नारकासुर के वध के बाद, द्वारका में खुशियों का आगमन होता है, जब भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के प्रथम पुत्र प्रद्युम्न का जन्म होता है! पर यह खुशी ज्यादा देर नहीं टिकती। राक्षस शंबरा, जिसने पहले कामदेव को भस्म किया था, भविष्य के इस खतरे को भांप कर नवजात प्रद्युम्न का अपहरण कर लेता है। शिशु को सागर में फेंक दिया जाता है, जहाँ एक विशाल मछली उसे निगल लेती है। यह मछली शंबरा के रसोई में पहुँचती है और यहीं से शुरू होती है एक अद्भुत कहानी, जहाँ रति (कामदेव की पत्नी), मायावती के रूप में प्रद्युम्न का पालन-पोषण करती है और उसे माया विद्याओं में निपुण बनाती है। शंबरा का अंत और प्रद्युम्न की द्वारका वापसी की यह दिव्य गाथा! #BhagavataPurana #KrishnaLeela #Pradyumna #Rukmini #Dwarka #Mythology #HinduPuranas #श्रीमद्भागवतम् #कृष्णलीला
Category
🦄
CreativityTranscript
00:00द्वारका नगरी नारका सुर्पर विजय और 16,100 राजकुमारियों के उद्धार के बाद एक अवर्णनिय आनंद और उत्सव के सागर
00:09में डूबी हुई थी।
00:11भगवान श्री कृष्ण अपने विशाल महल के एक एकांत कक्ष में अपनी पत्नियों के बीच व्याप्त प्रेम और द्वारका की
00:19शांती पर दिव्य मुस्कान बिखेरते हुए ध्यानस्थ थे।
00:23उन्ही के प्रमुख रानियों में से एक देवी रुकमिनी अपनी कोख में एक दिव्य तेज को धारन किये हुए थी।
00:30जिनका सौंदर्य चंद्रमा की शितलता और सूर्य की चमक से भी परे था।
00:36द्वारका के हर घर में आने वाले दिव्य शिशु के आगमन की प्रतीक्षा में एक अध्भुत उत्साह और प्रार्थनाओं का
00:44मधुर गुंजन सुनाई दे रहा था।
00:47आकाश में शुभ नक्षत्रों का उदे हुआ। प्रित्वी पर पूलों की वर्षा होने लगी और मंदमंद सुगंधित वायू चलने लगी
00:55जो एक महान आत्मा के आगमन का संकेत दे रही थी।
01:00प्रसव पीडा की घड़ी आई और रुकमिनी के कक्ष से दिव्य प्रकाश के साथ साथ अत्यंत मधुर किन्तु तीवर वेदना
01:07की आवाजे गुंजने लगी।
01:10एक दिव्यक्षन में उस कक्ष में अंधकार दूर हो गया और एक शिशु का जन्म हुआ जिसकी आभार इतनी तेजस्वी
01:18थी मानो साक्षात सूर्यदेव धरा पर अवतरित हुए हो।
01:22पुत्र रत्न के जन्म की सूचना पाकर भगवान श्रीकृषन तीवर गती से कक्ष में पहुँचे और अपने हाथों में उस
01:30अलोकिक शिशु को लेकर असीम आनन्द से भर उठे।
01:35रुकमिनी ने अपने पुत्र को देखा जिसकी सुन्दर्ता कामदेव के समान थी और मातरित्व के अगाथ प्रेम से उसकी आखों
01:43में अश्रु भर आये उसने तुरंट शिशु को अपनी गोद में ले लिया।
01:48जैसे ही प्रद्युम्न के जन्म का समाचार द्वारका में फैला, संपूर्ण नगरी में शंकनाद, व्रिदंग की थाप और खुशियों की
01:56किलकारियों से उत्सव का एक नया दौर शुरू हो गया।
02:00एक भव्य समारोह में, रिशियों और विद्वानों की उपस्थिती में भगवान श्री कृष्ण ने अपने तेजस्वी पुत्र का नाम प्रद्युम्न
02:09रखा, जिसका अर्थ है सर्वोच प्रें।
02:12समय के साथ प्रद्युम्न की सुंदर्ता दिनों दिन बढ़ती गई, वह साक्षात कामदेव के समान मोहक और तेजस्वी प्रतीत होते
02:21थे, जिनकी मुस्कान में ब्रहमांड को मोहित करने की शक्ती थी।
02:25उसी समय तीनों लोकों में विचर्ण करने वाले देवर्शी नारद अपनी वीना बजाते हुए द्वार का पधारे, जिनके आगमन से
02:34राजमहल में एक दिव्य उर्जा का संचार हुआ।
02:38नारद मुनी ने श्रीकृष्ण और रुकमिनी को बताया कि प्रद्युम्न कोई साधारन बालक नहीं, बलकि कामदेव का पुनरजन्म हैं, जिनहें
02:47पूर्वकाल में भगवान शिव के क्रोध ने भस्म कर दिया था।
02:52नारद ने यह भी चेतावनी दी की शंबरासुर नामक एक मायावी राक्षस जो कामदेव का चिर्शत्रु था, इस शिशु के
03:00जीवन के लिए एक बड़ा खत्रा बन सकता है।
03:04भगवान श्री कृष्ण अपनी दिव्यद्रिष्टी से सब कुछ जानते हुए भी संसार की लिलाओं को पूर्ण होने देने के लिए
03:12धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा कर रहे थे, ताकि धर्म की पुनरस्थाप ना हो सके।
03:17इस बीच ननहा प्रद्युम्न अपने महल के जूलते पालने में निश्चिन्थ होकर सो रहा था। उसकी मनमोहक छवी हर किसी
03:25के मन को मोह रही थी।
03:28किन्तु दूर मायावी शंबरासुर के गुप्तचर कृष्ण के पुत्र के जन्म की खबर सुनकर द्वारका की चकाचौंध पर पैनी द्रिष्टी
03:36जमाए हुए थे।
03:38एक अंधेरी रात में जब द्वारका गहरी निद्रा में थी, शंबरासुर का एक भयानक दूट चुपके से महल में घुसा
03:46और सोते हुए शिशु प्रद्युम्न का अफरन कर लिया।
03:50अगली सुबह जब रुकमिनी ने अपने पुत्र को पालने में न पाया, तो उनकी आखों से अशुरुधारा फूट पड़ी और
03:58पूरे महल में विलाप की एक दर्दनाक चीख गुँझ उठी।
04:03रुकमिनी की चीख एक भयानक लहर की तरह द्वारका के शांत महलों में गुँझ उठी और हर आत्मा को भय
04:10तथा शोक से भर दिया।
04:13द्वारका के हर कोने में श्रीकृष्ण ने इस हृदय विदारक पुकार को अपनी योगमाया से अनुभव किया और तुरंट अपनी
04:21प्रिया की ओर बढ़े।
04:23रुकमिनी को अपने अश्रुभरे नेत्रों से देखा, तो भगवान श्रीकृष्ण का हृदय भी अपने अध्भुत शिशु के अफरन की आशंका
04:31से विचलित हो उठा।
04:34हालांकि अपनी दिव्य अंतरद्रिष्टी से श्रीकृष्ण ने तुरंथ ही इस घटना के पीछे की मायावी शक्ती को पहचान लिया, किन्तु
04:42उन्होंने अपनी प्रिया के सामने धैर्य बनाये रखा।
04:46उन्होंने रुकमिनी को अपने करुणापूर्ण हाथों से उठाया और उन्हें दिलासा देते हुए कहा कि उनका पुत्र सुरक्षित है और
04:55अवश्य वापस आएगा।
04:58समस्त द्वारका में कृष्ण के निर्देश पर वीर सैनिकों और गुप्तचरों की टोलिया शिशु प्रद्युम्न की खोज में निकल पड़ी,
05:06हर गली, हर महल, हर मंदिर को चानते हुए।
05:10परंतु पृत्वी पर कोई निशान नहीं मिला और आकाश में भी कोई सुराग नहीं था, जिससे द्वारका के लोग गेहन
05:17निराशा में डूब गए।
05:19उधर समुद्र की गहरायों में अपने मायावी महल में राक्षस शंबरासुर अपने भयानक सिनहासन पर बैठा, प्रद्युम्न के अभरन की
05:29सफलता पर क्रूरता से मुस्कुरा रहा था।
05:32उसके मन में भविश्य वक्ताओं के वो शब्द गूंज रहे थे कि कृष्ण का आठवा पुत्र ही उसके विनाश का
05:39कारण बनेगा।
05:41इस भविश्य को टालने के लिए शंबरा ने उस मासूम शिशु को ततकाल नश्ट करने का क्रूर संकल्प किया।
05:49अपनी भयानक शक्तियों से शंबरा ने प्रद्यूम्न को अपने मायावी महल से उठा कर उसे समुद्र की गहराई में ले
05:57जाने का निश्चय किया।
06:00वह एक उच्च चटान पर खड़ा था, जिसके नीचे अथा सागर गरज रहा था, उसकी आखें एक भयावा संकल्प से
06:08चमक रही थी।
06:09एक बरफीली क्रूरता के साथ उसने सोय हुए शिशु प्रद्यूम्न को गहरे तूफानी समुद्र में फेंक दिया, मानो वह कोई
06:18तुछ वस्तु हो।
06:20ननहा शिशु प्रद्यूम्न अपनी नेती से अंजान विशालकाय लहरों के बीच एक छोटे से फूल की तरहे डग्म का रहा
06:27था।
06:29तभी एक विशालकाय मचली अपने भयानक मुख को खोले हुए, सीधे उस असहाय बालक की ओर बढ़ी।
06:37और फिर एक ही जटके में वह दैत्याकार मचली शिशु प्रद्यूम्न को निगल गई, मानो वह समुद्र का एक और
06:45रहस्यमय निवाला हो।
06:47कुछ समय बाद उसी क्षेत्र में मचुवारों का एक समोह अपनी पारंपरिक नावों में सवार होकर समुद्र में विशाल जाल
06:55फेंक रहा था।
06:57अचानक उनके जालों में एक असाधारन भार महसूस हुआ, जिसे खीचने के लिए उन्हें अपनी सारी शक्ती लगानी पड़ी।
07:06घोर परिश्रम के बाद मचुवारे उस विशालकाय मचली को शंबरासुर के महल के रसोई घर में ले गए, जिसे वे
07:14महाराजा का प्रसाद मान रहे थे।
07:17उसी रसोई में शंबरा सुर की प्रमुख रसोईया और पत्नी मायावती उस विशाल मचली को काटने की तयारी कर रही
07:25थी जब एक दिव्य आभा मचली के अंदर से चमक उठी
07:30आभा देखकर मायावती का हरिदय एक अलौकिक भय और विस्मय से भर उठा उसकी छुरी हवा में ही थम गई
07:39उस रहस्यमई चमक ने उसे मचली को और करीब से देखने पर विवश किया एक अंजानी शक्ती उसे अपनी ओर
07:47खीच रही थी
07:49धीरे धीरे और सावधानी से मायावती ने उस विशालकाय मचली का पेट चीरा जैसे कोई बहुमूल्य रहस्य उजागर कर रही
07:57हो
07:59मचली के गर्ब से एक कमल सद्रिश कोमल शिशु प्रकट हुआ जिसकी काया सूर्य के समान तेजस्वी थी और मुख
08:06पर मंद मुस्कान थी
08:09बालक की दिव्य उपस्थिती ने मायावती को स्तब्ध कर दिया उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह कोई
08:16साधारन मचली का शिकार हो सकता है
08:20शिशु के चारों और एक स्वर्गिय आभान रित्य कर रही थी जिससे रसोई का अंधेरा भी जग्म का उठा जैसे
08:28किसी देवपुत्र का आगमन हुआ हो
08:31शंबरासुर की पत्नी होने के नाते उसे एक पल को लगा कि यह कोई मायावी चाल है पर शिशु की
08:38निश्चलता उसके मन में ममता जगा रही थी
08:41तभी आकाशवानी हुई है मायावती यह शिशु कोई और नहीं भगवान कृष्ण और रुकमिनी का पुत्र प्रद्युम्न है
08:52आकाशवानी ने बताया कि शंबरासुर ने इस बालक का अफ़रण किया था क्योंकि वह जानता था कि प्रद्युम नहीं उसके
08:59वध का कारण बनेगा
09:01तुम्हें ही इस बालक को पालना है क्योंकि तुम पूर्व जन्म में कामदेव की पत्नी रती थी और यह शिशु
09:08कामदेव का पुनरजन्म है
09:11जब समय आएगा यह बालक शंबरासुर का सहार कर अपने मातापिता के पास लोटेगा तब तक इसकी रक्षा करना तुम्हारा
09:20परम कर्तव्य है
09:23मायावती ने सनेह से बालक को अपने आचल में छुपा लिया और उसे रसोई घर से सुरक्षित स्थान पर ले
09:30जाने लगी ताकि कोई और उसे देख न ले
09:34उसी क्षण अपनी भूख मिटाने और मचली के बारे में पूछने के लिए शंबरासुर विशालकाय देह के साथ रसोई घर
09:42में प्रवेश किया
09:44मायावती ने तुरंट खुद को संभाला और स्वाभाविक रूप से शंबरासुर का अभिवादन किया बालक को कुशलता से छिपाय रखा
09:52वर्ष बीटते गए और मायावती की देखरेख में प्रद्युम्न एक सुन्दर बलिष्ट किशोर के रूप में बढ़ा हुआ जो अपनी
10:01वास्तविक पहचान से अंजान था
10:05मायावती ने उसे समस्ट अस्त्रशस्त्र विद्या और मायावी शक्तियों का ज्यान दिया उसे भविश्य के महान युद्ध के लिए तैयार
10:13करती रही
10:15प्रद्युम्न का सौन्दर्य और बल अध्भुत रूप से बढ़ता गया उसके मुखमंडल पर श्री कृष्ण की जलक स्पष्ट दिखाई देने
10:23लगी
10:24शंबरासुर ने प्रद्युम्न के अध्वितिय रूप और बढ़ती शक्ती पर गौर करना शुरू कर दिया उसके मन में संदेह की
10:32हलकी छाया मंडराने लगी
10:35मायावती ने धीरे से प्रद्युम्न को शंबरासुर के कपटपूर्ण स्वभाव से साबधान किया उसे हर कदम फूंक फूंक कर रखने
10:43की सलाह दी
10:45प्रद्युम्न के मन में अपनी उत्पत्ती और नेती को लेकर एक गहरा कौतुहल और अज्यात पहचान की बेचैनी उठने लगी
10:52थी
10:54प्रद्युम्न ने आतुर होकर मायावती से अपने अतीत के रहस्यों और अपनी अज्यात उत्पत्ती का सत्य बताने का विनम्र आग
11:02रह किया
11:04प्रद्युम्न की गहरी व्याकुल्ता देखकर मायावती ने निर्ने लिया कि अब उसके वास्तविक रूप और जन्म के दिव्य रहस्य को
11:12प्रकट करने का उचित समया गया है
11:16मायावती ने उस अद्भुत दिन की याद ताजा की जब दैत्यराज शंबरासुर की विशाल रसोई में समुद्र से पकड़ी गई
11:23एक अत्यंत विशालकाई और रहस्य में मचली लाई गई थी
11:28जब शंबरासुर के मुख्य रसोईयों ने भारी और धारदार चाकूओं से उस विशालकाई मचली के पेट को काटना शुरू किया
11:36तो पूरी रसोई एक अन्होनी की आशंका से कांप उठी
11:41मचली का पेट खुलते ही उसमें से अलोकिक स्वर्णिम किर्णों का ऐसा तीवर प्रकाश पुंज निकला
11:47जिसने रसोई के समस्त्रसोईयों और सेवकों को स्तब्ध कर दिया
11:52उस मचली के पेट के भीतर कोई मृत वस्तु नहीं
11:56बलकी एक दिव्यरूकवान जीवित नवजात शिशु मुस्कुराता हुआ प्रकाशमान कमल पुष पर विराजमान था
12:04भैभीत होकर सभी असुरी सेवक वहां से भाग खड़े हुए
12:08किन्तु मायावती अपने हृदय में उमरते असीन वातसल्य और कौतुक के साथ उस अध्भुत बालक के समीग पहुची
12:17जैसे ही मायावती ने उस दिव्यरूकवान शिशु को अपनी गोद में उठाया
12:21उन्हें तुरंट अहसास हो गया कि यह कोई साधारन बालक नहीं बलकी स्वयन साक्षात नारायन का अंश है
12:30उसी क्षन ब्रहमर्शी नारद ने अलोकिक रूप से प्रकट होकर मायावती को गुप्ट संदेश दिया
12:36कि यह बालक द्वारकाधी श्री क्रिश्न का पुत्र प्रद्युम्न और उनका पूर्वजन्म का पती कामदेव है
12:44नारद मुनी के आदेश आनुसार मायावती ने उस शिशु को शंबरासुर की पापी द्रिश्टी से छिपा कर एक गुप्ट भवन
12:51में अत्यंत लाडप्यार और राजसी वैभव के साथ बढ़ा किया
12:56अपनी उत्पत्ती और जीवन की इस चकित कर देने वाली कथा को सुनकर प्रद्युम्न की आखे विस्मय और श्रद्धा के
13:04भाव से छलक आई
13:06मायावती ने मुस्कुराते हुए अपना वास्तविक रूप प्रकट किया और बताया कि वे स्वर्ग की देवी रती हैं जो अपने
13:14स्वामी कामदेव के पुनर्जन्म में उनकी सेवा के लिए यहां आई है
13:20देवी रती के इन वचनों को सुनते ही प्रद्युम्न को अपने पूर्वजन्म के कामदेव रूप की समस्थ स्मृतिया और अलौकिक
13:28सिध्धिया क्षन भर में पुनह प्राप्थ हो गई
13:32कामदेव का दिव्य प्रभाव और तेज प्रद्युम्न के मुखमंडल पर छा गया जिससे उनका सौंदर्य और पराक्रम कई गुना अधिक
13:40विशाल प्रतीत होने लगा
13:42देवी रती ने प्रद्युम्न को अवगत कराया कि पापी शंबरासूर ने ही उन्हें उनके जन्म के छठे दिन मातारुकमिनी के
13:50कक्ष से चुराकर समुद्र में फैंका था
13:54अपने जन्मदाता मातारुकमिनी और पिता श्रीकृष्ण से बिछोह और शंबरासूर के इस दुस्साहस को जानकर प्रद्युम्न का हृदय प्रचंड क्रोध
14:03से भर उठा
14:05शंबरासूर की मतिभरम करने वाली मायावी शक्तियों को नश्ट करने के लिए देवी रती ने प्रद्युम्न को प्राचीन महामारी महामाया
14:13विद्या और अलोकिक अस्त्रों का ज्यान प्रदान किया
14:17प्रद्युम्न ने पूर्ण एकागरता के साथ उस परम विद्या को ग्रहन किया, जिससे वे असुरी मायाजाल का क्षण भर में
14:25छेदन करने में सक्षम हो गए
14:28अपने दिव्य अस्त्रशस्त्रों को धारन कर प्रद्युम्न ने सौगंध ली की वे अपने मातापिता के अपमान का प्रतिशोध लेंगे और
14:36शंबरासुर का समूल विनाश करेंगे
14:39इस प्रकार अपनी वास्तविक पहचान जानकर प्रद्युम्न शंबरासूर के काल बनकर उभ्रे और दैत्यराज के महल की ओर चुनोती देने
14:48के लिए द्रिड कदमों से बढ़ चले
14:51विक्राल शंबरासुर के महल के द्वार पर पहुँचते ही, युवा प्रद्युम्न ने अपने नेत्रों में प्रतिशोध की अगनी और हृदय
14:59में दिव्य संकल्प लिए एक गर्जना की, जिसने डैत्यलोग की नीरवता को भंग कर दिया
15:05उसकी गर्जना सुनकर महल के विशाल द्वारों से शंबरासुर के क्रूर सेनानी बाहर निकले, जिनके चहरे पर चुनौती की अभेलना
15:14और प्रचंड क्रोध का भाव था, जो तुरंत युद्ध की विभीशिका में बदल गया
15:20प्रध्युम्न ने निर्भीक होकर उन्हें अपनी दिव्य शक्ती का परिचय दिया, माया विद्या के रहस्यमय मंत्रों का उच्चारन करते हुए
15:28अपने चारों और एक भ्रमजाल बुना, जिससे शत्रु सेना भ्रमित हो गई
15:34जैसे ही भ्रमजाल गहराया, शंबरासुर स्वया अपने सिनहासन कक्ष से बाहर निकला, उसकी विशाल आकृती और भयावह नेत्रों में अहंकार
15:43और अवमानना स्पष्ट जलक रही थी
15:47शंबरासुर ने प्रद्युम्न को एक बालक समझ कर उफास किया, अपनी प्रचंट शक्ती और आयू पर घमंड करते हुए उसे
15:55तुरंथ समर्पन करने की चुनौती दी
15:59प्रद्युम्न ने द्रिडता से शंबरासुर के उफास का उत्तर दिया, उसे अपने मातापिता के अपमान और अफ़रण का स्मरण कराते
16:07हुए और उसे चेतावनी दी की उसका अंत निकट है
16:12दोनों के बीच शब्दों का युद्ध समाप्थ होते ही प्रद्युम्न ने एक दिव्यतीर छोड़ा जो बिजली की गती से शंबरासुर
16:20की ओर बढ़ा युद्ध की भीशन शुरुवात की घोशना करते हुए
16:25शंबरासुर ने अपने भयानक अस्त्रों का प्रयोग करते हुए अगनी और अंधकार के गोले छोड़े जो प्रद्युम्न के दिव्य प्रकाश
16:33में तीरों से ठकरा कर आकाश में भयंकर विस्पोट उत्पन्न करने लगे
16:39प्रद्युम्न ने अपनी मायाविद्या का पूर्ण प्रदर्शन करते हुए शंबरासुर के चारों और भ्रमकारी रूपों की एक सेना उत्पन्न कर
16:47दी, जिससे दैट्यराज चकित और विचलित हो गया
16:52परंतु शंबरासुर अपनी मायावी शक्तियों में माहिर था, उसने भी अपने भयानक भ्रमों का प्रयोग किया, जिससे युद्धक्षेत्र एक भयावा
17:01दुहस्वप्न में बदल गया
17:04मायादेवी की शिक्षाओं को याद करते हुए, प्रध्युम्न ने अपने अंतरंग ज्यान से शंबरासुर के सभी भ्रमों को भेद दिया
17:11और अपने दिव्य अस्त्रों से उस पर वार करने लगा
17:16प्रद्युम्न के लगातार और सटीक प्रहारों से शंबरासुर का विशाल शरीर घायल होने लगा, उसके कवच तूटने लगे और उसकी
17:24शक्ती क्षीन होने लगी
17:27अपनी अंतिम शक्ती का प्रयोग करते हुए, शंबरासुर ने एक भयंकर गर्जना की और अपनी सबसे घातक मायावी शक्ती को
17:36प्रद्युम्न पर केंद्रिप किया, जो एक काली आंधी के समान थी
17:41परंतु प्रद्युम्न अपने दैविय पिता और मायादेवी के आशिरवाद से एक वजर्पात की भांती उस काली आंधी के बीच से
17:49निकला, उसके हाथ में एक तेजस्वी चक्र सुशोभित था
17:54एक क्षण भी विलंब किये बिना, प्रद्युम्न ने उस तेजस्वी चक्र को शंबरासुर की ओर फेंका, जिसने वायुमंडल को चीरते
18:02हुए सीधा उसके हरिदय में प्रहार किया
18:06एक भीशन चीक के साथ शंबरासुर का विशाल शरीर जलकर भस्म हो गया, उसकी दुष्ट आत्मा अंधकार में विलीन हो
18:14गई और दैट्यराज का अंथ हुआ
18:18शंबरासुर के वध के बाद मायावती, जिसका हरिदय प्रेम और चिंता से भरा था, दोड़कर प्रद्युम्न के पास आई, उसकी
18:26आखों में अश्रु और होठों पर विजय की मुस्कान थी
18:30उनकी दृष्टी मिलते ही, एक अलौकिक पहचान हुई, मायावती ने अपने प्रिय कामदेव को पुनह प्राप्त कर लिया था और
18:38प्रद्युम्न ने अपनी प्रियारती को चिरकाल के वियोग का अंथ हुआ
18:43इसी क्षन देवर्शी नारद आकाश से प्रकट हुए, उनके मुख पर दिव्य मुस्कान और हाथों में वीना थी, जो प्रेम
18:51और पुनर्मिलन की इस पावन बेला के साक्षी बने
18:55नारद ने अपनी वीना बजाते हुए मधुर स्वर में उनके पुनर्मिलन की प्रशनसा की, यह कहते हुए कि यह डिवाइन
19:03प्रेम की शाश्वत विजय और धर्म की स्थापना का प्रतीक है
19:09देवर्शी नारद ने अपने दिव्यदर्शन और आशिर्वचनों से उस पावन पुनर्मिलन को और भी अविस्मर्निय बना दिया, प्रेम की विजय
19:17के साक्षी बने
19:19नारद ने मायावती को प्रद्युम्न के भावी डेस्टिनी और शंबरा राक्षस के वध की आवश्शक्ता के बारे में समझाया, जिससे
19:27उनकी आखों में एक नया संकल्प जागा
19:31अपने कर्तव्य और प्रेम के आहवान पर मायावती, देवर्शी नारत के मार्क दर्शन में प्रद्युम्न को लेकर एक गुप्ट मायावी
19:40लोग की ओर प्रस्थान करती हैं, जो शंबरा की पहुँच से परे था
19:44उस एकांत जादूई रियम में, जहां ज़रने संगीत छेरते थे और वनस्पतिया लियुमिनस थी, मायावती ने प्रद्युम्न के लिए एक
19:54सुरक्षित और प्रेमपूर्ण आश्रे बनाया
19:58अद्भुत गती से बालत प्रद्युम्न उस गुप्रियल्म में बुल्योर्डू उसकी दिवे कांती दिन प्रति दिन बढ़ती जाती थी, जैसे भोर
20:06का सूर्य अपनी पूर्ण महिमा में खिलता हो
20:10मायावती ने उसे माता के प्रेम से पाला, उसके हर प्रश्न का उत्तर दिया और उसे ब्रहमांड के रहसियों से
20:17परिचित कराया, जैसे कोई गार्डनर अपने सबसे सुन्दर फूल को सीचता हो
20:23जब प्रद्युम्न थोड़ा बड़ा हुआ, तो मायावती ने उसे युद्धकला के मूल सिधानतों का ज्यान देना शुरू किया, उसे धैर्य
20:31और सटीक्ता के साथ तीरंदाजी और तलवार बाजी सिखाई
20:36उनकी शिक्षाओं का मुख्य फोकस मायावी विद्या पर था, इल्यूशन्स, छल और रूप बदलने की कला, जो शत्रूओं को भ्रमित
20:45कर सकती थी और उन्हें वास्तविक्ता से भटका सकती थी
20:49प्रद्युम्न ने अविश्वसनिय शीघरता और प्रवीन्ता के साथ इन कॉम्पलेक्स कलाओं में महारत हासिल की, जैसे कोई जन्मजात कलाकार अपनी
20:59कला को सहचता से गड़ता हो
21:02मायावती उसे अद्रिश्य होने, ध्वनी की गती से चलने और हवा को अपने साथी के रूप में उप्योग करने के
21:09तरीके सिखाती थी, जिससे वह एक शैडो वोरियर बनता जा रहा था
21:15उसने उसे केवल शारिरिक बल ही नहीं, बल की गेहन ध्यान और मानसिक एकागरता का महत्व भी सिखाया, जो मायावी
21:23शक्तियों को नियंत्रित करने की कुणजी थी
21:27युवावस्था में प्रवेश करते ही, प्रद्युम्न की सुन्दर्ता इतनी असाधारन हो गई कि वह कामदेव के ओरिजनल रूप को भी
21:35पीछे छोड़ देती थी, साथ ही उसकी शक्ती भी असीन थी
21:40मायावती ने उसे शंबरा के पास्ट मिस्दीड्स और उसके पिता श्री कृष्ण के साथ हुए छल के बारे में बताया,
21:48जिससे प्रद्युम्न के हृदय में प्रतिशोध की ज्वाला प्रज्वलित हुई
21:52उसने प्रद्युम्न को यह भी समझाया कि उसका जन्म ही शंबरा का वद करने और धर्म की रक्षा के लिए
21:59हुआ है, और वह कोई साधारन मनुष्य नहीं, बलकि स्वयं कामदेव का अवतार है
22:06अपने वास्तविक आइडेंटिटी को जानकर प्रद्युम्न का संकल्प और भी द्रिढ हो गया, उसकी आखों में अपने जन्म के उद्देश
22:14को पूरा करने की अदमय इच्छा चमक रही थी
22:19मायावती ने प्रद्युम्न को अपनी शिक्षाओं का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाया कि असली शक्ती प्रेम और न्याय में
22:27नहित है और छल का उप्योग केवल धर्म की स्थापना के लिए ही किया जाना चाहिए
22:33प्रद्युम्न अब पूर्ण रूप से तयार था उसका शरीर, मन और आत्मा शंबरा का सामना करने और अपने पिता के
22:41गौरव को वापस लाने के लिए डिवाइन उर्जा से परिपूर्ण थे
22:46एक शुभक्षण में मायावती ने प्रद्युम्न को शंबरा के अभेज्य फोर्ट्रेस में प्रवेश करने के लिए गुप मार्ग और सही
22:54समय का रहस्य बताया, जो केवल उनके ज्यान में था
22:58अपनी माता मायावती का आशिर्वाद और प्रेम प्राप्त कर प्रद्युम्न ने अपने मिशन पर प्रस्थान किया, उसके कदम द्रिड और
23:07उसका हृदय अटूट संकल्प से भरा था
23:10अपनी मायावी शक्तियों का उप्योग करते हुए, प्रद्युम्न ने एक रहस्य में रूप धारण किया और शम्वरा के असुरक्षित महल
23:18में स्टेल्थ ली प्रवेश किया, जहां उसके डेस्टिनी की परीच्षा होनी थी
23:24शम्वरा के दुरगम महल के लाबरिंथाइन गलियारों में प्रद्युम्न एक अद्रिश्य छाया की भांती विचर्ण कर रहा था, हर कदम
23:32उसके नियती की ओर बढ़ता हुआ
23:35अंतह गेहन अंधकार को भेदते हुए उसने शम्वरा को अपने भव्य, फिर भी भयावह, सिनहासन पर विराज मान देखा, जो
23:44अपने राक्षसी वैभव में खोया हुआ था
23:47तभी एक रहस्यमय शक्ती ने शम्वरा की गहरी निग्रा भंग की और उसने अपनी लाल धधकाती आखों से आसपास के
23:56अंधकार को टटोलना शुरू किया
23:59एक बिजली की चमक के साथ प्रद्युम्न अपनी मायावी आवर्ण से बाहर आया, उसकी दिव्य आभा ने शम्वरा के अंधकार
24:07में महल को क्षण भर के लिए प्रकाशित कर दिया
24:11शम्वरा की आखों में अविश्वास और फिर भयानक क्रोध की अगनी प्रजवलित हुई, जैसे किसी ने उसकी शांत दुष्ट दुनिया
24:19में हस्तक्षेप किया हो
24:21शम्वरा प्रद्युम्न की आवाज महल के हर कोने में गूंजी, तेरा अंत निकट है, और तेरी अधर्मी सक्ता का नाश
24:29मैं ही करूंगा
24:31शम्वरा ने एक क्रूर व्यंग्यात्मक हसी छोड़ी, तु कौन है रे बालक जो मेरे सामने खड़ा होने का दुस्सा हस
24:38करता है
24:40प्रद्युम्न की आखों में मायावती के शब्दों की गूंज सुनाई दी, जिन्होंने उसे उसके शत्रु के दुर्बलताओं और युद्ध की
24:48कला में निपुन्ता सिखाई थी
24:51अपनी गर्जना के साथ शंबरा ने अपनी विशाल गदा उठाई और एक विध्वनसक प्रहार किया, जिससे महल की नीम्व काप
24:59उठी
25:01प्रद्युम्न ने अपने दिव्यधनुष पांच जन्य से अगनिबानों की वर्षा की, जो सर्प की भाती तीवर गती से शंबरा की
25:09ओर बढ़े
25:11दोनों के अस्त्रशस्त्र टक्राए, जिससे चिंगारिया उठीन और मंत्रों की गून से महल का वायुमंडल विध्युतरंगित हो गया
25:20धीरे धीरे प्रद्युम्न की दिव्यशक्ती ने शंबरा की काली माया पर भारी पढ़ना शुरू किया, जिससे असुर भयभीत होने लगा
25:29अपनी हार देखकर शंबरा ने अपनी अंतिम शक्ती का आहवान किया और महल को भ्रमों के एक स्वर्लिंग भंवर में
25:37बदल दिया, जिससे प्रद्युम्न की आखे धोखा खा गई
25:41माया के घने जाल में फसकर, प्रद्युम्न को क्षण भर के लिए अपनी दिशा और उद्देश का बोध नहीं रहा,
25:49जैसे उसका मन किसी अद्रिश बंधन में जकड गया हो
25:53तभी उसके भीतर एक प्राचीन स्मृती जागरित हुई, उसे अपने दिव्य जनक और जन्म का उद्देश स्मरण हो आया, जिससे
26:02उसकी आत्मा पुना प्रकाशित हो उठी
26:05अपनी वास्तविक पहचान को स्मरण कर, प्रद्युम्न ने एक शक्तिशाली गर्जना की और अपनी दिव्य शक्ती से माया के सारे
26:14भ्रमों को एक पल में छिन्नभिन कर दिया
26:17उसकी काया से एक अध्भुत प्रकाश पुन्ज निकला, जो ब्रहमांड की समस्त उर्जा को समेटे हुए था, और वह अपनी
26:25पूर्ण दिव्य महिमा में प्रकट हो गया
26:28इस अलोकिक रूप को देखकर शम्बरा को उस बालक की वास्तविक पहचान का भान हुआ और उसे अपने अंत की
26:36भयावता ने जकड लिया
26:38अपनी विजय निश्चित जानकर प्रद्युम्न ने अपनी पांच जन्य धनुष पर एक दिव्यबान चड़ाया, जो न्याय और प्रतिशोध की अगनी
26:47से प्रजवलित था
26:50दिव्यबान तीवर गती से चला, शम्बरा के हृदय को चीरता हुआ और उस अधर्मी असुर का सामराज्य एक गर्जना के
26:57साथ पतन को प्राप्थ हुआ
27:00शम्बरासुर के प्राणहीन होते ही उसके मायावी सामराज्य की काली दिवारे ढह गई और चारों और शान्ती छा गई
27:09मायावती अत्यंत भावक होकर प्रद्युम्न के समीप आई, उनकी आखों में हर्ष और संतोष के अश्रु बह रहे थे
27:18अपने भीतर उठते प्रशनों को रोक न पाते हुए, प्रद्युम्न ने मायावती से अपने वास्तविक मातापिता और कुल के विशय
27:25में पूछा
27:27मायावती ने अपनी योग माया से अपना दिव्य रूप प्रकट किया और बताया कि वह वास्तव में कामदेव की पतनी
27:35देवी रती हैं
27:37देवी रती ने प्रद्युम्न को सत्य से अवगत कराया कि वे द्वारका के साक्षात नारायन, भगवान श्रीकृष्ण और देवी रुक्मिनी
27:46के जेश्ट पुत्र है
27:49अपनी माता रुकमिनी के वर्षों के विरह और पीड़ा के बारे में जानकर प्रद्युम्न का हृदय मात्रिप्रेम और करुणा से
27:56भर उठा
27:58देवी रती ने द्वार का प्रस्थान करने के लिए आकाश से एक दिव्य हंसों द्वारा संचालित रत का आहवान किया
28:07दोनों उस अलोकिक रत पर सवार होकर बादलों को चीरते हुए द्वार का की दिशा में तीवर गती से उर
28:13चले
28:15विशाल सागर के उपर से गुजरते हुए उन्हें दूर से ही सोने की भव्य और प्रकाश्मान द्वार का नगरी दिखाई
28:22दी
28:23इधर द्वारका के अंतहपुर में महारानी रुक्मिनी आज भी अपने खोए हुए पुत्र की स्मृतियों में लीन अत्यंत उदास बैठी
28:32थी
28:33उसी समय भगवान श्रीकृष्ण ने कक्ष में प्रवेश कर अपनी प्रियरानी को सांत्वना दी क्योंकि वे जानते थे कि मिलन
28:42की घड़ी आचुकी है
28:44अचानक द्वारका के मुख्य राजप्रासाद के प्रांगण में हंसों वाला वह दिव्यरत अत्यंत धीमे स्वर में उतर आया
28:53प्रद्युम्न के अलौकिक रूप और श्रीकृष्ण जैसी ही श्यामल कांती को देखकर वहां उपस्थित सभी लोग आश्चर्यच्कित रह गए
29:02कोलाहल सुनकर महारानी रुक्मिनी जरोखे पर आई और नीचे खड़े उस युवक को देखकर उनके मात्रित्व का सागर उमड पड़ा
29:12बिना एक क्षण गवाय रुक्मिनी अपने आसूओं को पोच्चते हुए महल की संगमर्मर की सीधियों से नीचे की ओर दोड़ी
29:21प्रध्युम्न ने भी जैसे ही उस करुणामई देवी को अपनी ओर आते देखा उनका हृदय अनायास ही उनके चर्णों की
29:29ओर खिंच गया
29:31रुक्मिनी ने अपने प्रिय पुत्र को गले से लगा लिया और वर्षों के विरह के बाद मा की ममता अश्रूओं
29:37के रूप में बह निकली
29:40भगवान श्री कृष्ण भी वहाँ पहुँचे और उन्होंने अपने पुत्र और पत्नी के इस पवित्र मिलन को देख कर मंदमंद
29:47मुस्कुराया
29:48तभी देवर्षी नारद वीना बजाते हुए प्रकट हुए और उन्होंने सभी के समक्ष प्रद्युम्न के कामदेव होने और उनके इस
29:57दिव्य रहस्य को उजागर किया
30:00इस महान और शुब समाचार से पूरी द्वार का नगरी में उच्सव का माहौल हो गया और पुश पवर्षा के
30:07बीच युवराज प्रद्युम्न का स्वागत किया गया
30:11पूरे द्वार का नगर में उत्सव का माहौल बना हुआ था, जहां नागरिक अपने युवराज प्रद्युम्न के चमतकारिक पुन्रागमन पर
30:19हर्शोल लास से जूम रहे थे और दिव्य संगीत की ध्वनी से आकाश गूंज रहा था
30:25रानी रुकमिनी जिनकी आखें अपने वर्शों से बिछ़़े पुत्र को देखकर असीम मातरित्व प्रेम और आसुओं से भराई थी, उन्होंने
30:34प्रद्युम्न को अपनी बाहों में कसकर भीच लिया
30:38भगवान श्रीकृष्ण ने अपने दिव्य होठोन पर एक शांत मुस्कान के साथ अपने पुत्र के सिर पर हाथ रखा, उन्हें
30:46अपना पैत्रिक आशिरवाद दिया और उनकी वीर यात्रा को स्विकार किया
30:52देवर्शी नारद ने अपनी दिव्य वीना बजाते हुए शंबरा नगरी में प्रद्युम्न की वीर्ता और मायावती के प्रती उनके गहन
31:00प्रेम की कहानिया सुनाई, जिससे उपस्थित सभी लोग मंत्रमुग्ध हो गए
31:06मायावती जो अब देवी रती के अपने दिव्य रूप में प्रकट हो चुकी थी, प्रद्युम्न के बगल में खड़ी थी,
31:13उनकी अलोकिक सुन्दर्ता और भक्ती सभी को स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही थी
31:19सुगंधित पुष्पों की वर्षा के बीच प्रद्युम्न को आपचारिक रूप से द्वार्का के युवराज के रूप में अभिशेक किया गया,
31:27जो यादव राजवन्ष में उनके उचित स्थान का प्रतीक था
31:32यादव कुल के पूजनिय वरिष्ठों, जिन में उग्रसेन और बलराम भी शामिल थे, ने साहसी और बुद्धिमान युवराज को अपने
31:40आशिरवाद और गहरा सम्मान अर्पित किया
31:44भगवान श्रीकृष्ण के मार्ग दर्शन में प्रद्युम्न ने राजधर्म, शासन कला और न्यायपूर्ण शासन के सुक्ष्म पहलूँ में स्वयन को
31:53परिश्रम पूर्वक समर्पित करना शुरू कर दिया
31:56अपने दिव्यधनुष के एक शक्तिशाली खिंचाव के साथ प्रद्युम्न ने धनुर्विद्या में अपनी अद्वितिय निपुन्ता का प्रदर्शन किया, जिससे तीर
32:06आकाशिय सटीक्ता के साथ आकाश में उर्ते चले गए
32:11नकली युद्धों में प्रद्युम्न ने द्वार्का के सबसे कुशल योद्धाओं को सहच्ता से मात दी, अपनी कठोर अगनिप्रीक्षाओं से प्राप्ट
32:19अपनी दुर्जे युद्ध क्षमता का प्रदर्शन किया
32:23द्वार्का के आम लोग अपने राजकुमार को श्रद्धा और प्रशन्सा से देखते थे, उनमें केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि एक
32:32रक्षक और आशा का प्रतीक पहचानते थे
32:36देवी रती, सदैव समर्पित, प्रद्युम्न को उनके कर्तव्यों में सहायता करती थी, उनकी उपस्थिती उनके प्रिये के लिए शक्ती और
32:44दिव्य प्रेणा का एक निरंतर स्रोत थी
32:48दूर-दूर के प्रतिष्थित रिशी और तपस्वी इस दिव्य मिलन को देखने और पुनरजन्म हुए कामदेव और उनकी संगिनी को
32:56अपनी श्रधांजली अर्पित करने के लिए द्वार का आए
33:00भगवान श्रीकृष्ण गेहन आध्यात्मिक और व्याभारिक ज्यान प्रदान करते हुए प्रद्युम्न को धर्म के एक स्तंभ के रूप में उनकी
33:09प्रतीक्षा कर रही महत्वपून जिम्मेदारियों के लिए तैयार कर रहे थे
33:14रानी रुकमिनी ने अपने पुत्र को समरिद्ध होते देखकर असीम सांत्वना और आनंद पाया उनका पिछला दुख अब गहरी संतुष्टी
33:23और गर्व की भावना से भर गया था
33:26प्रद्युम्न के बढ़ते प्रभाव में द्वारका ने फलना फूलना जारी रखा उसकी संपत्ती और सांस्कृतिक जीवन्तता नई उचाईयों तक पहुँच
33:35गई जो शांती और समरिद्धी का प्रतीक था
33:40स्वर्गलोक से दिव्य प्राणियों ने अद्रिश्य आशिर्वाद बरसाया, कामदेव के पुरुठ्थान और दुष्ट शंबरा की हार का जश्न मनाया
33:49प्रद्युम्न ने शांत लेकिन द्रिढ अभिव्यक्ती के साथ अपने दिव्य पिता के आदर्शों को दर्शाते हुए न्याय और धार्मिक्ता के
33:58सिध्धान्तों को बनाये रखने का संकल्क लिया
34:02द्वार्का के लोगों ने अब प्रद्युम्न और रती में एक आदर्श शाही युगल को देखा जो राज्य की रक्षा करने
34:09और अपनी दिव्य प्रेन कहानी से पीढियों को प्रेरित करने के लिए नियत थे
34:14इस प्रकार विजी राजकुमार और प्रेन के प्रतीक प्रद्युम्न द्वार्का में प्रकाशस्तंभ बनकर खड़े थे
34:21अपने भाग्य को पूरी तरह से अपनाते हुए और शान्ती के एक नए युग की शुरुवात कर रहे थे
34:29आकाश मार्ग से नीचे उतरते हुए प्रद्युम्न और रती जिनके दिव्य स्वरूप से द्वार्का का आकाश जग्मगा उठा था
34:37प्रित्वी की ओर एक शान्त महिमामय आभा के साथ बढ़ रहे थे
34:42द्वार्का के नागरिट अचानक प्रकट हुई इस दिव्य जोडी को देखकर विस्मय और हर्ष से भर उठे उनकी आखें श्रद्धा
34:50और उच्सुकता से चमक रही थी
34:54द्वार्का महल में भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिनी अपने चिरप्रतीक्षित पुत्र की वापसी के संकेत को भांप कर एक साथ आनंद
35:02और प्रेम की लहर में डूबे हुए थे
35:06अविश्वस्नी अक्षणों में प्रद्युम्न और रती महल के आंगन में कदम रखते हुए अपने माता पिता की ओर बढ़े उनके
35:14चहरे पर असीम प्रेम और भक्ती जलक रही थी
35:18पिता श्री कृष्ण ने अपने पुत्र को अपनी भुजाओं में भरते हुए वर्षों के अलगाओं का दर्द एक ही आलिंगन
35:25में मिटा दिया उनकी आखें स्नेह से नम थी
35:29रुक्मिनी वात्सल्य और प्रेम से अभिभूत होकर अपने खोए हुए पुत्र प्रद्युम्न को हृदय से लगाया उसकी आखों से आनंद
35:38के अश्रु अविरल बह रहे थे
35:41प्रद्युम्न ने अपने दिव्य माता पिता के चर्णों को स्पर्ष किया उनकी भक्ती और कृतग्यता उनके चहरे पर स्पष्ट जलक
35:49रही थी आशिर्वाद के प्रतीक स्वरूप
35:52रती ने भी अपनी सास रुक्मिनी और ससुर श्रीकृष्ण के चर्णों में श्रद्धा पूर्वक प्रणाम किया उनके मुख पर शालीनता
36:00और सम्मान का भाव था
36:03पूरा यादव कुल राजकुमार के विजी आगमन पर एकत्र हुआ, उनके चहरों पर खुशी और गर्व स्पष्ट रूप से जलक
36:11रहा था
36:13राज्य भर में उत्सव की घोशना की गई, द्वारका के हर कोने में खुशी की लहर दोड़ गई, धोल और
36:20शंकनाज से वातावर्ण गूँझ उठा
36:23प्रद्युम्न और रती एक भव्य रत में विराज मान होकर द्वारका की सडकों से निकले, जहां लोग उन पर फूलों
36:30की वर्शा कर रहे थे
36:32महल के प्रांगण में संगीत और नृत्य की गूँच सुनाई दी, नर्तक और संगीतकार अपनी कलासे वातावर्ण को जीवन्त कर
36:41रहे थे
36:42एक विशाल शाही भोज का आयोजन किया गया, जहां भाति-भाती के व्यंजन परोसे गए, जिनकी सुगंध पूरे महल में
36:50फैल गई
36:52प्रद्युम्न ने अपने मातापिता और कुल के वरिष्ठों को अपनी यात्रा और शंबरा पर विजय की संक्षिप्ट गाथा सुनाई, उनके
37:00शब्दों में साहस और विनमरता थी
37:04रती ने अपनी सच्ची पहचान प्रेम की देवी के रूप में परिवार के सामने प्रकट की, जिससे सभी के मन
37:11में श्रद्धा और आश्चर्य का भाव भर गया
37:15भगवान श्री कृष्ण ने प्रद्युम्न और रती को उनके भावी जीवन के लिए दिव्या आशिरवाद दिया, उनके मिलन को धर्म
37:23और प्रेम का प्रतीक बताया
37:26मारुकमिनी ने अपनी बहु रती को गले लगाया, उसे परिवार में सहर्ष स्विकार करते हुए और उसे एक नए जीवन
37:34के लिए शुभकाम नाये दी
37:36प्रद्युम्न और रती नवविवाहित जोडे के रूप में एक दूसरे की आखों में देखते हुए उनके अटूट प्रेम और एक
37:44साथ उनके उजवल भविश्य का प्रतीक बने
37:48द्वार का शहर उट्सव की रोष्ни और आनंदमय ध्वनी से जीवन्त राजकुमार और राजकुमारी के आगमन की खुशी में जूम
37:56रहा था
37:58इस प्रकार प्रद्युम्न और रतीने द्वारका में अपने नए जीवन की शुरुवात की जो प्रेम शांती और समरिधी के एक
38:06नए युग का प्रतीक था और उनकी कथा अमर हो गई
Comments