ने तीन पग भूमि देने का अपना वचन नहीं तोड़ा, तब वामन देव ने त्रिविक्रम रूप धारण कर दो पगों में पूरे ब्रह्मांड को नाप लिया। तीसरे पग के लिए राजा बलि ने अपना मस्तक अर्पित कर दिया। देखिए कैसे भगवान विष्णु ने बलि के परम समर्पण से प्रसन्न होकर उन्हें सुतल लोक का राज्य दिया और स्वयं उनके द्वारपाल बने! #BhagavataPurana #VamanaAvatar #KingBali #Trivikrama #HinduMythology
Transcript
00:00यग्यशाला की दिव्यवेदी पर जब बाल ब्रहमचारी वामन देव पधारे तब उनकी आलोकित आभा देखकर राजा बली और समस्त उपस्थित
00:09रिशिमुनी विस्मय से भर उठे
00:11असुरों के परम ज्यानी गुरु शुक्राचार्य ने अपने तपोबल से इस नन्हे बालक के भीतर छिपे संपून ब्रहमांड के स्वामी
00:19को तत्क्षन पहचान लिया
00:22गुरु शुक्राचार्य अत्यंत चिंतित होकर राजा बली के समीग पहुँचे और उन्हें इस बालक को दान देने की प्रक्रिया को
00:30रोकने का संकेत किया
00:32बली को यग्यवेदी से थोड़े फासले पर ले जाकर शुक्राचार्य ने अत्यंत गंभीर और दबी हुई आवाज में एक महान
00:41रहस्य उजागर करना शुरू किया
00:44शुक्राचार्य ने सचेट करते हुए कहा कि यह साधारन ब्राह्मन बालक कोई और नहीं बलकि स्वयन जगतपालत भगवान विश्णु हैं
00:53जो देवताओं का कार्य सिद्ध करने आये हैं
00:57उन्होंने राजा बली को चेतावनी दी कि यह बालक छल से तुम्हारा सब कुछ छीन कर देवराज इंद्र को पुनह
01:04स्वर्ग का वैभव लोटाने आया है
01:08गुरु ने समझाया कि जैसे ही तुम इसे तीन पग भूमी दान करने का वचन दोगे तुम्हारा विशाल सामराज यक्षन
01:15भर में नश्ट हो जाएगा
01:18अपने गुरु के इन वचनों को सुनकर राजा बली एक शन के लिए गहरे धर्मसंकट और विचार में डूब गए
01:36बली ने अत्यंत विनमरता पूर्वक अपने गुरु से कहा कि उनके द्वार पर आया हुआ कोई भी याचक कभी खाली
01:43हाथ नहीं लोट सकता विशेशकर स्वय भगवान
01:47बली ने द्रिड़ता से कहा कि यह पृत्वी भी एक मिथ्याचारी का भार सहन नहीं कर सकती और वचन भंग
01:55करना सबसे बड़ा पाप है
01:58उन्होंने तर्प दिया कि यदि स्वयन स्रिष्टी के रचिता श्री हरी मेरे द्वार पर याचक बन कर आये हैं तो
02:05मेरा सर्वस्व उनके चर्णों में अर्पित होना ही परम सौभाग्य है
02:10अपने शिष्य के इस हट को देख कर शुक्राचार्य का क्रोध भड़क उठा और उनकी आखें अंदारे की तरह लाल
02:17हो गई
02:19क्रोधित गुरु शुक्राचार्य ने अपना हाथ हवा में उठाया और राजा बली को श्रीहीन होकर अपना संपूर्ण सामराज जखोने का
02:27भयंकर श्राप दे दिया
02:29इस भयानक श्राप को सुनकर भी राजा बली तनिक भी विचलित नहीं हुए और उन्होंने गुरु देव के चरणों में
02:37शीश
02:38नवाकर अपनी प्रतिग्या पर डटे रहने का संकल्प लिया
02:43महारानी विंध्यावली भी अपने पती के इस धर्म प्रायन निर्नय पर अत्यंत गर्व महसूस करते हुए उनके पार्शु में आकर
02:51खड़ी हो गई
02:53संकल्प को पूरा करने के लिए राजा बली पुनह यग्यवेदी की ओर बढ़े और दान का जल छोड़ने के लिए
03:00सुवर्ण का कमंडल अपने हाथों में उठा लिया
03:03परंतु शुक्राचार्य ने दान को रोकने का एक अंतिम प्रयास किया और वे सुख्षम रूप धारन कर कमंडल की टोंटी
03:11के भीतर जाकर बैठ गए
03:14कमंडल से जल न गिरते देख बाल रूप भगवान वामन मंद मंद मुस्तुराएं और उन्होंने राजा बली को टोंटी को
03:21साफ करने के लिए कुशा घास का एक तिन का थमा दिया
03:26जैसे ही बली ने कुशा घास को टोंटी में डाला शुक्राचार्य की एक आख फूट गई और वे बाहर निकलाए
03:33जिसके तुरंट बाद दान का जल गिरकर संकल्प पूरा हो गया
03:38कुशा के प्रहार से फूटी आख लिए, शुक्राचार्य पीडा और प्रतिशोध की अगनी में जलते हुए कमंडल से बाहर निकले
03:47क्रोध से कापते शुक्राचार्य ने राजा बली की दानशीलता को अविवेक पूर्ण और अपने कुल के लिए घातक बताते हुए
03:55तीवर भर्थसना की
03:57परंतु दानवीर बली ने गुरु के क्रोध को शान्त भाव से ग्रहन करते हुए अपनी प्रतिग्या और वामन के प्रतीश
04:05रधा पर अटल रहने का निर्णय सुनाया
04:08गुरु शुक्राचार्य ने अपने भक्त की हटधर्मिता से आहत और क्रोधित होकर अपनी दिव्य शक्ती से राजा बली को शाप
04:16देने का अटल संकल्क लिया
04:19उस शाप के भीशन बोलोने घोशनाकी की दान के इस अविवेक पूर्ण कार्य के कारण बली अपनी सारी राजसी महीमा
04:27एश्वर्य और सत्ता शीघ्रही खो बैठेंगे
04:31अपने गुरु के शाप को भी धर्म का एक हिस्सा मानते हुए राजा बली ने द्रिडता पूर्वक उसे स्विकार किया
04:38अपने वचन और दान के प्रती अपनी अटूट निष्ठा बनाये रखी
04:42इस नाटकी अक्षन के दौरान बाल रूप भगवान वामन ने एक रहस्य मय और शांत मुस्कान के साथ इस पूरे
04:51आदान प्रदान को देखा
04:53उनकी आँखें दिव्य ज्यान से चमक रही थी
04:57जैसे ही दान का जल प्रित्वी पर गिरा वामन का ननहा शरीर ब्रहमांडिय उर्जा से उतप्रोथ होकर धीरे धीरे आकाश
05:05की ओर बढ़ने लगा और उनके चारों और एक दिव्य प्रभा मंडराने लगी
05:11पलक जपकते ही वह ननहा वामन विराठ त्रिविक्रम के रूप में परिवर्तित होने लगे उनका शरीर परवत्सा विशाल और उनका
05:20तेज सूर्य सा प्रखर होता जा रहा था
05:23उनका चरण इतना विशाल हो गया कि उसने पूरी प्रिथवी को एक पग में समा लिया पहाड और नदिया उनके
05:31चरणों के नीचे बिंदु मात्र प्रतीत होने लगी
05:35वामन का पहला पग धर्ती पर पड़ते ही धूमंदल काम्प उठा और राजा बली सहित सभी दर्बारी इस अप्रत्याशित ब्रहमांडिय
05:43रूप को देख कर स्थब्ध रह गए
05:46उनका विराट शरीर अब प्रित्वी से उपर उठकर ब्रहमांड के हर आयाम को पार करता हुआ
05:52स्वर्ग और पाताल के भी परेविस्तारित होता चला गया
05:57दूसरा पग उठाते ही उन्होंने समस्त स्वर्ग लोक और देवताओं के निवास स्थानों को एक ही जटके में माप लिया
06:04जिससे ब्रहमांड का संतुलंक्षन भर के लिए डग्मगा गया
06:09ब्रहम लोक में बैठे चार मुखवाले भग्वान ब्रहमा अपने दिव्यलोक से इस अध्भुत द्रिश्य को देखते हुए देवताओं के साथ
06:17विस्मय से भर गए
06:20संपून ब्रहमांड त्रिविक्रम के इस विराट रूप से थर्रा उठा तारे और ग्रह उनके अंगों के सामने रेत के कणों
06:27से भी छोटे दिखाई देने लगे
06:30अब एक ननहा बिंदु मात्र रह गए राजा बली अपनी मुकुट की ओर देखते हुए वामन के विराट अनन्त रूप
06:38को विस्मय और श्रग्धा से निहार रहे थे
06:41तब ब्रहमांड को भेटती हुई त्रिविक्रम के विशाल मुक से एक गंभीर गर्जनापूर्ण ध्वनी निकली जिसने राजा बली से तीसरे
06:50पक के लिए स्थान की मांग की
06:53अपने वचन की गंभीरता और अपनी लगुता का बोध होते ही बली ने ततकाल अपने अभिमान को त्याग दिया और
07:01वामन के चरणों में अपना मस्तक जुका दिया
07:05महादानवीर बली ने अपने वचन की लाज रखते हुए अपने मस्तक को वामन के तीसरे पक के लिए सहर्श अर्पित
07:12कर दिया, जो की उनके सर्वोच त्याग का प्रतीक था
07:17वामन ने अपना तीसरा पवित्र पक राजा बली के जुके हुए मस्तक पर रखा, जिससे न केवल उनका दान पूर्ण
07:25हुआ, बलकि बली को भी परम्मोक्ष की प्राप्ती हुई
07:29तीसरा पग बली के शीश पर रखते ही, त्रिविक्रम का विराट रूप ब्रहमांड में अटल, अचल और सर्वव्यापी होकर अपनी
07:37पराकाश्ठा पर स्थिर हो गया, जिसकी महिमा तीनों लोकों से परे थी
07:42उस अद्भुत क्षन को देखकर, देवता, दानव, रिशी और संपूर्ण चराचर जगत, त्रिविक्रम की अलोकिक शक्ती और भव्यता के सम्मुख
07:52विस्मय, भय और असीम श्रद्धा से नत्मस्तक हो गए
07:56कमल पर आसीन, स्रिष्टी के रच्चिता भगवान ब्रह्मा ने अपने चारों मुखों से भगवान विश्णु के इस विराट रूप की
08:04स्तुती में वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया, उनके हृदय में परम भक्ती उमड रही थी
08:11कैलाश परवत के शिखरों से भगवान शिव और आदिशक्ती पारवती ने भी त्रिविक्रम के इस अद्वितिय प्रदर्शन को देखा, उनके
08:19नेत्रों में गेहन सम्मान और आत्मिक संतोष जलक रहा था
08:24देवराज इंद्र सहित समस्त देवताओं ने अपने सिनहासन छोड़कर स्वर्ण पुष्पो की वर्षा करते हुए भगवान त्रिविक्रम के चर्णों में
08:33भाव विभोर होकर स्तुतिया अर्पित की
08:37महर्शी कश्यप जैसे परम ज्यानी रिशियों ने अपने शांत आश्रमों से त्रिविक्रम के इस दिव्य प्राकट्य को देख कर गहरे
08:45समाधी में लीन होकर पवित्र वैदिक मंत्रों का उद्गोश किया
08:50उसी क्शन भगवान त्रिविक्रम के पंचजन्य शंक की दिव्य ध्वनी ब्रहमांड के कोने कोने में गूंज उठी जो अंधकार और
08:58अज्यान को भेद कर सत्य और धर्म की विजय का उद्गोश कर रही थी
09:03आकाश गंगाओं के बीच से दिव्य पुश्पों की वर्षा होने लगी प्रत्येक पंखुडी से पवित्र सुगंध निकल रही थी जो
09:12इस ब्रहमांडिय घटना की पवित्रता और शुभता का प्रतीक थी
09:17वामन के तीसरे पक के स्पर्ष से राजा बली का शरीर दिव्य प्रकाश से आलोकित हो उठा उनका आत्मा शुद्ध
09:24होकर परम्मोक्ष की ओर अग्रसर होने लगा
09:28करुणा से भरे त्रिविक्रम ने राजा बली को संबोधित किया उन्हें आश्वस्थ किया कि उनका त्याग व्यर्थ नहीं जाएगा और
09:37उन्हें पाताल में सर्वोच्च सम्मान के साथ निवास मिलेगा
09:42तत्पश्चात भगवान की इच्छा से पाताल लोक के अंतरगत सूतल लोक के भव्यद्वार प्रकट हुए जो हीरों और रत्नों से
09:50जग्मगाते हुए बली के नए राज्यका स्वागत कर रहे थे
09:55परमानन से परिपून राजा बली ने अपने सभी बंधनों से मुक्त होकर भगवान त्रिविक्रम के आशिरवाद से उस दिव्य सूतल
10:03लोक में प्रवेश किया जहां स्वयं विश्णू उनके द्वारपाल के रूप में रहेंगे
10:09बली के सूतल लोक में प्रस्थान के साथ ही देवराज इंद्र का स्वर्ग लोक पर अधिकार पुनह स्थापित हो गया
10:17उनके मुख पर विजय और कृतग्यता का तेज चमक उठा
10:21समस्थ देवता अपने अपने स्वर्गिय धामों में लोट आये स्वर्ग की आभा फिर से अपनी पूर्ण महिमा के साथ प्रजवलित
10:29हो उठी जैसे कभी हुई ही न थी
10:33ब्रहमांड में व्यवस्था और संतुलन फिर से स्थापित हो गया
10:37प्रत्येक ग्रह अपनी कक्षा में प्रत्येक तारा अपने पत पर दिव्य विधान का पालन करता हुआ
10:43शांत भाव से गतिमान था
10:46अपने उद्देश्य की पूर्ती के पश्चात भगवान त्रिविक्रम का विराठ ब्रहमांड व्यापी रूप धीरे-धीरे संकुचित होने लगा
10:54मानो एक विशालकाय नक्षत्र अपने मूल स्रोत में समा रहा हो
10:59और अंतः वह विराठ रूप अपनी पूरी महिमा के साथ पुनह अपने लगो बाल ब्रहमन वामन के सौमय और मनमोहक
11:08स्वरूप में समा गया
11:10वामन ने अपनी मधुर मुस्कान बिखेरी जो उनकी परम विजय और ब्रहमांड में स्थापित हुई शान्ती का प्रतीक थी
11:17उनकी आखों में असीन करुणा झलक रही थी
11:22माता अदिती और महर्शी कश्यप ने अपने पुत्रों की खोई हुई महिमा को पुनह प्राप्त करते देखा
11:28उनके हृदय कृतग्यता और अवर्णनिय आनन से भर उठे यह भगवान की लीला का अद्भुत फल था
11:35इस प्रकार भगवान विश्णू ने अपने वामन अवतार में धर्म की स्थापना कर ब्रहमांडिय संतुलन को पुनर स्थापित किया
11:44और यह दिव्य नाटक एक अध्भुत संदेश के साथ समाप्त हुआ
11:49जैसे ही राजा बली ने अपना संकल्प जल छोड़ा
11:53बटुक वामन का लगु रूप एकाएक परिवर्तित होने लगा और वे अनंत ब्रहमांडिय उर्जा के साथ विस्तार लेने लगे
12:01देखते ही देखते वह छोटा सा बालरूप आकाश की सीमाओं को लांध कर संपूर्ण दिशाओं, नक्षत्रों और बादलों को अपने
12:10भीतर समेटते हुए त्रिविक्रम स्वरूप में प्रकट हुआ
12:15भगवान त्रिविक्रम के इस परम विराट स्वरूप के चर्णों में प्रित्वी स्थित थी, उनकी नाभी में आकाश गंगाए घूर्णन कर
12:22रही थी और उनके मस्तक पर सत्यलोक सुशोभित था
12:27राजा बली उस अत्यंत भैभीत करने वाले फिर भी अलौकिक रूप को देखकर अपनी सुध बुद्खो बैठे और हाथ जोड
12:35कर इस अनन्त लीला का साक्षात दर्शन करने लगे
12:39दानव सेनाप्ती और असुर योध्धा इस अवर्णनिय ब्रहमांडिय रूप को देखकर भै से कामपने लगे और अपनी गदाये तथा शस्त्रधर्ती
12:48पर गिरा दिये
12:50भगवान त्रिविक्रम ने अपना पहला विशाल चरण उठाया और एक ही पल में संपून प्रित्वी लोक तथा समस्थ अधोलोकों को
12:58पूरी तरह माप लिया
13:01जब प्रभु का प्रथमपद धरातल पर पड़ा तब पाताल लोक से लेकर अतल, वितल और सुतल तक संपून असुर सामराज्य
13:09उनके अधीन हो गया
13:11कुलगुरु शुक्राचार्य ने अपने तपोबल से समझ लिया कि यह कोई साधारन बालत नहीं, बलकि स्वयंपरम पुरुष श्री हरी विश्नु
13:20है, जिन्होंने संपूर्ण व्यवस्था को पुनह स्थापित किया है
13:26ततपश्चात प्रभुत्रिविक्रम ने अपने दूसरे विशाल चरण को उठाया जो बादलों, वायुमंडल और नक्षत्र मंडलों को चीर्ता हुआ उर्ध्व लोकों
13:35की ओर बढ़ा
13:37वह दूसरा पद भुवरलोक, स्वरलोक, महरलोक और जनलोक को एक ही क्षण में लांगते हुए सत्यलोक की सीमा तक पहुँच
13:45गया
13:46स्वर्ग से यह दृष्य देखकर देवराज, इंद्रक और अन्य देवता हरियाली और आनंद के अश्रूओं के साथ प्रभु के इस
13:54चरण का गुनगान करने लगे
13:57जब भगवान का द्वितिय चरण ब्रहमलोक अर्थात सत्यलोक की बाहरी सीमा तक पहुँचा, तो संपून ब्रहमांड का आवन उस चरण
14:05के प्रभाव से थर्थरा उठा
14:09सत्यलोक में विराजमान स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रहमा ने जब श्री हरी के उस परम पवित्र चरण का आगमन देखा,
14:16तो वे अत्यंत हर्षित हुए
14:19भगवान ब्रहमा ने शीघ्र ही अपने दिव्य कमंडलू से पवित्र जल निकाल कर प्रभु के चरंटमल का प्रक्षालन और पूजन
14:27किया
14:28ब्रहमा द्वारा धोये गए उस चरंटमल से प्रवाहित जल की पवित्र धारा ही आकाश गंगा मंदाकिनी बनकर ब्रहमांड में प्रवाहित
14:37होने लगी
14:38इस प्रकार केवल दो ही पगो में सर्वव्यापी प्रभु ने समस्त प्रित्वी, अधोलोक, अंतरिक्ष और सत्यलोक तक के संपून ब्रहमांड
14:47को नाप लिया
14:49ब्रहमांड में अब कोई भी स्थान शेश नहीं बचा था, जहां तीसरा पग रखा जा सके, और पूरी स्रिष्टी में
14:56एक क्षण के लिए मौन छा गया
14:59भगवान त्रिविक्रम की मेग गर्जना जैसी गंभीर वानी गूंजी है डैत्यराज बली
15:05दो पगों में संपून ब्रहमांड ना पा जा चुका है, अब बताओं मैं अपना तीसरा पद कहा रखू
15:12यह सुनकर दानव सेना में हडकम्प मच गया क्योंकि उनके राजा के पास अब देने के लिए इस संसार में
15:19कुछ भी भौतिक धन या भूमी शेश नहीं बची थी
15:24परन्तु राजा बली के चहरे पर कोई भय नहीं था, उन्होंने अत्यंत शांत भाव से विचार किया कि वे अपने
15:31दिये गए वचन को पूरा करने के लिए स्वयन को अर्पित करेंगे
15:36राजा बली ने अपने पूर्वजों और अपने गुरु शुक्राचार्य के उपदेशों को स्मरण करते हुए यह निश्चित किया कि अब
15:44वे अपने वचन को पूरा करने के लिए अपना मस्तक ही भगवान को अर्पित कर देंगे
15:49भक्त वत्सल भगवान त्रिविक्रम ने राजा बली के अदमय संकल्प और दानवीर्ता को देखकर मंदमंद मुस्कुराते हुए अपने तीसरे पक
15:59को उपर उठाना आरंभ किया
16:02जैसे ही भगवान ने अपने तीसरे पक को उपर उठाया वह एक विशाल ब्रहमांडिय स्तंभ के समान आकाश में तीवर
16:10गती से फैलता चला गया जिसके हर रोम में असंख्य लोग समाए हुए थे
16:16वह पवित्र चरन पाताल लोक के तल से होता हुआ पृत्वी के नीचे के सभी सात लोकों अतल, वितल, सुतल,
16:23तलातल, महातल, प्रसातल और पाताल को भेदता हुआ उपर उठ गया
16:29तत्पश्चात वह चरण प्रिथवी, अंतरिक्ष और स्वर्ग के बीच स्थित भूलोक, भुवरलोक, स्वरलोक, महरलोक, जनरलोक, तपोलक और सत्यलोक जैसे सभी
16:39उच्च लोकों की ओर बढ़ता चला गया
16:43भगवान के बढ़ते हुए चरण के दिव्यस पर्ष से संपून ब्रहमांड में एक पवित्र उर्जा का संचार हुआ, जिससे सभी
16:51स्वर्ग लोक और उनके वासी भक्ती भाव से उतप्रोथ हो गए
16:56देवराज इंडर सहित सभी देवतागन, महर्शी, सिद्ध और चारण भगवान के इस विराट रूप को देखकर विस्मय और आनन्द से
17:04भर गए, उनके मुख से केवल जय होके उद्गोश निकल रहे थे
17:09अंतर वह विराट चरण ब्रहमांड के आवर्ण को भेदता हुआ, साथ महाभूतों से बने अंडे के खोल को तोड़ कर
17:17अनावरित आकाश में पहुँच गया, जहां केवल शुद्ध चेतना का वास्था
17:23उस दिव्यपक की अंगुलिया ब्रहमांड के सर्वोच लोक, सत्यलोक में प्रवेश कर गई, जहां भगवान ब्रहमा अपने कमल सिनहासन पर
17:31विराज मान थे और स्रिष्टी के रहस्यों पर मनन कर रहे थे
17:36भगवान ब्रहमा ने अपने ध्यान से उठकर जैसे ही उस अलौकिक चरण को देखा, उनके चारों मुख पर विस्मय और
17:44परम भक्ती का भाव चा गया
17:47उन्होंने तुरंत पहचान लिया कि यह साक्षात भगवान विश्नु का ही विराट रूप है, जो बली के यग्य को पूर्ण
17:54करने के लिए वामन के रूप में अवत्रित हुए थे
17:58परम्पिता ब्रह्मा ने अपने कमल सिनहासन से उठकर श्रद्धा पूर्वक अपने पवित्र कमंडलु को उठाया, जो दिव्य जल से भरा
18:06हुआ था
18:08उन्होंने अपने कमंडलु को ब्रहमांड के उस पार्स्थित कारण सागर कार्णूद कशाई विश्नु का जल से और भी अधिक पवित्र
18:16जल से परिपूर्ण किया
18:19अक्यंत विनमर्ता और भक्ती भाव से उतप्रोथ होकर, ब्रहमा धीरे धीरे उस विराट चरण के दिव्य अंगुष्ट की ओर बढ़े,
18:27उनके मन में केवल परमेश्वर की सेवा का भाव था
18:31उन्होंने अपने कमंडलू से उस पवित्र जल को सावधानी पूर्वक भगवान के विशाल अंगुठे पर डाला, जिससे चरण का हर
18:39रोम रोम पावन हो उठा
18:42भगवान के चरण स्पर्ष से वह जल ततकाल और भी अधिक दिव्य हो गया, और एक छोटी सी धारा के
18:49रूप में ब्रहमा के कमंडलू के पास एकत्र होने लगा
18:53वह एकत्र जल धीरे धीरे एक अध्भुत, स्वच्छ और नीले रंग की दिव्यधारा में परिवर्तित होने लगा, जो स्वर्ग गंगा
19:01मंदाकिनी के प्राकट्य का संकेत था
19:05नवप्रक्तित मंदाकिनी, जिसे बाद में गंगा के नाम से जाना गया, धीरे धीरे सत्यलोक के दिव्यवातावर्ण में प्रवाहित होने लगी,
19:14हर कण को अपनी पवित्रता से सिंचित करती हुई
19:18वह दिव्यधारा फिर महरलोक, जनरलोक और तपोलक से होते हुए नीचे के लोकों की ओर उतरने लगी, अपने साथ परम
19:26शुद्धी और शान्ती का संदेश लेकर
19:29इस प्रकार भगवान के चर्णोदक से उत्पन हुई वह पुन्यसलिला, तीनों लोकों को पवित्र करती हुई, अन्तह प्रित्वी की ओर
19:38अपनी भव्ययात्रा आरंभ करने लगी
19:41भगवान वामन का विराट रूप, जिन्होंने अपने दो ही पगों से समस्त ब्रहमांड को माप लिया था, अब भी आकाश
19:49गंगाओं और नक्षत्रों को अपने में समेटे हुए, अनन्त अंतरिक्ष में प्रचंड उर्जा के साथ उत्दीप्थ हो रहा था
19:57धीरे धीरे वह विराट रूप थोड़ा संकुचित होने लगा, किन्तु उसकी दिव्य आभा और असीमित शक्ती ब्रहमांड के हरकण में
20:05अब भी स्पंदित हो रही थी, जिसने सभी उपस्थित देवों और असुरों को भय और विस्मय से भर दिया
20:13तब एक गहरी गूंजती हुई वानी, जो स्वयम ब्रहमांड का घोश प्रतीत होती थी, वामन के मुख से निकली और
20:20उसने राजा बली से अपने तीसरे पक के लिए स्थान की मांग की
20:26राजा बली अपनी द्रिड प्रतिग्या और दानवीर्ता के लिए विख्यात उस असीमित शक्ती के सामने भी अविचल खड़े थे, उनका
20:34मुख मंडल एक शांत और विस्मय पूर्ण स्विकार्यता से प्रकाशित था
20:40अपने राजा को पराजित और विवश्ट देख, दैत्य सेना में क्रोध और प्रतिशोध की आग भड़क उठी, उनकी गर्जना से
20:48सारा वातावर्ण काप उठा
20:51राजा बली के प्रमुख सेनाप्तियों ने अपनी विशाल सेना को भगवान वामन पर आक्रमन करने का आदेश दिया, जिनकी भुजाओं
20:59में देवताओं का अहंकार और असुरों का रोश एक साथ समाहित था
21:04हजारों दैत्य योध्धा अपने क्रूर अस्त्रशस्त्रों से लैस, अपनी जाती के अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए भगवान वामन की
21:13और एक भयावह गर्जना के साथ दौड़ पड़े
21:17वामन अपने दिव्य रूप में शांत और अडिक खड़े थे, उनके मुख पर एक अलौकिक मुस्कान थी, जैसे वे इस
21:25शनभंगुर क्रोध से अप्रभावित हों, और उनके चारों और अचानक दिव्य प्रकाश पुंच प्रकट होने लगे
21:32पलक जपकते ही, भगवान विश्णों के तेजस्वी पारशद और भयानक गरुड वामन के चारों और प्रकट हुए दैतियों के उस
21:40उग्र आक्रमन का सामना करने के लिए ततपर
21:44देवता गणों ने अपनी दिव्य शक्तियों से दैतियों के प्रहारों को आसानी से विफल करना शुरू कर दिया, उनकी तलवारों
21:52से निकले बिजली के जटके और गदाओं की प्रचंद शक्ती ने असुरों को पीछे धकेल दिया
21:59गरुर्द अपनी प्रचंद शक्ती और तीवर गती से दैतिय सेना के बीच ऐसे विचर्ण कर रहे थे जैसे एक तूफान
22:06पत्तियों को बिखेरता है, उनके तीखे पंख और शक्तिशाली चोँच हर वार को निश्प्रभावी कर रहे थे
22:14दैतिय अपनी समस्थ शक्ती के बावजूद देवताओं की संगठित और दिव्य शक्ती के सामने टिक न सके और एक के
22:22बाद एक धराशाई होने लगे
22:25अनेकों असुरों के अस्त्रशस्त्र तूट गए, उनकी गर्जना शांत पढ़ गई और उनका आक्रमन बिखर कर एक निराशापूर्ण पलायन में
22:34बदल गया
22:35जब दैत्य सेना पीछे हटने लगी, तब गरुर वामन की मौन आग्या को समझते हुए, राजा बली की ओर बढ़े,
22:43जो अभी भी अविचल खड़े थे
22:46गरुर ने विनमरता पूर्वक किंतु द्रिड़ता से राजा बली को वरुण के दिव्य पाशों से बांध दिया, जिससे बली के
22:54शरीर पर कोई कष्ट नहीं हुआ, परंतु वे विवश हो गए
22:59वरुण पाशों से बंधे होने पर भी राजा बली का मुख मंडल शांत और अविचलित रहा, मानों उन्होंने अपनी पराजय
23:06को भी एक इश्वरिय विधान के रूप में स्विकार कर लिया हो
23:10तब भगवान वामन अपने शांत और सौमे रूप में किन्तु असीमित ब्रह्मांडिय शक्ती की आभासे युक्त राजा बली के समक्ष
23:19खड़े हुए
23:21वामन ने अपनी दिव्य मुस्कान के साथ बली की ओर देखा और उनकी वानी में ब्रह्मांड की शांती और द्रिड़ता
23:29एक साथ समाहित थी
23:32तीनों लोकों को अपने दो पगों से नापने के बाद वामन ने राजा बली से पूछा हे दानवीर मेरा तीसरा
23:39पक कहा रखा जाए जबकि तीनों लोक मेरे चरणों में समाहित हो चुके हैं
23:45राजा बली अपनी द्रिड़ता और त्याग के प्रतीक के रूप में वामन के इस प्रश्ण का उत्तर देने के लिए
23:52अपने मस्तक को नीचा करने के लिए तत्पर हुए अपनी अंतिम भेंट अर्पित करने को तैयार
23:59अपनी प्रतिग्या के अटल सम्मान में राजा बली ने वामन के सामने अपना मस्तक जुका दिया यह जानते हुए कि
24:07ब्रह्मांड के स्वामी के समक्ष अपना सर्वस्व समर्पित करना ही परमधर्म है
24:13यह देख असुर गुरु शुक्राचार्य जिनका चहरा चिंता और क्रोध से तम्तमा रहा था ने बली को समझाने का अंतिम
24:21प्रयास किया कि वह इस अध्वितिय दान के परिणाम पर विचार करें
24:27किन्तु राजा बली अपनी अटल निष्ठा के साथ अपने गुरु की चिंता को शांत करते हुए बोले धर्म का मार्धी
24:34परमसत्य है और मैं अपने वचन से कभी विमुख नहीं हो सकता
24:40रानी विंध्यावली जो अपनी द्रिड़ता और पतिवर्ता धर्म के लिए विख्यात थी अपने पती के इस महादान के साक्षी के
24:48रूप में एक शांत मुस्कान के साथ खड़ी थी उनकी आखों में गर्व और भक्ती झलक रही थी
24:55फिर्क ब्रहमांड को स्टब्ध कर देने वालेक्षन में राजा बली ने वामन से निवेदन किया कि वे अपना तीसरा पग
25:03उनके मस्तक पर रखें जिससे उनके जीवन का सर्वोच उद्देशिपूर्ण हो सके
25:09जब वामन ने अपना तीसरा दिव्यपग राजा बली के मस्तक पर रखा, तो समस्त ब्रहमांड में एक पवित्र कमपन हुआ,
25:17जो परम्त्याग और इश्वर भक्ती के अध्भुत मिलन का उद्धोश कर रहा था
25:23इस अध्वितिय आत्मनिवेदन से स्वर्ग लोक में पुष्प वर्षा होने लगी, पृत्वी थर्रा उठी और पाताल लोक में भी एक
25:31नई दिव्य उर्जा का संचार हुआ
25:34जैसे ही वामन का तीसरा पग उनके मस्तक पर पड़ा, राजा बली अपनी प्रतिग्या और समर्पन के शिथर पर सहर्ष
25:42पाताल लोक की ओर प्रस्थान करने लगे
25:45इस अध्वितिय आत्मनिवेदन के पश्चात वामन का दिव्य रूप और अधिक प्रकाश्मान हो गया, उनकी छोटी काया में ब्रहमांडिय शक्ती
25:55का आभास पश्ट रूप से जलकने लगा
25:58इस महात्याग से अभिभूत होकर ब्रहमा और देवों के अधिपती इंद्र सहित सभी प्रमुख देवतागन अपनी पत्नियों सहित उस दिव्य
26:07स्थान पर प्रकट हुए
26:10भगवान ब्रहमा ने बली के आत्मनिवेदन की प्रशंसा करते हुए कहा कि ऐसा परम्त्याग जिसने अपनी भक्ती से स्वय भगवान
26:18को भी वश्मे कर लिया, तीनों लोकों में अध्वितिय है
26:23उसी क्षण पाताल लोक के गहरे अंधकार में, राजा बली के समक्ष भगवान विश्नु अपने पूर्न चतुर्भुजी दिव्य रूप में
26:31प्रकट हुए, जिससे वह स्थान दिव्य प्रकाश से आलोकित हो उठा
26:37भगवान विश्नु ने बली को आश्वस्त किया, कि वे सदैव उनके द्वारपाल बनकर उनकी रक्षा करेंगे और उन्हें सुतल लोक
26:45का अधिपती बनाएंगे
26:47अपने आराध्य को साक्षात देख और उनका वचन सुनकर, राजा बली की आखों से भक्ती के अश्रुबह निकले और उन्होंने
26:56कृतग्यता पूर्वक भगवान के चर्णों में अपना शीष जुका दिया
27:01भगवान विश्णू ने बली के इस महात्याग और अध्वितिय भक्ती से प्रसन्न होकर उन्हें समस्थ असुरों में सर्वश्रिष्ट स्थान प्रदान
27:09किया, जो त्रिलोक में उनकी कीर्टी को अमर कर गया
27:14इस अध्भुत घटना के साक्षी नारद मुनी अपनी वीना के मधूर स्वरों के साथ ब्रहमांड में बली के त्याग और
27:21भगवान विश्णू की क्रिपा का गुनगान करने लगे
27:25स्वर्गलोक में माता अधिती और महर्शी कश्चप ने अपने पुत्र वामन के विराट कार्य को देख संतुष्टी और गर्व से
27:33भर कर भगवान विश्णू का स्मरण किया
27:37अधिती जिन्होंने अपने पुत्रों के लिए इतना कठिन तब किया था अब अपने पुत्र विश्णू के दिव्य अवतार से संतुष्ट
27:45होकर ब्रहमांड की माता के रूप में अपनी भूमिका पूर्ण होते देख रही थी
27:51देवताओं ने बली के त्याग और वामन के इस अध्भुत कार्य का जश्ण मनाते हुए स्वर्गलोक में पुनह अपने सिन्हासन
27:58ग्रहन किये और धर्म की विजय का उद्गोश किया
28:02और इस प्रकार राजा बली का आत्मनिवेदन एक महाकाव्य बन गया जो युगो-युगो तक भक्ती, त्याग और परम विश्वास
28:11की असाधारन गाथा के रूप में ब्रहमांड में गूंचता रहेगा
28:16जैसे ही बली नागपाश में बंधे शांत भाव से खड़े थे, तभी आकाश मंडल से परम भागवत प्रहलाद का अलौकिक
28:24आगमन हुआ
28:26अपनी श्वेत दाढ़ी, शांत दिव्या आभा और अश्रुपूरित नेत्रों के साथ भक्त शिरोमनी प्रहलाद ने यग्यभूमी में प्रवेश किया
28:35अपने पौत्र बली की निश्काम भक्ती को देखकर प्रहलाद गदगद हो गए और उन्होंने भगवान विश्नु के चर्णों में प्रणाम
28:43किया
28:45प्रहलाद ने गदगद कंट से भगवान की स्तुती करते हुए कहा कि परमेश्वर द्वारा संपत्ती छीन लेना दंड नहीं, अपितु
28:53जीव पर अनुठा अनुग्रह है
28:56प्रहलाद ने स्पष्ट किया कि जब प्रभु किसी पर कृपा करते हैं, तो वे उसके धन और अहंकार को हरकर
29:03उसे शुद्ध भक्ती का दान देते हैं
29:07प्रहलाद ने राजा बली की ओर गर्व से देखा, जिसने सर्वस्व खोकर भी अपने सत्य और धर्म के संकल्प को
29:14तूटने नहीं दिया था
29:17प्रहलाद की निष्ठापून वानी सुनकर भगवान विश्णू के मुख पर मंद मुस्कान तिराई और उनका रूप और भी करुणामय हो
29:25उठा
29:27भगवान विश्णू ने देवों और मुनियों की सभा को संबोधित करते हुए कहा कि वे अपने परम भक्तों को मोह
29:34और अहंकार के जाल से सर्वदा मुक्त करते हैं
29:39श्रीहरी ने बली की अडिक सत्यवादिता की प्रशंसा की जिसने गुरु के शाप और सामराज्य विनाश के भय के बाद
29:46भी धर्म का त्याग नहीं किया
29:49अपनी अपार अनुकमपा से प्रेरित होकर भगवान विश्णू ने जैसे ही अपनी द्रिष्टी बली पर डाली वैसे ही बली के
29:57नागपाश स्वतही भस्म होकर गिर पड़े
30:01बंधनों से मुक्थ होते ही राजा बली अश्रुपूर्ण नेत्रों से भगवान के चरण कमलों में गिर पड़े और आनंद के
30:08महासागर में निमगन हो गए
30:11भगवान विश्णू ने बली को आशिर्वाद देते हुए उन्हें सुतल नामक दिव्य लोक का आधिपत्य प्रदान किया जो स्वर्ख से
30:19भी अधिक वैभवशाली और निश्कंटक था
30:22प्रभु ने बली को आश्वस्त किया कि सुतल लोक में उन्हें किसी प्रकार का भय, मानसिक संताप या पराजय स्पर्ष
30:30भी नहीं कर सकेगी
30:33सर्वेश्वर विश्णु ने अपनी महाकृपा प्रकट करते हुए घोशनाकी की वे स्वया हाथ में गदाधारन कर सुतल लोक के द्वारपाल
30:41बनकर बली की रक्षा करेंगे
30:44अपने कुल पर भगवान की ऐसी अहैतु की अनुकमपा देखकर परम भागवत प्रहलाद पुनह नत्मस्तक होकर प्रभु की महिमा का
30:52गान करने लगे
30:54श्रीहरी ने प्रहलाद को आग्यादी की वे अपने पौत्र बली के साथ सुतल लोक जाएं और वहाँ धर्म तथा भक्ती
31:02का निरंतर मार्क दर्शन करें
31:05आकाश से ब्रहमा, शिव और समस्त देवताओं ने राजा बली और प्रहलाद के उपर दिव्य पारिजात पुष्पों की घंगोर वर्शा
31:13की
31:14राजा बली और प्रहलाद ने अश्रुपूरित नेत्रों से भगवान विश्णू की अंतिम परिक्रमा की और उनके चर्णों में साष्टां दंडवत
31:23प्रणाम किया
31:25संपूर्ण ब्रह्मांड में भक्ती और समर्पन के जैगोश के बीच राजा बली और प्रहलाद सुतल लोक की ओर प्रस्थान कर
31:33गए
31:34भगवान विश्णू ने अपने भव्य स्वरूप में स्थेर होकर संसार को यह संदेश दिया कि निश्काम प्रेम और पूल्न आक्म
31:42स्मर्पन ही इश्वर प्राप्ती का एक मात्र साधन है
31:47ब्रहमांड को सत्यकापत दिखा कर भगवान विश्णू का विराट रूप धीरे धीरे अपने असीन विस्तार को समेटने लगा
31:55मानो सूर्य अपनी प्रचंड किर्णों को वापस ग्रहन कर रहा हो
32:00देवगण और रिशिमुनी इस दिव्य लीला के साक्षी बन विस्मय से भरे नेत्रों से भगवान के अलोकिक तिरोभाव को निहारते
32:08रहे
32:09अब वामन रूप त्याग कर भगवान श्रीहरी अपने चतुर भुजी स्वरूप में बली को दिये वचन की पूर्ती हेतु पाताल
32:18लोक की ओर अग्रसर हुए
32:20इस बीच राजा बली और परमभक्त प्रहलाद अथा भक्ती से भरे हृदय के साथ दिव्य रत पर आरूढ होकर सुतल
32:28लोक के भव्य प्रवेश द्वार पर पहुँचे
32:32सुतल लोक की अलोकिक छटा और अतुलनिय समरिध्धी देखकर बली का मन विस्मय और आनंद से भर उठा जो स्वर्ग
32:40से भी अधिक रमनिय और सुरक्षित था
32:43अपने वचन को समरण कर भगवान श्रीहरी ने अब द्वारपाल का सौमय और ग्रिड स्वरूप धारण किया हाथों में केवल
32:51अपनी प्रिय गदा धारण किये
32:54धीर गंभीर पगों से चलते हुए तीनों लोकों के स्वामी अब बली के सुतल सामराज्य के द्वार की ओर बढ़े
33:02अपने भक्त की रक्षा के लिए तत्पर
33:05अपने हृदय में एक अप्रत्याशित स्पन्दन का अनुभव करते हुए राजा बली को तत्काल आभास हुआ कि उनके आराध्य प्रभु
33:13द्वार पर आचुके हैं
33:17भावविभोर होकर राजा बली तुरंत प्रहलाद के साथ महल से द्वार की ओर दौड पड़े उनके आगमन की पुष्टी करने
33:24के लिए अधी
33:26द्वार पर पहुँचते ही बली ने देखा कि स्वय भगवान विश्णु अपने द्वारपाल स्वरूप में हाथों में गदालिये उनके वचन
33:35को निभाते हुए स्थिर खड़े हैं
33:38इस अध्वुत द्रिश्य को देख बली का हृदय कृतग्यता और प्रेम से उमड पड़ा उनके नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी
33:46यह विश्वास ही नहीं हो रहा था
33:49अपने आराध्य के सम्मुख राजा बली ने साश्टान दंडवत प्रणाम किया अपने अहंकार का पूर्ण त्याग कर पूर्ण तह समर्पित
33:58होते हुए
34:00परमभक्त प्रहलाद ने भी अपने दादा के पीछे जुक कर इस अद्वितिय प्रेम और त्याग के साक्षी बने और हरी
34:07के चर्णों में श्रधा अर्पित की
34:10भगवान विश्णु ने अपनी मधुर मुस्कान के साथ बली को उठाया और स्नेह पूर्वक उनके वचन को दोहराया, मैं सदा
34:18तुम्हारे द्वार पर ही रहूंगा
34:21तक पष्चात तीनों लोकों के पालक भगवान हरी, सुतल लोक के मुख्य द्वार पर अपनी गदाथा में एक अचल और
34:29शाश्वत द्वारपाल के रूप में स्थापित हो गए
34:33भगवान के द्वारपाल बनने से सुतल लोग की महीमा और सुरक्षा अकलपनिय रूप से बढ़ गई जो अब देवों के
34:40स्वर्ग से भी अधिक पवित्र और अभेद्य था
34:44दूर से देवगण, गंधर्व और अन्य दिव्य प्राणी इस अध्वितिय द्रिश को देख रहे थे जहां परमिश्वर स्वय अपने भक्त
34:53के द्वारपाल बन गए थे
34:55अपने हाथों में कौमोद की गदाथा में भगवान विश्णु शाश्वत काल के लिए सुतल के द्वार पर अटल खड़े रहे
35:03अपने भक्तों के लिए सर्वोट चरक्षक
35:06अपने प्रभु को द्वारपाल के रूप में पाकर राजा बली और प्रहलाद अत्यंत शान्ती और संतुष्टी के साथ अपने महल
35:14में लोट आए
35:16इस प्रकार निशकाम भक्ती और पूर्ण आत्मस्मर्पन की पराकाश्था प्रदर्शित हुई जहां भगवान स्वय अपने परम भक्त के सेवक बन
35:25गए एक अमर कथा बन कर
35:28ब्रहमांड की हर दिशा में असुर्राज बली के पाताल में स्थापित होने और भगवान के द्वारपाल बनने से एक दिव्य
35:36शान्ती चागई जैसे अनंत काल का ठहरा
35:40स्वर्ग लोक में अदिती के पुत्र देवगन धीरे धीरे अपनी चेतना में वापस आ रहे थे जैसे गहरी नीन से
35:48जागकर अपने खोए हुए सामराज्य की शान्ती महसूस कर रहे हूँ
35:53देवराज इंद्र जिनका तेज अब तक मंद पढ़ गया था उनकी आखों में आशा की एक नई किरन जग्मगा उठी
36:01अपने सिनहासन की ओर बढ़ते हुए
36:04तीनों लोकों में भ्रमन करते हुए देवताओं ने अब स्वर्ग की ओर अपना मार्ग प्रशस्त किया उनकी आत्माय विजय और
36:12पुनरस्थापना के आनंद से परिपूर्ण थी
36:16जैसे ही देवताओं ने स्वर्ण जडित स्वर्ग के द्वार से प्रवेश किया, स्वर्ग की अध्भुत वास्तुकला और शांत वातावर्ण ने
36:24उनके दिलों को भर दिया
36:26देवों की माता अधिती, जिन्होंने अपने पुत्रों के लिए इतना कश्ट सहा था, अब उन्हें सुरक्षित और विजी देखकर उनकी
36:35आखों से खुशी के अश्रुबह निकले
36:38ब्रहमा और शिव सहित सभी प्रमुख देवता, वामन लीला के इस अध्भुत क्षण के साक्षी बनने के लिए स्वर्ग में
36:46उपस्थित थे
36:47इंद्र ने कृतग्यता से भरे हृदय और विन्मर्ता से जुके सिर के साथ वामन भगवान के प्रती अपनी गहरी श्रद्धा
36:55और कृतग्यता व्यक्त की, जिन्होंने उनका राज्य लोटाया था
37:11स्वर्ग की पुनस्थापना के साथ ब्रहमांड का संतुलन पुनस्थापित हुआ और तीनों लोग दिव्य शान्ती और व्यवस्था के स्वर्णिन युग
37:20में प्रवेश कर गए
37:22देवगणों ने अपनी जीत का उत्सव मनाया, स्वर्ग के उपवन दिव्य संगीत और नृत्य से गूंध उठे, जहां अपसराय और
37:30गंधर्व अपने कला का प्रदर्शन कर रहे थे
37:34समस्थ देवगणों, रिशियों और सेलेस्टियल बीइन्स ने एकत्रित होकर वामन रूप में भगवान विश्णू की असीम शक्ती और करुणा के
37:43प्रती कृतग्यता के भाव से स्थुती की
37:46इस दिव्यल लीला के समापन के बाद महामुनी श्री शुकदेव गोस्वामी ने राजा परीक्षित को वामन अवतार के गहन आध्यात्मिक
37:55महत्व का वर्णन करना आरंभ किया
37:58राजा परीक्षित ने अत्यंत एकागरता और भक्तिभाव से अपने गुरु के मुख से नेहसरित होने वाले इन शाश्वत सत्यों को
38:07ग्रहन किया
38:08शुकदेव गोस्वामी ने बताया कि वामन लीला केवल इंद्र के राज्य की पुनरस्थापना नहीं थी
38:14बलकि यह अहंकार के परित्याग और परमाक्मा के प्रती पूर्ण समर्पन का प्रतीक थी
38:21उन्होंने समझाया कि कैसे भगवान वामन ने अपने छोटे रूप के माध्यम से महान राजा बली को भी विनमर्ता का
38:29सर्वोच पाठ सिखाया भले ही वे दानवीर थे
38:34शुकदेव गोस्वामी ने बल दिया कि भगवान को सब कुछ अर्पित कर देना यहां तक की अपना सर्वस्व भी ही
38:41वास्तविक भक्ती का मार्ग है
38:44राजा बली का उदाहरन देते हुए उन्होंने बताया कि कैसे निस्वार्थ भाव से किया गयादान और पूर्ण आत्मस्मर्पन व्यक्ती को
38:53अमर महिमा प्रदान करता है
38:56इस प्रकार शुकदेव गोस्वामी ने वामन अवतार की लीला के माध्यम से मनुष्य को विनमर्ता, त्याग और इश्वर के प्रती
39:04अटूट विश्वास का शाश्वत संदेश दिया
39:07यह लीला हमें सिखाती है कि भौतिक समरिधीक शनभंगुर है, जबकि इश्वर के चर्णों में पूर्ण समर्पन ही सर्वोच और
39:17स्थाई आध्यात्मिक धन है
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