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भागवत पुराण के सीजन 3, एपिसोड 54 में, हम चंद्रवंश के संस्थापक, पराक्रमी राजा पुरुरवा की अद्भुत कथा में गोता लगाते हैं। वैवस्वत मनु के पोते और बुध के पुत्र, पुरुरवा का जीवन तब एक नया मोड़ लेता है जब उनकी भेंट स्वर्ग की सबसे सुंदर अप्सरा, उर्वशी से होती है। यह एपिसोड उनके अलौकिक प्रेम, उनके मिलन की दिव्य शर्तें, वियोग की पीड़ा और अंततः उनके बच्चों के जन्म के साथ चंद्रवंश की स्थापना की कहानी बयां करता है। यह गाथा प्रेम, मोह और त्याग के गहन आध्यात्मिक रहस्यों को उजागर करती है। #PururavaUrvashi #Chandravamsha #BhagavataPurana #S3Ep54 #HinduMythology #DivineLove #PauranicKatha
Transcript
00:00व्यवस्वत मनु के पुत्र सुध्यूम्न के वेराग्य ग्रहन कर वन्गमन के उपरांत अयोध्या नगरी गेहन चिंतन और एक नए युग
00:07की प्रतीक्षा में कुछ पल के लिए शांत सी पड़ गई थी।
00:12राज्य की भावी दिशा तै करने के लिए राजपुरोहितों, मंत्रियों और पूजनिय रिशियों की एक महत्वपून सभा भव्य राजभवन के
00:21केंद्र में आहूत की गई।
00:23तब ज्यान के सागर महर्शी वशिष्ठ ने अपनी दिव्यवानी से सुध्यूम्न के पराक्रमी पुत्र पुरुर्वा को चंद्रवंश का संस्थापक और
00:32धर्म का रक्षक घोशित किया।
00:35युवा और तेजस्वी राजकुमार पुरुर्वा ने अपने पूर्वजों की गरिमा बनाये रखने तथा प्रजा का कल्यान सुनिश्चित करने का पवित्र
00:44वचन देते हुए राजसिनहासन को सहर्ष स्विकार किया।
00:47इसके पश्चात पूरे राज्ज में पुरुर्वा के राज्याभिशेक की भव्य घोशना कर दी गई और उत्सवों तथा तयारियों का एक
00:56नया अध्याय आरंभ हो गया।
01:00संपूर्ण राज्यमहल उल्लास और उत्साह से भर उठा जहां कारीगर दिनरात एक कर भव्य सजावटों और अलंकर्णों को अंतिम रूप
01:08देने में जुटे थे।
01:11राज्याभिशेक के शुभ मुहूर्थ पर वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते हुए अगनी प्रजवलित की गई और यग्य की पवित्र धूमर
01:19पूरे वातावर्ण में फैलने लगी।
01:21एक भव्य जुलूस के साथ पुरुर्वा ने स्वर्ण जडित वस्त्रों में सजे हुए तेजस्वी रूप में राज्याभिशेक कक्ष में प्रवेश
01:30किया, जहां सभी की आखें उन पर टिकी हुई थी।
01:34मुख्य पुरोहित ने पवित्र मंत्रो चार के साथ पुरुर्वा के मस्तक पर गंगाजल और ओश्धियों से मिश्रित जल का अभिशेक
01:42किया, जो उनके राज्याभिशेक का प्रतीक था।
01:47तदनंतर वे राजसिनहासन पर आसीन हुए, जिस पर चंद्रवंश का प्रतीक एक तेजस्वी अर्धचंद्र सुशोभित था, और इस प्रकार चंद्रवंश
01:56की स्थापना हुई।
01:58सभा में उपस्थित समस्त रिशियों, ब्राह्मनों और मंत्रियों ने नवनियुक्त राजा को आशिर्वाद दिया, जबकि प्रजाजनों ने जयकारों से आकाश
02:08को गुनजाय मान कर दिया।
02:10अपने राज्याभिशेक के पश्चात, पुरुर्वा ने अपनी प्रजा को धर्म, न्याय और समानता पर आधारित शासन का वचन दिया, जिससे
02:19राज्य में शान्ती और समरिध्धी का नया युग आरंभ हुआ।
02:23उनके धर्म प्रायन और न्याय पूर्ण शासन में राज्य में शान्ती, समरिध्धी और सद्भाव का स्वर्णिंकाल प्रारंभ हुआ, जहां हर
02:32नागरिक, सुरक्षित और प्रसन्न था।
02:35उनकी बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता से क्रिशी उन्नत हुई, व्यापार में वृद्धी हुई, जिससे राज्य का कोश धंधाने से परिपूर्ण हो
02:44गया।
02:45पुरुर्वा अपने राजदर्बार में प्रतिदिन न्याय करते थे, जहां उनकी निश्पक्षता और त्वरित निर्नय लेने की क्षमता ने सभी को
02:54प्रभावित किया।
02:56एक वीर योध्धा होने के नाते, वे अपने सैन्य बल को सुद्रिध रखने के लिए निरंतर अभ्यास करते थे और
03:04राज्य की सीमाओं की रक्षा के लिए सदैव ततपर रहते थे।
03:08उनकी यश और कीर्ती की कहानिया दूर-दूर तक फैलने लगी और कविगन उनके गुनों का बखान करते हुए घीत
03:16रचने लगे।
03:18देवलोक में विचर्ण करते हुए देवर्शी नारद ने अपने दिव्यद्रिष्टी से पुरुर्वा की बढ़ती हुई प्रसिध्धी और उनके धर्म प्रायन
03:26शासन को देखा।
03:28देव सभा में नारद जी ने पुरुर्वा के अदमै साहस उनकी नयाय प्रियता और धर्म प्रायनता का वर्णन करते हुए
03:36देवताओं को उनके बड़ते प्रभाव से अफगत कराया।
03:40इस प्रकार धर्ती पर अपनी प्रजा के प्रिय और धर्म के रक्षक राजा पुरुर्वा की यश्गा था अब तीनों लोकों
03:48में गूंजने लगी थी
03:51देवराज इंद्र की जग्मगाती अमरपुरी में दिव्य संगीत की धुन गूंज रही थी और संपूर्ण स्वर्गलोक इस अलोकिक उत्सव के
03:59आनंद में निमग्न था
04:00इसी बीच स्वर्ग की सबसे अनुपम और सुन्दर अपसरा उर्वशी अपने पायल की जंकार के साथ नृत्यमंडप के केंद्र में
04:09अवत्रित हुई
04:11जैसे ही उर्वशी ने अपने पदों का संचालन आरंभ किया उसकी अलोकिक गतिशील्ता और लावन्य ने पूरी देवसभा को पूरी
04:20तरह मंत्रमुग्ध कर दिया
04:22सभाप्ती के समीप विराजमान देवर्शी नारद अपनी वीना संभाले पृत्वी लोग के पराक्रमी राजा पुरुर्वा की महानता के विचारों में
04:32लीन थे
04:33निरित्य करते समय अचानक नारद जी की वीना की एक विशेश जंकार से उर्वशी का ध्यान क्षण भर के लिए
04:41भटक गया और उसका मन विचलित हो उठा
04:45ध्यान भंग होते ही उर्वशी की ताल छूट गई और उसके चरण शास्त्रों द्वारा निर्धारित लैबध गती से भटक गए
04:54देवसभा में चाई उस दिव्यसवर लहरी का एकाएक तूट जाना पूरी सभा के लिए अत्यंत स्तब्ध कर देने वाला ग्रिश
05:01बन गया
05:03इस गंभीर तुटी और देवसभा की मर्यादा के भंग होने से नारद जी अत्यंत शुब्ध और क्रोधित हो उठे
05:11देवर्शी ने गरस्ते हुए कहा कि जिस अपसरा का मन स्वर्गिक नियमों में नहीं रम सकता भर इस पवित्र सभा
05:19के योग्य नहीं है
05:21अत्यंत क्रोधवश महर्शी ने अपने कमंडलू से जल लेकर उर्वशी को ततकाल मृत्य लोक में जन्म लेकर मानव रूप में
05:29रहने का कठोर शाप दे दिया
05:32शाप का कठोर शब्द सुनते ही उर्वशी का अलौकिक तेज फीका पढ़ने लगा और स्वर्गलोक के द्वार उसके लिए बंध
05:40होने लगे
05:41शमा याचना करने के बाद भी जब शाप का निवारन न हो सका, तब विवश होकर उर्वशी ने अपने अश्रुपुरुत
05:49नेतरों से स्वर्ग की भूमी को अंतिन प्रणाम किया
05:53एक देदी प्यमान उलकापिंड की भाती उर्वशी स्वर्ग के बादलों से उतर कर धर्ती की दिशा में तीवर गती से
06:00गिरने लगी
06:02धर्ती पर पहुँचते ही वह उजजैन नगर के निकट एक अत्यंत मनोरम और सुर्भित वन की पुश्पित भूमी पर उतरी
06:10उसी समय चंद्रवंश के प्रतापी राजा पुरुर्वा अपने भव्यस्वर्ण रथ पर सवार होकर उसी सधन जंगल में आखेट के लिए
06:19भ्रमण कर रहे थे
06:21राजा का रथ जैसे ही सरिता के तटके समीग पहुचा उन्हें वन के निरव वातावर्ण में एक अभूत पूर्व अलौकिक
06:29प्रकाश दिखाई दिया
06:31परंतु उसीक्षण वन के अंधेरे कोनों से प्रकट होकर दुष्ट दानवों के एक समोह ने एकाकी उर्वशी को घेर कर
06:39उसे बंदी बनाने का प्रयास किया
06:42पुर्वशी की भयभीत पुकार सुनते ही राजा पुरुर्वा ने पलक जपकते ही अपने विशाल प्रत्यंचा चढ़ाय धनुषपर अगनी समान बान
06:51का संधान किया
06:53राजा के बानों के भीशन प्रहार से घबराकर दानव अपनी जान बचाकर भाग खड़े हुए और वन का प्रांगन पुनह
07:00शांत हो गया
07:02जब पुरुर्वा ने आगे बढ़कर उर्वशी को सांत्वना दी तब दोनों के नेत्र एक दूसरे से मिले और इस प्रकार
07:10एक अमर प्रेन गाथा का सूत्रपात हुआ
07:13उन दोनों की आखे मिली और समय जैसे ठहर सा गया एक गहन चुम्बकिय आकरशन ने उन्हें एक दूसरे में
07:21पूरी तरह से लीन कर दिया जहां केवल उनकी आत्माओं की प्रतिध्वनी सुनाई दे रही थी
07:28अपनी डैविय आभा को समेटते हुए उर्वशी ने राजा पुरुर्वा के प्रति आभार व्यक्त किया जिनकी अतुल्य वीर्ता ने उसे
07:37भयावह दानवों से बचाया था और सम्मान पूर्वक उनका आभार स्विकार किया
07:43राजा पुरुर्वा उनकी अनुपम सुन्दर्ता और स्वर्गिय सौमयता से इस कदर मुग्ध थे कि वे अपनी आखों से उनके दिव्य
07:51रूप को निहारते रहे, मानो एक स्वपन को जी रहे हो और उनके अस्तित्व में ही खो गए हो
07:58कुछ पल की खामोशी के बाद उर्वशी ने धीरे से अपनी स्वर्गलोक लोटने की अनिवार्यता का उलेख किया, जहां उनके
08:06दिव्यकर्तवियों और इंद्र की सभा में उनकी अनुपस्थिती की प्रतीक्षा थी
08:12प्रेम में डूबे पुरुर्वा ने ततकाल उनके हाथों को थाम लिया और उनसे धर्ती पर ही रुकने की मार्मिक प्रार्थना
08:19की, अपने जीवन को उनके बिना अधूरा और सूना बताते हुए
08:25पुर्वशी के हृदय में प्रेम और कर्तव्य का द्वंद्व गहराया, धर्ती के नश्वर प्रेम की ओर एक तीवर खिंचाव और
08:32स्वर्ग के अमर दायत्वों के बीच एक सुक्ष्म संधर्ष छिड़ गया
08:37अंतह अपने हृदय में पुरुर्वा के प्रती बढ़ते प्रेम के आगे जुपकर उर्वशी ने धर्ती पर रहने की स्विक्रिती दे
08:45दी परंतु इसके लिए कुछ अलौकिक और कठोर शर्ते रखी
08:50उन्होंने अपनी पहली शर्त बताई कि उनके साथ हमेशा दो भेडे निवास करेंगी जिनकी वे अपनी संतानों की भांती देख
08:58भाल करेंगी और जिन्हें कभी भी उनसे अलग नहीं किया जाएगा
09:03फिर उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके महल में कभी भी घी और दूध के अतरिक्त कोई अन्य खाद्य पदार्थ नहीं
09:11होगा
09:11क्योंकि यह उनके दैविय सार के लिए आवश्यक था और उनका पोशन बनाए रखता था
09:18अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण शर्थ यह थी कि पुरुर्वा उन्हें कभी भी निर्वस्त्र अवस्था में न दिखें
09:25क्योंकि यह उनके दिव्य तेज को भंग कर देगा और उन्हें स्वर्ग लोटने के लिए विवश करेगा
09:32अपने प्रेन की प्रबल शक्ती से प्रेरित होकर पुरुर्वा ने बिना किसी हिच्की चाहट के उरवशी की सभी शर्तों को
09:39सहेश स्वीकार कर लिया
09:41उनके प्रती अटूट समर्पन दिखाते हुए
09:45पुर्वशी ने उन्हें चेतावनी दी कि इन शर्टों का किसी भी प्रकार से उलंधन उनके संबंधों को तोर देगा और
09:52उन्हें ततकाल स्वर्ग लोटने के लिए विवश करेगा बिना किसी वापसी की आशा के
09:58पुरुर्वा ने अपनी इमानदारी और प्रेम की शपत लेते हुए उन्हें विश्वास दिलाया कि वे कभी भी उनके विश्वास को
10:06भंग नहीं करेंगे और अपनी प्राणों की बाजी लगा कर भी इन शर्टों का पालन करेंगे
10:13उनकी शर्तों की पुष्टी होते ही, दोनों के हृदय एक हुए और एक मधुर आलिंगन में बंध कर उनके अमर
10:20प्रेम की नीम रखी गई, जिसने दैविय और नश्वर को एक कर दिया
10:25उस आलिंगन में उर्वशी की दैविय चमक थोड़ी कम हुई, और उनके चहरे पर एक नश्वर प्रेमिका की सहच को
10:33मलता आ गई, जो धर्ती के प्रेम में ढल रही थी
10:37प्रेम के बंधन में बंधे पुरुर्वा और उर्वशी ने उस शांत वन प्रांगन से विदाली, जहां उनके प्रेम की पहली
10:45किरने प्रस्पुटित हुई थी, और एक नए जीवन का मार्ग प्रशस्थ हुआ था
10:50वे दोनों अपने राज्य की ओर चल पड़े, उनके मौन में भी एक अटूट प्रेम और एक उजजवल भविश्य की
10:58आशा विद्यमान थी, जैसे दो धाराय मिलकर एक विशाल नदी बन गई हो
11:04जैसे ही वे भव्य महल के द्वार पर पहुँचे, द्वारपालों ने एक दैविय सुन्दरी के साथ राजा को देखकर आश्चर्य
11:12से आखें फाडली, ऐसी शोभा उन्होंने पहले कभी न देखी थी
11:17राजा पुरुर्वा ने उर्वशी को अपने राज्य और प्रजा से परिचित कराया, जहां उनके आने से एक नया उत्सव का
11:25माहौल छा गया और हर कोई उनके दिव्य सुन्दर्य से मंत्रमुग्ध था
11:31इस प्रकार धर्ती पर एक अध्वितिय प्रेम कहानी का आरंभ हुआ, जहां एक नश्वर राजा और एक अमर अपसरा का
11:39दिव्य मिलन एक राजसी सिन्हासन पर हुआ, जो प्रेम शर्तों और नेती के जटिल धागों से बुना हुआ था
11:47महल के एकांत कक्षों में, पुरुर्वा और उर्वशी का प्रेम एक अनमोल रत्न की भांती दमक उठा, जहां समय अपनी
11:55गती भूल जाता था, और हर पल केवल एक दूसरे की उपस्थिती में ही अर्थ पाता था
12:02पुरुर्वशी के दिव्यस्पर्ष और मोहक उपस्थिती में पुरुर्वा को ब्रहमांड का हर सुख प्राप्थ हो रहा था, जैसे धर्ती पर
12:09स्वर्ग उतर आया हो
12:12दिन राजसी आनंद में, राते प्रेम की गहराईयों में, वे एक दूसरे में इतने लीन थे कि बाहरी दुनिया की
12:19सुधी न रहती और काल भी उनके प्रेम के आगे थमसा गया था
12:24धीरे-धीरे, राजकाज की कुछ जिम्मेदारिया छूटने लगी, क्योंकि पुरुर्वा का मन केवल उर्वशी के चिंतन और उनके साथ बिताय
12:33हर पल में ही रम गया था
12:36पुरुर्वशी अपनी अपसरा कलाओं से पुरुर्वा को मंत्रमुग्ध रखती थी, नृत्य संगीत और प्रेम भरी क्रीडाओं में समय बीटता था,
12:44हर पल एक दिव्य अनुभव बन जाता था
12:48कई वर्ष इसी अलौकिक प्रेम में व्यतीत हो गए, जैसे समय के चक्रने स्वय ही अपनी गती धीनी कर दी
12:55हो और वे दोनों इस सुखत ध्रम में खोए रहे
12:59दर्बार में मंत्री और दर्बारी राजा की अनुपस्थिती से चिन्तित होने लगे, पर उनके पास कोई उपाय न था, क्योंकि
13:07राजा का मन केवल प्रेम में लीन था
13:11स्वर्गलोक में देवगण और रिशिगण इस अध्वितिय प्रेम गाथा पर विस्मय और कौटुहल से चर्चा करने लगे, क्योंकि एक नश्वर
13:19राजा ने एक अपसरा के हृदय को मोह लिया था
13:24देवर्शी नारद, जिनके मुख पर दिव्य ज्यान की आभा थी, इस प्रेम के भविश्य पर विचारविमर्ष करने देवलोक पहुँचे, उनकी
13:32वीना की ध्वनी वातावर्ण में गूंज रही थी
13:36नारद ने देवों को बताया कि यह प्रेम कितना भी दिव्यक्यों न हो, नश्वर और अमर का यह मिलन नेती
13:43के बंधनों से मुक्त नहीं, और उसकी शर्तें अटल थी
13:48पुर्वशी अपनी दो भेडो और घी की शर्त को कभी नहीं भूलती थी, जो उनके धर्ती पर रहने का आधार
13:55थी, और यह ज्यान उनके भीतर एक गुप्त चिंता बनकर बैठा था
14:00पुरुर्वा उर्वशी के प्रेम में इतने डूबे थे कि वे अपनी पत्नी की नाजुक शर्तों और उनकी गंभीरता को लगभग
14:08भुला चुके थे, मानो प्रेम ने उन्हें अंधा कर दिया हो
14:13एक दिन वे एक शांथ सरोवर के किनारे बैठे थे, जहां उर्वशी के सौंदर्य ने जल को भी चमका दिया
14:20था, और प्रकृती भी उनके प्रेम की साक्षी बन रही थी
14:25स्वर्ग के गंधर्वों ने उर्वशी को वापस लाने की इच्छा से एक मायावी योजना बनाई, जिसका उद्देश्य उनके धर्ती पर
14:34रहने की शर्ट को भंग करना था
14:37रात्री के गहन अंधकार में गंधर्वों ने चुपचाप उर्वशी की एक भेड को चुरा लिया, जिससे उर्वशी के हृदय में
14:45भय समा गया और उनकी शर्ट तूटने का खत्रा मंदराने लगा
14:50उर्वशी की पुकार सुनकर राजा पुरुर्वा बिना वस्त्रधारन किये, नंगी तलवार लेकर भेड को बचाने दौड पड़े, उनकी आखों में
14:59क्रोध और चिन्ता का मिश्रण था
15:02ठीक उसी पल गंधरवों ने दूसरी भेड भी चुरा ली और आकाश में बिजली चमकी, जिससे उर्वशी ने राजा को
15:10नगन अवस्ता में देख लिया, और उनकी शर्थ तूट गई
15:14जैसे ही राजा का नगन शरीर उर्वशी की द्रिष्टी में आया, उनकी धर्ती पर रहने की शर्थ ततकाल भंग हो
15:21गई, और एक अद्रिश्य शक्ती ने उन्हें अपने लोग की ओर खींचना शुरू कर दिया
15:28उर्वशी अपने दिव्य रूप में वापस आकर एक क्षण में आकाश मार्ग से स्वर्ग की ओर उड़ गई, एक दर्ध
15:35भरी चीक हवा में गूझ उठी, जो पुरूर्वा के हृदय को चीर गई
15:40पुरूर्वा अकेले शूने में उर्वशी को निहारते रहे, उनका हृदय असहनिय पीडा से फटा जा रहा था, मानो जीवन का
15:48सार ही छिन गया हो और सब कुछ वीरान हो गया हो
15:53पुरूर्वा अपने हृदय में विरह की अगनी लिये, उस चूने आकाश की ओर बेथाशा दोड़ पड़े, मानो अपनी प्रेसी को
16:01थामने के लिए ब्रहमांड की सीमाओं को भी लांग जाना चाहते हूँ
16:06उनकी विकल पुकार उर्वशी
16:09उर्वशी वन की गहराईयों में गूंजती रही, प्रत्येक ध्वनी उनके तूटे हुए हृदय की असहनिय वेदना का प्रमाण थी
16:17राजा पुरुर्वा अपने महल की भव्यता को छोड़ कर एक विक्षिप्त प्रेमी की भांती, हर जलाशे और हर परवत श्रिंखला
16:26में अपनी प्रियत्मा की छवी तलाशने लगे
16:29वे नदी के किनारे बैठ जाते और जल की हर लहर में उर्वशी का चहरा देखते, मानो प्रकृती के हर
16:37कण में उनकी अनुपस्थिती का दुख व्याप्थ हो
16:41रात्री के गहरे अंधकार में वे तारों को निहारते और कलपना करते की उर्वशी उन्ही में से किसी तारे पर
16:48निवास करती है, जहां से वे उसे कभी वापस नहीं ला सकते
16:53उनका मन एक ऐसे पिंजरे में कैध हो गया था, जहां केवल उर्वशी की यादें और वियोग की पीड़ा ही
17:00चीखती थी
17:02उधर्क स्वर्गलोक में लोटकर उर्वशी का हृदय भी वियोग की ज्वाला से धधक रहा था, जहां अपसराओं की संगीत मैं
17:10रित्य शालाए अब उसे नीरस और अर्थहीन लगने लगी थी
17:15इंद्र के दर्बार में भी उनका मन नहीं लगता था, दिव्यवाद्यों की ध्वनी अब उन्हें पुरुर्वा के हृदय की सिस्कियों
17:23जैसी प्रतीत होती थी
17:25मेंका उनकी सखी अपसरा, उर्वशी के समीप आकर उनके उदास मुख को निहारती रही, उसके हृदय में भी अपनी प्रिय
17:34सखी की पीडा को देखकर व्यथा उमड़ पड़ी
17:38उर्वशी ने मेंका से कहा, स्वर्ग के ये सुख, ये विलास मेरे लिए अब व्यर्थ हैं, मेरा मन तो धर्ती
17:45पर पुरुर्वा के पास भटक रहा है, जो मेरे बिना अश्रु बहा रहा होगा
17:51धर्ती पर पुरुर्वा की खोज और भी तीवर हो गई थी, वे अब भेडों के जुन से लेकर जंगल के
17:57हर जानवर से उर्वशी का पता पूछने लगे थे
18:01कभी वे किसी जलधारा को उर्वशी का संदेश वाहत मान कर उससे बात करते, तो कभी हवा के जोकों में
18:08उसकी मधुर आवास सुनने का भ्रम करते
18:12उनकी चीखें और पुकारें इतनी तीवर हो गई थी, कि स्वयन देवलोक में भी उनकी वेदना की प्रतिध्वनी सुनाई देने
18:20लगी थी
18:22महर्शी नारद तीनों लोकों में भ्रमन करते हुए, पुरुर्वा की इस वियोग दशा को देखकर चिन्तित हो उठे और उनके
18:30समीप आने का विचार किया
18:33नारद मुनी अपनी वीना के शान्त स्वरों के साथ पुरुर्वा के पास पहुँचे, जिनकी उदासी ने पूरे वन को अपनी
18:40चपेट में ले लिया था
18:43नारद ने पुरुर्वा को धीरस बंधाते हुए कहा कि यह वियोग ख्षनभंगुर है और एक समय आएगा जब उनकी प्रेत्मा
18:51उनसे पुनह मिलेगी
18:53इन शब्दों से पुरुर्वा के हृदय में आशा की एक शीन किरण जगी और उन्होंने नारद के दिखाए मार्ग पर
19:00चलने का द्रिड संकल्प किया
19:03उधर स्वर्ग में उर्वशी को भी अपने अंतर मन में पुरुर्वा की अटूट निष्ठा और उनकी तपस्या का आभास होने
19:11लगा
19:11जो उसके हृदय को विचलित कर रहा था
19:15वह जानती थी कि उनके प्रेम का बंधन इतना गहरा है कि कोई शर्थ या लोग की सीमा उन्हें अधिक
19:22देर तक अलग नहीं रख सकती
19:25पुरुर्वा ने हिमालय की कंदराओं की और प्रस्थान किया जहां वे अपनी प्रेत्मा की वापसी के लिए कठोर तपस्या आरंभ
19:33करने वाले थे
19:35हर सास में हर मंत्र में केवल उर्वशी का नाम था, उनकी तपस्या इतनी तीवर थी कि तीनों लोकों में
19:42उनकी प्रेम की अगनी महसूस की जा सकती थी
19:46हिमाले की बरफीली चोटियों पर पुरुर्वा की तपस्या की अगनी इतनी प्रचंड थी कि वातावर्ण में एक अजीब सी उदासी
19:54और विरह की उर्जा व्याप्थ हो गई थी, मानो प्रकृती भी उनके दुख से पीडित हो
20:01उनकी हर सास, हर धड़कन उर्वशी के नाम का जाब करती थी और उनका मन स्वर्ग से लेकर प्रित्वी तक
20:08हर कण में अपनी प्रियत्मा को खोजता फिरता था
20:12दिन सप्ताह और महीने बीटते गए, परन्तु उर्वशी की वापसी का कोई संकेट नहीं मिला, और पुरुर्वा का धैर्य अब
20:21तूटता जा रहा था
20:23तपस्या के अंत में, जब उन्हें यह आभास हुआ की उर्वशी नहीं लोटेंगी, तो उनके हृदय में विरह का एक
20:31ज्वाला मुखी फूट पड़ा, जिसने उनकी शान्ती और सन्यम को भस्म कर दिया
20:37शाही वस्त्र और राजसी ठाठ बाट त्याग कर, पुरुर्वा पागलों की तरह जंगल-जंगल भटकने लगे, हर छाया में, हर
20:44हवा के जोके में उर्वशी का आभास पाकर
20:48उनकी तेजस्वी आखों में अब केवल वियोग की अगनी जल रही थी, जो उन्हें कभी चैन से बैठने नहीं देती
20:56थी, और वे हर दिशा में अपनी प्रेमिका को पुकारते थे
21:01वे कभी नदियों से पूछते, कभी पहाडों से, और कभी आकाश से, क्या उन्होंने उनकी प्रिय उर्वशी को कहीं देखा
21:09है, उनकी आवाज वन में गुम्जती रहती
21:13उनके हरिदय की वेदना इतनी तीवर थी, कि वे स्वयन से बातें करने लगे, कलपना में उर्वशी का हाथ थाम
21:20कर उन्हें अपने साथ चलने का आग रह करते
21:24उनके राजसी कर्तव्य, उनका राज्य, सब उनके लिए अर्थहीन हो गए थे, उन्हें केवल उर्वशी की एक जलक की चाह
21:33थी
21:34कभी वे हवा में उर्ते पत्तों में उर्वशी का नरित्य देखते, तो कभी जरने की कलकल में उनकी हसी सुनते,
21:41हर जगह उनका भ्रम उन्हें घेर लेता था
21:45उनकी शारिरिक शक्ती भले ही क्षीन हो रही थी, परन्तु उनके प्रेम की अगनी ने उन्हें एक अलोकिक बल प्रदान
21:53किया था, जिससे वे बिना रुके भटकते रहे
21:57उनके बाल उलज गए थे, दाढ़ी बढ़ गई थी, और उनकी आखें अब किसी खोए हुए बच्चे की तरह मासूम
22:04पर अत्यंत दुखी लगती थी
22:07एक दिन वे एक सूखे हुए तालाब के पास पहुँचे, जहां उन्होंने अपने विचलित प्रतिबिन को देखा, जो उन्हें पहचानना
22:16भी मुश्किल हो रहा था
22:18उन्हें लगा जैसे वे स्वयन को खोचुके हैं, और उर्वशी के बिना उनका अस्तित्व ही व्यर्थ हो गया है
22:26रात्री के सन्नाटे में वे आकाश के तारों को घूरते, उनसे उर्वशी का पता पूचते, और उनके सवालों का जवाब
22:34केवल खामोशी देती
22:37कभी-कभी वे अचानक उठ खड़े होते और एक दिशा में दौडने लगते, जैसे उन्हें उर्वशी कहीं दूर दिखाई दे
22:45गई हो, केवल निराशा हाथ लगती
22:49भूखप्यास से बेहाल, उनका शरीर अब उनका साथ छोड़ रहा था, पर उनकी आत्मा उर्वशी के प्रेम में अटूट थी
22:57उनके मन में उर्वशी की मधुर स्मृती ही एक मात्र सहारा थी, जो उन्हें इस विरह के सागर में डूगने
23:05नहीं देती थी
23:07पागलपन की इस अगनी में तबकर, पुरुर्वा अब केवल एक प्रेमी नहीं, बलकि प्रेम के एक जीवित प्रतीक बन गए
23:14थे, जिनकी कहानी ब्रहमांड के हर कोने में थैल गई थी
23:19उनकी विकलता इतनी तीवर थी कि देवता भी विचलित हो उठे, और उन्हें लगने लगा कि इस प्रेम कथा का
23:27कोई तो समाधान होना चाहिए
23:30देवताओं ने पुरुर्वा की असहनिय पीडा को स्वर्ग से देखा, जहां उनकी विरह वेधना ब्रहमांड के शांत संतुलन को भंग
23:38कर रही थी
23:40विशेश रूप से संगीत और कला के देवता गंधर्व पुरुर्वा के प्रेम की पवित्रता से प्रभावित होकर उनकी सहायता करने
23:48का संकल्प लेने लगे
23:50धर्ती पर पुरुर्वा अभी भी वनों में भटक रहे थे, उनके वस्त्र जीर्ण शीर्ण और आखें उर्वशी की तलाश में
23:58शुश्क हो चुकी थी
24:00अंतर कुछ गंधर्वों ने प्रित्वी पर उतरने का निर्णै लिया, जहां वे पुरुर्वा के हृदय की व्यथा को सीधे महसूस
24:08कर सकें
24:09जब गंधर्व पुरुर्वा के समीप पहुँचे तो उन्होंने राजा की दशा देखकर अत्यंत करुणा का अनुभव किया, मानों उनका अपना
24:18हृदय भी विरह की अगनी में जल रहा हो
24:22एक गंधर्व ने अपनी मधुर्वानी में पुरुर्वा को सम्बोधित किया, उनके दोहक को समझते हुए और उन्हें सांत्वना देने का
24:30प्रयास करते हुए
24:32गंधर्व ने पुरुर्वा को बताया कि यग्य और भक्ती के मार्ग से ही वे अपनी प्रिय उर्वशी को पुनह प्राप्त
24:39कर सकते हैं, क्योंकि प्रेम की शक्ती देवताओं को भी जुका सकती है
24:45उन्होंने पुरुर्वा को एक विशेश अगनी का रहस्य समझाया, जो केवल भौतिक ज्वाला नहीं थी, बलकि प्रेम और तपस्या की
24:53शुद्ध आध्यात्मिक उर्जा का प्रतीक थी
24:57गंधर्वोंने पुरुर्वा को उस पवित्र अगनी को स्थापित करने की विस्तृत विधी सिखाई, जिसमें मंत्रों का उच्चारण और शुद्ध समर्पन
25:05की आवश्शक्ता थी
25:08पुरुर्वा ने गंधर्वों की शिक्षा को पूरी श्रद्धा से स्विकार किया, उनके मन में एक नई आशा और अपनी प्रिये
25:15को पाने की अटूट ग्रिडता जागरित हुई
25:19उन्होंने गंधर्वों के मार्ग गर्शन में पवित्र स्थान को शुद्ध करना शुरू किया और यग्य के लिए आवश्यक सामगरी एकत्र
25:27की
25:28गंधर्वों ने समझाया कि यह अगनी केवल बाह्य कर्मकांड नहीं, बलकि आत्मा की शुद्धी और ब्रह्मांडिय उर्जा के साथ जुरने
25:37का माध्यम है
25:39पुरुर्वा ने ध्यान पूर्वक गंधर्वों द्वारा उच्चारित वैदिक मंत्रों को सुना और उन्हें अपने हिदय में आत्म साथ किया
25:48जब पुरुर्वा ने पूर्ण एक आग्रता से मंत्रों का जाब किया, तो एक पवित्र अगनी उनके समक्ष प्रकट हुई, जो
25:55उनकी तपस्या का प्रतीक थी
25:58उन्होंने श्रध्धा पूर्वक पहली आहुती अगनी में डाली, अपनी आत्मा की समस्थ पीड़ा और प्रेन को उस पवित्र ज्वाला में
26:06अर्पित करते हुए
26:09अगनी की स्थापना और आहुती के साथ ही, पुरुर्वा के हृदय में एक अलौकिक शांती का अनुभव हुआ, जिसने उनके
26:17वर्षों के कष्ट को शांत कर दिया
26:20उनकी विरह वेदना अब प्रेन के एक अटूट संकल्प में परिवर्थित हो चुकी थी, जो उन्हें उर्वशी की ओर और
26:27अधिक अग्रसर कर रहा था
26:30गंधर्वों ने पुरुर्वा को आशिर्वाद दिया और उन्हें अपनी तपस्या जारी रखने का निर्देश दिया, ताकि उनका उद्देश अवश्य पूर्ण
26:39हो
26:40उस दिन से पुरुर्वा का जीवन एक नई आध्यात्मिक यात्रा में परिवर्थित हो गया, जहां हर यग्य आहुती उनके हृदय
26:48को उर्वशी के निकट ला रही थी
26:51उन्हें विश्वास था कि इस अग्नी के माध्यम से उनकी भक्ती इतनी प्रखर होगी कि वह स्वर्ग से उनकी प्रिय
26:59उर्वशी को पुन्ह धर्ती पर ले आएगी
27:02कई वर्षों की गहन तपस्या और अन्वरत यग्य आहुतियों के बाद प्राजा पुरुर्वा अपने हृदय में उर्वशी को वापस लाने
27:10की अटूट आशा लिये अपने अंतिम महायग्य की पूर्ण आहुती की ओर बढ़ रहे थे
27:17जैसे ही अंतिम आहुती अग्नी में समाहित हुई एक अलौकिक प्रकाश पुंज उपर स्वर्ग से सीधा यग्यकुंड पर उत्रा जिसकी
27:25दिव्य आभाने संपूर्ण वातावर्ण को प्रज्वलित कर दिया
27:29उस अद्भुत प्रकाश के भीतर धीरे धीरे एक अलौकिक आकृती ने आकार लेना शुरू किया जो स्वर्ग की सभी सौंदर्य
27:38और अनुग्रह का प्रतीक थी
27:41पुरुर्वा ने भाय और विस्मय के मिश्रण से उस दिव्य द्रिष्टी को निहारा उनका हृदय प्रत्याशा और अविश्वास के साथ
27:49धड़क रहा था
27:51और फिर सभी भ्रम को चीरते हुए पुर्वशी स्वर्ग की सबसे सुंदर अपसरा अपनी पूरी महिमा में उनके सामने प्रकट
27:59हुई उनके रूप से दिव्य चमक विकियन हो रही थी
28:04पुरुर्वा की आखें अपने प्रेम को देखकर अश्रुपूर्ण हो उठीन और वे एक पल के लिए निहशब्द रह गए उनकी
28:11वर्षों की प्रतीच्षा आखिरकार पूरी हो चुकी थी
28:16पुर्वशी ने एक कोमल उदास मुस्कान के साथ पुरुर्वा की ओर देखा उनके चहरे पर एक गहरी शान्ती थी जो
28:23उनके दिव्य प्रेम की गाथा को बया कर रही थी
28:27उनकी मधुर आकाश्वानी जैसी आवाज ने यग्य भूमी में गूंज उठते हुए कहा कि उनका प्रेम केवल एक मानविय मिलन
28:36नहीं बलकी एक दैविय योजना का हिस्सा था
28:40पुर्वशी ने समझाया कि उनका मिलन चंद्रवंश के भविश्य को आकार देने और महान संतानों को जन्म देने के लिए
28:48इश्वरिय इच्छा से ही हुआ था
28:51उन्होंने पुर्वा को याद दिलाया कि एक राजा के रूप में उनका सबसे बड़ा कर्तव्य अपने राजधर्म का पालन करना
28:58और अपनी प्रजा का कल्यान सुनिश्चित करना है
29:02पुर्वा ने उर्वशी की बाते शांती से सुनी उनके चहरे पर अब अपने प्रेम के दिव्य उद्देश को समझने की
29:10एक नई द्रिड़ता थी
29:12पुर्वशी ने स्नेह पूर्वक उन्हें उनके पुत्रों आयुक, अमावसु और ध्रोन के बारे में बताया जो अब बड़े हो चुके
29:20थे और अपने पिता के मार्ग गर्शन का इंतजार कर रहे थे
29:35पुर्वशी ने उन्हें अब केवल सांसारिक सुखों से उपर उठकर एक गहरे आध्यात्मिक मार्ग पर चलने और परम सत्य की
29:44खोज करने के लिए प्रेरित किया
29:47उन्होंने समझाया कि वास्तविक प्रेम आत्माओं का मिलन है जो भौतिक संसार की सीमाओं से परे होता है और केवल
29:55आध्यात्मिक उन्नती से ही प्राप्थ होता है
29:59पुरुरवा ने गहन चिंतन में अपनी आखे बंद की उनके मन में उर्वशी के शब्दों का गहरा अर्थ आत्म साथ
30:06हो रहा था
30:08एक अंतिम मूख विदाई के साथ पुरुर्वा ने अपनी प्रिय उर्वशी की ओर देखा, जिनके चहरे पर अब एक शांत
30:15स्विकृती का भाव था, जो उनके नियत अलगाव को दर्शाता था
30:21धीरे धीरे उर्वशी की दिव्य आकरिती ने प्रकाश में विलीन होना शुरू कर दिया, उनकी चमक धीमी होती गई और
30:28वे स्वर्व के अनन्त आकाश में वापस लोट गई
30:32पुरूर्वा अब अकेले रह गए थे, लेकिन उनके हृदय में अपने प्रेम के खोजाने का दुहख कम और एक नई
30:40उच्छतर समझ का प्रकाश अधिक था
30:43उन्होंने अपने राजधर्म और आध्यात्मिक मार्ग को स्विकार कर लिया, इस अमर प्रेम गाथा ने उन्हें एक महान शासक और
30:51परम ज्ञानी व्यक्ती बनने की दिशा में अग्रसर किया
30:55नए ज्ञान के प्रकाश से उतप्रोत होकर, राजा पुरुर्वा ने अपने राज्य का संचालन असाधारन विवेक और न्याय के साथ
31:04करना आरंभ किया, जिससे प्रजा में सुक्समृध्धी का एक नया अध्याय खुल गया
31:10उनके अंतरमन में अब भी उर्वशी और उनके प्रेम की मधूर स्मृतिया थी, लेकिन मोह के स्थान पर उन स्मृतियों
31:18ने उन्हें जीवन के नश्वर सत्य और कर्तवय प्रायंता की ओर प्रेरित किया
31:24इसी बीच उनके कई पराक्रमी पुत्र जो उर्वशी से जन में थे, युवावस्था में प्रवेश कर चुके थे और अपनी
31:32असाधारण क्षमताओं तथा राजसी गुनों से चमक रहे थे
31:36उन सभी में सबसे बड़े पुत्र आयू, आयूस, अपने पिता के समान ही तेजस्वी, धैर्यवान और असाधारण युद्धा थे, जिनके
31:45नेत्रित्व गुन स्पष्ट रूप से जलक रहे थे
31:49अन्य पुत्र भी अपनी अपनी कलाओं में प्रवीन थे, एक संगीत में, दूसरा शास्त्रों में, और तीसरा युद्धनीती में अध्भुत
31:57कौशल प्रदर्शित कर रहा था
32:00पुरुर्वा ने अपने पुत्रों को केवल युद्धकला ही नहीं, बलकि धर्म, नीती, शासन और आत्मज्यान का भी गहन प्रशिक्षन देना
32:09आरंभ किया, ताकि वे भविश्य के योग्य शासक बन सके
32:14उनके मार्ग दर्शन में चंद्रवंश का राज्य समरिधी की नई उचाईयों को चूने लगा, प्रजा में सुख और संतोष का
32:21सामराज्य स्थापित हो गया
32:24पुरुर्वा ने उन्हें समझाया कि एक सच्चा राजा वही है जो धर्म का पालन करे, प्रजा की सेवा करे और
32:31अपने व्यक्तिगत मोह से उपर उठकर कर्तव्य निभाए
32:36उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों को साजा करते हुए, उर्वशी के साथ अपने अद्वितिय प्रेम और उससे मिली आध्यात्मिक सीख
32:45को अपने पुत्रों के सामने रखा
32:48जैसे जैसे आयू परिपक्व होते गए, पुरुर्वा ने उन में स्वयं की प्रतिध्वनी देखी और उन्हें राज्य का भार सौंपने
32:56का निर्णय ले लिया
32:58एक शुभ मुहूर्त में, राज्य सभा में राज्या पुरुर्वा ने अपने इस एतिहासिक निर्णय की घोशना की, जिससे समूचा राज्य
33:06हर्ष और उत्साह से भर गया
33:09अयोध्या नगरी में चंद्रवंश के नए राजा के राज्या भिशेक की भव्य तैयारिया शुरू हुई, जहां हर कोने से उत्सव
33:17की ध्वनी गूंज रही थी
33:19राज्या भिशेक समारोह में, पुरूर्वा ने अपने ही हाथों से आयू को राज्यमुकुट पहनाया, मानो अपने सभी अनुभवों और ज्यान
33:28को उनके सिर पर रख दिया हो
33:31अपने पुत्र को सिनहासन पर बैठा कर, पुरूर्वा ने एक गहरी सांस ली, उनके हृदय में प्रेम और त्याग का
33:38अध्भुत संगम था
33:40उन्होंने धीरे-धीरे अपने सभी राजसी वस्त्र और आभूशन उतार दिये, अब वे एक संत के समान साधारन जीवन की
33:48ओर अग्रसर होने को तयार थे
33:50अब एक साधारण भगवा वस्त्रधारण कर उन्होंने अपने पुत्रों और मंत्रियों को अंतिम बार प्रेम पूर्वक देखा उनके चहरे पर
34:00एक अविचल शान्ती थी
34:03महल के भव्यद्वार से बाहर निकल कर पुरुर्वा ने सांसारिक मोहमाया को पीछे छोड़ दिया और शान्त वनों की ओर
34:11अपने आध्यात्मिक मार्ग पर चल पड़े
34:14गहन वनों की शान्ती में उन्होंने एक एकांत कुटिया में प्रवेश किया जहां वे अपने शेश जीवन को ध्यान और
34:22तपस्या में समर्पित करने वाले थे
34:25वर्षों तक उन्होंने कठोर तपस्या की अपनी इंद्रियों पर नियंतरन प्राप्त किया और आत्मज्यान की गहरी अवस्थाओं को प्राप्त किया
34:35उनकी तपस्या और त्याग ने उन्हें केवल एक महान राजा ही नहीं, बल्कि एक परम ज्यानी महात्मा के रूप में
34:43अमर कर दिया
34:44अपनी गहन तपस्या के माध्यम से पुरुर्वा ने शरीर की सीमाओं को पार कर लिया और उनकी आत्मा ब्रहमांडिय उर्जा
34:53के साथ एकाकार होने लगी
34:55उनके चारों ओर की ब्रहमांडिये उर्जा और भी अधिक तीवरहो उठी जो उनकी आत्मा के उत्थान और आत्मग्यान की नई
35:04उचाईयों को दर्शा रही थी
35:07देवलोक में अनेक दिव्यप्राणी पुरुर्वा की असाधारन तपस्या को देखकर विस्मय और श्रद्धा से उनकी ओर निहार रहे थे
35:16अचानक देवर्शी नारद अपनी वीना पर दिव्यधुन बजाते हुए पुरुर्वा की कुटिया के समीप अवतरित हुए उनके मुख पर गहन
35:25संतोश और ज्ञान का भाव था
35:28नारद मुनी ने पुरुर्वा के वैराग्य और तपस्या के मार्ग पर विचार किया जिसने एक महान राजा को आत्म ज्यानी
35:35महात्मा में बदल दिया था
35:38पुरुर्वा ने ध्यान की अंतिम अवस्था में प्रवेश किया, जहां उनके चेतन और अचेतन मन की सभी परते विलीन हो
35:46गई
35:47सांसारिक मोह, व्यक्तिगत इच्छाए और हर प्रकार के बंधन उनसे पूरी तरह से मुक्त हो गए, जैसे हवा में उरते
35:55सुखे पते
35:57उन्होंने स्वयं को एक विशाल असीन प्रकाश के रूप में अनुभव किया, जो समय और स्थान की सभी अवधार नाव
36:05से परे था
36:07उनका व्यक्तिगत अस्तित्व परम्पिता परमात्मा के साथ पूर्ण रूप से एकाकार हो गया, जैसे एक बूंध सागर में विलीन हो
36:15जाती है
36:17यही वहक्षन था जब पुरुर्वा ने मोक्ष प्राप्त किया, जीवन मृत्यू के चक्र से मुक्थ होकर परम्शान्ती को प्राप्त किया
36:26उनकी शारिरिक काया से एक तीवर स्वर्गिय प्रकाश निकला, जो उनकी आत्मा के उत्थान का प्रत्यक्ष प्रमान था
36:34अब कुटिया खाली थी, परंतु उसकी प्रत्येक कण में पुरुर्वा की परम पावन उर्जा व्याप्त थी, जो शान्ती और दिव्यता
36:43बिखेर रही थी
36:45देवर्शी नारद ने अपने हाथों को जोड़ कर नमरता पूर्वक उस स्थान को प्रणाम किया जहाँ पुरुर्वा ने अपने नश्वर
36:53शरीर का त्याग किया था
36:55आकाश से दिव्य पुष्पों की वर्शा होने लगी, जो पुरुर्वा की मोक्ष प्राप्ती के उच्सव का प्रतीक थी
37:03वह दिव्य प्रकाश जिसने पुरुर्वा की देह का स्थान लिया था, धीरे धीरे उपर की ओर उठकर सितारों से भरे
37:11आकाश में विलीन हो गया
37:13स्वर्ग में उर्वशी ने अपने दिव्य अंतरग्यान से पुरुर्वा की आत्मा की मुक्ती को महसूस किया और उनके त्याग को
37:21समझा
37:22उसके हृदय में अब कोई दुख नहीं था, केवल पुरुर्वा के परम सुख की शांत, स्विकृती और उनके दिव्य मार्ग
37:30के लिए सम्मान था
37:32पुरुर्वा का यह आध्यात्मिक उत्थान चंद्रवंश के लिए एक शाश्वत प्रेना बन गया, जिसने उनके वंश्जों को भी धर्म और
37:40मोक्ष का मार्ग दिखाया
37:42उस रात आकाश में चंद्रमा पहले से कहीं अधिक उजजवल और शीतल प्रकाश बिखेर रहा था, जैसे वह पुरुर्वा की
37:51आत्मा की शुद्धता का गुनगान कर रहा हो
37:53इस प्रकार चंद्रवंश की नीम्व केवल राजसी शक्ती पर नहीं, बलकि परम वैराग्य और आध्यात्मिक ज्यान की अदमय शक्ती पर
38:03आधारित हुई

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